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हाशिये के लोग और हिन्दी उपन्यास :डॉ. रेणु व्यास का आलेख

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मार्च 06, 2013 | बुधवार, मार्च 06, 2013

(यह सामग्री पहली बार में ही 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर ही प्रकाशित हो रही है। इस आलेख के बहुत से अंश अपनी माटी के ही एक आयोजन में बीज वक्तव्य के रूप में रेणु जी ने कहे।पूरा आलेख आप सभी के हित यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है।-सम्पादक)
डॉ.रेणु व्यास
डॉ.रेणु व्यास
(हिन्दी में नेट चित्तौड़ शहर की युवा प्रतिभा, इतिहासविद, विचारवान लेखिका, गांधी दर्शन से जुड़ाव रखने वाली रचनाकार हैं। वे पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही रेडियो पर प्रसारित होती रहीं हैं।अपना शोध  'दिनकर' के कृतित्व को लेकर पूरा किया है। दिनकर पर ही उनकी एक पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य है। सम्पर्क सूत्र:- 29, नीलकंठ सैंथी, छतरीवाली खान के पास, चित्तौडगढ, राजस्थान, renuvyas00@gmail.com)

सबसे पहले हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे कि हाशिये के लोग है कौन ? 

दलित वर्ग जो सदियों से सामाजिक, आर्थिक शोषण का शिकार रहा है, इस सूची में सबसे आसानी से नज़र आने वाला वर्ग है। किंतु यह सूची यहीं खत्म नहीं हो जाती। गाँवों और शहरों की मुख्यधारा के जीवन से कटे हुए आदिवासी, न केवल भौगोलिक निवास की दृष्टि से, बल्कि सामाजिक,आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक वंचित वर्गों में से एक होने से समाज के भी हाशिये पर स्थित हैं। दुनिया की आधी आबादी - महिलाओं की स्थिति, परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ एक ही घर में रहते हुए भी समाज, परिवार, और उसकी अपने आप से, अपने जीवन से संबंधित महत्त्वपूर्ण अधिकारों के बारे में भी हाशिये पर ही है। परिवार की संपत्ति में उसकी भागीदारी का तो सवाल ही कहाँ उठता है; जबकि वह खुद परिवार की संपत्ति की तरह समझी जाती हैं, बरती जाती हैं। प्रकृति के दुर्योग से कुछ शारीरिक कमी, अक्षमता  के साथ जन्मे जुझारू, सक्षम ‘डिफरेंटली एबल्ड’ व्यक्तियों को शेष समाज, हाशिये पर ही रखता है।

धार्मिक, सांस्कृतिक दृष्टि से देश का ऐसा वर्ग जो समाज के बहुमत के कथित प्रवक्ताओं की धौंस से, किसी वास्तविक या काल्पनिक ख़तरे से, अपने जान-माल की असुरक्षा महसूस करता है या भेदभाव का शिकार होता है, वह भी समाज के हाशिये पर है। बंधुआ मजदूर, सीमांत एवं छोटे किसान, अन्य वंचित ग्रामीण पिछड़े वर्ग भी इसी श्रेणी में हैं, जिनका ज़िक्र आज न तो कोर्पोरेटीकृत आर्थिक विकास करता है और न ही राजनीतिक दृष्टि से उनकी आवाज़ सुनी जाती है। ऊपर गिनाए गए दलित, आदिवासी, बंधुआ मजदूर, विकलांग, अन्य वंचित ग्रामीण पिछड़े वर्ग, भाषायी, सांस्कृतिक और अन्य प्रकार से अल्पसंख्यक वर्ग और महिलाएँ समाज के हाशिये पर रहने वाले उस व्यापक जनसमूह के कुछ उदाहरण मात्र हैं। वास्तव में हर वह वर्ग, वे सभी व्यक्ति, जो समाज में किसी न किसी संस्थागत प्रकार के शोषण और भेदभाव के शिकार हैं, ‘हाशिये के लोगों’ में गिने जाने चाहिए। 

भारत के संदर्भ में कुल जनसंख्या से यदि इनके प्रतिशत की गणना करें तो आप सब भी आश्चर्यचकित हो जायेंगे। विद्वानों ने इन्हें भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 85 प्रतिशत माना है। आश्चर्यजनक बात है कि जो लोग हमारे समाज की तीन चौथाई से भी कहीं अधिक जनता है, वह हाशिये पर कैसे हो सकती है ? क्या हाशिया पेज़ से भी बड़ा होता है ? सच्चाई यही है कि भारत में मात्र 15 प्रतिशत से भी कम संख्या वाले अभिजात्य वर्ग के पास पूरे देश के भाग्य का निर्णय करने की शक्ति है। देश के आर्थिक संसाधनों पर उनका कब्ज़ा है, समाज का नेतृत्व वे कर रहे हैं और राजनीतिक सत्ता और शक्ति उनके हाथों में केन्द्रित है। 

मुट्ठी भर लोगों के इस साधनसम्पन्न वर्ग के विपरीत, समाज के हाशिये पर स्थित लोग वे लोग हैं, ऐसे सामाजिक समूह हैं जो विकास के लाभों से वंचित हैं और बहुधा विकसित लोगों के विकास की कीमत चुकाने वाले हैं। जो समाज के समांग ताने-बाने का हिस्सा नहीं बन पाए हैं, जो किसी न किसी प्रकार के भेदभाव के शिकार हैं या जो किसी न किसी प्रकार से समाज के वंचित लोग हैं। यह भेदभाव या वंचना - सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, नस्लीय, सांस्कृतिक या अन्य प्रकार की हो सकती है।

भारत के इतिहास में तीन बड़ी क्रांतियाँ हुई हैं-पहली बौद्ध धर्म का उदय, दूसरी भक्ति-आंदोलन और तीसरी - भारतीय स्वाधीनता आंदोलन। यह सिर्फ संयोग नहीं, सच्चाई है कि ये तीनों क्रांतियाँ हाशिये के लोगों द्वारा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्ता प्राप्त करने के लिए संघर्ष से जुड़ी हुई हैं। ये क्रांतियाँ सफल इसीलिए हुईं क्योंकि समाज के दलित-वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। समाज के 85 प्रतिशत लोगों की हिस्सेदारी के बिना कोई क्रांति सफल हो भी कैसे सकती है ?

भेदभावकारी वर्णव्यवस्था पर पहली बड़ी चोट बौद्ध धर्म ने की, दूसरी भक्ति-आंदोलन ने और तीसरी और अंतिम चोट भारतीय स्वाधीनता आंदोलन ने। हज़ारों वर्षों के इसी संघर्ष का परिणाम है कि आज छुआछूत न सिर्फ कानून दंडनीय अपराध है, बल्कि इस भेदभाव के विरुद्ध व्यक्ति के अधिकार को संविधान के सर्वाधिक संरक्षणीय हिस्से ‘मूल अधिकारों’ में स्थान मिला है।

भारत में प्राचीन काल में दो तरह की साहित्यिक परंपराएँ रहीं हैं - एक तो राज्याश्रय में रचे संस्कृत के महाकाव्यों और नाटकों की आभिजात्य परंपरा और दूसरी पालि-प्राकृत जैसी लोकभाषाओं में रची कथाओं और मुक्तकों की परंपरा। एक में आदर्श और आभिजात्य संस्कृति के चित्रण की प्रधानता है तो दूसरी में जनजीवन की। संस्कृत के महाकाव्यों का तो लक्षण ही रहा है - नायक देवता, राजा या उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति हो। जनभाषा प्राकृत में रची गई गुणाढ्य की वृहत्कथा में समाज के विभिन्न वर्गों का चित्रण मिलता है। ज़ाहिर है कि हाशिये के लोगों की आवाज़ इस दूसरे वर्ग में अधिक मुखर है। भक्ति-आंदोलन का बहुत बड़ा अवदान यह है कि इसमें बड़ी संख्या में समाज के दलित-वंचित वर्गों से आए संतों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों ने जनभाषा में रचना की और ऐसी रचना की जिससे धर्म की ठेकेदारी करने वाले पंडितवर्ग-मुल्लावर्ग पर ही नहीं, समाज के सामंती ढाँचे और वर्णव्यवस्था पर भी चोट पड़ती है।

अगला प्रश्न उपन्यास विशेषकर हिन्दी उपन्यासों से जुड़ा हुआ है - हिन्दी उपन्यासों में हाशिये के लोगों की आवाज़ किस तरह उपस्थित है ?

उपन्यास आज के युग का महाकाव्य है। यूरोप में और भारत में भी उपन्यास आरंभ से ही ‘मध्यवर्ग की दास्तान’ समझा जाता रहा है; और यह था भी। हिन्दी में प्रेमचन्द को यह श्रेय है कि उन्होंने उपन्यास को दलित-वंचित, ग्रामीण भारत से जोड़ा और हाशिये के लोगों को साहित्य में आवाज़ प्रदान की। ‘मध्यवर्ग की दास्तान’ कहा जाने वाला उपन्यास ‘गोदान’ के रूप में ‘किसान-जीवन का महाकाव्य’ बन गया। पूरा गोदान केवल ‘होरी’ की कथा नहीं कहता, वह एक छोटे किसान के भूमिहीन मज़दूर में बदलते जाने की दर्दनाक दास्तान है; अर्थात् समाज के एक कमज़ोर वर्ग के हाशिये पर पहुँच जाने की कहानी है। मुख्य पात्र होरी के अलावा भी ‘वेलारी’ गांव के अधिकांश बाशिंदे सरकारी कारकुनों, ज़मींदारों, पाखंडी पंडितों और सूदखोर महाजनों के चौतरफ़ा शोषण के शिकार हैं, और प्रेमचन्द की कलम ‘महाजनी व्यवस्था’ द्वारा उनके शोषण का ही प्रत्याख्यान है। 

प्रेमचन्द से लेकर आज तक उपन्यासों की एक लंबी शृंखला है, जिनकी विषयवस्तु हाशिये के लोगों से संबंधित है। रंगभूमि, गोदान, मैला आँचल, कब तक पुकारूँ,  महाभोज, छप्पर, तर्पण, चाक, अल्मा कबूतरी ये सिर्फ कुछ नाम उदाहरणस्वरूप दिए जा रहे हैं। ज्योतिबा फुले और बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर और महात्मा गांधी के वैचारिक सामाजिक प्रभाव की बदौलत आज स्थिति यह है कि हिन्दी उपन्यासों की मुख्यधारा हाशिये के लोगों से जुड़े उपन्यासों की है, जो सामाजिक न्याय का पक्ष ग्रहण करने वाले विचारों से संबंधित है। चाहे वे इन वर्गों में जन्म लेने वाले लेखकों ने लिखे हों या इनसे इतर उपन्यासकारों ने। 

एक और प्रश्न जो आज के साहित्यिक जगत् में सबसे अधिक ज्वलंत प्रश्न  - ‘भोगा हुआ यथार्थ’ या ‘स्वानुभूति’ और ‘देखा हुआ यथार्थ’ या ‘सहानुभूति’ से संबंधित है। 

पिछले कुछ दशकों में हाशिये के लोगों में से साहित्य में सबसे प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाने वाले दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श का आज यह मुख्य एजेण्डा है। यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक तब बना जब दलित-साहित्य के रूप में आत्मकथाएँ बड़ी संख्या में प्रकाशित हुईं। प्रश्न दलित परिवार में जन्म लेने वाले साहित्यकारों के इस आग्रह से उपजा है कि दलितों द्वारा दलितों के लिए, उनकी पीड़ा और संघर्ष का वर्णन करने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है। प्रेमचन्द की सद्गति, ठाकुर का कुआं, मन्दिर, घासवाली, दूध का दाम, पूस की रात, कफ़न आदि कहानियाँ भी हाशिये के लोगों की पीड़ा और संघर्ष को ही रेखांकित करती हैं। अब प्रश्न यह है कि क्या इसे सिर्फ इसी आधार पर दलित-संवेदना और चेतना से शून्य ही नहीं, दलित-विरोधी तक घोषित कर दिया जाए कि लेखक का जन्म दलित परिवार में नहीं हुआ है ? 

‘भोगा हुआ यथार्थ’ की प्रामाणिकता पर कोई प्रश्नचिह्न हो ही नहीं सकता। किन्तु प्रश्न यह है कि ‘देखा हुआ यथार्थ’ को साहित्य की परिधि से बहिष्कृत करने से क्या हम इसकी परिधि को संकीर्ण तो नहीं बना रहे हैं ? इसके संघर्ष के आधारक्षेत्र को संकुचित तो नहीं कर रहे हैं ? 

तुलसीदास से लेकर प्रेमचंद तक कोई भी महान् साहित्यकार प्रश्नों से परे नहीं होना चाहिए। उसके प्रभामंडल से प्रभावित हुए बिना, किसी भी लेखक की संवेदना को प्रश्नगत करने का अधिकार साहित्यिक लोकतंत्र की निशानी है। लेखक के चाहे-अनचाहे उसके और उसके परिवेश में जन्मे पूर्वाग्रह उसकी रचनाओं में आ जाते हैं। उन्हें पहचानना और आज के पाठकों को उनसे सचेत करना रचना के नए ‘पाठ’ की सार्थकता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। उदाहरण के लिए - तुलसीदास के शूद्रों और स्त्रियों से संबंधित पूर्वाग्रह और वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति प्रशंसाभाव आज सर्वज्ञात तथ्य हैं। यही बात कबीर के स्त्री-संबंधी धारणाओं को लेकर कही जा सकती है। किन्तु तुलसीदास को उनके काव्य को प्रामाणिक समझे जाने के लिए इस शर्त से बांध दिया जाए कि वे अपने काव्य से निषादराज, केवट, शबरी को ही नहीं, सीता, कौशल्या, कैकेयी, मंदोदरी के चरित्रों को निकाल दें और प्रेमचन्द गोदान से होरी, धनिया, सिलिया, झुनिया को निकाल दें, क्योंकि वे इन वर्गों का प्रमाणिक प्रतिनिधित्व नहीं करते ? ऐसा रामचरितमानस और ऐसा गोदान कितना अपूर्ण और कितना भयंकर होगा ? इसकी हम सब कल्पना ही कर सकते हैं। 

प्रश्न यह भी है कि साहित्यकारों का जन्माधारित विभाजन क्या कहीं साहित्य में भेदभावकारी जातिप्रथा को मान्यता देने और साहित्य में अलगाववाद के विचार का जनक तो नहीं होगा ? मेरा मत यह है कि स्त्रियों की पीड़ा यदि मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, आशापूर्णा देवी व्यक्त कर सकती हैं, तो शरत्चन्द्र और रवीन्द्रनाथ भी व्यक्त कर सकते हैं या कम से कम इसका प्रयास तो कर ही सकते हैं।  

आचार्य शुक्ल के शब्दों की सहायता लेकर कहें तो कविता ही नहीं, दरअसल साहित्यमात्र हृदय की मुक्तावस्था है। जो साहित्यकार साहित्य की रचना करते हुए स्व और पर का भेद से, अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर नहीं उठ सकता, दलित मानवता की पीड़ा कष्टों और संघर्ष को वाणी नहीं देता, उसकी रचनाओं को साहित्य कहने में भी मुझे संकोच होता है।

समाज के हाशिये के लोगों की संवेदना और पीड़ा को समझना और महसूस करना इन वर्गों से जुड़े व्यक्तियों के साथ-साथ उन लोगों के लिए भी आवश्यक है जो इन वर्गों से बेहतर स्थिति में हैं। क्योंकि किसी भी समाज का विकास, देश का विकास और साहित्य का विकास भी समाज के किसी भी वर्ग की उपेक्षा कर उसे पीछे छोड़ कर संभव नहीं है। मात्र इसलिए नहीं कि ये वर्ग समाज का 85 प्रतिशत हिस्सा हैं, बल्कि इसलिए कि मानवता की सामूहिक मुक्ति, सामूहिक विकास ही एकमात्र विकल्प है। एक की कीमत पर अन्य का विकास - स्थायी विकास या सस्टेनेबल डेवलपमेंट नहीं हो सकता।  अतः देश में, समाज में और साहित्य में भी गैर-बराबरी के खिलाफ लड़ाई केवल दलितों, केवल स्त्रियों, केवल मज़दूरों, विकलांगों और अल्पसंख्यकों जैसे हाशिये के लोगों की ही लड़ाई नहीं है; यह उनके समेत संपूर्ण समाज के समांग और न्यायपूर्ण विकास की लड़ाई है। दिनकर के शब्दों में -

‘‘जब तक मनुज-मनुज का यह सुखभाग नहीं सम होगा,
शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष नहीं कम होगा।’

मेरे विचार में आज का अगला विचारणीय प्रश्न यह हो सकता है कि सामाजिक न्याय का यह संघर्ष आर्थिक असमानता को आधार बनाएगा या सामाजिक असमानता को ? भारत ही नहीं दुनियाभर में सामाजिक दृष्टि से समाज के हाशिये पर स्थित लोग उस समाज में प्रायः आर्थिक दृष्टि से भी सबसे विपन्न हैं और राजनीतिक सत्ता से भी दूर हैं। अतः इस बात से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। चिंता की बात यह है कि समाज के हाशिये पर स्थित इन वर्गों के पास से जीवन के मूलभूत संसाधनों - जल, जंगल और जमीन को आज चल रहे एकांगी विकास से बहुत बड़ा खतरा है। महुआ माझी का नया उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ इसी चिन्ता को व्यक्त करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हाशिये के लोगों को अपना हक़ दिलाने के लिए हर तरह के शोषण और गैर-बराबरी के खिलाफ संघर्ष हो और इसमें सम्पूर्ण समाज की भागीदारी हो। समाज की इस संघर्ष में भागीदारी के लिए साहित्य और उसमें भी आज के जनजीवन का दर्पण - उपन्यास प्रगतिशील भूमिका निभा सकते हैं।

‘‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा, उनका भी अपराध।’’ 
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1 टिप्पणी:

  1. भारतीय समाज का अतिवंचित वर्ग के साथ आज भी जो व्‍यवहार देखने को मिलता है वह कथित सभ्‍य कहलाने वाले समाज के लिए शर्मनाक है । मै तो शिक्षा मे काम करने वाला एक अदना सा आदमी हूं और मेरा अदना सा प्रयास है । मै देखता हूं कि उनकी शिक्षा का हैवा खड़ा किया जा रहा है किन्‍तु धरातल पर उनको सिर्फ असम्‍मान मिलता है। साथ ही उनके शिक्षित नहीं होने का तमगा भी दिया जाता है उन्‍हे न जाने क्‍या क्‍या अलंकारो से नवाजा जाता है। आज रेणू जी का आलेख पढकर एक बार फिर दुगनी उर्जा के साथ काम करने का संकल्‍प गहरा हुआ है । रेणू जी आपको साधुवाद आपनें इस वर्ग को गहरी वाणी प्रदान की है।

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