स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ और वैकल्पिक राष्ट्रवाद
- अमरदीप
शोध सार : यह शोध–पत्र बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में उभरती दलित राजनीति के एक महत्त्वपूर्ण किंतु अपेक्षाकृत उपेक्षित अध्याय—स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ (1879–1933) के राजनीतिक विचार और हस्तक्षेप का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन तर्क देता है कि स्वामी अछूतानन्द की राजनीति न तो कांग्रेस–केन्द्रित राष्ट्रवाद की अनुकृति थी और न ही औपनिवेशिक सत्ता के प्रति निष्ठा का सरल उदाहरण, बल्कि यह ‘मुल्की हक’, ऐतिहासिक स्वदेशीयता, पृथक् प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक आत्मसम्मान पर आधारित एक वैकल्पिक राष्ट्रवादी परियोजना थी। शोध–पत्र में 1922 के प्रिंस ऑफ वेल्स सम्मेलन में प्रस्तुत सत्रह सूत्रीय माँग–पत्र, स्वराज की वैकल्पिक अवधारणा, साइमन कमीशन, पृथक निर्वाचक–मंडल, पूना पैक्ट तथा ‘हरिजन’ विमर्श के प्रतिरोध का विश्लेषण किया गया है। विशेष रूप से यह अध्ययन दिखाता है कि स्वामी अछूतानन्द ने दलित समुदाय को नैतिक दया का पात्र नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक–राजनीतिक इकाई के रूप में परिभाषित किया। उनकी कविता “कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान” के माध्यम से यह शोध दलित साहित्य को राजनीतिक प्रतिरोध और वैचारिक हस्तक्षेप के सशक्त माध्यम के रूप में भी रेखांकित करता है। समग्रतः, यह लेख दलित राजनीति को भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचनात्मक पुनर्व्याख्या के रूप में स्थापित करता है।
बीज शब्द : आदि हिन्दू आंदोलन, दलित राजनीति, मुल्की हक, पृथक निर्वाचक मंडल, वैकल्पिक राष्ट्रवाद, हरिजन विमर्श, दलित आत्मसम्मान, औपनिवेशिक भारत।
मूल आलेख : बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन ने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध एक सशक्त राजनीतिक रूप ग्रहण किया, किंतु इस आंदोलन की सामाजिक अंतर्वस्तु गहरी असमानताओं से ग्रस्त रही। कांग्रेस के नेतृत्व में विकसित राष्ट्रवाद राजनीतिक स्वतंत्रता को प्राथमिक लक्ष्य मानता था, जबकि जाति–आधारित दमन, अस्पृश्यता और दलित समुदायों की ऐतिहासिक पीड़ा उसके विमर्श में गौण बनी रही। ऐसे समय में स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ का उदय एक ऐसे दलित नेता के रूप में होता है, जिन्होंने राष्ट्र, इतिहास और अधिकार की अवधारणाओं को दलित दृष्टि से पुनर्परिभाषित किया। स्वामी अछूतानन्द न केवल औपनिवेशिक सत्ता से संवाद करते है, बल्कि कांग्रेस–केन्द्रित राष्ट्रवादी विमर्श को भी मूलतः चुनौती देते है। उनकी राजनीति का केंद्र ‘मुल्की हक’, ऐतिहासिक स्वदेशीयता, पृथक् प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक आत्मसम्मान था। उन्होंने दलितों को इस भूमि के आदि–निवासी और ऐतिहासिक अधिकार–सम्पन्न समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया। प्रिंस ऑफ वेल्स के समक्ष प्रस्तुत उनकी सत्रह माँगें, पृथक निर्वाचक–मंडल का समर्थन, डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व का समर्थन और ‘हरिजन’ नामकरण का प्रतिरोध—ये सभी उनके वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण आयाम हैं। यह शोध–पत्र स्वामी अछूतानन्द के इन्हीं हस्तक्षेपों के माध्यम से दलित राजनीति को भारतीय राष्ट्रवाद की आलोचनात्मक पुनर्रचना के रूप में समझने का प्रयास करता है।
‘मुल्की हक’ की अवधारणा -
1922 में प्रिंस ऑफ वेल्स औपनिवेशिक भारत के दौरे पर आये। जहाँ एक ओर कांग्रेस ने उनके विरुद्ध व्यापक विरोध–प्रदर्शन आयोजित किए, वहीं दूसरी ओर स्वामी अछूतानंद जैसे दलित नेताओं ने उनका स्वागत किया। यह स्वागत का निर्णय स्वामी अछूतानंद की वैकल्पिक राजनीतिक सोच को उजागर करता है और इस सोच के तहत दिल्ली में ‘विराट अछूत सम्मेलन’ का आयोजन किया गया जिसमें प्रिंस ऑफ वेल्स ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। एक विशाल सभा में स्वामी अछूतानंद ने कहा—“आर्यों, विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा हम पराजित हुए और धीरे–धीरे दासत्व तथा अस्पृश्यता की दहलीज़ पर पहुँचा दिए गए। अब हमें अपने उत्पीड़कों के विरुद्ध खड़ा होना है और इस भूमि के स्वदेशी निवासी होने के नाते ‘मुल्की हक’ (राष्ट्रीय अधिकार) की माँग करनी है। अतः हमें प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत करके उनके समक्ष अपनी माँगें प्रस्तुत करनी चाहिए, न कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह करना चाहिए।”[1] यहाँ ‘मुल्की हक ’ से उनका आशय उन अधिकारों से था जिन्हें दलित समुदाय कथित प्राचीन प्राक्–आर्य काल में भोगते थे। यह उल्लेखनीय है कि दलित नेताओं ने ब्रिटिश शासन–प्रतिनिधि का स्वागत किया और कांग्रेस के उच्च–जाति नेतृत्व पर अविश्वास प्रकट किया, क्योंकि उस समय तक उच्च जाति–नेतृत्व ने अस्पृश्यता–उन्मूलन या जाति–प्रथा के विरुद्ध कोई ठोस राजनीतिक माँग नहीं उठाई थी। परिणामस्वरूप, दलित ब्रिटिश शासन को अपने सामाजिक उद्धार का संभावित माध्यम मानने लगे। ‘मुल्की हक’ की माँग के माध्यम से स्वामी अछूतानंद ने दलितों को भारत के स्वदेशी निवासी घोषित किया और ऐतिहासिक अधिकारों की पुनर्प्राप्ति की बात कही। यह राजनीति सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर इतिहास और राष्ट्र की पुनर्रचना का प्रयास थी। निस्संदेह यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इस सम्मेलन में दलित वर्गों के लगभग 25,000 लोगों की व्यापक और प्रभावशाली सहभागिता दर्ज की गई, जो उस समय दलित चेतना, संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक सक्रियता के तीव्र उभार का स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत करती है।[2]
प्रिंस ऑफ़ वेल्स के समक्ष स्वामी अछूतानन्द की सत्रह माँगें -
स्वामी अछूतानन्द ने दलित एवं उत्पीड़ित समुदायों के उत्थान और विकास के लिए प्रिंस ऑफ़ वेल्स के समक्ष सत्रह सूत्रीय माँग–पत्र प्रस्तुत किया। ये माँगें इस प्रकार थीं—
- अछूतों के लिए विद्यालय खोले जाएँ।
- अस्पृश्यता के उन्मूलन हेतु कठोर क़ानून बनाया जाए।
- अछूतों के लिए पृथक् निर्वाचक–मंडल और पृथक् प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जाए।
- नगरपालिकाओं, ज़िला परिषदों, ग्राम पंचायतों, टाउन एरिया तथा अधिसूचित क्षेत्रों में अछूतों को सदस्य के रूप में नामित किया जाए।
- शिक्षित अछूतों को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति दी जाए।
- अछूतों को व्यापार और पेशे अपनाने की स्वतंत्रता दी जाए।
- बेगार (बलात् श्रम) की प्रथा का उन्मूलन किया जाए।
- सवर्ण हिन्दुओं के समान अछूतों को भी समान सामाजिक अधिकार प्रदान किए जाएँ।
- सरकारी तथा गैर–सरकारी समितियों में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए।
- अछूत विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियाँ प्रदान की जाएँ।
- जिन गाँवों में अछूतों की संख्या अधिक हो, वहाँ पृथक् विद्यालय खोले जाएँ।
- अछूतों की भर्ती पुलिस और सैन्य सेवाओं में की जाए।
- श्रमिकों की मज़दूरी में वृद्धि की जाए।
- अछूतों को गाँवों का चौकीदार नियुक्त किया जाए।
- परती भूमि अछूत किसानों को दी जाए।
- प्रांतीय विधानसभाओं में अछूतों को नामित किया जाए।
- उपर्युक्त सभी सोलह माँगों को देशी रियासतों में भी लागू किया जाए।[3]
इन माँगों के प्रत्युत्तर में प्रिंस ऑफ़ वेल्स ने कहा—“दिल्ली में दो अवसरों पर आपने जिस प्रकार से मेरा स्नेहपूर्ण और उत्साहपूर्ण स्वागत किया है, उसके लिए मैं आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। मैं आपकी शुभकामनाओं को अत्यन्त महत्व देता हूँ और जिन समुदायों का आप प्रतिनिधित्व करते हैं, उनके लिए समृद्धि और कल्याण की कामना करता हूँ।”[4] प्रिंस ने यह भी आश्वासन दिया कि वे इस संदेश को ब्रिटेन के सम्राट तक पहुँचाएँगे। इसके पश्चात् 1922 में भारत के राज्य–सचिव की ओर से वायसराय को एक आदेश प्राप्त हुआ, जिसके अंतर्गत प्रत्येक नगरपालिका में एक अछूत सदस्य के नामांकन की व्यवस्था की गई[5] एवं वायसराय ने एक आदेश पारित किया जिसमें दलितों को संयुक्त प्रांत में कहीं भी सभा–सम्मेलन आयोजित करने की अनुमति दी गई तथा अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि यदि सवर्ण कोई विरोध करें तो उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए।[6] यह आदेश दलितों के लिए केवल प्रशासनिक राहत नहीं था, बल्कि यह राज्य–मान्यता प्राप्त सार्वजनिक उपस्थिति का प्रतीक था। अत: इस आदेश को दलित समुदाय के लिए शक्ति और अधिकार की उद्घोषणा के रूप में देखा गया, जिसने सामाजिक दासता और अपमानजनक अधीनता से मुक्ति के संघर्ष को एक नई ऊर्जा, वैधता और व्यापक गति प्रदान की।
स्वामी अछूतानन्द द्वारा प्रस्तुत यह सत्रह सूत्रीय माँग–पत्र केवल सामाजिक सुधार की अपील नहीं था, बल्कि यह दलित अधिकारों का एक समग्र राजनीतिक घोषणापत्र था। इन माँगों में शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक संसाधन, सामाजिक सम्मान और प्रशासनिक भागीदारी—सभी आयामों को एक साथ संबोधित किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि स्वामी अछूतानन्द की दृष्टि सुधारवादी नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन की थी। विशेष रूप से पृथक् निर्वाचक–मंडल, जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व, तथा प्रांतीय विधानसभाओं में नामांकन जैसी माँगें यह दर्शाती हैं कि वे दलित समुदाय को केवल ‘कल्याण–प्राप्तकर्ता’ नहीं, बल्कि राजनीतिक इकाई के रूप में स्थापित करना चाहते थे। यह दृष्टि बाद में डॉ. भीमराव आम्बेडकर की राजनीतिक रणनीति से गहराई से जुड़ती हुई दिखाई देती है। समग्रतः, यह माँग–पत्र यह सिद्ध करता है कि स्वामी अछूतानन्द दलित राजनीति को नैतिक याचना के स्तर से उठाकर अधिकार–आधारित और प्रतिनिधित्व–केंद्रित राजनीति के स्तर तक ले आए। इसी कारण उनका हस्तक्षेप आदि हिन्दू आंदोलन और उत्तर भारतीय दलित चेतना के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाना चाहिए।
स्वराज की वैकल्पिक अवधारणा: कांग्रेस बनाम स्वामी अछूतानन्द -
1927 में कानपुर में आयोजित आदि हिन्दू सम्मेलन में स्वामी अछूतानन्द द्वारा ‘स्वराज’ की माँग उस समय प्रचलित राष्ट्रवादी विमर्श से मूलतः भिन्न थी। उनके अनुसार, यदि स्वराज का नैतिक अधिकार किसी समुदाय को प्राप्त था, तो वह अछूत समुदाय था, जिसे सहस्राब्दियों से सामाजिक, धार्मिक और मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया था।[7] इस प्रकार स्वराज उनके लिए केवल राजनीतिक सत्ता–हस्तांतरण का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक मुक्ति और मानवीय गरिमा की पुनःस्थापना का संघर्ष था।
इसके विपरीत, कांग्रेस भी स्वराज की माँग कर रही थी, परन्तु उसका स्वराज स्वामी अछूतानन्द के स्वराज से भिन्न था। कांग्रेस का स्वराज उच्चवर्णीय सामाजिक समूहों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ था। कांग्रेस के स्वराज की स्थापना का वास्तविक अर्थ एक ऐसे अल्पतंत्रीय शासन–तंत्र का निर्माण होता, जिसमें सर्वोच्च जातियों का वर्चस्व होता और नौकरशाही भी उन्हीं जातियों के एकाधिकार में होती।[8] इस प्रकार यह स्पष्ट है कि स्वराज की अवधारणा कांग्रेस और स्वामी अछूतानन्द, दोनों के लिए बिल्कुल भिन्न अर्थ रखती थी। निस्संदेह कांग्रेस निरंतर स्वराज की माँग कर रही थी, पर वह समाज के सीमित वर्ग के लिए थी। स्वामी अछूतानन्द का स्वराज निम्न जातियों के लिए था। उनका विश्वास था कि कांग्रेस जाति–हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करती है और निम्न जाति के लोगों के प्रति उसमें किसी प्रकार का सम्मान नहीं है। यही कारण था कि वे कभी भी कांग्रेस की किसी गतिविधि में सम्मिलित नहीं हुए।
डॉ. अम्बेडकर से भेंट और राजनीतिक दृष्टि की समानता -
1928 में बम्बई में आयोजित ‘आदि हिन्दू सम्मेलन’ में स्वामी अछूतानन्द की भेंट डॉ. भीमराव अम्बेडकर से हुई। यह मुलाकात दलित राजनीति के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि दोनों नेताओं ने अस्पृश्य समुदायों में चेतना–जागरण के लिए अलग–अलग क्षेत्रों में समानांतर संघर्ष किए थे। डॉ. अम्बेडकर ने स्वामी अछूतानन्द को साइमन कमीशन के समक्ष अछूतों की वास्तविक सामाजिक–आर्थिक स्थिति प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया।[9] 1928 में भारत आए साइमन कमीशन का जहाँ कांग्रेस ने इसलिए बहिष्कार किया कि उसमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था, वहीं अछूत नेताओं ने उसका स्वागत किया क्योंकि उनका विचार था कि कमीशन के सामने उन्हें अछूतों की वास्तविक समस्याएं आवश्यक रूप से रखनी चाहिए।
जब साइमन कमीशन लखनऊ पहुँचा, तब स्वामी अछूतानन्द ने कांग्रेस की उस कपटपूर्ण नीति का पर्दाफाश किया, जिसमें वह अछूतों की वास्तविक स्थिति छिपाने के लिए उन्हें नए कपड़े वितरित कर रही थी।[10] स्वामी अछूतानन्द ने साइमन कमीशन के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत किया, जिसमें अस्पृश्यों के लिए पृथक् दर्जा और पृथक् प्रतिनिधित्व की माँग की गई थी।[11] उन्होंने यह भी कहा कि “हमें ब्रिटिश सरकार की सहानुभूति नहीं चाहिए; हमें केवल सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार चाहिए।”[12] स्वामी अछूतानन्द विदेशी शासन से केवल इतने भर की अपेक्षा रखते थे कि वह निम्न जातियों की उन्नति में सहयोग करे। वे अपनी पुरानी नीति पर ही दृढ़ थे—ब्रिटिश पहल का स्वागत करना, क्योंकि तथाकथित राष्ट्रवादी नेतृत्व अभी भी निम्न जातियों की पीड़ा को अनसुना करता आ रहा था।
गोलमेज सम्मेलन : पृथक् निर्वाचक–मंडल और डॉ. अम्बेडकर के नेतृत्व का समर्थन -
स्वामी अछूतानन्द ने डॉ. अम्बेडकर द्वारा गोलमेज़ सम्मेलनों में उठाई गई पृथक् निर्वाचक–मंडल की माँग का दृढ़ समर्थन किया। उन्होंने उत्तर भारत के अस्पृश्य समुदायों से अपील की कि वे डॉ. अम्बेडकर के समर्थन में पत्र लिखें। उन्होंने उनसे स्पष्ट रूप से कहा कि उनके वास्तविक नेता डॉ. अम्बेडकर हैं, न कि मोहनदास करमचंद गांधी। इस अपील के प्रत्युत्तर में अस्पृश्य समुदाय के लोगों ने लंदन स्थित ब्रिटिश सरकार को अनेकों पत्र भेजे, जिनमें डॉ. अम्बेडकर को अपना प्रतिनिधि और नेता स्वीकार करने का आग्रह किया गया।[13] परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को प्राप्त 54 पत्रों में से 51 पत्र डॉ. अम्बेडकर के समर्थन में थे। 1932 में ब्रिटिश सरकार ने ‘कम्युनल अवॉर्ड’ घोषित किया, जिसके अंतर्गत अछूतों को पृथक् निर्वाचक–मंडल का अधिकार मिला। इसके अनुसार अस्पृश्य मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव स्वयं करेंगे। किंतु सवर्ण हिन्दू नेताओं का आग्रह था कि अस्पृश्यों के लिए आरक्षित सीटें तो रहें, पर उनके प्रतिनिधि का चुनाव संयुक्त निर्वाचक–मंडल—यानी सवर्ण हिन्दू और अस्पृश्य दोनों—द्वारा हो।[14] महात्मा गाँधी ने अस्पृश्यों के लिए पृथक् निर्वाचक–मंडल का विरोध, यह तर्क देते हुए कि इससे अस्पृश्यता स्थायी हो जाएगी, जैसे मुस्लिम पृथक् निर्वाचन के बावजूद मुस्लिम बने रहे, किया।[15] डॉ. अम्बेडकर का प्रत्युत्तर ऐतिहासिक महत्व का है—उन्होंने कहा: “भारत में आज किसी राष्ट्र का अस्तित्व नहीं है; राष्ट्र का निर्माण होना अभी शेष है। किसी पृथक् समुदाय के दमन से राष्ट्र का निर्माण नहीं होता। यदि यह स्वीकार किया जाता है कि अस्पृश्य प्रतिनिधि केवल अस्पृश्यों द्वारा चुना जाए, तो वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका पृथक् निर्वाचक–मंडल है।”[16]
पूना पैक्ट और दलित राजनीतिक आकांक्षाओं का दमन -
18 मई 1932 को कामठी (मध्य प्रान्त) में ‘ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज़ कॉन्फ्रेंस’ आयोजित हुई, जिसमें पूरे देश से सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। स्वामी अछूतानंद ने इस सम्मेलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए एक प्रस्ताव रखा कि राय साहब मुनिस्वामी पिल्लै, एम. एल. सी., मद्रास को इस सभा का सभापति चुना जाये, जिसको सभी दलित नेताओं ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया। इस सम्मेलन ने पृथक निर्वाचक मंडल के पक्ष में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित करते हुए घोषणा कि— “पृथक् निर्वाचक–मंडल के साथ हम तैरेंगे; संयुक्त निर्वाचक–मंडल के साथ हम डूब जाएँगे।”[17] यह प्रस्ताव दलित समुदाय की राजनीतिक समझ और आत्मनिर्णय की चेतना को स्पष्ट करता है। किंतु महात्मा गाँधी द्वारा पृथक निर्वाचक मंडल के विरोध में किए गए आमरण अनशन के तीव्र नैतिक और राजनीतिक दबाव के परिणामस्वरूप डॉ. अम्बेडकर को पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा। इस समझौते पर 24 सितम्बर 1932 को ‘पूना पैक्ट’ के रूप में औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किये गये। स्वामी अछूतानन्द ने पूना पैक्ट को सवर्ण हिन्दुओं की साज़िश मानते हुए इसका तीखा विरोध किया।[18] वे देशभर में सभाएँ आयोजित कर दलित समाज को यह समझाने का प्रयास करते रहे कि संयुक्त निर्वाचक–मंडल दलित प्रतिनिधित्व को अंततः निष्प्रभावी बना देगा। यह विरोध दलित राजनीति में उनके स्वतंत्र और सैद्धांतिक रूप से सुदृढ़ नेतृत्व को रेखांकित करता है।
‘हरिजन’ विमर्श का प्रतिरोध: नामकरण, सत्ता और अपमान की राजनीति -
पूना पैक्ट के पश्चात महात्मा गाँधी ने अस्पृश्यों के लिए ‘हरिजन’ नाम प्रस्तावित किया—अर्थात् ‘हरि के पुत्र’। स्वामी अछूतानन्द, डॉ. अम्बेडकर तथा अन्य नेताओं ने इसका तीव्र विरोध किया। स्वामी अछूतानन्द ने अपनी कविता “कियौ हरिजन पद हमें प्रदान” में इसका प्रतिवाद किया। उन्होंने प्रश्न उठाया: “यदि अछूत हरि के पुत्र हैं, तो क्या सवर्ण हिन्दू शैतान के पुत्र हैं?”[19] उनका मानना था कि ‘हरिजन’ शब्द वास्तव में अस्पृश्यता को स्थायी कर देता है।
‘आदि-निवासी’ से ‘हरिजन’ तक: इतिहास के अपहरण की कविता
कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान। टेक
अन्त्यज, पतित, बहिष्कृत, पादज, पंचम शूद्र महान।
संकर बरन और वर्णाधम पद अछूत-उपमान॥
थे पद रचे बहुत ऋषियन ने, हमरे हित धरि ध्यान।
फिर 'हरिजन' पद दियै हमैं क्यों, हे गांधी भगवान्॥
हम तो कहत हम आदि-निवासी, आदि-वंस संतान।
भारत भुइयाँ-माता हमरी, जिनकौ लाल निशान॥
आर्य-वंश वारे-सारे तुम, लिये वेद कौ ज्ञान।
पता नहीं कित तें इत आये, बांधत ऊँच मचान॥
'हरि' को अर्थ खुदा, 'जन' बंदा जानत सकल जहान।
"बंदे खुदा" न बाप-माय का जिनके पता-ठिकान॥
हरिजन हरिदासी, देवदासी, रामजनी-सम मान।
वेश्या-सुत सम जानत सब जन, वैसाई है सनमान॥
हम हरिजन तौ तुम हूँ हरिजन कस न, कहौ श्रीमान?
कि तुम हौ उनके जन, जिनको जगत कहत शैतान॥
हम निसर्ग से भारत-स्वामी, यहु हमरो उद्यान।
'हरिजन' कहि 'हरिहर' हमरौ तुम, काहे करत अपमान॥[20]
“कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान” स्वामी अछूतानंद ‘हरिहर की सर्वाधिक तीक्ष्ण, वैचारिक रूप से प्रखर और राजनीतिक हस्तक्षेपकारी कविताओं में से एक है। यह कविता केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि ‘हरिजन’ शब्द के माध्यम से दलित पहचान पर थोपे गए पितृसत्तात्मक और ब्राह्मणवादी नैतिक नियंत्रण का सुसंगत वैचारिक प्रतिवाद है। इसमें भाषा, प्रतीक और इतिहास–बोध—तीनों स्तरों पर प्रतिरोध की स्पष्ट चेतना दिखाई देती है।
प्रथमत: यह कविता ‘हरिजन’ पद को लेकर गांधीवादी सुधारवादी विमर्श पर सीधा प्रहार करती है। स्वामी जी प्रश्न करते है कि जब दलितों को सदियों से ‘अंत्यज’, ‘पतित’, ‘बहिष्कृत’, ‘पंचम शूद्र’ और ‘अछूत’ जैसे अपमानजनक विशेषण दिए जाते रहे, तो अचानक ‘हरिजन’ जैसा शब्द देकर उनके सामाजिक यथार्थ को क्यों छिपाया जा रहा है। यहाँ ‘हरिजन’ शब्द को कवि केवल नामकरण नहीं, बल्कि एक वैचारिक रणनीति के रूप में पहचानता है, जो दलितों की ऐतिहासिक पीड़ा को नैतिक करुणा में बदल देती है और उनके राजनीतिक अधिकारों को अप्रासंगिक बना देती है। कविता की सबसे सशक्त विशेषता उसका ऐतिहासिक प्रत्याख्यान है। स्वामी अछूतानंद स्वयं को और अपने समुदाय को ‘आदि-निवासी’ और ‘आदि-वंश संतान’ घोषित करते हैं तथा भारत भुइयाँ को अपनी ‘माता’ बताते हैं। इसके विपरीत, आर्यों को वे बाहरी बताते हैं। यह दृष्टि आदि हिंदू विचारधारा की मूल विचारधारा को प्रकट करती है, जिसमें दलितों को केवल पीड़ित नहीं, बल्कि इस भूमि के मूल स्वामी और ऐतिहासिक कर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार कविता इतिहास को पुनर्लिखित करने का साहसिक प्रयास करती है।
भाषिक स्तर पर कविता अत्यंत तीखी, व्यंग्यात्मक और चुनौतीपूर्ण है। ‘हे गांधी भगवान्’ संबोधन श्रद्धा नहीं, बल्कि विडंबनात्मक प्रतिरोध का सूचक है। स्वामी अछुतानंद महात्मा गांधी के नैतिक प्रभुत्व को प्रश्नांकित करते हुए पूछता है कि यदि ‘हरि’ का अर्थ ‘खुदा’ और ‘जन’ का अर्थ ‘बंदा’ है, तो क्या दलितों को ‘बंदे-खुदा’ जैसी स्थिति में धकेला जा रहा है—अर्थात् ऐसे लोग जिनका कोई सामाजिक वंश, माता-पिता या सम्मानित स्थान नहीं। यह रूपक ‘हरिजन’ शब्द के भीतर निहित अवमानना को उजागर कर देता है। कविता में ‘हरिजन’ शब्द को ‘हरिदासी’, ‘देवदासी’ और ‘रामजनी’ जैसे शब्दों के समतुल्य रखकर कवि यह दिखाता है कि यह पद दलित स्त्री-पुरुषों को नैतिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर धकेलने का कार्य करता है। इस तुलना के माध्यम से कविता जाति और यौन-नैतिकता के अंतर्संबंधों को भी उजागर करती है, जो दलित समुदाय के सामाजिक अवमूल्यन की गहरी संरचना को सामने लाती है।
राजनीतिक दृष्टि से यह कविता दलित आत्मसम्मान की उद्घोषणा है। स्वामी अछूतानंद स्पष्ट रूप से कहते है कि दलित किसी के ‘दया-पात्र’या ‘ईश्वर-पुत्र’ नहीं, बल्कि इस देश के स्वाभाविक स्वामी हैं। ‘हरिजन’कहकर पुकारना उनके लिए सम्मान नहीं, बल्कि एक नया अपमान है, जिसे वे अस्वीकार करते हैं। यह अस्वीकृति दलित राजनीति के उस संक्रमणकाल को दर्शाती है, जहाँ सुधारवादी समावेशन के बजाय स्वतंत्र पहचान और अधिकार की माँग केंद्रीय हो जाती है।
समग्रतः, यह कविता दलित साहित्य के प्रारंभिक चरण में विकसित आत्मसम्मान, ऐतिहासिक चेतना और वैचारिक प्रतिरोध की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। यह न केवल गांधीवादी नैतिक सुधारवाद की सीमाओं को उजागर करती है, बल्कि दलित राजनीति को सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर पर स्वायत्त बनाने का भी आग्रह करती है। इस दृष्टि से “कियौ हरिजन-पद हमैं प्रदान” केवल एक कविता मात्र ही नहीं, बल्कि दलित मुक्ति की वैचारिक उद्घोषणा है।
निष्कर्ष : स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ की राजनीति भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के भीतर मौजूद जातिगत असमानताओं और प्रतिनिधित्व–विहीनता की एक सशक्त आलोचना प्रस्तुत करती है। उन्होंने दलित समुदाय को केवल सामाजिक सुधार का विषय नहीं, बल्कि एक स्वायत्त राजनीतिक इकाई के रूप में स्थापित किया। ‘मुल्की हक’, पृथक निर्वाचक–मंडल और स्वदेशीयता की उनकी अवधारणाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि उनका लक्ष्य सत्ता–हस्तांतरण से अधिक सामाजिक–ऐतिहासिक न्याय था। पूना पैक्ट और ‘हरिजन’ विमर्श के प्रति उनका विरोध यह दर्शाता है कि वे सुधारवादी समावेशन के बजाय आत्मसम्मान और अधिकार–आधारित राजनीति के पक्षधर थे। उनकी कविता और वैचारिक हस्तक्षेप दलित साहित्य को राजनीतिक चेतना का माध्यम बनाते हैं। समग्रतः, स्वामी अछूतानन्द का योगदान उत्तर भारतीय दलित राजनीति को न केवल डॉ. अम्बेडकर की व्यापक परियोजना से जोड़ता है, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की एक वैकल्पिक, बहुजन–केंद्रित पुनर्व्याख्या भी प्रस्तुत करता है।
संदर्भ :
[1] चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु; भारतीय मौलिक समाजवाद: सृष्टि और मानव समाज का विकास अथवा 'भारत के आदि निवासी' ग्रन्थ का प्रथम खंड, लखनऊ: आदि हिन्दू ज्ञान प्रसारक ब्यूरो, 1941, प. 271-272
[2] वी.सी. लाहिरी; (कम्पाइल); दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स’ कम्पलीट टूर इन इंडिया एंड बर्मा, दिल्ली: दी रतन प्रेस, अप्रैल,1922, प.192
[3] राजपाल सिंह; स्वामी अछूतानंद हरिहर, दिल्ली: राजलक्ष्मी प्रकाशन, 2002, प. 20-21
[4] वी.सी. लाहिरी; (कम्पाइल); दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स’, प. 222
[5] पर्चा: “डॉ. आंबेडकर स्वामी अछूतानन्द को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे”, लेखक—सत्यदेव पचौरी, प्रकाशक—स्वामी अछूतानन्द स्मारक समिति, कानपुर, (प्रकाशन–तिथि उल्लिखित नहीं है)
[6] चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु; भारतीय मौलिक समाजवाद, प. 272
[7] डी. सी. दिनकर; स्वंतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान, लखनऊ: बोधिसत्व प्रकाशन, 1990, प. 84
[8] जे.इ. इल्लम; स्वराज: दी प्रॉब्लम ऑफ़ इंडिया, लंदन: हटचिंसों & सीओ. (पब्लिशर्स) लिमिटेड, 1903, प. 243
[9] राजपाल सिंह; स्वामी अछूतानंद हरिहर, प. 47
[10] निजी साक्षात्कार: राजवैद्य माता प्रसाद ‘सागर, दलित लेखक, (उनके पिता मंगल प्रसाद ने 1928 में लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर साइमन कमीशन के स्वागत समारोह में हिस्सा लिया था) उम्र 79, लखनऊ, 24 फरवरी, 2008 को दोपहर 2.00 बजे।
[11] विवेक कुमार; इंडिया’ज रोअरिंग रेवोलुशन: दलित अस्सेरसन एंड नई हॉरिज़ोन्स, दिल्ली: गगनदीप पुब्लिकेशन्स, 2006, प. 99
[12] डी. सी. दिनकर; स्वंतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान, प. 85
[13] निजी साक्षात्कार: आर.सी. कुरेल, (उम्र 52), महासचिव, श्री 108 स्वामी अच्युतानंद स्मारक समिति, कानपुर, यूपी, 22 फरवरी, 2008 को सुबह 10.00 बजे।
[14] डॉ. बी.आर. अम्बेडकर; मिस्टर गाँधी एंड दी इमानसीपेसन अंटचब्लेस, जालंधर: भीम पत्रिका पुब्लिकेशन्स, 1943, प. 25
[15] एम.के. गाँधी: (संग्रहण एवं संपादन: बी कुमारप्पा); दी रिमूवल ऑफ़ अंटचाबिलिटी, अहमदाबाद: नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, 1954, प. 178
[16] डॉ. बी.आर. अम्बेडकर; मिस्टर गाँधी, प. 26
[17] चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु; श्री 108 स्वामी अछूतानन्दजी 'हरिहर', प. 47
[18] गुरु प्रसाद मदन; स्वामी अछूतानंद हरिहर
[19] चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु; श्री 108 स्वामी अछूतानन्दजी 'हरिहर', प. 47
[20] वही
अमरदीप
एसोसिएट प्रोफेसर, स्नातकोत्तर इतिहास विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सेक्टर 1, पंचकुला, हरियाणा
amarchsjnu@gmail.com, 9466960340
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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