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अखिलेश औदिच्य की दो कवितायेँ

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, फ़रवरी 23, 2013 | शनिवार, फ़रवरी 23, 2013

                          यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है।


1 उसने कहा था
मुझे याद है
उस दिन चांद सोया नहीं था
सितारे ठिठक गए थे
रात की बुढ़िया 
हरक़तों को समेट
अंधेरे की पोटली में 
दूर पहाड़ी पर चली गई
कोई नहीं था वहां
मौक़ा देख
चांद ने सीढ़ियों के रस्ते
दबे पांव अंदर आ
मेरी पलकों पे लिख दिया था
नाम तेरा
अनामिका से
मैंने अब तक पलकें नहीं झपकाईं
और चांद फिर नहीं आया
लेकिन तुम ही आकर चिकोटी काटोगी
कहा था उसने जाते-जाते
हां....उस दिन वो सोया नहीं था...

2 उनींदे ख़्वाब
बरिश ने मचलकर
जब बाल झटके
मैंने महसूस की 
उसकी फुहार
अपने बिस्तर तक
छींटों की छमक ने
जगा दिया
कुछ अधसोये ख़्वाबों को 
कितना शोर मचाते हैं
जब उनींदे ख़्वाब 
गीले हो जाते हैं....




युवा कवि
रंगकर्मी 
और एस्ट्रोलोजर 
साकेत,चौथा माता कोलोनी,
बेगूं-312023,
चित्तौड़गढ़(राजस्थान) 
मो-9929513862
ई-मेल-astroyoga.akhil@gmail.com

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