'जंगल से आगे' में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन-दर्शन
- ज्योति
शोध सार : वर्तमान समय में आदिवासी समाज तथा संस्कृति साहित्यिक विमर्श के केंद्र में आ रहा है। इस विशिष्ट समाज को जानने-समझने का आधार उनका जीवन-दर्शन है, जिसके अनुसार उनकी मूल्य-मान्यताएं व विश्वास आदि आकार ग्रहण करते हैं। सीता रत्नमाला की अंग्रेजी में रचित और लन्दन से प्रकाशित आत्मकथा ‘बियोंड द जंगल’ आदिवासी दर्शन को समझने का सशक्त माध्यम है। यह आत्मकथा उस दौर की है जब हिंदी साहित्य के क्षेत्र में आदिवासी साहित्य व विमर्श का उद्भव नहीं हुआ था। इस आत्मकथा ने अपने विशिष्ट जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति के कारण सीता रत्नमाला को लन्दन में तो प्रतिष्ठा दिलाई, किन्तु आदिवासी अभिव्यक्ति होने के कारण भारत में यह आत्मकथा उपेक्षित रही। इस आत्मकथा में आदिवासी जीवन-दर्शन स्थान-स्थान पर नज़र आता है, जैसे आदिवासियों का प्रकृति से घनिष्ठ सम्बन्ध, उनका पशु-प्रेम तथा जीव-जगत के साथ सहजीवी, सहभागी व समता आधारित स्वभाव आदि।बीज शब्द : आदिवासी, जीवन-दर्शन, आत्मकथा, आत्म्संस्मरण, प्रकृति, आदिवासियत, सहभागी, सहयोगी
मूल आलेख : किसी भी परिस्थिति विशेष की पुनरावृत्ति पर जब मानवीय चिंतन एक दिशा की ओर अग्रसर होते हुए उसकी व्याख्या करने की चेष्टा करने लगता है, तब दर्शन जन्म लेता है। अन्य शब्दों में, “दर्शन की उत्पत्ति तब होती है जब विवेक, कल्पना-शक्ति का तथा बुद्धि कल्पना का स्थान ले लेती है जब व्याख्या के सिद्धांतों के रूप में अलौकिक माध्यमों का परित्याग कर दिया जाता है और अनुभव के तथ्यों को जाँच और व्याख्या का आधार बनाया जाता है।”[1] स्पष्ट है कि ‘दर्शन’ एक दीर्घकालिक चिंतन प्रक्रिया से गुजर कर जन्म लेता है। वातावरण, जलवायु तथा सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक विकास की विभिन्न अवस्थाएं भिन्न-भिन्न मानवीय समुदायों के विशिष्ट जीवन-दर्शन का निर्माण करती हैं। किसी भी अन्य समुदाय की भांति ही यह तथ्य आदिवासी समुदाय के लिए भी पूर्णतः सत्य है।
आदिवासी समाज तथा साहित्य पर चर्चा शुरू होते ही दृष्टि उनके जीवन-दर्शन की ओर चली जाती है जो प्रकृति को केंद्र में रखते हुए उसके चारों ओर अपना जीवन बुनती है। आदिवासी रचनाकारों के अनुसार, “आदिवासी दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अन्य संस्थागत धर्म की तरह यह मानव केंद्रित या ईश्वर केंद्रित नहीं है। यह प्रकृति केंद्रित है। … आदिवासी दर्शन में प्रकृति अन्यत्व के भाव के साथ नहीं आती है, बल्कि मनुष्य समस्त जीव-जगत और समस्त वनस्पति-जगत के साथ-साथ प्रकृति से एकत्व / एकात्मकता अनुभव करता है।”[2]
आदिवासी जीवन के मूलभूत तत्वों को चिह्नित करने तथा उनके पूरे परिवेश को स्पष्टतः देखने-समझने का एक सशक्त माध्यम आत्मकथा है। आदिवासी जीवन के संदर्भ में आत्मकथा व्यक्ति विशेष के अनुभवों के माध्यम से उसकी संस्कृति, समाज तथा परंपराओं को वाणी देती है। हालांकि, आदिवासी रचनाकार अपने जीवन चरित को आत्मकथा के स्थान पर आत्म–संस्मरण की संज्ञा देते हैं। तेमसुला आओ ने अपने जीवन चरित ‘वन्स अपॉन ए लाइफ : बर्न्ट करी एंड ब्लडी रैग्स : ए मेमोयर’ की भूमिका में स्पष्ट लिखा है – “यह मूल रूप से आत्मकथा की बजाए एक संस्मरण है, क्योंकि गोर विडाल ने कहा है, एक व्यक्ति का अपने जीवन को याद करना संस्मरण है जबकि आत्मकथा वास्तव में इतिहास है, जिसमें दोबारा से शोध, तारीखों और तथ्यों को परखना होता है।”[3] चूंकि आदिवासी समुदायों में संचयन तथा दस्तावेजीकरण की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती, अतः तेमसुला आओ का यह कथन अन्य आदिवासी रचनाकारों की आत्मकथाओं पर भी समान रूप से लागू होता है।
आदिवासी लेखकों की कृतियों की संरचना तथा शिल्प उनके समाज व संस्कृति के अनुरूप होता है, जो गैर–आदिवासी साहित्यकारों की नज़रों में अनगढ़ तथा असंस्कृत होता है। अतः वे आदिवासी लेखकों की रचनाओं को साहित्य ही नहीं मानते और यदि उसे साहित्य माना भी जाता है तो उस पर चर्चा तथा उसके संरक्षण के प्रयास नहीं किए जाते। मुख्यधारा की इस उपेक्षा की शिकार इरुला समुदाय की सीता रत्नमाला की आत्मकथा ‘जंगल से आगे’ भी रही है जो संभवतः भारत में अंग्रेजी आदिवासी साहित्य की पहली आत्मकथा है। यह मूलतः ‘बियोंड द जंगल’ शीर्षक से सन् 1968 में ब्लैकवुड एंड संस, लन्दन से प्रकाशित हुई थी। इस आत्मकथा के कई पहलू हैं जो इसे विशिष्ट बनाते हैं। सर्वप्रथम तो इसके रचनाकार का एक महिला होना और उस महिला का एक आदिवासी होना इसे विशिष्ट बना देता है, क्योंकि सन् साठ के दशक में जब सीता रत्नमाला लिख रही थीं तब भारत के अधिकतर आदिवासी समुदायों में अपने अस्तित्व और अस्मिता के प्रति जागृति नहीं थी तथा वह स्वयं भी एक ऐसे आदिम आदिवासी समुदाय से आती थीं जो राजनीतिक, सामाजिक या शैक्षिक आदि रूप से सजग नहीं था। उनके पूरे समुदाय में वह पहली बालिका थी जो स्कूल गई थी। इसके अतिरिक्त यह वह दौर था जब भारतीय अंग्रेजी साहित्य में दो दर्जन साहित्यकार भी सक्रिय नहीं थे तथा जो थे, वे भी उच्च जातियों से संबंधित थे। इन परिस्थितियों में एक उपेक्षित आदिवासी साहित्य की महिला का न केवल अंग्रेजी में लिखना बल्कि लन्दन के एक अत्यंत प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह से प्रकाशित होना भारतीय अंग्रेजी साहित्य की एक अद्भुत विसंगति है। यह घटना एक अद्भुत विसंगति इन मायनों में भी है कि पहली स्त्री आदिवासी आत्मकथा होने के बावजूद भी यह भारत की मुख्यधारा के साहित्यकारों की चर्चाओं में पूर्णतः अनुपस्थित रही है।
पहली बार जब ‘बियोंड द जंगल’ प्रकाशित हुई थी तब एक आत्मकथा के रूप में यह अत्यंत चर्चित रही थी तथा विभिन्न अखबारों व पत्र–पत्रिकाओं में इसकी समीक्षा छपी थी। इस आत्मकथा के प्रसिद्ध होने का कारण इसकी लेखिका सीता रत्नमाला की जीवन दृष्टि है जो उनकी रचना को आत्मकथा के अर्थ व शैली से भिन्न व विशिष्ट बनाती है। ‘बियोंड द जंगल’ की इसी विशिष्टता को इंगित करते हुए कान्वाडकर ने लिखा है – “ ‘बियोंड द जंगल’ की संरचना जरा–सी भी पारंपरिक नहीं है। सामान्य तरीके से यह उनके जन्म, एक बच्चे और किशोर के रुप में उनका विकास, प्रेम, विवाह, पेशा इत्यादि के साथ शुरू नहीं होता है। जिस अवधि की कथा कही गई है वह बहुत सीमित है। यद्यपि इसमें उनके जन्म का एक अनौपचारिक संदर्भ है, परन्तु वास्तव में यह आत्मकथा उनकी मां की मृत्यु और जंगल की खाई में उनके साथ हुई दुर्घटना के साथ शुरू होती है।”[4]
सीता रत्नमाला की विशिष्ट जीवन दृष्टि का आधार आदिवासियत या आदिवासी जीवन-दर्शन है जिसने न सिर्फ उनके मानस को गढ़ने का कार्य किया था, बल्कि शहरी जीवन के निवास के बावजूद भी उनकी आदिवासी पहचान को बनाए रखा था। आदिवासियत पर आधारित उनकी यह जीवन दृष्टि ‘जंगल से आगे’ में विभिन्न स्थानों पर नज़र आती है। उदाहरणतः जब लेखिका पहली बार स्कूल जाती है और साथी लड़कियों के हाव–भाव तथा व्यवहार को अपने प्रतिकूल पाती है तब अकेलेपन, निराशा तथा अनिद्रा से घिरे उसके मन को एक सियार की आवाज़ सुकून पहुंचाती है यथा – “वहां की अजनबियत और एकाकीपन मुझे सोने नहीं दे रही थी। फिर, अंधेरे से बाहर, एक सियार ने पुकार (टेर) लगायी और दूर, बहुत दूर से किसी दूसरे से उसके उत्तर में आवाज़ दी। कभी न भूलने वाली वह टेर पहाड़ियों से टकरा कर घाटियों में प्रतिध्वनित होने लगी। यह वो आवाज़ थी जिसे मैं बचपन से जानती थी। मुझे जल्द ही एहसास हुआ, कोई तो मेरे साथ है। इस ख्याल ने आखिरकार मुझे सुकून दिया और मुझे तुरन्त नींद आ गयी।”[5] यह उदाहरण दर्शाता है कि आदिवासियों को सहज महसूस करने के लिए मात्र मनुष्यों के संसर्ग की ही आवश्यकता नहीं होती, बल्कि जंगल का प्रत्येक जीव–जंतु उनका साथी तथा सहयोगी होता है जिसकी आवाज तक उनके निराश मन को चैन पहुंचाने के लिए पर्याप्त है।
‘जंगल से आगे’ में लेखिका के अनुभवों द्वारा स्पष्ट होता है कि आदिवासी प्रकृति तथा पेड़–पौधों से अत्यधिक घनिष्ठता से जुड़े होते हैं। उनके लिए प्रत्येक पेड़ घर और जंगल की आत्मीयता से परिपूर्ण होता है, जिसके साथ वे आत्मीयता महसूस कर पाते हैं जैसे अपने स्कूल की शुरुआत में जब सीता वहां के परिवेश से अपने को भिन्न तथा निम्न मानने लगती है, उसे अपनी उम्र से काफी छोटी बच्चियों के साथ पढ़ना पड़ता है। यहाँ तक कि खेल की आधी छुट्टी के समय जब सब बच्चे खेल रहे होते हैं तब भी वह स्वयं को बिलकुल अकेला पाती है। ऐसे में नीलगिरी का एक पेड़ उसे अपनेपन का एहसास कराता है – “मैंने खेलते हुए बच्चों पर से अपनी नज़रें हटायी और दौड़कर जा पहुंची पेड़ के पास। पेड़ की छाल को छूते हुए मैंने ऊपर की ओर उसकी टहनियों और पत्तियों के ऊपर के चमकीले आसमान को देखा। फिर तने पर सिर टिकाया और हौले से आँखें बंद कर लीं। खेल का शोरगुल अब बहुत दूर चला गया था। मुझे मानसून की झड़ी सुनाई दे रही थी। पेड़ के ऊपरी पत्तों से आती हुई हवा की ध्वनि बिलकुल वैसी ही थी, जैसे जंगलों में पहाड़ से आने वाली हवाओं की होती है। पेड़ की छाल के स्पर्श ने मुझे घर के आरामदायक और जाने-पहचाने एहसास से भर दिया।”[6]
“आदिवासी दर्शन सहअस्तित्व, समता, सामूहिकता, सहजीविता, सहभागिता और सामंजस्य को अपना आधार मानते हुए रचाव और बचाव में यकीन करता है। इसलिए इसमें स्वानुभूति और सहानुभूति के स्थान पर सामूहिक अनुभूति का प्रबल संगीत सुना जा सकता है।”[7] सामूहिक अनुभूति का यह मूल्य सिर्फ मानव समुदाय को ही केंद्र में नहीं रखता, बल्कि मानवेतर जगत के साथ भी सामूहिकता के साथ जीने में विश्वास करता है। आत्मकथा में यह मूल्य उस स्थान पर प्रत्यक्ष रूप से नजर आता है जब लेखिका और उसके पिता रात के समय घर लौट रहे थे। वे रास्ते भर सिर्फ इसलिए चुपचाप आते हैं कि कहीं जानवर परेशान न हो जाएं. “घर लौटते हुए हमने ज्यादा बात नहीं की। अधिकांश रास्ते हम दोनों चुप ही रहे। क्योंकि अपनी बातों से हम रात के जंगली जीव-जंतुओं को परेशान नहीं करना चाहते थे।”[8]
यदि आदिवासी जीव-जंतुओं की सुविधा-असुविधा का खयाल रखते हैं तो जानवर भी आदिवासियों को परेशान नहीं करते। हालाँकि, हिंसक व नरभक्षी जीव इसके अपवाद हैं, परन्तु यह भी सत्य है कि अधिकतर जंगली जीव–जंतु मानव समुदाय पर तभी हमला करते हैं जब उन्हें यह लगता है कि मानव विशेष उन्हें नुकसान पहुंचाने आया है। सीता रत्नमाला ने अपनी आत्मकथा में मनुष्य-पशु के सहजीवी जीवन का एक सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है। लेखिका ने लिखा है कि जब एक रात जब उसे नींद नहीं आ रही थी, वह अपने पालतू भैंसे के पास चली जाती है, तब उसे एक सियार नज़र आता है जो आदिवासी गाँव की निद्रा का ध्यान रखते हुए चुपचाप झोंपड़ियों के पास से चला जाता है, “उसी समय एक अकेला सियार हमारे पास से चुपके से गुज़रा। वह गाँव को अच्छी तरह से जानता था। और वह जानता था कि हारा और एक मुझको छोड़कर सभी लोग सोए हुए हैं। इसलिए उसने अपनी आवाज़ लगाने के लिए फिर दूर से, बहुत दूर से उसका जवाब पाने के लिए झोंपड़ियों के गुजर जाने का इंतज़ार किया।”[9] यह उदाहरण दर्शाता है कि सहअस्तित्व तथा सहजीविता में सिर्फ आदिवासी ही नहीं, कहीं-न-कहीं जंगली जीव-जंतु भी विश्वास करते हैं।
प्रकृति दर्शन में विश्वास करने वाले आदिवासियों का धर्म भी उनके जीवन की भाँति ही सरल होता है। वहां किसी वर्जना, गूढ़ता व जटिलता के लिए स्थान नहीं होता तथा वह “किसी को धार्मिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रूप से नियंत्रित नहीं करता है और न ही अपने अधीन रखने के लिये किसी भी तरह के बंधन बना कर उन पर थोपता है।”[10] आदिवासी धर्म के विपरीत गैर-आदिवासी धर्मों की क्लिष्टता, गूढ़ता तथा वर्जनाएं आदिवासियों को भयभीत कर देती हैं। सीता रत्नमाला ने भी इस डर का अनुभव किया था और अपनी आत्मकथा में उन्होंने इसका जिक्र भी किया है। लेखिका ने लिखा है - “एक दिन जब मैं चारों ओर आश्चर्य से देखते हुए यह सोच रही थी कि अब और क्या पढ़ूँ उस सेक्शन के सामने ठहर गयी जिस पर ‘धर्म’ लिखा हुआ था। यह मेरे लिए एक अच्छा शब्द नहीं था। मैं बार-बार और अकसर यह सोचा करती थी मुझे अपनी असभ्य आत्मा के लिए कुछ करना चाहिए, लेकिन कहाँ से शुरू करूँ? मैंने किताबों को देखा। बाइबल। कुरान। जीवन का हिन्दू मार्ग। बौद्ध धर्म। पारसी धर्म। भयानक और सब के सब डराने वाले।”[11]
आदिवासी अपने परिवेश से गहरी अंतरंगता से जुड़े होते हैं। प्रवासी जीवन भी अमूमन उन्हें उनके परिवेश के प्रति प्रेम से विमुक्त नहीं कर पाता। लेखिका ने अपने घर-परिवेश के प्रति लगाव को ‘जंगल से आगे’ में जगह-जगह पर व्यक्त किया है। उनकी इस अभिव्यक्ति में खास यह है कि जहाँ एक ओर वह अपने स्कूली जीवन की सुविधाओं से प्रभावित होती है तथा स्कूल से पहली बार घर लौटकर उसे घर का खालीपन अखरता है – “स्कूल ने मुझे अपने ही घर में अपरिचित बना दिया था। कुर्सियों पर बैठने और बिस्तर पर सोने की आदत हो गयी थी। इससे घर की शून्यता और अकेलापन पहली बार अच्छा नहीं लगा।”[12] वहीं दूसरी ओर वह घर लौटकर अत्यंत उत्साहित भी होती है और उसमें अपने घर-परिवेश के प्रति प्रेम को उसके प्रत्येक कार्य में लक्षित किया जा सकता है – “छात्रावास के गद्देदार बिस्तर की आशा करना बेकार था इसलिए सख्त धरती पर मैं चटाई बिछाकर लेट गयी. लेकिन धरती ने मुझे गले लगा लिया था। ऐसा लगा उसने मुझे अपनी गोद में ले लिया है और मैं एक गहरी मीठी नींद में सो गयी।”[13] लेखिका के मन का यह द्वंद्व तथा अपने घर की खामोशी के प्रति उदासी आत्मकथा में अन्यत्र कहीं भी नजर नहीं आती। यहाँ तक कि जब वह अपना प्रशिक्षण तथा प्रेम छोड़कर घर लौटती है तब भी उसका उल्लास व खुशी दर्शनीय है – “मैं जंगल में घुस गयी। अपने पेड़ों के बीच वापस लौट कर मैं हर्षित थी। मैं खुद को जंगल के महान रहस्यमयी आत्माओं के बीच पाकर उल्लासित थी, जो गहरी धरती के रहस्यों को जानते हैं और जो उज्ज्वल चमकीली हवाओं के रहस्यों से भी बहुत अच्छी तरह से परिचित हैं।... अपनी सारी खुशी के साथ मैंने जल्दी से गाँव के रास्ते पर कदम बढ़ाए और घर पहुँच गयी।”[14]
‘प्रेम’ किसी भी व्यक्ति के जीवन का सर्वाधिक सुन्दर अनुभव होता है और चूंकि आदिवासी समुदायों में प्रेम को एक सहज भाव माना जाता है अतः वहां प्रेम-संबंधों तथा प्रेम विवाह को भी सहज ही स्वीकृति प्राप्त होती है। यद्यपि इन समुदायों में गैर-जातीय और सगोत्रीय विवाह को स्वीकार नहीं किया जाता तथा सामुदायिकता की भावना की प्रबलता के कारण अमूमन प्रेमी अपने व्यक्तिगत जीवन की अपेक्षा समुदाय के नियमों को प्राथमिकता देते हैं तथापि हर व्यक्ति के लिए प्रेम और उससे जुड़े अनुभव नितांत भिन्न होते हैं। ‘जंगल से आगे’ की लेखिका सीता रत्नमाला डॉक्टर कृष्णा राजन से प्रेम करती है जिसने बचपन में उसके पैरों का इलाज किया था ; हालाँकि, यह प्रेम सायास नहीं होता, बल्कि सीता और कृष्णा के एक-दूसरे को लिखे पत्रों और सीता के स्कूल की छुट्टियों में उनकी मुलाकातों में आकार लेता है। अपने प्रेम के वशीभूत होकर ही सीता नर्सिंग का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए मद्रास जाना चुनती है यथा – “मैं बैठकर प्रशिक्षण के लिए प्रस्तावित और संभावित जगहों के बारे में पढ़ने लगी। इन सबमें कोई न कोई बात जरूर थी, लेकिन इससे मेरे सोचे हुए में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।... मद्रास : जहाँ डॉक्टर कृष्णा राजन है! मैंने आगे नहीं पढ़ा। उसी शहर में रहने के लिए जिसमें वो रहता है! उसी हवा में साँस लेने के लिए जिसे वह भी लेता है! उसे फिर से देखने के लिए!”[15]
अस्पताल में वार्ड के कार्यों, अध्ययन, व्याख्यान तथा कृष्णा से मुलाकातों द्वारा लेखिका के मद्रास निवास का शुरुआती दौर संतोषजनक रहता है, किन्तु रात की ड्यूटी मिलने के साथ ही सीता की स्थिति में बदलाव आता है, तब वह न तो कृष्णा राजन से मिल पाती है और न ही अस्पताल के रात के परिवेश के साथ सामंजस्य बना पाती है। “मैं इस तरह से जिन्दगी जीने की आदी नहीं हो पाई। यह बहुत ही अप्राकृतिक लग रहा था कि जब हर कोई सो रहा होता है, तो मुझे अँधेरी गैलरी और एक मंद रोशनी वाले वार्ड में चलते हुए जागना पड़ता था।... दिन की नींद शरीर की आवश्यकताओं को कभी संतुष्ट नहीं कर पाती। मेरी थकावट एक ऐसा शारीरिक दर्द बन गई थी जिसके खिलाफ मुझे लड़ना पड़ता था।”[16]
गहरी उदासी, अकेलेपन और निराशा के बाद भी सीता अपने प्रेमी के संसर्ग के लिए ही मद्रास में रहना चाहती थी, किन्तु कृष्णा राजन के मित्र और डॉक्टर बालाचंद्रा राव द्वारा यह सुनिश्चित किए जाने पर कि कृष्णा चाहे कितना ही आत्मद्रोह कर ले, परन्तु अपने जातिगत संस्कारों के कारण वह कभी भी सीता को अपना नहीं पाएगा, सीता कृष्णा और मद्रास का अपना प्रशिक्षण छोड़ कर जाने का फैसला लेती है – “अपनी इच्छा और चाहत के खिलाफ, खुद को एक जोरदार धक्का देते हुए, जिसके लिए मेरे पास कोई तर्क नहीं था, मैंने फैसला कर लिया कि मैं उससे सम्बन्ध तोड़ कर दूर चली जाऊंगी। और इसे मुझे अब बिना किसी हिचकिचाहट के करना चाहिए... कृष्णा से मिलने के सवाल पर मैं दुविधा में थी, क्योंकि मुझे पता था मैं उसके साथ रहना चाहती हूँ, और उसको देखते ही मेरा मन बदल जाएगा। इसलिए मैंने उससे मिलने की बजाए उसे एक चिट्ठी लिखी। फिर मैंने सुबह में मेट्रोन से मुलाकात का वक्त निश्चित किया। ऐसा करने के बाद मुझे आश्चर्यजनक रूप से शांति महसूस हुई।”[17] सीता के निर्णय की दृढ़ता उसकी आदिवासी जीवनशैली के कारण है जो समुदाय के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को भावनात्मक रूप से इतना सशक्त बना देती है कि वह झूठे सुखद सपनों के स्थान पर दुखद वास्तविकता को स्वीकार कर लेते हैं। यह लेखिका की चारित्रिक दृढ़ता को भी अभिव्यक्त करता है कि किस प्रकार एक लड़की जो अपने प्रेम के लिए अपना घर, शहर तथा सम्पूर्ण वातावरण छोड़ सकती है वह अनिश्चित प्रेम की अवस्था में अपने प्रेमी को भी छोड़ सकती है।
निष्कर्ष : किसी भी समुदाय का जीवन-दर्शन एक लंबी चिंतन प्रक्रिया से गुजर कर जन्म लेता है और यही जीवन-दर्शन विभिन्न समुदायों में भिन्नता का कारक भी बनता है। समुदायों के मध्य मौजूद भिन्नता को समझने का एक मुख्य साधन साहित्य है क्योंकि साहित्यिक कृतियों में सामुदायिक संस्कृति अपने जीवंत रूप में अभिव्यक्त होती है। यह तथ्य आदिवासी समुदायों के जीवन-दर्शन के लिए भी पूर्णतः सत्य है। यदि सीता रत्नमाला की ‘जंगल से आगे’ पर ध्यान केंद्रित किया जाए तो इसका प्रकाशन सन् 1968 में हुआ था। यह वह समय था जब भारत में न तो आदिवासी साहित्यिक आंदोलन शुरू हुआ था और न ही आदिवासी जीवन-दर्शन पर चर्चा ही आरंभ हुई थी फिर भी इस आत्मकथा में आदिवासी दर्शन स्पष्टतः नजर आता है, उसे कृति में ढूंढने की आवश्यकता नहीं पड़ती चाहे वह स्कूल की पहली रात में सियार की आवाज़ सुनकर सो पाना हो या दौड़ने की अपनी जन्मजात प्रतिभा एवं रुचि के माध्यम से स्कूल में अपनी जगह बनाना हो अथवा प्रेम में असफल होने पर करुण विलाप के स्थान पर सब कुछ छोड़ कर न सिर्फ घर लौट आना बल्कि उस लौटने में भी खुश होने का भाव हो, इन सभी क्रियाओं में आदिवासी दृष्टि मुखर हो उठती है।
सन्दर्भ :
[1] दो शब्द, संपादक, आदिवासी दर्शन, संपादक : समर बसु मल्लिक, संतोष किड़ो, राणेन्द्र, मोनिका रानी टुटी, राकेश रंजन उरांव, अमृता प्रियंका एक्का, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2025, पृष्ठ 5
[2] वहीं, पृष्ठ 6
[3] जंगल से आगे, सीता रत्नमाला, प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची, 2018, भूमिका, पृष्ठ 24
[4] वहीं, पृष्ठ 25
[5] वहीं, पृष्ठ 56
[6] वहीं, पृष्ठ 65
[7] आदिवासी चिंतन की भूमिका, गंगा सहाय मीणा, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, 2021, पृष्ठ 91
[8] जंगल से आगे, सीता रत्नमाला, प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची, 2018, पृष्ठ 144
[9] वहीं, पृष्ठ 182
[10] सरना धर्म क्या है?, नेह अर्जुन इंदवार, आदिवासी साहित्य, वर्ष 1, अंक 1, जनवरी-मार्च 2015, पृष्ठ 43
[11] जंगल से आगे, सीता रत्नमाला, प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची, 2018, पृष्ठ 155
[12] वहीं, पृष्ठ 127
[13] वहीं, पृष्ठ 128
[14] वहीं, पृष्ठ 254
[15] वहीं, पृष्ठ 197
[16] वहीं, पृष्ठ 236
[17] वहीं, पृष्ठ 247
ज्योति
शोधार्थी (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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