‘अंधकारा’ नहीं, ‘अंध कारा’ / कमलेश वर्मा एवं सुचिता वर्मा

‘अंधकारा’ नहीं, ‘अंध कारा’
- कमलेश वर्मा एवं सुचिता वर्मा

निराला की प्रसिद्ध कविता है ‘गहन है यह अंध कारा’। इसका प्रकाशन 1942 (‘देशदूत’, साप्ताहिक, प्रयाग, 13 दिसम्बर, 1942) में हुआ था। अगले साल 1943 में युग मंदिर, उन्नाव से प्रकाशित निराला के काव्य-संग्रह ‘अणिमा’ में यह संकलित हुई। धीरे-धीरे यह पंक्ति प्रसिद्ध होती गयी और न जाने कब और किसकी लापरवाही से इस पंक्ति में एक सूक्ष्म परिवर्तन आ गया और लगातार बना रहा। आज भी यह चल रहा है। ‘अंध कारा’ को जोड़कर ‘अंधकारा’ कर दिया गया। ‘निराला रचनावली’ का पहला संस्करण 1992 में आया और दूसरा संस्करण 1998 में। मेरे पास दूसरा संस्करण है। उसमें ‘अंध कारा’ है। 2023 में विवेक निराला द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘निराला : प्रतिनिधि कविताएँ’ का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से हुआ। इसमें भी ‘अंध कारा’ है। यही सही प्रयोग है।

चंद्रकांत देवताले के संग्रह ‘जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा’ में ‘गहन है यह अंधकारा’ शीर्षक से एक कविता है। इस कविता में महाकवि निराला को याद करते हुए यह पंक्ति लिखी गयी है और इसमें ‘अंधकारा’ शब्द का प्रयोग किया गया है। अमित श्रीवास्तव का एक उपन्यास है ‘गहन है यह अंधकारा’। संजय कुंदन के संपादन में वाम प्रकाशन, दिल्ली से 75 कविताओं का एक संकलन आया – ‘गहन है यह अंधकारा : 21वीं सदी 25 साल 75 कविताएँ’। यहाँ भी ‘अंधकारा’ है।

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‘अंध कारा’ का अर्थ है अँधेरा कारागार। ‘अंधकारा’ शब्द का क्या अर्थ हो सकता है? जिन लोगों ने ‘अंधकारा’ शब्द का प्रयोग किया है उन्होंने इसका अर्थ अंधकार लगाया है। उनकी पृष्ठभूमि में निराला की यह पंक्ति ही रही है। मानो यह पंक्ति एक मुहावरा बन गयी है। सवाल यह है कि हिन्दी में ‘अंधकारा’ शब्द का कोई अर्थ हो सकता है या नहीं? मेरी अब तक की जानकारी में यह शब्द हिन्दी में कोई अर्थ नहीं रखता है।

निराला के इस प्रयोग में ‘कारा’ शब्द महत्त्वपूर्ण है। उत्तर पद के रूप में इसके चार अन्य प्रयोग भी उनकी कविताओं में मिलते हैं, जैसे – ‘गगन-कारा’, ‘ज्योति:कारा’, ‘अंधकार कारा’, और ‘चिर-कारा’। कुछ प्रयोग ‘कारा’ शब्द से बने हुए शब्दों के हैं, जैसे – ‘कारागार’, ‘काराएँ’, ‘कारावरण’। इन सभी प्रयोगों में कारागार या जेल का अर्थ बना हुआ है। इनमें कहीं भी ‘कारा’ का अर्थ ‘अंधकार’ से नहीं जुड़ता है। इन प्रयोगों को विस्तार से समझना जरूरी है।

‘अंध कारा’ के विपरीत ‘ज्योतिःकारा’ का यह प्रयोग देखिए,

‘मैं सोया पथ पर खिन्नमना
मुद गयी दृष्टि ज्योति:कारा’

यह पंक्ति ‘गीतिका’ में संकलित ‘कितने बार पुकारा’ गीत की है। यहाँ ‘कितनी बार पुकारा’ नहीं है। ‘गीतिका’ के परिशिष्ट में ‘ज्योतिःकारा’ शब्द का अर्थ दिया गया है – ‘प्रकाश की जो क़ैद थी’। ‘अंध कारा’ में अँधेरे का कारागार है और ‘ज्योतिःकारा’ में प्रकाश का कारागार है। ‘कारा’ का अर्थ लिया गया है ‘कारागार’।

‘अंध कारा’ जैसा अर्थ भरा है ‘अंधकार कारा’ में,
‘अंधकार कारा यह, बन्दी हुए मुक्तिधन,
भरने को प्रकाश करने को जनमन चेतन;’

लखनऊ से प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका ‘माधुरी’ के दिसम्बर, 1940 के अंक में निराला की कविता ‘आदरणीय प्रसादजी के प्रति’ छपी थी। बाद में यह कविता ‘अणिमा’ में संकलित हुई। जयशंकर प्रसाद की मृत्यु 15 नवम्बर, 1937 को हुई थी। संभवतः उनकी पुण्य-तिथि पर 1940 में यह कविता लिखी गयी हो। निराला प्रसाद को भाव-विह्वल होकर याद कर रहे हैं कि तुम हिन्दी के जीवन हो। दूर गगन के ज्योतिर्मय तारा की तरह तुम द्रुतगति से धरती पर उतर आये। यह धरती ‘अंधकार कारा’ है। तुम स्वयं मुक्ति की समृद्ध भावना से भरे हुए थे, मगर तुमने धरती के बंदी जीवन को स्वीकार किया ताकि जनमन के भीतर प्रकाश भरकर चेतना उत्पन्न की जा सके। यहाँ भी ‘कारा’ शब्द का अर्थ कारागार या बंदीगृह है।

धरती ‘अंधकार कारा’ है तो गगन को भी मुक्त मत समझिए। उसकी भी तो कोई परिधि होगी। वह परिधि निश्चय ही ‘गगन-कारा’ है। ‘गीतिका’ का प्रसिद्ध गीत है ‘बुझे तृष्णाशा-विषानल झरे’। प्रयाग (उस दौर में ‘प्रयाग’ शब्द का प्रयोग किया गया है।) से निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ के जनवरी, 1936 अंक में यह कविता प्रकाशित हुई थी।

‘बढ़े वह परिचय बिंधा जो क्षुद्र भावों से हमारा,
क्षिति-सलिल से उठ अनिल बन देख लें हम गगन-कारा’

इस कविता में कामना की गयी है कि तृष्णापूर्ण आशा और विषैली जलन बुझ जाए। हमारी भाषा में अमृत का निर्झर झरे। आगे कहा गया है कि क्षुद्र भावों से ग्रस्त होकर हम परस्पर अपरिचित हो जाते हैं। कामना की गयी है कि हम उच्च और उदार भावों को अपनाकर परस्पर परिचय बढाएँ! रामचंद्र शुक्ल की बात याद आती है कि परिचय के बिना प्रेम कैसा? परिचय बढ़ेगा तो प्रेम के बढ़ने के ठोस आधार बनेंगे। स्थल और जल की सीमा से उठकर वायु की तरह उड़ें और गगन के विस्तार को ही नहीं उसके अंतिम छोर को भी देख लें। गगन की वह परिधि मानो ‘गगन-कारा’ है। ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि ‘गगन’ हमेशा मुक्ति या अनंत का प्रतीक है। कवियों ने उसे दूसरे ढंग से भी देखा है। निराला के लिए गगन से बना हुआ कारागार है तो मीर के लिए आकाश किसी दिलजले की कब्र है। मीर की प्रसिद्ध ग़ज़ल ‘देख तो दिल कि जाँ से उठता है/ये धुआँ सा कहाँ से उठता है’ का एक शे’र है,

‘गोर किस दिलजले की है ये फ़लक
शोला इक सुब्ह याँ से उठता है’

यह फ़लक (आकाश) किस दिलजले की गोर (कब्र) है? इस गोर से हर सुबह एक शोला उठता है। यह सूर्योदय का दृश्य है।

इस तरह निराला चित्र खींचते हैं कि यह धरती ‘अंधकार कारा’ है और आकाश ‘गगन-कारा’। ‘अंध कारा’ और ‘ज्योतिःकारा’ की विपरीत स्थिति भी उनकी कविताओं में हम देख चुके। इन सबसे ज्यादा खतरनाक है मन की कारा। निराला मन की कारा को ‘चिर-कारा’ कहते हैं। यह कारा हमेशा बनी रहनेवाली कारा है,

‘सहन-शीत-सित यौवन अविचल,
मानव के मन की चिर-कारा।’

‘निराला रचनावली’ के अनुसार 24 नवम्बर, 1954 को निराला ने ‘रूपक के रथ रूप तुम्हारा’ कविता लिखी थी। यह कविता ‘गीत-गुंज’ (1954) में संगृहीत है। उत्तर पद के रूप में ‘कारा’ शब्द का यह अंतिम प्रयोग निराला-काव्य में मिलता है। पहला प्रयोग जनवरी, 1936 का है और अंतिम प्रयोग नवम्बर, 1954 का।

निराला ‘कारा’ शब्द से बने हुए कुछ शब्दों का प्रयोग करते हैं – कारागार, काराएँ, कारावरण। इन शब्दों के अर्थ में कोई विशेष या नयी बात नहीं है। इनके अर्थ भी स्पष्ट हैं,


‘पावस की प्रगल्भ धारा में/कुञ्जों का वह कारागार,’ : 1/125 यमुना के प्रति/परिमल
‘तोड़ गहन प्रस्तर की काराएँ’ : 1/354 सेवा-प्रारम्भ/अनामिका
‘देश दश दिशावधि/कटे कारावरण’ : 2/217 वन्दना/असंकलित कविताएँ
‘छूटा ध्वच्छ कारागार’ : 2/487 तुम्हारे आसरे, हारे हुए/सान्ध्य-काकली

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‘अंध कारा’ के ‘कारा’ शब्द की स्थिति हमने देख ली। अब ‘अंध’ शब्द के प्रयोग को देखना चाहिए। निराला ने ‘अंध’ और इससे बने सामासिक शब्दों के प्रयोग शुरू से आखिर तक किये थे। उनके प्रयोगों में सीधे-सीधे भी ‘अंध’ शब्द आता है। जिसका अर्थ अंधा या दृष्टि-वंचित, जैसे –

‘गन्ध की निरुपमित ढेरी/दिग्दिगन्तों अंध करती’ : 2/408 मुस्कुरा दीं रातरानी/असंकलित कविताएँ
‘हुताशन विश्व के शब्द-रस-रूप-गन्ध/दीपक-पतंग-से अंध थे आ रहे’ : 1/173 रेखा ‘क’/अनामिका

ज्यादा प्रयोग सामासिक पद के रूप में मिलते हैं। निराला की प्रसिद्ध कविता ‘वर दे, वीणावादिनी वरदे!’ की पंक्ति है – ‘काट अंध-उर के बन्धन-स्तर/बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;’। ‘अंध-उर’ का अर्थ हुआ अंधकार (अज्ञान) से भरा हुआ हृदय। यहाँ ‘अंध’ शब्द लाक्षणिक ढंग से काम कर रहा है। प्रसंगवश यह बात उल्लेखनीय है कि पहली पंक्ति में आया हुआ ‘वर दे’ तथा ‘वरदे’ शब्द अलग-अलग अर्थ रखता है। ‘वर दे’ का अर्थ हुआ वर दो। ‘वरदे’ शब्द ‘वरदा’ (वर देने वाली देवी) का संबोधन-रूप है। ज्यादातर जगहों पर इन दोनों को ‘वर दे’ लिख दिया जाता है। यही समझा जाता है कि सरस्वती वंदना में बार-बार वर माँगा जा रहा है। ‘अंध-उर’ के बीच में एक शब्द जोड़कर निराला ने बनाया ‘अंध-वारिद-उर’। अर्थ हुआ बादलों के अँधेरे हृदय में। बादल घने और काले होते हैं। उसके गहरे घने हृदय में दिनकर की रश्मि जैसे छिप जाती है वैसे ही प्रिया की स्मृति बसी हुई है,

‘रश्मि से दिनकर की सुन्दर/अंध-वारिद-उर में तुम आप’ : 1/143 स्मृति/परिमल
‘अंध-उर’ की तरह का अर्थ रखनेवाला शब्द है ‘अंध अन्तर’। अँधेरे हृदय में प्रथम प्रभात का प्रकाश भर गया,
‘हृदय के सब सुप्त दल खुल गये,/अंध अन्तर में वह प्रथम प्रभात आया।’ : 1/179 रेखा ‘ग’/असंकलित

‘अंध-उर’, ‘अंध-वारिद-उर’ और ‘अंध अन्तर’ का कोई दूसरा प्रयोग संभवतः निराला की कविताओं में नहीं मिलता है। निराला समस्त पद बनाते हैं और दुहराते नहीं!

‘अंध’ और ‘तम’ को मिलाकर निराला कई समस्त पद बनाते हैं, जैसे – ‘अंध-तम जाल’, ‘अंध-तम-निशि’, ‘अंध-तम-कूप’, अंध-चपल’, ‘अंध-तम-अगम-अनर्गल’। ‘अंध-तम’ का अर्थ हुआ ऐसा अँधेरा जहाँ कुछ दिखायी न पड़े, खूब घना अँधेरा। एक प्रयोग देखें कि जीवन की गति कुटिल है। वह गहरे अँधेरे जाल की तरह है,

‘जीवन की गति कुटिल अंध-तम जाल;
फँस जाता हूँ, तुम्हें नहीं पाता हूँ प्रिय,
आता हूँ पीछे डाल –’ (1/188 विस्मृत-भोर/परिमल)

इसी तरह की निराशा का भाव ‘हताशा’ कविता में मिलता है। इसकी पंक्तियाँ बार-बार उद्धृत भी की जाती रही हैं। निराला के व्यक्तित्व को बताने के क्रम में इन पंक्तियों को याद किया जाता रहा है। इसमें समस्त पद है ‘अंध-तम-निशि’। हताशा-निराशा में विपरीत बातें करना स्वाभाविक है। जीवन की विषम परिस्थितियों के कारण मेरा अंतर्मन वज्र की तरह कठोर हो गया है। इसे तुम जी भरकर झकझोर-झकझोर कर सताते रहो! मेरे दुखों की रात असूझ गहरे अँधेरों (गहन अंध-तम-निशि) से भरी हुई है। इस रात की कभी भोर न हो!

‘मेरा अन्तर वज्रकठोर,
देना जी भरकर झकझोर,
मेरे दुःख की गहन अंध-
तम-निशि न कभी हो भोर,’ (1/181 हताश/अनामिका)

‘गीतिका’ की चर्चित कविता है, ‘पास ही रे, हीरे की खान/ढूँढ़ता कहाँ और नादान’। यहाँ ‘ही रे’ और ‘हीरे’ के भिन्न अर्थ पर आसानी से ध्यान चला जाता है (‘वर दे’ और ‘वरदे’ वाली भूल इसके साथ घटित नहीं हुई है।)। इसी कविता ‘अंध-तम’ के साथ ‘कूप’ को जोड़ा गया है। सत्य का रूप कहीं नहीं मिल पाता। पूरा संसार असूझ अंधकार से भरे कुएँ की तरह है,

‘कहीं भी नहीं सत्य का रूप,
अखिल जग एक अंध-तम-कूप,’
(1/215 पास ही रे, हीरे की खान/गीतिका)

निशा का स्पर्श शीतल है। उस स्पर्श से हर्ष हो रहा है और व्यग्रता बढ़ रही है। रात के सुन्दर प्रभाव का रूपकात्मक चित्र खींचते हुए निराला नीचे की पंक्तियों तक पहुँचते हैं कि वायु व्याकुल हो रही है। उपवन की सुगंध मानो बालों की खुशबू है। उस खुशबू से मदहोशी भरी चंचलता उत्पन्न हो रही है। मदहोशी भरी चंचलता में सही-गलत की सूझ खत्म हो गयी है। इस भाव को ‘अंध-चपल’ पद में पिरोया गया है,

‘वायु व्याकुल कर रही है चयन
अलक-उपवन-गन्ध अंध-चपल।’ (2/112 निशा का यह स्पर्श शीतल/अणिमा)

अंत में ‘अंध’ से बने एक और प्रयोग को देखिए – ‘अंध-तम-अगम-अनर्गल’। ‘बादल राग-2’ के इस समस्त पद को निराला ने चार शब्दों के सहारे बनाया है। इसका अर्थ लगाते समय अपनी तरफ से कुछ जोड़कर समझना होता है। बादल अभेद्य अंधकार से बने हैं (अंध-तम)। वहाँ किसी का गमन संभव नहीं है (अगम)। बादलों पर किसी की अर्गला (बंधन) काम नहीं करती है।

‘ऐ निर्बन्ध!/अंध-तम-अगम-अनर्गल – बादल!’ (1/129 बादल-राग-2/परिमल)

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‘अंध कारा’ को ‘अंधकारा’ बनाकर अंधकार का ही अर्थ लिया गया है, भले ही यह सब भूलवश हुआ। ‘अंधकार’ शब्द की स्थिति पर विचार करें तो हम पाते हैं कि निराला काव्य के प्रारंभ से लेकर अंत तक यह शब्द मिलता है। ‘तुम और मैं’ 1923 की कविता है और ‘रूपक के रथ रूप तुम्हारा’ 1954 की। नमूने के लिए यहाँ नौ कविताओं से काव्य-पंक्तियाँ रखी जा रही हैं,

‘तुम सुरा-पान-घन अंधकार/मैं हूँ मतवाली भ्रान्ति।’ : 1/49 तुम और मैं/परिमल
‘ध्वनिमय ज्यों अंधकार’ : 1/100 दिल्ली/अनामिका
उज्ज्वल! घन-वन-अंधकार के साथ/खेलते हो क्यों? क्या पाते हो?’ : 1/108 प्रपात के प्रति/परिमल
‘अंधकार – घन अंधकार ही/क्रीड़ा का आगार’ : 1/133 बादल-राग-4/परिमल
‘क्षणिक प्रवाह में बह गया अंधकार,’। 1/180 रेखा ‘ग’/असंकलित
‘है अमानिशा; उगलता गगन घन अंधकार; : 1/330 राम की शक्ति-पूजा/अनामिका
‘तारक-नयनों की अंधकार-कुन्तला रात’ : 2/45 आदरणीय प्रसादजी के प्रति/अणिमा
‘जड़ता तामस, संशय, भय, बाधा, अंधकार’ : 2/175 वही राह देखता हूँ... /बेला
‘अंधकार सुचि केश कुटिल ऋजु’ : 2/462 रूपक के रथ रूप तुम्हारा/गीत-गुंज

निराला शब्द-सृजन की अपार क्षमता से संपन्न थे। उन्होंने प्रसंग की विशिष्टता को सर्वोत्तम ढंग से अभिव्यक्त करने के लिए सामासिक पदों की रचना की। विशेषण और विशेष्य के संबंध का प्रयोग करते हुए नये ढंग का अर्थ सौंदर्य उत्पन्न किया। उन्होंने सामान्य कवियों की तरह कविता को नहीं देखा। प्रयोग की अपार इच्छा-शक्ति से संपन्न उनका उर्वर मस्तिष्क बहुत कुछ ऐसा रच गया है जहाँ काव्य-भाषा का जादू देखते बनता है।

नोट : निराला रचनावली (कुल 8 खंड), सम्पादक : नन्दकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली, 1998 (इस लेख में खंड संख्या 1 और 2 का उपयोग किया गया है)

कमलेश वर्मा
प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी, उ.प्र.

सुचिता वर्मा
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, के. प्र. मि. राजकीय महिला महाविद्यालय, औराई, भदोही, उ. प्र.

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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