शोध आलेख : आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय का साहित्य और उनकी आलोचना दृष्टि / वरुण भारती

आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय का साहित्य और उनकी आलोचना दृष्टि
- वरुण भारती

शोध सार : आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय बहुआयामी प्रतिभासम्पन साहित्यकार थे। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के लिए अपने जीवन का सर्वस्व समर्पित कर दिया था। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हिंदी के आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। वे हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू और फ़ारसी के आधिकारिक विद्वान् थे। हिंदी-उर्दू और हिन्दुस्तानी के विवाद में उन्होंने हिंदी का पक्ष बड़े प्रभावपूर्ण रूप से रखा था। उन्होंने दर्जनों पुस्तकें और पैम्फलेट लिखे है जो हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। सूफी साहित्य पर किया गया उनका काम इस विषय पर हिंदी में विरल है। उन्होंने हिंदी में ऐसे विषय को अपना लेखन का विषय बनया जिन पर अन्य लेखकों का ध्यान उतनी गंभीरता से नहीं गया था। उन्होंने सुफीमत के अलावा कई ऐसे तथ्यों की खोज कर भ्रांतियों से पर्दा उठाया जो साहित्य के लिए रहस्य बना हुआ था। तुलसीदास के जन्मस्थान हो या जायसी के पर उन्होंने गहन अनुसन्धान किया। उनका समग्र साहित्य अपने आप में साधना का साहित्य है। प्रस्तुत शोध-पत्र में आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय के समग्र साहित्य का विश्लेषण और अनुशीलन करने का प्रयास किया गया है।

बीज शब्द : सूफ़ीमत, तसव्वुफ़, भाषा, हिंदी, उर्दू, हिन्दुस्तानी, शोध, भक्ति।

मूल आलेख : आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय भाषा के गहरे अध्येता और सूफीमत एवं भक्ति और आधुनिक साहित्य के प्रकांड विद्वान् थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अत्यंत प्रिय शिष्य रहे और उन्होंने उनके निर्देशन में शोध कार्य किया। और जबतक शुक्ल जी जीवित रहे उनके निर्देशन में वे काम करते रहे। हिंदी को लेकर उनकी निष्ठा ऐसी थी कि सन् 1932 से सन् 1949 तक हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए जो राष्ट्रव्यापी आंदोलन चला उसमें हिंदी के पक्ष में वे एक बड़े योद्धा के रूप में लड़े। वे कई भाषाओं के ज्ञाता थे। हिंदी के साथ-साथ संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, अरबी तथा प्राकृत साहित्य के भी वे गहरे अध्येता थे। पांडेय जी के व्यक्तित्व और योगदान के विषय में बांग्ला के सुप्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने कहा था कि-“उनके एक-एक पैम्फलेट पर डी.लिट् की उपाधि दी जा सकती है।”1चन्द्रबली पाण्डेय की प्रतिभा विस्मित कर देने वाली थी। इन्होंने लगभग 34 ग्रंथों की रचना की है और राष्ट्रभाषा आन्दोलन के लिए बहुत सारे पैम्फलेट भी लिखें हैं, जिनकी उस समय काफी प्रसिद्धि हुई थी।

डॉ. कन्हैया सिंह ने चन्द्रबली पाण्डेय कि महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है- “हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से लेकर आजतक जिन महत्वपूर्ण आलोचकों ने हिन्दी भाषा एवं साहित्य के इतिहास में योगदान किया है उनमें आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय का सबसे अलग और अनोखा व्यक्तित्व रहा है। न केवल हिन्दी में मौलिक आलोचना के लिए वे जाने जाते है, बल्कि राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिए कठोर तपस्यापूर्ण जीवन के साथ उन्होंने संघर्ष किया। एक प्रकार से यह कहा जाए कि हिन्दी ही उनकी साधना थी और यही उनकी सिद्धि भी।”2वास्तव में आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल स्कूल’, से निकले थे और उन्होंने हिंदी साहित्य को एक मौलिक चिंतन दिया। भुवनेश्वरनाथ मिश्र ‘माधव’ ने चन्द्रबली पाण्डेय के सम्बन्ध में लिखा है–“चन्द्रबली जी एक साथ ही अँग्रेजी, संस्कृत, हिन्दी और फारसी के बड़े ही मँजे हुए विद्वान थे। यही कारण है कि हिंदी पर जब हिंदुस्तानी का आघात होने लगा तो चन्द्रबली जी ने हिंदी के पक्ष में एक सच्चे वीर सेनानी की तरह लड़ाई लड़ी। काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित होने वाली ‘हिंदी’ की संचिकाओं (फाइलों) देखने से पता चल सकता है कि चन्द्रबली जी दुर्धर्ष विद्वान थे।”3 चन्द्रबली पाण्डेय हिंदी के पक्ष में हमेशा एक योद्धा की तरह हर मोर्चे पर डटे रहे ।

चन्द्रबली पाण्डेय ने अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य के लेखन और हिंदी प्रचार में लगाया। कहते हैं कि इन्होंने सूफी साहित्य पर शोध करते-करते इतने संपृक्त हो गये कि फकीराना वेश ही धारण कर लिया और आजीवन अविवाहित रहे। इनके स्वभाव में जहाँ एक ओर सरलता और विनम्रता थी तो दूसरी ओर अक्खड़पन भी। चन्द्रबली पाण्डेय के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्वविद्यालय परिधि के बाहर रहकर जितने महत्वपूर्ण शोध एवं अकादमिक कार्य इन्होंने किये शायद ही किसी और ने किये होगें। इनके साहित्यिक समर्पण को देखकर ही साहित्य सम्मेलन ने इनको सभापति पद पर आसीन किया जो उन दिनों बहुत सम्मान की बात होती थी। वे काशी नागरी प्रचारणी सभा के भी सभापति चुने गये थे। ‘हिंदी’ नामक पत्रिका के भी ये लंबे समय तक संपादक रहे। ‘हिंदी’ पत्रिका और चन्द्रबली पाण्डेय के सम्बन्ध ने आचार्य शिवपूजन सहाय ने लिखा है-“ ‘हिन्दी’ के द्वारा भी उन्होंने बड़ी निर्भीकता और प्रचण्ड तेजस्विता के साथ हिंदी का पक्ष पुष्ट किया था। स्पष्टवादी आलोचक होने के कारण साहित्य-संसार में कुछ अप्रियता भी उन्हें मिली। पर, वे अपने मन की जँची बात कहने से कभी न चुके।”4 नागरी प्रचारणी सभा से जब भाषा मंडल, दक्षिण भारत गया था ये उसके प्रमुख सदस्यों में से थे। 1949 में साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन जब हैदराबाद में हुआ था तो ये उसके भी सभापति मनोनीत किये गये थे। चन्द्रबली पाण्डेय का साहित्यिक योगदान और सक्रियता अपने आप में एक संस्थान की तरह है।

‘विचार-विमर्श’ नामक निबंध-पुस्तक जिसमें उन्होनें कबीर, मीरा, पद्मावत, भक्तमाल, वैष्णवन की वार्ता, सूरदास का रहस्यवाद और उर्दू की हकीकत विषय पर विस्तार से लिखा है। पाण्डेय जी शोध के बारीकियों को गंभीरता से लेते थे। उन्होंने विचार-विमर्श की भूमिका में लिखा है- “हिन्दी साहित्य के विवेचनात्मक इतिहासों में भी भक्तमाल का समय संवत् 1942 दिया जाता है जो किसी भी दशा में ठीक नहीं। स्वयं भक्तमाल में ऐसे प्रमाण प्रचुर मात्रा में हैं जिनसे उसका रचना-काल संवत् 1700 ई. के आसपास तक ठहरता है।”5चन्द्रबली पाण्डेय एक खोजी अध्येयता थे। किसी भी विषय पर शोध करते तो उसके मूल तक पहुँच कर निष्कर्ष निकाल लाते। उनके तमाम निबंधों को देखने से यह पता चलता है की वो विषयों के प्रति कितने सतर्क थे। मीरा पर लिखते हुए उन्होंने उसका क्रमबद्ध विश्लेषण किया है। साथ ही मीरा की उन भावनाओं का भी विश्लेषण किया है जिसमें उनका स्वर दिखाई पड़ता है। सूरदास पर लिखते हुए उन्होंने उनकी रहस्वादी भावनाओं को रेखांकित करते हुए उनके दार्शनिक पक्ष को भी उद्घाटित किया है। पद्मावत में निहित आध्यात्मिकता को समझने के लिए उन्होंने उक्तियों का सहारा लेते हुए प्रमाणिकता के साथ अपने तथ्य प्रस्तुत किये हैं।

भाषा के प्रश्न को लेकर इनकी प्रतिबद्धता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब भारत में ‘हिन्दुस्तानी’ नाम से एक बनावटी भाषा को प्रतिष्ठित करने का प्रयास हो रहा था तब उन्होंने इसका डट कर विरोध किया। चन्द्रबली पाण्डेय ने इसके प्रति उत्तर में कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी। ‘राष्ट्रभाषा पर विचार’, ‘भाषा का प्रश्न’, ‘बिहार में हिन्दुस्तानी’, ‘मुग़ल बादशाहों की हिंदी’, ‘उर्दू का रहस्य’, ‘कचहरी की भाषा एवं लिपि’, ‘नागरी ही क्यों?’ ‘नागरी का अभिशाप’। वही कुछ महत्वपूर्ण पैम्फलेट भी लिखे ‘हिन्दुस्तानी से सावधान’, ‘हिन्दुस्तानी का भंवरजाल’, ‘कुरआन में हिंदी’, ‘उर्दू की हकीकत क्या है?’, उर्दू का उद्दगम’,‘उर्दू की जबान’ तथा ‘हिंदी की हिमायत क्यों?’ इत्यादि। हिंदी भाषा पर हो रहे प्रहारों का इन्होंने डटकर जवाब दिया। इस बात को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि चन्द्रबली पाण्डेय का हिंदी को प्रतिष्ठित कराने में उनका अकेले का योगदान अप्रतिम रहा।

आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय ने हिन्दी-उर्दू-हिन्दुस्तानी के बहस में बढ़ चढ़‌कर हिस्सा लिया। वे हिन्दी के प्रबल हिमायती थे। उन्होंने हिन्दी और उर्दू के विषय में लिखा है- “हिंदी और उर्दू में बड़ा भेद है। प्रकृति या बोली के विचार से तो उर्दू हिन्दी पर प्रवृति की दृष्टि से वह हिंदी की चहेती सौत है। हिन्दी को मिटाने के लिए फ़ारसी ने जो मायावी हिन्दवी रूप धारण किया उसी का नाम आज उर्दू है। उर्दू हिंदी-रूप में छिपी फ़ारसी है जो फ़ारसी के लद जाने पर देश में चालू की गई। देश से उसे कोई प्रेम नहीं। वह फारस-अरब और न जाने कहाँ की दूती है। उसका ध्येय कुछ और ही है।”6 हिंदी के समर्थन में वे हमेशा खड़े रहते थे। उन्होंने हिंदी के पक्ष में अलग-अलग प्रमाणिक उदाहरण प्रस्तुत कए हैं। उनके लिखे पैम्फलैट, भाषणों और किताबों में सुरक्षित है। दरअसल आजादी के आन्दोलन का नेतृत्व महात्मा गाँधी कर रहे थे और राष्ट्रीय आन्दोलन तीव्र हो चुका था। दूसरी ओर मुस्लिमलीग ने उर्दू भाषा को पाकिस्तान की माँग से जोड़ दिया था। जिससे भाषा के आधार पर साम्प्रदायिकता को रंग दे दिया गया। वर्षों तक हिंदी-उर्दू का विवाद चलता रहा। पहले तो गाँधी जी हिंदी के समर्थक थे। बाद में अंग्रेजों ने हिंदी को साम्प्रदायिक रूप दिया तब गाँधी जी ने हिंदी-उर्दू के स्थान पर ‘हिन्दुस्तानी भाषा’ का समर्थन किया। तब हिंदी, उर्दू और हिन्दुस्तानी को समर्थन करने वाले अलग-अलग धारा बन गए। जिसमे चन्द्रबली पाण्डेय ने हिंदी का प्रबल समर्थन किया था।

चन्द्रबली पाण्डेय ने उर्दू के निर्माण प्रक्रिया पर भी बड़े तथ्यात्मक ढंग से अपनी बात रखी है। उन्होंने इस विषय पर लिखा है-“भाषा का प्रश्न राष्ट्र‌भाषा का प्रश्न बना। उर्दू सन् 1744-45 ई. में उर्दू अर्थात दिल्ली के लाल किला में बनी और मुग़ल शांहशाहो एवं दरबारी लोगों के साथ लखनऊ, अजीमाबा, (पटना) और मुर्शिदाबाद आदि शहरों में पहुंची। फ़ारसी के साथ-साथ कंपनी सरकार के दरबार में दाखिल हुई और सन् 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज के जा जमी।”7 उस समय हिन्दी, उर्दू, हिन्दुस्तानी की जो राजनीति थी उसे पाण्डेय जी ने बहुत अच्छी तरह सुलझाया है। पाण्डेय जी ने अपने पैम्फलेट और पुस्तकों के माध्यम से उर्दू को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का विरोध किया। उन्होंने उर्दू को कृत्रिम और शासकवर्ग की भाषा बताया। उन्होंने उर्दू के मूल शब्द पर ही सवाल उठाया है। उर्दू का मूल अर्थ ‘लश्कर’ या ‘बाजार’ नहीं अपितु ‘शाही शिविर’ होता है।

साहित्य के जिन इलाकों में उन्होंने काम किया एक नया मानदंड स्थापित किया। हम उनके काम को तीन रूपों में देख सकते हैं (1) शोध (2) भाषा (3) आलोचना। जिस भी क्षेत्र में इन्होंने प्रवेश किया कुछ नया ही खोज कर लाए। चन्द्रबली पाण्डेय को भारतीय संस्कृति में अपार आस्था थी। संस्कृत साहित्य से भी इनका सघन लगाव था। इन्होंने ‘कालिदास’ तथा ‘शूद्रक’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं और भक्तिकाल एवं रीतिकाल के शोधपूर्ण अध्ययन के साथ ‘तुलसीदास’ और ‘केशवदास’ पर भी स्मरणीय पुस्तकें लिखीं। इनकी ‘मुसलमान’ नामक पुस्तक भी अपने समय में काफी चर्चित रही। इसके अलावा आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय ने कई मौलिक आलोचना की पुस्तकें लिखीं जिनमें- ‘तसव्वुफ़ अथवा सूफीमत’, ‘विचार-विमर्श’, ‘साहित्य-संदीपिनी’, ‘एकता’, ‘हिंदी कवि चर्चा’, ‘हिंदी गद्य निर्माण’, ‘तुलसी की जीवन-भूमि’ ‘स्वप्न सिद्धांत’ और ‘राधा’ (अपूर्ण) आदि। उन्होंने कुछ अंग्रेजी में भी पैम्फलेट लिखे है- ‘एप्ली फॉर नागरी हिंदी’, लिंग्विस्टिक सर्वे-ए पोलिटिकल स्टेट’, ‘नेशनल लैंग्वेज फॉर इंडिया’, ‘नेशनल स्क्रिप्ट ऑफ इंडिया’, ‘काबवेव ऑफ हिन्दुस्तानी’, ‘नागरी ए लैंग्वेज’, ‘द मिस्ट्री इज अनवील्ड’ और ‘हिन्दुस्तानी इन इट्स टू कलर’ आदि प्रमुख है।

इनकी विद्वता के कायल स्वयं इनके गुरु आचार्य रामचंद्र शुक्ल थे जिन्होंने ‘जायसी ग्रंथावली’ की भूमिका में इनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए लिखा कि-“इधर मेरे प्रिय शिष्य पं. चन्द्रबली पाण्डेय एम.ए.,जो हिंदी के सूफी कवियों के सम्बन्ध में अनुसंधान कर रहे है, जायस गये और मलिक मुहम्मद की कुछ बातों का पता लगा लाये। इनकी खोज के अनुसार ‘जायसी का जीवन-वृत्त’ भी नये रूप में दिया गया है जिसके लिए उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करना मैं आवश्यक समझता हूँ।”8 आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इस अभिमत से ही चन्द्रबली पाण्डेय की विद्वता एवं उनके शोध की गहनता का पता चलता है। यही कारण था कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल इन्हें अपना प्रिय शिष्य मानते थे। शुक्ल जी उन्हें ‘शाह साहब नसीरुद्दीनपुरी’ कहा करते थें। क्योंकि चन्द्रबली पाण्डेय नसीरुद्दीनपुर के निवासी थे। इनपर श्यामसुन्दर दास का भी विशेष स्नेह रहा।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने चन्द्रबली पाण्डेय के साथ मिलकर ‘नूरमुहम्मद’ की कृति ‘अनुराग-बाँसुरी’ का संपादन करने की योजना बनाई थी लेकिन यह कार्य शुक्लजी के जीवन-काल में पूर्ण न हो सका। पाण्डेय जी ने लिखा है-“स्वर्गीय आचार्य पंडित रामचन्द्र जी शुक्ल की कामना थी कि ‘अनुराग-बाँसुरी’ का सम्पादन हम दोनों मिलकर करें। सच पूछिए तो ‘अनुराग-बाँसुरी’ का सम्पादन इस प्रकार के कार्यों का सूत्रपात भर था। उनकी धारणा थी कि काशी विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण करने पर उन्हें इतना पर्याप्त समय मिलेगा कि वे इस प्रकार के कार्य सरलता से कर सकेंगे। मन की मन ही में रही कि चोला बदल गया।”9 बाद में पाण्डेयजी द्वारा यह संपादित पुस्तक (अनुराग-बांसुरी-कवि नूरमोहम्मद प्रणीत,संपादक-आचार्य रामचंद्र शुक्ल,चन्द्रबली पाण्डेय) अपने आप में अनूठा है। शोध की मौलिक दृष्टि से यह पुस्तक तैयार की गई है। इस पुस्तक में पाण्डेय जी ने मूल पाठ और इसके अर्थ दोनों पर विचार करते हुए पाठ निर्धारण किया है। यही कारण है की इस किताब को विशेष बनाती है।

आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय की पुस्तक ‘साहित्य-संदीपिनी’ में साहित्य के विभिन्न विषयों पर अठारह लेखों का संग्रह है। लेखक ने साहित्यिक पाठ के त्रुटियों की तरफ इशारा किया है। और कई जगहों पर लेखकों की और रचनाओं की वर्तमान सन्दर्भ में उसकी प्रासंगिकता को लेकर भी बात की है। उन्होंने लिखा है-“केशवदास का अध्ययन भी ‘रामचंद्रिका’ तक ही सीमित रह गया है। उनके ‘वीरचरित’ कोई फूटी आँख से देखता भी नहीं और सभी इतिहास को शाही आँख से देखने के आदि हो गए है। इसमें कुछ यह भी दिखाने की चेष्टा की गई है कि बादशाहों की दिनचर्या और तिथियां की तालिका चाहे जहाँ कहीं हो पर जनता का जीवन और देश का इतिहास हिन्दी में ही आँख खोलता है।”10 उन्होंने ऐसे-ऐसे दुर्लभ क्या अलभ्य विषयों पर कलम चलाई है जिन पर किसी अन्य आलोचकों का ध्यान नहीं गया था। इस संग्रह में उन्होंने भक्तिभाव, प्रेमयोग, साधारणीकरण, अध्यात्मिक व्याख्या,कामायनी का कवि आदि विषय पर उन्होंने विस्तार से लिखा है। ‘हिंदी कविचर्चा’ में पाण्डेय जी ने शोध के अनछुए बिन्दुओं को उठाया है और चंदरबरदायी, विद्यापति, जायसी, सुर, मीरा, भूषण और रसखान के कृतित्त्व और व्यक्तित्त्व पर विवेचन प्रस्तुत किया है।

चन्द्रबली पाण्डेय लिखित पुस्तक ‘तुलसीदास’ में जहाँ उनके गुरु आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि तुलसी की व्यक्ति पक्ष की तरफ झुकी है तो वही उनकी दृष्टि शोध की तरफ है। वे तुलसी के साहित्य के महत्त्वपूर्ण स्थल पर शोधपूर्ण दृष्टि से विवेचन करते है और निष्कर्ष निकालते है। पाण्डेय जी ने लिखा है-“राम की आंखों में आँसू भी समा सकते हैं और सो भी ‘तिय’ के सरल प्रश्न, इसको कौन जानता था। राम धीरे-धीरे पहुँच गए उस स्थान पर जहाँ उनकी, ‘पर्णशाला’ बनी और प्रिय को प्रेमपीयूष का स्थान मिला; किन्तु वहां तक पहुँचने में कितने पानी की आवश्यकता पड़ी और राम की आँखों से कितना पानी गिरा, इसका भी कुछ ठिकाना है?”11 इस तथ्य से यह पता चलता है की पाण्डेय जी की दृष्टि शोधपरक थी। पाण्डेय जी की शोध-दृष्टि विश्लेषणवादी है। इन्होंने इस पुस्तक में कुछ विवादों को सुलझाने के लिए तथ्यपरक विश्लेषण किया है। ‘महाकवि केशवदास’ पुस्तक भी अपने आप में श्रेष्ट है। उन्होंने केशवदास के जीवन काव्य के सम्बन्ध में मौलिक चिंतन प्रस्तुत किया है। उन्होंने केशवदास के जीवन पर तात्कालीन व्यक्तियों से उनके सम्बन्ध तथा ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर विचार किया है।

पाण्डेय जी द्वारा लिखित एक पैम्फलेट है। जिसमे उन्होंने नागरी लिपि की वैज्ञानिकता तथा लोगों के बीच में हिंदी की लोकप्रियता को दिखाया है। उस समय बिहार में जानबूझकर हिन्दुस्तानी के नाम पर हिंदी में अरबी-फ़ारसी के शब्द को घुसाया जा रहा था उसका उन्होंने खुल कर विरोध किया। ‘मुग़ल बादशाहों की हिंदी’ पुस्तक में पाण्डेय जी ने सप्रमाण सिद्ध किया है कि मुसलमान बादशाह हिंदी से प्रेम करते थे और हिंदी में रचना भी करते थे। मुग़ल बादशाह द्वारा हिंदी किसी न किसी रूप में प्रयोग में लाया जाता था। एक किताब उन्होंने उर्दू में सम्पादित की थी ‘मुल्क की जबान और फाजिल मुसलमान’ इस पुस्तक में नागरी लिपि और हिंदी भाषा के सम्बन्ध में मुसलमान विद्वानों की सम्मतियों का संकलन किया गया है।

चन्द्रबली पाण्डेय ने ‘एकता’ नाम से एक व्यक्तिपरक और विषयगत निबंधों की पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण शीर्षक से लेख लिखे है –‘भात’, ‘उर्दू बाजार में बनी या दरबार में’, ‘हिन्दू’, ‘मुसलमानों में कृष्ण’, ‘कबीर और गो वध’, ‘स्याम सगाई’ आदि। इसी पुस्तक में एक लेख ‘भूषण की राष्ट्रदृष्टि’ उन्होंने लिखा है- “भूषण देश के उन अभागे कवियों में मुख्य है जिनकी स्तुति तो दूर रही, उलटे भर्त्सना ही की जाती है। किसी ने उनको कामुक कह दिया तो किसी ने चापलूस किसी ने उन्हें ‘भांड’ बनाया तो किसी ने राष्ट्रद्रोही होने का फतवा दे दिया; यही नहीं, दिलेरी के साथ साहित्य के रंगमंच से घोषणा तक कर दी गई कि भूषण वस्तुतः मुस्लिम-द्रोही थे- मुसलमानों से उनकी जानी दुश्मनी थी।”12 इस पुस्तक में अलग-अलग विषय पर पैंतीस लेख संकलित किये गए है। पाण्डेय जी ने भूषण के काव्य का गहनता से विश्लेषण किया है। दरअसल उनका कहना है भूषण एक राष्ट्रनिष्ठ सच्चे देश-प्रेमी कवि थे। इस निबंध संग्रह में उन्होंने ऐसे शब्दों पर लिखा है जिसका लोग प्रयोग तो करते है लेकिन उसका अर्थ नहीं जानते। जैसे-भात, बख्शी, हिनवाना आदि। उन्होंने इस निबंध संग्रह में कई नवीन खोज और कई मौलिक स्थापनाएँ दी है।

सूफी काव्य पर शोध के क्रम में चन्द्रबली पाण्डेय ने मौलवी महेश प्रसाद से फारसी सीखी थी इस कारण उनसे भी इनका आत्मीय सम्बन्ध रहा। वे अपने समय के तमाम शीर्ष लेखकों के बीच प्रतिष्ठित रहे। चन्द्रवली पाण्डेय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. करने के बाद वही से शोध करने की योजना बनाई। उन्होंने वही ‘हिंदी सूफी काव्य’ पर डी.लिट. के लिए अपना शोध विषय लिया। आगे चलकर इनके शोध से संबंधित एक तकनीकी विवाद शुरू हो गया। चूंकि उस समय शोध प्रबंध अंग्रेजी में लिखना होता था। चन्द्रबली पाण्डेय ने हिंदी में अपना शोध प्रबंध लिखने की अनुमति मांगी पर उस समय विश्वविद्यालय का यह नियम बाधक बन गया। उन्होंने चार अध्याय में प्रस्तुत होने वाले शोध-प्रबंध का पहला अध्याय लिखकर ही आगे का शोध कार्य रोक दिया। आगे चलकर उसी लिखे का प्रथम अध्याय ‘तसव्वुफ अथवा सूफीमत’ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। जो अपने विषय की प्रारंभिक मानक पुस्तक मानी जाती है।

‘तसव्वुफ अथवा सूफीमत’ पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है-“उस समय लेखक के हृदय में भावना थी डाक्टरेट करने की और फलतः यह रचना भी रची गई थी उसी की भूमिका के रूप में। किन्तु घटना कुछ ऐसी घटी कि इस जन को काशी विश्वविद्यालय से नाता तोड़ना पड़ा और टूट गया उसी के साथ डॉक्टर होने का विचार भी। हिंदू-विश्वविद्यालय में हिंदी की उपेक्षा हो और यह जन कहीं और से डॉक्टर बने यह उसकी भावना के सर्वथा प्रतिकूल बात था।”13 दरअसल चन्द्रबली पाण्डेय ने ‘तसव्वुफ अथवा सूफीमत’ पुस्तक सन् 1933-34 में ही लिख लिया था। किन्तु इस पुस्तक को प्रकाशित होने में बारह वर्ष लग गये। एक लम्बे समय के बाद यह पुस्तक सरस्वती मंदिर, वाराणसी से 1945 में प्रकाशित हुई। सूफीमत पर यह अपने आप में एक अलग ढंग की किताब है। यह पुस्तक इनकी श्रेष्ठ पुस्तकों में ही नहीं बल्कि हिंदी की श्रेष्ठ पुस्तकों में गिनी जाती है।

पाण्डेय जी का हिन्दी भाषा और साहित्य के निर्माण में अप्रतिम योगदान रहा है। हिंदी के पक्ष में वे हमेशा एक योद्धा की तरह अपने जीवन के अंतिम समय तक लड़ते रहें। पाण्डेय जी एक साथ कई मोर्चे पर काम कर रहे थें। भाषा-आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। तो दूसरी ओर साहित्य के कई महत्वपूर्ण विषयों पर आलोचनात्मक लेखन कर रहे थे। भाषा के अलावा सूफीमत, केशवदास, तुलसीदास, शूद्रक, कालिदास के साथ कई अन्य महत्वपूर्ण विषय पर उन्होंने गंभीर लेखन किया है। हिंदी के पक्ष में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण पैम्फलेट लिखे जो हिंदी के मेनिफेस्टो की तरह है। उन्होंने हिंदी के पक्ष में ‘हिंदी’ पत्रिका का सम्पादन किया। साहित्य के कई गंभीर-विषयों पर लेख लिखकर उन्होंने साहित्य की दुनिया में एक अलग पहचान बनायीं। पाण्डेय जी आचार्य रामचंद्र शुक्ल की परंपरा के एक महत्वपूर्ण आलोचक थे। उन्होंने विश्वविद्यालय के परिधि से बहार रहकर खोजपूर्ण तथा आकादमिक काम किया। वे अपने आप में एक संस्था थे।

आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय की आलोचना दृष्टि बिल्कुल स्पष्ट है। वे अपने पूर्व या समकालीन आलोचकों से आलोचनात्मक संवाद स्थापित करते हुए अपने नवीन विचारों को जोड़ते हैं। वे अपने लेखन में राजनीतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि का विवेचन करते है। उनकी रचना के केन्द्र में ‘भारतीय संस्कृति की रक्षा’ मूल भावना है। तत्कालीन समय में हिंदी-उर्दू एकता और हिंदी-उर्दू का परस्पर विरोध ये दो मुख्य धाराएं थी जिनके बीच तीव्र संघर्ष था। उसके बाद उन्होंने हिंदी-उर्दू की अभेद्यता पर भाषा और साहित्य के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि उसके इतिहास में भी जाकर काम किया। वे भाषा के असाम्प्रदायिक धारा के प्रबल समर्थक थे। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी के मानकीकरण को लेकर उसके स्वरुप को लेकर बहुत गंभीर विचार-विमर्श किया है। उनकी खुद की भाषा शुक्ल जी से भिन्न और आमफहम वाली थी। वे अपने दौर में उन थोड़े से लेखकों में थे जिनकी भाषा और गद्य अपने समय से आगे और आधुनिक थी।

सन्दर्भ :
  1. डॉ. कन्हैया सिंह, आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, 2021, पृ.सं. 07
  2. वही, पृ.सं. 01
  3. भुवनेश्वरनाथ मिश्र ‘माधव’,स्वर्गीय भाई चन्द्रबली पाण्डेय, नागरी प्रचारिणी, (चन्द्रबली पाण्डेय स्मृति-अंक),1958, वर्ष-63, अंक- 3-4, पृ.सं. 470
  4. शिवपूजन सहाय, शिवपूजन-रचनावली,(चौथा खंड),बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना, 1959, पृ.सं. 640
  5. चन्द्रबली पाण्डेय, विचार-विमर्श, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, 2004, पृ.सं. 10
  6. चन्द्रबली पाण्डेय, भाषा का प्रश्न, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, 2022, पृ.सं. 42
  7. चन्द्रबली पाण्डेय,राष्ट्रभाषा पर विचार, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, 2022, पृ.सं. 05
  8. जायसी ग्रंथावली,(संपा.) आचार्य रामचंद्र शुक्ल, अद्वैत प्रकाशन, दिल्ली, 2021, पृ.सं.12
  9. अनुराग-बांसुरी, (संपा.) आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चन्द्रबली पाण्डेय, हिंदी साहित्य सम्मलेन,प्रयाग, 1997, पृ.सं. 05
  10. चन्द्रबली पाण्डेय, साहित्य-संदीपिनी,सरस्वती मंदिर, जतनबर, बनारस, 1947, पृ.सं. 01
  11. चन्द्रबली पाण्डेय, तुलसीदास, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, 2025 पृ. सं. 163
  12. चन्द्रबली पाण्डेय, एकता, हिंदी-साहित्य-सम्मलेन, प्रयाग, 1947, पृ.सं. 68-69
  13. चन्द्रबली पाण्डेय, तसव्वुफ अथवा सूफीमत, सरस्वती मंदिर, जतनबर, बनारस, 1945, पृ.सं. 02
  14. आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, सूफ़ी-काव्य-संग्रह,हिंदी-साहित्य-सम्मलेन, प्रयाग, 2005, पृ.सं. 15
  15. रामपूजन तिवारी, सूफीमत साधना और साहित्य, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, पृ.सं 03
  16. चन्द्रबली पाण्डेय, तसव्वुफ अथवा सूफीमत, सरस्वती मंदिर, जतनबर, बनारस, 1945, पृ.सं. 04
वरुण भारती

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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