- ज्योति कुमारी
नामवर
सिंह
एक
प्रभावशाली
आलोचक
थे।
उनका
आलोचनात्मक
चिंतन
अत्यंत
गहरा,
व्यापक
और
मौलिक
था।
उनकी
आलोचनात्मक
कृतियों
के
आधार
पर
यह
स्पष्ट
कहा
जा
सकता
है
कि
नामवर
जी
में
रचना
के
मर्म
को
समझने
की
व्यावहारिक
क्षमता
थी।
नामवर
जी
मार्क्सवादी
आलोचक
रहे
हैं
किंतु
उन्होंने
अपनी
आलोचनात्मक
दृष्टि
को
हिंदी
साहित्य
की
परंपरा
के
अनुरूप
ढाला
है।
इनकी
आलोचना
के
केंद्र
में
सामाजिक
संदर्भ
और
ऐतिहासिक
चेतना
ही
प्रमुख
रही
है।
नामवर
सिंह
ने
आधुनिक
साहित्य
की
समझ
के
लिए
प्राचीन
भाषा
एवं
साहित्य
के
अध्ययन
पर
विशेष
बल
दिया
है।
उनके
अनुसार
अपभ्रंश
भाषा
आधुनिक
भारतीय
भाषाओं
की
नींव
है।
अपभ्रंश
भाषा
की
सहजता
और
जीवंतता
ने
आधुनिक
साहित्य
को
नई
दिशा
दी
है।
नामवर
सिंह
ने
अपभ्रंश
साहित्य
की
उस
समृद्ध
परंपरा
को
अपनी
रचना
के
माध्यम
से
उजागर
किया
है
जिसने
हिंदी
साहित्य
को
व्यापक
आधार
दिया
है।
मध्यकालीन
भारतीय
आर्यभाषा
की
प्राकृत
अवस्था
से
अपभ्रंश
भाषा
का
स्वरूप
स्पष्ट
होने
लगता
है,
आगे
चलकर
इससे
अन्य
भारतीय
भाषाओं
का
भी
विकास
हुआ
है।
नामवर
सिंह
जी
ने
यह
स्पष्ट
रूप
से
स्वीकार
किया
है
कि
हिन्दी
साहित्य
की
परंपरा
का
आरंभ
अपभ्रंश
की
साहित्यिक
रचनाओं
से
हुआ
है।
सिद्ध,
नाथ
व
जैन
कवियों
की
अपभ्रंश
रचना
से
हिन्दी
साहित्य
के
आदिकाल
की
वास्तविक
शुरुआत
हुई
है।
सिद्धों
व
नाथों
के
प्रयोग
को
नामवर
जी
ने
हिंदी
निर्गुण
परंपरा
के
बीज
के
रूप
में
स्वीकार
किया
है।
अपभ्रंश
भाषा
के
साहित्य
व
हिन्दी
के
विकास
में
उसके
महत्व
को
उजागर
करने
में
नामवर
जी
ने
अपनी
प्रगतिशील
चेतना
का
परिचय
दिया
है
है।
भाषा
और
साहित्य
के
संदर्भ
में
नामवर
जी
की
आलोचना
सदैव
सामाजिक
व
ऐतिहासिक
महत्व
को
रेखांकित
करती
है।
हिन्दी
आलोचना
आज
अपने
विकास
की
अनेक
अवस्थाएँ
पार
कर
एक
समृद्ध
परंपरा
का
रूप
ले
चुकी
है।
आलोचना
विधा
को
शीर्ष
तक
पहुंचाने
का
श्रेय
हिन्दी
के
परिश्रमी
व
तटस्थ
आलोचकों
को
जाता
है।
आलोचक
का
कार्य
रचना
के
निहितार्थ
को
स्पष्ट
करने
के
साथ-साथ
उससे
जुड़ी
बुनियादी
समस्या
की
ओर
पाठकों
का
ध्यान
आकृष्ट
करना
है।
इस
दृष्टि
से
यदि
विचार
करें
तो
आलोचक,
पथ
प्रदर्शक
होता
है
जो
रचना
के
गुण
दोष
का
विवेचन
कर
पाठक
को
नई
दृष्टि
देने
के
साथ
साथ
लेखक
को
सजग
करता
है।
किंतु
इसका
यह
अर्थ
नही
की
वह
कोई
सिद्धांत
निर्माता
है।
भारत
यायावर
आलोचना-कर्म
को
स्पष्ट
करते
हुए
लिखते
हैं-
“आमतौर
पर
हम
यह
भूल
जाते
हैं
कि
आलोचक
साहित्य
का
दरोगा
नहीं
होता
है।
ऐसा
नहीं
हो
सकता
कि
आप
कोई
दिशानिर्देश
देने
वाले
सिद्धान्त
बनायें
और
कोई
अन्य
आपके
उस
सिद्धान्त
पर
रचना
करे।
आलोचना
एक
तरह
से
रचना
पर
ही
निर्भर
है।
अतः
इस
बात
का
ध्यान
रखा
जाना
चाहिए
कि
रचना
न
हो
तो
आलोचना
का
कोई
मतलब
नहीं
है।”1 हिंदी आलोचना के
उत्कर्ष
में
जिन
आलोचकों
का
अमूल्य
योगदान
रहा
है,
उनमें
महावीर
प्रसाद
द्विवेदी,
रामचन्द्र
शुक्ल,
नन्दुलारे
वाजपेयी,
शिवदान
सिंह
चौहान,
हजारीप्रसाद
द्विवेदी,
प्रकाशचन्द्र
गुप्त,
रामविलास
शर्मा
और
नामवर
सिंह
जी
प्रमुख
हैं।
ये
सभी
हिन्दी
आलोचना
के
प्रमुख
स्तम्भ
माने
जाते
हैं
और
इनके
योगदान
का
ऐतिहासिक
महत्त्व
है।
इन
सभी
आलोचकों
ने
आलोचक
के
कर्तव्य
को
बखूबी
निभाया
है|
शिवदान
सिंह
चौहान,
प्रकाशचन्द्र
गुप्त,
रामविलास
शर्मा
और
नामवर
सिंह
आदि
का
नाम
प्रगतिवादी
समीक्षकों
में
विशेष
रूप
से
लिया
जाता
है।
प्रगतिवादी
समीक्षकों
में
नामवर
सिंह
का
नाम
विशेष
रूप
से
उल्लेखनीय
है।
नामवर
सिंह
जी
ने
आधुनिक
तथा
प्राचीन
साहित्य
का
मूल्यांकन
कर
साहित्य
को
व्यापक
जन
जीवन
से
जोड़ा
है।
इनकी
आलोचना
पद्धति
तर्क
और
विवेक
पर
आधारित
है।
आलोचनात्मक
कृतियों
से
यह
स्पष्ट
होता
है
कि
इनके
ज्ञान
का
क्षेत्र
सामाजिक,
राजनीतिक,
सांस्कृतिक,
राष्ट्रीय
तथा
अंतर्राष्ट्रीय
स्तर
तक
फैला
था।
आलोचना
जैसी
जटिल
विधा
को
सहज
बनाने
में
नामवर
सिंह
जी
का
विशेष
योगदान
रहा
है।
“नामवर
जी
मूलतः
साहित्यिक
समाज
के
हिस्से
थे,
पर
उनकी
सबसे
बड़ी
खूबी
यह
थी
कि
वे
उसमें
क़ैद
नहीं
रहे।
उन्होंने
साहित्येतर
समाज
में
अपनी
स्वीकार्यता
निर्मित
की।
साहित्येतर
अनुशासनों
के
संवेदनशील
शिक्षितों
और
बौद्धिकों
के
बीच
वे
सहज
ही
अपनी
छाप
छोड़
सके
तो
इसके
पीछे
उनकी
सामाजिक
प्रतिबद्धता,
जनपक्षधरता
और
अकुंठ
प्रतिभा
है।
साहित्य
की
सीमित
साहित्यिक
व्याख्या
से
बाहर
निकालकर
उसे
सामाजिक
सम्बद्धता
के
वृहद्
परिप्रेक्ष्य
में
देखने
की
प्रवृत्ति,
जो
प्रगतिशील
साहित्य-धारा
की
प्रमुख
पहचान
है,
को
उन्होंने
व्यापक
रूप
से
फैलाने
में
प्रायः
एक
बुद्धिजीवी
कार्यकर्ता
की
तरह
कार्य
किया।
इस
क्रम
में
उन्होंने
ठेठ
स्थानीय
स्थितियों
से
लेकर
वैश्विक
परिदृश्य
की
अपनी
भ्रमहीन
समझ
का
परिचय
दिया।”2
नामवर
सिंह
जी
द्वारा
रचित
प्रमुख
समीक्षात्मक
कृतियाँ
हैं
- हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग',
'छायावाद',
'इतिहास
और
आलोचना',
'आधुनिक
साहित्य
की
प्रवृत्तियाँ',
'कहानी
: नई
कहानी',
'कविता
के
नये
प्रतिमान',
'दूसरी
परम्परा
की
खोज',
'वाद
विवाद
संवाद'
आदि।
“1952 ई०
से
लेकर
आज
तक
के
हिन्दी
साहित्य
के
पूरे
विकास
को
सतर्क
दृष्टि
से
देखते
हुए
डॉ०
नामवर
सिंह
ने
एक
सच्चे
समीक्षक
का
दायित्व
निभाया
है।
उनकी
मान्यताओं
और
निर्णयों
से
मतभेद
हो
सकता
है
किन्तु
साहित्य
से
जुड़े
हुए
बुनियादी
प्रश्नों-
'जनतंत्र और समालोचना',
'आलोचना
की
स्वायत्तता',
'कविता
की
राजनीति',
'आलोचना
और
संस्थान',
'मार्क्सवादी
सौन्दर्यशास्त्र
के
विकास
की
दिशा',
'आलोचना
की
भाषा',
'प्रगतिशील
साहित्यधारा
में
अंधलोकवादी
रुझान',
'काव्य
की
दूसरी
परम्परा'-
पर
उन्होंने
जो
विचार
समय-समय
पर
व्यक्त
किए
हैं,
वे
अत्यन्त
उत्तेजक
और
प्रेरक
हैं।”3 नामवर सिंह ने
अपनी
आलोचनात्मक
यात्रा
की
शुरुआत
हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
भाषा
का
योग’
पुस्तक
से
की
थी।
यह
पुस्तक
नहीं
अपितु
नामवर
जी
द्वारा
लिखा
एक
लघु
प्रबंध
है।
इस
लघु
प्रबंध
का
महत्व
हिंदी
साहित्य
में
यह
रहा
कि
इसे
संशोधित
कर
विभिन्न
विश्वविद्यालय
के
हिन्दी
पाठ्यक्रम
में
इसे
शामिल
कराया
गया।
नामवर
जी
ने
इस
रचना
के
माध्यम
से
अपभ्रंश
भाषा
और
उसके
साहित्य
की
विभिन्न
प्रवृत्तियों
पर
आधारित
एक
समीक्षात्मक
चिंतन
प्रस्तुत
किया
है।
अपभ्रंश
भाषा
का
विकास
भारतीय
आर्यभाषा
से
हुई
है।
भारतीय
आर्यभाषा
के
मध्यकाल
में
पालि,
प्राकृत
और
अपभ्रंश
ये
तीनों
भाषाएँ
शामिल
थी।
अपभ्रंश
भाषा
प्राकृत
भाषा
के
बाद
विकसित
हुई
थी
इस
कारण
से
इसे
'प्राकृताभास हिंदी'
भी
कहा
गया
है।
रामचंद्र
शुक्ल
के
शब्दों
में
“पहले
जैसे
'गाथा' या 'गाहा'
कहने
से
प्राकृत
का
बोध
होता
था
वैसे
ही
पीछे
'दोहा' या 'दूहा'
कहने
से
अपभ्रंश
या
लोकप्रचलित
काव्यभाषा
का
बोध
होने
लगा।
इस
पुरानी
प्रचलित
काव्यभाषा
में
नीति,
श्रृंगार,
वीर
आदि
की
कविताएँ
तो
चली
ही
आती
थीं,
जैन
और
बौद्ध
धर्माचार्य
अपने
मतों
की
रक्षा
और
प्रचार
के
लिए
भी
इसमें
उपदेश
आदि
की
रचना
करते
थे।
प्राकृत
से
बिगड़कर
जो
रूप
बोलचाल
की
भाषा
ने
ग्रहण
किया
वह
भी
आगे
चलकर
कुछ
पुराना
पड़
गया
और
काव्य
रचना
के
लिए
रूढ़
हो
गया।
अपभ्रंश
नाम
उसी
समय
से
चला।
जब
तक
भाषा
बोलचाल
में
थी
तब
तक
वह
भाषा
या
देशभाषा
ही
कहलाती
रही,
जब
वह
भी
साहित्य
की
भाषा
हो
गई
तब
उसके
लिए
अपभ्रंश
शब्द
का
व्यवहार
होने
लगा।”4 अपभ्रंश संधिकालीन भाषा
है
जो
मध्यकाल
और
आधुनिक
भारतीय
आर्यभाषा
को
जोड़ती
है।
सर्वप्रथम
पतंजलि
ने
अपने
महाभाष्य
में
अपभ्रंश
शब्द
का
प्रयोग
किया
था।
नामवर
सिंह
ने
अपभ्रंश
शब्द
के
विभिन्न
पर्याय
को
स्पष्ट
करते
हुए
लिखा
है-
“भारतीय
आर्यभाषा
के
विकास
की
जो
अवस्था
आज
अपभ्रंश
नाम
से
जानी
जाती
है,
उसके
लिए
प्राचीन
संस्कृत
ग्रंथों
में
अपभ्रष्ट
और
अपभ्रंश
तथा
प्राकृत-
अपभ्रंश
ग्रंथों
में
अवव्भंस,
अवहंस,
अवहत्थ,
अवहट्ठ,
अवहठ,
अवहट,
आदि
नाम
मिलते
हैं।
संस्कृत
में
प्रायः
अपभ्रंश
शब्द
का
ही
प्रयोग
किया
गया
है,
'अपभ्रष्ट'
शब्द
का
उल्लेख
बहुत
कम
मिलता
है।
विष्णुधर्मोत्तर
पुराण
जैसे
दो-एक
ग्रंथों
ने
ही
'अपभ्रष्ट' संज्ञा का
व्यवहार
किया
है।
अवव्भंस
और
अवहंस
शब्द
अपभ्रंश
के
ही
तद्भव
रूप
है।”5 दंडी ने अपने
काव्यादर्श
में
अपभ्रंश
को
‘अभीरों
की
भाषा’
कहा
है।
अपभ्रंश
शब्द
का
अर्थ
भाषा
के
विकृत
रूप
से
है।
“अपभ्रंश
अर्थात्
भ्रष्ट,
च्युत,
स्खलित,
विकृत
अथवा
अशुद्ध।
भाषा
के
सामान्य
मानदण्ड
से
जो
शब्द-रूप
च्युत
हों,
वे
अपभ्रंश
हैं।”6
नामवर
जी
के
विषय
में
यह
कहा
जाता
है
कि
उनके
ज्ञान
का
क्षेत्र
व्यापक
स्तर
तक
फैला
है।
भाषा
विज्ञान
को
लेकर
नामवर
जी
की
समझ
व
उसका
सूक्ष्म
विश्लेषण
विद्वानों
को
भी
आश्चर्य
करता
है।
अपभ्रंश
शब्द
की
प्राचीनता
को
लेकर
जब
बात
होती
है
तो
सबसे
पहले
पतंजलि
और
उनके
महाभाष्य
का
ही
जिक्र
होता
है।
पतंजलि
से
पूर्व
के
रचनाकार
इससे
परिचित
अवश्य
थे
किंतु
ठोस
प्रमाण
का
अभाव
था।
पतंजलि
के
महाभाष्य
में
अपभ्रंश
शब्द
का
स्पष्ट
उल्लेख
मिलता
है।
पतञ्जलि
ने
अपने
महाभाष्य
में
गौः
शब्द
का
उदाहरण
देते
हुए
उसे
‘साधु’
शब्द
कहा
और
उसके
पर्याय
के
रूप
में
प्रयुक्त
होने
वाले
लोक
भाषा
के
शब्द
जैसे
गावी,
गोणी
आदि
को
‘असाधु
शब्द’
व
‘अपभ्रंश’
कहा।
नामवर
सिंह
जी
इससे
असहमत
होते
हुए
लिखते
हैं-
“पतंजलि
जैसे
लोकवादी
मुनि
के
मुख
से
बोली
के
शब्दों
के
लिए
अपशब्द
और
अपभ्रंश
संज्ञा
का
प्रयोग
सुनकर
आश्चर्य
होता
है;
क्योंकि
उन्होंने
स्थान-स्थान
पर
लोक-प्रचलित
शब्द-रूपों
को
लक्षित
ही
नहीं
किया
है
बल्कि
शब्द-प्रयोग
के
विषय
में
लोक
को
ही
प्रमाण
माना
है।
महाभाष्य
का
वैयाकरण
और
सूत
संवाद
प्रसिद्ध
है
जिसमें
शब्द-प्रयोग
को
लेकर
वैयाकरण
को
सूत
के
सम्मुख
मुँह
की
खानी
पड़ती
है।
यही
नहीं,
महाभाष्यकार
ने
अनेक
जगह
शब्द
को
'लोक-विज्ञान' कहा
है।
'लोकतो अर्थ-प्रयुक्ते
शब्द-प्रयोगे
शास्त्रेण
धर्मनियमो
क्रियते'
वार्तिक
पर
भाप्य
करते
हुए
जो
यह
कह
सकता
हो
कि
'अभ्यन्तरोऽहं लोके
न
त्वहं
लोकः'
उसके
द्वारा
लोक
में
व्यवहृत
बोली
के
शब्दों
के
लिए
अपशब्द
का
प्रयोग
किया
जाना
कुछ
विस्मयकर
ही
लगता
है।
ऐसा
प्रतीत
होता
है
कि
महाभाष्यकार
ने
उक्त
कथन
के
द्वारा
देव-वाणी
संस्कृत
के
तत्कालीन
आचायों
का
सामान्य
विचार
व्यक्त
किया
है।”7 बाद में अन्य
वैयाकरणों
ने
गावी,गोणी
आदि
को
आभीर
जाति
की
बोलियों
का
शब्द
माना।
नामवर
जी
इससे
कुछ
हद
तक
सहमत
भी
हुए।
नामवर
सिंह
के
भाषा
संबंधी
चिंतन
व
विश्लेषण
को
उपर्युक्त
उदाहरण
द्वारा
स्पष्ट
रूप
से
समझा
जा
सकता
है।
ईसा
की
छठीं
शताब्दी
तक
आते
आते
भाषा
के
अर्थ
में
अपभ्रंश
शब्द
का
प्रयोग
होने
लगा
था।
अपभ्रंश
भाषा
के
भौगोलिक
जुड़ाव
के
संदर्भ
में
नामवर
जी
का
मत
है
कि
यह
मूलतः
पश्चिम
भारत
की
बोली
है
जिसे
उत्तर
भारत
की
साहित्यिक
भाषा
होने
का
भी
गौरव
प्राप्त
है।
“साहित्यिक
अपभ्रंश
मूलतः
और
मुख्यतः
पश्चिमी
भारत
की
बोली
होती
हुई
भी
८
वीं
से
१३
वीं
शताब्दी
तक
समूचे
उत्तर
भारत
की
साहित्यिक
भाषा
थी।
एक
और
इसमें
बंगाल
के
सरह
और
काणह
जैसे
सिद्ध
कवियों
ने
दोहा-कोशों
की
रचना
की
और
मिथिला
में
ज्योतिरीश्वर
तथा
विद्यापति
ने
स्थानीय
बोली
का
पुट
देकर
साहित्यिक
अपभ्रंश
में
ग्रंथ
लिखे
तो
दूसरी
ओर
मुल्तान
में
अब्दुल
रहमान
का
भी
कंठ
इसी
में
फूटा।
दक्षिण
में
मान्यखेट
के
पुष्पदंत
ने
इसी
वाणी
को
अपने
हृदय
का
हार
बनाया,
अस्सये
के
कनकामर
मुनि
ने
इसी
में
चरित
गाया
और
महाकवि
स्वयंभू
ने
रामायण
की
रचना
के
लिए
इसी
भाषा
को
चुना।”8 नामवर जी ने
यह
भी
स्पष्ट
किया
है
कि
अपभ्रंश
भाषा
के
विकास
व
प्रसार
में
राजनीतिक
घटनाओं
का
योगदान
रहा
है
पर
पूरी
तरह
यह
इसी
तथ्य
पर
निर्भर
नहीं
करती
है।
“किसी
भाषा
को
बड़ी
छोटी
करना
किसी
राजा
के
बूते
की
बात
नहीं
है।
भाषा
का
मूल
स्रोत
तो
लोक
समाज
ही
है
और
उसे
यथेष्ट
रूप
देने
की
शक्ति
भी
उसी
लोक
के
हाथ
में
है।
फिर
भी
उस
युग
में
राजकीय
अथवा
साम्प्रदायिक
संरक्षण
के
अभाव
में
लोक
द्वारा
रची
हुई
अनेक
रचनायें
सुरक्षित
न
रह
सकीं।
इसलिए
अपभ्रंश
के
उन्नयन
में
राजकीय
और
साम्प्रदायिक
संरक्षण
की
चर्चा
करना
उसे
अनुचित
महत्व
देना
नहीं
है।
इसके
अतिरिक्त
तत्कालीन
राजाथ्रों
ने
राजनीतिक
और
व्यवसायिक
केन्द्रों
के
निर्माण
में
भी
बहुत
बड़ा
कार्य
किया
जिनसे
बिखरी
हुई
लोक-बोलियों
में
केन्द्राभिमुख
प्रवृत्ति
आई।
इसे
भूलना
ठीक
नहीं
है।
यद्यपि
अपभ्रंश
इतने
विस्तृत
भूभाग
की
व्यापक
साहित्यिक
भाषा
रही
फिर
भी
उसमें
स्थान-भेद
से
कुछ
विविधता
आ
ही
गई।”9 धीरे-धीरे लोक
बोलियों
के
सहारे
अपभ्रंश
भाषा
में
नवीनता
आने
लगी।
अपभ्रंश
से
ही
अन्य
आधुनिक
भारतीय
भाषाओं
का
जन्म
हुआ।
नामवर
जी
ने
अपभ्रंश
भाषा
के
मुख्य
रूप
से
दो
भेद
स्वीकार
किए
हैं-
पश्चिमी
और
पूर्वी।
नामवर
जी
परिनिष्ठित
अपभ्रंश
को
पश्चिमी
अपभ्रंश
के
अंतर्गत
रखते
हैं
और
पूर्वी
अपभ्रंश
को
इसकी
विभाषा
मानते
है।
नामवर
जी
अपभ्रंश
साहित्य
की
शुरुआत
सर्वप्रथम
पिशेल
से
मानते
है।
नामवर
जी
ने
अपने
प्रबंध
‘हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
में
इसका
उल्लेख
किया
है।
पिशेल
ने
अपभ्रंश
साहित्य
का
पहला
संग्रह
'माटेरियालिएन त्सुर
केंटनिस
डेस
अपभ्रंश'
प्रस्तुत
किया
था।
इस
सामग्री
में
हेमचन्द्र
के
प्राकृत-व्याकरण
के
अपभ्रंश
के
छंदों
के
साथ-साथ
'सरस्वती कण्ठाभरण' के
अठारह
और
विक्रमोर्वशींय
के
पन्द्रह
छंद
शामिल
थे।
अपभ्रंश
साहित्य
से
जुड़ा
दूसरा
महत्त्वपूर्ण
कार्य
जर्मनी
के
याकोबी
ने
किया
था।
इन्होंने
धनपाल
के
'भविस्सयन्त कहा'
का
संपादन
किया।
इसके
बाद
श्री
जिन
विजय
मुनि
जी
का
नाम
अपभ्रंश
से
जुड़ी
रचनाओं
के
संपादन
और
प्रकाशन
के
लिए
विशेष
रूप
से
लिया
जाता
है।
इन्होंने
पुष्पदंत
के
महापुराण',
स्वयंभू
के
'पउम चरिउ' और
'हरिवंश पुराण' की
खोज
की।
इस
दिशा
में
हरप्रसाद
शास्त्री
ने
भी
पूर्वी
प्रदेश
के
बौद्ध
सिद्धों
की
अपभ्रंश
रचनाओं
की
खोज
की।
इनका
'बौद्ध गान ओ
दोहा'
इस
तरह
का
पहला
ग्रन्थ
है।
इनके
पीछे
महापंडित
राहुल
सांकृत्यायन,
डा०
प्रबोधचन्द्र
वागची
आदि
ने
भी
इस
दिशा
में
महत्वपूर्ण
कार्य
किया
है।
यह
तो
तय
है
कि
उत्थान
और
पतन
के
क्रम
में
एक
का
प्रभाव
दूसरे
पर
इस
कदर
पड़ता
है
कि
चीजें
एक
दूसरे
में
गुंफित
हो
जाती
है।
भाषा
के
संदर्भ
में
भी
यह
बात
लागू
होती
है।
अपभ्रंश
साहित्य
का
विकास
संस्कृत
साहित्य
से
ही
हुआ
है।
संस्कृत
साहित्य
की
कथानक
रूढ़ियां,
वस्तु
वर्णन
की
प्रवृतियाँ
आदि
का
प्रभाव
अपभ्रंश
साहित्य
में
स्पष्ट
परिलक्षित
होता
है।
अपभ्रंश
साहित्य
में
जीवंतता,
सरलता
व
सौंदर्य
की
प्रधानता
है।
नामवर
जी
अपभ्रंश
साहित्य
की
इस
विशेषता
को
रेखांकित
करते
हुए
लिखते
हैं
- “इन
सब
विशेषताओं
का
यही
कारण
है
कि
जैन
विद्वानों
और
मुनियों,
बौद्ध
सिद्धों
और
इतर
मतानुयायी
कवियों
द्वारा
लिखे
जाने
पर
भी
अपभ्रंश
साहित्य
सामान्य
लोक-जीवन
के
गहरे
संपर्क
में
था।
वह
जिन
लोगों
की
आशाओं
और
आकांक्षाओं
को
व्यक्त
कर
रहा
था,
उन्हें
बहुत
दिनों
के
बाद
अपनी
देसी
भाषा
में
हृदय
की
बात
कहने
का
अवसर
मिला
था।
संस्कृत
के
माध्यम
से
उस
समय
उस
लोक
जीवन
की
अभिव्यक्ति
नहीं
हो
सकती
थी।
पृथ्वी-पुत्रों
की
वह
सारी
भाव-सम्पदा
सीधे
अपभ्रंश
को
ही
पहली
बार
प्राप्त
हुई।
अपभ्रंश-साहित्य
की
शक्ति
का
यही
रहस्य
है।
इसी
लोक-तत्व
के
द्वारा
अपभ्रंश
साहित्य
ने
भारतीय
साहित्य
में
अपना
ऐतिहसिक
कार्य
संपन्न
किया
और
इसी
लोक
तत्व
से
उसमें
युग-युग
तक
मानव-हृदय
को
आनन्दित
करने
की
शक्ति
आई।”10
'हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
यह
1952 में
प्रकाशित
हुई।
“हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग
और
'संक्षिप्त पृथ्वीराज
रासो'
यह
पुस्तक
मूलतः
सम्पादन
और
पाठ-शोध
से
संबंधित
कार्य
हैं
किन्तु
डॉ.
नामवर
सिंह
की
आलोचनात्मक
क्षमता
के
संकेत
इन
ग्रन्थों
में
मिलते
हैं।
प्रथम
ग्रन्थ
में
अपभ्रंश
साहित्य
पर
विचार
करते
हुए
बीच-बीच
में
नामवर
जी
ने
टिप्पणियाँ
दी
हैं,
वे
विचारपूर्ण
और
सुचिन्तित
हैं।
वे
सूक्ष्मदर्शिता
और
सहृदयता
के
साथ
मार्क्सवादी
आलोचना
पद्धति
का
रूप
प्रस्तुत
करती
हैं।11
नामवर
जी
ने
अपनी
पुस्तक
'हिन्दी के विकास
में
अपभ्रंश
का
योग'
में,
'अपभ्रंश
साहित्य'
नामक
अध्याय
में
अपभ्रंश-साहित्य
की
कतिपय
महत्त्वपूर्ण
रचनाओं
का
परिचय
देते
हुए
उनके
सौन्दर्य-पक्षों
का
उद्घाटन
किया
है।
जैन
कवियों
द्वारा
अपभ्रंश
के
पुराण
साहित्य
में
वर्णित
राम
कथा
लिखने
वालों
में
स्वयंभू,
त्रिभुवन,
पुष्पदंत
और
रइधू
का
नाम
विशेष
रूप
से
उल्लेखनीय
हैं।
राम
काव्य
के
सम्बन्ध
में
डॉ.
नामवर
सिंह
ने
लिखा
है- "जैन कवि
अतिमानवीय
प्रसंगों
को
बुद्धि
संगत
और
मानवीय
रूप
देने
कि
चेष्टा
करते
हैं।
जैसे
गंगा
उत्पत्ति,
वानरों
को
उत्पत्ति,
रावण
का
दशानन
होना
आदि।
इसी
तरह
रावण
के
चरित्र
को
जैन
कवियों
ने
अधिक
पराक्रम
युक्त
दिखाया
है
और
शूर्पणखा
का
चरित्र
अपेक्षाकृत
उज्जवल
चित्रित
किया
है
।
यहाँ
तक
कि
स्वयंभू
ने
उसका
नाम
"चन्द्रनखी
दिया
है।”12 इससे यह तो
स्पष्ट
है
कि
नामवर
सिंह
का
आलोचनात्मक
चिंतन
गहराई
और
संवेदनशीलता
से
युक्त
है।
नामवर
सिंह
की
प्रगतिवादी
चेतना
को
अपभ्रंश
साहित्य
के
मूल्यांकन
से
स्पष्ट
समझा
जा
सकता
है।
अपभ्रंश
के
महाकवि
स्वयंभू
की
रचना
‘पउमचरिउ’
में
सीता
का
चित्रण
सामान्य
नहीं
हैं।
तत्कालीन
समय
में
स्त्री
के
प्रति
पुरुष
के
दृष्टिकोण
को
स्वयंभू
ने
सीता
के
अग्नि
परीक्षा
वाले
प्रसंग
के
साथ-साथ
द्रौपदी
की
पीड़ा
के
रूप
में
भी
दर्शाया
है।
नामवर
जी
स्वयंभू
की
इस
छवि
के
विषय
में
लिखते
है-
“नारी
के
प्रति
स्वयंभू
के
मन
में
कितना
बड़ा
सम्मान
है!
जहां
भी
वे
नारी
को
किंचित
अपमानित
होते
देखते
हैं,
उनकी
संपूर्ण
मानवता
कालाग्नि
के
समान
धधक
उठती
हैं।
यही
नहीं,
अवसर
आते
ही
वे
शक्तिमती
नारी
की
शक्ति
का
उद्घाटन
किए
बिना
नहीं
रहते।”13 राम का सीता
के
प्रति
जो
व्यवहार
था
वह
उचित
नहीं
था।
सीता
अग्नि-परीक्षा
से
भयभीत
नहीं
है,
राम
का
सीता
के
प्रति
जो
विश्वास
था,
उसका
टूटना
सीता
के
लिए
असहनीय
था।
स्वयंभू
की
सीता
सतीत्व
के
गर्व
से
भरकर
कहती
है-
“पुरुष
गुणवान
होकर
भी
निहीन
होते
हैं।
मरती
हुई
स्त्री
का
भी
विश्वास
नहीं
करते।”14 स्वयंभू की सीता
यहां
प्रगतिशील
दृष्टिकोण
रखने
वाली
स्त्री
प्रतीत होती हैं
जिसमें
अपने
अस्तित्व
व
मान
की
रक्षा
करने
की
शक्ति
है।
लेकिन
अग्नि-परीक्षा
के
बाद
खरी
निकलने
पर
वे
राम
को
यह
कहकर
आश्वस्त
कर
देती
हैं
कि
“न
तुम्हारा
दोष
है,
न
जनसमूह
का।
दोष
तो
दुष्कृत
कर्म
का
है
और
इस
दोष
से
मुक्त
होने
का
एकमात्र
उपाय
यही
है
कि
ऐसा
किया
जाए
जिससे
फिर
स्त्री
योनि
में
जन्म
न
लेना
पड़े।”15 नामवर सिंह वाल्मीकि
की
सीता
की
तुलना
में
स्वयंभू
की
सीता
में
कर्म
फल
विश्वासी
चेतना
को
महसूस
करते
हैं-
“आग
से
तपकर
असली
सीता
तो
शायद
खरे
सोने
की
तरह
और
भी
कान्तिमयी
होकर
निकली
होगी,
लेकिन
स्वयंभू
की
सीता
कर्मफल
की
विभूति
रमाए
बाहर
आई।
खेद
है
कि
जिस
स्वर्ण
प्रतिभा
को
कवि
ने
इतने
परिश्रम
से
गढ़कर
तैयार
किया
उसे
अपने
ही
हाथों
जलाकर
क्षार
कर
दिया।
कवि
को
क्या
पता
कि
उसकी
सृष्टि
अग्नि-प्रवेश
से
पहले
जितनी
ही
तेजोमयी
थी,
उससे
निकलने
के
बाद
उतनी
ही
म्लान
भस्मावृत
चिनगारी
मात्र
रह
गई”16 नामवर जी अग्नि
प्रवेश
से
पहले
स्वयंभू
की
सीता
में जिस दीप्त
आभा
को
देखते
है
वह
अग्नि
प्रवेश
के
बाद
बुझ
चुकी
थी।
अपभ्रंश
साहित्य
के
बौद्ध
और
सिद्ध
कवियों
की
रहस्य
साधना
का
मूल्यांकन
करते
हुए
नामवर
जी
ने
सिद्ध
कवियों
के
आदर्श
के
रूप
में
समरसता
को
स्थापित
किया।
ये
सिद्ध
कवि
जीवन
के
राग
विराग
में
इसी
को
स्थापित
करने
का
प्रयत्न
करते
हैं।
नामवर
जी
इनकी
इस
विशेषता
को
स्पष्ट
करते
हुए
लिखते
हैं,
“कुल
मिलाकर
सिद्धों
की
रचनाओं
में
जीवन
के
प्रति
बहुत
बड़ा
स्वीकारात्मक
दृष्टिकोण
है।
उनके
दर्शन
का
यही
वह
रचनात्मक
पक्ष
है
जो
उन्हें
आशावादी
बनाए
रखता
है।
इतने
अधिक
विरोधों
के
सम्मुख
अडिग
रहना
उनके
आशावाद
का
पक्का
प्रमाण
है।“17 नामवर जी ने
अपभ्रंश
और
हिन्दी
के
साहित्यिक
संबंध
को
स्थापित
करने
का
प्रयास
किया
है।
नामवर
जी
यह
स्पष्ट
रूप
से
स्वीकारते
हैं
कि
हिंदी
अपभ्रंश
साहित्य
की
जीवंत
परंपरा
को
लेकर
आगे
बढ़ी
है।
अपभ्रंश
के
माध्यम
से
जिस
लोकजीवन
का
चित्रण
हुआ
है।
हिंदी
का
संत
साहित्य
उसी
से
प्रेरित
है।
“अपभ्रंश
ने
उस
संक्रान्ति
युग
में
भी
लोक-जीवन
को
अपनाकर
जो
युगान्तरकारी
कार्य
किया,
हिंदी
ने
उसी
को
अपने
ढंग
से
बहुत
बड़े
पैमाने
पर
संत-भक्ति
काव्य
के
द्वारा
आगे
बढ़ाया।
उस
युग
में
लोक-जीवन
ने
अपभ्रंश
के
माध्यम
से
अपनी
जिन
भावनाओं
को
व्यक्त
किया
वे
कालान्तर
में
और
भी
प्रबल
हुई
तथा
गौरवशाली
प्राचीन
भाव-संपदा
का
सहारा
पाकर
संत-भक्ति
आन्दोलन
के
रूप
में
प्रकट
हुई।
हिंदी
साहित्य
का
उदय
लोक-जीवन
के
उसी
उच्छ्वास
की
अभिव्यक्ति
है
और
इस
विषय
में
अपभ्रंश
साहित्य
उसका
अग्रदूत
है।”18 हिंदी साहित्य के
आदि
काल
में
वीरगाथात्मक
रचनाओं
के
साथ-साथ
धार्मिक
रचनाएँ
भी
हुई।
नामवर
जी
इस
युग
को
अंतर्विरोध
का
युग
स्वीकारते
हुए
आदिकाल
की
प्रवृत्तियों
का
विवेचन
करते
है-
“हिन्दी
साहित्य
के
आदिकाल
में
प्रवृति
की
अराजकता
नहीं
थी,
उसमें
बेतरतीब
उगी
हुई
प्रवृत्तियों
का
जंगल
नहीं
था।
उस
विविधता
में
भी
व्यवस्था
यह
थी
कि
दो
स्पष्ट
विरोधी
साहित्यिक
प्रवृत्तियाँ
प्रचलित
थी।
एक
प्रवृति
वह
थी
जो
क्रमशः
क्षीयमाण
थी
तो
दूसरी
वह
थी
जो
क्रमशः
वर्धमान
थी।
पहली
का
सम्बन्ध
राजस्तुति,
सामन्तों
के
चरित
वर्णन,
युद्ध
वर्णन,
केलि
विलास,
बहु
विवाह
के
लिए
विजयोन्माद
आदि
से
था
और
दूसरी
का
सम्बन्ध
नीची
समझी
जाने
वाली
जातियों
के
धार्मिक
असन्तोष,
रूढ़ि
विरोध,
बाह्याडम्बर
खण्डन,
जाति
भेद
की
आलोचना,
उच्चतर
आचार,
व्यापक
भगवद
प्रेम,
मानवीय
आत्म
गौरव
आदि
से
था।
एक
तथाकथित
वीर
गाथा
काव्य
है
तो
दूसरी
का
तथाकथित
योगधारा।”19 इस प्रकार यह
स्पष्ट
होता
है
कि
डॉ.
नामवर
सिंह
जी
ने
आदिकालीन
हिन्दी
साहित्य
की
पतनशील
एवं
विकासशील
प्रवृत्तियों
को
चिह्नित
करके,
अपनी
प्रगतिशील
समीक्षा
दृष्टि
का
प्रमाण
दिया।
नामवर
जी
ने
साहित्य
के
इतिहास
को
एक
नई
मार्क्सवादी
दृष्टि
से
समझने
के
लिए
नया
मार्ग
प्रशस्त
किया
है।
विश्वनाथ
त्रिपाठी
के
शब्दों
में,
“यदि
प्रगतिशील
आलोचना
को
जातीय
और
हिन्दी
पाठकों
की
दृष्टि
में
विश्वसनीय
बनाने
का
कार्य
डॉ.
रामविलास
शर्मा
ने
किया
है
तो
उसे
सक्रिय
आन्दोलन
के
रूप
में
जीवित
रखने
और
हिन्दीभाषी
बुद्धिजीवी
युवकों
में
तत्सम्बन्धी
रुचि
जाग्रत
करने
का
कार्य
डॉ.
नामवर
सिंह
कर
रहे
हैं।
डॉ.
नामवर
सिंह
ने
प्राचीन
और
नवीन
साहित्य
का
अध्ययन
किया
है।
हिन्दी
की
नव्यतम
रचनाओं
के
आलोचक
डॉ.
नामवर
सिंह
ने
अपना
आलोचक
जीवन
'हिन्दी के विकास
में
अपभ्रंश
का
योग'
से
शुरू
किया
था।”20
हिंदी साहित्य
के
इतिहास
के
काल
विभाजन
और
नामकरण
संबंधी
विवाद
में
विद्वानों
ने
अपभ्रंश
साहित्य
का
भी
उल्लेख
किया
था।
अपभ्रंश
भाषा
के
साहित्य
को
हिंदी
साहित्य
के
इतिहास
का
अंग
माना
जाए
या
नहीं
इसको
लेकर
कई
मत
सामने
आए।
कुछ
विद्वानों
ने
इसे
हिंदी
साहित्य
का
अनिवार्य
अंग
माना
और
अपभ्रंश
साहित्य
से
ही
साहित्य
के
इतिहास
की
शुरुआत
को
सिद्ध
किया।
कुछ
विद्वानों
ने
इसे
लोक
साहित्य
कहा
और
इसे
हिंदी
साहित्य
के
इतिहास
से
अलग
कर
दिया।
सर्वसम्मति
से
यह
स्वीकार
कर
लिया
गया
कि
अपभ्रंश
भाषा
के
साहित्य
का
अपना
एक
महत्व
है
जिसे
नकारा
नहीं
जा
सकता।
हिन्दी
आलोचना
के
क्षेत्र
में
कई
विद्वान
आए,
सबने
अपनी
कलात्मकता
का
परिचय
अलग-अलग
ढंग
से
दिया।
इन
आलोचकों
में
नामवर
सिंह
विशेष
रूप
से
उल्लेखनीय
रहे।
नामवर
सिंह
ने
अपनी
प्रगतिशील
दृष्टि
का
परिचय
देते
हुए
न
केवल
अपभ्रंश
भाषा
की
समृद्ध
परंपरा
को
प्रस्तुत
किया
अपितु
हिंदी
साहित्य
के
विकास
में
अपभ्रंश
भाषा
के
साहित्यिक
योगदान
को
भी
रेखांकित
किया।
नामवर
सिंह
ने
दोनों
भाषाओं
के
बीच
सम्बन्ध
स्थापित
करने
का
महत्वपूर्ण
कार्य
किया
है।
आधुनिक
भाषा
के
विकास
को
भी
संपूर्णता
में
समझने
के
लिए
नामवर
सिंह
जी
ने
अपनी
प्राचीन
भाषा
परंपरा
की
ओर
लौटने
का
आग्रह
किया
है।
नामवर
जी
की
कृति
‘हिन्दी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
इस
दृष्टि
से
महत्वपूर्ण
रचना
है।
इस
शोधपरक
रचना
में
स्थान-स्थान
पर
नामवर
जी
की
प्रगतिशील
आलोचना
के
साथ-साथ
अतीत
के
प्रति
अनुराग
भी
स्पष्ट
दिखाई
देता
है।
इनकी
आलोचना
में
साहित्य
की
गहरी
समझ
है।
नामवर
जी
ने
अपभ्रंश
के
कवियों
के
साथ-साथ
आदिकालीन
प्रवृत्तियों
का
भी
इसमें
विवेचन
किया
है।
नामवर
जी
यह
भी
स्पष्ट
करते
हैं
कि
हिंदी
साहित्य
की
समृद्ध
परंपरा
ने
अपभ्रंश
भाषा
की
जीवंत
परंपरा
के
साथ-साथ
उसकी
रूढ़
प्रवृति
की
भी
रक्षा
की
है।
नामवर
जी
ने
जोर
देकर
कहा
है
कि
हिंदी
साहित्य
के
उद्भव
और
विकास
के
मूल
में
कई
तत्व
शामिल
रहे
हैं,
अपभ्रंश
साहित्य
उनमें
से
एक
है।
1. भारत यायावर, आलोचना का अदृश्य पक्ष, प्रकाशन संस्थान दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2012, पृ-97
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, मानविकी विद्यापीठ, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
jyotik041@gmail.com

एक टिप्पणी भेजें