मनुष्य के भीतर छिपे हिटलर की शिनाख्त
(विजयदान देथा की कहानी ‘अलेखूं हिटलर’ पर एकाग्र)
- जगदीश गिरी
राजस्थान के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय कथाकार विजयदान देथा उर्फ़ बिज्जी की कहानियों में राजस्थानी लोकमानस की सूक्ष्म छवियाँ दर्ज़ हैं। लोकजीवन से उनकी गहरी संसक्ति और लोकमानस की वैज्ञानिक समझ के कारण उनकी कहानियों को पढ़ते हुए निरंतर यह महसूस होता है कि वे स्वयं लोक के अभिन्न अंग भी हैं और द्रष्टा भी। यही वजह है कि अपने नितांत निजी अनुभवों को कथा में पिरोते हुए भी वे भावुकता से बचे रहते हैं। बिज्जी के कथा-साहित्य के अध्येता दिनेश चारण उनकी कहानियों की विशिष्टता के संबंध में लिखते हैं कि “वस्तुत: एक नई कथा धारा का प्रारंभ ‘बिज्जी’ की कहानियों से होता है। आपकी कहानियाँ प्रेमचंद की कहानियों से जितनी भिन्न हैं, उतनी ही समकालीन कथाकारों की कहानियों से। संभवतः बिज्जी की कहानियों के सही मूल्यांकन के लिए नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित करने की आवश्यकता है।”1 उनकी रचनाधर्मिता की विशिष्टता यह है कि वे वर्गों या समूहों के बजाय व्यक्ति को अपनी कथाओं का केंद्र बनाकर सार्वभौम सत्य को अभिव्यक्त कर सकते हैं। इसीलिए बिज्जी की कहानियों के पात्र प्राय: वर्गीय चरित्रों का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि वे एक स्वतंत्र इकाई के रूप में अपनी समस्त अच्छाइयों-बुराइयों के साथ आते हैं। उनके यहाँ पात्रों का व्यक्तित्व परिस्थियों से तय होता है, जाति या वर्ग से नहीं। लोक की तलस्पर्शी पहचान के कारण ही वे ऐसा कर पाए हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘अलेखूं हिटलर’ को पढ़ते हुए इसे गहराई से महसूस किया जा सकता है।
‘अलेखूं हिटलर’ अर्थात् अनेक हिटलर। इस कहानी का प्रथम प्रकाशन 1974 में राजस्थानी पत्रिका ‘दीठ’ में हुआ।2 तेजसिंह जोधा के सम्पादन में निकलने वाली ‘दीठ’ के इस अंक में बिज्जी की तीन कहानियाँ थीं- ‘अलेखूं हिटलर’, ‘राजीनांवौ’ और ‘फाटक’। इस अंक की कहानियों से राजस्थानी कहानी के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई जिसका सर्वाधिक श्रेय बिज्जी को ही है। डॉ. अर्जुनदेव चारण ‘अलेखूं हिटलर’, और ‘राजीनांवौ’ कहानियों को इस अर्थ में भी महत्त्वपूर्ण मानते हैं कि इनसे बिज्जी को एक मौलिक कहानीकार के रूप में प्रतिष्ठा मिली।3 ‘अलेखूं हिटलर’ न केवल राजस्थानी कहानी बल्कि हिन्दी कहानी इतिहास में भी एक उपलब्धि कही जा सकती है। इसमें जहाँ प्रेमचंद की भांति मानव-मन की अतल गहराइयों में उतरकर कटु यथार्थ को अर्जित किया गया है वहीं अज्ञेय की तरह प्रतीकात्मक शिल्प-विधान और व्यंजनात्मक भाषा के जरिए तीव्र विषाद-बोध को संभव किया गया है। यह कहानी पाठक की चेतना को झकझोर कर उसे नए तरीक़े से सोचने के लिए विवश करती है। अद्भुत लेखकीय कौशल का ही परिणाम है कि यह कहानी एक वैश्विक समस्या को ठेठ स्थानीय कथानक के माध्यम से, उसकी समूची भयावहता के साथ प्रकट कर देती है। इसके जोड़ की कम ही कहानियाँ होंगी जो तानाशाही और क्रूरता को इतनी तीव्रता से व्यक्त करने में सफल हुई हैं।
आधुनिक विश्व के इतिहास में हिटलर एक ऐसा चरित्र है जो तानाशाही और क्रूरता का प्रतीक बन गया है। इस जर्मन तानाशाह ने नस्लीय श्रेष्ठता और राष्ट्रवाद के नाम पर जो नृशंसता की, वह मानव-सभ्यता के इतिहास में एक कलंक की तरह याद किया जाता रहेगा। लेकिन एक सजग लेखक के बतौर बिज्जी यह सवाल करते हैं कि क्या हिटलर एकमात्र व्यक्ति था जिसने अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए किसी भी हद तक गिरने से गुरेज़ नहीं किया अथवा यह एक प्रवृत्ति है जो किसी के भी भीतर, अवसर आने पर कभी भी जाग्रत हो सकती है? क्या हिटलर से पहले और हिटलर के बाद ऐसी क्रूरता और तानाशाही का कोई दूसरा उदहारण नहीं है? बिज्जी प्रश्न करते हैं कि क्या हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराना तथा पूर्वी पाकिस्तान(वर्तमान बांग्लादेश) में पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा किए जाने वाले अत्याचार हिटलरी प्रवृत्ति नहीं है? इसी का जवाब खोजने का एक लेखकीय प्रयास है ‘अलेखूं हिटलर’।
स्वतंत्रता के बाद बदली हुई परिस्थितियों में भारत के वे किसान जिनके पास कृषि भूमि का मालिकाना हक़ था, वे कृषि पर लगने वाले पचासों तरह के लाग-बाग़ से मुक्त हो गए। इससे उनकी माली हालत में जबरदस्त सुधार हुआ। इन्हीं दिनों तकनीकी प्रगति के कारण खेती का मशीनीकरण भी तेजी से होने लगा जिससे उत्पादन भी बढ़ा और कृषि कार्य में शारीरिक मेहनत की आवश्यकता भी कम हो गई। इन नव-धनाढ्य किसानों को आर्थिक समृद्धि ने नए किस्म के सामंत के रूप में बदल दिया। बिज्जी ने इसी पृष्ठभूमि पर ‘अलेखूं हिटलर’ कहानी को बुना है। इस कहानी के माध्यम से लेखक का दावा है कि हिटलरी प्रवृत्ति किसी भी व्यक्ति में अवसर आने पर उभर सकती है अथवा कहना चाहिए कि हम सब छोटे-मोटे हिटलर हैं। दूध का धुला कोई नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि बिज्जी हिटलर का बचाव कर रहे हैं और उसके अपराध पर परदा डाल रहे हैं बल्कि वे इस कहानी के माध्यम से मनुष्य मात्र को अपने भीतर के हिटलर को पहचान कर उस प्रवृत्ति से मुक्त होने का सन्देश दे रहे हैं। यह अकारण नहीं है कि उन्होंने इस प्रवृत्ति को उजागर करने के लिए नव-धनाढ्य किसान वर्ग को चुना। सामान्यत: किसान समाज का शोषित और पीड़ित वर्ग है। उदारता, भोलापन, सहयोग, सहिष्णुता आदि उसके स्वाभाविक गुण माने जाते रहे हैं। साहित्य में उसे दया और करुणा की प्रतिमूर्ति की तरह चित्रित किया गया है। लोकमानस की सूक्ष्म पहचान रखने वाले बिज्जी इस तरह की स्थापित अवधारणा के विपरीत यह सिद्ध करते हैं कि श्रेष्ठत्व का मिथ्या दंभ किसी किसान को भी हिटलर में तब्दील कर दे तो कोई अनोखी बात नहीं है। इसीलिए कहानी का आरंभ भी इसी प्रकार की व्यंजक शैली में होता है कि जो मनुष्य आगे चलकर हिटलर में तब्दील होने वाले हैं, वे सामान्य मनुष्य जैसे मनुष्य ही हैं। उनके कोई सींग-पूँछ नहीं है यानी ऐसी कोई विशिष्टता नहीं है जो उन्हें किसी भी रूप में सामान्य मनुष्य से भिन्न प्रदर्शित करती हो अथवा जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि इनके भीतर क्रूरता और हत्यारापन भरे पड़े हैं। कहानी के पहले पैराग्राफ में प्रयुक्त कुछ पंक्तियों को देखिए-
“वे पाँचों मनुष्य थे। ... चेहरे मनुष्यों जैसे ही थे। आँख की जगह आँख। नाक की जगह नाक। दाँतों की जगह दाँत। हाथ-पैरों की जगह हाथ-पैर। ... वे सब मनुष्यों की तरह ही बोलते थे और मनुष्यों की तरह ही चलते थे।”4 जाहिर है लेखक का सारा ज़ोर इस पर है कि वे सामान्य मनुष्य थे। लेकिन कहानी के अंत में जब वे इन्हीं पंक्तियों को दोहराते हैं तो इन पंक्तियों अर्थ ही बदल जाता है। सामान्य दिखने वाले वे मनुष्य कितने असामान्य थे, यह ध्वनि पाठक के कानों में देर तक गूंजती रहती है और वह खुद में छिपे ऐसे ही किसी हिटलर को स्पष्ट रूप से चिह्नित कर पाता है। वह पहचान करता है कि कब-कब ऐसा हुआ जब उसकी चेतना पर हिटलर सवार हो गया था। यही इस कहानी की सफलता है।
इस कहानी का कथ्य पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण परिवेश पर आधारित है। आज़ादी के बाद नव-समृद्ध एक किसान परिवार के पांच भाई मिलकर साझे में ट्रेक्टर खरीदना चाहते हैं। उन दिनों ट्रेक्टर खरीदना आम किसान के लिए संभव नहीं था क्योंकि ट्रेक्टर बहुत महँगा था और उसके लिए नंबर लगाकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। बहुत बार अधिक पैसे वाले लोग जुगाड़ से ब्लैक में अपनी बारी से पहले ही ट्रेक्टर हथिया लेते थे जिससे अन्य लोगों की प्रतीक्षा अवधि बढ़ जाती थी। एजेंसी वाले से अच्छे संबंध होने पर ही ट्रेक्टर मिल पाता था। चूँकि ट्रेक्टर होना प्रतिष्ठा का सूचक था तो तमाम मुश्किलों के बावज़ूद ये पाँचों भाई जोधपुर शहर में ट्रेक्टर एजेंसी वाले ओमजी की दो साल तक ख़ूब चापलूसी करते हैं तब जाकर ट्रेक्टर मिल पाता है। पाँचों भाई ट्रेक्टर के साथ ट्रोली और कुछ अन्य जरूरी कृषि उपकरण भी खरीद लेते हैं। कुल मिलाकर साठ हजार रुपये की लागत आती है जो भारतीय मुद्रा के मूल्य के हिसाब से उन दिनों कोई छोटी रकम नहीं थी। ट्रेक्टर खरीद पाने की ख़ुशी इतनी अधिक है कि उसे सजाने के लिए फूलों की मालाएँ लाई गई। स्वस्तिक बनाने के लिए लाल रंग और ख़ुशी में लोगों का मुँह मीठा कराने के लिए गुड़ मंगवाया गया। यहाँ तक कि जश्न के लिए रम की छह बोतलें भी खरीदी जाती हैं। स्वस्तिक और शराब का एक साथ जिक्र अनायास नहीं है। हिटलर भी स्वस्तिक के चिह्न को महत्त्व देता था। यह एक सूक्ष्म संकेत है कि कैसे धर्म का ढोंग करने वाले लोग वास्तविक जीवन में उतने पवित्र नहीं हैं। बहरहाल, ट्रेक्टर लेकर अपने गाँव रवाना होने से पहले लेखक अत्यंत कौशल से उन पाँचों भाइयों की मन:स्थिति, आज़ादी से पूर्व उनकी गरीबी और कठिनाइयों से भरे जीवन से पाठक को परिचित करा देता है। जब ओमजी कहते हैं कि, “भाइयो, ज़माना बदला तो क्या ख़ूब बदला। पहले तो गाँव में एक ठाकुर होता था लेकिन अब तो आप जैसे सारे बड़े किसान ठाकुर बन गए। आज़ादी के सारे ठाट आप ही के हिस्से आ गए। कहाँ तो छाछ-राबड़ी के भी लाले पड़ते थे, और कहाँ अब ऊँची-ऊँची चीज़ें पानी की तरह बहाई जा रही हैं। जिनको हल-बैल खरीदने में ही ज़ोर पड़ता था, वे हजारों रूपयों का ट्रेक्टर लेते हुए जरा भी नहीं सोचते। यारो, आज़ादी के जो मजे लेने हैं, ले लो। मन में मत रखना।”5
जाहिर है कि ये किसान कोई पुश्तैनी अमीर या सामंत नहीं हैं। उन्होंने ग़रीबी को भोगा है और ज़िल्लत सहन की है। ऐसे लोगों में भी सामन्ती ठसक और क्रूरता हो सकती है, कोई सोच भी नहीं सकता। चौथे भाई के कथन से यह प्रमाणित भी हो जाता है कि वे अपनी तंगहाली को भूले नहीं हैं और महात्मा गांधीजी के बहुत ऋणी हैं जिनकी बदौलत वे आज सुख पा रहे हैं। सत्य और अंहिसा के मार्ग पर चलने वाले गाँधी बाबा के प्रति कृतज्ञ किसान हैं वे। मतलब कहानी के मध्य भाग तक पाठक को अन्दाज़ा ही नहीं होता कि इस कहानी में हिटलर कौन है या हो सकता है? यद्यपि लेखक बड़ी चतुराई से संकेत देता चलता है लेकिन वे संकेत इतने सूक्ष्म हैं कि कहानी के अंत तक पहुँचने पर ही प्रकाशित होते हैं। ट्रेक्टर के मालिक हो जाने का नशा कितना अधिक है, इसका संकेत तब मिलता है जब वे जोधपुर शहर से बाहर निकलकर अजमेर जाने वाली खुली सड़क पर अपने गाँव की ओर बढ़ रहे होते हैं। लेखक ने अत्यंत कल्पनाशक्ति और सर्जनात्मकता का परिचय देते इस अनुभव को शब्दों में बांध दिया है –
“फरफराती मालाओं से सजाया हुआ ट्रेक्टर धर–र धर-र चल रहा था। उस पर बैठे हुए पाँचों भाइयों को ऐसा लगा जैसे सड़क की जगह आसमान ही उनके ट्रेक्टर के नीचे बिछ गया है। और सामने धरती उन्हें नारियल से भी छोटी- निहायत छोटी लगी। अस्ताचल को जाता सूरज जैसे उनके ट्रेक्टर को निहारने के लिए ही एक जगह स्थिर हो गया हो। सूं- सूं करती हवा जैसे उनकी ही बलैयाँ ले रही हो। समूची दुनिया का हर्ष उनके हृदय में हिलोरें भरने लगा।”6
ऐसे ही हर्ष से भरे हुए पाँचों भाई जब देखते हैं कि सड़क किनारे वीराने में एक बाज झपट्टा मारकर खरगोश को ले उड़ा, तो एक साथ हँसते हैं और बड़ा भाई कहता है कि होनी कभी टलती नहीं है। सामान्यत: ऐसे मौकों पर व्यक्ति किसी प्राणी की तड़प देखकर दुखी होता है और अफ़सोस व्यक्त करता है लेकिन यहाँ ऐसा नहीं हुआ। यह पहला स्पष्ट संकेत है कि उनके भीतर का हिटलर जाग्रत हो रहा है। इसके तुरंत बाद कहानी में जब साइकिल सवार का प्रवेश होता है तो एक सीधी रेखा में चल रही कहानी में जबरदस्त तनाव उपस्थित हो जाता है।
कितना आश्चर्यजनक है कि सड़क पर साइकिल चलाने का अभ्यास कर रहे एक अनजान युवक, जिसके बारे में ये पाँचों भाई कुछ जानते तक नहीं हैं, को अपना प्रतिद्वंद्वी मान बैठते हैं और उसे पीछे छोड़ देने के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा देने के लिए तैयार हो जाते हैं। उनके गुस्से से बेख़बर साइकिल सवार अपनी तैयारी की परख करने के लिए स्वाभाविक रूप से इस प्रतियोगिता हिस्सा हो जाता है। युवक को मालूम ही नहीं है कि उसकी रफ़्तार की वजह से ट्रेक्टर पर बैठे लोग उसे अपना दुश्मन मान चुके हैं। युवक को अखिल भारतीय साइकिल चैंपियनशिप जीतकर पेरिस जाने के लिए चयनित होने की लालसा है और फिर अपनी प्रेमिका से शादी करने का स्वप्न। उसे लगता है कि यदि वह इस नए ट्रेक्टर का मुक़ाबला कर सकता है तो फिर साइकिल चैंपियनशिप में उसे कोई हरा नहीं सकेगा। युवा सपनों से अनजान ट्रेक्टर सवार पाँचों भाइयों के लिए साइकिल सवार से आगे निकलना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। एक सामान्य सी घटना सत्ता-संघर्ष में परिवर्तित हो जाती है।
लेखक ने यहीं एक संकेत किया है कि हिटलरी प्रवृत्ति सदैव अपने से कमज़ोर और निरीह लोगों के विरुद्ध ही सिर उठाती है। अपने से ताक़तवर के सामने यह प्रवृत्ति आत्मसमर्पण कर देती है। साइकिल जैसे सस्ते वाहन से नया ट्रेक्टर पीछे रह जाए यह बात पाँचों भाइयों को पच नहीं रही। “सभी के मन में एक साथ एक ही बात चुभी – दो सौ रिपल्ली की साइकिल और साठ हजार रुपयों का ट्रेक्टर। ये भी कोई होड़ है। चूहा हाथी से टक्कर ले रहा है।”7 यह अनायास नहीं कि ‘दो सौ रुपये की साइकिल और साठ हजार के ट्रेक्टर से होड़’ की अनुगूँज कहानी में बार-बार सुनाई देती है और पाँचों भाइयों को क्रोध से भर देती है। वे ट्रेक्टर की स्पीड को उसकी अधिकतम सीमा तक बढ़ाकर साइकिल का पीछा करते हैं लेकिन जब सामने से मिलिट्री की दो गाड़ियाँ आ जाती हैं तो वे ट्रेक्टर की गति कम कर देते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि मिलिट्री वालों से पंगा लेना ठीक नहीं है। जाहिर है वे चाहते तो साइकिल वाले युवक को बच्चा समझकर उसकी उपेक्षा कर सकते थे या उसकी फुर्ती की प्रशंसा कर सकते थे अथवा इस बात को हँसकर टाल सकते थे। परंतु पचास साल की पकी हुई उम्र के बड़े भाई के मन में भी यह भाव नहीं आया क्योंकि साइकिल सवार को वे सबक सिखा सकने की क्षमता रखते थे। यहाँ यह भी एक सवाल उठता है कि यदि कोई मोटर या जीप ट्रेक्टर को ओवरटेक करती तो क्या वे बुरा मानते? परन्तु एक साइकिल सवार युवक ट्रेक्टर को ओवरटेक कर दे तो उनकी पगड़ी की शान में बट्टा लग जाता है। और वे इस हद तक चले जाते हैं कि ओवरटेक कर रहे युवक की साइकिल को ट्रोली की टक्कर से गिरा देते हैं और ट्रेक्टर के टायर से उसका सिर कुचल देते हैं। इससे भी अधिक हैरत की बात तो यह है कि उन्हें इसका कोई अफ़सोस नहीं है। कहानी का यह वाक्य उनकी क्रूरता को प्रकट कर देता है- “हवा में फिर मनुष्यों की आवाज़ फुसफुसाई , मादर... ट्रेक्टर से आगे निकलना चाहता था!”8
वे यहीं नहीं रुकते। सबसे छोटा भाई जो पढ़ा-लिखा था, वह ट्रेक्टर से उतरकर मृत युवक के मुँह में शराब उंडेलकर बोतल को उसके सिर के पास फोड़ देता है। यहाँ पढ़े-लिखे होने पर किया गया व्यंग्य विशेष ध्यान खींचता है। लेखक का संकेत है कि मनुष्यता को तहस-नहस करने के जितने घातक अस्र्त्र बनाये गए हैं वे बहुत पढ़े-लिखे लोगों ने ही बनाए हैं। जिनके ज्ञान से मनुष्यता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए था, वे ही बर्बादी का सामान जुटा रहे हैं। यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। अर्जुनदेव चारण का मत है कि, “संवेदनहीनता की स्थिति से भी आगे बढ़कर यह कहानी उस सत्य को पकड़ने का प्रयास करती है जो इस सृष्टि की बुनियाद है। वो सत्य है प्रीत, उससे जुड़े हैं करुणा, स्वप्न और उम्मीद।”9 साइकिल सवार युवक की हत्या इसी प्रीत के सपने की हत्या है। करुणा और मानवीय मूल्यों की हत्या है। पाँचों भाई साइकिल सवार को सिर्फ इसलिए कुचल डालते हैं क्योंकि वह कमज़ोर होकर भी उनसे टक्कर ले रहा है। इससे उनके अहं को संतुष्टि मिलती है। युवक के सपनों की उन्हें कोई परवाह नहीं है इसलिए वे भी एक किस्म के हिटलर ही हैं। हिटलर ने यही किया था और दुनियाभर में अनेक हिटलर आज भी यही कर रहे हैं। गाँव से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों तक यही हो रहा है। फिलिस्तीन, यूक्रेन, ईरान, वेनेज़ुएला आदि किसी-न-किसी हिटलर के अहं की सज़ा भुगत रहे हैं। विश्व में जिस तरह की परिस्थितियां निर्मित हो गई हैं, पूँजी और तकनीक के बल पर कमज़ोर मुल्कों को उपनिवेश बनाया जा रहा है, इन हालात में कोई उम्मीद भी नहीं है कि यह सिलसिला कभी थमेगा। हिटलर नए-नए रूप धारण कर सामने आते रहेंगे। उनके शिकार बदलते रहेंगे, शिकार करने के तरीक़े बदल जाएँगे लेकिन प्रवृत्ति नहीं बदलेगी।
संदर्भ :
1. दिनेश चारण, बिज्जी का कथालोक, पुस्तकनामा, गाजियाबाद, 2023, पृ. 07
2. अर्जुनदेव चारण, राजस्थानी कहाणी:परम्परा–विकास, राजस्थानी साहित्य संस्थान, जोधपुर, 1998, पृ. 39
3. वही, पृ. 39
4. अलेखूं हिटलर, विजयदान देथा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1984, पृ. 60
5. वही, पृ. 62
6. वही, पृ. 64
7. वही, पृ. 65
8 वही, पृ. 68
9.अर्जुनदेव चारण, राजस्थानी कहाणी:परम्परा–विकास, राजस्थानी साहित्य संस्थान, जोधपुर, 1998, पृ.40
नोट- संदर्भ संख्या 4 से 9 में प्रयुक्त उद्धरण मूलतः राजस्थानी भाषा में हैं जिन्हें पाठकों की सुविधा के लिए हिन्दी में अनूदित किया गया है।
जगदीश गिरी
एल-09 बी, विश्वविद्यालय परिसर, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर – 302004
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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