- हेमंत कुमार
"धरम से बड़ा है करम। करम का साखी कौन है महाराज!" इतना कहकर उन्होंने मेरी ओर देखा। मैं समझ नहीं पाया कि उन्होंने सवाल मुझसे पूछा है या अपने आप से। मैंने आत्मा, परमात्मा या समय जैसा कोई अटकळपच्चू जवाब देने की बजाय भरपूर नज़र उन्हें देखा। सवाल दरअसल न मुझसे था, न खुद से, बल्कि सवाल इसलिए था कि आगे जो वे कहने वाले हैं, वह बड़ी महत्त्वपूर्ण और वज़नदार बात है। अपनी बात की ओर ध्यान खींचने के लिए उन्होंने जब हाथ का पंजा फैलाकर आगे किया तो मेरा ध्यान उनकी देह की धूजणी की तरफ चला गया। आगे बढ़ता हुआ हाथ धूज रहा है, गर्दन पर रखा मुख समेत पूरा सिर हल्का-हल्का हिल रहा है। सामने गले की उभरी हुई दोनों लम्बी नसों के बीच गड्ढे में धँसी झुर्रियों भरी चमड़ी के साथ उनकी काया में करीब नब्बे बरस से बिराजा हँसला हर साँस के साथ यों डाँवाडोल हो रहा था जैसे हथेली में रखा चुग्गा चुगने आते पालतू मोर की नीली नाड़ ठीक कंठ तले के ठौर से काँपती है।
उणियारा (शक्ल) मेरी आँखों के आगे अब भी घूम रहा है। रंग गोरा, जिस पर उम्र ठौर-ठौर चकत्तों के रूप में हरा-नीला रंग भर रही है। चौड़े चेहरे से एक दिन पहले घुटी हुई दाढ़ी के धोळे रोयें दिखाई दे रहे हैं। आँखों के श्वेत-श्याम-रतनार रंग को फीका पड़े जुग बीत गए हैं। अब जरा-सा काँच के फूटे कंचों का फीका रंग शेष रह गया है।
धोळे पजामे, अध-भगवा कुर्ते, उस पर रानी रंग की इनर, उस पर गुलाब जामुनी रंग की तीन जेब की कोटी। सिर पर सिंदूरी गमछा। माथे पर जितना मोटा सिंदूर का सूरज, लगभग उतना ही सिंदूर गले और कानों की दोनों लवों पर भी थेथड़ा हुआ। चिटली और बीचली आँगळी को छोड़कर बाकी बची दोनों आँगळियों में मूँदड़ी। पगों में कैनवास की पगरखियाँ मिलकर उनके व्यक्तित्व के अध-औघड़िया रूप को और भी निरवाळा रूप देती थीं।
सिंदूर के टीके की बाबत पूछने पर उन्होंने चिड़ावा के बावळिया बाबा का नाम सिमर कर हाथ जोड़ दिए।
पहली मुलाकात में परिचय के सिलसिले में जब मैंने अपने गाँव का नाम लिया तो उन्होंने पहचान पुख्ता करने के लिहाज से पूछा- "उस गाँव के तो बरसों पहले एक तहसीलदार थे। जानते हो उनको?" मैंने जब उनका नाम बताया - 'फलाँ जी?' तो आत्मीयता की पुलक से भर उठे। फिर यादव जी को कहकर मेरे रात-बासे की व्यवस्था करवाई - "यार यादव जी! ये अपने रिश्तेदार हैं ध्यान रखना। कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए।"
यह पहली मुलाकात थी उनसे। वे दिन के तीसरे पहर रोज़ आया करते। कोई न कोई 'कुक्कू' (इलेक्ट्रिक रिक्शा) रोज़ उन्हें छोड़ने आता। वे चालीस रुपये भाड़ा निकाल कर दे देते। फिर तनिक देर बाहर बैठते - आए-गए के पास। फिर उठकर भीतर आ जाते। अंदर रखी फोटुओं के धोक खाकर बैठ जाते। हमें चाय के साथ मनुहार कर बिस्कुट खिलाते। खुद सिर्फ चाय पीते। फिर लाठी का ठेंगा टेकते हुए ज्यों ही वाटिका के बड़े दरख़्तों के पास पहुँचते, पेड़ों की डालों, कोटरों और पत्तों के बीच बैठी काठगिलहरियाँ दौड़ पड़तीं। वे उन्हें बिचुर-बिचुर कर पारले-जी बिस्कुट खिलाते जाते। गिलहरियाँ उनसे इतनी हिलमिल गई थीं कि पैरों से होते हुए सरपट कंधों पर चढ़ जातीं। कभी-कभी तो वे डट-डट या थम-थम की आवाज़ लगाते रह जाते पर वृक्ष-विहारिणी गिलहरियाँ उनकी जेब से बिस्कुट निकाल कर पिछले पंजों पर ठसक से बैठकर अगले दो पंजों में थाम कर पारले-जी का भोग लगाने लग जातीं। पशुपालन तो कई तरह के देखे हैं, पक्षी पालन भी। पर गिलहरी पालने वाला यह बिरला ही मामला था।
कुल जमा तीस दिनों में तीस-पैंतीस मुलाकातें हुईं मेरी उनसे। आदमी दयालु और दिलचस्प थे। किश्त-दर-किश्त की इन आधी-अधूरी मेल-मुलाकातों में उनके पूरे जीवन की अधूरी कहानी मुझे नसीब हुई।
घर की हालत खस्ता थी। भाई ऐसा क्रोधी कि पिताजी उसे रावण ही कहने लगे थे। बचपन खेत-कुएँ और घर में खटते बीता। ऊपर से घर की रोज़ की किचकिच-चिकचिक। उठ-सवेरे की राड़ (लड़ाई), घाटे की। अभाव। घाटा तो कमाने से ही पट सकता था सो कच्ची उमर में ही कमाने निकलना पड़ा। दो-च्यार क्लास आँक पढ़ गया था। कक्का-बारहखड़ी, पहाड़े-इकावळी, जोड़-बाकी, गुणा-भाग आ गया था जो ज़िंदगी में हमेशा काम आया। तो महाराज! घर से बाहर निकले बरस बीते। फिर एक बार जब मुसाफ़िरी से गाँव आया हुआ था तो सोचा ठाले बैठे क्या करेंगे। तो यहीं एक 'बस' पर खलासी रह गया। पुराना ज़माना था सो चाल-चलन और 'स्यान-सकल' का ठीक जानकर ब्याह-सगाई हो गई। पत्नी बड़े घर की इकलौती बेटी। सुंदर-सरूप! मायके में दो-दो चौकबंद हवेलियाँ छोड़कर ससुराल की झोंपड़ी में आई। भोळा-ढाळा पर मन का सच्चा जानकर सदा मुझे 'नरसी भगत' कहकर बुलाने लगी। कहते बखत उनकी आवाज़ में दुलार भरा पुलक था जैसे सत्तर-बहत्तर बरस पहले का समय फिर से आन पहुँचा हो। उनकी ब्यावली बीनणी जैसे शक्करपारे सरीखी मीठी जीभ से उन्हें 'नरसी भगत' कहकर पुकार रही हो।
ससुर का आसाम में काम था तो मुझे भी वहीं ले गए। बारह-छह महीने बीते। वहीं एक म्हेस्री बाण्या (माहेश्वरी बनिया) से भायलाचारी हुई। एक दिन उसने कहा, कि ससुराल वालों की नौकरी नहीं करनी चाहिए तो नौकरी छोड़ दी। उसी दोस्त के साथ च्याराना पाँती में दलाली का काम चालू कर दिया। धीरे-धीरे पाँती आठाना पहुँच गई। दिन फिरते देर नहीं लगती। अचानक घराळी बीमार पड़ गई। टीबी का रोग। आसाम का तिनसुकिया छोड़कर देस आना पड़ा। बेगार करनी थी सो कर ली, पर घराळी की हालत पतली होती गई और सन तिरासी की धोळी दोपहरी में उसने प्राण त्याग दिए। कहते-कहते उनकी बुझी-बुझी आँखों में अदीठ नमी झाँक गई। कोई आँसू नहीं। बस सूखा दुख। दुख की सुखेड़ी करके जैसे उन्होंने कहीं बचा रखी हो। क्या कुछ दुख कैर-सांगरी जैसे होते हैं, जिन्हें सुखाकर मन के किसी कोने में भरा जा सकता है, बरसों-बरस बाद भी फिर से जी लेने के लिए।
जब जीव की छटपटाहट नहीं मिटी तो वे पूरी देह और अधूरी ज़िंदगी को लेकर आसाम लौट गए, मगर काम-धन्धे में भी मन नहीं लगा तब वे तिनसुकिया से कामाख्या चले गए। वहाँ कई महीनों तक पंडों से तंत्र विद्या सीखी। इधर नाते-रिश्तेदार फिर ब्याह कराने की कोशिश में। तीन-तीन बच्चे बिन माँ के कैसे पलेंगे। सो रिश्ते देखे जाने लगे। इधर सती-दाह से व्याकुल-विरक्त शिव की तरह नरसी भगत ब्याह के लिए तैयार नहीं। एक बार तो बड़ा रोचक वाकया हुआ। मामा जी एक रिश्ता लेकर आए। एक खांड़ी (विधवा) हो रखी मास्टरनी का रिश्ता। रिश्ता क्या, रिश्तेवाली को ही साथ ले आए धर्मशाला में। उसने प्रेमपत्र लिख भेजा। आमने-सामने की मुलाकात में इन्होंने यह कहकर रिश्ता ठुकरा दिया कि माताजी! फिर चिट्ठी मत लिखना। तब जाकर पुनर्विवाह की कोशिशें बंद हुईं।
ब्याह से इनकार का कारण कहने लगे नरसी भगत कि महाराज, कन्याओं की माँ अनपढ़ थी पर उसने बड़ी बेटी की कॉपी में ग्यारह वचन लिखवाए थे कि महाराज! सूरज सा गरम मत होना। चनरमा सा सीतल रहना। धरती सा धरमातमा रहना। तुलसी सा पवितर रहना। और दुबारा शादी नहीं करना। नब्बे की उम्र में पहुँचे नरसी भगत की गिनती गड्डमड्ड थी या कोई और बात। उन्होंने शादी नहीं करने की बात एक-दो बार दोहराई और फिर अतीत की दुनिया में कहीं तनिक अटके रहे। फिर ज़रा रुक कर बोले, "महाराज! मरने से पहले पत्नी ने ग्यारह साल की बड़ी लड़की को रोटी पोना सिखा दिया। बड़ी ने छोटी को सिखा दिया। फिर बहू आ गई। एक दिन भी हाथाँ रोटी नहीं बनानी पड़ी। देखा जाए तो बेटी, बहू, स्त्री सब हाथ एक ही अन्नपूर्णा के हाथ हैं।"
नरसी भगत खासे ईमानदार आदमी ठहरे। जिन सेठजी के ट्रस्ट में काम कर रहे हैं, वह कोई आज से थोड़े ही कर रहे हैं। तीस बरस से बेसी हो गए, यहाँ की देख-रेख करते। शुरू में सेठ जी ने ईमानदारी की खूब परख ली। कभी तकिए, दरी के नीचे या आले में पैसे रख देते। कभी बाथरूम में। कभी तिजोरी की चाबी भूल से रखने का नाटक कर परखा पर जब कभी कोई हेरफेर न हुआ तो फिर आँख मूँदकर भरोसा करने लगे। नौ सौ रुपये से शुरू हुई तनख़्वाह आठ हजार रुपये तक पहुँच गई। पर इस ईमानदारी और अपरिग्रह वृत्ति से परिवार खुश नहीं। बेटे को शिकायत है कि क्या मिला ईमानदारी से। दूसरे ट्रस्टों में घुसे लोगों ने कई प्लॉट ले लिए। मगर यहाँ उसी बाप-दादों की गुवाड़ी के सिवा कुछ भी अर्जन नहीं किया। समूची उमर बावळपने में गँवा दी। लेकिन वे कहते हैं, "श्याणपत मुझसे होती नहीं।" लोग इस बमभोलेपन का फायदा उठाते हैं। "मैं सब समझता हूँ महाराज!" बड़े भोलेपन से उन्होंने अपनी समझदारी का किस्सा सुनाया कि किस तरह हार्ट अटैक का दर्द आने पर बदमाश डॉक्टर ने उनको मृत घोषित कर दिया। लेकिन बाबा श्याम की किरपा से अंत समय उनको होश आ गया और किस तरह उन्होंने उस बेईमान डॉक्टर को गाळ काढ़कर लताड़ा, "हँरै भाया डॉक्टर का पिट्या! जींवते को मृत घोषित करते तुम्हें शरम नहीं आई?"
उन्हीं के कहे मुताबिक सेठ उन्हें उनकी उम्र भर की सेवा के बदले में एक छोटा प्लॉट देना चाहता है लेकिन ये संकल्प करके भूमि का दान लेने को तैयार नहीं। ऐसे देना हो तो दे दो। मकान पर अपना नाम लिखा दो। पर संकल्प करके वे भूमि भार नहीं लेंगे। मादरार भूखे तो मरने से रहे। हालांकि घरवाले उनके इस इनकार को भी उनका सनातन ढेळूपना मानते हैं। जबकि उनका कहना है कि वे शेष बचे थोड़े से जीवन के लिए अपना अगला भोतर नहीं बिगाड़ सकते। क्योंकि करम को बाबा श्याम नहीं देखता। करम की साख भरते हैं चनरमा, सूरज और यह पर्थवी (पृथ्वी)!
अभी तीन बरस बाद यादव जी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि उम्र भर 'कन्या की माँ का ग्यारहवाँ वचन' निभाने वाले नरसी भगत का खुद का ग्यारहवाँ, बारहवाँ, तेरहवाँ सब कोई दो बरस पहले हो गया है। ज़माना विकास की राह चलते-चलते ब्याहता से वचन निभाने की बजाय उसे ठिकाने लगाने तक का आ गया है। करम का साखी कौन है महाराज!

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