यात्रा साहित्य के आईने में आदिवासी समाज : दृष्टिबोध और परिवेश
- हेमंत कुमार एवं धर्मेन्द्र प्रताप सिंह
शोध सार : प्रस्तुत शोध आलेख हिंदी के समकालीन यात्रा साहित्य में आदिवासी समाज की उपस्थिति, उनके जीवन और उनके परिवेश को समझने का एक सीधा और सरल प्रयास है। शुरुआत में यात्रा वृत्तांत केवल घूमने-फिरने और नई जगहों को देखकर हैरान होने तक सीमित था। लेकिन आज के लेखकों ने इस नजरिए को पूरी तरह से बदल दिया है। समकालीन लेखकों ने आदिवासी समाज को केवल एक अजूबे या तमाशे के रूप में देखने के बजाय, उनके जीवन की सच्चाई, उनके दुख-दर्द और प्रकृति के साथ उनके गहरे जुड़ाव को बहुत ही ईमानदारी से महसूस किया है। फणी मजूमदार, हरिराम मीणा, लीलाधर मंडलोई, अशोक अग्रवाल, चंद्रकांत देवताले, मधु कांकरिया, अनिल यादव और रामशरण जोशी जैसे कई महत्वपूर्ण रचनाकारों की यात्राओं के आधार पर यह लेख तैयार किया गया है। यह आलेख इस बात पर जोर देता है कि आदिवासियों का जल, जंगल और जमीन से रिश्ता केवल पैसे कमाने का नहीं है, बल्कि यह उनका जीवन है। इसके साथ ही, यह लेख इस बात की भी पड़ताल करता है कि बाहरी दुनिया के दखल, तथाकथित विकास और लालच ने कैसे उनके सीधे-सादे जीवन को संकट में डाल दिया है।
बीज शब्द : यात्रा साहित्य, आदिवासी समाज, औपनिवेशिक नजरिया, जल-जंगल-जमीन, सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन का दर्द, प्रकृति प्रेम, हाशियाकृत समाज, प्रतिरोध, विकास की सच्चाई, अस्तित्व का संकट, समकालीन विमर्श।
मूल आलेख : हिंदी साहित्य की लंबी और समृद्ध परंपरा में यात्रा साहित्य का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। आरंभिक दौर में यह विधा मुख्यतः यात्रा-वर्णन, भौगोलिक जानकारी, अंचलों की प्राकृतिक सुंदरता, दूरस्थ प्रदेशों की विशेषताओं तथा वहाँ के रीति-रिवाजों के चित्रण तक सीमित था। उस समय यात्रा लेखक का दृष्टिकोण अधिकतर बाहरी और पर्यवेक्षक का होता था। वह जिस समाज, संस्कृति या जनजीवन को देखता था, उसे अपनी दृष्टि से परखता था, लेकिन उसमें भीतर तक उतरने, उसकी ऐतिहासिक पीड़ा समझने और उसकी सामाजिक-राजनीतिक जटिलताओं को पहचानने की गंभीर कोशिश बहुत कम दिखाई देती थी। आदिवासी समाज के संदर्भ में तो यह स्थिति और भी अधिक संकीर्ण थी। आदिवासी इलाकों को प्रायः रहस्यमय, पिछड़ा, आदिम या जंगली कहकर देखा जाता था। वे लोग, जिनका जीवन प्रकृति, श्रम, सामूहिकता और आत्मनिर्भरता से निर्मित था, मुख्यधारा के लेखकों की दृष्टि में केवल एक रोमांचक या अजीब दुनिया के रूप में उपस्थित होते थे। इसीलिए पुराने यात्रा वृत्तांतों में आदिवासी जीवन की तस्वीरें अक्सर सतही, एकांगी और कभी-कभी उपेक्षात्मक रूप में सामने आती थी।
लेकिन समय के साथ साहित्य की चेतना बदली। साहित्य केवल मनोरंजन, दृश्य-वर्णन या यात्रा-रोमांच का माध्यम भर नहीं रहा, बल्कि वह समाज को समझने, शोषण की संरचनाओं को पहचानने और वंचित तबकों की आवाज़ को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम बन गया। इसी परिवर्तन के साथ यात्रा साहित्य में भी गहरी वैचारिक परिपक्वता आई। समकालीन यात्रा लेखक अब केवल पर्यटनकर्ता नहीं है; वह एक संवेदनशील द्रष्टा, खोजी, चिंतक और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा हुआ रचनाकार है। वह केवल मार्गों की कठिनाई, दृश्य-सौंदर्य या स्थान-विशेष की विचित्रताओं को नहीं देखता, बल्कि उन जीवन-संघर्षों को भी पहचानता है जिनके केंद्र में आदिवासी समाज खड़ा है। वह यह समझने की कोशिश करता है कि इन समुदायों की पहचान, संस्कृति, भूमि, जल, जंगल और जीवनशैली पर किस प्रकार के संकट मंडरा रहे हैं। इस रूप में समकालीन यात्रा साहित्य आदिवासी जीवन का दस्तावेज़ भी है और प्रतिरोध का स्वर भी।
इस परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक पृष्ठभूमि यह है कि आदिवासी समाज का प्रकृति से संबंध मात्र संसाधन-उपयोग का नहीं, बल्कि अस्तित्वगत और सांस्कृतिक संबंध का है। उनके लिए जल, जंगल और जमीन केवल भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन की आत्मा हैं। सदियों तक तथाकथित सभ्य दुनिया ने आदिवासियों को या तो हिंसक या जंगली या विकास-विरोधी कहकर देखा। यह दृष्टि औपनिवेशिक काल में और भी अधिक मज़बूत हुई, जब अंग्रेज़ी शासन ने उनके क्षेत्रों को केवल खनिज, वन-संपदा और श्रम-शक्ति के स्रोत के रूप में देखा। आदिवासी संस्कृति, उनकी सामाजिक संरचना, उनकी आस्थाएँ और उनके स्थानीय ज्ञान को समझने के बजाय उन्हें ‘सभ्य’ बनाने की परियोजनाएँ चलाई गईं, जिनके पीछे असल उद्देश्य उनकी भूमि और संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना था। हरि राम मीणा अपनी किताब में इसी मानसिकता की तीखी आलोचना करते हैं। वे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि कैसे अंग्रेजों ने अपने हितों के लिए आदिवासियों को केवल असभ्य मानकर उनके अध्ययन का दिखावा किया था। इस दृष्टिकोण को खारिज करते हुए वे लिखते हैं, "ब्रिटिशकाल में वैज्ञानिक अध्ययन किए गये हैं, मगर कुल मिलाकर नजरिया जो रहा, वह था 'जंगली बर्बर' मानने का।" 1 इस कथन में केवल औपनिवेशिक सोच की आलोचना नहीं है, बल्कि उस पूरे ज्ञान-तंत्र पर प्रश्नचिह्न है जो सत्ता के हित में निर्मित हुआ। आदिवासी अध्ययन के नाम पर जो कुछ भी हुआ, वह उनके जीवन को समझने का नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने और उनके संसाधनों पर अधिकार जमाने का प्रयास था।
यह मानसिकता केवल भारत तक सीमित नहीं रही। संसार के अनेक आदिवासी समुदायों को भी इसी दृष्टि से देखा गया। बाहरी दुनिया ने आदिवासियों के संबंध में तरह-तरह की अफ़वाहें, भय और पूर्वाग्रह गढ़े। दूरस्थ भूभागों में रहने वाले इन समाजों को अक्सर रहस्यमय, खतरनाक या असभ्य मान लिया गया, जबकि वास्तविकता यह थी कि उनका जीवन प्रकृति के साथ गहरे संतुलन पर आधारित था। फणी मजूमदार का यात्रा वृत्तांत बोर्नियो के इबान कबीले की सच्चाई को सामने लाता है। वे बताते हैं कि जब बाहरी समाज किसी आदिवासी इलाके में जाने की सोचता है, तो उसके मन में पहले से ही कितनी झूठी कहानियाँ और कितना डर बैठा होता है। यात्रा पर जाने से पहले अपनी पत्नी के डर का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं, "जल्दी-जल्दी मैंने अपना सामान बाँधा। मुझे खुद ही सामान बाँधना पड़ा क्योंकि मेरी पत्नी ने पूर्ण असहयोग की घोषणा कर दी थी। उसे बोर्नियो यात्रा की मुश्किलों के बारे में पता चल गया था। नरमुंड शिकारियों के साथ ... बारे में भी उसने सुन रखा था।"2 यह पंक्ति केवल एक व्यक्तिगत प्रसंग नहीं है; यह उस सामाजिक मानसिकता का प्रतीक है जिसमें आदिवासी जीवन को भय, हिंसा और अंधविश्वास के चश्मे से देखा जाता है। किंतु जब लेखक स्वयं उनके बीच जाता है, उनके साथ समय बिताता है और उनके जीवन को भीतर से समझता है, तब यह भय धीरे-धीरे पूर्वाग्रह से रहित हो जाता है। वह महसूस करता है कि इन समुदायों का जीवन प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एकात्म है। इसी संदर्भ में फणी मजूमदार इबान कबीले की धार्मिक आस्था का वर्णन करते हुए लिखते हैं, "ये लोग कुछ श्रेष्ठ देवताओं में भरोसा रखते थे, इनमे से तीन देवता मुख्य थे। पहला मनुष्य का सृजक, दूसरा खेतीबाड़ी का रक्षक और तीसरा युद्ध का निर्णायक। इन अलौकिक शक्तियों के श्रेष्ठक्रम में आत्माएं सबसे नीचे है। उनका विश्वास था कि जंगलों और नदियों पर्वतों और धान के खेतों पर छोटे देवताओं का शासन था। ये देवता प्राणियों के व्यवहार के माध्यम से अपनी इच्छाएं प्रगट करते थे।"3 इस कथन से स्पष्ट होता है कि आदिवासी धर्म और आस्था को केवल अंधविश्वास कहकर खारिज करना उचित नहीं है; वह उनके जीवन के पर्यावरणीय, सामाजिक और नैतिक संतुलन का हिस्सा है।
पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी समाजों के संदर्भ में यह संघर्ष और भी अधिक तीव्र दिखाई देता है। वहाँ की जातीय-जनजातीय संरचना, ऐतिहासिक स्वायत्तता, संसाधनों पर अधिकार और बाहरी सत्ता से टकराव की लंबी कहानी रही है। अनिल यादव अपने लेखन में नागा समाज के साहस और अंग्रेज़ी शासन के दमन की कथा को उकेरते हैं। अंग्रेजों ने खनिज, भूमि और सामरिक नियंत्रण के लिए जिन अमानवीय उपायों का प्रयोग किया, उन्होंने वहाँ के जीवन को गहरे घाव दिए। यह संघर्ष किसी एक क्षण की घटना नहीं था, बल्कि वर्षों तक चलने वाला प्रतिरोध था। उस भयानक दमन का एक दृश्य इस प्रकार है, "दस दिसंबर 1850 को अंग्रेज सेना ने 150 गज की दूरी से दिन भर मोर्टार से खोनोमा के किले पर गोले दागे... अगले दिन फौज जब गाँव में दाखिल हुई तब तक वहाँ कोई नहीं बचा था।"4 यह विवरण केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि उस क्रूरता का प्रमाण है जिसके बल पर औपनिवेशिक सत्ता ने आदिवासी प्रतिरोध को कुचलने की कोशिश की। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि आदिवासी समाज ने अपनी स्वतंत्रता, भूमि और स्वाभिमान के लिए अत्यंत साहस के साथ संघर्ष किया। उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय प्रतिरोध को चुना और इस प्रक्रिया में अनेक बलिदान दिए।
आदिवासी जीवन की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अर्थों में नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अर्थों में भी महत्वपूर्ण है। उनका जीवन-तंत्र प्रकृति पर निर्भर होते हुए भी परजीवी नहीं है। वे कम संसाधनों में अधिक संतुलित, सरल और सामूहिक जीवन जीते हैं। उनके समाज में उपभोग की अंधी दौड़ नहीं, बल्कि आवश्यकता और उपलब्धता के बीच संतुलन की समझ है। आधुनिक उपभोक्तावादी समाज, जो हर समय अधिक पाने, अधिक जुटाने और अधिक खर्च करने की होड़ में लगा रहता है, आदिवासी जीवन की इस सादगी से बहुत कुछ सीख सकता है। अशोक अग्रवाल अपने यात्रा संस्मरण में दुधलाल वनवासी नामक एक साधारण किन्तु आत्मविश्वास से भरे व्यक्ति के माध्यम से आदिवासियों की आत्मनिर्भरता को रेखांकित करते हैं। दुधलाल के शब्दों में वह आत्मविश्वास और व्यावहारिक बुद्धि झलकती है जो प्रकृति-सापेक्ष जीवन का आधार है। वह कहता है, "वनवासी के उत्साह में कोई कमी नहीं। 'झोंपड़ी के लिए लकड़ी की कमी नहीं। आपको सोचने की ज़रूरत नहीं पिताजी। फालतू जमीन में लौकी, भाटा, अदरक, मिर्ची, टमाटर, कुम्भड़ा, मटर सब के लेंगे। अकेला नमक घर लाना हुआ। फालतू सब्जियाँ हाट से लाऊँगा। नमक का भी जुगाड़ हो गया।”5 यह कथन आदिवासी अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता का सुंदर उदाहरण है। यहाँ जीवन की ज़रूरतें सीमित हैं, लेकिन संतोष, श्रम और योजना की संस्कृति बहुत गहरी है। यही कारण है कि आदिवासी समाज बाहरी बाजार-व्यवस्था के बावजूद अपने स्वाभाविक जीवन-संबंधों को लंबे समय तक बचाए रख सका।
फिर भी यह संतुलन स्थायी नहीं रह सका। जैसे-जैसे बाहरी दुनिया का हस्तक्षेप बढ़ा, वैसे-वैसे आदिवासी जीवन की सहजता टूटती चली गई। विकास के नाम पर जंगल काटे गए, पहाड़ खोदे गए, नदियाँ प्रदूषित की गईं और लोगों को उनके घरों से विस्थापित किया गया। इस प्रक्रिया ने केवल भौगोलिक स्थान नहीं छीने, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक संरचना और आत्मसम्मान को भी बुरी तरह चोट पहुँचाई। हरि राम मीणा चेँचु जनजाति की स्थिति का वर्णन करते हुए उनकी गरीबी और वंचना की भयावह तस्वीर सामने रखते हैं। उनकी वेशभूषा और सांस्कृतिक दयनीयता का चित्रण करते हुए वे लिखते हैं, "इनकी परम्परागत वेशभूषा में स्त्रियाँ मुश्किल से अपना तन ढँक पाती हैं-बहुत कम कपड़ों में। पुरुष गुप्त अंगों को ढँकने के लिए वल्कल वस्त्र का उपयोग करते रहे हैं।"6 यह केवल वस्त्रों की कमी का चित्र नहीं है, बल्कि उस सामाजिक अपवंचना का संकेत है जिसमें आदिवासी जीवन को विकास की मुख्यधारा से जानबूझकर बाहर रखा गया। जब कोई समाज मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो, तो उसकी सांस्कृतिक गरिमा भी धीरे-धीरे संकट में पड़ जाती है। यह स्थिति किसी प्राकृतिक कमी का परिणाम नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बहिष्करण और शोषण का परिणाम है।
तथाकथित विकास की नीतियाँ आदिवासी समाज के लिए और अधिक खतरनाक साबित हुई हैं। राज्य और बाजार दोनों ने मिलकर उनके जीवन को अपने-अपने ढंग से नियंत्रित करने की कोशिश की है। कभी उन्हें संरक्षण के नाम पर अलग-थलग किया गया, तो कभी विकास के नाम पर उनकी जमीन छीन ली गई। चंद्रकांत देवताले लोक संस्कृति की रक्षा के नाम पर अपनाई गई नीतियों की आलोचना करते हुए महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं। वे लिखते हैं, "लोक संस्कृति की धारणा पर गंभीर विचार किए बिना उसे सुरक्षित और पृथक रखने वाली नीति, साजिश की तरह ही मालूम पड़ती है। वैदिक और ब्राह्मण संस्कृति ने जिस तर्क के सहारे उन्हें लोक-प्रवाह से काट दिया था, क्या उन्हीं तर्कों का नवीनीकरण कर विज्ञान और पूँजी की संस्कृति को भी उनके साथ व्यवहार करने की इजाजत दी जा सकती है...?"7 यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि संस्कृति के नाम पर अलगाव, विकास के नाम पर विस्थापन और संरक्षण के नाम पर नियंत्रण-ये सब एक ही सत्ता-तंत्र के रूप हैं। आदिवासी समाज को केवल संग्रहालय की वस्तु बनाकर नहीं रखा जा सकता; उसे सम्मान, समानता और अधिकार के साथ जीने का अवसर देना होगा।
विकास का सबसे कठोर चेहरा तब सामने आता है जब खनन, उद्योग और बड़े प्रोजेक्ट आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं। इन परियोजनाओं के साथ केवल पूँजी नहीं आती, बल्कि विनाश, बीमारी, विस्थापन और सामाजिक टूटन भी आती है। रामशरण जोशी अपने संस्मरण में इस विनाशकारी विकास की भयावहता को सामने लाते हैं। बैलाडीला जैसे क्षेत्रों में खनन ने न केवल पहाड़ों को खोदा, बल्कि पानी, खेत और जीवन-तंत्र को भी नष्ट किया। वे लिखते हैं, "इस क्षेत्र के बैलाडीला पहाड़ों में कच्चा लोहा निकालने का काम शुरू हुआ। करीब एक सौ गाँव उजड़े। लोहा धुलाई का पानी शंखनी और डंकनी नदियों में बहाया गया... बड़े पैमाने पर खेती चौपट हुई आदिवासियों ने आत्महत्या का विकल्प चुना।"8 इस कथन में विकास की असल कीमत छिपी है। जब नदियाँ ज़हरीली हो जाएँ, खेत बर्बाद हो जाएँ और रोज़गार छिन जाए, तो केवल आर्थिक संकट नहीं आता, बल्कि जीवन जीने का आधार ही टूट जाता है। ऐसे में आत्महत्या की घटनाएँ महज़ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि एक पूरे सामाजिक ढांचे के विफल हो जाने की चेतावनी हैं।
लगातार शोषण, छल, दमन और विस्थापन के कारण आदिवासी समाज के मन में बाहरी लोगों के प्रति गहरा अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है। उनके अनुभवों ने उन्हें यह सिखाया है कि मुख्यधारा का समाज अक्सर उनकी जमीन, श्रम और संसाधनों का उपयोग अपनी सुविधा के लिए करता है। मधु कांकरिया इस ऐतिहासिक धोखे को बहुत सटीक शब्दों में व्यक्त करती हैं। वे लिखती हैं, "सदियों से लूटे-पिटे एवं दलित आदिवासियों को अनुभवों ने आंख में अंगुली डालकर सिखा दिया था कि जब भी कोई शहरी यहां आता है तो इन्हें लूटकर ही जाता है।"9 यह कथन आदिवासी चेतना में जमा उस गहरे अविश्वास को उजागर करता है जो बार-बार हुए शोषण का परिणाम है। बाहरी समाज यदि बार-बार आकर केवल उपयोग, उपभोग और दमन करता रहे, तो विश्वास की नींव कैसे बने? इसी असमान संबंध के कारण आदिवासी समाज विकास के नारों पर संदेह करता है, क्योंकि उन्हें पता है कि अक्सर इन नारों के पीछे लूट की नीतियाँ छुपी होती हैं।
आदिवासी स्त्री और बालिका की सुरक्षा भी इसी शोषणकारी व्यवस्था का शिकार रही है। मुख्यधारा समाज जब भीतर तक संवेदनशील नहीं होता, तब वह केवल संसाधन ही नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा को भी चोट पहुँचाता है। हरि राम मीणा द्वारा उद्धृत एक पीड़ित पिता का कथन इस नैतिक पतन को बहुत गहराई से दिखाता है। वह कहता है, "हुजूर, मैंने जंगल में भयानक से भयानक जानवर देखे हैं लेकिन इस जैसा शैतान नहीं देखा। इसने मेरी किशोर बेटी के साथ 'सब कुछ' करने के बाद उसकी हत्या की है।"10 यह पंक्ति किसी एक अपराध की बात नहीं करती, बल्कि उस सभ्यता के संकट को उजागर करती है जो स्वयं को आधुनिक, शिक्षित और प्रगतिशील कहती है, लेकिन भीतर से इतनी क्रूर हो सकती है कि वह जंगल के हिंसक जीवों से भी अधिक भयावह सिद्ध हो। आदिवासी समाज के प्रति होने वाले ऐसे अपराध केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक विफलता का परिणाम हैं।
विकास की इस दौड़ में सबसे गहरी विडंबना यह है कि जिन आदिवासियों के श्रम और जंगलों से पूरा समाज लाभ उठाता है, उनके अपने घरों में न्यूनतम सुविधाएँ भी नहीं होतीं। वे दूसरों के लिए लकड़ी, खनिज, जड़ी-बूटियाँ, पत्ते और वन-उत्पाद जुटाते हैं, लेकिन स्वयं के लिए बुनियादी संसाधनों से वंचित रह जाते हैं। मधु कांकरिया इस पूँजीवादी विकास मॉडल की विडंबना पर चोट करती हैं। वे लिखती हैं, "ये दिन भर जंगल में लकड़ी काटते, लकड़ियों के ढेर को ढोते मिलेंगे पर इनके घर में लकड़ी की एक छोटी टूल तक नहीं मिलेगी। ज़मीन पर ही सोते हैं ये, जिससे शीघ्रता से मलेरिया की चपेट में आ जाते हैं... कौन समझेगा इस विडंबना को।"11 यह कथन व्यवस्था के दोहरेपन को उजागर करता है। जो लोग प्रकृति से संसाधन निकालकर दूसरों की जरूरतें पूरी करते हैं, वही लोग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए तरसते रहते हैं। यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का चरम रूप है।
इन तमाम संकटों से निकलने का सबसे प्रभावी मार्ग शिक्षा हो सकता है, लेकिन यह भी इतना सरल नहीं है। आदिवासी समाज में शिक्षा की राह को गरीबी, श्रम की अनिवार्यता, सामाजिक उपेक्षा और भाषाई-सांस्कृतिक दूरी कठिन बना देती है। जब किसी परिवार की रोज़ी-रोटी ही अनिश्चित हो, तब बच्चों को स्कूल भेजना कई बार व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है। मधु कांकरिया शिक्षा की इस जटिलता को रेखांकित करते हुए लिखती हैं, "दरअसल, जब तक यह समाज शिक्षित नहीं होगा...कुछ भी नहीं किया जा सकता। इन अंधविश्वासों से नहीं लड़ा जा सकता है और शिक्षा का आलम यह है कि निशुल्क शिक्षा देने पर भी ये अपने बच्चों को पढ़ने भेजने की बजाय खेती के काम में लगाना चाहते हैं जिससे परिवार को सहारा मिले।"12 यह टिप्पणी किसी दोषारोपण के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएँ ही अनिश्चित हों, तब शिक्षा का आदर्श बहुत दूर लग सकता है। इसलिए केवल स्कूल खोल देना पर्याप्त नहीं; शिक्षा को रोजगार, भोजन, सम्मान और स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ना भी आवश्यक है।
आज स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई आदिम जनजातियाँ अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। कुछ समुदाय जनसंख्या की दृष्टि से इतने छोटे रह गए हैं कि उनके सांस्कृतिक और जैविक अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगने लगा है। लीलाधर मंडलोई अंडमान की जनजातियों के इस अंतहीन दर्द को मार्मिक रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे लिखते हैं, "केवल 27 हैं हम, अपनी ख़त्म होती सभ्यता से लिपटे-छूटते भोगते / असंख्य दुख और लगातार छीजते, हर मृत्यु ख़त्म करती है जीने की आस"13 यह केवल संख्या का नहीं, बल्कि सभ्यता के विलुप्त होने का शोक है। जब कोई समाज केवल जीवित शरीरों का समूह न रहकर स्मृति, भाषा, प्रकृति-संबंध, सामूहिक जीवन और इतिहास का वाहक होता है, तब उसके धीरे-धीरे खत्म होने का अर्थ बहुत व्यापक हो जाता है। यह मानवता के एक अनूठे अध्याय के मिट जाने का दर्द है।
निष्कर्ष : समकालीन हिंदी यात्रा साहित्य को गहराई से पढ़ने और समझने के बाद हम इस पक्के निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि आज के यात्रा वृत्तांत अब केवल मनोरंजन या सैर-सपाटे की किताबें भर नहीं रह गए हैं। यह साहित्य अब सामाजिक यथार्थ, सत्ता-संबंध, पर्यावरणीय संकट, सांस्कृतिक संघर्ष और हाशिए के समाजों की पीड़ा को समझने और अभिव्यक्त करने का माध्यम बन गया है। फणी मजूमदार, हरिराम मीणा, लीलाधर मंडलोई, अशोक अग्रवाल, चंद्रकांत देवताले, मधु कांकरिया, अनिल यादव और रामशरण जोशी जैसे रचनाकारों ने अपनी कलम के जरिए हाशिए पर पड़े आदिवासी समाज की अनकही पीड़ा, उनकी साधारण लेकिन मजबूत जीवनशैली और उनके छिनते हुए अधिकारों को बहुत ही सच्चाई और पूरी ईमानदारी के साथ समाज के सामने रखा है। इन लेखकों ने आदिवासी समाज को किसी रोमांचक ‘अन्य’ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित, संघर्षशील, संवेदनशील और गरिमामय समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया है। इन लेखकों के लेखन से यह समझ बनती है कि आदिवासी लोग विकास के दुश्मन नहीं हैं, बल्कि वे उस विनाशकारी बदलाव का विरोध करते हैं जो उनकी संस्कृति, उनकी पहचान और उनके जंगलों को खत्म कर रहा है। यह समाज आधुनिकता, शिक्षा या विकास का विरोधी नहीं है। वह केवल उस विकास का विरोध करता है जो उसके जंगलों को नष्ट करता है, उसकी नदियों को ज़हरीला करता है, उसकी जमीन छीनता है, उसकी संस्कृति मिटाता है और उसे उसकी ही धरती पर पराया बना देता है।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आदिवासी समाज को पिछड़ा, अविकसित या असभ्य कहकर देखने की दृष्टि को त्यागें। हमें उनके जीवन-दर्शन से सीखना होगा, जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य, सीमित संसाधनों में संतुलित जीवन, सामूहिकता, श्रम का सम्मान और जरूरत भर उपभोग की भावना शामिल है। आधुनिक समाज यदि वास्तव में सभ्य है, तो उसे आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर उनके जन्मसिद्ध अधिकार को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना होगा। विकास का अर्थ यदि केवल खनन, उद्योग, मुनाफा और बड़े ढाँचों का निर्माण है, तो वह विकास नहीं, विनाश है। सच्चा विकास वही है जो मनुष्य, समाज और प्रकृति-तीनों के बीच संतुलन बनाए। आदिवासी विमर्श इसी संतुलन की माँग करता है। वह केवल साहित्यिक बहस नहीं, बल्कि न्याय, पर्यावरण, लोकतंत्र और मानवता की बुनियादी शर्त बन चुका है। समकालीन यात्रा साहित्य ने इस विमर्श को नई गहराई दी है और यह दिखाया है कि साहित्य जब समाज के हाशिए से जुड़ता है, तब वह केवल रचना नहीं रहता, बल्कि प्रतिरोध और परिवर्तन का माध्यम बन जाता है। आदिवासी विमर्श अब केवल किताबों में बहस करने का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक जीवित समाज को बचाने और अंत में हमारी इस पूरी धरती को विनाश से सुरक्षित रखने की सबसे जरूरी और मानवीय शर्त बन गया है।
सन्दर्भ :
- हरि राम मीणा, 'आदिवासी लोक की यात्राएं', वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली - 110 002, सजिल्द दूसरा संस्करण 2025, पृष्ठ- 7
- फणी मजूमदार, 'बोर्निओ के नरमुंड शिकारी', संभावना प्रकाशन, रेवती कुंज, हापुड़ - 245101, संशोधित प्रथम संस्करण 2018, पृष्ठ -11
- वहीं, पृष्ठ – 46
- अनिल यादव, 'वह भी कोई देस है महाराज', अंतिका प्रकाशन, सी-56/यूजीएफ-IV, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II, गाज़ियाबाद - 201005 (उ.प्र.), तीसरा पेपरबैक संस्करण 2014, पृष्ठ -56
- अशोक अग्रवाल, 'किसी वक्त किसी जगह', संभावना प्रकाशन, 64, रेवती कुंज, हापुड़-245101, प्रथम संस्करण 2011, पृष्ठ – 168
- हरि राम मीणा, 'आदिवासी लोक की यात्राएं', वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली - 110 002, सजिल्द दूसरा संस्करण 2025, पृष्ठ – 61
- संपादक: शंभुनाथ एवं त्र्यंबक पालीवाल, 'समकालीन सृजन' (यात्राओं का ज़िक्र - अंक 24), साहित्य और सामाजिक आलोचना की पत्रिका, 20, बालमुकुंद मक्कड़ रोड, कोलकाता - 700 007, वर्ष 2008, पृष्ठ – 124
- रामशरण जोशी, 'यादों का लाल गलियारा दंतेवाड़ा', राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2017, पृष्ठ – 121
- मधु कांकरिया, 'बादलों में बारूद', किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली - 110002, प्रथम संस्करण 2014, पृष्ठ – 11
- हरि राम मीणा, 'आदिवासी लोक की यात्राएं', वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली - 110 002, सजिल्द दूसरा संस्करण 2025, पृष्ठ – 141
- मधु कांकरिया, 'बादलों में बारूद', किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली - 110002, प्रथम संस्करण 2014, पृष्ठ – 28
- वहीं, पृष्ठ – 24
- लीलाधर मंडलोई, 'काला पानी', राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, जी-17, जगतपुरी, दिल्ली - 110 051, दूसरी आवृत्ति 2023, पृष्ठ - 13
हेमंत कुमार
शोधार्थी, हिंदी विभाग, केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, केरल
kumarhemant0777@gmail.com, 8787287195
धर्मेन्द्र प्रताप सिंह
शोध निर्देशक, हिंदी विभाग, केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, केरल
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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