कुली प्रथा नाटक : प्रतिरोध, प्रतिबंध और प्रवासी साहित्य
- कौसर साबिदा सुल्ताना
शोध सार : प्रस्तुत शोध-पत्र औपनिवेशिक भारत में हो रहे साहित्यिक प्रतिबंधों के विभिन्न पक्षों को उजागर करने और प्रवासी साहित्य के माध्यम से भारतीय सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के अध्ययन पर केंद्रित है। साथ ही, तत्कालीन स्थिति तथा भारतीय जनमानस और प्रवासी जनता पर पड़ रहे उसके प्रभावों को भी रेखांकित करता है। ज्ञातव्य है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की ऐतिहासिक विकास प्रक्रिया को गति प्रदान करने में प्रवासी हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रवासी हिंदी साहित्य में ‘कुली प्रथा’ नामक नाटक एक मार्मिक कृति है| नाटक की मूल विषय-वस्तु ब्रिटिश शासन के दौरान प्रवासी भारतीयों के जीवन संघर्षों का चित्रण हैI हज़ारों की तादाद में भारतीय निवासियों को धोखे से विदेश भेजे जाने के अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने के साथ कुली व्यवस्था की क्रूरता, मजदूरों की खरीद-बिक्री, पीड़ा को दर्शाने के कारण ब्रिटिश अधिकारियों ने नाटक से रोष प्रकट किया। स्वराज और असहयोग जैसी विचारधारा का वाहक होने के कारण ब्रिटिश सत्ता को संदेह था कि यह नाटक जनता में विद्रोह की आग को और भड़काएगा। इसलिए इस नाटक को खतरनाक बताते हुए आशंकित विद्रोह की आग को बुझाने के प्रयास में 1917 ई. से 1920 ई. की अवधि के अंदर ही इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। 1922 ई. में ‘चांडूभाई कीलचंद्र’ मेहता’ द्वारा इस नाटक को मंच पर लाने या पुन: प्रकाशित करने का प्रयास किया गया तो उन प्रयासों को भी सरकार ने विफल कर दिया, उसके प्रदर्शन पर भी रोक लगा दी और उसे प्रतिबंध कर दिया। इस नाटक में प्रवासी भारतीयों का दर्द, संघर्ष और अत्याचारों का इतिहास दर्ज था इसमें ब्रिटिश राज की कड़ी निंदा की गई, इसलिए उसी वर्ष इसे ज़ब्त कर लिया गया और सेंसरशिप के नाम पर संपूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया। ऐसे में यह शोध पत्र अंग्रेजों द्वारा किये गये शोषण के विभिन्न रूपों और उस शोषण के खिलाफ विकसित हो रहे आंदोलन के भारतीय और प्रवासी पक्षों को दर्ज करने तथा सकारात्मक दिशा प्रदान करने वाली इन पुस्तकों के माध्यम से उस दौर के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य को समझने का एक प्रयास है। साथ ही, भारतीय जनमानस पर इन पुस्तकों के व्यापक प्रभाव को भी समझने का प्रयास है, जिसकी वजह से इन पुस्तकों को औपनिवेशिक प्रतिबंध संस्कृति का शिकार होना पड़ा।
बीज शब्द : औपनिवेशिक, प्रवासी, राष्ट्रीय आंदोलन, प्रतिबंध, नाटक, रंगमंच, गिरमिटिया मजदूर, संघर्ष, सितम।
मूल आलेख : अपनों से दूर पराधीन वतन की चिंता और अपने लोगों की याद में प्रवासी साहित्य उन भारतीय मूल के लेखकों की कलम से निकला है, जो परदेस में बस तो गए पर अपनी जड़ों को नहीं भूले। इन रचनाओं में अपने देश से बिछड़ने का दर्द, जबरन श्रम करने को विवश और विदेशी संस्कृति एवं अपने संस्कारों के बीच तालमेल बिठाने की जद्दोजहद स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। गुलामी के दौर में जब जीविका का प्रलोभन दिखाकर भारतीय मजदूरों को मॉरिशस और फ़िज़ी जैसे देशों में ले जाया गया, तब उन्होंने अपनी मातृभाषा हिंदी में वहाँ के वातावरण और भारत की पुरानी यादों को साहित्य में पिरोया। विदेशी दासता और ग़ुलामी की पीड़ा ने साहित्यकारों को लेखनी उठाने पर मजबूर किया। जब देश पराधीनता की आग में झुलस रहा था, तब जनता को मानसिक रूप से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रेरित करने हेतु नाटकों को एक सशक्त माध्यम बनाया गया।
हिन्दी नाट्य जगत के इतिहास में भारतेन्दु काल, प्रसाद काल और पारसी रंगमंच के लेखकों ने जनमानस में देशभक्ति की लौ जगाने के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया| “भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी नाटक को एवं नाट्य- कला को जन्म दिया, प्रसाद ने उसे एक नई दिशा दी, विषय और शैली की दृष्टि से उसे चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया । प्रसाद ने पूरे हिंदी साहित्य में जागरण की सांस्कृतिक चेतना की, राष्ट्रीय भावना की, करुणा और प्रेम की, उदात्त मानवीय भावों और आदर्शों की लहर सी दौड़ा दी। उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने नाटक ही नहीं, कविता, निबंध, कहानी, उपन्यास, आलोचना सभी माध्यमों से हिंदी साहित्य को नयी शैली-शिल्प, नये रूप दिए। प्रसाद के नाटक हिंदी नाट्य- साहित्य में एक नया अध्याय खोलते हैं|”¹ तत्कालीन अधिकांश नाटककारों ने दर्शक और पाठक में नाटक के प्रति रुचि पैदा करने के लिए ख़ुद पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, संपादन और नाटक मंडलियाँ बनाकर इसे एक तरह के नया जन- जागरण आंदोलन का रूप दे दिया।“पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से रंगमंच का राष्ट्रीय स्वरूप बनाने के पीछे भारतेंदु और उनके सहयोगियों की यही कोशिश रही है।”² वास्तव में अपने समय के शासन व्यवस्था से वैचारिक विरोध को अभिव्यक्ति देने के लिए नाटक लेखन और रंग-मंचीय गतिविधियों को विस्तार देना नाटकों का प्रमुख उद्देश्य था और इनकी प्रकाशित अथवा मंचित होने की सूचना पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा जनता तक पहुंचाया जाता था।
स्वाधीन भारत की चाहत की लड़ाई में भारतीय साहित्य के साथ-साथ प्रवासी साहित्य ने भी प्रतिबन्ध राजनीति का स्वाद चखा था। प्रवासी प्रतिबंधित साहित्य की जड़े ग़ुलामी के उस दौर अर्थात् औपनिवेशिक काल में छिपी हैं, जब भारतीय साहित्य सरकारी निगरानी में प्रकाशित होता था। सरकार विरोधी तथा स्वतन्त्रता संग्राम को प्रेरित करनेवाली किसी भी विधा की रचनाओं में पाबंदी लगा दी जाती थी। “इस परिस्थिति में इस युग में 1857 संबंधी ऐसे नाटक प्रणीत हुए जो खेले तो गये परन्तु छाप कर प्रकाशित नहीं किये गये, ऐसी कविताएँ भी प्रणीत हुई जो कवि सम्मेलनों में खुले आम पढ़ी तो गयीं परन्तु छापी नहीं गयीं। ऐसी जो रचनाएं छापी गयीं के सरकार द्वारा तुरन्त जब्त भी कर ली गयीं जिससे उनके लेखकों और प्रकाशकों को महान् आर्थिक हानि उठानी पड़ी।”³ उस कठिन समय में ‘प्रवासी प्रतिबंधित साहित्य’ आजादी की एक नई आवाज़ बनकर उभरा। जब अंग्रेजी हुकूमत भारत में क्रांतिकारी विचारों के प्रकाश करने के प्रयासों पर पाबंदी पर पाबंदी लगा रही थी तब विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों ने इन रचनाओं को प्रकाशित करने की जिम्मेदारी संभाली। ब्रिटिश शासन की कठोर नीतियों के खिलाफ लिखी गई इन किताबों और लेखों को चोरी-छिपे प्रकाशित और प्रचारित-प्रसारित किया गया। इस प्रकार के साहित्य ने न केवल आज़ादी की लड़ाई को नई धार दी, बल्कि समाज में हो रहे अन्याय और शोषण को भी सबके सामने बेनक़ाब किया। “सन 1842 में अंग्रेजों की अफगान से हार फिर सन 1857 ई. के जन विद्रोह ने अग्रेजों को विचलित कर दिया। ब्रिटेन विश्व के समक्ष अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाये रखना चाहता था। अंग्रेज भारत में अपनी पकड़ और कमजोर नहीं करना चाहते थे परिणामतः उन्होंने भारत में नये-नये दमनकारी कानून बनाने शुरू कर दिये थे। अग्रेजों द्वारा बनाये गये दमनकारी कानून में से एक सन् 1876 का नाटा प्रदर्शन अधिनियम था, जिसने उभरते हुए रंगमंच को अपने शिकंजे में ले लिया।”⁴ तत्कालीन कला और साहित्य की विभिन्न विधाएँ औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की दमनकारी नीतियों का पर्दाफाश कर रही थी। साथ ही स्वाधीनता आन्दोलन के लिए जरूरी सामूहिक लोक-चेतना का विस्तार भी कर रही थी।
प्रतिबंध प्रक्रिया के अंतर्गत समाचार पत्र, पत्र-पत्रिकाएं, नाटक, नुक्कड़ नाटक, कविताएँ, पोस्टर, पैम्फलेट सहित अन्य मुद्रित साहित्यिक रचनाएँ तथा उन्हें प्रकाशित करने वाले प्रेस भी आते थे। विभिन्न ‘प्रेस अधिनियमों जैसे- 1898 ई. के एक्ट IV द्वारा भारतीय दंड संहिता (धारा 124-ए, 153-ए, 505) एवं दण्ड प्रक्रिया संहिता (धारा 108) को लागू किया जाता था। ब्रिटिश सरकार किन्हीं निश्चित कारणों से यह विश्वास करती थी कि भारतीय प्रेस अधिनियम (1910) के पारित होने के बाद नाटक लेखकों और नाटक मंचन करनेवाली संस्थाओं ने नाटक प्रदर्शन के माध्यम द्वारा राजद्रोहपूर्ण विचारों तथा स्वराज की विचारधारा का प्रसार तीव्र गति से करना प्रारंभ किया। “ड्रोमेटिक परफारमेंस एक्ट, 1876 (1876 का XII) द्वारा स्थानीय सरकारों को इन परिस्थितियों से निपटने की सारी शक्तियाँ दी गई हैं। तदनुसार मैं लेफ्टिनेंट गवर्नर का इन प्रावधानों की ओर ध्यान दिलाते हुए सुझाव देना चाहता हूँ कि वे इसके माध्यम से इस (राजद्रोह) प्रवृति को रोकने में सफल होंगे।”⁵
प्रवासी भारतीयों के बीच आज भी ‘रुकमिणी-होल्लास’ जैसे लोकगीत गाए जाते हैं जिनमें पूर्वजों की दर्द भरी गाथा है। आधुनिक समय में जहाँ नयी पीढ़ी अपनी जड़ें और पुरानी संस्कृति भूलती जा रही है ऐसे वातावरण में इस तरह के गीत एक आश्वासन की तरह प्रतीत होते हैं-
“और जहाज़ में मिलकर आए, और भी नर-नारी
नौकरी के कारण आए, छोड़ पिता महतारी
×××
दुई बजे जब घंटा बाजे, जाग उठे नर-नारी
कोई बनावे आलू चौखा, बैंइगन की तरकारी
चार बजे जब घंटा बजे तैयार भए नर-नारी ||”⁶
इस गीत में गिरमिटिया मजदूरों द्वारा झेली गई परेशानियाँ, आर्थिक तंगी और अन्यायपूर्ण रूप से नियत कार्य समय से कहीं अधिक घंटों तक काम करने के लिए विवश कर देने के बारे में विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है। इस संबंध में ‘तोताराम सनाढ्य’ अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि- “सब लोग नित्य प्रातःकाल उठाये जाते हैं और सबको रोटी तैयार करके पाँच बजे खेत पर पहुँचना होता है। जो स्त्रियाँ बच्चे वाली होती हैं, वे अपने बच्चे को खेत पर ले जाती हैं। लगभग प्रत्येक मनुष्य को 1200 फूट से ले कर 1300 फूट लंबी और 6 फूट चौड़ी गन्ने की लेन कुदाली से दिन भर को नराने के लिए दी जाती है”⁷
यह प्रवासी साहित्य तब भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का विदेशी ठिकाना बन गया जब अंग्रेज अफसर भारतीय लेखकों की हर गतिविधि पर नज़र गड़ाए बैठे थे। विशेष रूप से उन रचनाओं पर जो क्रांति की मशाल जलाती थी। ऐसे में प्रवासी भारतीयों द्वारा कई ऐसे लेखों को विदेशी धरती से प्रकाशित करके भारत भेजा गया था। जब विदेशों में भारत की आज़ादी के लिए आंदोलन की गति तेज हो गई और वहाँ से भारी संख्या में क्रांतिकारी साहित्य भारत भेजा जाने लगा तो ब्रिटिश सरकार ने इसे रोकने के लिए ‘सी’ कस्टम्स एक्ट का उपयोग किया। इस नियम के अनुसार सरकार विदेश से भारत में आने वाली या भारत से बाहर विदेश जाने वाली किसी भी चीज़ को रोक सकती थी या जब्त कर सकती थी। इस ‘चीज़’ शब्द की आड़ में छपी हुई किताबें और पत्रिकाएं भी शामिल थी। “औपनिवेशिक प्रशासन ने भारत में मुद्रित साहित्य पर व्यावहारिक नियन्त्रण और प्रतिबन्ध की एक बड़ी शक्ति सी कस्टम्स एक्ट, 1878 द्वारा प्राप्त की। सी कस्टम एक्ट, 1878 के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार को भारत के बाहर से भीतर आने तथा भीतर से बाहर जाने देने से रोकने तथा जब्त करने के असीमित अधिकार प्राप्त हो।”⁸ इतना ही नहीं, ‘सी कस्टम्स एक्ट, 1878’ के नियम 181-A और 181-C सरकार को यह अधिकार देते थे कि वे किसी भी ऐसे पत्र-पत्रिका या प्रकाशित सामग्री को भारत में आने या बाहर जाने से रोक सकें और उसे नष्ट कर सकें, जिस पर उन्हें शंका हो कि उसमें कुछ ऐसा छपा है जिसके लिए भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 124-A के तहत सजा मिल सकती है।
यह साहित्य सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं था बल्कि जन जागृति का एक सैलाब था। इस प्रकार की रचनाएँ ब्रिटिश सेंसरशिप के बावजूद भूमिगत रूप से फैली, जिनके मूल स्वर कुली प्रथा की विवशता, किसान शोषण का चित्रण और स्वराज्य की मांग प्रमुख थी। आज यह साहित्य हमारे लिए स्वतन्त्रता संग्राम कालीन साहित्यिक इतिहास की अमूल्य धरोहर हैI यह हमें याद दिलाता है कि भले ही प्रवासी भारतीय सात समंदर पार के निवासी थे लेकिन उनका अंतरमन भी अपने देश की स्वतंत्रता के लिए तड़प रहा था। यह उन लेखकों के संघर्ष की कहानी है जिन्होंने पाबंदियों के बावजूद सच का साथ देना नहीं छोड़ा। प्रवासी भारतीयों का यह योगदान भारतीय इतिहास का एक ऐसा पन्ना है जो हमें उनकी मजबूत राष्ट्रभक्ति और अटूट साहस का परिचय देता है।
गौरतलब है कि, प्रवासी साहित्य में ‘कुली प्रथा’ नामक नाटक एक दर्द-भरी मार्मिक कृति है। हिंदी साहित्य के इतिहास में स्वाधीनता संग्राम कालीन प्रत्येक घटना और संघर्ष को रेखांकित किया गया है। ‘कुली प्रथा’ नाटक भी इसी तथ्य को प्रमाणित करता हैं। यह ब्रिटिश राज के समय भारत से फ़िज़ी, मॉरीशस जैसे देशों में गए मजदूरों की दर्द-भरी कहानी कहता है। गिरमिटिया भाइयों का शोषण, गुलाम जैसी जिंदगी और अंग्रेजों की बेरहमी को साफ दिखाता है। सुप्रसिद्ध लेखिका ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ के पति लेखक ‘ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान’ ने 19वीं-20वीं सदी में इन्ही प्रवासी भारतीयों के जीवन परिस्थितियों से प्रेरणा लेकर 1913 ई. में ‘कुली प्रथा’ नाटक की रचना की और 1916 में यह प्रकाशित हुआ।
लाखों भारतीयों को धोखे से विदेश भेजे जाने के जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने के साथ ही कुली व्यवस्था की क्रूरता, मजदूरों की खरीद-बिक्री, उनकी पीड़ा और संघर्ष को दर्शाने के कारण ब्रिटिश अफसरों को यह नाटक चुभ गया। यह नाटक प्रताप प्रेस के द्वारा प्रकाशित होने के कुछ समय के बाद ही अपनी क्रांतिकारी विचारधारा और बढ़ती जन-प्रियता के कारण अंग्रेजी हुकूमत की आँखों में चुभने लगा जिसके परिणामस्वरूप इसे विद्रोह भड़काने वाला मानकर प्रतिबंधित कर दिया। क्योंकि यह साधारण लोगों के बीच में बहुत ही अधिक लोकप्रिय हो रहा था। ज़ब्त होने के बावजूद जो प्रतियाँ बची थीं बंटती रहीं। 1917 ई. में कुछ उत्साही कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसे कांग्रेस अधिवेशन में प्रतिबंधित होने के बावजूद भी बाँटा। इसी बात को मुद्दा बनाकर वहाँ भी इसे एक ‘राजद्रोह का साक्ष्य’ करार देकर इस नाटक को अंग्रेज़ सरकार ने ज़ब्त कर लिया। 1922 ई. में ‘चांडूभाई कीलचंद्र मेहता’ द्वारा इस नाटक को मंच पर लाने या पुन: प्रकाशित करने की कोशिश की गई तो अंग्रेजों ने उस पर भी रोक लगा दी और सेंसरशिप के नाम पर प्रतिबंधित कर दिया। इसी बग़ावत की आग को दबाने की कोशिश में 1917 ई. से 1920 ई. की अवधि के भीतर इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया और इस तरह सेंसरशिप के नाम पर इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को पूर्णतः मिटा देने का प्रयास किया गया।
लक्ष्मण सिंह ने इस नाटक के माध्यम से अत्यंत साहस के साथ ब्रिटिश शासन की भयावहता और क्रूरता को जगत-प्रसिद्ध किया है। वे दर्शाते हैं कि किस प्रकार भोले-भाले ग्रामीणों को बिचौलियों द्वारा अनेक छल-कपट में उलझाकर उन्हें दासता की बेड़ियों में जकड़ लिया जाता था। लेखक ने शोषण की इस पूरी प्रक्रिया का सजीव चित्रण किया है। इस तथ्य की वास्तविकता का आभास ‘कुली-प्रथा’ नाटक के शीर्षक से ही हो जाता है। फ़िज़ी या किसी अन्य नए उपनिवेश में खेती-बाड़ी के लिए मजदूर ले जाना एक बात है लेकिन सीधे-सादे लोगों को बहकाकर बंधुआ मजदूर बनाना और गुलमों की तरह व्यापार करना इंसानियत को ताक पर रखना अन्याय की चरम सीमा ही है।
‘कुली प्रथा’ नाटक में तत्कालीन गिरमिटिया समुदाय में हो रहे राजनीतिक,सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का विस्तृत वर्णन तथा गिरमिटिया मजदूरों की समस्याओं को उजागर करने के साथ- साथ उनके अधिकारों के हनन, धोखाधड़ी और ज्यादतीयों को भी दर्शाता है। अंग्रेजों द्वारा की जा रही आर्थिक लूट की वजह से भूख से विलेख और आर्थिक बदहाली से त्रस्त साधारण भारतीय जनता का भूख की आग मिटाने के लिए सात समुंदर पार जहाज पर चढ़कर जीविकोपार्जन के लिए अपने देश और परिवार को छोड़कर जाने का दर्दभरा ज्वलंत इतिहास इस नाटक में दर्ज है।
औपनिवेशिक शासन ने भारतीय उद्योग धंधों और शिल्प कलाओं के अस्तित्व का विनाश करने के साथ-साथ भिन्न-भिन्न प्रकार के कर वसूलने की प्रक्रियाओं के माध्यम से भारतीय जनता की आर्थिक अवस्था को बेहाल कर दिया। इसका मूल कारण अपनी स्वार्थ सिद्धि तथा अपने देश को समृद्ध करना था। विदेशी यंत्रों से निर्मित वस्तुओं के बाजार में पदार्पण के कारण भारतीय किसानों और कारीगरों के जीविकोपार्जन में विघ्नता उत्पन्न होने लगी और देश में उद्योगों की अभिवृद्धि में रुकावट की स्थिति पैदा हो गई। इसलिए उन्हें अन्यत्र कहीं काम नहीं मिल रहा था। कारीगरों, किसान और शिल्पकारों को आजीविका के लिए बहुत बड़ी तादाद में विदेश जाकर मज़दूरी करके अर्थ उपार्जन का सहारा लेना पड़ा। ‘कुली प्रथा’ नाटक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के समय भारतीय जनता की आर्थिक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अवनति की दयनीय दशा का क्रमशः बिगड़ता हुआ स्वरूप स्पष्टतया दृष्टव्य है।
इस नाटक को लिखकर नाटककार लक्ष्मण सिंह ने मानो गिरमिटिया समुदाय के प्रति अपने उत्तरदायित्व का पालन किया। 3 दृश्यों में विभाजित नाटक की कथावस्तु मुख्य पात्र दंपति भोला-कुंती और उनके पुत्र शंकर के इर्द-गिर्द घूमती है। नाटक का प्रारंभ भारतीय लोक नाट्य परम्परा से प्रेरित नटी और सूत्रधार के संवाद से होता है। अमेरिका में उच्च शिक्षा का सपना देख रहे युवक शंकर को किस तरह अध्ययन का लालच देकर, गिरमिटिया मजदूर बनाकर धोखे से ‘बनवारी लाल’ द्वारा फ़िज़ी भेज दिया जाता है। यह नाटक उसी की मार्मिक गाथा है। बनवारी लाल जैसे लोभी और मौकापरस्त भारतीय दलालों ने मात्र कुछ रूपयें अर्जन की लालच में अपने ही देशवासियों के साथ अन्याय करने के लिए ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था। सनातनी संस्कारों वाले दम्पति भोलाराम और कुन्ती के बेटे शंकर को घर से भागे कई साल बीत चुके हैं उसका कोई अता-पता नहीं मिला। कुछ उदास कुछ परेशान माँ-बाप तीर्थ यात्रा के लिए जगन्नाथपुरी में घूम रहे थे। उधर आरकटियों का एक दल ऐसे भटके लोगों को अपने जाल में फँसाने में जुटा हुआ है ताकि उन्हें कुली बनाकर फीजी भेजा जा सके। भोला और कुंती पुत्र को ढूँढने के सिलसिले में इन भारतीय दलालों के झांसे में पड़ जाते हैं और फीजी देश के लिए निकल पड़ते हैं। वहां बीमारी और वृद्धता के कारण अच्छे से काम करने में असमर्थ भोला को बंद कोठरी में रखकर इंस्पेक्टर इतना मारता है कि उसकी मौत हो जाती है। भोला की मृत्यु के स्पष्टीकरण में उसको जंगली जानवर द्वारा खा जाने की बात कही जाती है| इस घटना के माध्यम से भारतीय मजदूरों के प्रति अंग्रेज़ मुनाफा अर्जन के लिए किस प्रकार की क्रूरतापूर्ण हथकंडे अपनाते थे और कितनी यातनाएँ देते थे इस विषय को लेखक ने उजागर किया है। इसी क्रम में कुंती का प्रसंग आता है जिसमें नवजात शिशु के जन्म के बाद प्रसव पीड़ा के बावजूद उसे उसी दिन मार पीट कर काम करने के लिए विवश किया जाता है और उसके बच्चे की भी निर्मम हत्या कर दी जाती है। इन सब घटना के उपरांत इंस्पेक्टर द्वारा प्रेम प्रस्तावना से कुंती बौखला जाती है।
“फोड़ दूंगी उँगलियो से मैं तेरी आँख जभी।
खिंच लेऊँगी तेरे पेट की आंते सभी।
रगड़ दूंगी एड़ियों से निचे तेरा हृदय भी।
बस दुखमय इस जगत में मैं शांति पाऊँगी तभी।“⁹
इस घटना के माध्यम से अंग्रेजों द्वारा किए गए स्त्री शोषण और शून्य सहानुभूति के तथ्य को बेनक़ाब किया गया है। इस नाटक में ब्रिटिशकालीन गिरमिटिया समुदाय में फैले अन्याय अत्याचार की ज्वलंत इतिहास दर्ज है।
नाटक की समाप्ति किंचित सुखद है जहाँ शंकर अपनी माँ से मिलता है और अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहता है – “शंकर: माँ, मैंने अमेरिका जाने की इच्छा से घर छोड़ा। दो वर्ष तक इधर-उधर घूमता रहा। आरकाटियों ने धोखा दे यहाँ भेज दिया। अब इन महाशय ने रुपए भर मुझे गिरमिट से छुड़ाया है। पर माँ, तुम यहाँ कैसे आईं?”10 इस संबंध में ‘सत्येन्द्र कुमार तनेजा’ ने ‘सितम की इंतिहा क्या है’ की भूमिका में लिखा हैं, “अवसर मिले तो साम्राज्यवाद का चेहरा किस कदर खौफनाक हो सकता है, इस असलियत का अहसास ‘कुली-प्रथा’ नाटक के पाठ से हो जाता है। फीजी या किसी नए उपनिवेश में खेती-बाड़ी के लिए मजदूर ले जाना एक बात है, सीधे-सादे लोगों को बहकाकर बंधुआ मजदूर बनाना और गुलाम व्यापार करना इन्सानियत को ताक पर रखना है। फ़िज़ी में निरंकुशता का उन्माद छाया हुआ था। सनातनी संस्कारों वाले दम्पति भोलाराम और कुन्ती के बेटे शंकर को घर से भागे कई वर्ष बीत चुके हैं, उसकी कोई खोज ख़बर नहीं आई। कुछ उदास कुछ उखड़े माँ-बाप तीर्थ यात्रा के लिए जगन्नाथपुरी आए घूम रहे हैं। उधर आरकटियों का एक दल ऐसे भटके लोगों को अपने जाल में फँसाने में जुटा हुआ है ताकि उन्हें कुली बनाकर फ़िज़ी भेजा जा सके।”¹¹ स्वतंत्रता संग्रामकालीन लेखक अपनी रचनाओं में विदेशी शासन द्वारा किये जा रहे दमन को उजागर भी करता है और साथ-साथ उस विदेशी सत्ता से कर देश को स्वाधीनता दिलाने का प्रयास भी करता है।“सामाजिक सुधार नयी धारा का एक आवश्यक अंग था। तभी से यह परम्परा चली कि स्वाधीनता आन्दोलन के नेता समाज सुधारक भी हों और अपने राजनीतिक प्रचार में सुधारों की बात भी कहें।”¹² सन् 1857 के बाद राष्ट्रीय आंदोलन की भूमि में नाटकों के द्वारा जड़े जमाने में बहुत सफलता मिली थी।
‘तोताराम सनाढ्य’ की ‘फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष’ आत्मकथा जिसकी ‘कुली प्रथा’ नाटक के कथानक से बहुत नज़दीकी संबंध और साम्यता भी है। इस पुस्तक ने महिलाओं और पिछड़े वर्गों की पीड़ा को भी अपनी आवाज दी।“पुरुषों के बजाय स्त्रियों में सहन शक्ति ज्यादा थी, इसलिए उनके ऊपर हुए शोषण, अत्याचार उभरकर सामने नहीं आए या उसे स्वाधीनता आन्दोलन का हिस्सा ही नहीं माना गया ठीक वैसे ही जैसे उनके घरेलू श्रम के महत्व को रेखांकित नहीं किया जाता।”¹³ जो केवल एक आत्मकथा नहीं एक ऐतिहासिक दस्तावेज स्वरूप हैं।
निष्कर्ष : प्रवासी साहित्य का महत्व प्रतिबंध के बावजूद देशभक्ति का भाव जागृत करने में है। क्योंकि यह न केवल अंग्रेजी शासन का विरोधी था, बल्कि स्त्री-दलित शोषण, विदेशी गुलामी तथा सामाजिक मुद्दों पर भी प्रकाश डालता था। प्रतिबंधित होने पर भी यह भूमिगत रूप से फैला, जिससे जन-चेतना जागृत हुई। आज यह औपनिवेशिक इतिहास की अमूल्य धरोहर है, जो प्रवासी भारतीयों की साहित्यिक भूमिका को रेखांकित करता है। इन पुस्तकों द्वारा अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे शोषण के विभिन्न रूपों और उस शोषण के खिलाफ विकसित हो रहे आंदोलन के भारतीय और प्रवासी पक्षों को दर्ज करने तथा सकारात्मक दिशा प्रदान करने वाले तत्वों को पाठक के सामने प्रस्तुत किया गया हैं। साथ ही साथ इन पुस्तकों के माध्यम से उस दौर के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिप्रेक्ष्य और भारतीय जनमानस पर इन पुस्तकों के व्यापक प्रभाव को समझा जा सकता हैं। इस पुस्तक ने ‘दुनिया को बताया कि गिरमिटिया मजदूर केवल मज़दूर नहीं थे, बल्कि वे संस्कृति के वाहक थे। उन्होंने अभावों में रहकर भी अपनी इंसानियत और भारतीयता को जिंदा रखा।
सन्दर्भ :
1. गिरीश रस्तोगी, हिंदी नाटक का आत्मसंघर्ष, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2017, पृष्ठ स. 30
2. रंग दस्तावेज़ सौ साल (1850-1950), महेश आनंद, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, 2007, भूमिका
3. भगवान दास माहौर, 1857 के स्वाधीनता संग्राम का हिंदी साहित्य पर प्रभाव,कॉन्फ्लुएंस इंटरनेशनल, नई दिल्ली 2008, पृष्ठ स- 228
4. अपनी माटी, सम्पादक: गजेंद्र पाठक, चेतन प्रकाशन, चित्तौड़गढ़, 30.11.2022 ,पृष्ठ स. 189
5. नरेंद्र शुक्ल, भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन और प्रतिबंधित साहित्य, संयुक्त प्रान्त के विशेष सन्दर्भ में (1907-1935), नेहरू स्मारक एवं पुस्तकालय, नई दिल्ली, 2014; पृष्ठ: 10
6. प्रवासी जगत’ खंड-7, अंक-1, आश्विन मार्गशीर्ष, 2080/अक्टूबर-दिसंबर, 2023 पृष्ठ स. 116
7. Hindisamay :फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष – तोताराम सनाढ्य fizi dwip me mere 21 varsh -Totaram Sanadhya https://share.google/6QW9lzOBS9tGZPye0
8.प्रेस, पब्लिक ओपिनियन एण्ड गवर्नमेण्ट ऑफ इण्डिया, सुशीला अग्रवाल, आशा पब्लिशिंग हाउस, जयपुर, 1970, पृष्ठ स. 204
9.सत्येंद्र कुमार तनेजा : सितम की इंतिहा क्या है ? : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010. पृ. सं.199
10.सत्येंद्र कुमार तनेजा : सितम की इंतिहा क्या है ? : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण 2010. पृ. सं.202
11.सत्येंद्र कुमार तनेजा : सितम की इंतिहा क्या है ? : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावलपुर हॉउस, नई दिल्ली प्रथम संस्करण2010. पृ. सं.202
12. रामविलास शर्मा, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, अरुणोदय प्रकाशन, दिल्ली, 1994, पृष्ठ स. 1
13. अपनी माटी, सम्पादक: गजेंद्र पाठक, चेतन प्रकाशन, चित्तौड़गढ़, 30.11.2022 ,पृष्ठ स. 89
कौसर साबिदा सुल्ताना
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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