नासिरा शर्मा के उपन्यासों में चित्रित विविध-समस्याएं
- अंकिता तिवारी एवं महेन्द्र कुमार त्रिपाठी
शोध सार : यह शोध पत्र नासिरा शर्मा द्वारा लिखित उपन्यासों में चित्रित विविध समस्याओं पर प्रकाश डालता है। सामाजिक समस्याओं को नई धार देता है। उन समस्याओं के माध्यम से समाज की दोहरी मानसिकता व वास्तविक दशा को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। उनमें चित्रित समस्याएं जैसे – साम्प्रदायिकता, शहरीकरण, स्त्री-विमर्श, सामाजिक, पारिवारिक, महानगरीय जीवन की समस्याएं, भ्रष्टाचार, राजनीतिक वैमनस्य, धार्मिक-पक्षपात, अन्धविश्वास, रूढियों धारणायें आदि। नासिरा शर्मा जी के उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें वर्तमान समाज के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा अवश्य होती है और चर्चा के साथ-साथ वे उस समस्या के लिए समुचित समाधान को भी सुझाने का प्रयास करतीं हैं। नासिरा जी अपने कथानकों के माध्यम से सूक्ष्म से सूक्ष्म मानवीय संवेदना को प्रस्तुत करती हैं। वे मानव जीवन के लिए अतिआवश्यक चीजों को उपलब्ध कराना ही जीवन जीना नहीं मानती बल्कि व्यक्ति के बाहरी जीवन के साथ-साथ एक आन्तरिक जिंदगी होती है और उसकी भी कुछ आवश्यकतायें होती हैं उन आवश्यकताओं की पूर्ति को भी प्राथमिकता देती हैं। उनका मानना है कि जीवन एहसास के धरातल पर होता है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को महसूस करने की और समझने की आवश्यकता होती है। लेखिका अपने उपन्यासों में इन्हीं सूक्ष्मगत मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक, पारिवारिक आदि समस्याओं को स्पष्ट करती हैं। इस शोध पत्र के माध्यम से लेखिका के उपन्यासों मे चित्रित विविध समस्याओं (पारिवारिक, सामाजिक, स्त्री-विमर्श आदि) का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह शोध पत्र एक वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। इस शोधपत्र के माध्यम से लेखिका के उपन्यासों में चित्रित विविध समस्याओं का समग्र रूप से मूल्यांकन किया जा सकेगा।
बीज शब्द : नासिरा शर्मा, विविध समस्याएं, स्त्री-विमर्श, नारी चेतना, उपन्यास, आधुनिकता, समाज, कथा-साहित्य, वर्तमान समाज, मानवीय मूल्य, लेखिका।
मूल आलेख : नासिरा शर्मा एक प्रतिष्ठित लेखिका हैं। आधुनिक महिला साहित्यकारों में नासिरा शर्मा जी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। नासिरा जी समाज के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए लेखन कार्य करती हैं। गहन अनुभव की धनी नासिरा शर्मा जी का व्यक्तित्व उदार है तथा उनका सृजन संसार पाठकों के मन को झकझोरने की क्षमता रखता है। आज साहित्य जगत में नवीन विचारों, नवीन मूल्यों ने जन्म लिया है, जिनके फलस्वरूप समाज में बहुत परिवर्तन आया है। धार्मिक पक्षपात, अन्धविश्वास, रूढिवादी धारणायें, राजनीतिक वैमनस्य आदि ने समाज को गहरा आघात पहुँचाया है ऐसे संक्रमणशील वातावरण में नासिरा शर्मा जी ने अपने सृजन कार्य के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है और समाज को नई दिशा देने का प्रयत्न किया है। नासिरा शर्मा जी का रचना संसार बड़ा ही विस्तृत है- उपन्यास, कहानी, नाटक, अनुवाद, लेख-संग्रह, रिपोर्ताज, पत्रकारिता, टी. वी. फिल्म, बाल-साहित्य, संवाद लेखन, साक्षात्कार, आदि लगभग सभी विधा में अपनी लेखनी के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत कियें हैं। लेखिका में गहन चिंतन-मनन की शक्ति है जिसका उदाहरण उनका रचना संसार है। उन्होनें अपने आस-पास के जन-जीवन को बहुत करीब से देखा और महसूस किया है अपने लेखन में उन्होनें इन्हीं मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं और विचारों को अभिव्यक्ति प्रदान की है जिसका विवेचन इस शोधपत्र में किया गया है। “नासिर शर्मा जी का साहित्य समाज की वास्तविकताओं को उजागर करने और पाठकों को सामाजिक चेतना से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।”1
निष्कर्षतः इस शोध पत्र में नासिरा शर्मा जी के उपन्यासों में समाज की संरचना और उनमें व्याप्त भेदभाव,सामाजिक असमानतायें तथा संघर्ष का प्रभावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया गया है।
साहित्य समीक्षा-
नासिरा शर्मा जी के उपन्यास समसामयिक समस्या पर आधारित होते हैं। उनके लेखन में वर्तमान समाज की वास्तविक दशा की झलक एकदम स्पष्ट दिखाई पड़ती है। नासिरा शर्मा जी अपने उपन्यासों के माध्यम से समाज के स्वरूप व उसमें व्याप्त विविध प्रकार की समस्याओं पर चर्चा करती हैं, हालांकि इनके उपन्यसों में चित्रित विविध समस्याओं पर शोध कार्य कम ही हुए हैं जिनमें कुछ इस प्रकार से हैं-
- स्त्री विमर्श के संदर्भ और नासिरा शर्मा के उपन्यास, डॉ. रवीन्द्र कुमार सिंह, सहायक आर्चाय, विभागाध्यक्ष (हिन्दी-विभाग), राजा हरपाल सिंह महाविद्यालय सिंगरामउ, जौनपुर, उत्तर प्रदेश, भारत-2024
- नासिरा शर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सामाजिक संवेदना, स्वालिया बेगम आर. कोप्पल, शोधार्थी, कर्नाटक, अक्क महादेवी महिला विश्वविद्यालय, विजयपुर-2021
- नासिरा शर्मा के उपन्यासों में संवेदना का धरातल, राजेन्द्र कुमार सिंघवी ‘विविधा’ जनवरी-मार्च, 2025 प्रकाशित।
- नासिरा शर्मा के कथा साहित्य में बनते-बिगड़ते रिश्तों का देश, ममता मिश्रा, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज, गोंड़ा उत्तर प्रदेश, भारत-2025
इस विषय पर शोध कार्य कम होने के कारण इस शोध पत्र की महत्ता और भी बढ़ जाती है क्योंकि इस शोधपत्र के माध्यम से नासिरा शर्मा जी के उपन्यासों के लगभग प्रत्येक पहलू पर पर्याप्त प्रकाश पड़ा है जिससे वर्तमान समाज और साहित्य को एक सकारात्मक दिशा प्राप्त हुई है।
शोध पद्धति -
यह शोध पत्र वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है, इस पत्र में सामाजिक, सांस्कृतिक एवं स्त्रीवादी पद्धति को भी अपनाया गया है, जो स्त्री के अनुभवों, दृष्टिकोणों और सामाजिक संदर्भो को समझने के लिए उपयोगी है, जिससे उपन्यासों की समकालीन प्रासंगिकता का आकलन किया गया है। इस शोध पत्र में सहायक सामग्री के रूप में मूल उपन्यास, आलोचनात्मक पुस्तकें, लेख, पत्र-पत्रिकायें व अन्य साहित्यिक संदर्भों का उपयोग किया गया है।
विवेचन-
नासिरा शर्मा प्रगतिशील विचारधारा रखनेवाली लेखिका हैं। वे मनुष्यता को धर्म, संप्रदाय या संकीर्ण विचारधारा से ऊपर मानती हैं उनका यह प्रगतिवादी रूप उनके जीवन में एवं साहित्य में दृष्टिगोचर होता है। ऊँच-नीच, सामाजिक-आर्थिक विषमता, धार्मिक-विषमता, राजनीतिक-अराजकता, स्वार्थी-भावना, भ्रष्टाचार आदि संबंधी बातें उन्हें अंदर ही अंदर सालतीं हैं जिसकी अभिव्यक्ति उनके साहित्य में हुई है। समाज में व्याप्त समस्याओं पर विचार-मंथन करना, उन्हें अपने कथा-साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त करना एवं उनके समाधान हेतु सुझाव प्रस्तुत करना लेखिका अपना कर्तव्य मानती हैं। उन्होंने अपने साहित्य में वर्तमान समय की समस्याओं का चित्रण किया है जिसमें स्त्री-विर्मश, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, सामाजिक-समस्याएं, देश-विभाजन के दुष्परिणाम, महानगरीय जीवन की समस्याएं, शहरीकरण, पारिवारिक समस्या आदि हैं जिसका विवेचन इस प्रकार से है-
स्त्री विर्मश- “किसी भी देश में होने वाला बदलाव, क्रान्ति या बदलते, नए बनते सामाजिक मूल्यों से उत्पन्न परिस्थितियों में सबसे अधिक मार महिलाओं पर ही पड़ती है और कोई भी क्रान्ति तब तक सफल नहीं हो सकती, जबतक उसमें महिलाओं का योगदान न हो..... तथाकथित प्रोग्रेसिवनेस का ठप्पा न पड़ जाए।”2 इसी विचार धारा से संबंध रखने वाली नासिरा शर्मा जी ने अपने साहित्य मे स्त्री को प्रमुख स्थान दिया है वे नारी को साहित्य और सृजन का मुख्य अंग मानती हैं, जिसे स्पष्ट करते हुए वे अपने एक साक्षात्कार में स्वयं कहती हैं कि- “आज की औरत ने कई तरह की सामाजिक, राजनीतिक, चुनौतियों को स्वीकारा है और...... मर्द और औरत समाज की दो इकाईयाँ है एक अधिक शोषित एक कम।”3
एक चेतनापूर्ण सशक्त नारी जो परंपरागत लीक पर चले आ रहे समाज में परिवर्तन ही नही चाहती है बल्कि उस परिवर्तन को लाने का पूरा-पूरा प्रयास भी करती है इसी विशेषता को चरितार्थ करने वाली लेखिका नासिरा जी ने नारी को अपने साहित्य में स्थान देकर मुख्य धारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रेम और श्रृंगारिकता से परे समाज के विभिन्न मुद्दों जैसे- आस्तित्व की लड़ाई, शिक्षा का अधिकार, समानता, मानसिक द्वंद्व आदि की जद्दोजहद् से जूझने वाले नारी मन के प्रश्नों को अपनी कलम के माध्यम से प्रस्तुत किया है। जो स्त्री शताब्दियों से समाज में शोषित होती रही है वह अब अपने मुक्त होने के लिए प्रयासरत दिखाई पड़ती है, वह परिवार तथा समाज द्वारा लादे गये नियमों, बधनों, रूढ़ियों, दकियानूशी धारणाओं के बंधनो को ठुकराने का पूरा-पूरा प्रयास कर रही है। नासिरा जी के साहित्य और विचारों ने स्त्री को इन्हीं बंधनो से मुक्ति पाने के लिए प्रेरित किया है क्योंकि उनका मानना है कि समाज में यदि स्थायी परिवर्तन, विकास, सकारात्मक वातावरण लाना है या समाज को विकास के पथ पर आगे बढ़ाना है तो हमें समाज के इस आधे-हिस्से (स्त्री) को मुख्य धारा से जोड़ना ही होगा क्योंकि इन्हें गौण रखकर परिवर्तन संभव नहीं है। औरत हमारे परिवार की नींव मानी जाती है एक बच्चे की प्रथम शिक्षिका माँ होती है यदि वह माँ ही समाज में अपने बराबरी के हक को नहीं पायेगी तो वह अपने बच्चे को अपने हक और अधिकार की लड़ाई क्या सिखा पायेगी, इस लिये समाज को स्त्री को उचित स्थान और सम्मान देना चाहिए। कहा जाता है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है और यह नियम ही हमारे समाज को नई दिशा देने में सहायक होगा। परिवर्तन की इसी अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए ‘आर्चाय हजारी प्रसाद दिवेदी’ जी ने कहा है कि- “कोई भी सामाजिक व्यवस्था जो समय के साथ न बदले वह स्वयं तो डूबती ही है, उसे भी ले डूबती है जिसके लिए वह बनी है।”4
लेखिका ने नारी को मात्र प्रेम और समता की मूर्ति माने जाने वाले विचारों से अलग कर मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा है चाहे वह ‘शाल्मली’ उपन्यास की नायिका शाल्मली हो या फिर ‘ठीकरे की मंगनी’ की महरूख या फिर स्त्री संघर्ष का ज्वलंत दस्तावेज ‘सात नदियाँ-एक समुन्दर’ की सात सहेलियाँ (अख्तर, महनाज, परी, तय़्यबा, सूसन, सनोबर और मलीहा) सभी के माध्यम से मानवीय संवेदना और नारी संघर्ष को प्रस्तुत किया है। सभी नारी पात्र अपने-अपने संघर्षो से लड़ते हुये नजर आती हैं कोई भी यथास्थिति से भागती नहीं है बल्कि डटकर उसका सामना करती हैं। अतः नासिरा शर्मा के साहित्य में नारी चेतना, स्त्री-विमर्श के स्वर पूर्णतया मुखरित हुयें हैं।
सामाजिक समस्याएं-
व्यक्ति समाज की मूल इकाई है और परिवार समाज का महत्वपूर्ण अंग, जिस कारण प्रत्येक व्यक्ति की यह नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है कि वह अपने परिवार और समाज को सुचारू रूप से चलाने में योगदान दें पर इन सब के बीच उसे कई अलग-अलग प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है जीवन में आने वाली इन्हीं विभिन्न समस्याओं को हम सामाजिक समस्या कहते हैं। सामाजिक समस्या को स्पष्ट करते हुये फुल्लर एण्ड मेयर्स ने लिखा है कि “ जब समाज के अधिकांश सदस्य किसी विशिष्ट दशा एवं व्यवहार प्रतिमानों को अवांछित और आपत्तिजनक मान लेते हैं तब उसे सामाजिक समस्या कहा जाता है।”5
समाज के बदलते स्वरूप के अनुसार सामाजिक समस्या का स्वरूप भी बदल रहा है। सामाजिक विघटन की यह स्थिति परिवर्तन की तीव्रता के कारण उत्पन्न होती है। कुछ क्षेत्रों में यह परिवर्तन तीव्र गति से होते हैं और कुछ क्षेत्रों में धीमी गति से, इस बदलती परिस्थितियों में पुरानी परंपराएं, मूल्य, नियम ये सब बेकार से लगने लगते हैं वहीं नई मान्यताओं, मूल्यों, नियमों आदि को शीघ्रता से ग्रहण नहीं कर पाने के परिणामवश वे समस्या बन कर व्यक्ति के सामने आ खड़े होते हैं। ये समस्याएं जैसे- सामाजिक नियम, रीति-रिवाज, धर्म, दफ्तर संबंधी समस्याएं, वैचारिक द्ंवद्व, असफल जीवन आदि। ये समस्याएं किसी एक व्यक्ति की न होकर समाज के लगभग व्यक्तियों की हैं। नासिरा शर्मा जी ने समाज में व्याप्त इन्हीं समस्याओं के लगभग हर पहलू पर काम किया है।
राजनीतिक उलटफेर व सत्ता के लालच में किये गए संघर्षो का सशक्त उदाहरण ‘सात नदियाँ एक समुन्दर’ है जिसमें सात सहेलियों के जीवन के संघर्ष का बहुत ही मर्मिक चित्रण किया है तो वहीं दूसरी तरफ दोहरे जीवन को जीने के लिए बाध्य नौकरी पेशा वाली शाल्मली है जो पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर होने पर भी परिवारिक समस्याओं (कलह, असफल वैवाहिक-जीवन) के द्ंवद्व को भोगती हुई व उनसे लड़ती हुई दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार ‘ठीकरे की मंगनी’ की ‘महरूख’ भी समाज के इन्हीं नैतिक-अनैतिक प्रश्नों में उलझकर अनचाहा जीवन जीने को बाध्य है।
पारिवारिक समस्याएं-
परिवार गृहस्थ जीवन की नींव है संस्कारों की पहली पाठशाला है जहाँ मानव का प्रथम बार समाज से सारोकार स्थापित किया जाता है। उसे मानवोचित संस्कार सिखाए जाते हैं। परिवार में एक दूसरे के प्रति प्रेम, आदर, दया, ममता, सहानुभूति सहयोग आदि का भाव निहित होता है। सामाजिक जीवन में परिवार की अह्म भूमिका होती है। नासिरा शर्मा जी ने अपने उपन्यासों में पारिवारिक समस्याओं को बड़ी बारीकी से उकेरा है। उपन्यास ‘अक्षयवट’ में परिवार एवं घर की उदारता को, उसकी आवश्यकता को, व्यक्त करने का प्रयास किया है। एक घर, एक परिवार, व्यक्ति के लिये कितना महत्वपूर्ण है इसका बड़ा मर्मिक चित्रण अक्षयवट में है- जब माँ ‘जुगनू’ को भोजन परोसती है तो उसे अनुभव होता है कि यद्यपि यह घर गंदी बस्ती में है फिर भी यहाँ का माहौल कितना सुखदायी है। जुगनू के ही शब्दों में- “यह घर सस्ता ही सही, इसकी दीवारें बेसीदा ही सही, मगर इनमें कितना स्नेह भरा है। सारा शहर छानकर जब घर लौटो तो लगता है कि स्वर्ग में लौटे हो। प्यार, संतोष, सुरक्षा का यह हिंडोला कितना अपना लगता है।”6
उपन्यास शाल्मली में भी पारिवारिक जीवन की समस्या केन्द्र में है। इस उपन्यास में यह दर्शाया गया है कि घर में सुख-शांति के लिए झूठ-सच की आहुति देनी पड़ती है। भावनात्मकता के साथ-साथ व्यवहारिकता को भी महत्व देना पड़ता है। परिवार को सुचारू रूप से चलाने के लिये अपने सुख-दुख को भूलना पड़ता है। शाल्मली के माध्यम से यह बात स्पष्ट किया है नासिरा जी ने – “अब शाल्मली को लगता है कि एक घर खड़ा करने के लिए भावनात्मक रूप से आपको कितना अपने आप को तोड़ना-मोड़ना पड़ता है....... जो संबधों की दीवारों को हिला देती है।”7 स्त्री की मात्र निष्ठा, समर्पण, त्याग से ही घर नहीं चलता है बल्कि एक विशेष कूटनीति, भावना, तर्क, विवेक सबकुछ का संयोग करना पड़ता है जिससे परिवार बेहतर तरीके से चल सके। कभी-कभी भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता को महत्व देना पड़ता है। जिससे गृहस्थ जीवन, रिश्ते-नाते प्रभावित न हो। ‘ठीकरे की मंगनी’ इस उपन्यास में भी पारिवारिक जीवन की समस्याएं विशेषतः केन्द्र में है। इस उपन्यास मे नासिरा शर्मा जी ने मुस्लिम परिवार की लड़की ‘महरूख’ के वर्तमान स्थितियों, रूढ़ि-परंपराओं के बंधन, पारिवारिक समस्याओं को चित्रित किया है। औरत के बदलते वजूद और अस्तित्व का जीवन्त दस्तावेज है महरूख, जो समाज के सामने चंद सवाल रखती है जैसे-अपना घर होने का सवाल, औरत-मर्द के बराबरी का सवाल, औरत के अस्तित्व का सवाल आदि, जिसका जवाब वह समाज से चाहती है। इस उपन्यास में और भी समस्याएं उभरकर सामने आयीं हैं जिनमें वर्तमान समय में व्यक्ति का आत्मकेद्रित, होना अपने ही परिवार में प्राइवेसी ढूंढ़ना सबसे अलग रहना, अपने हिसाब से जिंदगी जीना, आदि। इस विषय पर लेखिका लिखती है कि- “अब तो यह आलम है हर बच्चे माँ-बाप के साथ, बहन-भाई के साथ एक कमरे में रहना नहीं चाहते है सबको अपनी प्रइवेसी चाहिए।”8 किसी प्रकार का कोई रोक टोक न हो, जीवन अपने हिसाब से चले, इसी तरह के घर परिवार के मतभेदों, वैचारिक दंवद्वों को दर्शाता हुआ यह उपन्यास वर्तमान समय और समाज में और भी प्रांसगिक हो जाता है।
शहरीकरण की समस्याएं-
वर्तमान समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए साधन सम्पन्न जीवन की आकांक्षा रखता है जिस कारण वह शहरों की ओर भाग रहा है जिसका परिणाम यह होता है कि इस भाग दैड़ में उसकी जड़े, उसका मूल घर-परिवार, उससे अलग हो कहीं पीछे छूट जाता है। इसी समस्या का उदाहरण नासिरा शर्मा जी का उपन्यास ‘कुइयाँजान’ है। बढ़ते शहरीकरण के कारण, शहरों में निवास करने के कारण, परिवार के लोगों से दूरी बनती जा रही है। पिता पुत्र से दूर, माता-पिता से बच्चे दूर, परिवार के लोगों की एक-दूसरे से दूरी बढ़ती जा रही है। उनके अपने जो कहीं गावों में बसे हैं उनसे संबंधों का दायरा टूटने लगता है। इसी आपसी दूरी को दर्शाते हुये इस उपन्यास में ‘जमाल’ पारिवारिक विघटन की चिंता करता है और सोचता है कि- “ यह उन्हीं का किस्सा नहीं है बल्कि हर उस खानदान का है जो शहर और गाँव में बटकर दो इकाईयों में बट गया है।”9
महानगरीय जीवन की समस्याएं- महानगरीय जीवन ने मनुष्य को संवेदना रहित बना दिया है। महानगरीय परिवेश के कारण परिवार के सदस्य एक एक दूसरे से अलग हो रहें हैं, उनमें दूरीयाँ बढ़ रही हैं। अपना जीवन अपने तरीके से जीना, बिना किसी रोक-टोक के, यह महानगरीय जीवन की सबसे बड़ी विशेषता है। यहाँ कोई किसी को उसकी जिन्दगी में कुछ करने से रोकता-टोकता नहीं है। इसकी अपेक्षा ग्रामीण परिवेश में रहने वाला परिवार उसके सदस्य एक दूसरे के जीवन से बड़ी घनिष्ठता के साथ जुड़े होते हैं। और उनका उचित मार्गदर्शन करते हैं, उनकी विभिन्न समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करते हैं। महानगरीय जीवन में जहाँ परिवार में विभिन्न समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं वहीं महानगर में निवास करने के लिये भी व्यक्ति को बहुत संघर्ष करना पड़ता है चाहे वह संघर्ष शुद्ध पीने योग्य पानी का हो या शुद्ध वायु, या फिर उचित स्थान पर मकान अथवा यातायात संबंधी समस्याएं इत्यादि।
वर्तमान समय में पानी की समस्या महानगरीय जीवन की मुख्य समस्याओं में से एक है। लेखिका द्वारा लिखा गया ‘कुइयाँजान’ उपन्यास जल की समस्या को गंभीरता से दर्शाता है। हवा, पानी, हमारे प्राकृतिक स्त्रोत है किंतु अब ये दूषित हो चुके हैं। ‘डॉ. कमाल’ इस पात्र को समुचे भारत और विश्व के दूषित जल आँकड़ो को प्रस्तुत करने के लिये ही इस उपन्यास में नासिरा जी ने चित्रित किया है। ‘जल ही जीवन है’ यही पानी आज उपभोक्ता वादी संस्कृति में बेचा जा रहा है यह उपन्यास जल-आपूर्ति की समस्या पर चर्चा ही नहीं करता बल्कि उपायों को भी दर्शाता है- “यह उपन्यास बताता है कि जमीन और इन्सान की प्यास कैसे एक-दूसरे से गहरे में जुड़ी हैं। पानी के रहने और न रहने पर दोनों हालातों में इंसानी रिश्ते के रंग और संबंध मुखतलिक् हो उठते हैं।”10
भ्रष्टाचार की समस्या- भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिसके कारण हमारे समाज, देश, की प्रगति बाधित हो रही है। आज यह भ्रष्टाचार हमारे जीवन के लगभग हर क्षेत्र में फैला हुआ है। भ्रष्टाचार ने हमारे जीवन को किस तरह प्रभावित किया है इसको स्पष्ट करते हुए सी.पी. श्रीवास्तव जी लिखते है- “भ्रष्टाचार का प्रवाह उद्दम वेग के साथ बह रहा है और इसने लोगों को स्वच्छ प्रशासन से वंचित तथा विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है.... भ्रष्टाचार ने एक महामारी का रूप ले लिया है और अधिकांश, नौकरशाही, पुलिस, न्यायपालिका और राजनीतिक सत्ता सब इसकी लपेट हैं।”11 नासिरा जी के उपन्यासों में भ्रष्टाचार की खुलकर अभिव्यक्ति हुई है। अक्षयवट उपन्यास का रामस्वरूप सिंह पुलिस विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार के संबंध में कहता है- “पुलिस की जात का तो तुम जानत हो, दरोगा हरपाल सिंह बड़ा हरामी है खाये-पीये के आगे ओका कुछ सूझत नाहीं। ठाकुर का लौण्डा बोतल-वोतल, देय-दिलाय के और मुठ्ठी गर्म कर सच्चाई दबाई दीस बस।”12
भ्रष्टाचार का स्वरूप बहुत व्यापक हो चुका है अब “यह भ्रष्टाचार केवल पुलिस मोहकमें में नहीं रह गया है, बल्कि हर क्षेत्र में, यहाँ तक कि लोग अब धर्म को भुनाने में भी नही झिझकते, बल्कि उसकी भी मार्केटिंग होती है।”13 शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार का चित्रण नासिरा शर्मा जी ने अपने ‘अक्षयवट’ उपन्यास में किया है। सरकारी दफ्तर भ्रष्टाचार के अड्डे बन गये हैं। आज गाँव हो या शहर हर जगह व्यक्ति इस विषम सामाजिक पीड़ा से जूझ रहा है। भ्रष्टाचार एक गम्भीर समस्या है जिसके कारण हमारे समाज का विकास अवरुद्ध हो रहा है।
अंधविश्वास- समाज में कई तरह के अंधविश्वास प्रचलित होते है। जब किसी धारणा या मान्यता का अन्धा अनुशरण होने लगता है, तब वह अंधविश्वास की सीमा तक पहुँच जाता है। जादू-टोना, भूत-प्रेत, आदि अंधविश्वास हमें आज भी देखने को मिलते हैं। नासिरा शर्मा जी ने अपने उपन्यासों में इन जादू-टोने, अंधविश्वासों को भी बड़ी बारीकी से चित्रित किया है।जहा ‘सात नदियाँ एक- समंदर’ उपन्यास की तैय्यबा भविष्य देखने में विश्वास नहीं रखती है इसे अंध-विश्वास मानती हुई कहती है-
“यदि कोई इन्सान चालाक हो और उसे कोई बेवकूफ मिल जाए तो वह पैसा खूब कमाता है। यहाँ बैठे-बैठे अपनी वाक्पटुता से चार सौ तूमान कमा लिये।”14 अंधविश्वास से ग्रसित पात्र का चित्रण नासिरा जी ने अपने उपन्यास अक्षयवट में किया है। जहाँ रमेश के घर में शनि का वास होने के कारण रमेश नौकरी के लिये भटकता है जिस कारण पंडित जी रमेश की माँ को टोटका बताते है कि- “सप्ताह में एक दिन व्रत और सफेद लाई, नदी या किसी भी बहते पानी में डालें। सारे काले बादल छंट जायेंगे। मन को शान्ति मिलेगी.....रास्ते के बीच और चौराहे पर वह पूरी-हलवा, सिंदूर, फूल, नींबू भी रखने लगी थी।”15
इस प्रकार से नासिरा शर्मा जी ने अपने कथा-साहित्य के माध्यम से अपनी कहानियों लेखों के माध्यम से समाज मे व्याप्त अंधविश्वासों दोहरी मानसिकता दकियानूसी ख्यालों आदि को उजागर किया है और समाज को जागरुक करने का प्रयास किया है।
उद्देश्य-
- नासिरा शर्मा के प्रमुख उपन्यासों का अध्ययन कर उनमें चित्रित सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समस्याओं की पहचान करना।
- नासिरा शर्मा के उपन्यासों में स्त्री-जीवन से संबंधित समस्याओं एवं स्त्री-चेतना के स्वरूप का विश्लेषण करना।
- नासिरा शर्मा के उपन्यासों में जातिगत भेदभाव एव सामाजिक असमानता के स्वरूप को स्पष्ट करना।
- नासिरा शर्मा के उपन्यासों के माध्यम से प्रस्तुत सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना को रेखांकित करना।
- समकालीन हिन्दी उपन्यास परंपरा में नासिरा जी के योगदान और साहित्यिक महत्व का निर्धारण करना।
निष्कर्ष : संक्षेप में हम कह सकते हैं कि नासिरा शर्मा का उपन्यास साहित्य साझी-संस्कृति और हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर हैं। साहित्यकार के धर्म को निभाते हुये लेखिका विश्व बंधुत्व का संदेश देती है। नासिरा जी के उपन्यास समकालीन भारतीय समाज की विविध समस्याओं का प्रामाणिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं। उनका साहित्य स्त्री-जीवन, सांप्रदायिकता, विस्थापन, जातिगत भेदभाव, अन्याय जैसे विषयों को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इस प्रकार नासिरा शर्मा का साहित्य सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।
आभार- मैं इस शोध पत्र लेखन मे सर्वप्रथम अपने शोध-निर्देशक डॉ. महेन्द्र कुमार त्रिपाठी के अमूल्य मार्गदर्शन और सहयोग के लिये उनके प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ, उनके सहयोग और मार्ग दर्शन ने ही इस शोध-पत्र को दिशा प्रदान की है। साथ ही हिंदी साहित्य के विद्वानों के प्रति आभार प्रकट करती हूँ जिनके लेखों, विचारों से इस शोध पत्र को आधार मिला है।
विशेष धन्यवाद नासिरा शर्मा जैसी स्वच्छन्द लेखिका को जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से नारी को एक नये धरातल पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है और वर्तमान समाज को नवीन वैचारिक दृष्टि प्रदान की है।
सन्दर्भ-
- स्वालिया बेगम आर कोप्पल, शोधार्थी, कर्नाटक, अक्कमहादेवी महिला विश्व-विद्यालय, विजयपुर, पेज सं-1
- नासिरा शर्मा, औरत के लिये औरत, नूतन ठाकुर का सक्षात्कार, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2023, पृष्ठ 169
- वही, पृष्ठ संख्या-170
- वही, पृष्ठ संख्या-169
- Fuller richard C.and Richard R. myery. “some Aspects of a theory of social problems” in American Sociological riviw ,february 1941 -vol.6 no.27. BASO-302
- नासिरा शर्मा, अक्षयवट, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन नई दिल्ली संस्करण-2003 पृष्ठ-54
- नासिरा शर्मा, शाल्मली, किताब घर प्रकाशन, दिल्ली-1994, पृष्ठ-67
- नासिरा शर्मा, ठीकरे की मंगनी, किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण-1989, पृष्ठ-191
- नासिरा शर्मा, कुइयाँजान, सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली, संस्करण-2023 पृष्ठ-245
- वही, फ्लैप से।
- सी.पी. श्रीवास्तव, भ्रष्टाचार भारत का भीतरी शत्रु, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्रा. लि., दिल्ली, प्रथम संस्करण -2002, पृष्ठ-1
- नासिरा शर्मा, अक्षयवट, वाणी प्रकाशन पेपर बैक प्रथम संस्करण-2023, पृष्ठ-102
- नासिरा शर्मा, अक्षयवट, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-03, प्रथम संस्करण-2003, पृष्ठ सं.102
- नासिरा शर्मा, सात नदियाँ एक समुंदर, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1995, पृष्ठ सं. 14
- नासिरा शर्मा, अक्षयवट, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-03, प्रथम संस्करण 2003, पृष्ठ सं.-391
अंकिता तिवारी
शोधार्थी, हिंदी विषय, तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पता- ग्राम गोधूपुर, पोस्ट- मछली शहर जिला- जौनपुर (उ.प्र.)
ankitatiwari7844@gmail.com, 9335841572
महेन्द्र कुमार त्रिपाठी
(शोध-निर्देशक), तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर (उ.प्र.)
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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