आलोचना विषयक संवाद
(अंकित नरवाल से योगेश शर्मा की बातचीत)
योगेश शर्मा : अंकित जी नमस्ते, आपका आज के इस साक्षात्कार में स्वागत है।
अंकित नरवाल : धन्यवाद योगेश जी।
योगेश शर्मा : अंकित जी, जाहिर है कि यू.आर. अनंतमूर्ति को आधार बनाकर आपने अपने शोध का काम किया है। उस पर आपको युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है। तो मेरा पहला सवाल है कि यू.आर. अनंतमूर्ति का जो साहित्य है, वह आज के समाज और आज के भारत में किस तरह से प्रासंगिक है? वह हमारी पूरी सामाजिक संरचना में और हमारे समाज की जो पूरी सामूहिक मनोरचना है, उसमें किस तरह हस्तक्षेप करता है?
अंकित नरवाल: योगेश जी, जहाँ तक यू.आर. अनंतमूर्ति के साहित्य और वर्तमान भारत की चुनौतियों के परिदृश्य का संबंध है, यदि हम अनंतमूर्ति की कुछ रचनाओं को अपने सामने रखेंगे तो हमें बहुत सारी चीजें आसानी से समझ में आयेगी। उदाहरण के लिए, मैं उनकी कुछ रचनाओं के नाम बताऊँ, जैसे— 'यह भारतीयता', उनके आखिरी दिनों की किताब 'हिंदुत्व और हिंद स्वराज', और उनकी जीवनी जो उन्होंने 'सुरगी' के नाम से लिखी। यदि हम इन तीन किताबों को अपने सामने रखेंगे, तो बहुत सी बातें हमें स्पष्ट हो जायेगी।
आज का जो हमारा भारत है, उसमें संस्कृतियों को लेकर एक कशमकश है। धर्म को लेकर हमारे सामने एक चुनौती है, भाषा को लेकर हमारे सामने एक चुनौती है, और बहुत सारे संप्रदायों के बीच आपसी तनाव की स्थितियाँ बनी हुई दिखाई देती हैं। इन तनावपूर्ण स्थितियों को सुलझाने या इनमें मनुष्य को देखने का अनंतमूर्ति के पास क्या नज़रिया है, यह हम इन तीन किताबों को पढ़कर देख सकते हैं। जहाँ तक भारतीयता का सवाल है कि हम किसे भारतीय कहें—जैसे अब तो सिटिज़नशिप एक्ट(नागरिकता कानून) भी बन रहे हैं—तो अनंतमूर्ति के पास आज से लगभग 30 साल पहले ही इस सवाल के बहुत सारे जवाब थे। वे इस बनती हुई भारतीयता को लेकर चिंतित थे और यह समझते थे कि भारत का निर्माण किसी एक संस्कृति से नहीं हुआ है; हम बहुत सारी संस्कृतियों के मेल से बने हैं। संस्कृतियों का यह मेल ही हमें एक खास किस्म का भारतीय बनाता है, जो बहुत सारे रंगों, धर्मों और संप्रदायों में हमारे सामने मौजूद है।
यदि आज हम यह मानने लगें कि केवल हिंदू भारतीय हैं या केवल मुस्लिम भारतीय हैं, और किसी दूसरे को आउटसाइडर(बाहरी) समझने लगें, तो हमारे सामने जो चुनौतियाँ खड़ी होंगी, वे हमें और गहराई में पीछे ले जायेगी। क्या आज हमें इन सवालों के बारे में सोचने की जरूरत है? क्या हमें इस बारे में सोचने की जरूरत नहीं है कि हम इस गरीबी को कैसे दूर करें? संप्रदायों की जो आपसी लड़ाई है, उसे कैसे समाप्त करें? या रंग और भाषा को लेकर जो चुनौतियाँ हैं, उन्हें कैसे दूर करें? क्या हमारे लिए हिंदी और उर्दू का झगड़ा महत्त्वपूर्ण है, या सड़क पर भीख मांगते व्यक्ति की मजबूरी को संबोधित करने की ज़्यादा जरूरत है? क्या हम अपने समाज और रचनाओं में धर्मों के आपसी तनाव के बीच जीते हुए मनुष्यों की तकलीफों का निवारण करने की ओर आगे बढ़ें, या उन तनावों से अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए आगे बढ़ें? अनंतमूर्ति के पास इन सारे सवालों के जवाब हैं।
अनंतमूर्ति का जो एक नॉवेल(उपन्यास) है—'संस्कार', उसमें प्राणेशाचार्य नाम का एक ब्राह्मण है और उसके सामने नारणप्पा एक चुनौती की तरह खड़ा है। यदि आप इन दोनों को व्यक्तियों के तौर पर पढ़ेंगे, तो देखेंगे कि बदलते हुए परिवेश और संस्कारों में मनुष्य जब अपना मूल्यांकन कर रहा होता है, तो वह एक ऐसा परिवेश और मनुष्य बनता है जो बहुत सारे तरीकों से स्वयं को मनुष्य बनाता है। मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि कोई भी मनुष्य एक सीधी रेखा पर विकसित नहीं होता; उसमें बहुत सारी रेखाएँ मिलती हैं और बहुत सारे संघर्षों से उसे खाद-पानी मिलता है। तो क्या आज हमारा जो भारत है, जिसमें हम एक खास सांस्कृतिक वर्चस्व या एक खास किस्म के हिंदुत्व का वर्चस्व देख रहे हैं, क्या वह हमारे काम की चीज़ है? या हमारे सामने दूसरे सवाल हैं जिनके उत्तर हमें तलाशने हैं? हमारे सामने वैश्विक चुनौतियाँ हैं, टेक्नोलॉजी की चुनौतियाँ हैं, और अपने विकास को गति देने की चुनौतियाँ हैं। हमें उनकी ओर ध्यान देने की जरूरत है या फिर इस तरह के झगड़ों में अपना समय जाया करने की? अनंतमूर्ति के पास इन सारे सवालों के जवाब हैं।
मैं अनंतमूर्ति का एक उदाहरण देता हूँ। वे अक्सर संस्कृतियों के संबंध में एक बात बताते हैं कि एक व्यक्ति जो जंगल में कुल्हाड़ी से एक पेड़ काट रहा है, उससे पूछा जाता है कि "भई, यह जो कुल्हाड़ी है, इसे मुझे दे दीजिए।" तो वह कहता है कि "यह कुल्हाड़ी मैं आपको नहीं दे सकता, यह परंपरा से मेरे पास आई है।" पूछने वाला कहता है, "परंपरा से तुम्हारे पास आई है? यह कितनी लंबी परंपरा है?" वह जवाब देता है, "यह मेरे दादाजी के दादाजी से हमें मिली है।" व्यक्ति कहता है, "नहीं, यह तो नई लग रही है।" इस पर वह कहता है, "हाँ, इसका डंडा टूट गया था तो हमने इसमें नया डंडा लगवाया है, इसकी धार कमजोर हो गई थी, तो नई धार बनाई है, और इसे रंदा भी लगवाया है।" फिर सवाल करने वाला व्यक्ति पूछता है कि "जब सब कुछ बदल गया, तो फिर तुम इसे परंपरा से आई हुई चीज़ क्यों कहते हो?" तब वह लकड़हारा कहता है कि "इसके साथ जो संस्कार है, वह मेरे पास आया है। यह कुल्हाड़ी भले ही नई है और हमने इसमें बहुत सारी चीजें बदल दी हैं, लेकिन इसके साथ जुड़ा संस्कार हमारे पास पीढ़ियों से आया है।" इसी तरह संस्कृतियों से जो संस्कार हमारे पास आया है, भले ही आज उसकी शक्ल बदल गई हो, लेकिन वह उस कुल्हाड़ी के रूप में हमारे भीतर मौजूद और निहित है। तो संस्कृतियों का यह जो सवाल है कि क्या संस्कृतियाँ एक दिन में विकसित हो जाती हैं, और क्या कोई स्वयं को एक महान संस्कृति से जोड़कर गौरवान्वित महसूस कर सकता है? अनंतमूर्ति के पास इन सारे सवालों के बहुत वाजिब उत्तर हैं। इसके अलावा, आज की बदलती हुई मॉडर्न दुनिया में जो हम मॉलों की दुनिया बना रहे हैं, वह रेहड़ी पर काम करने वाले, फल और सब्जियाँ बेचने वाले छोटे लोगों के लिए कत्लगाह के समान है। इन सारी चीज़ों को उन्होंने आज से लगभग 30-40 साल पहले ही देख लिया था और उनके उत्तर तलाशने की कोशिश की थी, जो आज भी मुझे हमारे काम की चीज़ लगती है।
योगेश शर्मा : जी, तो अभी आपने उनके एक बड़े महत्त्वपूर्ण नॉवेल 'संस्कार' का ज़िक्र किया। ज़ाहिर है, वह एक बहुत बढ़िया और काफी चर्चित उपन्यास है। उन्हीं संदर्भों का एक उपन्यास हिंदी में भी हमारे पास है—'चित्रलेखा'। तो एक प्रश्न यह बनता है कि आप कन्नड़ साहित्य और हिंदी साहित्य में क्या मूलभूत फर्क देखते हैं? कन्नड़ साहित्य में ऐसी कौन सी चीजें हैं जो हिंदी साहित्यकारों को वहाँ से सीखनी चाहिए?
अंकित नरवाल : देखिए, जो रचना को बनाता है, वह जीवन है। और पूरा जो भारतीय जीवन है, वह कमोबेश एक ही ढंग का जीवन है। कन्नड़ साहित्य में जो बड़े नाम हैं—जैसे आज के दौर में आप भैरप्पा का नाम लें, या मुश्ताक बानो का जिन्हें बिल्कुल हाल ही में बुकर प्राइज़ भी मिला—तो कर्नाटक के आसपास का इलाका या कन्नड़ का जो क्षेत्र है, वहाँ का जीवन एक खास किस्म के परंपरा-बोध से बना हुआ है, जिसमें हिंदू संस्कार बहुत गहरे हैं। दूसरी ओर, जो हिंदी बेल्ट या हिंदी समाज है, उसके संस्कारों में संस्कृतियों की निरंतर आवाजाही है। आप देखेंगे कि यहाँ जितना मुस्लिम वर्चस्व है, उतना ही सिख और अन्य सांप्रदायिक वर्चस्व भी है। तो कन्नड़ साहित्य जिस ज़मीन या जीवन से अपनी ऊर्जा ले रहा है, वह अलग है। आप देखिए, यदि आप कर्नाटक जायेंगे या बैंगलोर जैसे आधुनिक शहर में जायेंगे, तो आप हर गली और हर चौराहे पर एक मंदिर पायेंगे।
ऐसी जगह पर जहाँ अनंतमूर्ति रहे, उन्होंने 'संस्कार' जैसा नॉवेल लिखा जो मंदिर को चुनौती देता है। या उनका जो सबसे महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, जिसकी कम चर्चा होती है—'भारतीपुरा'; यह एक मंदिर से जुड़ी हुई संस्कृति को हमारे सामने लाता है। भारतीपुरा एक गाँव है और वहाँ का मंदिर उस पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का केंद्र बन गया है। आज के समय में जब हम राम मंदिर की बात कर रहे हैं और उस व्यवस्था में जब हमारे पास घोटालों की एक पूरी लिस्ट बन गई है कि कैसे चंदे को चुराया जाता है या कैसे एक ऐसी संरचना विकसित की गई है जो अर्थ-केंद्रित है, आस्था-केंद्रित नहीं; ठीक वैसी ही संरचना का उद्घाटन 1972 में लिखा गया 'भारतीपुरा' उपन्यास करता है।
तो क्या 1970-80 के दशक में हिंदी के पास कोई ऐसी रचना है, जो ऐसे स्ट्रक्चर को पहचानती है? मुझे लगता है कि हिंदी में 'भारतीपुरा' जैसी रचना नहीं है। हिंदी का जो समाज है, वह वहाँ से ऐसी रचनाएँ ग्रहण कर सकता है और अपने आज के समय की व्याख्या को और तीव्र बना सकता है। अनंतमूर्ति या उनके आसपास के जो लोग हैं, उन्हें पढ़कर हम यह सीख सकते हैं कि वे कैसे अपने समाज को परिभाषित कर रहे हैं। एक और महत्त्वपूर्ण बात जो हिंदी के लेखकों को भी सीखनी चाहिए, वह यह है कि आज के हमारे लेखक या पुराने दौर के लेखक भी अपनी रचनाओं में एक तरह की पुनरावृत्ति करते हैं। अनंतमूर्ति कहते हैं कि लेखक को अपनी हर नई रचना के साथ अपने कुछ पाठक खो देने चाहिए। यदि हम अपने कुछ पाठक नहीं खोते हैं, तो इसका अर्थ है कि हम वही लिख रहे हैं, जो अपनी पुरानी रचना में लिख चुके हैं। यह कन्नड़ साहित्य या विशेष रूप से अनंतमूर्ति से सीखने की ज़रूरत है कि वे जिस समाज में रहते हैं, उसकी आलोचना करने का माद्दा रखते हैं। उनके 'संस्कार' उपन्यास पर जो फिल्म बनी थी, उसमें चंद्रि की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री की बाद में हत्या कर दी गई थी; ऐसे खतरों के बावजूद भी जो लेखक लिख सकता है, आज के हिंदी समाज को उसकी ज़रूरत है। हिंदी में ऐसे खतरे उठाने की परंपरा कम है। आप ऐसे खतरे उठाने वाले लेखकों को उंगलियों पर गिन सकते हैं।
योगेश शर्मा : अंकित जी, अभी आपने बात की कि किसी रचनाकार को अपने समाज की आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए। इसका अर्थ है कि रचनाकार भी अपने आप में एक आलोचक हो सकता है, जिससे यह पता चलता है कि रचना भी अपने आप में एक आलोचना हो सकती है। तो एक सवाल यह बनता है कि एक आलोचक के तौर पर, आप किसी रचना और आलोचना के बीच किस तरह का संबंध देखते हैं?
अंकित नरवाल : देखिए, रचना और आलोचना, दोनों को मैं एक ही चीज़ मानता हूँ। एक ही चीज़ इस अर्थ में कि दोनों जिस चीज़ के लिए काम कर रही हैं, जिस व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रयासरत हैं, या जिस समाज के दिवास्वप्न को अपने भीतर संजो रही हैं, वह एक जैसा ही है। रचनाकार के पास, यदि कविता के संदर्भ में कहें, तो बिंब होते हैं जिनके सहारे वह एक समाज बनाने की कोशिश करता है। वहीं आलोचना के पास उस बिंब की व्याख्या करते हुए, या उसे खोलते हुए एक ऐसे समाज को सामने लाने का स्पेस होता है जो रचना में या तो अदृश्य है, कहीं छूट गया है, या जिसका ठीक-ठीक आकार पाठक को दिखाई नहीं देता।
उदाहरण के लिए, यदि हम मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' की व्याख्या के संदर्भ में बात करें, तो क्या उसमें दिखाई देने वाला महास्वप्न एक ऐसे समाज का निर्माण करता है जो निश्चित रूप से जनप्रतिनिधियों द्वारा लूटा गया है? बहुत लंबे समय तक इस कविता के संबंध में यह कहा गया कि यह दुरूह है और इसमें इतने जटिल बिंब हैं जो समझ में नहीं आते। आलोचना यह करती है कि जिस व्यवस्था या रचना को दुरूह कह दिया गया है, उसके भीतर पनप रहे समाज को बाहर लाती है कि यह कैसा समाज बन रहा है। इसमें किन लोगों को पहचानने की ज़रूरत है, आलोचना उनकी व्याख्या करती है। रचनाकार के पास स्पेस कम होता है। उसके पास बनते हुए समाज के संबंध में व्यवस्था को आलोचित करने का स्पेस तो है, लेकिन आलोचक के पास उस स्पेस के बहुत सारे सिरों को देखने का भी अवकाश होता है। यदि आलोचक ईमानदार है, तो वह रचना में मौजूद हाशिए के बिंबों और प्रतीकों को बहुत विस्तार से हमारे सामने खोलता है। वह यह दिखाता है कि कविता में जो समाज आया है या उसके बनने की जो संभावनाएँ हैं, उसमें दिक्कतें किसे हैं और किससे हैं? कौन सी व्यवस्था इसमें रोड़ा अटका रही है? या कवि जो समाज बना रहा है, उसके यथार्थ रूप लेने की संभावनाएँ कितनी हैं और क्या वह महज़ एक कल्पित समाज है?
जैसे, जिस कविता को अच्छी कविता की संज्ञा दी जाती रही है और जिसे औसत कविता माना गया है, उन दोनों के समाजों में जो भिन्नताएँ हैं, उन्हें आलोचना ही खोलती है। आलोचना के पास यह स्पेस है कि वह उसे ईमानदारी से स्पष्ट करे, जबकि रचनाकार के पास ऐसे तुलनात्मक समाजों की व्याख्या का कोई स्पेस नहीं होता। जैसे निर्मला पुतुल की कविता की हम बात कर रहे थे कि, "बाबूजी, मत ब्याहना ऐसे देश जहाँ पहुँचने के लिए बेचनी पड़ें बकरियाँ।" इस कविता में आए बिंब कि एक लड़की को इतनी दूर शादी करने की जो मजबूरियाँ हैं, और अर्थव्यवस्था के डांवाडोल होने की वह स्थिति जिसमें घर की जीवंत चीज़ों को बेच देना पड़ता है—इसे अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता तो रचनाकार के पास है। लेकिन आलोचक के पास यह स्पेस है कि वह इस रचना के सामाजिक सरोकारों, आर्थिक पहलुओं और उस परिवेश को खोले जिसके कारण कवि को ऐसा कहना पड़ा। यह रचनाकार के बाद का काम है। मुझे लगता है कि ये दोनों काम अपने आप में रचना के लिए ही महत्त्वपूर्ण हैं और रचना के ही हिस्से हैं। इसलिए रचना बनाम आलोचना के सवाल में, इन दोनों को इतना दूर करके नहीं देखना चाहिए कि ये दो अलग चीजें लगने लगें।
योगेश शर्मा : आपने अपने जवाब में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही कि आलोचना कविता के किसी जटिल बिंब को खोलने का काम करती है या उन सामाजिक मूल्यों की पहचान करती है जो कविता के अर्थ में अंतर्गुंफित और निहित हैं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या आलोचना देश-कालातीत होती है? क्या वह हमेशा के लिए किसी पाठ का कोई एक अर्थ स्थापित कर देती है, या कई बार हम देखते हैं कि आलोचना पुरानी पड़ जाती है? आप इस संदर्भ में क्या सोचते हैं? किसी रचना से संबंधित कोई आलोचना, क्या वह किसी नए पाठक के लिए महज़ एक सीढ़ी है या वह कोई अंतिम मापदंड होती है?
अंकित नरवाल : यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण सवाल किया है आपने! यह आलोचना के इतिहास का भी सवाल है। आप देखिए कि एक समय पर जायसी या कबीर के संबंध में—विशेषकर कबीर के संबंध में हम इस सवाल को अच्छी तरह समझ सकते हैं। आलोचना अपने परिवेश और उसके सीमित ज्ञान से उपजती है। आलोचक के पास अपनी परंपरा का ज्ञान होता है, भविष्य का एक स्वप्न होता है और कुछ ज्ञानगत सीमाएँ होती हैं। इन्हीं से कोई भी आलोचक अपना एक विवेक निर्मित करता है।
जैसे, कबीर के संबंध में बहुत लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि वे एक ऐसे समाज की परिकल्पना करते हैं जिसमें ऐसा मनुष्य बने जो न हिंदू हो, न मुस्लिम; वह केवल एक मनुष्य हो। शुरुआती तौर पर जब इसकी व्याख्याएँ हुईं, तो कबीर को मनुष्यता का बहुत बड़ा हितैषी और महान कवि माना गया। लेकिन जब दलित आलोचना और स्त्री आलोचना आई, और उनके पास दलित जीवन या स्त्री होने का अनुभव था, तो कबीर के यहाँ बहुत सारी नई चीजें रेखांकित की गईं। उदाहरण के लिए, "माया महा ठगिनी" में माया को स्त्रीलिंग क्यों कहा गया? या कबीर की रचनाओं को जब दलित दृष्टिकोण से पढ़ा गया, तो पाया गया कि यह उस सर्वांगीण मनुष्य की हितैषी नहीं है जिसमें दलित, पिछड़े या अन्य लोग भी शामिल हों। तो जो आलोचक एक समय पर इन चीज़ों को नहीं देख रहे थे, वे बाद में इन्हें दूसरी तरह से देखने लगे।
जैसे आपने साक्षात्कार शुरू होने से पहले रैदास के संबंध में एक सवाल किया था—रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि रविदास केवल अपनी जाति को आइडेंटिफाई(पहचान) करते हैं कि "मैं चमार हूँ।" उन्होंने इसे इतना ही समझा, जबकि रैदास अपने रचनात्मक स्पेस में उसे ग्लोरिफाई भी(महिमामंडित) करते हैं; यह बात शुक्ल जी से छूट गई।
जब तक हमारे पास अस्मिता का सवाल नहीं था—यानी जब तक हमारे पास कीर्केगार्द या सार्त्र जैसे विचारकों को पढ़ने और समझने की दृष्टि नहीं थी—तो क्या हमारे पास कविता में आई इस तरह की बातों को हल करने के कोई टूल्स थे? यदि हमारे पास टूल्स नहीं थे, तो हम यह समझ नहीं पा रहे थे कि यहाँ रैदास अपनी जाति को ग्लोरिफाई कर रहे हैं या यह उनकी जाति पर होने वाले दंश और पीड़ा की कविता है। जैसे मीरा को बहुत लंबे समय तक साहित्य के इतिहासों में एक 'फुटकल कवि' के तौर पर गिना जाता रहा। मीरा जो अपने दर्द को ग्लोरिफाई कर रही है और अपनी पीड़ा को अभिव्यक्ति दे रही है, यदि हम उसे स्त्री आलोचना या स्त्री भाषा के परिप्रेक्ष्य में देखेंगे, तो मीरा के संबंध में हमारी पुरानी आलोचना और क्रिटिसिज्म पुराना पड़ जाएगा।
एक ज़माने में गांधीवाद को आलोचना के मापदंड की तरह इस्तेमाल किया गया। यह माना गया कि रचना में एक ऐसे समाज का निर्माण होना चाहिए जिसमें पंक्ति में खड़ा अंतिम आदमी भी महत्त्वपूर्ण समझा जाए और रचना का अंत आदर्शवादी हो; ऐसी रचनाओं को आलोचकों ने महत्त्वपूर्ण माना। बाद में जब गांधीवाद का दौर समाप्त हुआ और यथार्थवाद का दौर आया, तो यह माना गया कि रचना में आए यथार्थ को अभिव्यक्त करना आलोचना का सबसे महत्त्वपूर्ण काम है। फिर यथार्थ की परतों का दौर आया, क्योंकि यथार्थ कोई एक बनी-बनाई चीज़ नहीं है। उसके पीछे भी बहुत सारे यथार्थ होते हैं जिन्हें परत-दर-परत उघाड़ना आलोचना का काम है। इसके बाद रचना की 'ब्यूटी' (सौंदर्य) का मूल्यांकन करने वाले वादों का विकास हुआ, जिसमें यह बात हुई कि पोएट्री या कहानी की ब्यूटी क्या है, जिसे 'कहानीपन' कहकर आलोचित किया गया। क्या रचना महज़ एक विचार है, जिससे आप रचना का अंत कर देते हैं? या रचना में आया विचार एक धागे की तरह पूरी रचना में पिरोया होना चाहिए? जब हमारे पास इनकी व्याख्या के नए टूल्स आए, तो हमने पाया कि हमारी पुरानी आलोचना आज हमारे काम की नहीं रही है। जब पुरानी आलोचना के पास आज की रचनाओं की व्याख्या के लिए उचित टूल्स नहीं होते, तो हमें नए ज्ञान और नए टूल्स की ज़रूरत पड़ती है। अतः आलोचना यदि स्वयं को नया नहीं करती है, तो वह पुरानी पड़ जाती है। कोई भी अच्छा आलोचक अपने दौर और समय की जटिलताओं से ही रचना का मूल्यांकन करता है। यदि हमारे पास मूल्यांकन के नए टूल्स नहीं हैं, तो हम वही बातें दोहरा रहे होंगे जो पुराने आलोचक पहले ही कह चुके हैं।
योगेश शर्मा : तो अंकित जी, आपने नामवर सिंह की जीवनी लिखी, और वह किताब बड़ी चर्चित हुई। नामवर सिंह ने एक जगह लिखा है कि जो आलोचक होता है, वह मूलतः एक रचनाकार ही होता है। आप इस संदर्भ में क्या सोचते हैं? क्या आलोचक वाकई एक रचनाकार ही होता है, या आलोचक महज़ एक कोई उन्नत किस्म का पाठक मात्र होता है?
अंकित नरवाल : देखिए, जैसा कि मैंने पहले भी कहा, एक रचनाकार के पास जो चीज़ें नहीं होने से भी उसका काम चल सकता है(हालांकि चलता नहीं है, क्योंकि दोनों को ही अपने-अपने स्तर पर बहुत गहन अध्ययन की ज़रूरत होती है), आलोचक के पास वे होनी चाहिए। क्योंकि किसी भी समाज की सच्चाई एकरेखीय नहीं होती, वह परत-दर-परत होती है। जैसे प्रेमचंद या निराला जब अपने समय में लिख रहे थे, तो उनके सामने अपने समय का यथार्थ था—एक ऐसा देश बन रहा था जिसमें किसानों की दुर्गति थी और एक खास किस्म की व्यवस्था किसानों को निगल रही थी। यह सामान्य यथार्थ सबको दिखाई दे रहा था। तो क्या रचनाकार के लिए इस यथार्थ को अभिव्यक्त कर देने मात्र से काम चलने की संभावना थी? या इस ज़मीन के नीचे कुछ और भी पक रहा था जिसे सामने लाने की ज़रूरत थी?
प्रेमचंद की जो सबसे कम चर्चित किताब है, जो 'गोदान' के नीचे दब गई—उनका उपन्यास 'रंगभूमि'—उसमें आप देखें कि प्रेमचंद इस बात को पहचान गए थे कि समस्या केवल महाजन के सूद की नहीं है। समस्या औद्योगीकरण से विकसित हो रही है, जहाँ एक बड़ी पूंजी बहुत सारी छोटी पुंजियों को अपने अधीन कर रही है। इससे जो समाज बनेगा, वह पूंजी-आधारित समाज होगा जो मानवीय भावों को खत्म कर देगा। वह महाजन और किसान के बीच आपसी भाईचारे के संबंध को समाप्त कर देगा; वहाँ भाईचारे के लिए कोई जगह नहीं होगी। बड़ी मशीन बहुत सारे छोटे उपकरणों को अपने अधीन कर लेगी। बड़ी फैक्टरियाँ उन छोटे-छोटे हलों के लिए स्पेस खत्म कर देंगी जिन्हें किसान बैलों से खींचता है। यह प्रेमचंद ने अपने समय में ही पहचान लिया था। अब आपका जो सवाल है कि क्या आलोचक केवल एक उन्नत पाठक भर है?
एक उन्नत पाठक तो वह है ही, लेकिन उससे अधिक क्या है? आलोचक के पास एक खूंटी है, जिस पर रचना एक थैले की तरह टंगी हुई है। यदि आप अच्छे आलोचक नहीं हैं, तो आप महज़ उस खूंटी की तरह हैं। लेकिन यदि आप अच्छे आलोचक हैं, तो आप उस थैले को उतारकर यह देखते हैं कि इसके भीतर क्या चीज़ें हैं। और इस थैले में जो उपकरण भरे गए हैं, वे आज हमारे किस काम के हैं? यदि वे हमारे काम के नहीं हैं, तो उन्हें कैसे अपने काम का बनाया जा सकता है? आलोचना, रचना से बढ़कर यह काम करती है। आलोचना एक रचना ही है; अच्छी आलोचना केवल सिद्धांतों का कोई बड़ा जखीरा नहीं है कि आपने बहुत सी थ्योरीज़ का अध्ययन कर लिया और आपका काम चल गया। जैसा कि नामवर सिंह कहते थे कि यदि आपके पास एक रचना को खोलने के लिए सिर्फ एक 'पेचकस' भी है, तो आपको औजारों के बड़े बक्से की ज़रूरत नहीं है। यदि आपके पास वह पेचकस है और उसे इस्तेमाल करने की सही समझ है, तो आप रचना को खोल सकते हैं और रचना में निहित एक बड़े, वृहद समाज का निर्माण दिखा सकते हैं।
आलोचक से उन्नत पाठक होने की उम्मीद की जाती है, और यह उम्मीद वाजिब भी है। एक अच्छा और उन्नत पाठक रचना की उन बारीकियों तक नहीं पहुँच पाता जहाँ आलोचना उसे पहुँचाने की कोशिश करती है। वह रचना में आए हुए स्लोगन्स और सामान्य स्टेटमेंट्स तक ही पहुँच पाता है; वह उसके बड़े क्लेवर (आकार) को नहीं समझ पाता। इसके साथ ही मैं यह भी मानता हूँ, जैसा कि नामवर सिंह ने कहा था, कि यदि घाटी में एक हाथी खड़ा है और चोटी पर एक खरगोश, तो चोटी पर खड़े खरगोश को घाटी में खड़े हाथी से स्वयं को बड़ा नहीं समझना चाहिए। रचनाकार के पास जो मूल टेक्स्ट है, वह निश्चित रूप से घाटी में खड़ा हुआ एक हाथी है। लेकिन जो आलोचक चोटी पर खड़ा है, यदि उसके पास देखने की दृष्टि और टेक्स्ट तक पहुँचने के सही एंगल्स नहीं हैं, तो वह रचना तक नहीं पहुँच पाता। जैसा कि विजयदेवनारायण साही ने भी एक जगह लिखा है कि आलोचक का काम उस व्यक्ति जैसा है जो ट्रांजिस्टर को सेट करता है। एक निश्चित अंक पर, जहाँ से सिग्नल्स आ रहे हैं, ट्रांसमीटर को फिट कर देना आलोचक का काम है। यदि सिग्नल्स अच्छे हैं और चैनल पर कोई अच्छा व्यक्ति बोल रहा है, तो आपको हूबहू अच्छी चीज़ें सुनाई देंगी। यदि चैनल पर कोई नहीं बोल रहा, तो आपको कुछ सुनाई नहीं देगा। यानी, यदि रचना में कोई काम की वस्तु नहीं है, तो आपको काम की चीज़ नहीं मिलेगी। आलोचना वह विवेक है जो आपको उस वेवलेंथ पर ले जाता है जिस पर रचना पहुँचती है, और एक उन्नत पाठक यह कर सकता है, क्योंकि अच्छे आलोचक के पास बहुत सारे अनुशासनों की समझ होना अनिवार्य है।
योगेश शर्मा : इसी संबंध में ही एक सवाल हमारे सामने और आता है कि वर्तमान आलोचना में जो बिल्कुल नए डिस्कोर्सेस (विमर्श) हैं—यदि हम 1991 के बाद पैदा हुए विमर्शों (जैसे आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श, या स्त्री विमर्श) को भी शामिल करते हुए दूसरे डिस्कोर्सेस की तरफ जाएँ, जैसे इको-फेमिनिज़्म या इको-फिलॉसफी—तो इस तरह के डिस्कोर्सेस हिंदी आलोचना में अपेक्षाकृत कम स्थान पा रहे हैं। जबकि हम देखते हैं कि ये बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं और इनके आलोक में रचनाओं का पाठ अनिवार्य है। आप इस संदर्भ में क्या सोचते हैं?
अंकित नरवाल: आप बिल्कुल सही बात कह रहे हैं कि सन् 2000 के बाद का जो हमारा साहित्य है, क्या हम उसे केवल इन तीन विमर्शों के संदर्भ में ही देखें या उससे आगे बढ़ने की ज़रूरत है? यदि हम उससे आगे बढ़ें तो इको-फेमिनिज़्म, इको-फिलॉसफी या इको-क्रिटिसिज़्म की बात आती है। या फिर जेंडर बाइनरीज़ के सवाल हैं और जेंडर्स का जो एक बड़ा अम्ब्रेला (LGBTQIA+) बन गया है, उसकी बात आती है। भाषा और उसमें आए मुहावरों को अब इन तरीकों से देखा जा रहा है। हिंदी में जिसे क्वीयर विमर्श या एलजीबीटी ग्रुप कहते हैं, क्या उसे समझने के लिए हमारे पास इतनी पर्याप्त मात्रा में रचनाएँ हैं कि हम उनसे कोई खास समझ या विमर्श विकसित कर सकें?
चूंकि हिंदी में अभी हमारे पास उस तरह की समझ को विस्तार देने वाली रचनाओं की कमी है ही। हिंदी के पास अंग्रेजी जितना बड़ा एक्सपोज़र नहीं है। हमारे पास जो ज्ञान आता है, वह मूलतः अंग्रेजी से आता है, और अंग्रेजी में ज्ञान बहुत सी दूसरी भाषाओं से आता है। अतः ज्ञान के आयात का जो हमारा सोर्स है, वह सीमित मात्रा में है।
लेकिन अब चूंकि जो नए लोग हिंदी में काम कर रहे हैं, उनके सामने भाषा किसी बैरियर की तरह नहीं है। आप देखिए कि एडवर्ड सईद जैसे लोगों ने भाषा पर काम किया। या इको-फेमिनिज़्म स्त्री को प्रकृति की तरह पढ़ने की कोशिश करता है। हमारे यहाँ अभी तक स्त्री को केवल एक 'अस्तित्व' की तरह पढ़ने की कोशिश की गई थी; क्या उसे प्रकृति की तरह पढ़ा जा सकता है, इसकी बात करना और रचना को इस नज़रिए से देखना एक बड़ी बात है। या मैंने जेंडर्स की बात की कि यह एक बड़ा अम्ब्रेला है, जिसमें अभी सेक्स आइडेंटिफाई नहीं हुआ है, होमोसेक्सुअल्स, बाईसेक्सुअल्स या लेस्बियंस शामिल हैं। वे भाषा को कैसे देखते हैं? जैसे भाषा में बहुत सारे सवाल आते हैं। हमारे लेखकों का भाषा को बरतने का नज़रिया क्या अभी इतना समृद्ध हो गया है कि वे इस तरह से भाषा का इस्तेमाल करें और हमारी भाषा उनके अस्तित्व की पहचान भी कर पाए? नहीं, अभी हमारी भाषा में ऐसे अस्तित्वों को पहचानने का माद्दा नहीं है, क्योंकि हमारी भाषा जिस समाज से आ रही है, वह अपेक्षाकृत बहुत ही सांप्रदायिक किस्म का और अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ समाज है। जिसके पास अपने से नीचे व्यक्ति को ढूंढने का बहुत सारा स्पेस है।
यहाँ जैसे द्विवेदी जी ने भी कहा था कि यहाँ हर दलित अपने से निचले दलित को ढूंढ लेता है। अपने से नीचे के आदमी को ढूंढकर हम जो सुख प्राप्त करते हैं, वह बहुत सूक्ष्म स्तर पर हमारी चेतना में घुसा हुआ है। इसलिए हमारी जो भाषा या कथाएँ हैं, उनमें अभी इस बात का स्पेस ही नहीं है कि हम इस तरह से सोचें या भाषा का ऐसा इस्तेमाल करें जो दूसरे समुदायों को हानि न पहुँचाए। मैं समझता हूँ कि हर रचना में एक खास समुदाय लीड भूमिका में होता है। हमें रचना को पढ़ते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो समाज पीछे छूट गया है, उसके साथ लेखक ने कैसा बर्ताव किया है।
हम रचना में ज़ाहिर तौर पर यथार्थ दिखाते हैं, जैसा हमारा समाज है उसे प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जहाँ पात्र नहीं बोल रहे होते, बल्कि लेखक बोल रहा होता है, वहाँ हमें यह देखने की ज़रूरत है कि हमारी स्त्रियाँ दलितों के साथ कैसा बर्ताव कर रही हैं। जो पुरुष हैं, वे दूसरे दलित पुरुषों के साथ कैसा बर्ताव कर रहे हैं, या एक ही दलित समाज के पुरुष अपनी स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं। यदि हम अपनी रचनाओं में यह देखेंगे, तो पायेंगे कि हमारे लेखक अपने मुख्य पात्रों के प्रति जितने संवेदनशील हैं, उतने संवेदनशील वे अपने गौण पात्रों के साथ नहीं हैं—बावजूद इसके कि वे यथार्थ दिखा रहे हैं। आप सामाजिक समाज का यथार्थ दिखाते हैं, समाज का आईना हमारे सामने रखते हैं, यह एक जुदा बात है; लेकिन उसमें भी जहाँ एक लेखक बोल रहा होता है, वहाँ क्या हम इस बात का खयाल रखते हैं कि हम अपनी भाषा का कैसा इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या हम स्त्री भाषा को वैसा ही दिखा रहे हैं, या वह वास्तव में एक पुरुष की ही भाषा है?
अब हिंदी में इसकी पढ़ाई-लिखाई शुरू हुई है। आज से लगभग 5-10 साल बाद आप देखेंगे कि हमारा पढ़ने-लिखने का, और किताब, कहानी व कविता को देखने का जो नज़रिया है, वह बिल्कुल बदल जाएगा। जिन्हें आज हम महान कवि कह रहे हैं, हमें लगेगा कि ये महान नहीं हैं। ये अपनी भाषा में उस व्यक्ति का अपमान कर रहे हैं जिसे सबसे ज्यादा सहानुभूति की ज़रूरत है। ये जो नए विमर्श हैं—इको-फेमिनिज़्म, लैंग्वेज का डिस्कोर्स, स्त्री भाषा का डिस्कोर्स या दलित भाषा का डिस्कोर्स—जब हम इनके ज़रिए रचना का अध्ययन करने लगेंगे, तो पायेंगे कि हमारे बड़े कवि अपनी ही रचना में एक बड़े समुदाय के साथ छल कर रहे हैं।
योगेश शर्मा : तो अंकित जी, आजकल एक बात बड़ी चर्चा में है और इधर इस पर काफी बातचीत हो रही है कि आलोचना के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, आलोचना कहीं न कहीं मृतप्राय होती दिखाई दे रही है। इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
अंकित नरवाल : देखिए, इस तरह के सवाल कि 'आलोचना मृतप्राय है', आ कहाँ से रहे हैं? हमें यह देखने की ज़रूरत है कि क्या ये सवाल उन रचनाकारों की ओर से आ रहे हैं जिनके मूल्यांकन में देरी है या जिनका मूल्यांकन अभी तक नहीं हुआ है? इस तरह के सवाल हमें चिंता में तो डालते हैं, लेकिन साथ ही चिंतन का रास्ता भी खोलते हैं कि हमें इस बारे में सोचना चाहिए कि ऐसे सवाल उठ क्यों रहे हैं। क्या ऐसे सवाल अपने दौर में कबीर ने उठाए थे? क्या निराला ने उठाए थे? आप अपने समय के किसी भी बड़े लेखक का नाम ले लीजिए, क्या उन्होंने ऐसे सवाल उठाए थे? आज ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि लोगों को मूल्यांकन की जल्दी है। हर व्यक्ति यह चाहता है कि आज वह कोई कविता लिखे और तुरंत कोई उसका महिमामंडन करके उसे सर्वश्रेष्ठ कवि, सर्वश्रेष्ठ उपन्यासकार या सर्वश्रेष्ठ कहानीकार बना दे।
अच्छी रचना का आज भी एक अच्छा मूल्यांकन हो रहा है। यदि हम कहें कि रचना या आलोचना मृत्यु की ओर बढ़ रही है, तो ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि आलोचना भी इस बात को समझती है कि मूल्यांकन में जल्दी नहीं करनी चाहिए; इसके लिए थोड़ा समय देने की ज़रूरत होती है। जैसे आज आपको किसी कवि की कविता में बड़ी संभावना दिखाई देती है कि यह बहुत ऊँचे दर्जे की कविता है। लेकिन दूसरे ही संग्रह में आप देखते हैं कि वह कवि अपना मिजाज बिल्कुल बदल देता है। जो आलोचक पहले यह कह रहा था कि यह बड़ी संभावनाओं वाला कवि है और इसके साहित्य में बड़े समाज के निर्माण का स्पेस है, क्या वह दूसरे संग्रह के मूल्यांकन में यह नहीं पाएगा कि कवि चूक गया है या उसके पास से वह स्पेस खत्म हो गया है?
तो अभी जो समय है, मुझे लगता है कि उसमें थोड़ा ठहर कर देखने की ज़रूरत है। जैसे नामवर सिंह भी कहते थे कि कई बार अतिशय प्रशंसा से भी प्रतिभाएँ समाप्त हो जाती हैं। अतः किसी विधा की मृत्यु से जुड़े इस तरह के सवाल बेमानी हैं और आलोचना अच्छा काम कर रही है। आप अपने इस समय में देखिए, कितने आलोचक हैं जो बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं। आप नाम गिनिए, आपको बहुत सारे लोग दिखाई देंगे जिनकी लेखनी में एक तरह की ईमानदारी है। ऐसे लोग बहुत आपको मिलेंगे। तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि आलोचना मर रही है?
योगेश शर्मा : महत्त्वपूर्ण बात आपने कही अंकित जी। आपकी दृष्टि में विचारधारा कैसे काम करती है?
अंकित नरवाल : देखिए, विचार बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। किसी भी रचना को पढ़ने का टूल हमारे पास विचार से ही आता है। अब विचार को कैसे परिभाषित करेंगे? जैसे बहुत लंबे समय तक रचना को पढ़ने के लिए हमारे सामने दो विचार थे—एक ओर पूंजीवाद था और दूसरी ओर समाजवाद था। तो जो बनता हुआ समाज है, जिसे लेकर हमारे रचनाकार की चिंता है, क्या वह समाज पूंजी और समाजवाद या जनवाद की लड़ाई से बनेगा? क्या हमारी रचना को उसकी चिंता है, या हमारी आलोचना को उसकी चिंता है?
विचारों की लड़ाई के बीच आप आज के ज़माने में देखें—कोई कहता है कि आप आरएसएस की विचारधारा से जुड़े हैं, कोई कहता है कि आप मार्क्स की विचारधारा से जुड़े हैं, कोई गांधीवादी कहता है, तो कोई कांग्रेसी। क्या एक आलोचक इन सारे वादों के बीच से कोई ऐसा रास्ता निकाल सकता है जो उस अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचाए जिस तक लाभ नहीं पहुँचा है? इन सारी विचारधाराओं के बीच कौन हैं? क्या मार्क्स जब यह कहते हैं कि पूंजी की समझ बेहद ज़रूरी है, समाज का निर्माण पूंजी से होता है, और जिसका पूंजी पर आधिपत्य है वही समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और समाज का निर्धारण करता है; तो क्या पूंजीवाद में इस तरह की बातें शामिल नहीं हैं? एक आलोचक के सामने इन सारी विचारधाराओं की समझ होना बेहद ज़रूरी है।
एक रचनाकार अपनी रचना में गाहे-बगाहे जाने-अनजाने बहुत सारे विचारों को समाहित करता है। उसके बने-बनाए पात्र नहीं होते कि वह बनाकर चले कि यह पात्र समाजवाद की लड़ाई लड़ेगा, यह पूंजीवाद की लड़ेगा और यह राष्ट्रवादी विचारधारा की लड़ाई लड़ेगा। वह ऐसा बनाकर नहीं चलता। यदि आलोचक रचना पढ़ते हुए इन बाइनरीज़ की समझ नहीं रखता है, तो क्या वह उस रचना के साथ इंसाफ कर पाएगा? आलोचक भी तो उसी समाज से आया है जिससे रचनाकार आया है। यदि दोनों उसी समाज के प्रोडक्ट हैं, तो दोनों को यह देखना है कि विचारों की इस लड़ाई और रस्साकशी में हम किस व्यक्ति के साथ खड़े हैं। क्या हम ऐसे समाज के साथ खड़े हैं जिसमें सबके लिए लाभ हो, या हम महज़ किसी एक विशेष समुदाय के लाभ की बात कर रहे हैं?
यदि हम किसी विशेष समुदाय के लाभ की बात कर रहे हैं, तो हम रचना और आलोचना में अलग से पहचान लिए जाते हैं। हमारे सामने यह चुनौती है कि हर तरह के विचार को समझते हुए हम उस विचार के पक्ष में खड़े हों जिससे हम समाज को लाभान्वित होता देखना चाहते हैं, न कि किसी एक विशेष वर्ग को। यदि रचनाकार किसी एक विशेष वर्ग को लाभान्वित होते देखना चाहता है, तो वह समावेशी समाज का निर्माण नहीं करता। आलोचना या आलोचक बहुत सारी विचारधाराओं के अध्ययन से ही यह समझता है कि लेखक किसे लाभ पहुँचाना चाह रहा है।
आलोचना में विचारधारा के अध्ययन की ज़रूरत है, और यह विचारधारा का अध्ययन ही एक अच्छे विचारक को जन्म देता है।
योगेश शर्मा : एक सवाल यह भी उभरता है कि किसी आलोचक की विचारधारा उसकी भाषा को कैसे प्रभावित करती है?
अंकित नरवाल : देखिए, भाषा बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और विचार भाषा को डिक्टेट तो करता ही है। जैसे जो विचार गांधीवाद से आता है, उसके पास अपनी शब्दावली और अपने कीवर्ड्स हैं—जैसे जन-कल्याण, सत्याग्रह, अहिंसा आदि। इसी तरह जो दूसरे तरह का विचार है—जैसे राष्ट्रवाद का विचार—उसके पास अपने शब्द हैं, जैसे अपनी संस्कृति, अपना मूल्य, अपना राष्ट्र, अपना सर्वोदय आदि। इन शब्दों के अध्ययन की जो समझ है, वह हमारे पास विचार से ही आती है। उसी से यह पता चलता है कि इसके पूरे सरोकार समाज के किस व्यक्ति से जुड़े हैं।
और कविता में इस तरह से आए हुए शब्दों को हम पहचानते हैं। कविता भाषा का इस्तेमाल करते हुए उन सरोकारों का इस्तेमाल करती है जैसा वह समाज बनाना चाहती है। अच्छी आलोचना उन सरोकारों के सिरों को पहचानती है कि कविता में जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बातें आ रही हैं, ये लाभ किनको पहुँचाएंगी? क्या ये हिंदुओं को लाभ पहुँचाएंगी? क्या ब्राह्मणों को, दलितों को, या केवल सवर्णों को लाभ पहुँचाएंगी? इसकी पहचान कविता में आई हुई भाषा और हमारे भाषा-बोध से पैदा होती है। भाषा-बोध की समझ से ही हम यह जान पाते हैं कि यह कविता किसे लाभ पहुँचाने के लिए लिखी गई है।
क्या भाषा केवल हमारे बाह्य परिवेश की उपज से आती है? भाषा हमारे भीतर बैठे उन शताब्दियों के संस्कारों से आती है जो रोज़मर्रा खान-पान और सांस लेने के साथ हमारे भीतर उतार दिए गए हैं। उसी से हम भाषा का इस्तेमाल करना सीखते हैं। और अपनी कविता में भी हम चाहे-अनचाहे अपने आंतरिक मन को ले आते हैं, जिसमें किसी के प्रति हमदर्दी होती है।
योगेश शर्मा : ज़ाहिर तौर पर, एक समय के बाद हम अपनी भाषा के ही उत्पाद बन जाते हैं।
अंकित नरवाल : बिल्कुल।
योगेश शर्मा : शुक्रिया अंकित जी, इस साक्षात्कार के लिए।
अंकित नरवाल : शुक्रिया योगेश जी, आपने बातचीत की और हमने बहुत सारे विषयों पर इस तरह से विचार साझा किए। धन्यवाद।
(सोनीपत, हरियाणा में जन्में अंकित नरवाल, पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से हिंदी-साहित्य में एम.ए. व पीएच.डी हैं। उन्होंने इसी विश्वविद्यालय के विधि विभाग में लगभग चार वर्षों तक अध्यापन कार्य किया है। इससे पहले लगभग चार वर्षों तक हरियाणा शिक्षा विभाग में रिसोर्स पर्सन के रूप में काम। कविताएँ लिखने से शुरुआत करके सक्रिय आलोचना लेखन की ओर आए। आजकल आ॰ई॰सी॰ यूनिवर्सिटी, सोलन, हिमाचल प्रदेश में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। इनकी अभी तक छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं- अठारह उपन्यास : अठारह प्रश्न, हिन्दी कहानी का समकाल, यू. आर. अनंतमूर्ति : प्रतिरोध का विकल्प, अनल पाखी (नामवर सिंह की जीवनी), संपा.- संपूर्ण कविताएँ- नामवर सिंह, कहानी का लोकतंत्र और अप्रकाशित रचनाएँ- नामवर सिंह। इसके अतिरिक्त विभिन्न पुस्तकों में लेखन व अनेक पत्रिकाओं में निरंतर लेख आदि प्रकाशित होते रहे हैं। भारत की लगभग सभी श्रेष्ठ पत्रिकाओं में अभी तक लगभग 80 लेख प्रकाशित हो चुके हैं। इन्हें राष्ट्रीय साहित्य अकादमी का साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2020, आधार प्रकाशन का प्रथम युवा आलोचक पुरस्कार 2018 मिल चुके हैं। ईमेल- ankitnarwal1979@gmail.com, 9466948355 )
योगेश शर्मा
शोधार्थी, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
kaushikyogesh09@gmail.com, ९८९६९५७९९४
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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