संस्मरण : ‘परिवार में बाबू जी’ / सिद्धार्थ सिंह

‘परिवार में बाबू जी’
(हिन्दी समीक्षा के शिखर पुरुष नामवर सिंह के इक्यानबे वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर)
- सिद्धार्थ सिंह


[1]

लिखना मैं अपने बड़े पिता जी, जिन्हें हम सब भाई-बहन बाबू जी कहते हैं, पर चाहता हूँ पर मेरे दिमाग में नामवर सिंह मेरे बाबू जी से यूँ उलझे हुए हैं कि मैं अपने बाबू जी को अलग करना भी चाहूँ तो अलग होते ही नहीं हैं। कारण शायद यह भी है कि जब तक मैंने होश संभाला, हमारे बाबू जी नामवर सिंह हो चुके थे, वे हम लोगों से ज्यादा समाज के और अपने साहित्य पाठकों के हो गए थे, वक्त के थपेड़ों ने और दिल्ली की आबोहवा ने हमारे बाबू जी को रुखा बना दिया था, जिसमें बच्चे रचनाशीलता में बाधा के सिवाय कुछ नहीं थे। पर बात यह भी है कि यदि वे नामवर सिंह न होते तो कोई इस संस्मरण को पढ़ता भी क्यों? तो मेरे बचपन की शुरुआत अपने बाबू जी को नहीं नामवर सिंह जी को देखने से हुयी, नतीजतन, मेरी स्मृतियों में भी बाबू जी और नामवर सिंह आपस में गुंथे हुए हैं।

इतवार का दिन है, घर में आपाधापी का माहौल है। पापा सुबह ही उठ कर बाज़ार चले गए हैं, माँ झकझोर-झकझोर कर बारी-बारी से हम सब को उठा रही हैं, “अरे उठो भी! भैया कभी भी पहुँच सकते हैं। देखेंगे तो क्या कहेंगे कि अब तक सो रहे हो तुम लोग। वे लोग ब्रह्ममुहूर्त में ही उठ कर पढ़ने लगते थे, तब न आज इतने बड़े विद्वान बन गए हैं, सब लोग जानते-मानते हैं...।” वास्तव में उस समय माँ की चिंता हमें बड़ा आदमी बनाने के लिए उठाने की नहीं थी, मुद्दा था कि एक मात्र गुसलखाने जाने के लिए छहो बच्चों में अंत समय में मारामारी की नौबत न आ जाए। और फिर इन सब के नित्य-कर्म के बाद थोड़ा समय टॉयलेट को ख़ुद भी फ्रेश होने के लिए मिल जाए, बदबू वगैरह दूर हो जाए, जिससे कि हमारे घर के ‘ज़िल-ए-इलाही’ को बनारस आने के बाद इत्मीनान से निपटने-नहाने का अवसर मिल जाए।

बड़ी वाली गुड्डी दीदी भी आज नहाने के लिए प्रतिबद्ध दिखायी पड़ रही हैं, जो कम ही होता है। माँ के हाथ उनके और मुन्ना गुरु के सामने तंग ही नज़र आते हैं, इसलिए उनसे माँ निवेदन की ही मुद्रा में दिखाई पड़ रहीं हैं। मुन्ना गुरु लाट साहब की तरह सोये पड़े हैं, उनका नंबर अंत में आयेगा, घर के बाऊ साहब जो ठहरे। अलसायी-सी गीता दीदी कुनमुना रहीं हैं, ‘क्या अम्मा! इतवार को भी सुबह-सुबह उठा रहीं हैं’, इति दीदी, नीना दीदी और मेरे जैसे सर्वहारा लोगों की कोई वकत नहीं होती थी, एक्कै लप्पड़ में शुद्ध हो जाते थे, इसलिए हम तीनों पर ज्यादा मेहनत नहीं लगती थी। खैर, सब गिरते-पड़ते हमेशा की तरह बाबू जी की अगवानी के लिए राजा बाबू बन के तैयार हो गए।

मेरे बड़े भाई, जिन्हें मैं प्यार भरे सम्मान से मुन्ना गुरु कहता हूँ, बचपन से ही एक नंबर के चंचल, खुराफाती और शेर दिल। उन्होंने मुझे खींच के बाहर घर के बाहर धकेला, ‘अबे आओ, बाबू जी को बहरियें से धर लिया जाएगा।’ मैं और मुन्ना गुरु चौकन्ने बाबू जी के इंतज़ार में बाहर खड़े, मुन्ना गुरु की निगाहें बार-बार ऊपर आसमान में उड़ रही पतंगों पे जा कर टिक जा रही हैं।

‘अबे, अब समझ में आया, तुम साले गुड्डी (पतंग) के चक्कर में बाहर आये हो।’

‘अरे नहीं यार, सोच रहे हैं जब तक बाबू जी नहीं आ रहे हैं, तब तक एकाध गुड्डी ही लूट लेते, जो गुड्डी लूटने का मज़ा है गुरु, वो उड़ाने में भी कहाँ। अरे, अरे.....वो ललकी चंदारा कटी, पक्का ज्ञानू पंडित के यहाँ गिरेगी, हम अभी लूट के लौट रहे हैं, कहीं जाना मत मन्टूआ! बाबू जी का मिल के स्वागत करेंगे, कह के बड़े भाई साहब फुर्र।’

थोड़ी देर में गर्वीली मुस्कान के साथ ढेर सारे मंझे के साथ एक लाल रंग की चंदारा पतंग ले कर मुन्ना गुरु वापस हाज़िर। तभी हम दोनों ने पापा को दूर से हाथ में कागज़ का ठोंगा लेकर आते हुए देखा, प्रायः पापा के हाथ में पान ही के ठोंगे हुआ करते थे, पत्तों में खोंसी हुई सींकें ठोंगे में उभर कर बता देतीं थीं कि वे अलग प्रजाति की हैं। पापा द्वारा ये सींकें पान खोलने के क्रम में निकाल-निकाल कर बिस्तर पर बाइज्जत बिखरा कर रखीं जातीं थीं कि पता नहीं कब एक बीड़ा पान खा के बचे हुए पान को बाँधने के लिए फिर उसकी जरूरत पड़ जाए या फिर, बड़े भैया ‘काशी...’ पुकार कर दांत खोदने के लिए सींक मांगेगें तो कहीं सींक की कमी न पड़ जाए, इस चिंता में कोई भी पान के ठोंगे की सींक हमारे घर में फेंकीं नहीं जाती थी। नतीजतन, बिस्तर किसी भीष्म की शरशैया से कम नहीं होता था। उस पर सोना या तो काशीनाथ जी के मान का था या तो उनके बड़के भैया नामवर जी के। कोई दूसरा सोने की हिमाकत भी करे तो छलनी ही होकर उठेगा। मेरी माता जी समेत हम सब के लिए आज तक यह रहस्य है कि पापा उस काटों से भरे बिस्तर पर सोते कैसे हैं, लेकिन जैसे साँपों के बीच रहने वालों को उसकी आदत होती है, वैसे ही हमारे पिताश्री उसमें पारंगत हैं।

लेकिन, इस बार कागज़ का ठोंगा पान के ठोंगे की तरह आड़े तिरछे उभरा हुआ नहीं था, एक निहायत ही शरीफ आयताकार ठोंगा था। हम दोनों में बेचैनी हुई। मुन्ना गुरु ने मेरे कान में फुसफुसाया, ‘गुरु! का है, देखा जाए?’ अभी मैं अपनी राय देता तब तक मुन्ना गुरु ने लपक कर ठोंगे पर झपट्टा मारा और ले उड़े सीढियों के ऊपर। मैं भी पीछे-पीछे भागा और हमारे पीछे हक्के-बक्के पापा।

जल्दी-जल्दी ठोंगा फाड़ा तो दो छोटे-छोटे क्यूब निकले अमूल मक्खन के। सब भाई-बहनों की जीभ लपलपाई, ‘बटर..।’ कम से कम मैंने तो पहली बार घर में मक्खन का आगमन देखा था।

‘देखो भाई, मैं ले के आया हूँ, इसलिए इस पर पहिला हक़ मेरा।’ मुन्ना गुरु ने अधिकार जताया।

‘अरे हाँ, मज़ाक है क्या ?’, घर की दूसरी रणबांकुरी गुड्डी दीदी ने ललकारा, ‘उम्र के हिसाब से मिलेगा। जो जितना बड़ा उसे उतना ज्यादा, जो जितना छोटा उसे उसी हिसाब से उतना कम।’

छिड़ गई जंग मक्खन को ले कर, माता जी मामला सलटाने की कोशिश कर ही रहीं थीं, तभी आकाशवाणी गूंजी, ‘आप लोग वहीँ रखिये उसे, वह भैया के लिए है। आप लोग अपनी चाय से रोटी खाइए।’

मन तो सभी का बड़ा खिन्न हुआ, लेकिन सभी जानते थे कि पापा के ‘भैया’ का मामला तर्क और बहस से परे है, इसलिए किसी ने बाल-हठ तक करने की हिमाकत न की। हम सब में सबसे दुस्साहसी मुन्ना गुरु कान में फुसफुसाए, ‘गुरु, हल्के-फुल्के, दब-दूब जाओ, सबकी हवा खराब है...निकल लो।’ प्रायः गुस्से को ताखे में रखने वाले पापा जब हमें ‘आप’ कह कर संबोधित कर दें तो संकेत साफ़ होता है कि वे रंज हो गए हैं। और फिर इतने भारी-भरकम व्यक्तित्व के स्वागत का मामला है और गंभीर कड़की के दिनों में भी वे बाबू जी के नाश्ते के लिए दो अदद मक्खन के टुकड़े लेकर आये थे, ऐसे में हमारा कोई भी लड़कपन घर की माली हालत के लिए अच्छा भी नहीं होता। हमारे लिए स्थितियों को समझना ज्यादा कठिन था भी नहीं क्योंकि अम्मा ने हम लोगों को पापा का वह आप्त वाक्य सुना-सुना कर बड़ा ही किया था कि शादी के बाद जब वह घर पर आयीं तो पापा ने उनसे जो पहली बात कही थी, वह थी, “देखिए, इस दुनिया में कोई भगवान है, ऐसा तो मैं न जानता हूँ न ही मानता, लेकिन मेरे भगवान तो मेरे भैया ही हैं। और आज से आपके भी। ऐसे में मुझे कोई कष्ट हो तो कोई चिंता नहीं पर इसका ध्यान रखियेगा कि भैया को कोई परेशानी न होने पाए।’ माँ संघ परिवार से आयी थीं, इसलिए भगवान में आस्थावान तो थीं ही; बस एक और भगवान को शामिल करना था, कर लिया।

हम लोगों ने माहौल देखा और चुपचाप वहां से सरक लिए।

बाबू जी हैं कि आने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। हाँ, मौक़ा मुआयना करने वाले जरूर आ रहे हैं। सुबह-सुबह सामने से जाने माने वकील और नामवर जी के बचपन के अभिन्न मित्र नगेन्द्र प्रसाद सिंह चले आ रहे हैं। झक सफ़ेद धोती-कुरता, छोटी मजबूत कदकाठी, मुस्कुराता चेहरा, चौड़ी नाक और अक्खड़ई की पराकाष्ठा। इसीलिए नामवर जी उन्हें झक्खड़ बाबा कहते थे, लेकिन यह अधिकार सिर्फ नामवर जी का ही था। और दुनिया में किसी का यह साहस न था।

यदि अपने को लगाने वाला आदमी हो तो उस बड़े से बड़े आदमी का पानी उतार दें बाबू नगेन्द्र प्रसाद सिंह और वहीं दूसरी तरफ, रिक्शे वाले से अत्यंत विनम्रता से पूछें - “कहिये बड़े आदमी, मुझे सिगरा (उनके घर के पास का चौराहा) तक छोड़ देंगे। रास्ते में रुक कर हम दोनों लस्सी पीया जाएगा, उसके बाद मैं आपको केशव का पान खिलाऊंगा। चलने का तरीका हमारा, और पैसा आप जो बोलें, वो।’ रिक्शा वाला ऊपर से नीचे तक उन्हें देखने लगता था कि यह कैसे महापुरुष से पाला पड़ा है। कई तो घबरा के मना भी कर देते थे। कचहरी में जिरह की कला और अपने उसूलों के लिए मशहूर बाबू नगेंदर प्रसाद सिंह जब तक वकालत चलती रही, तब तक अपनी एम्बेसडर कार में कमला नाम के ड्राइवर के साथ चलते रहे, और जब, उनके शब्दों में, वकालत दलाली एवं वकील दलाल में तब्दील हो गए, तब वे कार छोड़ कर रिक्शे पर चलने लगे। दूरी कितनी भी रही हो, रिक्शे पर ही चलने का बनारसी रईस अंदाज कभी छोड़ा नहीं उन्होंने। कोई भी मिले तो यह बताना न भूलें – “ बड़े आदमी! आपको पता है? इस दुनिया में एक ही आदमी नमवर को डांट सकता है, वह है बाबू नगेंदर प्रसाद सिंह।” बोलने के बाद वे गर्वपूर्वक कुरते की दोनों बाहें हाथ झटक कर मोड़ने लगते थे। वे जीवन भर नामवर को ‘नमवर’ ही बोलते थे और सामने वाले को बड़े आदमी, चाहे वो रिक्शावाला हो, मोची हो या चाय वाला। जानने वाले कहते हैं कि यदि नामवर से बड़ा विद्वान नहीं देखा तो बाबू नगेंदर प्रसाद सिंह से बड़ा आदमी भी नहीं देखा अब तक।

हम लोगों ने लपक कर नगेन्द्र बाबू जी का पैर छुआ पापा की तरफ देखते हुए, कि वे हमें ऐसा करते हुए देख लें। न देखने की स्थिति में फिर पैर छुआएंगे - “आप लोगों ने अभी तक पैर नहीं छुआ, चलिए, पैर छू कर आशीर्वाद लीजिये।” इस चक्कर में हमें एक ही व्यक्ति के कई-कई बार पैर छूने पड़ जाते थे।

इस बार पापा ने तसल्ली पाई कि हम लोगों ने वकील बाबू जी का पैर छू लिया है। और हमने भी कि फिर कमर को कष्ट नहीं देना पड़ेगा। इस बार वकील बाबू जी के श्रोता हम दोनों भाई थे। उन्होंने सुनाना शुरू किया - “कहिये, बड़े आदमी! किस कक्षा में पढ़ते हैं?... एक बात बतावैं आपको, ‘नमवर’ डरते हैं तो सिर्फ मुझसे...आप लोगों की उम्र है लड़ाई- झगड़ा करने की इसलिए आज एक ज्ञान देता हूँ, नोट कर लीजीए! लड़ना हो जिन्दगी में तो बड़े मुद्दों के लिए लड़ियेगा, छोटी-छोटी बातों पर जो झगड़ता है वह छोटा आदमी होता है। विद्वान बनिए या न बनिए, इंसान बड़ा बनिएगा...और सुनिए! सामाजिक संबंधों में आप लोगों को दो किस्म के लोग मिलेंगे: एक वे जो सम्बन्ध का निर्वाह करते हैं और दूसरे वे जो संबंधों में निवेश करते हैं। जो संबंधों में निवेश करते हैं वैसे निवेशकों से हमेशा सावधान रहिएगा...‘नमवर’ दूसरे किस्म के लोगों से घिरे हुए हैं और कासी को तो आदमी की पहचान ही नहीं है...खैर, अब छोड़िये....मैं बोलता रहता हूँ तो लोग पागल समझते हैं।” और फिर उन्होंने अपनी प्रिय पंक्तियाँ दोहरायीं - “या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात, दे और दिल उनको जो न दे मुझको जुबाँ और।”

जब उन्होंने पागल समझने वाली बात कही तो हम दोनों भाई हँस पड़े, और तभी उनकी प्यार भरी झिड़की मिली - “ गज़ब तमाशा करते हैं आप लोग, आप लोगों को जिन्दगी की समझ ही नहीं है... ।”

“कोई आपको पागल नहीं समझता है भैया, अन्दर तो आइये चाय पीने”, अम्मा ने दरवाजे से आवाज दी। ”

“मुझे केवल कुसुम पण्डित ही समझती हैं ...” (पापा और माँ को वे काशी पण्डित और कुसुम पण्डित कहते थे, लेकिन नामवर जी को सिर्फ नमवर)।

“हाँ तो कन्या! तुम्हें पता है कि काशी की शादी तुम्हारी माँ से मैंने ही कराई थी?...” बोलते हुए घर में घुस गए। उनका हमारी बहनों को ‘कन्या’ बुलाना हमारे लिए वैसे ही प्रिय था, जैसा उनके मुँह से हमारे लिए ‘बड़े आदमी।’

जिस क्षण का इंतज़ार था, वो घड़ी भी आ गयी। नामवर बाबू जी का आगमन हुआ। छः बच्चों की फ़ौज साफ़ सुथरे कपड़ों में बाल-वाल ‘टे’ कर दरवाजे पर तैनात, अपने पापा के भगवान को भर पेट देखने के लिए और सिर्फ यह उम्मीद लिए कि शायद वह हम लोगों को एक नज़र भर के देखें तो सही। उन्होंने हमें देखा कि नहीं देखा, याद नहीं। लम्बे-लम्बे गज भरते हुए वे घर में घुसे। लोलार्क कुण्ड, भदैनी के नीचे के कमरे में ले जाते हुए उनके पीछे हैं पापा; अति उत्साहित, अति सुरक्षात्मक और बाल सुलभ हरकतें करते हुए, मानो उनके भगवान को कोई उनसे छीन न ले। हम भी भगवान से उनकी दृष्टि रूपी प्रसाद की आकांक्षा लिए पीछे-पीछे। बाबू जी ने वकील बाबू जी को गले लगा लिया। ‘का हो नमवर, दुब्बर हो गईला यार, खात पियत ना हौवा का?’ कहते हुए झक्खड़ बाबा ने भी प्यार जताया। पापा बस सुदामा की तरह लहालोट हुए जा रहे थे।

हमें उन्हें गले मिलते हुए देख कर राहत हुयी कि पापा के भगवान प्रेम से युक्त इंसान भी हैं। हमें उम्मीद जगी कि उसी आत्मीयता का रसपान हम भी करेंगे जल्दी ही। संभवतः, अभी उनका हम सब की तरफ ध्यान न गया होगा, पापा ध्यान दिलाएंगे तब बात बनेगी। जब मामला स्थिर हो गया तब हमारी पांत लगी परिचय के लिए। बारी-बारी से अपना नाम लिए जाने पर सब आगे आते गए।

‘हाँ तो भैया, यह है सबसे बड़ी बिटिया रचना (गुड्डी दीदी), शास्त्रीय संगीत सीख रही है आजकल’...उधर से एक भारी आवाज आयी ‘हूँ...;’

‘अब इसके बाद है नीना, सब बच्चों में सबसे लम्बी’...फिर आवाज आयी ‘हूँ......’;

‘इसके बाद है स्वस्ति, बहुत पढ़ाकू’...‘हूँ...’;

‘अब इसके बाद मेरी सबसे प्यारी बिटिया है समीक्षा (गीता दीदी), स्वस्ति और ये दोनों एक ही कक्षा में पढ़ती हैं...’

हम सब चौकन्ने थे कि इस परिचय के बाद शायद प्रतिक्रिया बदले।

आखिरकार, बाबू जी की अपनी बिटिया थी समीक्षा, जो इंटरमीडिएट तक हमारे साथ ही पली-बढीं (आज डॉ. समीक्षा ठाकुर के नाम से जानी जाती हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में हिन्दी की प्रोफेसर हैं) । हम सब को कभी एहसास ही नहीं था कि वह हम सब की सगी बहन नहीं हैं। पापा के ‘सबसे प्यारी’ पर जोर देने ने अचानक हम सब को झकझोर दिया, जैसे कि उसे हम सब से अलग कर दिया गया हो, हमें दो भागों में बाँट दिया गया हो। लेकिन जैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद थी, वैसा कुछ हुआ नहीं। फिर आवाज आयी... ‘हूँ...’

अब परिचय देने और लेने वाले दोनों विद्वान थक गए से लग रहे थे, अतः हम दोनों भाइयों को घलुआ में ही निपटा दिया गया, ‘और ये दोनों मुन्ना और मंटू हैं, पुरुषार्थ और सिद्धार्थ।’...आवाज फिर वही आयी,..‘हूँ...’ पापा ने भी हम दोनों के परिचय में कोई विशेषण लगाने की जरूरत नहीं समझी। लगाते भी क्या ....’बहुत अच्छा कंचा खेलते हैं.....बहुत अच्छा गुल्ली-डंडा खेलते हैं... मुन्ना गुरु अखाड़े के चैम्पियन हैं। या फिर क्या? हमारी क्वालीफिकेशन वही थी, जो अव्याकृत थी, कम से कम जे.एन.यू. के नामवर जी के सामने।

‘हाँ, त काशी! उ कौन पत्रिका हौ, तनी बढ़ावा त एहर’ कह कर बाबू जी ने तख़लिया का एलान कर दिया। हम सब अपनी-अपनी हाजिरी लगा कर विदा हुए। दिल में सबके एक खलिस सी थी.....बाबू जी ने किसी को छुआ तक नहीं....सिर पर हाथ ही रख दिया होता....काश किसी को नाम से पुकार लिया होता.....समीक्षा दीदी भी खुश नहीं दिख रहीं थीं.... ‘क्या उनको उम्मीद थी कि बाबू जी अपनी सगी बिटिया को गोदी में बिठा लेंगे?’ नहीं, ऐसा तो वह नहीं सोच सकतीं। इस घर के संस्कारों को देखते हुए वे अपने सगे पिता से भी सार्वजनिक रूप से इस व्यवहार की उम्मीद तो न करेंगी। तब संभवतः वह पापा द्वारा कराये गए इस विशिष्ट परिचय से खुश नहीं थीं। वह हम सबसे अलग न ही थीं, न ही दिखना चाहती थीं और इसीलिए, कोई घर आ कर खींसें निपोर कर यदि पूछता था कि, “हें, हें हें, वो तो ठीक है, लेकिन इनमें से नामवर जी की बिटिया कौन है?’ तो गीता दीदी का उस निवेशक (वकील बाबू जी के शब्दों में) पर रोष देखते बनता था।

छोटा-सा घर था, कोई नखड़े में भी ‘अपने कमरे’ में तो जा नहीं सकता था। सब अगले ही क्षण साथ थे, विवेचना शुरू हुई....’कितने रूखे ढंग से मिले, हूँ के सिवा कुछ नहीं बोला उन्होंने, हम लोगों की कक्षा ही पूछ लिया होता...!

सबसे बड़ी रचना दीदी ने कहा, ‘नज़र उठा कर देखा तक नहीं’,

मुन्ना गुरु ने आपत्ति की, ’भई, हमको तो देखा था’

‘सुबह से अम्मा कूद रहीं थीं सिर पर, उठो, उठो; इसी के लिए?’ नीना दीदी ने हुंकार लगायी।

समीक्षा दीदी ने भी भागीदारी की, ‘लगता है, दिल्ली वाले सब ऐसे ही होते हैं, अब तो हम नहीं जायेंगे उनके सामने।’

समीक्षा जैसी शांत प्रकृति के व्यक्तित्व को ललकारते हुए देख कर घर की दूसरी संतुलित व्यक्ति स्वस्ति दीदी भी रोमांचित हो उठीं, ‘हाँ, हाँ दिल्ली ने ही उनको रुखा बना दिया होगा। अरे, थोड़ी देर हम लोगों से ठीक से परिचय ही कर लेते तो क्या चला जाता?’

अम्मा भी हमारे दुःख में शरीक हो गयीं, ‘इतने दिन बाद तो बच्चों से मिले हैं, मंटू और मुन्ना को तो होश भी नहीं रहा होगा जब पिछली बार आये थे। टिक्का साबुन से कपड़ा कचार कर पहिनाए कि दो शब्द बतियाने के लिए बच्चे पास रुकें तो बस्सायें नहीं, तो उनको तो साहित्यै की पड़ी है। जैसे पत्रिका कहीं उड़ी जा रही है। बिचारे बच्चे सब दुखी हो गए हैं। अरे, कुछ नहीं तो गीता से ही बतिया लिए होते।’ विद्रोह की ज्वाला भड़क रही थी। हम दोनों भाई भी कुछ सुर लगाना चाहते थे, तभी पीछे से आवाज गरजी, ‘यदि यही परिचय करने-कराने में वह रह गए होते तो आज वो नामवर सिंह न होते। उनका एक स्वभाव है और उनकी एक जीवन पद्धति है जो एक तपस्वी की है। आप लोगों को कुछ नहीं पता है कि उन्होंने जीवन में क्या-क्या झेला है और क्या झेल रहें हैं? हम लोगों का उद्देश्य केवल यह होना चाहिए कि कैसे उनके जीवन को तनावमुक्त रखें और कैसे उनकी सेवा करें। बाकि मिलने-मिलाने के लिए जीवन पड़ा है।’ पापा की इस गरज में भावुक अपील भी थी और सुधर जाने की ताकीद भी थी।

अम्मा ने तुरंत पल्टी मारी, ‘अरे, एक कपड़ा धो-धो कर पहनते हुए ये लोग पढ़े-लिखे हैं तो आज नाम कर रहें हैं। भैया थके-मांदे आये हैं, दोपहर में भाषण देने जाना है। पढेंगे-लिखेंगे कि तुम लोगों के साथ चकल्लस करेंगे दिन भर। तुम लोगों को तो पढ़ना-लिखना है नहीं, फ़ालतू की बकवास दिन भर करना है। बोलो, तुम लोग पिछला होम वर्क पूरा किये हो कि नहीं?’

हम लोग यह विषयांतर देख कर चकित। सब अपने-अपने कोने में ढुक लिए। खुसफुस जारी.... लेकिन बात तो सही है, ‘नामवर सिंह सिर्फ हमारे बाबू जी थोड़े हैं, कितना नाम हो रहा है, कुछ है तभी न लोग मिलने-जुलने आते हैं, सम्मान देते हैं। कभी-कभी उन्हीं के नाम पर आयी हुई मिठाई, फल या गन्ना में से हम लोगों को भी फ़ायदा हो जाता है।’ अंतिम पंक्ति में सबसे ज्यादा दम था, इसलिए आम राय से सब बच्चे शांत हो गए और तय हुआ कि बाबू जी की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी जायेगी।

‘बहरहाल, कुसुम! भैया के लिए ब्रेड सेंक दा आउर मक्खन लगा के पहुँचावा। जौन मक्खन बचे, ओके रख दिहा, कल काम आयी’, पापा का माँ को निर्देश आया। मक्खन का जिक्र दुबारा हम लोगों को अपनी जनसँख्या और गरीबी का एहसास करा गयी।

यह मेरे होश संभालने के बाद नामवर बाबू जी से पहली मुलाक़ात थी, जिसमें नामवर सिंह तो दिखे, अपने बाबू जी नहीं।

[2]

नामवर बाबू जी के संघर्षों और उनकी अलग किस्म की जीवनपद्धति को हम समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि एक और झटका लगा हम सब को। वह दिन मेरे बचपन के होश संभालने के बाद का पहला सबसे मनहूसियत भरा दिन था। धुंधली सी याद भर शेष है, जो अब भी असहज कर देती है। हम छः भाई-बहन का जीवन लड़ते-झगड़ते, प्यार और कुट्टी की नियमित प्रक्रिया से गुजरते हुए शानदार बीत रहा था। घर का सबसे बड़ा पकवान होता था माँ के हाथ का सीमित मात्रा में बनाया हुआ आटे का चूरन और झगड़े की जड़ प्रायः उस चूरन का बंटवारा होता था। छः बच्चे, माँ, पापा, बाबा, दादी, कभी-कभी आने वाले विजय भैया (नामवर जी के एकमात्र बेटे और हम सब के सबसे बड़े भैया) और घर पर आने-जाने वाले तमाम मेहमानों के ऊपर गिरने वाले खर्चों के बीच हम सब चूरन ही खा कर शेर बने फिरते थे। हाँ, त्यौहार वगैरह पर आटे के हलवा को देखना नसीब होता था, जिसका हम कटोरी में लड्डूनुमा आकार बना कर उसे एक दूसरे को ललचाते हुए धीरे-धीरे खाते थे। बाहर से खरीद कर आने वाली एकमात्र ‘खादनीय’ वस्तु होती थी मूंगफली, जिसे हम चीनीया-बादाम ही कहा करते थे। मूंगफली कहने पर आज भी वह अजनबी सा लगती है। यह जनसँख्या के हिसाब से आठ-आठ, दस-दस की मात्रा में हम सब के बीच बंटा करता था।

चूरन हो, हलवा हो या चीनीया-बादाम, सामग्री के बंटने के समय तो हम सब साँस रोके यह तजबीजते रहते थे कि कहीं मेरी कटोरी में दूसरे से कम तो नहीं पड़ रहा है। वितरण को लेकर अकसर जंग तय रहती ही थी, ऐसे में सबको बारी-बारी से मौका दिए जाने के बाद अन्त में नीना दीदी ही ईमानदारी की कसौटी पर खरी उतरीं, इसलिए वितरण का जिम्मा उन्हीं का रहता था। भोज्य सामग्री बंटी कि जो सबसे रोचक नियमित घटना होती थी, वह यह कि हमारी गीता दीदी को ठीक वितरण पश्चात अपना माल ले लेने के बाद तुरंत अपना कोई जरूरी काम याद आ जाता था – ‘अरे भाई, हमें गणित का होमवर्क करना है, अरे भाई, स्कूल जाने वाली फ्रॉक फट गयी है, मुझे सिलना है उसे’ कह कर गीता दीदी काम में व्यस्त। अब सामने उनकी कटोरी में पूरा समूचा हलवा लड्डू के रूप में गोलिया कर रखा हुआ है, हम सबका हलवा धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है, बाल्यकाल की ईर्ष्या से ग्रस्त हम सब इस अन्याय के लिए तैयार नहीं हैं कि हम सब का हलवा समाप्त हो रहा है और हमारे बीच का ही कोई पूरा हलवा बचाए हुए हमें इतनी यातना दे रहा है। हम मुँह अपने हलवे से सिक्त कर रहे हैं, और निगाह गीता दीदी की कटोरी पर लगी हुयी है। गुड्डी दीदी ने कातर पुकार लगायी, ‘खा लो गीता, काम तो बाद में भी हो जाएगा।’

गीता के कान पर जूं भी रेंगने का नाम ले तब तो। नीना दीदी हमेशा की तरह गीता दीदी के बचाव के लिए तत्पर, ‘गुड्डी, तुम अपना काम करो न, उसे जब खाना होगा तो खाएगी।’ नीना दीदी साथ में प्रसन्न भी कि शायद इस तरह साथ देने पर गीता दीदी के हलवे के हिस्से में से एकाध टुकड़ा मिले अन्त में।

सबका हलवा खत्म, गीता दीदी अभी भी निर्विकार भाव से गणित के होमवर्क में व्यस्त हैं जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं कि बाहर कैसी द्वेषाग्नि जल रही है। सबके हलवा के समाप्त हो जाने के बाद गीता दीदी इत्मीनान से काम ख़त्म करती हैं, धीरे-धीरे हाथ धोतीं हैं और इसके बाद कटोरी हाथ में ले कर थोड़ा-थोड़ा चुगते हुए खाना शुरू करतीं हैं। समय कम है, अब अस्त्र जल्दी-जल्दी चलाना होगा। मुन्ना गुरु ने पुराना एहसान याद दिलाया - ‘गीता भूल गयी, तुमको मैंने पिछली बार दो चीनीया-बादाम दिया था.’

‘हाँ, याद है, दोनों सड़ा था, एक भी दाना तो नहीं निकला था। ’

नतीजा सिफ़र।

मैंने भी हाथ आजमाया, ‘मैं यदि पेंटिंग का होमवर्क पूरा कर दूँ तो...’

‘अच्छा....तुमसे एक सपाट गोला तो बनता नहीं है, पेंटिंग में क्या मदद करोगे?’

उधर से माँ की आवाज गूंजी, ‘तुम लोगों ने अपना-अपना खा लिया है न? चलो वहाँ से।’

समय और भी कम होता जा रहा है, बाहर का दबाव तो है ही, हलवा भी ख़त्म होता जा रहा है। गीता दीदी माहौल देख कर उदार होती नज़र आ रहीं हैं, मुस्कुरा रहीं हैं। कुछ संभावना बनी है। अभी वह वितरण की औपचारिक घोषणा करतीं कि लूटपाट शूरू। देखते ही माल कब गायब हो गया, पता ही नहीं चला। यह हम सब के उन दिनों की नियमित गतिविधि थी। न कभी गीता दीदी ने खाद्य सामग्री को तत्काल खाया, न हम कभी उसके लूटपाट से बाज आये।

इसी किस्म के मस्त जीवन में एक पत्र बम की तरह आ कर फूटा। नामवर बाबू जी का पापा को लिखा हुआ पत्र। पत्र का पूरा मज़मून तो याद नहीं लेकिन इतना याद है कि उसमें यह सन्देश था कि गीता ने अब इन्टर पास कर लिया है। उन्हें अब आप दिल्ली भेज दें। अब वह मेरे साथ रहेगी और आगे की पढ़ाई दिल्ली में करेगी।

जिसे जन्म से पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और अपने सगे बच्चों से ज्यादा प्यार दिया, उससे अचानक एक झटके से अलग होने की सोच से ही पापा-माँ पस्त और बीमार से हो गए। हम बच्चों की तो दुनिया ही उजड़ गयी। सभी अवसादग्रस्त, दुखी और अपने तनाव से संघर्ष करते हुए, जिसमें सबसे बुरी स्थिति स्वयं गीता दीदी की।

पापा के सामने असहमतिपूर्ण याचना के स्वर भी उठने लगे, ‘वाह, गाँव से उठा कर बनारस लाने, पाल-पोस कर बड़ा करने के लिए हम लोग। सगे से भी ज्यादा सर-माथे पर बिठा कर रखा और आज एक झटके में गीता को हमसे जुदा कर रहे हैं वह। इति-गीता (स्वस्ति दीदी और समीक्षा दीदी, दोनों साथ-साथ एक ही कक्षा में बचपन से पढ़ीं थीं) ने जुड़वा बच्चों की तरह एक ही साथ खाना, पीना, सोना, स्कूल जाना किया और अब यह जोड़ी तोड़ी जा रही है। नहीं, कृपा कर के ऐसा अनर्थ मत कीजिए। यह कहाँ का न्याय है? आप कुछ तो कीजिए। एक बार उनसे बात तो कीजिए कि पढ़ाई यहाँ बी.एच.यू में भी हो सकती है।’

पापा ने उदास स्वर में मात्र इतना कहा, ‘भैया को बेटी का प्यार कभी नहीं मिला, अब वह गीता को पास बुलाना चाहते हैं तो वह गीता और भैया दोनों के हित में ही होगा।’

गीता दीदी दिल्ली चली गयीं। इस लाडली बिटिया ने नामवर बाबू जी के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया, अब वह ज्यादा चहकने लगे, खुश रहने और ठहाके लगाने लगे। हम लोगों ने भी धीरे-धीरे गीता दीदी के बिना जीवन जीना सीख लिया और बाबू जी की खुशी देख कर लगा कि जो हुआ, वही ठीक था। दिल्ली जाकर भी गीता दीदी के दिल में बनारसी पापा-माँ और भाई-बहनों के लिए जगह कम न हुई।

[3]

बिहार प्रदेश में बिताये गए जवानी के कुछ दिनों में नामवर जी के बारे में कुछ और भी ज्ञात हुआ। वर्ष 1996 में मेरी बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग के द्वारा इंटरव्यू के माध्यम से भागलपुर विश्वविद्यालय के शेखपुरा जिले के बरबीघा नामक एक कॉलेज में लेक्चरर पद पर नियुक्ति हुई थी। अभी सात-आठ महीने ही हुए थे ज्वाइन किये हुए। बिहार में कोई नौकरी ज्वाइन नहीं करता है, ‘सहयोग’ करता है। ज्वायन का हिन्दी रूपान्तर ‘सहयोग’ मुझे पहली बार वहीँ मिला। विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से नियुक्ति मिली, भागलपुर विश्वविद्यालय के ऑफिस में ज्वायन करने पहुँचा। पटना में हुए इन्टरव्यू के बाद यह मेरा बिहार में दूसरी बार प्रवेश था। ऑफिस में जा कर मैंने जॉइनिंग पेपर माँगा, क्लर्क ठठा कर हँसा, ‘बी.एच.यू. समझ लिए हैं का? इहाँ सादे कागज़ पर लिख कर सहयोग कर दीजिये।’

‘क्या कर दीजिये?’

‘अरे, सहयोग करने आये हैं तो सहयोगे न करेंगे। हमरे कपार पर नहीं न बैठेंगे।’

‘अच्छा, अच्छा, समझ गया, तो सादा कागज़ दे दीजिये।’

‘ला, अब सादा कागज़ भी हमहीं दें, चलिए दे देते हैं, आप भी क्या याद करेंगे? लाइए, बीस ठो रूपया निकालिए बाल-बुतरू को मिठाई खिलाने के लिए। ’

‘सहयोग का आवेदन लिख कर रजिस्ट्रार धनेश्वर मंडल बाबू के पास कल चले जाइयेगा। आज वे छुट्टी पर हैं। वही आपको पोस्टिंग का कॉलेज बताएँगे।’

मैं पापा के मित्र और भागलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार एवं अवकाश प्राप्त हिन्दी प्रोफेसर रामेश्वर प्रसाद सिंह के घर पर ठहरा हुआ था। निहायत ही भला एवं आत्मीय परिवार। मैं तो नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह के माध्यम से पहचाने जाने के पूरी तरह खिलाफ़, लेकिन रामेश्वर चाचा ने अपने मातहत काम कर चुके धनेश्वर बाबू को फ़ोन कर दिया। मैं अगले दिन सहयोग करने पहुँचा, ‘अच्छा, तो आप ही हैं सिद्धार्थ सिंह?’

‘जी, हाँ’

‘रामेश्वर बाबू कह रहे थे कि आप नामवर सिंह के भतीजा हैं। सहियो में आप उनके भतीजा हैं, का?’

‘सहियो’ सुन कर मैं चौंका, ‘देखिए, नामवर जी को पता भी नहीं है मेरी नौकरी लगने का। रामेश्वर बाबू ने मेरी गैर-जानकारी में आपको फोन किया है कि मुझे कोई दिक्कत न आये, नहीं तो मेरी मंशा....’

‘अरे, छोड़िये न जी। बेवकूफ बनाने के लिए कोई और नै मिला है आपको, हमहीं मिले हैं? नामवर सिंह का भतीजा रहेगा तो उनको नौकरी लगवाने के लिए भागलपुर विश्वविद्यालय का एक ठो सडियल सा कॉलेजै मिला है। बुड़बक बुझा रहे हैं हम आपको?’

‘देखिए! आपको जो समझना है, समझिये। बस, मुझे पोस्टिंग की जगह बता दें।’

‘अरे, सब्जेकटे ऐसा लिए हैं आप कि कोई ठाकुरों के कॉलेज में तो है नहीं। तो जाइए, भूमिहारों के बरबीघा कॉलेज में जाइए। देखिएगा, कुंवारे हैं, शादी के चक्कर में उठा न ले जाएँ लोग। ठाकुर बताएँगे तो डेरा किराए पर नहीं मिलेगा, भूमिहार बताएँगे तो शादी के लिए उठ जायेंगे।’

धनेश्वर बाबू कड़वे तो थे, लेकिन थे पूरे ज्योतिषी। वही हुआ जैसा उन्होंने कहा था। बी.एच.यू. के भूमिहार दोस्त के मार्फ़त एक बरबीघा के नौजवान से भेंट हुयी। नाम था बुल्लू। इक्कीस-बाईस साल का नौजवान। हट्टा-कट्टा शरीर, चेहरे पर एक सख्त भाव, मुंह में पान मसाला। मुझे पटना से बरबीघा बस में उसके साथ जाना था।

‘पहली बार बिहार में घुसे हैं? अपना बस टिकट ले लीजियेगा, हमको जरूरत नहीं है, छौंड़ा (छोरा, टिकट जांचने वाले के लिए) यदि टिकट माँग लिया तो बरबीघा से बस वापस पटना नहीं आएगी, वहीँ तोड़फोड़ देंगे। ’

बुल्लू बाबू के दुस्साहस से पहले तो मैं घबराया, फिर मैंने उत्तर दिया, ‘नहीं, दूसरी बार बिहार आये हैं। पहली बार इन्टरव्यू देने आये थे।’

‘चलिए, अच्छा है, प्रोफेसर बन गए। अब आप दस-बारह लाख के आदमी तो हो ही गए। सही तोल-मोल करेंगे तो औरो ज्यादा मिल सकता है।’

‘क्या मतलब?’

‘अरे, शादी की बात कर रहे हैं। अब नौकरी लग गयी है यहाँ तो शादी भी तो इधरिये न करेंगे।’

‘अच्छा, कौन जात हैं आप?

‘ठाकुर हैं’

‘जहां जा रहे हैं, वहाँ अपने आप को भूमिहार बताइयेगा, नहीं तो डेरा नहीं मिलेगा किराए पर।’

मैं अब दृढ हो गया, ‘बुल्लू भाई, जाति की बात चाहूँ भी तो छिप न पायेगी। कॉलेज में अध्यापक हूँ, कोई तो समझदार आदमी किराये पर देगा? अरे, किराया ज्यादा लेना हो, ले, ले।’

‘चलिए, देखते हैं। बाकि ये मत बताइयेगा कि कुंवारे हैं, नहीं तो पास ही में ठाकुरों का इलाका जमुई है। वहीँ से आ के उठा ले जायेंगे। फिर शादी करा के वापस भेजेंगे। मेरे अपने भाई को मेरे सगे मामा ही दूसरी पार्टी से पैसा लेकर उठवा ले गए थे।’

मेरी आँखें यह सुन कर फटी ही रह गयीं। अभी तक जो मेरे लिए समाचार जैसा लग रहा था, वह अब गंभीर मुद्दा लगने लगा था। मैंने तुरन्त अपना एक काल्पनिक विवाह किया। सोचना शुरू किया कि पत्नी का मायका ऐसी जगह हो, जहां बिहार-निवासी कम हो और मेरे झूठ की दरियाफ्त करना मुश्किल हो, साथ में मैं भी उस क्षेत्र से परिचित होऊं। सोच समझ कर पत्नी को सोनभद्र का निवासी बनाया, इसलिए कि अपना ननिहाल राबर्ट्सगंज सोनभद्र में है, जगह से थोड़ा परिचित हूँ और बरबीघा या जमुई वालों के लिए जांच के लिए वहाँ तक पहुँचना मुश्किल होगा। फिर पत्नी के माँ-पिता की कल्पना की, एक बेटी तीन साल की पैदा की और उसका नामकरण किया। बुल्लू को विश्वास में ले लिया क्योंकि वही वहाँ एक मात्र मेरा मित्र होने वाला था।

पहुँचते ही हम बुल्लू के घर गए, सामान रखा, उसके माँ-पिता जी से भेंट की और उसके भाई संजय से परिचय हुआ, जिसकी ‘उठ’ कर के शादी हुई थी। आदमी शानदार और खुशमिजाज लगा, घर से अलग एक बहुत छोटा सा कमरा था उसका। मुस्कुराते हुए उसने कहा, ‘तलाश लीजिये कमरा प्रोफेसर साहब यदि मिल जाए तो, वैसे लग रहा है कि आप को इसी चौकी पर मेरे साथ सोना पड़ेगा।’ कमरा चौकी की साइज़ से थोड़ा ही बड़ा था। मैंने पूछा, ‘पर आपका परिवार?’

‘अरे, उ तो किडनैप हो कर शादी करने के बाद जैसे ही छूटे, पत्नी को छोड़ दिया। ऐसे जबरदस्ती की बीबी नहीं चाहिए थी। पहले पता रहता कि उठाये जाने वाले हैं तो हम भी तैयारी में रहते, वो तो अचानक पेट्रोल पम्प पर अपना ही मामा धोखे से गाड़ी में बिठा लिया। सगा मामा था, इसलिए माँ का ख़याल कर के उसे गोली नहीं मारे हैं अब तक...।’ कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर रामदेव प्रसाद संयोग से हिन्दी के ही निकल गए। इसी कारण से बाबू नामवर सिंह और बाबू काशीनाथ सिंह वाला मेरा परिचय वहाँ मुझसे पहले से पहुँच गया था। प्राचार्य महोदय मुझे देख कर मुस्कुराए, ‘पूरे बिहार में सहयोग करने वालों में आप सिनियारीटी में सबसे नीचे हैं। हम लोग तो मान चुके थे कि अरे बाप रे, नामवर सिंह, काशी नाथ सिंह के घर का लड़का यहाँ जंगल में कहाँ सहयोग करेगा और फिर आपने बी.एच.यू से पढ़ाई की है।’ प्राचार्य महोदय अब अपने कमरे में मौजूद अध्यापकों की तरफ मुखातिब हुए, ‘आप लोगों को पता है, बी.एच.यू. में एक ऐसे हिन्दी के प्रोफेसर रहे हैं, जो पाँच सौ शोध-प्रबंधों के परीक्षक रहे थे।’ जनता में से वाह, वाह की ध्वनि सुनायी पड़ने लगी।

प्राचार्य साहब आगे जारी रहे, ‘देखिए, यहाँ कॉलेज में बड़ी राजनीति है, ये भूमिहारों का गढ़ है और मैं ठहरा सामाजिक न्याय का सिपाही। चलिए, आ गए तो अच्छा ही न किये। कॉलेज की राजनीति में एक और सामाजिक न्याय वाला बढ़ गया। परिवार की विचारधारा के हिसाब से तो आप हमारे ही न साथ खड़े होंगे।’

किराए पर डेरा लेने की तलाश शुरू हुई मेरी। कुछ लोगों का पहला प्रश्न, ‘कौन जात हैं?’, जाति सुनते ही, ‘नहीं, खाली नहीं है।’

इक्का-दुक्का लोग तैयार भी हो गए, लेकिन उनका प्रश्न, ‘परिवार के साथ रहेंगे, या अकेले?’

‘जी, अभी तो अकेले ही रहेंगे, बच्ची छोटी है न।’

‘नहीं भई, हम लोग तो परिवार वालों को ही देते हैं।’

छोटा सा क़स्बा, पहले ही दिन स्थिति स्पष्ट हो गयी कि बिना परिवार और बिना जाति-साम्य के कोई डेरा नहीं मिलने वाला।

शाम को थक हार कर शाम के अँधेरे में संजय के कमरे पर पहुँचा। उस युग में बरबीघा में महीने में एकाध दिन बिजली आती थी। सामाजिक न्याय के मसीहा लालू जी का युग था, लोग घंटे के हिसाब से जेनरेटर माफियाओं से बिजली खरीदते थे। बुल्लू और संजय के पिता सहकारी बैंक में सामान्य पद पर थे, बिजली खरीदना संभव नहीं था, इसलिए अँधेरे में ही जीवन बीतना था। पहली ही रात पसीने में लथपथ एक ही चौकी पर सोने के लिए मैं संघर्ष कर रहा था, तभी संजय ने पीठ थपथपाया, ‘प्रोफेसर बाबू, आधी रात को कोई दरवाजा खटखटाए तो खोलियेगा मत, हमको पूछेगा तो बोल दीजिएगा कि संजय बाबू नवादा गए हैं।’

मेरा माथा चकराया, ‘आधी रात को? कौन आ सकता है ?’

‘पुलिस आ सकती है, पर आप चिंता मत कीजिए। साले यदि रात को नींद खराब किये तो सुबह थाने पर जा कर सीने पर चढ़ जायेंगे। बस, रात को आप संभाल लीजियेगा।’

‘पर पुलिस क्यों आयेगी?’

‘भई, कारखाना डाले हैं न अपने गाँव में।’

‘हाँ, तो?’

‘सामान बनाते हैं एक से एक।’

‘तो इसका पुलिस से क्या काम?’

‘आज ही न आप पूछ रहे थे कि संजय जी! आप बच्चों की पत्रिका सरस-सलिल कब से पढ़ने लगे? वो जो पत्रिकवा में कभर पेज पर एक बच्चा एके-47 ले कर खड़ा है न, उसी को अपने कारीगर को दिखा कर बनवाना है, अब इतना पैसा तो है नहीं कि असली खरीद कर उसकी नक़ल बनवाएं। फोटो वगैरह से ही काम चलाना पड़ता है। पैसा तो ज्यादा है नहीं। साला, मति मारी गयी थी जेकेएलएफ का कश्मीर से इतना अच्छा ऑफर था, आ जाओ, पाँच हज़ार रुपया प्लस खाना, पीना, रहना मुफ्त। पर गए नहीं, अब पछता रहे हैं।’

मैं सिहर गया सुनकर, ‘इस आदमी के लिए जिन्दगी क्या है? विचारधारा, राष्ट्र, नैतिकता का प्रश्न पूरी तरह बेमानी?’

‘अरे हाँ सर, बनता बिहार में है लेकिन खपत तो आपके बनारस, कानपुर तरफ ही है, कोई क्लायंट ढूढ़िये न हमारे लिए। अच्छी कमाई हो जायेगी मेरी’।.....‘चलिए, देर हो गयी है। आप भी निश्चिन्त हो कर सोइए, हम भी सोते हैं।’

शुक्र है कि रात को कोई आया नहीं और बिना पंखा रोज संजय बाबू के साथ सोने की आदत भी हो गयी। जो भी नया सामान बनता वो संजय उत्साह से मुझे दिखाने के लिए लाते। हर जगह अच्छे और बुरे लोग होते हैं, अन्त में बुल्लू और संजय के भूमिहार परिवार ने ही मुझे शरण दी। मैंने भी उन लोगों को आश्वस्त कर दिया था कि मैं वहाँ के स्तर से काफी ज्यादा उन लोगों को रहने, खाने का दे दिया करूंगा।’

एक सुबह मैं चाय पीने के लिए दूकान पर पहुँचा। एक कोने में बैठ गया। हर शहर, कस्बे, गाँव, क्षेत्र की अपनी पप्पू की चाय की दूकान होती है, प्रत्येक के अपने अड़ीबाज होते हैं। और फिर बिहार तो प्रतिभाओं की खान है, सामान्य व्यक्तियों को भी जिस प्रत्युत्पन्नमतित्व, वाकचातुर्य एवं ज्ञान के साथ आप राजनीतिक बहस-मुबाहिसा करते पाएंगे, कई बार तो लगेगा कि सभी भारतीय धर्मों के न्याय दर्शन की उत्पत्ति यहीं की चाय की दुकानों से हुई होगी, और सारे नैयायिकों ने धर्म-ग्रन्थ बाद में पढ़े होंगे, पहले यहीं पर तर्कशक्ति की धार को तेज किया होगा।

पहले से बैठे एक प्रोफेसर साहब ने आवाज दी, ‘का सिद्धार्थ बाबू! लगता है बड़ा सपर कर आज आये हैं, पहले तो नहीं दिखते थे इहाँ।’

मैं मुस्कुराया, ‘हाँ, बस मन किया आप लोगों के पास बैठने का।’

‘मन किया तो ठीकै न किया। अरे, मेलजोल से ही न सम्बन्ध बढेगा। अब देखिए, हम सोचै रहे थे कि इस नवरात्र में बाल-बुतरू के साथ बनारस जा के कुछ दिन पूजापाठ करें। अब आप का घर हईये है, आदमी आठ-दस दिन रह के लौट आयेगा। आपकी पत्नी आउर हमारी पत्नी डेरा पर गप्प किया करेंगी, बुतरू लोग आपस में खेला करेगा। हमहूँ घूर-घार (घूमघाम) लेंगे, देवी माँ और भोले बाबा का दर्शन, गंगा नहान अपना करते रहेंगे। बाकि बनारसी साड़ी आपको खरीदवाने चलना पड़ेगा, बनारसी ठग के बारे में हम बहुत सुना है भई।’

‘हाँ, हाँ, क्यों नहीं’, अन्दर से जान सूख रही थी कि ये महोदय टपक पड़े तो इनसे मिलाने के लिए अपना बीबी-बच्चा कहाँ से लायेंगे।

इस बार बगल की मंडली में ट्यूशन पर चर्चा चल रही थी। ‘कल ही गौतमवा (गौतम विडियो कोच, वहाँ ट्रेन, बस को भी ऐसे दुलराते या गरियाते हैं कि भ्रम होता है कि किसी इंसान की बात हो रही है) से भाया बिहार शरीफ लौटे हैं जी, पटना में एक ठो इतिहास का अच्छा ट्यूटर पता लगा है। वहीँ रह कर कौम्पटीशन का तैयारी करने से ठीक न रहेगा। कुछ बन गया तो ठीकै है, नहीं तो पटना में पढ़े पर दहेजवा त बढ़िया मिलेगा। पटना में तो हर विषय का ट्यूशन चलता है भई, चाहे हिन्दी हो, अंग्रेजी हो, या लौ। साइंस में झार के पईसा है।’

‘ला, पटना का बात करते हैं, इहाँ नहीं देख रहे हैं रामबिलास बाबू को? ट्यूशनै के पैसा से पांचमंजिला मकान खड़ा कर लिए, चारपहिया पर चल रहे हैं।’

बात चलते-चलते अंजाम तक पहुंची। एक गंभीर से दिखने वाले सज्जन ने यह दर्शाना चाहा कि ‘हे मोघपुरुषों ! बिहार के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलो।’ उन्होंने पहले खंखारा, जिससे कि लोग उनकी तरफ तवज्जो फरमाएं, फिर कहा -

‘नामवर सिंह का नाम सुने हैं आप लोग?’, मेरे कान खड़े हो गए, पता नहीं क्या सुनने को मिलेगा?

‘नहीं भाई, कौनो पहलवान हैं का? नाम तो बड़ा जब्बर लग रहा है’, एक ने जिज्ञासा प्रकट की।

‘यही तो है आप लोग कुछ पढ़ते-लिखते तो हैं नहीं आउर यहाँ बकर-बकर करने चले आते हैं। अरे भाई, हिन्दी के बहुत बड़े साहित्यकार हैं। दिल्ली में रहते हैं नेहरू इनवर्सटी में, डीन आउर भाईचांसलर रह चुके हैं, आउर भी न जाने का का रहे हैं।

‘अभी आप लोग बरबीघा और पटनै की बतिया रहे हैं न, बस वहीँ तक सीमित रह जाइएगा आप लोग। जस्ट इमैजिन, नामवर सिंह का ट्यूशन से कितना कमाई होता होगा? सुबह से शाम तक फुरसतै नहीं रहता होगा उनको तो। उनका घर तो पईसे से भरा होगा। इतना जगह का पेपर बनाते होंगे, दू-चार छौरों को भी लीक कर दिए तो सोच लीजिये।’

मेरा सब्र का बाँध टूट गया। बोल पड़ा, ‘मैं नामवर सिंह को जानता हूँ।’

‘सही में? अरे वाह, इ तो जनबै करते हैं, तब इहै बताएँगे कि उनकी कितनी कमाई है? महीना में पचास हज़ार तो कमा ही लेते होंगे ट्यूशन से?’

प्रोफेसर साहब मुग्ध हो गए, ‘वाह भई, पचास हज़ार। बताइये, कितने बड़े-बड़े विद्वान हैं जी दिल्ली में।’

‘देखिए, ऐसा कुछ नहीं है। वे ट्यूशन वगैरह नहीं करते हैं, और वैसे भी यह सब जे.एन.यू, दिल्ली विश्वविद्यालय या बी.एच.यू जैसे बड़े संस्थानों की संस्कृति में नहीं है। वे विद्वान हैं, उन्हें पढ़ने-पढ़ाने से फुर्सत नहीं है और होती भी तो मैं जानता हूँ कि वह ट्यूशन तो कम से कम नहीं पढ़ाते।

‘लीजिये, अरे योग्यता रहेगी तो ट्यूशन काहे नहीं पढ़ाएंगे भई? पैसा किसी को बुरा लगता है का? का प्रोफेसर साहब! आप भी लगता है कि झूठे हांक रहे हैं कि उनको जानते हैं।’

‘ठीक है, तब इस पर क्या बात की जाए? चलता हूँ’, चाय पी कर मैं चलता बना।

‘तो जल्दिये बनारस आ रहे हैं प्रोफेसर साहब, ठीक है न?’, पीछे से आवाज आयी।

तो, इस तरह से मेरा बरबीघा, जिला शेखपुरा में दाना-पानी चलता रहा। नामवर जी जागरूक समाज के विचार-विमर्श में भांति-भांति से आते रहे, मैं सुन-सुन कर आनन्दित होता रहा। बी.एच.यू में नियुक्त होने के पहले का एक साल, आठ महीने का यह अनुभव मेरे लिए जीवन भर की पूंजी हो गयी, जिन्दगी के अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों ने खूब सिखाया।

मैं बरबीघा कॉलेज से छुट्टी में आया हुआ था। दिल्ली से समाचार आया कि नामवर बाबू जी की तबियत खराब है, टाइफाइड निकला है और होली फैमिली नाम के हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। हम सब चिन्तित और पापा और मंझले बाबू जी (राम जी सिंह) की तो नींद ही गायब। मंझले वाले बाबू जी भाग कर घर आये।

मंझले बाबू जी का अंदाज निराला। आज भी पचासी साल की उम्र में साईकिल से चलते हैं, जीवन में कभी कोई दवा नहीं खाई, कुछ छोटी-मोटी समस्या होने पर डॉक्टर ने दवा लिखी भी तो डॉक्टर को ‘चुतिया’ बताते हुए उसकी दवाओं को फ्रॉड घोषित किया, सुबह तीन बजे उठ कर दण्ड बैठक किया, घर में बनाए हुए मंदिर में ऊँची आवाज में प्रार्थना की, उसके बाद एकाध कड़ाही चना खाया, कुछ घरेलू उपाय किये और बीमारी छू मंतर। ब्लड प्रेशर, शूगर जैसी को तो वे बीमारी गिनते ही नहीं, बल्कि बार- बार जांच कराना उनकी नज़र में ब्लड प्रेशर, शूगर से भी बड़ा रोग है, इसलिए वे कभी कोई जांच ही नहीं कराते। ईश्वर उन्हें ऐसे ही स्वस्थ रखे और लम्बी उम्र दे।

आज कल का तो नहीं पता, लेकिन एक लम्बे समय तक साहित्यकार उनकी नज़र में सबसे निकम्मी कौम और लिहाड़ी लेने की वस्तु थे, जो सभी जिम्मेदारियों से भागे रहने के लिए साहित्य रचना का बहाना गढ़ते हैं। पापा, मंझले बाबू जी और नामवर बाबू जी में से किसी ने हम सब बच्चों को शिक्षित करने में सबसे ज्यादा मेहनत की है तो वो हैं मंझले बाबू जी। उनकी पैनी आँखों से हम लाख प्रयास के बावजूद बच नहीं सकते थे।

फ़र्ज़ करिए कि घर पर किसी चरण-स्पर्शीय विभूति का आगमन हुआ है (चरण स्पर्श कराना हमारे घर के शिक्षाशास्त्र की धुरी थी) :

पापा (काशीनाथ सिंह) : आप लोगों ने बच्चन बाबू जी का पैर छुआ?

हम लोग (विनम्र भाव से): हाँ, छू लिया।

मैंने तो नहीं देखा, चलिए, फिर छू कर दिखाइये......,,,(हमें दूबारा छूना पड़ा)..... हाँ, अब जा कर आनंद आया।

बड़े बाबू जी (नामवर सिंह) : आप लोगों ने प्रणाम किया?

हम लोग (विनम्र भाव से): हाँ, पैर छू लिया (पैर पर यहाँ जोर है)।

अच्छा, तो फिर चलिए आप लोग। मुझे डॉक्टर साहब से कुछ बात करनी है। दरवाजा लगा दीजियेगा।

मंझले बाबू जी (राम जी सिंह) : भक, मर्दवा! कौनो तमीज ना सीखले हौवा तू लोगन? पैर छुवला?

हम लोग (विनम्र भाव से): हाँ बाबू जी, छू ले लीं।

अईसे घुटना पे छुवल जाला? फुअडै रह जईबा लोगन. चला, फिर से छुआ दूनौ हाथ से नीचे पैर पे।

मंझले बाबू जी के आगमन की सूचना से ही सिहरन पैदा हो जाती थी, कितनी भी सावधानी रखिये, उनकी अदालत में पेशी तो होनी ही थी। कुछ बानगी देखिए :

मुन्ना गुरु ने थोड़ा बाल बढ़ा लिया। मंझले बाबू जी प्रकट हुए। दोनों हाथों से बालों को पकड़ा, ‘का हो! बड़ा चुरकी बढैले हौवा, सनेमा में जाए के हौ का? (सिर पर एक तमाचा)... शाम तक इ झोंटा कट जाए के चाही नाहीं त शाम के कैंची ले के आइब।’

हम दोनों स्कूल बैग लिए हुए एक बार उनके सामने पड़ गए: “मंटू और मुन्ना स्कूल जा चुके हैं’, का अंग्रेजी में अनुवाद करो” (जब अंग्रेजी का मामला आता था तो वे शुद्ध हिन्दी पर उतर आते थे, अन्यथा भोजपुरी से ही आक्रमण होता था)।

मुन्ना गुरु कान में फुसफुसाए, ‘गुरु! ये चुका, चुकी का चक्कर बहुत खराब है, कितनी भी कोशिश करो गड़बड़ हो ही जाती है।’

बाबू जी के कान में कुछ शब्द पड़ गए, “ससुर क नाती! इ नाही कि कुछ पढ़ीं-लिखीं त दिन भर त तू लोग कंचा और गुल्ली-डंडा खेलबा। आउर काशी के त कौनो मतलबै ना हौ, दिनवा भर चार ठे चुतिया मतीन साहित्यकारन के साथ ही-ही हा-हा करिहन।”

जब हमारी बड़ी दीदी नीना ने अन्तरजातीय प्रेम विवाह करने का निर्णय किया। पापा पर बरस पड़े, “हमार आपन लड़की होत त काट के फेंक देतीं। इ सब तोहरे छूट का नतीजा हौ।” पापा सिर नींचे कर सुनते रहे। शादी में मंझले बाबू शामिल तो हुए पर बायकाट की मुद्रा में।

मंझले बाबू जी के उस गुस्से में गहरे अपनेपन का एहसास होता था, सरोकार था कि बच्चे इन दो साहित्यकारों की साहित्य-सेवा के चक्कर में बिगड़ न जाएँ और उनके शब्दों में ‘बिलेल्ला’ न हो जाएँ। दूसरा सरोकार उनका यह भी कि साहित्य नाम की इस बीमारी और साहित्यकार नाम के ‘परजीवियों’ (उनके उस समय के शब्दों में, हालांकि अब उनकी राय बदल चुकी है) ने उनके दो भाइयों को, जिन्हें वे जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं, घर की जिम्मेदारियों और विशेष तौर पर गाँव से दूर कर दिया है। गाँव उनकी धड़कन में बसता है, वे चाहते थे और चाहते हैं कि पापा और नामवर बाबू जी गाँव के मामलों में रूचि लें लेकिन ये कमबख्त जुवा कवि – लेखक उनको ‘बझाए’ रहते हैं। उनके भाई लोगों को तो आदमी की समझ है नहीं, सो वे भी उसी में ‘अझुराए’ रहते हैं।

साहित्य पर उदभूत उनका यही गुस्सा बचपन में हम लोगों पर फूट पड़ता था, और आगे चल कर सामने पड़ गए साहित्यकारों पर भी। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास होने लगा कि उनके बड़के भैया कुछ ठीक-ठाक कर रहे हैं, दिल्ली पहुँच गए हैं और नाम कर रहे हैं। एक दिन उन्होंने हमारे बचपन में ही हमें ज्ञान दिया -

‘बक मर्दवा नाहीं त ! कहाँ घुमल करला तू लोग दिनवा भर लुहेड़ा के तरह|’

इसके बाद वे अचानक खड़ी हिन्दी पर आ गए, हम लोग समझ गए कि मामला अकादमिक है।

‘आप लोगों को पता है कि आप लोगों के बड़का बाबू जी क्या लिखते हैं? क्यों इतना नाम है उनका?’

‘हम लोग थोड़ा जानते हुए भी उन्हीं के मुँह से सुनना चाहते थे उनके अपने बड़के भाई का मूल्यांकन, ‘नहीं, बाबू जी! क्या लिखते हैं वे?’

‘आप लोग सब्जी की दूकान पर जाते हैं तो छांटते हैं न कि ‘भैया! ये बैंगन किनहा है, इसको मत देना। ये वाला हल्का और अच्छा है इसे ही देना। ये करेला कड़ेर और बीज वाला है, इसे मत देना; ये वाला देशी और कम बीज वाला है, इसे ही देना। ’

‘हाँ, यही तो करते हैं हम लोग।’

‘वैसे ही भैया हिन्दी साहित्य में ‘बीनने-बराने’ का काम करते हैं। ये बहुत जरूरी है, नहीं तो पाठक लोग को तो कुछ समझ में ही नहीं आएगा कि का पढ़ीं, का ना पढ़ीं।’ (प्रायः उनकी खड़ी बोली के साथ भोजपुरी मिश्रित हो जाती थी)

हम सभी लोग समीक्षा की इस बैंगन छाप समीक्षा से अभिभूत हुए और मुन्ना गुरु ने अपने अन्दाज में विशेष टिप्पणी की, ‘गुरु! अब जा के पता चला कि नामवर बाबू जी दिल्ली में सब्जी विशेषज्ञ हो गए हैं।’

राम जी बाबू जी ने काशीनाथ जी को साहित्यकार तो संभवतः ‘देख तमाशा लकड़ी का’ जैसी ‘काशी का अस्सी’ के प्रारंभिक हिस्सों की रचना के बाद मानना शुरू किया, जब उससे उपजी लोकप्रियता का स्वाद उन्हें भी अस्सी पर चखने को मिलना शुरू हुआ। लेकिन सुना है कि नामवर बाबू जी के प्रभाव क्षेत्र के व्यापक होने के बाद से आगन्तुक नए कवियों और कहानीकारों को कई बार मंझले बाबू जी के परीक्षा कक्ष से गुजरना पड़ता था। जब तक वे नामवर जी तक अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन के लिए पहुँचते थे, तब तक वे ‘प्रीलिम्स’ से गुजर चुके होते थे -

‘का हो, का नाम हौ?’

‘अच्छा...... बावला नाम हौ ?’

‘कवी हौवा?’

‘त, तनी पिहिंक के दू-चार ठे कविता सुनावा त।’

मंझले बाबू जी तो टाइम पास कर के निकल लेते थे, और फिर नामवर बाबू जी तक ‘पिहिंक के कविता सुनाने वाले’ का नाम पहुँचाने का साहस भी नहीं था छोटे भाइयों में; लेकिन इस बहाने मंझले बाबू जी का दरबार गुलज़ार रहता था।

नामवर बाबू जी के स्वास्थ्य का समाचार सुन कर मंझले बाबू जी भागते हुए घर पर आये। मीटिंग हुयी और तय हुआ कि उन्हें सेवा-सुश्रुषा के लिए बनारस हमारे घर पर लाया जाए, जिसमें दोनों भाई अपने बड़े भाई का हाथ-पाँव दबाया करेंगे। राम जी बाबू जी को वैसे भी दिल्ली के डॉक्टरों पर विश्वास नहीं था। मेरी बहनों का विवाह हो चुका था, बड़े भाई पुरुषार्थ (जिन्हें मैं प्यार और सम्मान से मुन्ना गुरु बुलाता हूँ) बच्चों की एक अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संस्था की नौकरी में नोएडा जा चुके थे। मुझे जीवन में पहली बार नामवर बाबू जी को देखने-सुनने का, आपसी हिचक तोड़ने का मौका मिलना था।

बाबू जी का आगमन हुआ। बेहद दुर्बल और कांतिहीन लग रहे थे। उनके लिए छत पर अकेला वाला कमरा सजाया गया, जिसमें सारी सुविधाएं थीं और दिल्ली वाले घर का एकांत भी। दिल्ली के डॉक्टर की दी गयीं टाइफाइड की दवाएं बंद हो चुकी थीं और कुछ विटामिन वगैरह चल रहे थे। उनकी बार-बार आती हुई खांसी संकेत दे रही थी कि कहीं कुछ अभी भी गड़बड़ है। वे अस्वस्थ थे लेकिन पढ़ने की उनकी दीवानगी कम होने का नाम नहीं ले रही थी, सुबह पाँच के आसपास उठ कर ऐसे पढ़ना शुरू करते थे जैसे कि अभी कल ही कोई कठिन इम्तहान देना हो। उस लगन से साल भर की पढ़ाई करने से तो कोई बड़े से बड़े कॉम्पटीशन में सफल हो जाए। पढ़ने का कोई निश्चित पैटर्न नहीं, कभी आधुनिक साहित्यिक पत्रिकाओं में से कुछ पढ़ रहे हैं, कभी उपनिषद् पढ़ रहे हैं, कभी अंग्रेजी लिटरेरी थ्योरी से सम्बंधित पढ़ रहे हैं, कभी मीर, ग़ालिब या फैज़ जैसे उर्दू शायरों को पढ़ रहे हैं। कभी भी निरर्थक नहीं बैठे हैं। हमारी उन्हें बनारस बुलाने की योजना ध्वस्त होती नज़र आ रही है कि वे यहाँ पर कुछ आराम कर सकेंगे। हम सब की उनसे सुबह-शाम की चाय पर मुलाकात होती थी, जिसके लिए वे नीचे उतर कर साथ बैठने के लिए आते थे।

अब वे मुझे नाम से पुकारने लगे थे, जो आत्मीयता की अनुभूति कराता था। और फिर जब उन्हें पता लगा कि मैं पालि और बौद्ध अध्ययन का विद्यार्थी हूँ तो उन्होंने मुझे ‘भंते’ (बौद्ध भिक्षुओं को संबोधित किया जाने वाला शब्द) कह कर संबोधित करना शुरू कर दिया। एक दिन उन्होंने मेरी आलमारी की तरफ इशारा किया -‘तुम तो बौद्ध विद्या पढ़ते हो, एक बात बताओगे? मैंने हाल ही में भाषण में बुद्ध से सम्बंधित एक प्रसंग सुनाया है। बुद्ध अपने शिष्यों को एक बेड़े की उपमा देते हुए एक कथा सुनाते हैं कि एक व्यक्ति एक भारी जलाशय में गिर पड़ा है। उसे तैरना नहीं आता है और हाथ-पैर बुरी तरह मार कर जीवन बचाने का प्रयास कर रहा है। जब लगता है कि उसकी जान निकलने ही वाली है, तभी उसे दूसरी तरफ से एक लकड़ी का बेड़ा आता हुआ दिखायी देता है, वह लपक कर उसे पकड़ लेता है और उसी के सहारे लगे-लगे वह एक किनारे पहुँच कर अपनी जान बचाने में सफल हो जाता है।

अब उसे ऐसा लगता है कि इस बेड़े का उसके ऊपर बड़ा उपकार है और इसे यहीं पर फेंक देना उचित नहीं है। उत्साह में वह कंधे पर इस बेड़े को लादे जंगल में अपने घर चल देता है। वह भी थक कर निढाल है और लकड़ी का बेड़ा भी भीग कर अत्यन्त भारी हो चला है। ऐसे में पसीने से लथपथ उसकी हालत खराब होती जा रही है। तभी उसकी भेंट सामने से आ रहे बुद्ध से हो जाती है। बुद्ध ने उसके ऐसा करने का कारण पूछा। उसने समूचा प्रसंग सुना दिया। तब बुद्ध ने उसे समझाया कि बेड़े का कार्य जितना था, वह लक्ष्य सिद्ध हुआ। अब तो उसे ढोने से तुम्हारी जान ही निकल जायेगी, इसलिए इस बेड़े को यहीं पर छोड़ो और सुखपूर्वक अपने घर जाओ। व्यक्ति को बात समझ में आयी और उसने बुद्ध को प्रणाम कर अपने घर प्रस्थान किया। इसी मिसाल को दे कर बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा, “उसी प्रकार हे भिक्षुओं! मैंने भी जीवन में तुम्हें जो धर्मोपदेश दिया है, वह सिर पर ढोने के लिए नहीं दिया है। उनकी उपयोगिता है कि तुम उन्हें अपने जीवन में उतारो, जब उनके उपयोग से तुम एक आदर्श मनुष्य बन जाओगे तब तुम्हारे सामने धर्म या अधर्म का प्रश्न ही बेमानी हो जाएगा।”

अब यह बताओ कि यह प्रसंग किस पालि ग्रन्थ के किस सुत्त से लिया गया है?

मैंने तत्काल उत्तर दे दिया, “बाबू जी, तिपिटक के मज्झिम निकाय के अलगद्दूपम सुत्त में यह समूची कथा आयी है। साथ में बुद्ध ने इसी कथा में यह भी बताया है कि धर्म को ठीक तरह से न ग्रहण करना वैसे ही है जैसे कि सांप को गलत ढंग से पकड़ना।”

बाबू जी गदगद हो गए और पापा को आवाज लगाई - “अरे काशी, मेरी बड़ी तमन्ना थी कि अगली पीढ़ी में से कोई अकादमिक क्षेत्र में आये, आज मुझे प्रसन्नता हो रही है कि यह बच्चा पालि साहित्य और बौद्ध विद्या को अच्छे ढंग से पढ़ रहा है। अच्छा, काशी ने बताया कि तुम बिहार में कहीं पर पढ़ा रहे हो।”

“हाँ, बाबू जी! भागलपुर विश्वविद्यालय का एक एस.के. आर नाम का कॉलेज है।”

फिर मैंने चुटकी ली, “और हाँ, वहाँ लोग मानते हैं कि आप दिल्ली में ट्यूशन पढ़ा कर खूब पैसा कमाते हैं।”

यह सुन कर बाबू जी ठठा कर हँसे और मानो इसी घटना के बाद उन्होंने अब मुझे पास उठने-बैठने की स्वतन्त्रता दे दी। अब उनके पास घर के अन्दर ज्ञान-चर्चा के लिए दो लोग उपलब्ध हो चुके थे - साहित्य-विमर्श के लिए उनके छोटे भाई काशीनाथ जी और धर्म-दर्शन विमर्श के लिए मैं। धीरे-धीरे मुझे उनको जानने का मौका लगने लगा और उसमें मेरी कुछ अभिरुचियों का भी योगदान था। मैं मेंहदी हसन, ग़ुलाम अली, की ग़ज़लें, नुसरत फ़तेह अली खान की कौवालियाँ, पंडित भीमसेन जोशी और पंडित जसराज का शास्त्रीय गायन खूब सुनता था। इनमें पापा की कभी कोई रूचि नहीं दिखती थी, लेकिन नामवर बाबू जी की गंभीर रूचि और उर्दू एवं रागों की बेहतरीन समझ ने हमारे बीच एक ट्यूनिंग कायम कर दी। वह मुझे कभी-कभी उर्दू शब्दों के मायने और रागों के महत्त्व को समझाया करने लगे। शेर और नज्में तो शायद अनगिनत उनकी ज़बान पर रहा करती हैं हर मौके के लिए एक न एक। लेकिन उनमें से दो शेर वे अकसर ही बोला करते हैं, दोनों ही शेर उनके अलग-अलग किस्म के दर्द को बयान करते हैं।

जब वे घर की किसी बात से कष्ट पाते हैं तो उनके मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ने वाला शेर है -

जज़ा सज़ा सब यहीं पे होगी
यहीं अज़ाब-ओ-सवाब होगा
यहीं से उठेगा शोर-ए-महशर
यहीं पे रोज़-ए-हिसाब होगा

इसके पीछे कहीं उनकी अचेतन पीड़ा है कि वे हमारे दादी-बाबा यानि अपने माँ-पिता के प्रति अपना पुत्र-धर्म नहीं निभा सके, उतना समय नहीं दे सके या उनका उतना ध्यान नहीं रख सके जितना उन्हें बड़े पुत्र होने के नाते करना चाहिए था।

जब वे बाहर के तथाकथित अपनों से घिरे हुए होते हैं, जिसमें वह बाहर से चापलूसी का रंग और अन्दर से किया जाने वाला छल भी देख रहे होते हैं, तब सभा बर्खास्त होने के बाद का उनका प्रिय शेर हुआ करता है,

फुगां कि मुझ गरीब को ये हुक्म है हयात का
समझ हरेक राज़ को मगर फरेब खाए जा

जिन्हें भी यह भ्रम हो कि नामवर जी का मार्क्सवादी होने के चलते, संस्कृत साहित्य, प्राकृत-पालि साहित्य समेत समूचे भारतीय साहित्य और धर्म-दर्शन का ज्ञान सीमित या शौकिया स्तर का होगा, वह भारतीय या वैश्विक ज्ञान की किसी भी विधा में पूरी तरह पारंगत होने के बाद नामवर जी के साथ संवाद करें और नामवर जी कहीं से भी उस विषय पर ज्ञान के मामले में उनसे कमजोर दिखायी पड़ें, ऐसा कभी नहीं देखा। और तो और, नामवर जी सामने वाले को उसी के विषय में जो नवीनतम शोध हो रहा है, उस की अतिरिक्त जानकारी देते हुए नज़र आते हैं, जिससे नामवर जी से मुलाक़ात करना उसके खुद के भी लाभकारी हो जाता है।

नामवर जी के लिए ज्ञान, विवेक और लेखनशैली; सभी या फिर उनमें से कम से कम एक सर्वोपरि है, किसी भी राजनीतिक सम्बद्धता या आइडियोलॉजी से ऊपर। यदि उन्हें किसी का लेखन पसंद आ गया तो आप उसकी विपरीत विचारधारा या गैर-मार्क्सवादी विचारधारा या उसके खराब व्यक्ति होने का हवाला दे कर नामवर जी को उसके खिलाफ़ तैयार नहीं कर पायेंगे। आपको पूरी तसल्ली से सुनने के बाद वे कहेंगे, ‘हाँ, वो तो ठीक है लेकिन कमबख्त लिखता बहुत अच्छा है, इसलिए उसके आयोजन में जाना तो पड़ेगा भई।’

प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय का द्वारपाल विश्वविद्यालय के द्वार पर ही आगन्तुक के ज्ञान की परीक्षा लेता था और परीक्षा पास करने वाला ही अन्दर जा सकता था। वैसे ही, आप कितनी भी अच्छी और रोचक बातें क्यों न करने वाले हों, सार्थक एवं ज्ञान युक्त बात यदि आप के पास नहीं है तो नामवर जी आपको अपने जीवन में प्रवेश नहीं देंगे। उनके बी.एच.यू हॉस्पिटल में लगभग एडमिट रहने के दौरान उनके इस ज्ञानपिपासु स्वभाव के चलते मैंने और पापा ने जो कष्ट झेला है, उसको सिर्फ हम दोनों ही जानते हैं। बी.एच.यू हॉस्पिटल के एक सरकारी हॉस्पिटल होने के नाते मरीज़ के परिवार को तमाम व्यक्तियों की मदद की आवश्यकता पड़ती है। एक अध्यापक की शक्ति तो उसके छात्र ही होते हैं। लेकिन होता यूँ है कि योग्य और पढ़ाकू छात्र स्वार्थसिद्धि में भी उतने हुनरमन्द होते हैं, जब तक ज्ञान या लक्ष्यसिद्धि की धारा बह रही है तब तक तो खूब डुबकी लगायेंगे, लेकिन जहाँ गुरु जी को किसी गैर अकादमिक काम में उनकी मदद की आवश्यकता पड़ गयी, वहाँ कल तक का रामभक्त हनुमान नदारद। तब बेचारे वही छात्र काम आते हैं, जिन्हें गुरु जी ने कांख-कूंख कर अंतिम समय में पी एच.डी के लिए स्वीकार किया था। यहाँ भी ऐसा ही हुआ, पापा के शिष्य गण और मेरे कुछ गैर अकादमिक मित्रों के सहयोग से तीमारदारी शुरू हुई। नामवर बाबू जी का दिल्ली का इलाज गलत चला था। टाइफाइड था ही नहीं, और उसके लिए गंभीर दवाएं चल रहीं थीं। बुखार उतरने पर बनारस में घर पर सेवा-सुश्रुषा के लिए लाये गए, तब तक दो-चार दिनों बाद बुखार पुनः वापस शुरू हो गया। बात बिगड़ती देख कर हम लोगों ने बी.एच.यू हॉस्पिटल के स्पेशल वार्ड में एडमिट कराया। डॉक्टरों के लिए भी चुनौती कि है क्या? खैर, हफ्ते-दस दिन की कवायद के बाद पता लगा कि एक किस्म की टी.बी., जिसे ‘प्लूरिसी’ कहते हैं, अपने चरम पर है और अभी काफी दिन हॉस्पिटल में रहना होगा। दवाओं से उपजी हुई चिड़चिड़ाहट और प्रत्येक अवस्था में वाद-संवाद के लिए आतुर एक विराट व्यक्तित्व के मरीज की सेवा में मैं, नामवर जी के काशीनाथ सिंह एवं राम जी सिंह नामक दो अनुज और काशीनाथ जी के कुछ शिष्य, साथ में मेरे इक्के-दुक्के मित्र। नामवर जी की पल-पल उठती-गिरती अवस्था के दौरान पापा के कुछ शिष्यों समेत हम लोगों ने नामवर जी की सेवा में न दिन देखा, न रात लेकिन उनके बीमारी के उपचार से भी बड़ी चुनौती ये थी कि उनकी सेवा के साथ-साथ उनसे ज्ञान-चर्चा करने वाला महापण्डित कहाँ से लायें। हर अगली सुबह शिकायत मिले, ‘हाँ, अमुक सेवा में तो ठीक था लेकिन विषय में उसके हाथ तंग हैं, ज्ञान-चर्चा से भागता है।’ हम लोग तो इसी बात से उन सभी के शुक्रगुजार थे कि कुछ लोगों ने महीने भर दिन-रात उनकी सेवा में हमारी सहायता की, इसलिए नामवर जी की इस शिकायत का हमारे पास कोई निदान नहीं था।

उसी दौरान दर्शनशास्त्र के कोई अध्यापक भी उन्हें हॉस्पिटल में देखने के लिए आये। मैं प्रसन्न था, कि साहित्यकारों से तो उनका संवाद हो भी जा रहा था, चलो अब दर्शन-चर्चा की आस भी पूरी हो गई। कुछ ही देर की बातचीत के बाद मैंने देखा कि नामवर बाबू रूचि खो रहे हैं। राणा की पुतली फिरी नहीं, तब तक चेतक मुड़ जाता था, की तर्ज पर संकेत समझ कर हम लोगों ने उन्हें विदा किया। मैंने जिज्ञासा प्रकट की, ‘बाबू जी, व्यक्ति तो अच्छे लग रहे थे, आपने बड़ी जल्दी बात समेट ली। क्या बात है?’

‘हाँ, व्यक्ति तो सज्जन थे, लेकिन उनसे दर्शन-चर्चा संभव नहीं थी। जो व्यक्ति आदि गुरु शंकराचार्य के ग्रन्थ शारीरकभाष्य को शारीरिकभाष्य बोले, उससे दार्शनिक संवाद संभव नहीं है। इससे यह भी पता लगता है कि उसके लिए शारीरक और शारीरिक में कोई अंतर नहीं है, जबकि ये दोनों अलग-अलग अर्थों के परिचायक शब्द हैं। इसी तरह से तुम्हारे बौद्ध विद्या में विद्वानों से संवाद करते हुए मैं देखता हूँ कि वे अश्वघोष द्वारा रचित ग्रन्थ ‘सौन्दरनन्द’ को सौन्दरनन्द कहते हैं या सौन्दरानन्द। भई, सुन्दरी और बुद्ध के भाई नन्द का प्रेमप्रसंग वर्णित है तो ग्रन्थ का शीर्षक तो सौन्दरनन्द ही बनेगा। यदि व्यक्ति ने शारीरिकभाष्य या सौन्दरानन्द बोल दिया तो अगले ही क्षण मैं तय कर लेता हूँ कि यह व्यक्ति आगे साहित्य या दर्शन चर्चा के लायक नहीं है।’

राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के हिन्दी विभाग में कार्यरत युवा विद्वान सहायक प्रोफेसर और छोटे भाई समान विशाल विक्रम सिंह ने हाल ही में अपने फेसबुक पर नामवर जी के भाषण का एक अंश का जिक्र किया है, जो उन्होंने संभवतः 2011 या 12 के दौरान हिंदी दिवस के अवसर पर चिकित्सा विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रेक्षागृह में दिया था। उस भाषण में नामवर जी ने अपनी एक प्रिय कथा सुनायी थी, जिसे वे हम सब को घर पर भी सुना चुके थे। विशाल द्वारा संक्षेप में उद्धृत कथा का मुकम्मल रूप कुछ इस तरह से है: “एक बार राजा भोज पालकी ढो रहे कहारों में से एक कहार ठोकर लग जाने के कारण गिर कर चोटिल हो गया। निर्जन स्थान होने के चलते नया कहार मिलना संभव न हुआ। बहुत खोजने के बाद कहारों को सहयोग के लिए एक दुर्बल सा व्यक्ति मिला। वह एक वैयाकरण अर्थात व्याकरण का ज्ञाता था।

कहार उसे पकड़ कर राजा भोज के पास ले गये। वैयाकरण ने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि भाई, मैं तो शब्दों का विशेषज्ञ हूं पर पालकी ढोना मेरे बस की बात नहीं। लेकिन राजा ने उसकी एक न सुनी। बेचारा वैयाकरण को दबाव में अन्य कहारों के साथ पालकी ढोने में लगा दिया गया। जो पेशेवर कहार होते हैं, वे पालकी को कभी इस कंधे पर, तो कभी उस कंधे पर लेकर ढोते हैं, ताकि एक ही कंधे पर जोर न पड़े और दोनों कंधे दुखने से भी बचे रहें। लेकिन वैयाकरण को इसका क्या पता? वह तो एक ही कंधे पर पालकी ढोता रहा। जल्दी ही उसका कंधा दुखने लगा। काफी देर से यह स्थिति देख रहे राजा भोज से कहे बिना नहीं रहा गया - ‘भारं वहसि दुर्बुद्धे, तव स्कंधं न बाधति?’ अर्थात्, ओ मूर्ख, तुम जो (एक ही कंधे पर) भार ढोये चले जा रहे हो, क्या इससे तुम्हारा कंधा नहीं दुखता है? इस पर वैयाकरण ने तपाक से कहा- ‘न तथा बाधते राजन यथा बाधति बाधते’ अर्थात्, हे राजन, इससे मुझे उतना कष्ट नहीं हो रहा, जितना आपके ‘बाधति’ कहने से हो रहा है।

वस्तुतः, राजा को शुद्ध संस्कृत बोलते हुए ‘तव स्कंधं न बाधते?’ पूछना चाहिए था, उसके ‘बाधति’ के प्रयोग ने वैयाकरण को पालकी ढोने से भी ज्यादा कष्ट दे दिया। नामवर जी की भी दशा उसी वैयाकरण की हो जाती है, जब कोई व्यक्ति उनके समक्ष ‘शारीरिकभाष्य’ एवं ‘सौन्दरानन्द’ जैसे शब्दों का उच्चारण करता है। नामवर जी वैसे तो कक्षा बी.ए. के एक छात्र से भी एक अच्छे श्रोता की तरह ज्ञान लेने के लिए तैयार रहते हैं, उससे प्यार से उसकी रुचियों के विषय में बात करेंगे, उसकी बताई हुई नयी बात को तुरंत सराहने में तथा उसी से कागज़ का टुकड़ा और पेन माँग कर उस पर नोट्स लेने में भी कोई संकोच नहीं करेंगे। लेकिन एक शर्त है कि भाषा के साथ कोई छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करेंगे, चाहे वह हिन्दी हो या अंग्रेजी।

नामवर बाबू जी का बनारस के उस प्रवास ने मुझे उनके करीब तो ला दिया, लेकिन सभी जानते हैं कि नामवर जी के आसपास या उनकी उपस्थिति मात्र से एक ऐसा आभामंडल व्याप्त रहता है, जो बिना पूछे ही सबको चेताता रहता है कि तमाम नजदीकी के बावजूद भी आप नामवर जी से कितनी लिबर्टी ले सकते हैं, कितनी नहीं। वही दशा आज तक मेरे पिताश्री की नामवर बाबू जी के सामने है, तो फिर मेरी तो औकात ही क्या। हम भाई-बहन मज़ाक में कहते हैं कि नामवर बाबू जी का व्यक्तित्व बालि की तरह है, आदमी कुछ भी सोच कर सामने गया हो, नामवर जी के सामने पड़ते ही शक्ति आधी हो जाती है और जबान मुँह में आधी अटकी हुई।

एक बार हमारे बनारस के घर में शाम की पीने की महफ़िल जमी हुई थी। उपस्थित विशिष्ट व्यक्ति थे: नामवर सिंह, नगेन्द्र प्रसाद सिंह, केदारनाथ सिंह, बच्चन सिंह और काशीनाथ सिंह। ऐसी महफ़िलों में मैं साकी की भूमिका में हुआ करता था। नामवर बाबू जी और काशीनाथ जी अत्यंत संतुलित ढंग से पी रहे थे और बाकी क्षत्रिय-त्रय अपने पूरे जोश में। केदारनाथ बाबू जी और बच्चन बाबू जी तो कुछ इस तरह कि अन्त में एक जन को मैंने और एक जन को पापा ने पकड़ कर निराला निवेश (प्रोफेसर बच्चन सिंह जी के घर) पहुंचाया। दिन में कोई उत्साहजनक आयोजन हुआ था और मैंने केदारनाथ बाबू जी से पूछा था, ‘बाबू जी, कैसा रहा आज का आयोजन?’

‘बेटा, अच्छा रहा। अच्छा होना ही था क्योंकि नामवर जी तो अच्छा बोलने को अभिशप्त हैं।’

मैंने इस सुन्दर अभिव्यक्ति को सुन कर ठहाका लगाया।

मैं भोजन की समाप्ति के बाद टेबिल पर आम ले कर आया। बच्चन बाबू जी ने हाथ में आम को उठाया और कहा, ‘आम मीठा है।’

झक्खड़ बाबा अपने रौ में आ गए, ‘हद है, पता नहीं कब साहित्यकारों को चीजों को ठीक से देखना आएगा। आम दरअसल सांवला है।’

अपने चिरपरिचित अंदाज में बच्चन बाबू ने ठहाका लगाया, ‘हें...हें...हें...हें....वकील साहब, आम मीठा है।’

‘अरे, क्या तमाशा करते हैं आप, ‘आम सांवला है।’

आम बेचारा इंतज़ार कर रहा है कि मामला निपटे तो वह लोगों के मुँह में पहुँचे। शेष तीन लोग भी आम को हाथ लगाने में हिचक रहे हैं कि अब तय हो ही जाए कि आम है क्या?

अन्दर से माँ और अन्य सब भी इकठ्ठा हो गए, सभी हंसते-हंसते लोटपोट हुए जा रहे हैं कि इस बहस में कौन सी तर्कप्रणाली काम कर रही है? मीठे और सांवले का क्या संघर्ष? लेकिन बहस थमने का नाम ही नहीं ले रही है। बीच में समधियाना धर्म निभाते हुए केदारनाथ बाबू जी ने बच्चन बाबू जी का पक्ष लेने की कोशिश की, तो शिव भक्त झक्खड़ बाबा उनकी इस लौकिक दृष्टि पर उग्र हो गए, ‘क्या बाऊ साहब, कैसे कवि हैं आप? आप को भी सही दृष्टि नहीं उत्पन्न हो सकी?’ बाऊ साहब भी अब शांत। पापा मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे हैं लेकिन बर्रे के छत्ते में हाथ नहीं धर रहे हैं।

आधे घंटे तक कोई भी घुटने टेकने के लिए नहीं तैयार।

नामवर बाबू जी को मैंने इस किस्म की बाल क्रीड़ाओं को न कभी करते देखा, न उनमें पड़ते देखा। ऐसे मौकों का ही उपयोग करते हैं वे घर के सदस्यों से मिलने और बातचीत करने के लिए। वे हम लोगों के साथ घरेलू बातों में मशगूल हो गए। पापा को मेजबान और मुझे साकी होने के चलते कोई विकल्प नहीं था। हद होते देख कर मैंने कातर भाव से नामवर बाबू जी की ओर देखा। अगले ही क्षण उन्होंने चश्मे के ऊपर से दोनों लोगों की आँखों में झाँका और कहा, ‘ठीक है भई, आम सांवला हो या मीठा हो, भोज्य तो है न। तो क्यों जनता को उसके गुणों की सज़ा दे रहे हैं। चलिए, आप सभी लोग आम का स्वाद लीजिये और खुद को बादशाह शाहजहाँ समझिये।’

झक्खड़ बाबा की कमजोरी नामवर बाबू जी थे। किसी भी हस्ती या हस्तियों के सामने जब झक्खड़ बाबा ललकारना शुरू करते थे, तो ‘नमवर’ के चश्मे के ऊपर से आँख चमकाने के बाद ही शांत पड़ते थे। विवाद शांत हो गया। हम लोगों ने सभी को यथास्थान पहुंचाने के बाद चैन की साँस ली।

बनारस में बीमारी के इलाज के सिलसिले में साथ रहने के बाद नामवर जी मुझे नामवर बाबू जी की तरह लगने लगे, और आगे से जब भी बनारस आते रहे, मेरा उनके साथ धर्म-दर्शन संवाद करना और बी.एच.यू की सेंट्रल लाइब्रेरी जाना तय रहता। बी.एच.यू. की सेंट्रल लाइब्रेरी का समूचा स्टाफ उनसे परिचित है और आज भी उनकी बाट जोहता है। मैंने कभी उन्हें बी.एच.यू. लाइब्रेरी के हिन्दी साहित्य सेक्शन में जाते नहीं देखा, शायद इसलिए कि उनके दिल्ली के घर और बनारस के घर के संग्रह से उनकी हिन्दी पुस्तकों की आवश्यकता पूरी हो जाती थी। उनके अध्ययन क्षेत्र से कुछ भी अछूता नहीं रहता। अंग्रेजी, संस्कृत, पालि या अन्य वैश्विक साहित्य, भारतीय दर्शन, पाश्चात्य दर्शन, इतिहास, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र और कभी-कभी विज्ञान एवं कृषि विज्ञान भी, वह कब किस विषय के स्टैक में प्रविष्ट हो कर क्या पढ़ने लगेंगे, कोई अनुमान नहीं लगा सकता है। जिन्होंने उन्हें लाइब्रेरी में देखा है, वह जानते हैं कि वह प्रेमिका से मिलन से उल्लसित एक प्रेमी की तरह वह पुस्तकों के बीच आनन्दित होते हैं, उनके और उनकी प्रेमिका के बीच किसी की भी, चाहे वह कोई भी हो, उपस्थिति उन्हें स्वीकार्य नहीं है। वह किताबों में डूबते हैं, उनसे बातें करते हैं, उन्हें प्यार से सहलाते हैं, उन पर पड़ी धूल ऐसे पोंछते हैं जैसे कि प्रेमी प्रेमिका के घाव पर मरहम लगा रहा हो, उनके बिखरे हुए पृष्ठों को इस तरह तह लगाते हैं, जैसे कि प्रेमी प्रेमिका के बिखरे हुए बालों को करीने से सजाता है। उनके सामने पुस्तकों के पृष्ठ मोड़ने या उन पर पेन से निशान लगाने की कोशिश उनकी आँखों के सामने उनकी प्रेमिका से छेड़छाड़ का प्रयास करना है, जिसे देख कर वह चश्मे के ऊपर से आपको यूँ घूर कर ‘हूँ..’ की हुंकार लगायेंगे कि आप वहीँ का वहीँ शर्म से गड़ जायेंगे।

मैंने एक बार ऐसी हिमाकत की थी। वे मेरे बी. एच.यू लायब्रेरी कार्ड पर पुस्तकें इशू करा कर ले जाते थे, और महीने-दो महीने में किसी के हाथ या स्वयं उनके ही हाथों पुस्तकें वापस आतीं थीं। एक बार मैं दिल्ली गया हुआ था तो घर पुस्तक लेने गया। बड़े प्यार से अपनी बाहों में समेटे कोई छः पुस्तक लिए वे ड्राइंग रूम में लौटे। साथ में उनके हाथों में रबर (इरेज़र) का एक टुकड़ा। मुझे कहीं जाने की जल्दी थी तो मैंने पुस्तकें लेने के लिए हाथ बढ़ाया। मुस्कुराते हुए उन्होंने मुझे बैठने के लिए इशारा करते हुए कहा, ‘रुक जाएँ भंते, ऐसे नहीं दूँगा।’ उसके बाद उन्होंने पहली पुस्तक खोली, पता नहीं कैसे बिना पृष्ठ मोड़े उन्हें अनुमान था कि कहाँ किस पृष्ठ पर उन्हें पठनीय अथवा संग्रहणीय सामग्री मिली थी, मैंने देखा कि उन्होंने पृष्ठ पर काम की जगह पर पेंसिल से अत्यंत हल्का सा, लगभग न दिखने वाला, संकेत चिह्न लगाया हुआ है, और पृष्ठ दर पृष्ठ उसे भी वे इरेज़र से मिटा रहे हैं। मैंने सोचा कि इस तरह से तो छः पुस्तकों में निशान मिटाने में बहुत समय लगेगा, मेरे मुँह से अनायास निकला, ‘बाबू जी, छोड़ दीजिये, किताब में उतने निशान से क्या हो जाएगा। ‘उन्होंने चश्मे के ऊपर से बड़ी-बड़ी आँखें कर मुझे घूरा, मानो मैंने उन्हें किसी भारी पाप का मशविरा दे दिया हो। बस, उतनी सीख काफी थी मुझे जीवन भर के लिए। वो दिन और आज का दिन, मैंने भी पुस्तक में पृष्ठ मोड़ने और पेन से निशान लगाने से तौबा कर ली।

एक ही पुस्तक को हज़ार लोग पढ़ें, खूब पढ़ें, बार-बार पढ़ें और उस पाठ के आधार पर अपनी समझ बना कर निश्चिन्त रहें। नामवर जी आपके नजदीक आयेंगे, आपकी उस बार-बार पढ़ी हुई पुस्तक को एक शाम को कुछ घंटों के लिए अपने पास ले जायेंगे। और जब अगले दिन वे उस पुस्तक पर आपसे संवाद करेंगे तो आप को अपनी समझी हुई सारी अवधारणाएँ कटघरे में खड़ी नज़र आएँगी, बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन की तरह वे आपके सारे बुद्धि-विकल्पों के मजबूती से स्थापित दीवारों को ध्वस्त करते नज़र आयेंगे। आपको अपनी बनी-बनायी पूर्वधारणाओं का ध्वस्त होना अच्छा तो नहीं लगेगा, लेकिन उसी के साथ-साथ आप चमत्कृत भी होते जायेंगे कि जिस ग्रन्थ को आप वर्षों से गुन रहे थे और एक विश्वासप्रद समझ तक पहुँच गए हैं, नामवर जी कुछ ही घंटों में कैसे उसी ग्रन्थ के उस परिप्रेक्ष्य तक पहुँच गए जिस पर आज तक किसी का ध्यान तक नहीं गया था, नामवर जी आप को फिर से उसी ग्रन्थ को एक नयी दृष्टि से पढने के लिए बाध्य कर देंगे, और यही बात नामवर जी को नामवर सिंह बनाती है। उनकी तरह 90 वर्ष की उम्र में भी रोज़ 10-12 घंटे पढने वाले तो शायद होते हों या आगे चल कर मिल भी जाएँ, लेकिन उनके जैसा ‘ज़ेन गुरु’ मिलना दुर्लभ है, जो आपको शॉक-ट्रीटमेंट दे कर आपकी पूरी दृष्टि ही सही ट्रैक पर ला कर खड़ा कर देता है। अब दौड़िए उस नए ट्रैक पर नए सिरे से, शुरू में खराब तो लगेगा लेकिन जब मंजिल मिलेगी तब उस गुरु का योगदान समझ आएगा और फिर लगेगा कि ऐसा गुरु जीवन में दस-बीस साल पहले क्यों नहीं मिला।

नामवर जी ने बनारस में मौत के लगभग मुँह से वापस लौट आने का अपना अनुभव अपने एक संस्मरण में विस्तार से लिखा है, इसलिए बीमारी और चिकित्सा से जुड़ी बातों की विशेष चर्चा की यहाँ जरूरत नहीं। लब्बोलुआब यह कि भारी कष्ट और संघर्षों के बाद वह स्वस्थ हो गए, लेकिन उस एक महीने में मैं उनके कुछ समीप आ गया था।

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अभी हाल ही (जून, 2017) में यूरोप के शेंगेन वीजा के सिलसिले में मेरा दिल्ली जाना हुआ। बाबू जी को साक्षात् देखे मुद्दत हो गयी थी। सुना था कि शरीर कमज़ोर हो गया है, यात्रा वगैरह करने से डॉक्टर ने मना कर रखा है। अब शेर को दहाड़ने से पाबंदी लगायेंगे तो वह और कमजोर हो ही जाएगा, यह बात दिल्ली के डॉक्टरों को क्या समझ में आने वाली है। दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग में पोस्ट-डॉक्टोरल कर रहे अपने शिष्य रवि शंकर को मैंने साथ में लिया और समीक्षा दीदी से फ़ोन पर बात कर योजना बनाई कि अचानक बाबू जी को घर पर पहुँच कर चौकाऊंगा। शिवालिक अपार्टमेंट पहुँच घंटी बजाया तो घर में अकेले रह रहे बाबू जी ने दरवाजा खोला। वर्षों बाद मिले भतीजे को पहचानने में उन्हें कुछ क्षण लगे, लेकिन जब पहचाना तो उनके काँपते हुए ठन्डे-ठन्डे दोनों हाथों ने मेरे हाथों को अपने भीतर समेट लिया और मुझे गले लगा लिया। डबडबायी आँखों से सिर्फ एक ही पंक्ति बार-बार, ‘अरे, मेरा मंटू (मेरा घर का नाम) आ गया, अरे, मेरा मंटू आ गया।’ मैंने अपने मन को जकड़ कर रखा हुआ है, लेकिन आँखें नियंत्रण के बाहर हैं, आंसू अनचाहे ही टप-टप कर बाहर आ रहे हैं और उनका मेरे हाथों को निरन्तर सहलाना मेरे दिल को अनिर्वचनीय सुकून दे रहा है। समीक्षा दीदी ने जलपान के इंतजाम के बहाने हम दोनों को इस मिलन के लिए छोड़ दिया है, या फिर शायद रोने से बचने के लिए। रवि शंकर की आँखें भी नम हो चलीं थीं। मेरा बार-बार उनसे कहने को जी कर रहा है कि, ‘बाबू जी! क्यों इतना समय लगा दिया अपने बच्चों को गले लगाने में? हम सब ने तो हिन्दी विषय तक इस भय से छोड़ रखा था कि हमारी किसी भी सफलता पर उसकी तोहमत आपके या पापा के माथे पर न फोड़ दी जाए। थोड़ा सा प्यार, सिर पर आपके इन्हीं निर्मल हाथों का हल्का सा स्पर्श और आपकी कभी-कभी मीठी सी डांट ही की तो आस रही जीवन भर हम सब को, क्या वह भी आपकी पढ़ाई में बाधक बन गयी होती? आपका ऐसा वात्सल्यपूर्ण रूप हमें वर्षों पहले से मिला होता तो शायद हम सब साहित्यकार नामवर सिंह के साथ-साथ अपने नामवर बाबू जी को भी और बेहतर जान पाते।

लेकिन अभी भी क्या देर है, आपको तो शतायु होना ही है और आप ही के परम मित्र झक्खड़ बाबा उर्फ़ वकील बाबू जी कहते थे कि ‘होना’ बहुत महत्त्वपूर्ण है। आप हमारी छत्रछाया बन कर बस रहिये और चलिए, जीवन की नयी पारी को बच्चों की तरह बिता कर देखिए। तब उम्र के सौ साल क्या एक सौ बीस साल भी कम लगेंगे।”

सिद्धार्थ सिंह,
प्रोफेसर, पालि एवं बौद्ध अध्ययन विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू), वाराणसी

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव 

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