- सत्यनारायण व्यास
दो
कारणों
से
आलोचना
में
नामवर
सिंह
की
पहचान
विशिष्ट
है।
एक
तो
यह
कि
उनकी
आलोचना
सृजनात्मक
है
और
दूसरा
कारण
सामाजिक
और
सांस्कृतिक
दायित्वबोध
है।
अतः
उन्हें
‘मार्क्सवादी’
आलोचक
कहना
उनकी
अधूरी
पहचान
है।
साहित्य
में
कुछ
उतावले
लोग
किसी
भी
बड़े
लेखक
पर
‘लेबल’
लगा
देने
की
जल्दबाजी
करते
हैं।
आचार्य
शुक्ल
को
ब्राह्मणवादी
और
वर्णाश्रम
का
समर्थक
कहना
ऐसे
ही
निचले
स्तर
के
लेबल
हैं,
जो
बड़े
लेखकों
पर
पूर्वग्रहजनित
छींटाकशी
से
कुछ
ज़्यादा
नहीं
लगते।
आधुनिक
आलोचकों
में
नामवर
सिंह
ही
सबसे
ज़्यादा
प्रत्यालोचना
के
शिकार
हुए
हैं।
इसकी
वज़ह
है,
मार्क्सवादी
साँचे
से
बाहर
निकलकर
बड़े
और
व्यापक
फलक
पर
विमर्श
करना।
वे
ऐतिहासिक
परंपरा
और
आधुनिकता
के
बीच
एक
विश्वसनीय
सेतु
हैं-
बहुत
मजबूत,
तर्कसंगत
और
वस्तुपरक
।
वे
विचारधारा
को
पीछे
छोड़कर
भारतीय
संस्कृति
और
साहित्य
का
गहरा
दायित्वबोध
निभाते
हैं।
आचार्य
मम्मट
के
शास्त्रीय
ग्रन्थ
‘काव्यप्रकाश’
से
लेकर
आचार्य
शुक्ल
के
सिद्धान्त-पक्ष
तक
सोद्देश्य
और
सार्थक
विश्लेषण
करते
हैं।
कृति
का
मूल्यांकन
उनके
लिए
एक
प्लेटफॉर्म
है,
जिस
पर
खड़े
रहकर
वे
युगीन
परिवेश,
सामयिक
प्रतिमानों
की
भी
शिनाख्त
करते
हैं,
जो
हर
सामान्य
आलोचक
के
बस
की
बात
नहीं
होती।
संस्कृत
वाङ्मय
के
उद्धरणों
और
संदर्भों
से
पता
चलता
है
कि
क्लासिकी
परंपरा
में
उनकी
कितनी
गहरी
पैठ
है।
वे
राजशेखर
की
‘काव्य
मीमांसा’,
‘कालिदास
के
रघुवंश’
और
‘कुमारसंभव’
के
प्रसंगों
से
वर्तमान
कविताओं
की
तुलनात्मक
आलोचना
करने
में
समर्थ
हैं।
यह
प्रवृत्ति
इस
बात
को
सूचित
करती
है
कि
एक
आलोचक
के
अध्ययन
का
दायरा
कितना
बड़ा
और
स्मृति-गंभीर
होना
ज़रूरी
है।
आलोचना,
साहित्यिक
कर्म
के
साथ
पूर्ण
सामाजिक
दायित्व
भी
है।
अतः
साहित्येतर
विषयों
में
जाना
पड़ता
है-
चाहे
राजनीति
हो,
अर्थशास्त्र
हो
या
समाजविज्ञान
हो।
इन
सबको
टटोलकर
वहाँ
से
उचित
सामग्री
लेकर
आलोचना
से
जोड़ना
कोई
मामूली
काम
नहीं
है।आचार्य
शुक्ल
के
ही
कथन
से
वे
अपनी
कठिनाई
को
व्यक्त
करते
हैं
कि
‘सभ्यता
के
विकास
के
साथ-साथ
कविकर्म
भी
कठिन
होता
जाता
है’
तो
“मैंने
इसमें
आगे
यह
जोड़ा
था
कि
आलोचना
कर्म
और
भी
कठिन
होता
जाता
है।”
अपने
वाराणसी
में
दिए
गए
एक
व्याख्यान
में
उन्होंने
कहा
कि
“इसलिए
हिंदी
आलोचना
के
सामने
कविता-कहानियों
को
व्याख्या
का
अर्थ
तो
बाद
में
आएगा,
पहले
तो
वे
मज़बूत
साम्राज्यवादी
विचारधाराएँ,
जो
बन
रही
है,
हथियार
तैयार
हो
रहे
हैं,
उन
विचारधाराओं,
प्रवृतियों
का
उतनी
ही
मज़बूती
से
जवाब
देना
है-
एक
सशक्त
थियरी
के
द्वारा।
यह
चुनौती
है
आज़
की
आलोचना
के
सामने
और
इसकी
कमी
है
हमारी
हिंदी
आलोचना
में।
धोखे
में
हैं
हम।
वे
कहते
हैं-
एंड
ऑफ
आइडियोलोजी
तो
हम
भी
मान
लेते
हैं
कि
आइडियोलोजी
का
अंत
हो
गया।
अब
कैसे
अपने
देश
के
इन
ज्ञानी-समझदार
लोगों
को
मैं
समझाऊँ
कि
वे
जो
कह
रहे
हैं
कि
आइडियोलोजी
का
अन्त
हो
गया,
वे
खुद
कितनी
बड़ी
विचारधारा
अपने
यहाँ
पैदा
कर
तुम्हारे
पास
भेज
रहे
हैं।
अब
तुम
स्वयं
हथियार
डालकर
कह
रहे
हो
कि
विचारधारा
की
आवश्यकता
नहीं
रही।
आज़
विचारधारा
की
ज़्यादा
ज़रूरत
है
और
जब
भी
वे
उस
विचारधारा
को
लेकर
लड़ने
आएँगे
तो
कोई
विकल्प
नहीं
होगा,
मार्क्स
के
अलावा।”
उपर्युक्त
उद्धरण
से
नामवर
सिंह
अवश्य
विचारधारा
के
प्रति
कमिटेड
लगते
हैं,
लेकिन
वे
हमेशा
इसी
से
चिपके
नहीं
रहते
और
अपनी
इस
प्रतिबद्धता
को
लाँघकर
व्यापक-विराट
सांस्कृतिक
विरासत
की
थाह
लेते
हुए
आलोचना
को
पक्के
सामाजिक
दायित्व
में
बदल
देते
हैं।
उनकी
आलोचना
कृति
के
आस्वादन
और
मूल्यांकन
के
बाद
उसके
पार
जाती
है,
जहाँ
वह
साहित्यिक
कर्म
से
बढ़कर
सामाजिक
कर्तव्य
में
रूपांतरित
हो
जाती
है।
यहाँ
यह
कहना
भी
ज़रूरी
लगता
है
कि
हिंदी
आलोचना
को
संस्कृत
की
शास्त्रीय
परंपरा
के
प्रभुत्व
और
वर्चस्व
से
बचाए
रखने
और
जड़शास्त्र
के
दबाव
के
समानांतर
अधिकाधिक
जीवंत,
लोकपरक
और
रचनात्मक
बनाए
रखने
में
नामवर
जी
की
भूमिका
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल,
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
की
तरह
असंदिग्ध
है।
लेकिन
इस
प्रक्रिया
में
वे
‘शास्त्र’
को
भी
हमारे
समय
में
पुनर्नवा
करते
रहे
हैं।
मगर,
शास्त्र
के
सम्मुख
झुकते
नहीं
हैं।
बार-बार
यह
कहा
गया
है
कि
नामवरसिंह
की
स्मरणशक्ति
अद्भुत
है,
जो
उनके
आलोचना-कर्म
का
प्रमुख
आधार
है।
उनका
पश्चिमी
लेखकों,
विशेषकर
मार्क्सवादी
विचारकों
का
व्यापक
और
गहन
अध्ययन-
लुकाच,
क्रिस्टोफर
कोडवेल,
सार्त्र,
पाब्लो
नेरूदा,
ब्रेख्त,
चीन
और
रूस
के
लेखकों
सहित
हिंदी
के
रचनाकारों-
मुक्तिबोध
नागार्जुन,
त्रिलोचन,
शमशेर,
रघुवीर
सहाय,
धूमिल
और
पाश
को
पहली
बार
ढंग
से
स्थापित
करने
का
बड़ा
काम
किया
है।
खुद
नामवर
सिंह
के
कृतित्व
को
देखें
तो
उनका
लिखा
कम
नहीं
माना
जा
सकता।
उन्हें
बार-बार
उलाहना
दिया
गया
कि
व्याख्यान
ज़्यादा
दिए
और
लिखा
कम,
यह
बिलकुल
झूठ
है।
विद्यार्थी
अवस्था
से
ही
उन्होंने
प्रौढ़
लेखन
शुरू
कर
दिया
था।
बड़े
होने
पर
उनकी
ये
पुस्तकें
आईं-
1. हिंदी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योगदान
2. पृथ्वीराज
रासो
की
भाषा
3. छायावाद
4. आधुनिक
साहित्य
की
प्रवृतियाँ
5. इतिहास
और
आलोचना
6. कहानी
नयी
कहानी
7. कविता
के
नये
प्रतिमान
8. दूसरी
परंपरा
की
खोज
9. वाद-विवाद-संवाद,
और
10. आलोचना
के
संपादकीय
आदि।
इनके
अलावा
अभी
हाल
ही
में
आशीष
त्रिपाठी
ने
उनके
अप्रकाशित
निबंध,
व्याख्यान
और
अन्य
पुस्तकों
की
भूमिकाओं
के
लगभग
2000 पृष्ठों
की
सामग्री
ढूँढ़कर,
संपादित
करके
करीब
बारह
पुस्तकों
की
शृंखला
प्रकाशित
कराई
है।
अतः
उन्हें
‘वाचिक
आलोचक’
का
उपालंभ
देनेवालों
की
अनुदारता
है।
नामवर
जी
अपने
ढंग
के
शिरोमणि
और
वाग्मी
वक्ता
रहे
हैं,
जो
उनके
व्यक्तित्व
का
उज्ज्वल
पक्ष
है।
उनके
व्याख्यान
भी
सृजनात्मक,
आकर्षक
और
विचारोत्तेजक
होते
थे।
व्यंग्य
का
पुट,
गहरी
मार
और
विद्वत्ता
का
मेल
उनके
वक्तव्यों
की
जान
थी।
साथ
ही
वे
एक
अविस्मरणीय
अध्यापक
भी
थे।
कक्षा
में
दिए
गए
उनके
लेक्चर
यदि
कहीं
रिकॉर्ड
होते
तो
शायद
पचासेक
साहित्यिक
ग्रंथ
बन
सकते
थे।
उनकी
आलोचना-भाषा
मौलिक
और
खुद
की
कमाई
हुई
थी।
उनके
बोलने
में
ही
विदग्धता
रहती
थी।
कविता
के
तो
वे
बड़े
आलोचक
हैं
ही,
कहानी
के
भी
अग्रणी
प्रवक्ता
माने
गए।
नामवर
सिंह
की
आलोचना
भाषा
बहुत
गहरे
अर्थ
लिए
हुए
चलती
थी।
डॉ.
नगेन्द्र
और
अज्ञेय
के
रचनाकर्म
पर
उनकी
समीक्षकीय
टिप्पणी
अकाट्य
दस्तावेज़
हैं
लेकिन
सर्वत्र
शालीनता
और
सभ्यता
का
निर्वाह
करते
हुए।
उनकी
मान्यता
थी
कि
हिंदी
आलोचना
की
भाषा
को
तोड़कर
नयी
बनाना
ज़रूरी
है।
भाषा
को
जब
तक
हिंदी
आलोचना
नहीं
तोड़ेगी,
तब
तक
वह
एक
ही
जगह
पर
कवायद
करती
रहेगी।
और
नामवर
सिंह
ने
यही
काम
किया
और
इसी
से
उनकी
ख्याति
में
चार
चाँद
लगे
हैं।
बड़े-से-बड़े
रचनाकार
और
आलोचक
की
सीमाएँ
होती
हैं।
आचार्य
शुक्ल
से
लेकर
सभी
आधुनिक
आलोचकों
पर
यह
नियति
लागू
होती
है।
अपने
गुरु
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
की
भाँति
वे
विचारधारा
मुक्त
नहीं
हो
पाए।
द्विवेदीजी
कहते
थे
‘मनुष्य
ही
साहित्य
का
लक्ष्य
है।’
इस
स्तर
की
उदारता,
उदात्तता
और
सार्वभौमिकता
उनकी
विचारधारागत
प्रतिबद्धता
के
चलते
उनमें
नहीं
आ
सकी।
दिनकर
का
कथन
है
कि
“प्रगतिशील
होने
के
लिए
कम्यूनिस्ट
होना
ज़रूरी
नहीं
है।”
नामवर
जी
की
आस्था
मनुष्य
और
लोक
के
प्रति
थी,
पर
वह
‘वाया
आइडियोलॉजी’
के
थी।
बस,
यही
तकनीकी
फ़र्क
गुरुदेव
और
शिष्य
में
रह
गया।
वरना
प्रतिभा,
विद्वता
और
आलोचना
में
आज़
तक
डॉ.
नामवरसिंह
का
कोई
सानी
नहीं,
कोई
जवाब
नहीं
है।
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