शोध आलेख : नामवर सिंह की शमशेर सम्बन्धी आलोचना / धीरेन्द्र कुमार

नामवर सिंह की शमशेर सम्बन्धी आलोचना
- धीरेन्द्र कुमार

 

नामवर सिंह आधुनिक हिन्दी कविता के पहले व्यवस्थित और प्रगतिशील हिन्दी आलोचना के शिखर आलोचक हैं। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कविता के मूल्यांकन में महत्त्वपूर्ण स्थापनाएं दी हैं। हम उनकी स्थापनाओं से सहमत-असहमत हो सकते हैं लेकिन उन्हें पूर्णतः ख़ारिज नहीं कर सकते। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, बाबा नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध और त्रिलोचन शास्त्री पर अप्रतिम लिखा है। बावजूद इसके नामवर सिंह कीशमशेर की शमशेरियतलेख में कुछ ऐसी स्थापनाएँ हैं। जिस पर अवश्य विचार होना चाहिए। शमशेर के काव्य में स्त्री के रूप और सौन्दर्य की एक ऐसी दुनिया निर्मित है, जिसमें ढेरों मांसल-बिम्ब और दैहिक सौन्दर्य की सहज अभिव्यक्ति है।

डॉ. नामवर सिंह ने शमशेर की कविता के विषय लिखा है कि “...अकुंठ मन से शरीर का उत्सव रचा गया है। शमशेर के लिए सौन्दर्यएक अष्टधातु का-साहै, जिसमेंजंघाएँ ठोस दरिया/ ठैरे हुए से1 मेरा विचार है कि शमशेर की कविता में स्त्री का रूप है, सौन्दर्य है, उसके विविध अंगों का चित्रण है लेकिन इसेशरीर का उत्सवकहना शमशेर की कविता का उचित मूल्यांकन नहीं है। नामवर सिंहशमशेर की शमशेरियतलेख की शुरुआत मुक्तिबोध के उस कथन से करते हैंशमशेर की आत्मा ने अपनी अभिव्यक्ति का जो एक प्रभावशाली भवन अपने हाथों तैयार किया है, उसमें जाने से मुक्तिबोध को भी डर लगता है-‘उसकी गंभीर प्रयत्नसाध्य पवित्रता के कारण2 शमशेर की कविता इतनी प्रबुद्ध और सजग होते हुए भी क्याशरीर का उत्सवरच सकती है? नामवर सिंह की इस उक्ति पर विचार होना चाहिए। शमशेर बदन कोआबशारयाअष्टधातुकहते हैं, तो पाठक के मन में एक पेंटिंग का भाव उभरता है। शमशेर चित्रकार भी हैं इसलिए जब वे कविता में खालिश देह की बात करते हैं तो उसमें वे देह के साथ सौन्दर्य की किसी प्रतिमा को गढ़ते हैं। वे देह या ऐन्द्रिय बिम्बों को रचते समय शरीर के अंगों को इस तरह कविता में ढालते हैं कि देह का आकर्षण समाप्त हो जाता है और कविता एक पंटिंग में बदल जाता है। जिसे नामवर सिंह के शब्दों में, “कभी-कभी ऐसा लगता है कि नारी-शरीर भी शमशेर के लिए जैसे एक कलाकृति है- अपने रूपाकार मात्र के लिए आकर्षण है।3 शमशेर कविता में देह को खूबसूरत कलात्मक ढंग से उकेरते हैं। उनकी कविता देह के मामले में ज्यादा मुखर है। वह देह के चित्रण में ऐन्दियता का प्रसारण है। इसमें बिना किसी झिझक के स्त्री के अनेक अंगों का वर्णन हैं। वह भी अपने समकालीनों से बिल्कुल भिन्न। वह कविता में देह को छुपाते नहीं अपितु देह के सौन्दर्य को पूरी सिद्दत से गड़ते हैं। उनकी अनेक कविताओं में ऐन्द्रियता होने के बावजूद संवेदना का नया आयाम रचती हैं। शमशेर इस शिल्प की सुघड़ता के नायाब हीरो हैं। इसे इन उदाहरणों से समझिए- 1. “तुम मेरी पहली प्रेमिका हो/ जो आइने की तरह साफ/ बदन के माध्यम से ही बात करती हो।/…/ वह काँसे का चिकना बदन हवा में हिल रहा है।/ हवा हौले-हौले नाच रही है,/ इसलिए...”4, 2. “यह पूरा/ कोमल काँसे में ढला/ गोलाइयों का आईना/ मेरे सीने से कसकर भी/ आजाद है|”5, 3. “एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा/ सचमुच? / जंघाएँ दो ठोस दरिया/ ठैरे हुए-से/ ठोस वक्ष कपोल उभरे हुए चारों/ निमंत्रण देते चैलेंज सा।6

शमशेर की कविता मेंसलोने जागे हुए जिस्महैं, ‘अध-खुली अंगडाइयाँ हैं, ‘भीनी गंध में बेहोश भौरों को कसे हुए, ‘नील जलमें उषा की गौर झिलमिल देहहै, ‘साँवलापन रात का गहरा सलोनाहै, औरस्तनों के बिंबित उभार लिए हुएहै। प्रेमिका का ठोससुडौल बदन एक आबशार हैयह कवि के अंतर्मन मेंअजब तौर सेव्याप्त है।

यहाँ शमशेर का मांसल सौन्दर्य सर्वाधिक मुखर है। इनकी कविता में पहली बार यहाँ नारी देह सच्चे अर्थो में दैहिकता प्राप्त करती है। वह भी रीतिकाल के नख-शिख से एकदम भिन्न। यहाँ सिर्फ देह नहीं है, बल्कि ठोस और सुडौल बदन है, जो गठा हुआ। कविता में शमशेर की यह कलात्मक ऊँचाई है। वह पत्थर की तरह तराशी हुई प्रतिमा को भी इस तरह निहारते हैं- “चिकनी चाँदी-सी माटी/ वह देह धूप में गीली/ लेटी है हँसती-सी।7

उन्होंने केवल प्रकृति के अवलम्बन द्वारा स्त्री केरूपऔरअरूपसौन्दर्य की खोज की। शमशेर की कविताओं में स्त्री का शरीर है लेकिन उसका उत्सव नहीं। वह देह को पाने की लालसा में नहीं फंसते अपितु उसके सौन्दर्य को सिरजते हैं। कवि और आलोचक गोबिन्द प्रसाद ने लिखा हैं, “शमशेर ऐसे ही कवि हैं जिन्होंने सौन्दर्य को उसके अनावृत्त लिवास में भी तर्जे तकल्लुफ की एक तहज़ीब बख्शी; सौन्दर्य को सहज भाषा में अनाहत रूप प्रदान किया।8 अतः शमशेर का काव्य प्रेम की तीव्रता के साथ-साथ दैहिक सौन्दर्य का अद्भुत आख्यान है। उनके यहाँ नारी देह के प्रति चरम आसक्ति तथा सम्मोहन है। वह स्त्री देह के चित्रण को अश्लील होने से बचा लेते हैं। ये शमशेर के काव्य की विशेषता है। शिल्प की सुघड़ता के मामले में शमशेर अकेले कवि हैं। जो दैहिक कविता लिखकर भी विदेह होने की कला जानते हैं। देह के आरोप से खुद को बचा ले जाना शमशेर को भलीभांति आता है। शमशेर की कविताओं में सौन्दर्य चेतना की एक अजब-सी लौ है, जो दैहिकता में भी सौन्दर्य खोजती है। इसलिए शमशेर दैहिक सौन्दर्य के कवि हैं।

शमशेर की कविता सघन ऐन्द्रियता के उस आकुल भरे प्रेम की उपज है जिसमें प्रेम की अनुभूति सघनतम रूप में व्याप्त है। जहाँ कविता में वह देह होने पर भी विदेह हो गई है। वह देह की भौतिकता से परे हुई है- “तूने मुझे दूरियों से बढ़कर/ एक अहर्निश गोद बनकर/ लपेट लिया है।/ इतनी विशाल व्यापक तू होगी/ सच कहता हूँ, मुझे स्वप्न में भी/ गुमान था।9 शमशेर कुछ कविताओं में देह से विदेह हो जाते है। “ ‘मॉडल और आर्टिस्टकविता में एक मॉडल कलाकार से अपनी कला में बाँधने का आग्रह करती है। यहाँ कवि की ऐन्द्रियता सजीव हो उठती है- “ये हैं मेरे वक्ष-गोल से गोल; कहीं देखे होंगे तो कहो, ऐसे/ ये- ये ही बिबाधर/ जल रहे हैं जहाँ अंगारे,/ यह कटि-प्रदेश/ जंघाएँ, कि गोरे पारद के दो/ दरिया, ये केश/ कि रात के जादू का प्रदेश...यही होता है।10

शमशेर देह की सुन्दरता पर बार-बार रीझते हैं और सुन्दर बिम्ब रचते हैं। लेकिन देह की यह सुन्दरता, माँसलता कवि की चेतना में ऐन्द्रियता, अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकती। दैहिक सौन्दर्य तो परिवर्तनीय है। यह बदलता रहता है। इसलिए शमशेर इस सौन्दर्य का, देह की सत्ता का अतिक्रमण करते हैं और दृश्यमान ऐन्द्रियता से परे चले जाते हैं। इस क्रम में  में उन्हें दैवीय सत्ता का साक्षात्कार होता है। जहाँ शमशेरमॉडलकी जगह स्वयं को शोधने लगते हैं। उस समय शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। कवि को अपनी सत्ता का भान होने लगता है। शब्द, रूप, आकार, चाप सब के अर्थ सौन्दर्यमय हो जाते हैं। कवि उस परम सौन्दर्यानुभूति में स्वयं से साक्षात्कार करता है- “यह हो तुम/ शब्द नहीं, रूप/ आकार चाप, अर्थ/ वह सत्ता/ जो होने-होने को हो मेरे अन्दर/ वही तुम/ .../ कहाँ शरीर त्वचा केश/ अधर वक्ष जंघा-/ ये केवल आवरण सघनतम/ रुपार्थ के आवरण11 शमशेर के लिए शरीर केवल रूप का आवरण है। इसलिए वह रूप में सौन्दर्यानुभूति को मिलाते हैं। इयान वोट की यह स्थापना किवह प्रेम अवश्य हीभोग-लिप्सासे प्रेरित होता है जिसमें स्त्री देह को चित्रित करने की प्रवृत्ति पायी जाती है।इस चश्मे से देखने पर शमशेर की सघन ऐन्द्रियता की व्याख्या संभव नहीं। शमशेर की सघन ऐन्द्रियता को प्रेम और सौन्दर्य से अलगाकर नहीं देखा जा सकता। उनकी सघन ऐन्दियता प्रेम और सौन्दर्य की खोज हैं। शमशेर देह को उसकी पूरी निर्मिति में उठाते हैं। उसके अंग-प्रत्यंग को तराशकर आँकते हैं। वह सिर्फ देह को ही नहीं आँकते, उस प्रेम को भी आँकते हैं जिसमें डूबकर उसके अवलम्ब पर रीझ सकें। देह प्रेम का अवलम्ब ही तो है। इसलिए वर्जना देह की हो सकती है। उस प्रेम की कहाँ जिसमें विलीन होकर कवि जीवन की मुक्ति का रहस्य समझ पाता है। शमशेर तो प्रकृति को भी देह के अवलम्ब से परे नहीं देखते। वे स्त्री देह के अंग से प्रकृति के संचरण को आंकते हुए उसी में डूब जाते हैं। शमशेर के काव्य की प्रकृति देह के अवलम्ब में प्रेम और सौन्दर्य को पाने की है। वह देह, प्रकृति, प्रेम और सौन्दर्य के विरले कवि हैं।

शमशेर की दैहिक कविताओं में सर्वत्र एक अतृप्ति, असंतोष और चाह का एक भाव है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। प्रेम अशरीरी अवश्य है। वह केवल भाव तक सीमित नहीं है। इसमें एक कायावेग है। उस आवेग के कारण ही ऐन्द्रियता इतनी सघन हो पायी है। उदाहरणस्वरुप जिनमेंचुका भी हूँ मैं नहीं, ‘हार-हार समझा मैं, ‘सावन, ‘टूटी हुई बिखरी हुईआदि अनेक कविताएँ शामिल हैं।जमाना तुम होजिन्दगी तुम होकहते शमशेर की कविताओं में प्रेम जीवन जीने का प्रश्न बन गया है। वह प्रेम को अपने अंतर्मन में बसाता और अपनी अंतरात्मा की आकांक्षाओं में देह को उस प्रेम का आधार बनाकर सघन ऐन्द्रियता संभव करता है। वे जब देह का चित्रण करते हैं तो मानो ऐसा लगता है कि वह उस देह से जुदा नहीं। देह के सारे अवलम्ब सहज ही कविता में उतर आते हैं। वे उनके आमंत्रण को स्वीकार करते हैं। अतः शमशेर की ऐन्द्रियता का रहस्य देह के होने में भी है और उससे परे भी। 

नामवर सिंह ने शमशेर कोरंगों के महोत्सव12  का कवि कहा है। उनकी ये स्थापना भी अतिवाद में दिया गया वक्तव्य है। शमशेर के काव्य में अनेक रंग हैं। शायद ही हिन्दी में जितने रंगों का प्रयोग शमशेर ने कविता में किया है उतना किसी अन्य कवि ने किया हो। नामवर सिंह के अनुसार, “अकेले एक धूप के ही कितने-कितने रूप! वैसे शमशेर का अपना प्रिय रंग साँवला है, जो कभी-कभीकेसरिया साँवलापनभी हो जाता है, कभी साँवला संगमर्मरी आबशारऔर कभी एक नीला दरिया बरस रहा है।’...हिंदी कविता में रंगों का ऐसा महोत्सव अन्यत्र दुर्लभ है।13

दरअसल, शमशेर की कविता में प्रकृति के माध्यम से कई रंग आए हैं। उन्होंने अकेलेशामके अनेक रंग प्रस्तुत किए हैं। इन रंगों में ख़ुशी, उल्लास या जीवन की मधुरता सिरे से गायब है। ये वह रंग हैं जो शमशेर को प्रिय अवश्य हैं लेकिन उनकी कसक का कारण भी।एक पीली शाम/ पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता शांत/ मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल|’ ये कविता शमशेर ने अपनी पत्नी की मृत्यु से ठीक पहले लिखी है। पत्नी को जाते हुए कवि देख रहा है। जिसे उसने पीली शाम और पतझर की संज्ञा दी है। इस तरह शाम के पीलेपन में कवि की उदासी छिपी हुई है। बिछुड़ने के याद जुड़ी हुई है।  ऋषभदेव शर्मा के अनुसार, “शमशेर की शाम के रंग जहाँ उदासी से भरे हुए हैं, वहीं सुबह के रंग जागरण चेतना और उल्लास से भरपूर हैं।14 

शमशेर की अनेक कविताओं के शीर्षक में या कविताओं में अनेक रंग भरे हुए हैं।मकई-से वे लाल गेहूँए तलवे, ‘गायें’-गायें मैली, सफ़ेद, काली, भूरी, ‘उषा, ‘पूर्णिमा का चाँद, ‘एक पूरा असमान का असमान, ‘गीली मुलायम लटें, ‘एक नीला आईना बेठोस, ‘होली : रंग और दिशाएँ, ‘धूप कोठरी के आईने में खड़ी, ‘ पलटना उधर, ‘सारनाथ की एक शाम, ‘गजानन मुक्तिबोध, ‘कत्थई गुलाब, ‘एक नीला दरिया बरस रहा है, ‘अफ्रीका, ‘प्रकृति-रूप, ‘प्रेयसीआदि कविताओं में रंगों का अधिक रूपायन हैं। इनमें कुछ कविताएँ में सुबह के जागरण के रंग हैं, जहाँ उन्मुक्त होकर कवि ने रंगों को सिरजा है। बावजूद इसके शमशेर की कविता में आए रंगों का मूल कथ्यउल्लास और विलास के रंगों में भी कवि अवसाद और विषाद की छायाएं तलाशने को अभिशप्त हैं। रंगों के प्रयोग से मन की गुत्थियाँ किस तरह अनजाने में खुलती हैं, यह देखने के लिए भी शमशेर की कविताओं का रंगपाठ तैयार किया जा सकता है...|”15 शमशेर को प्रकृति से, पुष्पों से, पत्तों से और ऋतुओं से अनन्य प्रेम था। इन पर लिखते हुए उनकी संवेदना और सघन है। इस अर्थ में कवि शमशेर बहुरंगी हैं।

शमशेर के काव्यगत रंगों के रचाव में ख़ुशी या उल्लास कम अवसाद, उदासी, विषाद अधिक किया है। नामवर सिंह विचार है कि एक कवि और चित्रकार के नाते शमशेर के लिएशब्द रंग भी हैं, रेखा भी और सुर भी- शब्द में निहित इन संभावनाओं की तलाश जैसी शमशेर में है, अन्यत्र विरल है।16 उनका ये कहना बिल्कुल सही है। शमशेर कवि हैं, चित्रकार हैं और कलारूपों के उपासक हैं। नामवर सिंह ने लिखते हैं, “वान गांग और पिकासो के चित्र देखकर, बाख़ का संगीत सुनकर जो कविताएँ उन्होंने लिखी हैं, उनसे हिन्दी कविता में एक नई वृत्ति की शुरुआत हुई है।...भाषा का रूपाकार भी शमशेर के लिए एक आश्चर्यलोक रहा है। यह कोरी प्रयोगशीलता नहीं, बल्कि कवि की कलानुभूति का अतिरिक्त आयाम है।17 दरअसल रंगों के प्रति उनकी समझ विभिन्न अभिप्रायों से जुड़ी हुई है। जहाँ रंगों के अमूर्तन में कवि की निजी और ज़माने भर की पीड़ा और विषाद छिपा हुआ है। कवि और आलोचक गोबिन्द प्रसाद ने लिखा है, “शमशेर ही अकेले ऐसे कवि हैं प्रगतिशील काव्यधारा के कवियों में जिनकी कविता में रंगों का महत्त्व इस क़दर है कि बहुधा उनकी काव्य-संवेदना की निर्मिति में रंगों की एक बड़ी भूमिका दिखाई पड़ती है। उनके यहाँ रंग, महज़ रंग होकर भाव-स्थितियों, स्थिति और आकांक्षा के द्वैत से निर्मित कल्पना में घिरे आलोक-अमूर्तन हैं जो काव्य-संवेदना के तंतुओं को आलोकित करने के साथ-साथ उनके अनछुए आयाम में भी कौंधने लगते हैं।18

शमशेर की कविताओं के बारे में पाठक वर्ग में अक्सर यह धारणा बनी हुई है कि उनके काव्य में स्त्री देह का प्रदर्शन है। सामान्यतौर पर यह धारणा सही है। उनकी अधिकांश कविताओं में स्त्री की छवि मौजूद है। शमशेर की स्त्री, देह में प्रकृति का अवलम्बन है। वहाँ देह प्रकृति का आवरण ओढ़े हुए हंसती है। शमशेर पर यह आरोप इसलिए और अधिक है कि उनकी कविताओं में देह पर बात करती अनेक पंक्तियाँ मौजूद हैं। बावजूद इसके उन्हीं कविताओं में अनेक पंक्तियाँ ऐसी हैं जो किसी रहस्य की ओर संकेत करती हैं। यहाँ सिर्फ देह नहीं हैं बल्कि प्रेम और सौन्दर्य को पाने की खुमारी है। प्रेम में अपने वजूद को फ़ना कर देने की अद्भुत कोशिश है। यह प्रेम की सर्जना का नया रंग है। यह शरीर के माँसलता की नहीं बल्कि प्रेम और सौन्दर्य के गहनतम क्षणों के एहसास की कविता है। हमें शमशेर की कविता को पढ़ते हुए कविता में व्यक्त मनोगत भाव को भी समझना चाहिए। उनकी कविता में रंग जहाँ  अवसाद, उदासी, विषाद और पतझड़ के रूप में आएं तो उन्हें उत्सव के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता।

सन्दर्भ :

1.         शमशेर बहादुर सिंह, प्रतिनिधि कविताएँ, संपादक, नामवर सिंह,राजकमल पेपरबैक्स, दिल्ली, बारहवाँ संस्करण-2024, पृष्ठ-7
2.         उपर्युक्त, पृष्ठ-5
3.         उपर्युक्त, पृष्ठ-7
4.         शमशेर बहादुर सिंह, काल तुझसे होड़ है मेरी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, प्रथम संस्करण : 1988, पृष्ठ.99
5.         उपर्युक्त, पृष्ठ.100
6.         उपर्युक्त, पृष्ठ.105
7.         उपर्युक्त, पृष्ठ.102
8.         देवीलाल गोदारा, शमशेर का स्त्री-राग, ब्राउन बुक पब्लिकेशन, दिल्ली, पहला संस्करण : 2017, पृष्ठ.72
9.         उपर्युक्त, पृष्ठ.100
10.       शमशेर का स्त्री-राग, पृष्ठ.62
11.       उपर्युक्त, पृष्ठ.75-76
12.       शमशेर बहादुर सिंह, प्रतिनिधि कविताएँ, संपादक, नामवर सिंह, पृष्ठ-7
13.       उपर्युक्त, पृष्ठ-7
14.       ठंडी धुली सुनहरी धूप, संपादक- विश्वरंजन, यश पब्लिकेशन दिल्ली, प्रथम संस्करण : 2010, पृष्ठ-272
15.       उपर्युक्त, पृष्ठ-272
16.       शमशेर बहादुर सिंह, प्रतिनिधि कविताएँ, संपादक, नामवर सिंह, पृष्ठ-7
17.       उपर्युक्त, पृष्ठ-7
18.       गोबिन्द प्रसाद, शमशेर एक अभिनव राग, अनुज्ञा बुक्स प्रकाशन, शाहदरा दिल्ली, प्रथम संस्करण : 2018, पृष्ठ-
76


धीरेन्द्र कुमार
सहायक आचार्य, महंत शिव शंकर गिरि महाविद्यालय अरेराज, पूर्वी चंपारण, बिहार-845411
dr.dhirubrabu@gmail.com, 7053817725

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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