जीवा, तुम कब आओगे / ‘वेटिंग फॉर गोडो’ हास्य रूपान्तरण
(इंतज़ार की एक फटी-पुरानी दास्तान)
- सुप्रिया सिंह
यह नाटक विश्व प्रसिद्द नाटककार व आलोचक सैमुएल बेकेट के १९५२ में प्रकाशित नाटक ‘वेटिंग फॉर गोडो’ (Waiting for Godot) का भारतीय परिपेक्ष्य में हास्य रूपान्तरण है। इस रूपान्तरण में किरदारों को भी अलग नाम दिए गए हैं जो भारतीय भाषा के अनुरूप हैं।
कहानी का सार : यह नाटक दो फकीरनुमा किरदारों, पौने (भईया) और पुतुल (बबुआ) के इर्द-गिर्द घूमता है, जो एक सुनसान सड़क पर एक सूखे पेड़ के नीचे किसी 'जीवा' नाम के आदमी का इंतज़ार कर रहे हैं। उन्हें ठीक से पता नहीं कि जीवा कौन है, कैसा दिखता है, या वह उनकी मदद क्यों करेगा, पर उनका पूरा अस्तित्व इसी इंतज़ार पर टिका है।
नाटक में दो एक्ट हैं और दोनों एक्ट का अंत गतिहीन निष्क्रीय वार्ता से होता है— "चलें? हाँ, चलो।" लेकिन दोनों अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिलते। यह हमारे समाज की उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ हम सब किसी न किसी 'जीवा' यानि बेहतर भविष्य या चमत्कार के इंतज़ार में ठहरे हुए हैं, पर असल में कुछ भी नहीं बदलता।
एक्ट १
(पुतुल एक पत्थर पर बैठा है और अपनी पूरी ताक़त से अपना जूता खींच रहा है। उसका चेहरा लाल है। पौने उसे बोरियत से देख रहा है।)
पुतुल: (कराहते हुए) यह साला... निकल ही नहीं रहा!
पौने: अरे बबुआ, जूता है, कोई बैंक की तिजोरी नहीं। ज़ोर लगाओ, बबुआ!
पुतुल: (हार मानकर ठंडी आह भरता है) कुछ नहीं हो सकता। मेरा पैर इस जूते का कैदी बन चुका है।
पौने: तुम्हारी यही तो दिक्कत है। फौरन हार मान लेते हो। मुझे देखो—मैं एक फाइटर हूँ!
पुतुल: तुम सिर्फ बातों के फाइटर हो, झेलता तो मैं हूँ...पता है, कल रात गड्ढे में मैं गिरा था, तुम नहीं।
पौने: (चटकारे लेते हुए) अच्छा? सर्विस कैसी थी वहाँ की?
पुतुल: बहुत बेकार।
पौने: खैर, एक बात तो है की हम दोनों ही फाइटर हुए। हम एक बेहतरीन टीम हैं।
पुतुल: मुझे टीम-वीम नहीं बनना। मुझे बस एक बड़ा जूता चाहिए। यह छोटा होता जा रहा है। मुझे मार डालने की साज़िश है इसकी।
पौने: (उसके सिर को थपथपाते हुए) गलती जूते की नहीं है, बबुआ। यह दुनिया ही ऐसी है। यह दुनिया एक तंग जूते जैसी है।
पुतुल: तो फिर मुझे यह दुनिया उतार देनी है। बहुत दर्द दे रही है।
(पुतुल गुस्से में अपनी जूते से एक कंकड़ झाड़ रहा है। पौने आसमान की तरफ देख रहा है, जैसे बहुत "गहरी" सोच में हो।)
पुतुल: (चिड़चिड़ाते हुए) यह कंकड़! धर्म की तरह मुझ से चिपक गया है। जैसे हम अपना धर्म लेकर पैदा होते हैं वैसे या जैसे कोई बिन बुलाया रिश्तेदार, जो जाने का नाम ही नहीं लेता।
पौने: (गंभीरता से) नहीं, बबुआ। यह धर्म नहीं है। तुम अपनी शारीरिक तकलीफ को 'धर्म' समझ रहे हो।
पुतुल: हाँ! हाँ! धर्म मतलब हिन्दू- मुसलमान, जाति, वंश गोत्र या ऐसा ही कुछ।
पौने: अरे नहीं, नहीं।
पुतुल: (रुकते हुए) धर्म? ओह! तो फिर क्या यह वही लड़का है जिस पर मेरे पाँच रुपये उधार हैं?
पौने: (ठंडी आह भरते हुए) नहीं। धर्म एक 'ब्रह्मांडीय व्यवस्था' है। जैसे- सूरज का काम है उगना, नदी का काम है बहना, और हम फकीरों का काम है... शायद, इंतज़ार करना। यह वो अदृश्य धागा है जिसने पूरी कायनात को बाँध रखा है!
पुतुल: (अपनी जूते खींचते हुए) लो, मेरे जूते का तो धागा टूट गया। तो क्या अब कायनात खत्म हो जाएगी?
पौने: हर बात का शाब्दिक अर्थ मत निकाला करो। धर्म ही वह वजह है जिसकी वजह से हम यहाँ रुके हैं। इंतज़ार करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। भले ही हम जिसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसके पास जीपीएस (GPS) न हो।
पुतुल: मेरा धर्म बहुत सीधा है। मेरा धर्म है—एक भरा हुआ पेट और एक ऐसा जूता जो काटे नहीं।
पौने: बबुआ, तुम्हारी आत्मा तुम्हारे पेट में रहती है.... अरे! धर्म का मतलब है 'सत्य' और 'न्याय'।
पुतुल: (अपने चोटिल पैरों को देखते हुए) क्या उस रात उन लड़कों ने मुझसे रुपये उधार लिए और मुझे मारा, यह 'न्याय' था? क्या यही उनका धर्म था? मेरी पसलियों को तबला बना देना?
पौने: (खामोश होकर) वो... वो सिस्टम की एक गलती थी। आत्मा में आया एक छोटा सा 'ग्लिच'।
पुतुल: (वापस जूते पहनते हुए) तो फिर उस 'सिस्टम' को बोल देना कि मैं इस्तीफा दे रहा हूँ। अब से मेरा धर्म यही है कि यहाँ चुपचाप बैठूँ और कुछ न करूँ।
पौने: (सिर हिलाते हुए) आहा! अब तुम सही रास्ते पर आए। इस देश में, कुछ न करना ही ध्यान की सबसे ऊँची अवस्था है।
(पुतुल ज़मीन पर लेट जाता है और अपनी फटी पुरानी जूते को तकिया बनाने की कोशिश करता है। पौने घबराहट में इधर-उधर टहल रहा है।)
पुतुल: (उबासी लेते हुए) बस भईया, मेरा पर्दा गिर रहा है। मैं तो चला नींद की वादी में। मुझे जगाना मत।
पौने: (अचानक रुककर) नहीं! बबुआ, सोओ मत। अकेले में यह सन्नाटा... बहुत शोर कर रहा है।
पुतुल: (आंखें बंद किए हुए) तो सन्नाटे से बातें करो न। वह तुमसे अच्छी बातें करेगा। मैं बिज़ी हूँ।
(पुतुल खर्राटे लेने लगता है। अचानक वह झटके से उठ बैठता है, हांफते हुए।)
पुतुल: भईया! भईया! मैंने देखा। एक विशाल गोभी का फूल, जिस पर मेरी नानी का चेहरा लगा था—
पौने: (अपने कान बंद करते हुए) बस! चुप हो जाओ! मुझे तुम्हारे ये डरावने सपने नहीं सुनने। वैसे भी जब तुम सो जाते हो, तो इस दुनिया में मैं अकेला बचता हूँ। मैं किससे बात करूँ? अपनी टोपी से? तुम्हारा जागना ज़रूरी है ताकि मुझे यकीन रहे कि 'मैं' ज़िंदा हूँ।
पुतुल: (चिड़चिड़ेपन में बैठते हुए) मतलब तुम हो, यह पक्का करने के लिए मुझे जागकर दुखी होना पड़ेगा? यह तो बहुत भारी टैक्स है, भईया।...तुम भी अजीब नमूने हो। बड़े आए 'फिलॉसफर', जो अंधेरे से डरते हैं।
पौने: (नज़रें चुराते हुए) मुझे माफ़ कर दो। मैं खुदगर्ज़ हो रहा हूँ। जाओ, वापस अपनी नानी-गोभी के पास चले जाओ।
पुतुल: (आह भरते हुए, लड़खड़ाते हुए खड़ा होता है) नहीं। अब मूड खराब हो गया। नानी गायब हो गईं। वैसे भी नानी से ज्यादा मेरे लिए तुम ज़रूरी हो
(दोनों एक-दूसरे को देखते हैं—धूल में सने दो आदमी—और फिर एक-दूसरे को ज़ोर से गले लगा लेते हैं।)
पुतुल: बढ़िया। छोड़ना मत। छोड़ा तो मैं गुब्बारे की तरह हवा में उड़ जाऊँगा।
पौने: (मुस्कुराते हुए) हम कितने बेकार लगते हैं न?
पुतुल: सबसे बेहतरीन बेकार! अब... क्या तुम्हारे पास थोड़ा चना है? मेरे 'अस्तित्व' को भूख लगी है।
(तभी अचानक एक तीखी आवाज़ आती है— चटाक!)
पुतुल: (झटके से पीछे हटते हुए) अरे बाप रे! यह क्या था? मेरी पसली टूटी या तुम्हारा दिल?
पौने: (नीचे देखते हुए, घबराकर) न दिल, न पसली। तुम्हारे 'धर्म' वाले जूते का आखिरी धागा भी शहीद हो गया, बबुआ।
(पुतुल अपना पैर उठाता है। जूते का अंगूठा पूरी तरह अलग हो चुका है और सिर्फ एक पतली पट्टी से लटका हुआ है।)
पुतुल: (गुस्से में जूते को घूरते हुए) देख रहे हो? यही है मेरा नसीब! जब भी मैं किसी से प्यार जताने की कोशिश करता हूँ, मेरा जूता मेरा साथ छोड़ देता है। अब मैं अस्तित्व को कैसे महसूस करूँ? एक पैर नंगा और एक पैर 'वीआईपी'?
पौने: (हँसते हुए) शांत हो जाओ! यह एक संकेत है। नंगे पैर चलना मतलब मिट्टी से जुड़ना। तुम अब सच्चे 'महात्मा' बन गए हो।
पुतुल: (लड़खड़ाते हुए चलने की कोशिश करता है, थप-थप-थप) महात्मा नहीं, मैं मुर्गा लग रहा हूँ। अब मैं इस टूटे जूते के साथ इंतज़ार कैसे करूँगा? अगर 'वो' आ गया और मैंने उसे लंगड़ाते हुए नमस्ते किया, तो उसे लगेगा मैं भीख माँग रहा हूँ।
पौने: (अपनी जेब से एक गंदा सा सुतली का टुकड़ा निकालते हुए) फिक्र मत करो। मेरे पास 'जुगाड़' है। भारत में जुगाड़ ही सबसे बड़ा धर्म है। पैर आगे बढ़ाओ।
(पौने झुककर पुतुल के पैर और जूते को सुतली से ऐसे बांध देता है जैसे कोई पार्सल पैक कर रहा हो। पुतुल एक पैर पर खड़ा होकर पौने के सिर का सहारा लेता है।)
पुतुल: (हिलते हुए) धीरे भईया! मेरा पैर बांध रहे हो या मुझे गिरफ्तार कर रहे हो?
पौने: (गाँठ मारते हुए) लो! अब तुम्हारे जूते और तुम्हारा पैर एक हो गए हैं। अद्वैत वेदांत। अब तुम और तुम्हारे ये जूते अलग नहीं हैं।
पुतुल: (भारी पैर उठाकर देखते हुए) अद्वैत का तो पता नहीं, पर अब मेरा पैर हाथी जैसा लग रहा है। (एक गहरी सांस लेकर) चलो, अब कम से कम मैं खड़ा तो रह सकता हूँ।
पौने: (मुस्कुराते हुए) और मैं तुम्हें गिरते हुए देख सकता हूँ। हम फिर से तैयार हैं।
पुतुल: (उदासी से) किसके लिए?
पौने: (आसमान देखकर) अगले कंकड़ के लिए।
(पुतुल अपने भारी, सुतली से बंधे जूते को घसीटते हुए चलने की कोशिश कर रहा है। तभी अचानक दूर से एक तेज़ सीटी और कोड़े की आवाज़ आती है— तड़ाक!)
पौने: (चौंककर) वह क्या है? क्या 'वो' आ गया?
पुतुल: (लड़खड़ाते हुए) अगर 'वो' सीटी बजाकर आ रहा है, तो पक्का कोई सरकारी अफसर होगा। मेरे जूते छुपाओ।
(मंच पर लकिया प्रवेश करता है। उसके गले में एक लंबी रस्सी बंधी है। उसने भारी सूटकेस, एक मुड़ने वाली कुर्सी, एक खाने का टिफ़िन और एक भारी कोट लादा हुआ है। वह बुरी तरह हांफ रहा है। उसके पीछे लच्छू हाथ में कोड़ा और रस्सी का दूसरा सिरा पकड़े हुए रौब से आता है।)
लच्छू: (गरजते हुए) चल! ऐ ऐ! रुक मत! ऐरावत की तरह मत मटक, गधे की तरह चल।
(लकिया रुक जाता है। वह झुककर कांप रहा है। लच्छू अपनी घड़ी देखता है और पुतुल-पौने को घूरता है।)
लच्छू: (रौब से) कौन हो तुम लोग? मेरी ज़मीन पर क्या कर रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं यह 'लच्छू सेठ' का इलाका है?
पौने: (घबराकर) माफ़ करना सेठ जी, हमें लगा यह सरकारी सड़क है। हम तो बस... इंतज़ार कर रहे थे।
पुतुल: ( लकिया के गले की रस्सी देखते हुए) साहब, यह आपका पालतू कुत्ता है क्या? बहुत बड़ा है, और इसके कपड़े भी इंसानों जैसे हैं।
लच्छू: (हँसते हुए) कुत्ता? नहीं-नहीं! यह मेरी 'किस्मत' है। इसका नाम लकिया है। यह मेरा सारा बोझ उठाता है ताकि मैं हल्का महसूस करूँ। कुर्सी!
(लकिया बिना कुछ बोले, कांपते हाथों से कुर्सी खोलता है। लच्छू उस पर ठाठ से बैठ जाता है और अपना टिफ़िन खोलता है।)
पुतुल: ( लकिया के पास जाकर, उसके जूते देखते हुए) ओए! इसके जूते तो बिल्कुल नए है! और इसमें सुतली भी नहीं बंधी। सेठ जी, क्या आप पुराने जूते के बदले नए जूते की स्कीम चलाते हैं?
लच्छू: (सिगरेट पीते हुए) चुप रहो! बोलता नहीं है, सिर्फ ढोता है। यह मेरा गुलाम है, मेरा मनोरंजन है, मेरा 'गूगल' भी है और ‘पबजी’ भी।
पौने: (लकिया की तरफ देखते हुए) लेकिन इसके गले में रस्सी... क्या यह अमानवीय नहीं है?
लच्छू: (लापरवाही से) रस्सी? यह तो 'रिश्ता' है! दुनिया में हर कोई किसी न किसी रस्सी से बंधा है। तुम इंतज़ार की रस्सी से बंधे हो, यह मेरी रस्सी से। फर्क सिर्फ इतना है कि मेरी रस्सी रेशम की है।
पुतुल: (लकिया की आँखों में देखते हुए) इसकी आँखें तो ऐसी लग रही हैं जैसे इसमें पूरा दुनिया भर का ज्ञान भरा हो। क्या यह नाचता भी है?
लच्छू: (कोड़ा फटकारते हुए) ! नाच।दुनिया को अपना 'तांडव' दिखा।
(लकिया नाचता है)
लच्छू: इसके दिमाग में एक 'देसी' दार्शनिक रायता भी है। (लच्छू उसे अपनी टोपी पहनाता है और कोड़ा फटकार कर कहता है—) सोच। और भाषण के लिए तैयार हो जा।
लकिया : (लकिया पहले हकलाता है, फिर मशीन की तरह बिना रुके चिल्लाते हुए शुरू हो जाता है)
"माननीय अध्यक्ष महोदय और मेरे जूते-धारी भाइयों! चूँकि परमात्मा, जिसका एड्रेस आधार कार्ड पर नहीं मिलता और जो ऊपर वाले फ्लोर पर बैठकर बिना रिमोट के सृष्टि का नेटफ्लिक्स चला रहा है, वह हमसे नाराज़ है! क्यों? क्योंकि हमने गंगा में प्लास्टिक फेंका, धरती का सीना चीरकर अनगिनत निर्माण किये, पेड़ काटे, मॉल बनाये और रोप वेज़... वो भी बाज़ार में और कालेजों के ऊपर... और तो और... धर्म के नाम पर चंदा खाया!
अतः वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि इंसान का दिमाग एक प्रेशर कुकर है जिसकी सीटी बजना बंद हो गई है। बस ब्लास्ट होना बाकी है। शोध बताते हैं कि नंगे पैर चलने से लेकर हवाई जहाज़ में बैठने तक, इंसान सिर्फ एक ही चीज़ खोज रहा है— वाई-फाई का पासवर्ड। पर अफ़सोस! आत्मा का सिग्नल कमज़ोर है।
इतिहास गवाह है कि महान कबीर ने कहा था, 'जूते फटे तो क्या हुआ, पैर तो सलामत है।' पर आज का युवा हाथ-पैर का तो छोड़ो बुद्धि का भी इस्तेमाल नहीं करता. बस, रील बना रहा है। वह नाच रहा है। वह गा रहा है। वह बिना बात के उदास है। पत्थर पिघल रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और पनीर टिक्का महंगा हो रहा है। एलपीजी और पेट्रोल उफ़ ...
निष्कर्ष यह है कि... शून्य बटा सन्नाटा! हम आए थे नंगे पैर, हम जाएंगे नंगे पैर, बस बीच में एक टूटी हुई सुतली वाली जूते का संघर्ष है। दुनिया एक गोल रोटी है जिसे वक्त का कुत्ता खा रहा है। सोचो! सोचो! क्योंकि सोचने के पैसे नहीं लगते, पर काम करने के लिए हड्डी तोड़नी पड़ती है। उफ़!"
(अचानक चुप हो जाता है और बुरी तरह हांफने लगता है। वह वापस अपनी पुरानी जड़ अवस्था में आ जाता है।)
पुतुल: (अपना सिर पकड़कर) भईया, इसके 'सोचने' से तो अच्छा मेरा जूते का दर्द था। कम से कम समझ तो आता था।
पौने: (प्रभावित होकर) बबुआ, तुमने ध्यान नहीं दिया? इसने ब्रह्मांड का सारा ज्ञान एक ही सांस में उगल दिया। यह 'गूगल' से भी तेज़ निकला!
लच्छू: (उबासी लेते हुए) बस! बहुत हो गया ज्ञान का भंडार। सामान उठा। हमें अगले स्टेशन तक पहुँचना है जहाँ इंसान की सेल लगी है।
(लच्छू अचानक अपनी कलाई घड़ी देखता है—जो असल में बंद है—और घबरा जाता है।)
लच्छू: (चिल्लाते हुए) अरे! घडी तो बंद है पर समय तो भागा जा रहा है। जैसे बिना टिकट का यात्री टीटीई को देखकर भागता है। ओए! आलसी के अवतार! सामान उठा।
(लकिया झटके से सीधा खड़ा होता है और सारा सामान—कुर्सी, टिफिन, सूटकेस—दोबारा अपने ऊपर लाद लेता है। वह एक कांपते हुए पहाड़ जैसा लग रहा है।)
पुतुल: (लकिया के जूते को लालच से देखते हुए) सेठ जी, जाते-जाते इस बेचारे का बोझ थोड़ा हल्का कर दो। इसके जूते मुझे दे दो, मेरा पुण्य बढ़ेगा और मेरा पैर बचेगा।
लच्छू: (कोड़ा फटकारते हुए) पुण्य बाद में कमाना, पहले रास्ता छोड़ो! लकिया को अपनी जूते से 'लगाव' है, भले ही वह फट जाए। है ना ?
(लकिया बस एक गहरी, दर्दभरी आवाज़ निकालता है— "हूँउउ!")
पौने: (हाथ जोड़कर) सेठ जी, आप जा तो रहे हैं, पर क्या आप 'उससे' मिले? जिसके लिए हम यहाँ धूप में पापड़ बेल रहे हैं?
लच्छू: (रुककर, सोच में डूबते हुए) 'वो'? कौन? जिसकी वजह से तुम यहाँ पेड़ के नीचे साक्षात् तपस्या कर रहे हो? (हँसते हुए) बेटा, दुनिया में दो ही लोग मिलते हैं—एक जो लूटते हैं और दूसरे... जो लुट जाते हैं। तीसरा कोई नहीं आता। कोई नहीं जाता।
(लच्छू रस्सी खींचता है। लकिया लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ता है। कोड़े की आवाज़ और रस्सी के घिसटने की आवाज़ दूर होती जाती है।)
लच्छू की आवाज़ (दूर से): "अलविदा! टाटा! बाय-बाय! फिर मिलेंगे... शायद नर्क के अगले मोड़ पर!"
(मंच पर फिर से सन्नाटा छा जाता है। पुतुल और पौने अकेले खड़े हैं।)
पुतुल: (अपनी सुतली वाले जूते को देखते हुए) कम से कम एक चिकन की टांग ही छोड़ जाता। बहुत शोर था, पर मिला कुछ भी नहीं।
पौने: (लंबी सांस लेकर) शोर ही तो जीवन है, बबुआ। अब सन्नाटा वापस आ गया।
पुतुल: (बैठते हुए) तो... अब क्या करें?
पौने: (आसमान की तरफ देखते हुए) वही, जो हम सबसे अच्छा करते हैं।
पुतुल: क्या?
पौने: इंतज़ार।
(पुतुल और पौने चुपचाप बैठे हैं, तभी अचानक एक दुबला-पतला लड़का आता है। उसने एक गंदा सा झोला लटकाया हुआ है।)
लड़का: (डरे हुए अंदाज़ में) नमस्ते... क्या आप ही 'वो' दोनों हैं?
पौने: (उछलकर खड़ा होते हुए) आ गया! संदेशा आ गया। बबुआ! उठो। देखो साक्षात् खुशखबरी आई है।
पुतुल: (अपनी जूते ठीक करते हुए) क्या है? क्या ज़ोमैटो वाला है? मेरा पनीर टिक्का लाया है?
पौने: (लड़के के पास जाकर) बेटा, तुम कहाँ से आए हो? क्या तुम 'उनके' पास से आए हो?
लड़का: जी... मैं जीवा साहब के यहाँ से आया हूँ। उन्होंने मुझे भेजा है।
पौने: (उत्साह में) तो? क्या कहा उन्होंने? क्या वे आज आ रहे हैं? क्या वे हमें इस धूल और जूते के संघर्ष से आज़ाद करेंगे?
लड़का: (सिर खुजलाते हुए) वो... असल में... साहब ने कहा है कि आज उन्हें थोड़ा ज़रूरी काम आ गया है। उनकी 'मीटिंग' चल रही है।
पुतुल: (गुस्से में) मीटिंग? क्या वो किसी सरकारी ऑफिस के क्लर्क हैं?
पौने: (चुप कराते हुए) चुप रहो बबुआ! (लड़के से) तो वे कब आएंगे? कल?
लड़का: जी, साहब ने कहा है— "कल पक्का।" कल वो ज़रूर आएंगे। चाहे बारिश हो या धूप, कल वो इस पेड़ के नीचे मिलेंगे।
पुतुल: (लड़के का झोला टटोलते हुए) कुछ एडवांस-वेडवांस लाए हो? खाने को कुछ है? या सिर्फ ये 'कल-कल' वाली लॉलीपॉप ही बाँटते हो?
लड़का: (घबराकर) नहीं जी, मेरे पास तो सिर्फ ये चिट्ठी है... पर साहब ने इसे खोलने से मना किया है।
पौने: (हताशा में) अच्छा, जाओ। उनसे कह देना कि तुमने हमें देखा। हम यहीं हैं... इंतज़ार कर रहे हैं।
लड़का: (भागते हुए) जी! नमस्ते! कल मिलते हैं।
(लड़का चला जाता है। अँधेरा होने लगता है। सन्नाटा और भी गहरा हो जाता है।)
पुतुल: (अपनी सुतली वाली जूते को देखते हुए) तो... कल भी यही ड्रामा?
पौने: हाँ... कल भी।
पुतुल: (एक लंबी सांस लेकर) तो... चलें?
पौने: (बिना हिले) हाँ, चलो।
(दोनों वहीं खड़े रहते हैं। कोई नहीं हिलता। पर्दा धीरे-धीरे गिरता है।)
एक्ट २
(दृश्य: वही पेड़... बस कुछ और पत्तियां, वही धूल। पुतुल अपनी सुतली से बंधे जूते को घूर रहा है और पौने अपनी पुरानी टोपी को झाड़ रहा है।)
पुतुल: (चिड़चिड़ाते हुए) भईया, एक बात बताओ। हम किसका इंतज़ार कर रहे हैं? यह 'जीवा' आखिर है कौन? कोई एमएलए है, या किसी बाबा का चेला?
पौने: (गंभीरता से) चुप करो बबुआ। जीवा... जीवा एक 'उम्मीद' है। वह एक ऐसा 'जुगाड़' है जो हमारी किस्मत की बंद गाड़ी को धक्का लगाएगा।
पुतुल: (गुस्से में) धक्का? मेरे जूते टूट गए, मेरी पसलियां बज रही हैं और वह बंदा 'मीटिंग' कर रहा है। क्या उसने हमें अपॉइंटमेंट दिया था? या हम बस बिना बुलाए बाराती की तरह यहाँ खड़े हैं?
पौने: (सोचते हुए) देखो, मैंने उससे बात की थी। उसने कहा था कि वह आएगा। वह हमें... हमें 'सेटल' कर देगा।
पुतुल: 'सेटल'? मतलब क्या? हमें सरकारी नौकरी देगा? या हमारे राशन कार्ड बनवाएगा? भईया, मुझे तो लगता है जीवा कोई आदमी नहीं, वह बस एक 'अफवाह' है। जैसे मोहल्ले में खबर आती है कि कल नल में पानी आएगा, पर आता है सिर्फ... सन्नाटा!
पौने: (दार्शनिक अंदाज़ में) बबुआ, तुम समझ नहीं रहे। जीवा का मतलब है— 'कल का भरोसा'। अगर वह नहीं है, तो हम यहाँ क्यों हैं? अगर हम यहाँ नहीं हैं, तो हम कहाँ हैं और कौन हैं? क्या हम सिर्फ दो फटेहाल आदमी हैं जो सड़क किनारे टाइम पास कर रहे हैं?
पुतुल: (जूते झटकते हुए) हाँ! हम वही हैं। हम 'टाइम पास' के ब्रांड एंबेसडर हैं। अगर जीवा आ भी गया, तो वह क्या कहेगा? "नमस्ते, सॉरी मैं लेट हो गया, ये लो अपने फटे जूते के लिए फेविक्विक!" क्या इसी के लिए हम धूप में अपनी खाल जलवा रहे हैं?
पौने: (परेशान होकर) तुम बहुत 'प्रैक्टिकल' हो रहे हो। भक्ति में शक्ति होती है। इंतज़ार करना ही हमारा 'धर्म' है। चाहे वह आए या न आए, हमारा काम है खड़े रहना। जैसे ट्रैफिक सिग्नल पर लाल लाइट होने पर सब खड़े रहते हैं, चाहे सामने से कोई गाड़ी न आ रही हो।
पुतुल: (बैठते हुए) तो हम ट्रैफिक सिग्नल हैं? और जीवा ...एक फ्यूज हरी लाइट है जो कभी जलती ही नहीं? वाह! क्या शानदार फिलॉसफी है। भईया, मुझे भूख लगी है। क्या जीवा के पास समोसे होंगे?
पौने: (उदास होकर) सुना है उसके पास बहुत कुछ है। पर शायद समोसे के लिए भी हमें 'एप्लीकेशन फॉर्म' भरना पड़े।
पुतुल: (एक लंबी सांस लेकर) चलो, फॉर्म ही सही। कम से कम कुछ काम तो मिलेगा। पर अगर कल भी वह नहीं आया... तो क्या हम खुद को इस पेड़ से लटका लें?
पौने: (पेड़ को देखते हुए) नहीं, पेड़ बहुत कमज़ोर है। हमारी किस्मत की तरह। टूट जाएगा।
पुतुल: (सिर हिलाते हुए) सही बात है। मरने के लिए भी मज़बूत 'सिस्टम' चाहिए।
(पुतुल और पौने उस सूखे, पतले पेड़ के पास खड़े हैं। पुतुल अपने सुतली वाली जूते को घूर रहा है।... शाम हो गयी)
पुतुल: भईया, मेरा तो मन भर गया। न जीवा आया, न समोसा। चलो, इस पेड़ से लटक जाते हैं। कम से कम 'अमर' तो हो जाएंगे!
पौने: (पेड़ को शक से देखते हुए) विचार तो नेक है, बबुआ। पर फांसी के लिए रस्सी कहाँ है? हमारी किस्मत की तरह वह भी गायब है।
पुतुल: (अपनी कमर की तरफ देखते हुए) अरे, मेरे पैजामे का नाडा है न। यह बहुत मज़बूत है। माँ कहती थी इससे हाथी भी बांध लो तो न टूटे।
(पुतुल अपना नाड़ा खींचकर निकालता है। उसका पायजामा ढीला होकर नीचे खिसकने लगता है, वह उसे एक हाथ से पकड़ता है।)
पौने: (हँसते हुए) वाह! शहीद होने चले हो और पायजामा संभाल नहीं पा रहे? चलो, आज़माते हैं।
(पुतुल पेड़ की एक पतली सी टहनी पर नाडा फेंककर उसे खींचता है। वह पूरी ताक़त लगाता है— चररर... कड़ाक!)
पुतुल: (धड़ाम से ज़मीन पर गिरते हुए) आय्यो! मेरी कमर!
(पेड़ की वह इकलौती टहनी टूटकर पुतुल के सिर पर गिरती है। पौने उसे घूरता है।)
पौने: (पेड़ को देखते हुए) देखा? मैंने कहा था न। इस देश में तो मरने के लिए भी 'क्वालिटी' का सामान नहीं मिलता। पेड़ भी मिला तो चाइनीज।
पुतुल: (मिट्टी झाड़ते हुए और लंगड़ाते हुए खड़ा होता है) साला, सुसाइड भी नहीं करने देते! अब मेरा नाड़ा भी टूट गया और पायजामा भी हाथ में है। अब मैं जीवा का इंतज़ार नंगे पैर और बिना नाड़े के करूँगा? यह तो 'इंटरनेशनल' बेइज्जती है!
पौने: (प्यार से उसका पायजामा ऊपर करने में मदद करते हुए) फिक्र मत करो। कल हम एक मज़बूत रस्सी लाएंगे। एक असली 'मेड इन इंडिया' वाली रस्सी!
पुतुल: (उदास होकर) और अगर कल भी जीवा नहीं आया?
पौने: (आसमान की ओर देखते हुए, जहाँ चाँद निकल आया है) तो हम फिर से कोशिश करेंगे। अगले पेड़ पर।
(पौने और पुतुल पेड़ के पास खड़े हैं। अचानक दूर से घिसटने और गिरने की आवाज़ आती है। लच्छू और लकिया मंच पर गिरते-पड़ते प्रवेश करते हैं। लकिया के गले में रस्सी अभी भी है, पर वह अब बहुत छोटी है। लकिया रुकता है और लच्छू उसके पीछे आकर उससे टकरा जाता है।)
लच्छू: (चिल्लाते हुए, अंधों की तरह हाथ मारते हुए) अरे! कौन है? दीवार आ गई क्या? ! ओए गूंगे के अवतार! रास्ता बता या मुझे गड्ढे में गिराएगा?
पौने: (हैरान होकर) अरे! यह तो वही 'सेठ जी' हैं! पर इनकी हेडलाइट... मतलब आँखें कहाँ गईं?
पुतुल: ( लकिया को गौर से देखते हुए) और यह तो अब कुल्फी की तरह जम गया है। न आवाज़, न सांस। सेठ जी, क्या इसका रिचार्ज खत्म हो गया?
लच्छू: (रोते हुए अंदाज़ में) कौन बोल रहा है? क्या तुम इंसान हो या कोई भूत? मुझे कुछ नहीं दिखता! कल मैं दुनिया को अपनी जेब में लेकर घूमता था, आज मुझे अपनी नाक भी नहीं दिख रही!
पुतुल: (लच्छू के पास जाकर उसका चश्मा चेक करते हुए) सेठ जी, आपकी आँखें तो ठीक लग रही हैं, बस अंदर का बल्ब फ्यूज हो गया है। और यह लकिया ? यह क्यों नहीं बोल रहा? इसे 'मौन व्रत' रखने का शौक चढ़ा है क्या?
लच्छू: (गुस्से में कोड़ा हवा में लहराते हुए) वह मर चुका है! अंदर से! वह अब 'म्यूट' मोड पर है। मैंने उसे इतना 'सोचने' को कहा कि उसका सॉफ्टवेयर ही उड़ गया। अब वह सिर्फ एक ज़िंदा लाश है, बिना इन्टरनेट का फोन, जो मेरा सूटकेस ढोती है।
पौने: (दया भाव से) पर सेठ जी, यह सब हुआ कैसे? कल तो आप बहुत रौब झाड़ रहे थे।
लच्छू: (चीखते हुए) कल? परसों? नर्सों? वक्त का क्या भरोसा! इस अंधेरे में सब एक जैसा है। जैसे बिना बिजली कोई गाँव! बस अंधेरा ही अंधेरा! उठ! मुझे ले चल... जहाँ कम से कम ठोकर न लगे।
(लकिया बिना एक शब्द बोले, धीरे से उठता है। वह किसी टूटी हुई मशीन की तरह हिल रहा है।)
पुतुल: (लच्छू का हाथ पकड़कर) अरे सेठ जी, जाते-जाते कुछ तो बताते जाओ। जीवा कब आएगा?
लच्छू: (पागलों की तरह हँसते हुए) जीवा? वह भी अंधा होगा! या शायद उसे भी रास्ता नहीं मिल रहा। इस दुनिया में सब अंधे हैं, बस कुछ के पास चश्मा है और कुछ के पास लाठी! चलो ! ऐ! ऐ!
(लकिया और लच्छू एक-दूसरे से टकराते हुए, लड़खड़ाते हुए मंच से बाहर जाते हैं। लच्छू की आवाज़ दूर से आती है— "बचाओ! कोई है?")
पुतुल: (एक लंबी सांस लेकर) भईया, ये तो हमसे भी ज़्यादा गए-गुज़रे निकले।
पौने: (उदास होकर) हाँ बबुआ। वक्त सबको 'अंधा' और 'गूंगा' बना देता है। बस इंतज़ार, उम्मीद और एक दुसरे का साथ ही है जो हमें ज़िंदा रखता है। दुनिया में और कुछ भी नहीं बस... दो वक़्त साथ गुजार लो, कुछ कह-सुन लो और क्या.
(दृश्य: रात का समय। चाँद पेड़ की सूखी टहनी के पीछे से झाँक रहा है। लच्छू और लकिया के जाने के बाद चारों तरफ सन्नाटा है। पुतुल अपनी सुतली से बँधे जूते को घूर रहा है।)
पुतुल: (थककर) भईया, मेरा तो 'सिस्टम' हैंग हो गया है। लच्छू अंधा हो गया, लकिया गूँगा हो गया... और हम? हम बस यहाँ खूँटे से बँधी भैंस की तरह खड़े हैं।
पौने: (गंभीरता से) भैंस नहीं, बबुआ। हम 'गवाह' हैं। इस खाली सड़क के, इस सूखे पेड़ के और उस जीवा के... जो शायद गूगल मैप पर रास्ता भटक गया है।
पुतुल: (अचानक खड़े होकर) छोड़ो ये सब! मुझे आज़ादी चाहिए। मैं जा रहा हूँ। यह इंतज़ार मेरा गला घोंट रहा है।
पौने: (उदास होकर) कहाँ जाओगे? अगले मोड़ पर भी यही पेड़ मिलेगा। और वहाँ भी तुम अपने जूते ही ठीक कर रहे होगे।
पुतुल: (पेड़ को देखकर) तो फिर वही करते हैं। आखिरी कोशिश। चलो, लटक जाते हैं।
(पुतुल अपना फटा हुआ अंगोछा निकालता है। वह उसे रस्सी की तरह मरोड़ता है।)
पौने: रुको! पहले चेक करो। मज़बूत है?
पुतुल: (अंगोछे को दोनों तरफ से खींचते हुए) बिल्कुल! 'प्योर कॉटन' है भईया!
(पुतुल पेड़ की उस टूटी हुई टहनी पर अंगोछा डालता है और लटकने का नाटक करता है। जैसे ही वह वज़न डालता है— चरररर... धाड़!)
पुतुल: (ज़मीन पर गिरते हुए) अरे मोरी मईया! मेरा अंगोछा दो टुकड़े हो गया! और ये साला पेड़ है या कागज़ का खिलौना?
पौने: (हँसते हुए) बबुआ, लगता है ऊपर वाले को भी तुम्हारा ड्रामा पसंद आ रहा है। वह तुम्हें अभी अपने पास नहीं बुलाना चाहता। शायद उसे भी 'एंटरटेनमेंट' की कमी है।
पुतुल: (फटा हुआ अंगोछा उठाकर) अब मैं क्या करूँ? न जीवा आया, न मौत आई, जूता तो गया ही था और अब तो मेरा अंगोछा भी गया। अब ठंड लगेगी तो क्या ओढूंगा?
पौने: (उसके कंधे पर हाथ रखकर) मेरा कोट ले लेना। हम एक-दूसरे को गर्मी देंगे। कल... कल हम एक असली मज़बूत रस्सी लाएंगे। पीली वाली, जो ट्रक बांधने के काम आती है।
पुतुल: (आँसू पोंछते हुए) और अगर कल भी वह नहीं आया?
पौने: (आसमान की ओर देखते हुए) तो हम फिर से यही ड्रामा करेंगे। आखिर 'शो मस्ट गो ऑन'!
पुतुल: (एक लंबी उबासी लेकर) ठीक है। तो... अब सच में चलें?
पौने: (बिना हिले) हाँ, चलो।
(दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, लेकिन अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिलते। लाइट धीरे-धीरे बंद होती है। सिर्फ पुतुल की सुतली वाली जूते पर एक स्पॉटलाइट चमकती है।)
-- पर्दा गिरता है –
नोट : यह नाटक आयरिश नाटककार सैमुएल बेकेट के १९५२ में प्रकाशित नाटक ‘वेटिंग फॉर गोडो’ (Waiting for Godot) का भारतीय परिपेक्ष्य में हास्य रूपान्तरण है| इस रूपान्तरण में किरदारों को भी अलग नाम दिए गए हैं जो भारतीय भाषा के अनुरूप हैं| इनका विवरण इस प्रकार है:
1. पौने (Vladimir)
'पौने' शब्द अक्सर 'पौना' (3/4) या 'अधूरा' होने का अहसास दिलाता है। पौने हमेशा ज्ञान, तर्क और दर्शन की बातें करता है, लेकिन वह अंदर से खाली और अधूरा है। वह जानता है कि बिना 'जीवा' (Godot) के उसका अस्तित्व पूरा नहीं होगा। यह नाम दर्शाता है कि इंसान चाहे कितना भी बड़ा ज्ञानी बन जाए, वह परमात्मा या सत्य के बिना हमेशा 'पौना' ही रहता है। पौने 'धर्म', 'कर्म' और 'अस्तित्व' जैसी गहरी बातें करता है, जबकि पुतुल उसे अपनी भूख और फटे जूते के धरातल पर वापस खींच लाता है।
2. पुतुल (Estragon)
'पुतुल' का अर्थ होता है 'कठपुतली' (Puppet)। पुतुल शरीर के कष्टों, भूख और टूटे जूते के स्ट्रगल से परेशान रहता है। वह परिस्थितियों के हाथों की कठपुतली है। पुतुल नाम यह दिखाता है कि आम आदमी अक्सर अपनी शारीरिक ज़रूरतों और समाज के थपेड़ों के हाथों नाचता रहता है। वह आज़ाद होना चाहता है, पर उसकी डोर किसी और के हाथ में है। पुतुल अपनी तंग और टूटे जूते से जूझता रहता है, जो आम आदमी के रोज़मर्रा के शारीरिक कष्टों और संघर्ष का प्रतीक है।
3. लच्छू (Pozzo)
लच्छू नाम में एक 'रौबीले ज़मींदार' जैसी ध्वनि है। यह उस सामंती सोच को दर्शाता है जो दूसरों पर हुक्म चलाना अपना अधिकार समझता है। लच्छू वह है जो भौतिक सुखों में अंधा है (जैसे एक्ट 2 में लच्छूअंधा हो जाता है) उसे लगता है कि वह दुनिया का मालिक है, पर अंत में वह भी समय की मार से नहीं बच पाता।
4. लकिया (Lucky)
यह नाम सबसे बड़ा कटाक्ष है। जिसका नाम 'लकिया' है, उसके गले में रस्सी बंधी है और वह गधों की तरह बोझ ढो रहा है। यह उस टैलेंट या मज़दूर वर्ग को दर्शाता है जिसकी शान और बुद्धिमत्ता जो उसके लम्बे भाषण में दिख रही थी, को समाज ने कुचल दिया है। वह चुपचाप सब सहता है, क्योंकि उसकी अस्तित्व अब सिर्फ दूसरों की सेवा करने में बचा. एक्ट २ में, लच्छू अंधा और लकिया गूँगा हो जाता है, जो समय की क्रूरता और सत्ता के पतन को दिखाता है।
5. जीवा
'जीवा' शब्द सीधे 'जीवन' से जुड़ा है। जीवा का इंतज़ार असल में 'जीवा' यानी जीवन के सही अर्थ का इंतज़ार है। इंसान पूरी उम्र इंतज़ार करता है कि 'जीवा' आएगा और उसे दुखों से मुक्ति दिलाएगा। जीवा वह 'परम तत्व' है जो कभी पकड़ में नहीं आता, पर जिसके बिना पुतुल और पौने यानि हम और आप, हम इंसान एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाते।
यह नाटक हमें बताता है कि हम सभी पौने और पुतुल की तरह आम इंसान हैं .... एक अधूरा इंसान पौने या परिस्थितियों की कठपुतली पुतुल, जो अपने टूटे जूते के साथ स्ट्रगल करते हुए उस जीवन के सार (जीवा) का इंतज़ार कर रहे होते हैं, और दुनिया की झूठी चमक (लच्छू) और कुचली हुई प्रतिभा (लकिया) हमारे सामने से हर रोज गुज़रती रहती है ...और फिर भी हम... डरे सहमे... जीवा का इंतज़ार करते रहते है क्योंकि हम कुछ और कर ही नहीं सकते... कर सकते हैं तो बस... इंतज़ार... जीवा तुम कब आओगे?
सुप्रिया सिंह
सहा० आचार्य, अंगेजी साहित्य विभाग, वसंत कन्या महाविद्यालय
सम्बद्ध : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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