- नीरज कुमार श्रीमाली
कितना बेस्वाद होगा वो कच्चा खाना जो हमारे खानाबदोश पूर्वज खाते होंगे। असल मज़ा तो तभी आया होगा जब आग में भुना हुआ ज़ुबां पर लगा होगा, पर अभी तो खाने का लज़ीज़ होना बाकी था। पहले पेट भरने वाली खेती होगी और फिर उगाया जाएगा वो जादू, जिसका स्वाद ही नहीं बल्कि महक भी मदहोश कर देने वाली होगी। जी, सही पकड़े हैं, मैं बात कर रहा हूँ मसालों की, मसालों के उस दौर की जो अपने साथ लाया बाज़ार और फिर बर्बादी, जिसने लहू की स्याही से लिखा एक ऐसा खूनी इतिहास, जिसकी गवाही देने वालों की नस्लें ही इस दुनिया से गायब हो गईं।
खाने को लज़ीज़ बनाना, बस इतना भर काम था इनका, लेकिन इंसानों ने इसको लेकर इतनी शेखी बघारी कि ये थाली से बाहर निकलकर कभी मर्दाना कमज़ोरी वाली दवाई, कभी चर्चों की धूप, कभी दैवीय शक्ति वाली औषधि तो कभी अमरता की प्रतीक बन गए, तभी तो मिस्र के फैरो रामेसेस द्वितीय की नाक में भी काली मिर्च के दाने मिले। एक समय तो ऐसा भी आया जब यूरोप में गाय से महँगा जायफल था और केसर से ज़मीन खरीदी जा सकती थी। काली मिर्च के कारनामे सुनकर तो आप चौंक ही जाएँगे, जिससे न केवल लगान चुकाया जा सकता था बल्कि इसे दहेज में भी दिया जाता था।
जब तक समुद्री मार्ग नहीं खोजे गए थे, लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक भारत से मसाले ऐतिहासिक रेशम मार्ग से अरब पहुँचते थे। मसालों से लदा ऊंटों का कारवां जब “खैबर दर्रे” से होकर गुज़रता तो पूरी घाटी ही मसालों की खुशबू से महक जाया करती होगी। मसालों के साथ यही मुसीबत है, इनकी महक कारवां के आने से पहले ही दर्रे में छुपे लुटेरों को अपने आने की सूचना दे देती है, तभी तो डर बना रहता था, जाने कौन दिशा से कब हमला हो जाए। एक बार दर्रा पार हो जाए बस, फिर तो आगे जन्नत ही जन्नत। बल्ख, बुखारा, समरकंद, बगदाद और फिर आखिरी पड़ाव कुस्तुनतुनिया।
नाम सुना सा लगता है, कुस्तुनतुनिया, अरे हाँ, वही जो पहले कांस्टेंटिनॉपल हुआ करता था, अभी कुस्तुनतुनिया, जो बाद में जाकर बन जाएगा तुर्की का इस्तांबुल शहर। कुस्तुनतुनिया में हर कोने से कुछ ना कुछ ख़ास आता था। फ़ारस की कालीन, यूरोप की शराब, चीन का रेशम, रेगिस्तान की तरकारियां और मेवे और सबसे ख़ास, भारत के मसाले।
ख़ास किसलिए? भाई ऐसा है, गोश्त तो पूरी दुनिया में मिल जाएगा पर उसे लज़ीज़ बनाने वाले मसाले तो भारत में ही मिलेंगे। काली मिर्च, लौंग और गरम मसाला तो गोश्त में ही पड़ता होगा पर सौंफ और केसर का कुछ कह नहीं सकते। अरबी और फ़ारसी व्यापारी इन रेशम मार्गों के बेताज बादशाह थे। उन्होंने इन मसालों के लिए फंतासी किस्से गढ़े, चाहे वो दालचीनी के घोंसले बनाने वाले विशाल पक्षी हों या काली मिर्च की घाटियों की रक्षा करने वाले साँप। इन मिथकों से यूरोप में इनकी कीमतें आसमान छूने लगीं।
ऐतिहासिक रेशम मार्ग केवल एक व्यापारिक मार्ग ही नहीं था बल्कि यहाँ वस्तुओं के साथ फैला धर्म और दर्शन। करीब पंद्रह सौ वर्षों तक यह मार्ग विभिन्न संस्कृतियों के मिलन का माध्यम था। लेकिन फिर समय ने करवट ली। शायद मसालों को रेगिस्तान रास नहीं आया, तभी तो उन्होंने समुद्रों पर सवारी शुरू कर दी। इतिहास का यही वो निर्णायक मोड़ था जब मसालों ने बाज़ार से बर्बादी के सफ़र का आगाज़ कर दिया।
ऊपर वाले की मेहरबानी से दक्षिण भारत (कालीकट और मालाबार) की मिट्टी ने खूब मसाले उगले, लेकिन यही मेहरबानी बाद में अभिशाप बन गई। काली मिर्च का जन्म भारत के केरल राज्य के घने वर्षा वनों में हुआ। यही क्षेत्र प्राचीन सुमेरियन अभिलेखों में लगभग 3000 ईसा पूर्व “गार्डन ऑफ़ स्पाइसेज़” के नाम से जाना जाता था। इस जगह की ख्याति इतनी दूर तक फैली कि बेबीलोनियन, असीरियन और मिस्र के बाज़ारों में भारत के मसालों का ख़ास मुकाम था। धीरे-धीरे यह क्षेत्र प्राचीन विश्व के व्यापारिक मानचित्र का केंद्र बन गया।
एशिया का एक और सुदूर पूर्वी द्वीप मालुकू (इण्डोनेशिया) जायफल और लौंग जैसे मसालों की खान था। अंग्रेज़ों ने तो इस टापू को "मसालों के द्वीप" (स्पाइस आइलैण्ड्ज़, Spice Islands) का ताज भी पहना दिया था। पता नहीं कैसे इन मसालों की खुशबू अरब के रेगिस्तान को पार करते हुए यूरोप चली गई, अंग्रेज़ी कप्तानों में इन मसालों को लूटने की होड़ सी मच गई। अंग्रेज़ों को बस एक ही बात का मलाल था कि मसालों के इस बाज़ार पर अरब व्यापारियों का नियंत्रण है। इन्हीं बिचौलियों से बचने के लिए यूरोप में, एशिया ख़ासकर भारत के समुद्री मार्ग को ढूँढने की होड़ मच गई। काका कोलंबस और वास्को डी गामा का नाम तो आपने सुना ही होगा, काश कि उनका बेड़ा बीच समंदर में ही गर्क हो जाता तो नई दुनिया (अमेरिकी महाद्वीप) के करोड़ों मूलनिवासी ख़ाक होने से बच जाते और सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को कई सदियों तक बिना पंख के तड़पना नहीं पड़ता।
मसालों के चक्कर में काका कोलंबस एशिया, ख़ासकर भारत के समुद्री मार्ग को खोजने स्पेन से निकले थे। पूरे दस सप्ताह की यात्रा के बाद आख़िरकार 1492 में उन्हें ज़मीन (आज का बहामास) दिखाई दी, लेकिन उसने जो सोचा था वैसा हुआ नहीं। कोलंबस एशिया में नहीं बल्कि अमेरिकी धरती पर खड़ा था। उसने एक नई दुनिया खोज ली थी जहाँ उसे मसाले तो नहीं मिले लेकिन उससे भी कीमती चीज़ मिली और वो थी सोना। जैसे ही यह खबर स्पेन पहुँची, स्पेनियों ने यहाँ बस्तियाँ बसानी शुरू कर दीं। इन्हीं प्रवासियों में एक युवा था, जिसका नाम था “बार्टीलोम डी ला कसास”, जिसने पहले तो स्थानीय मूल निवासियों के नरसंहार में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन इस अमानवीय अत्याचार को देखकर उसका हृदय ठीक वैसे ही परिवर्तित हो गया जैसे सम्राट अशोक का हुआ था। बाद में वो एक पादरी बन गया। स्पेनवासियों द्वारा मूल निवासियों पर किए अत्याचारों से वो काफ़ी आहत था। आख़िरकार उसने एक रपट तैयार कर स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय को भेजी। (Bartolomé de las Casas
की प्रसिद्ध पुस्तक “A Short Account of the Destruction of the Indies” 16वीं सदी के स्पेनी विजय अभियानों के दौरान हुए अत्याचारों का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रत्यक्ष विवरण मानी जाती है। यह पुस्तक 1552 में प्रकाशित हुई, लेकिन इसमें वर्णित घटनाएँ लगभग 1492 से 1540 के दशक के बीच की हैं।)
रपट के अनुसार हिस्पेनियोला, जमैका, प्यूर्टोरिको, क्यूबा और हैती जैसे द्वीपों पर मूल निवासियों से सोना निकलवाने के लिए गोलियों से भून देना तो सबसे आसान मौत थी, लोगों को खम्भों से लटकाकर, उनके शरीर के चारों ओर रुई लपेटकर जलाना, नंगा कर गरम तवे से बाँधकर भूनना, दूध पीते बच्चों को माओं से छीनकर चट्टानों पर पटककर उनका सिर फोड़ना, भूखे शिकारी कुत्तों से नोचवाना, घास के भूसे से ढककर सामूहिक रूप से लोगों को जलाना, हाथ, पैर या स्तनों को काटना, धड़ तक शरीर को ज़मीन में गाड़कर जंगली जानवरों के लिए छोड़ देना और महिलाओं का बलात्कार आम बात थी।
सारा सोना निकलवाने के बाद जब गोरों को लगा कि अब मूलनिवासियों को इस तरह मार देने से कोई फायदा नहीं तो उन्होंने इन्हें गुलामों के रूप में बेचना शुरू कर दिया, जिनका उपयोग खेती और खदानों में किया जाता था। बार्टीलोम एक वाक़या याद करते हुए अपनी रपट में लिखते हैं कि “एक जगह जब कुत्तों के लिए खाना ही नहीं बचा तब इनके मालिकों ने गुलामों के छोटे बच्चे उठाकर भूखे कुत्तों के बीच फेंक दिए। कुत्ते उन बच्चों को नोच-नोच कर खा गए। बीमार, बूढ़े और गर्भवती महिलाओं को ज़िंदा ही उन्हीं खदानों में दफ़्न कर दिया जाता। अमेरिकी महाद्वीप से सोना और एशिया से मसालों की इस लूट से पुर्तगाल, डच, ब्रिटिश और स्पेनिश जैसे ताक़तवर साम्राज्य खड़े हुए। उपनिवेशवाद, शोषण और दास प्रथा इसी व्यापार की स्याह विरासत हैं।
चलिए अब बात करते हैं वास्कोडिगामा की। सबसे पहले तो हम बड़ी ग़फ़लत दूर कर लेते हैं कि गामा ने भारत की खोज नहीं की, बल्कि यूरोप से भारत जाने वाले समुद्री मार्ग की खोज की थी। गामा से सदियों पहले यूनान का एक छरहरा छोकरा (सिकंदर) भारत आ चुका था। संभवतः आज की अधिकांश युवा पीढ़ी नहीं जानती होगी (केवल जीके पढ़ने वालों को छोड़कर) कि भारत तो सन सैंतालीस में ही आज़ाद हो गया था, लेकिन गोवा को आज़ादी मिली 1961 में। गोवा लगभग 450 वर्षों तक पुर्तगालियों के अधीन रहा।
जब वह 1498 में पहली बार भारत में आया था तब कालीकट के राजा के साथ उसकी मुलाक़ात अच्छी नहीं रही थी। उसी समय उसने तय कर लिया था कि दूसरी बार जब आएगा, तो दूसरी मुलाक़ात को यादगार बना देगा। कमबख़्त ने कुछ ऐसा ही किया। सितंबर 1502 में वह वापस भारत आया। कालीकट में उतरने से पहले उसने रास्ते में ही भारत के एक जहाज़ “मिरी” को घेर लिया। जहाज़ में करीब 300 यात्री सवार थे। अधिकांश यात्री हज करके लौट रहे थे, साथ में कुछ कालीकट के धनी व्यापारी थे।
सबसे पहले जहाज़ में से कुछ बच्चों को उतार कर उनका बपतिस्मा कर दिया गया। उसके बाद जहाज़ को वापस तट से दूर धकेल कर आग लगा दी गई। जहाज़ सहित सभी यात्री ज़िंदा ही राख हो गए। 19 अक्टूबर 1502 को जब वह कालीकट के तट पर पहुँचा, तो सबसे पहले उसने आसपास के सभी नाविकों को बंदी बना लिया। अपने 20 जहाज़ों को एक क़तार में खड़ा करके उन सभी नाविकों को फाँसी देकर जहाज़ों के ऊपर ऊँचा लटका दिया।
दूर से यह दृश्य देखकर पूरे कालीकट में दहशत मच गई। दूसरे दिन सभी लाशों को समंदर के किनारे से थोड़ा दूर (ज़मीन पर) फेंक दिया गया। जब बस्ती के सारे लोग अपने-अपने परिजनों की लाशों को देखने आए, तब वास्कोडिगामा ने अपने जहाज़ों से तोप के गोले दागे। उन गोलों से सभी लोगों के चिथड़े उड़ गए। कालीकट का पूरा समुद्री तट लाल रंग से रंग गया।
केरल से लेकर के गोवा तक के सभी समुद्री तटीय शासकों ने वास्कोडिगामा के आगे घुटने टेक दिए। उसने न केवल भारत की अतुल संपदा को लूटा, बल्कि भारी मात्रा में धर्मांतरण करवाया। गामा की इस खोज के बाद लिस्बन यूरोप के सबसे समृद्ध शहरों में शामिल हो गया। ग़ौरतलब है कि आज भी गोवा में गामा के नाम से एक शहर है। पता नहीं क्यों हम भारतीय, भारत की गुलामी की नींव रखने वाले गामा की विरासत का बोझ आज भी उठाए हुए हैं।
जब पुर्तगाल की तिजोरियाँ भारत की अतुल संपदा से भरी जा रही थीं तो डचों को इसकी ख़बर लगने में देर न लगी। अगले दो सौ वर्षों तक डचों ने पुर्तगालियों से मसालों के व्यापार पर नियंत्रण के लिए युद्ध किया। इसी बीच लड़ाई में कूद पड़ा ब्रिटेन जिसने डचों को पराजित कर भारत को अपना उपनिवेश बना लिया, जिसकी इबारत मसालों के इसी व्यापार पर नियंत्रण के साथ लिखी गई थी। ब्रिटिश राज में मसालेदार थाली तो दूर, सूखी रोटी नसीब हो जाए, वो भी गनीमत थी। लाखों लोग केवल भूख के कारण मर गए। विज्ञान का एक पर्चा तो यह भी कहता है कि ब्रिटिश राज में हमारे पूर्वजों का शरीर लगातार भूखे रहने के कारण भूख के अनुसार ढल गया था। वही जीन हम भारतीयों को विरासत में मिले, लेकिन चूँकि अब एक आम भारतीय घर का फ्रिज हमेशा खाने से भरा रहता है, खाने की इसी बेतहाशा आपूर्ति से हमारे शरीर के जीन ग्लूकोस को पचा नहीं पा रहे और यही कारण है कि भारत डायबिटीज़ के मामले में पूरे विश्व में अव्वल है।
मसालों का ये किस्सा मसालेदार तो बिल्कुल नहीं। इनका इतिहास खून से रंगा हुआ है जिसने साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और दासता की ऐसी व्यवस्था को जन्म दिया जिसने करोड़ों लोगों की बलि ले ली। बार्टीलोम डी. ला. कसास अपनी रपट में एक जगह लिखते हैं कि एक बार किसी द्वीप के सबसे बड़े कबीले के सरदार को मौत की सज़ा सुनाई गई। उसे सूली पर चढ़ाने से पहले पादरी ने उसके पास आकर कहा “तुम मरने से पहले ईसाई धर्म अपना लो, तुम्हें जन्नत में जगह मिलेगी”। तब उस सरदार ने पूछा “क्या तुम्हारे धर्म के सभी लोग जन्नत में जाते हैं? पादरी ने कहा हाँ, इस पर कबीले के सरदार ने कहा “तब तो मैं तुम्हारा धर्म हरगिज़ नहीं कबूलूँगा। मैं नहीं चाहता कि मुझे जन्नत में भी तुम लोगों का मुँह देखना पड़े”। मुझे अपने लोगों के साथ नरक में ही भेज दो।
गरम कड़ाही में मसालों का तड़का तो ज़रूर लगाया होगा आपने, आग की लपटों और धुएँ के साथ पूरा रसोईघर महक उठता है। कभी-कभी मुझे उन लपटों के बीच रोते-बिलखते बच्चों, अधखाए बच्चों के मांस के लोथड़ों को इकट्ठा करती बेसुध औरतें, अधजली लाशों और बेड़ियों में जकड़े उन कृशकाय इंसानों के अक्स दिखाई देते हैं जिनके सामने कुछ गोरे बंदूक तान कर खड़े हैं, कुछ के हाथ में तलवारें हैं, कहीं भट्टी पर बड़ा सा तवा गरम हो रहा है और बीच-बीच में जर्मन शेफर्ड नस्ल के कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आ रही हैं।
सहायक आचार्य (वनस्पति विज्ञान), श्री गोविन्द गुरु राजकीय महाविद्यालय बांसवाडा, राजस्थान
nirajkani81@gmail.com, 9602637100

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