पाठकों का स्नेह @ अपनी माटी
( जनवरी से मार्च 2026 तक की कुछ विशेष चयनित टिप्पणियाँ)
Sourav Sharma @ "साक्षात्कार : कविता विषयक संवाद ( सिद्धार्थ शंकर राय से योगेश शर्मा की बातचीत )" Feb 18, 2026, बहुत ही ज्ञानवर्धक एवं सार्थक बातचीत। दर्शन, कविता, समाज (उसकी इकाई के रूप में स्वतंत्रता), बिम्ब व प्रतीक इसके समांतर ही समकालीन हिंदी कविता स्वरों को लिए हुए यह आलेख पढ़ा ही जाना चाहिए। हालांकि यह आलेख आपसे यह उम्मीद भी करेगा कि आप इस आलेख के साथ कुछ और भी संदर्भित चीजों को पढ़ें। जिससे इस आलेख की तह में जाया जा सके और महीन बिंदुओं को समझा जा सके। भविष्य में भी कविता और दर्शन पर ऐसे सुगठित प्रश्नों के साथ ऐसी बातचीत आनी चाहिए। इसका इंतजार रहेगा...।
निर्मल एस भारद्वाज @ "संस्मरण : शिवगंज टू सिरोही वाया पालड़ी एम / कैलाश गहलोत" Feb 24, 2026, बहुत ही सुंदर ढंग से आपने इस संस्मरण में कई प्रकार की परिस्थितियों की छांव छोड़ दी। एक ड्राइवर जिसकी मनःस्थिति कैसी भी हो किंतु वह इतना सजग जरूर है कि उनके ऊपर कई जिंदगियां हैं। शराबी वाला किस्सा बेहद मार्मिक रहा, मनुष्य कितना सहनशील है; ये भाव एक झटके में समझ आया। प्रत्येक मनुष्य केवल अपने आराम का सोचता है।
cinemanthan @ "आलेख : सिनेमा का सांस्कृतिक संघर्ष / आशीष त्रिपाठी" Feb 25, 2026, लेख में फिल्मों के नाम से संबंधित कुछ त्रुटियाँ हैं। उत्सव गुलज़ार की नहीं, गिरीश कर्नाड द्वारा निर्देशित फिल्म है जिसे शशि कपूर ने निर्मित किया था। गुलज़ार की फिल्म हू तू तू है (नाना पाटेकर, तबू , सुहासिनी मुले और सुनील शेट्टी अभिनीत), शोध - बिप्लव रॉय चौधरी द्वारा निर्देशित फिल्म थी और त्रिकाल को श्याम बेनेगल ने निर्देशित किया था। राजश्री प्रोडक्शंस के संस्थापक, ताराचंद बडजात्या, राजस्थानी मूल के थे। हिन्दी फिल्मों में फिल्म -सरस्वतीचन्द्र के गीत - मैं तो भूल चली बाबुल का देस, से पहले भी गरबा गीत बने हैं, जैसे फिल्म - नास्तिक (1954) का गीत - कान्हा बजे बांसुरी (लता मंगेशकर, सी. रामचंद्र) है।
cinemanthan @ "शोध आलेख : शैलेंद्र : सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी / प्रियदर्शिनी" Feb 25, 2026, अमला शैलेन्द्र (सुपुत्री श्री शैलेन्द्र ) की पुस्तक - Shailendra: A Love Lyric in Prints , A Daughter Remembers , के प्रकाशन के बाद शैलेन्द्र और उनके द्वारा निर्मित एकमात्र फिल्म - तीसरी कसम के संबंध में पहले अन्य लोगों द्वारा लिखी गयी सामग्री का बहुत कम औचित्य बचा है क्योंकि पहले लोगों ने अनुमान के आधार पर शैलेन्द्र और तीसरी कसम के बारे में लिखा था और इस मामले में अफवाहों पर ही ध्यान दिया गया था। शैलेन्द्र की बेटी की किताब तीसरी कसम और शैलेन्द्र के बारे में बहुत सारे भ्रमों को समाप्त करती है।
अनवर सुहैल @ "सम्पादकीय : बातें बीते दिनों की (अंक-62) / माणिक" Feb 25, 2026, लघुपत्रिका की बात हो तो संबोधन, आकंठ, तनाव, शेष, पहल, कृति ओर, वर्तमान साहित्य जैसे नाम ज़ेहन में आते हैं और माणिक जी ने सम्पादकीय में हमें फिर से हमारे बीते दिनों की याद दिला दी.
प्रवीण कुमार जोशी @ "अफ़लातून की डायरी (10) गोवा यात्रा / विष्णु कुमार शर्मा" Feb 26, 2026, अवलोकन की सूक्ष्मता और अभिव्यक्ति का प्रवाह दोनों अद्भुत है। गोवा को थोड़े समय में बहुत ज्यादा जिया है विष्णु भाई ने। ख़ास बात यह कि ये अपने सीखे को लेखन में शामिल करते, जीवन के सूत्र बताते चलते हैं। बहुत बधाई।
नमर्दा भाटी @ "शोध आलेख : पितृसत्तात्मक व्यवस्था और स्त्री की अदम्य जिजीविषा की इयत्ता का द्वन्द्व / अवनि शर्मा एवं विमलेश शर्मा" Feb 28, 2026, Vs ma'am इस विश्लेषण में स्त्री की स्थिति और अस्मिता को केंद्र में रखते हुए बाल विवाह, विधवा जीवन और बिना सहमति की दूसरी शादी जैसी प्रमुख समस्याओं को स्पष्ट रूप से उभारा गया है। इसमें यह सामने आता है कि समाज और धर्म के नाम पर स्त्री के अधिकार सीमित किए जाते हैं, जबकि पात्र अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं। मेरे दृष्टिकोण से यह भी महत्वपूर्ण है कि जन्म से ही ऐसी सामाजिक मानसिकता विकसित कर दी जाती है, जिससे कई बार स्त्रियाँ अपने साथ हो रहे अन्याय को भी सामान्य या सही मानने लगती हैं। सामाजिकरण की इसी प्रक्रिया के कारण महिलाएँ परम्पराओं को आगे बढ़ाती हैं और अगली पीढ़ी को भी वही मान्यताएँ सिखाती हैं। इस संदर्भ में साहित्य उन मानसिक और संरचनात्मक बंधनों को समझने का माध्यम बनता है, जो लैंगिक असमानता को बनाए रखते हैं।
हेमंत कुमार @ "अफ़लातून की डायरी (10) गोवा यात्रा / विष्णु कुमार शर्मा" Mar 1, 2026, सब कुछ इतना बिम्बात्मक, जीवंत और सगुण-साकार कि आश्चर्य होता है कोई इतने अनुभव-बहुल दिनों कैसे शब्दों में बाँध सकता है! जगह-जगह झाँक उठता इंसानी टुच्चापन, जिम्मेदारों का जिम्मेदारी मुक्त रवैया, 'नहाने-धोने ( सही क्रम धोने-नहाने)' के प्रसंग में योरोपीय व भारतीय 'सांस्कृतिक समन्वय' के गुदगुदाते पर आईना दिखाते प्रसंग से शुरू करके इतिहास, संस्कृति, प्रकृति, भाषाई उपनिवेशवाद, स्थानीय जीवन, प्रकृति, पर्यटन, दोस्ती, परिवार, खानपान, साहित्य, सांस्कृतिक बहुलता, चर्च, चैपल, चाय-नाश्ते तक न जाने कितने ही पक्षों को अपने में समेटे एक अद्भुत वृत्त! लेखक से सहमति है कि गोवा बार-बार आया जा सकता है पर अपने आने को इस तरह शब्दों में बाँधा जा सकना हर एक के लिए कहाँ संभव हो सकता है। अपनी जीवंत लेखन शैली से अपने अनुभव संसार का हिस्सा बनने का अवसर देने के लिए लेखक का शुक्रिया!
अंकुश गुप्ता @ "संस्मरण : नदिया के तीरे-तीरे, चलत बा जिनगी धीरे-धीरे / पूर्विका अत्री" Mar 1, 2026, मैं भी जौनपुर से हूं। जौनपुर देख कर पढ़ना प्रारम्भ किया परन्तु कब अन्तिम पंक्ति तक पहुंच गया पता ही नहीं चला। बहुत सुंदर लेखन। आपको ढेरों साधुवाद।
अंकित कुमार मौर्या @ "शोध आलेख : खंजन नयन : भक्तकवि सूर के जीवन की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति / डॉ. रेनू त्रिपाठी" Mar 10, 2026, आलेख पढ़कर लगा कि इसका शीर्षक 'अमृतलाल नागर के उपन्यासों में मानवीय चेतना : खंजन नयन के विशेष संदर्भ में' होना चाहिए था। कई संदर्भों को पढ़कर लगा कि अनायास ही रख दिये गये हैं। आलेख का उससे प्रत्यक्ष संबंध नहीं जुड़ रहा है। बालपन में सूरदास की दरिद्रता का चित्रण 'खंजन नयन' में नहीं किया गया है। यदि आपको मिले तो संदर्भ सहित सूचित करें। यदि ऐसा नहीं है तो शब्दों के प्रयोग को लेकर सजगता बरतें।
डॉ. सन्तोष विश्नोई @ "अफ़लातून की डायरी (10) गोवा यात्रा / विष्णु कुमार शर्मा" Mar 10, 2026, मेरे साथी संपादक विष्णु कुमार शर्मा द्वारा गोवा में किए गए Refresher Course के अनुभवों पर लिखा गया यह संस्मरणपरक डायरी अत्यंत रोचक, जानकारीपूर्ण और जीवंत शैली में प्रस्तुत की है। लेखक ने इस डायरी में न केवल अपने शैक्षणिक अनुभवों को साझा किया है, बल्कि गोवा की सांस्कृतिक, सामाजिक और प्राकृतिक विशेषताओं का भी सुंदर चित्रण किया है। डायरी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विस्तृत और क्रमबद्ध प्रस्तुति है। लेखक ने पाठ्यक्रम के आरंभ से लेकर उसके समापन तक होने वाली गतिविधियों, व्याख्यानों, चर्चाओं और विभिन्न शैक्षणिक सत्रों का विस्तार से वर्णन किया है। इससे पाठक को ऐसा अनुभव होता है मानो वह स्वयं उस कार्यक्रम का हिस्सा हो। इसके साथ ही, लेखक ने अपने सहपाठियों, शिक्षकों और आयोजकों के साथ हुए संवादों तथा अनुभवों को भी सहज और भावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है। यह डायरी केवल एक शैक्षणिक रिपोर्ट नहीं रह जाता, बल्कि लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों और भावनाओं का भी सजीव दस्तावेज बन जाता है। भाषा की दृष्टि से यह डायरी सरल, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है, जो पाठकों को अंत तक बाँधे रखती है। गोवा के वातावरण, वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता का वर्णन लेख को और भी आकर्षक बनाता है। समग्र रूप से कहा जाए तो यह डायरी न केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम की जानकारी देता है, बल्कि पाठकों को प्रेरित भी करता है कि वे ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर अपने ज्ञान और अनुभव को समृद्ध करें। यह लेख अनुभव, ज्ञान और भावनाओं का संतुलित संगम है।
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा


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