शोध आलेख : ‘चंद्रकांता’ तथा 'चंद्रकांता संतति' में दास्तान का भारतीयकरण / अंशु प्रिया

‘चंद्रकांता’ तथा 'चंद्रकांता संतति' में दास्तान का भारतीयकरण
- अंशु प्रिया

शोध सार : प्रस्तुत शोध-पत्र उन प्रक्रियाओं का विश्लेषण करता है जिनके माध्यम से देवकीनंदन खत्री कृत 'चंद्रकांता' और 'चंद्रकांता संतति' फारसी-उर्दू की 'दास्तान' परंपरा का 'भारतीयकरण' करते हैं। खत्री ने मात्र एक आख्यान-शैली को उधार नहीं लिया, बल्कि उन्होंने स्थानीय भूगोल, हिंदूवादी सांस्कृतिक प्रतीकों, संबंध-संरचनाओं और दरबारी शिष्टाचार के माध्यम से इसे एक नवीन कूटलिपि प्रदान की, जो उत्तर-भारतीय सामाजिक जीवन के भीतर पूर्णतः बोधगम्य है। इन उपन्यासों में महलों, उद्यानों, वनों, राजकुमारों और ऐय्यारों को एक 'हिंदी नैतिक जगत' के भीतर पुनर्कल्पित किया गया है, जहाँ 'अतिप्राकृत' या 'विस्मयकारी' तत्वों का पूर्ण परित्याग किए बिना उनका देशीकरण (domestication) किया गया है। 'प्राकृतिकरण' (naturalization), 'सांस्कृतिक अनुवाद' और 'देशज मुद्रण संस्कृति' के सिद्धांतों का सहारा लेते हुए, यह शोधपत्र तर्क देता है कि दास्तान का हिंदी औपन्यासिक स्वरूप में रूपांतरण करने के लिए 'भारतीयकरण' की यह प्रक्रिया केंद्रीय रही है। इस प्रकार, यह पाठ रूमानियत, कौतूहल और तिलिस्मी आकर्षण को सुरक्षित रखते हुए उन्हें औपनिवेशिक उत्तर-भारत के एक नवीन पाठक वर्ग के लिए सुलभ बनाता है।

बीज शब्द : चंद्रकांता, देवकीनंदन खत्री, ऐयारी, दास्तान, हिन्दी उपन्यास, मुद्रण संस्कृति, सांस्कृतिक अनुवाद, भारतीयकरण, प्राकृतिकरण, रूपांतरण।

मूल आलेख : उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में उपन्यास का उदय प्रायः पाश्चात्य प्रभाव का परिणाम माना जाता है, किंतु इसे पूर्ववर्ती आख्यान-परंपराओं से पूर्ण विच्छेद के रूप में नहीं देखा जा सकता। भारतीय साहित्यिक परंपरा में कथा-वाचन पहले से ही सशक्त रूप में विद्यमान था, और आरंभिक उपन्यास इसी विरासत तथा आधुनिक मुद्रण और नए पाठक-वर्ग के बीच एक संतुलन का परिणाम हैं। इन परंपराओं में ‘दास्तान’ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो अपने विस्तृत कथानक, दरबारी परिवेश, तिलिस्म, षड्यंत्र और रूमानियत के कारण जीवंत आख्यान-रूप प्रस्तुत करती है। देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति इस दास्तान परंपरा को हिंदी के सांस्कृतिक संदर्भ में रूपांतरित करती हैं। वे इसकी मूल कथात्मक ऊर्जा को बनाए रखते हुए इसे अधिक परिचित, सामाजिक रूप से बोधगम्य और नए पाठक-वर्ग के अनुकूल बनाती हैं, जिससे उपन्यास एक जटिल सांस्कृतिक पुनर्संरचना के रूप में सामने आता है।

दास्तान का भारतीयकरण : उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक हिन्दी अपना स्वरूप गढ़ ही रही थी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनके मंडल के लेखकों के निरंतर प्रयासों से हिन्दी को एक सक्रिय लेखक-वर्ग तो मिल गया, पर पाठकों का आधार अभी भी कमजोर था। भारत में साहित्य और कथाओं की कमी नहीं थी, लेकिन उनका आस्वादन मुख्यतः मौखिक परंपरा के माध्यम से होता था। भाषाई विविधता भी एक बड़ी बाधा थी, जिसके कारण हिन्दी का संगठित पाठक-वर्ग तैयार नहीं हो पा रहा था। उस समय जनता के बीच धार्मिक ग्रंथ, गीत, चापबुक और दास्तान ही लोकप्रिय साहित्य के रूप में प्रचलित थे। फ़्रांचेस्का ओर्सीनी ने यह दिखाया है कि भारत में मुद्रण तकनीक के आगमन के शुरुआती दौर में हिन्दी में जो पुस्तकें छप रही थीं, वे अधिकतर या तो पाठ्यपुस्तकें थीं या फिर गीत, चापबुक और दास्तान जैसी सामग्री।[i] ऐसे साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश में देवकीनंदन खत्री ने चंद्रकांता की रचना आरंभ की। अंबिका प्रसाद वाजपेयी के शब्दों में, “उन्होंने जिस समय लेखनी उठायी थी, उस समय हिन्दी के नामलेवा बहुत ही कम थे।[ii]

देवकीनंदन खत्री ने अपने लेखन में ऐसे पाठक-वर्ग को केंद्र में रखा जो न पूरी तरह सुसंस्कृत था, न ही साहित्यिक रूप से प्रशिक्षित। लक्ष्मीशंकर वार्ष्णेय के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ऐतिहासिक कारणों से एक अर्द्ध-शिक्षित निम्नवर्ग उभरा, जिसे अवकाश के समय मनोरंजन की आवश्यकता थी।[iii] इसके विपरीत भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन साहित्यकारों का लक्ष्य एक सुसंस्कृत हिन्दी-पाठक वर्ग तैयार करना था, जिसके परिणामस्वरूप साहित्य में मानकीकृत, मुद्रित हिन्दी को श्रेष्ठ मानते हुए एक मूल्य-आधारित पदानुक्रम विकसित हुआ। फ्रैंचेस्का ओर्सीनी ने इस प्रक्रिया को रेखांकित करते हुए बताया है कि हिन्दी नवजागरण के दौरान एक बड़े जनसमूह और उसकी साहित्यिक परंपराओं की उपेक्षा हुई।[iv] इस पदानुक्रम से बाहर एक उभरता हुआ निम्न-मध्यवर्ग था, जिसे गोपाल राय संभावित हिन्दी-पाठक के रूप में देखते हैं—ऐसा वर्ग जो उर्दू-फारसी से शिक्षित था, नागरी जानता था और धार्मिक वाचन परंपरा से जुड़ा हुआ था। खत्री ने इसी संक्रमणशील, अर्द्ध-शिक्षित और वाचिक संस्कारों से जुड़े पाठक-वर्ग को अपनी रचनाओं का लक्ष्य बनाया।

'चंद्रकांता' और 'चंद्रकांता संतति' का साहित्यिक संसार 'दास्तान' के दीर्घकालिक इतिहास से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है—एक ऐसी आख्यान विधा जिसकी जड़ें पारसी कल्पनाशीलता में निहित हैं और जिसका सांस्कृतिक प्रसार हिंदी कथा-साहित्य में प्रवेश करने से बहुत पहले ही संपूर्ण इस्लामी जगत में हो चुका था। स्वयं 'दास्तान' शब्द की व्युत्पत्ति फारसी से हुई है, जहाँ व्यापक रूप से इसका अर्थ कोई किस्सा, कहानी या आख्यान होता है। हालाँकि, इसका अर्थ-क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है, जिसमें कथन, मौलिक आविष्कार, जनश्रुति और कलात्मक वाचन के अर्थ भी समाहित हैं। अपने ऐतिहासिक जीवन में, दास्तान केवल एक साहित्यिक विधा मात्र नहीं थी, बल्कि यह एक प्रदर्शनात्मक और सामाजिक परंपरा थी: यह दरबारों, निजी महफ़िलों और सार्वजनिक किस्सागोई के स्थानों से संबद्ध थी, जहाँ पेशेवर कथावाचक (किस्सागो) श्रोताओं और अवसर के अनुरूप कथा के प्रसंगों को नया रूप देते थे। फारसी, अरबी, तुर्की और कालांतर में उर्दू साहित्यिक संस्कृतियों में इसके प्रसार ने इसे प्रतिष्ठा और गतिशीलता दोनों प्रदान कीं, जिससे यह पूर्व-आधुनिक युग की सबसे अनुकूलनशील आख्यान विधाओं में से एक बन गई।

इस वृहद परंपरा के भीतर, 'दास्तान-ए-अमीर हमज़ा' ने एक विशिष्ट और केंद्रीय स्थान ग्रहण किया, जो कालांतर में दास्तान की समझ को निर्धारित करने वाला एक प्रतिमान बन गया। इसकी व्यापक काल्पनिक परिधि, दरबारी वैभव, नायकत्व का द्वंद्व और तिलिस्मी साहसिक कार्यों ने उस 'आख्यान-व्याकरण' को स्थापित किया, जिसे बाद में दक्षिण एशिया में नए सिरे से ढाला गया। भारत में दास्तान का प्रवेश किसी जड़ या आयातित पाठ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत और परिवर्तनशील आख्यान-परंपरा के रूप में हुआ, जो पहले से ही मौखिक प्रस्तुतियों, दरबारी संरक्षण और जन-प्रसार के माध्यम से अपना स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। वागीश शुक्ल लिखते हैं “कवियों की तरह ही दास्तान-गो भी राज्याश्रय पाते थे और ईरान के शाह इस्माइल के दास्तान-गो जैनुल-आबिदीन तकलतू खान, अकबर के दास्तान-गो इनायतुल्ला दरबार ख़ान, जहाँगीर के दास्तान-गो मुल्ला असद जैसे नाम भी यत्र तत्र मिलते हैं जिन्हें दरबारी पद हासिल थे।”[v] खत्री इसी ऐतिहासिक विरासत को प्राप्त करते हैं और हिंदी उपन्यास के ढांचे के भीतर उसे पुनर्गठित एवं 'राष्ट्रीयकृत' (nationalize) करते हैं। दास्तान परंपरा के चारों स्तम्भ - रज़्म, बज़्म, हुस्न और ऐयारी[vi], चंद्रकांता में चारों आते तो हैं, परंतु उनका स्वरूप भारतीय परंपराओं के साँचे में ढल कर आता है। ओर्सीनी इस तरफ ध्यान खींचते हुए कहती हैं “खत्री द्वारा इस संसार के 'भारतीयकरण' का अर्थ अपरिचित को परिचित बनाना मात्र नहीं था। इसके बजाय, उन्होंने उन पात्रों और साहसिक कारनामों को—जो अब तक केवल कोरी कल्पना और अतिरंजित कथाओं में जीवित थे—जनसाधारण के दैनिक जीवन (the everyday) के निकट लाकर प्रतिष्ठित कर दिया।”[vii] चंद्रकांता' और 'चंद्रकांता संतति' की महत्ता उस पद्धति में निहित है, जिसके माध्यम से वे इस पारसी विरासत का 'भारतीयकरण' करते हैं। भूगोल, पात्र, दरबारी शिष्टाचार और नैतिक संहिताओं—इन सभी को इस प्रकार पुनर्गठित किया गया है कि दास्तान की वह प्राचीन रूमानियत उत्तर-भारतीय किलों, उद्यानों, संबंधों, जातीय संवेदनाओं और हिंदू सामाजिक मूल्यों के संसार में सर्वथा 'अपनी' और सहज प्रतीत होती है। यहाँ 'अतिप्राकृत' या विस्मयकारी तत्वों का विलोपन नहीं किया गया है; बल्कि उन्हें सांस्कृतिक रूप से बोधगम्य बनाया गया है।

दरबारी व्यवस्था का भारतीयकरण : खत्री के भारतीयकरण' का सबसे स्पष्ट चित्र दरबारी व्यवस्था के चित्रण में दिखता है। जैसा कि ओर्सीनी रेखांकित करती हैं, उन्होंने दास्तान की दुनिया का प्राकृतिकरण किया, जिसमें दास्तान के नायकों और दरबारों की दरबारी नैतिकता के भीतर जातिगत मान्यताओं, पारिवारिक संबंधों, रीति-रिवाजों और 'हिंदू धर्म व राजनीति' के संदर्भों के माध्यम से स्थानीय एवं 'घरेलू' तत्वों का समावेश शामिल था।[viii] यह परिवर्तन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दरबार को मात्र एक पारसी प्रदर्शन-स्थल के बजाय एक ऐसे उत्तर-भारतीय नैतिक क्षेत्र के रूप में पुनर्गठित करता है, जो सुपरिचित सामाजिक संबंधों द्वारा संचालित है। इसका परिणाम दरबारी वैभव का विलोपन नहीं, बल्कि सम्मान, संबंध और मर्यादा की भारतीय संहिताओं के माध्यम से उसका पुनर्लेखन किया। बादशाहों तथा शहज़ादों का स्थान क्षात्रधर्म का पालन करने वाले काशी के राजपूत राजा तथा राजकुमार ले लेते हैं, हालाँकि इससे उनके गुणों पर कोई विशेष असर नहीं पड़ता, क्योंकि नायक लगभग सभी परंपराओं में वीर, उदार, सहृदय, न्यायप्रिय और दास्तान की भाषा में ‘जवाँमर्द’ ही होते हैं।

भौगोलिक परिवेश का भारतीयकरण : खत्री द्वारा दास्तान के 'भारतीयकरण' की प्रक्रिया सबसे स्पष्ट रूप से उनके भौगोलिक चित्रण में दिखाई देती है। उन्होंने कहानी के परिवेश को किसी धुंधले और काल्पनिक स्थानों से निकालकर उत्तर-भारत के एक निश्चित मानचित्र पर स्थापित कर दिया। पारसी प्रेमाख्यानों में जगहें अक्सर काल्पनिक और अस्पष्ट होती थीं, लेकिन इसके विपरीत 'चंद्रकांता' का भूगोल उन स्थानों के आस पास घूमता है जिससे सभी भारतीय, विशेषकर हिन्दी पट्टी के पाठक पूर्व परिचित हैं जैसे काशी, गया, चुनार, विजयगढ़, रोहतासगढ़, जमनिया और इनके आसपास के किलों व नदियों का क्षेत्र। ये संदर्भ केवल कहानी के सौन्दर्य वृद्धि के लिए नहीं दिए गए हैं, ये वो नाम हैं जो भारतीय पाठकों के लिए ऐतिहासिक, धार्मिक और भावनात्मक महत्व रखते हैं। ये नाम कहानी के 'अतिप्राकृत' या जादुई तत्वों को हमारी स्मृतियों, यात्राओं और लोक-कथाओं के एक ठोस धरातल से जोड़ देते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि पाठक जब इन चमत्कारों का सामना करता है, तो उसे ये किसी अनजान दुनिया की बातें नहीं लगतीं, बल्कि उन जगहों की लगती हैं जिनसे वह सांस्कृतिक रूप से पहले से परिचित है। इस तरह एक ऐसा कथा-संसार निर्मित होता है जो अद्भुत और जादुई तो है, पर साथ ही घरेलू और पूरी तरह 'भारतीय' भी लगता है।

प्रकृति-चित्रण में भी हमें ठीक यही प्रक्रिया दिखाई देती है। पेड़-पौधे, कुंज, पहाड़ियाँ, घाटियाँ, नदियाँ और जंगल—इन सबका वर्णन पारसी दरबारी कल्पना के बजाय भारतीय जनजीवन के अनुभवों के करीब जान पड़ता है। खत्री ने बार-बार पहाड़ी झरनों, घने जंगलों, संकरी घाटियों और पथरीले रास्तों का कुछ इस तरह जिक्र किया है जो न केवल कहानी के परिवेश को रोमांचक बनाता है, बल्कि हिंदी भाषी पाठकों के लिए उसे जाना-पहचाना भी बना देता है। जंगलों का विवरण लिखते हुए वे जिन पेड़ों तथा जानवरों के नाम देते हैं, वे भी भारतीय उप-महाद्वीप विशेषकर उत्तरी भारत के परिचित हैं- “नौगढ़ और विजयगढ़ का राज पहाड़ी है, जंगल भी बहुत भारी और घना है, नदियाँ चंद्रप्रभा और कर्मनाशा घूमती हुई इन पहाड़ों पर बहती हैं। जाबजा लोह और दरें पहाड़ों में बड़े खूबसूरत कुदरती बने हुए है। पेड़ों में सासू, तेद, विजयसार, सनई, कोरया, गो, बाजा, पेयार, जिगना, आसन आदि के पेड़ हैं। इसके अलावा पारिजात के पेड़ भी है। मील-भर इधर-उधर जाइए तो घने जंगल में फंस जाइएगा। कहीं रास्ता न मालूम होगा कि कहाँ से आए और किधर जाएँगे। बरसात के मौसम में तो अजब ही कैफियत रहती है, कोस भर जाइए, रास्ते में दस नाले मिलेंगे। जगली जानवरों में बारहसिंघा, चीता, भालू, तेंदुआ, चिकारा, लंगूर, बंदर वगैरह के अलावा कभी-कभी शेर भी दिखाई देते है”[ix] यही कारण है कि ओर्सीनी द्वारा दिया गया 'प्राकृतिकरण' (naturalization) का विचार यहाँ इतना सटीक बैठता है: दास्तान की जादुई दुनिया को इस तरह पेश किया गया है जैसे वह स्वाभाविक रूप से उत्तर-भारत की भौगोलिक स्थिति और यहाँ के वातावरण का ही हिस्सा हो।

चरित्र का भारतीयकरण : चरित्र चित्रण के स्तर पर खत्री का 'भारतीयकरण' सबसे अधिक प्रभावी ढंग से उभर कर आता है। पुराने दरबारी चरित्रों के केवल नाम नहीं बदले गए, बल्कि उन्हें उत्तर-भारतीय नैतिक जगत के भीतर नए सिरे से पुनर्गठित किया गया है। ओर्सीनी के अनुसार, इस 'प्राकृतिकरण' की प्रक्रिया में चरित्रों और स्थानों के भारतीयकरण के साथ-साथ दरबारी नैतिकता के भीतर "स्थानीय और 'घरेलू' तत्वों" का समावेश भी शामिल था।यह बदलाव व्यक्तित्व के पूरे तर्क को ही बदल देता है। यहाँ का 'नायक' अभी भी रोमानी है, लेकिन उसकी रूमानियत अब मान-मर्यादा, संयम और एक ऐसी आचार-संहिता से छनकर आती है जो उसे किसी साधारण साहसी यात्री के बजाय एक 'राजपूत राजकुमार' के रूप में स्थापित करती है। वह प्रेम में मूर्छित हो सकता है, विलाप कर सकता है और विरह की अग्नि में जल सकता है, लेकिन उसके इस भावातिरेक (emotional excess) को एक ऐसे नैतिक अनुशासन में बांधा गया है जो यहाँ के दरबारी लोकाचार का हिस्सा है। यह विलाप राम के सीता विरह के विलाप के समान प्रतीत होता है, जिस प्रकार राम सीता के प्रेम में उन्हें खोजते हुए विलाप करते हैं, खत्री जी के नायक भी अपनी प्रिया को खोकर वैसे ही विलाप करते हैं। सीता जी को आश्रम में न पा कर राम अनेक प्रकारों से विलाप करते हुए प्रकृति से सीता का पता पूछते हैं, “हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ।। खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।”[x] यह विलाप राम के पौरुष को किसी तरह बाधित नहीं करता, या उस पर प्रश्न नहीं उठाता। इसी प्रकार चंद्रकांता के नायक, भावुक होते हुए भी पौरुष में किसी प्रकार कम नहीं हैं। साथ ही, वे कुछ मूल्यों को आत्मसात किए हुए नायक हैं, वे स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाते, निहत्थों पर वार नहीं करते आदि। यह उस 'वीरता' से भिन्न है जो फारसी दास्तानों में अक्सर अधिक रूढ़ और नैतिक रूप से अस्पष्ट हुआ करती थी।

चंद्रकांता के ऐय्यार भी पारसी ऐय्यारों से भिन्न प्रतीत होते हैं। फारसी दास्तानों में ‘ऐय्यार’ अक्सर हास्य पैदा करने वाले, अवसरवादी या लालची किस्म के चालाक पात्र होते थे, लेकिन खत्री के यहाँ वे खुफिया तंत्र के वफादार एजेंट बन जाते हैं। उनका छद्मवेष, उनकी गति और उनका सामरिक कौशल अब केवल शरारत के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस्तेमाल होता है। अमन कुमार कहते हैं कि “खत्री के ऐय्यार वफादार और विश्वसनीय हैं और वे मुख्य रूप से अपने राजनीतिक स्वामियों के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं।”[xi] यह एक बहुत बड़ा नैतिक संशोधन है। ऐय्यार के पास छल-कपट की कला तो अभी भी है, लेकिन अब वह छल अपने स्वार्थ के लिए नहीं रह गया है; इसे नैतिक और अनुशासित बना दिया गया है, और इसका उपयोग न्याय तथा राजनीतिक स्थिरता के लिए किया जाता है।

इसी कारण उपन्यास के सहायक पात्र भी सामाजिक प्रकारों के स्तर पर भारतीयकृत प्रतीत होते हैं। मंत्री, योगी, ब्राह्मण-संकेतित पात्र और गृह-केन्द्रित राजपरिवार की स्त्रियाँ—ये सभी दरबारी संसार में ऐसे प्रवेश करते हैं, जहाँ उनकी भूमिकाएँ पाठकों के लिए सहज पहचानी जा सकें। देवकीनंदन खत्री के यहाँ चरित्र-निर्माण वह प्रमुख स्थल बन जाता है, जहाँ दास्तान परंपरा घरेलू बन जाती है, तथा उसे हिन्दी पाठकों के लिए सामाजिक रूप से बोधगम्य हो जाती है।

सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों का भारतीयकरण - खत्री द्वारा सामाजिक और नैतिक जगत के 'भारतीयकरण' की प्रक्रिया उनके द्वारा तत्कालीन 'अश्लीलता' के मानकों के निषेध और उसके स्थान पर मर्यादा, शुचिता तथा सम्मान की स्थापना में सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। वागीश शुक्ल लिखते हैं “खत्री जी होशरुबा का 'अश्लीलांश-विवर्जित' संस्करण हिन्दी में बना रहे थे।[xii]” उनके आख्यान में यौन चित्रण या कामुक दृश्यों के लिए कोई स्थान नहीं है। यहाँ तक कि जब कोई महिला पात्र नैतिक रूप से विचलित भी होती है, तब भी रचना में उस कृत्य के प्रत्यक्ष वर्णन के बजाय "हम इसे अपनी सीधी सादी लेखनी में लिखना पसंद नहीं करते, पर मनचले पाठक समझे बिना न रहेंगे”[xiii] जैसी लक्षणात्मक भाषा का प्रयोग हुआ है, जिससे वह दृश्य पर्दे के पीछे ही बना रहे।

स्त्री पात्र, विशेष रूप से 'नायिकाएं', अत्यंत निष्ठावान और सजग चित्रित की गई हैं। जब वे नायक की सहायता करती हैं, तब भी वे मर्यादा का उल्लंघन नहीं करतीं; वे इस बात का पूरा ध्यान रखती हैं कि कोई अनचाहा व्यक्ति उन्हें न देख सके।[xiv] इस प्रकार, उनकी सक्रियता हमेशा शील और समर्पण के दायरे में ही बंधी रहती है। इसी प्रकार, पुरुष नायक भी एक कठोर नैतिक संहिता से बंधे हुए हैं। वे स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाते और उनका आचरण वीरता के उस आदर्श से निर्धारित होता है जिसमें संध्या-वंदन जैसी भक्ति-क्रियाएँ और ब्राह्मणवादी या राजपूत धर्मनिष्ठा के अन्य अनुशासित प्रतीक शामिल हैं। इस प्रकार, खत्री जी का संसार स्वच्छंदता के बजाय नैतिक नियमों से नियंत्रित प्रतीत होता है। यहाँ तक कि 'प्रेम' भी मर्यादा की कसौटी से छनकर ही अभिव्यक्त होता है। नायक का प्रेम प्रगाढ़ और आवेशपूर्ण तो है, लेकिन उसे कभी भी अमर्यादित या प्रत्यक्ष रूप से कामुक होने की अनुमति नहीं दी जाती।

नैतिक पुनर्गठन की इस प्रक्रिया में जाति और धर्म की सीमाएँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उपन्यास का “नायक ऐसे किसी व्यक्ति के हाथ का छुआ भोजन ग्रहण नहीं करता जिसकी धार्मिक पहचान संदिग्ध हो।”[xv] ऐसे प्रसंग यह संकेत देते हैं कि सामाजिक शुचिता कहानी का कोई आकस्मिक हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आख्यान के बुनियादी ढांचे का एक अनिवार्य तत्व है। इसी प्रकार, “तेजसिंह भी तब तक अपनी इच्छा से विवाह नहीं कर सकता जब तक कि उसकी जातीय अनुकूलता सिद्ध न हो जाए।”[xvi] यह दर्शाता है कि व्यक्तिगत लगाव या प्रेम अभी भी विरासत में मिली सामाजिक व्यवस्था के अधीन है। ये सूक्ष्म विवरण स्पष्ट करते हैं कि खत्री ने केवल कहानी के बाहरी कलेवर का भारतीयकरण नहीं किया, बल्कि उन्होंने इसके नैतिक व्याकरण को ही पूरी तरह भारतीय सांचे में ढाल दिया।

निष्कर्ष : इस प्रकार, देवकीनंदन खत्री के यहाँ दास्तान का भारतीयकरण बहुआयामी प्रक्रिया के रूप में सामने आता है, जिसमें भूगोल, दरबारी व्यवस्था, चरित्र-निर्माण और सामाजिक-मूल्य सभी स्तरों पर पुनर्संरचना होती है। स्थानीय भौगोलिक परिवेश और परिचित सांस्कृतिक संकेतों के माध्यम से कथा को उत्तर भारतीय जीवन-जगत से जोड़ा गया है। चरित्रों और नैतिक संहिताओं में मर्यादा, शुचिता और संबंध-केन्द्रित दृष्टि को स्थापित किया गया है, जहाँ संकेतात्मक भाषा विशेष भूमिका निभाती है। इस प्रकार, दास्तान की तिलिस्मी और रोमांचक परंपरा को बनाए रखते हुए उसे हिन्दी समाज के सांस्कृतिक और नैतिक ढाँचे में स्वाभाविक रूप से रूपांतरित कर दिया गया है।

संदर्भ :
[i] Francesca Orsini, Hindi public sphere, proquest, 1996 , Page-16
[ii] गिरीशचंद्र त्रिपाठी, लहरी बुक डिपो, 1963 खत्री स्मृति ग्रंथ पृ 32
[iii] गिरीशचंद्र त्रिपाठी, लहरी बुक डिपो, 1963 खत्री स्मृति ग्रंथ पृ 36
[iv] Francesca Orsini, Hindi public sphere, proquest, 1996 , Page-16
[v] वागीश शुक्ल,चंद्रकांता संतति का तिलिस्म, राजकमल प्रकाशन, 2019 पृ 21
[vi] Francesca Orsini, Print and pleasure, permanent black,2009 Page- 202
[vii] Francesca Orsini, Print and pleasure, permanent black,2009 Page- 205
[viii] Francesca Orsini, Print and pleasure, permanent black,2009 Page- 217
[ix] देवकीनंदन खत्री, चंद्रकांता, राजकमल प्रकाशन, 2019, पृ 30
[x] तुलसीदास, रामचरितमानस, गीता प्रेस, 2018 पृ 661
[xi]https://franpritchett.com/00urduhindilinks/workshop2013/txt_amankumar_chandrakanta.pdf
[xii] वागीश शुक्ल,चंद्रकांता संतति का तिलिस्म, राजकमल प्रकाशन, 2019 पृ 27
[xiii]देवकीनंदन खत्री, चंद्रकांता संतति 1, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, 2016 पृ 63
[xiv] देवकीनंदन खत्री, चंद्रकांता संतति 3, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, 2016 पृ 92
[xv] देवकीनंदन खत्री, चंद्रकांता संतति 1, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, 2016 पृ 31
[xvi] देवकीनंदन खत्री, चंद्रकांता, राजकमल प्रकाशन, 2019, पृ169

अंशु प्रिया
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय, चेरी-मनातू, राँची, झारखंड

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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