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समीक्षा:‘समय की धारा का कवि- अशोक कुमार पाण्डेय’

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जुलाई 15, 2013 | सोमवार, जुलाई 15, 2013

जुलाई-2013 अंक


ब्लॉग
दख़ल प्रकाशन के कर्ताधर्ता 

साहित्यिक मंचों पर अपनी जादुई भाषा, तीखी प्रतिक्रिया ओर बेबाक टिप्पणियों से श्रोताओं को चमत्कृत कर उन्हें झिंझोड़ने में जिस युवा कवि ने महारथ हासिल की है, वह है- अशोक कुमार पांडेय । परम्परागत तत्सम शब्दावली से दूर, मन की गहराइयों तक उतरने की क्षमता व परिवेश का सूक्ष्म निरीक्षण करने की विलक्षण योग्यता से कवि अशोक कुमार पाण्डेय समकालीन रचनाकारों की अग्रिम पंक्ति में आ गए हैं । ‘लगभग अनामंत्रित’ कविता संग्रह में विविध विषयों को संवेदना की मणियों में पिरोकर जिस अंदाज़ में परोसा गया है कि खूबसूरती भाषा में है या भाव में, पता ही नहीं चलता। फिर अपने विचारों को बेबाक ढंग से भाव-प्रवणकारी रस में डुबोया है और पैनी व्यंग्य की थाली में परोसा है, वहाँ रस-प्लावन स्वाभाविक ही है । 

‘लगभग अनामंत्रित’ कविता संग्रह में समकालीन जीवन की विडम्बनाओं, अन्तर्विरोधों, अनंतिम लालसाओं और मानवता के पतन को उजागर करने के साथ-साथ भूमण्डलीकरण के आने वाले खतरों को भी रेखांकित किया है। उक्त संग्रह की प्रथम कविता ‘सबसे बुरे दिन’ में कवि को आर्थिक अभावों के, फाकाकशी के अथवा मजबूरियों में भटकने के दिन इतने बुरे नहीं लगते, जितने कि वैश्विक उदारीकरण में बढ़ते बाजार के फलस्वरूप किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के भरोसे जीने की आदत डालनी पड़ेगी । आने वाले समय का भयावह संकेत देती उक्त पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

बहुत बुरे होंगे वे दिन
जब रात की शक्ल होगी बिल्कुल देह जैसी
और उम्मीद की चेकबुक जैसी
विश्वास होगा किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का विज्ञापन
खुशी घर का कोई नया सामान
और समझौते मजबूरी नहीं बन जाएँगे आदत ।
(सबसे बुरे दिन, पृ.12)

पूंजीवादी प्रभाव और मध्यमवर्गीय जीवन शैली की उद्दाम लालसाएँ किस तरह से अपनेपन को नष्ट कर रही है व आम आदमी को पंगु बना रही है, इसकी पड़ताल ‘जगन की अम्मां’ कविता में दिखाई देती है । इसी तरह यांत्रिक जीवन शैली ने हमारी जीवन की रसमयता को कितना भ्रमित कर दिया है, उसका प्रमाण ‘चाय, अब्दुल और मोबाइल’ कविता में मिलता है । कवि अपन दर्द इस प्रकार प्रकट कर देता है- 

अब भी रोज की तरह अब्दुल करता है नमस्कार
पहले सा ही है पत्ती-शक्कर-दूध-अदरक का अनुपात
पर कप और होठों के बीच मुँह के छालों सा चुभता है
मोबाइल पर चाय के ऑर्डर लेता अब्दुल ।
(चाय, अब्दुल और मोबाइल, पृ.23)

‘प्रेम’ जीवन का शाश्वत सत्य है। कवि का प्रेमी मन 'मैं चाहता हूँ' में अपनी प्रेयसी का इंतजार करता है, तो ‘तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश’ में वह स्वयं को समर्पित कर देता है । कवि अपनी प्रेयसी के लिए स्वयं को संघर्षशील बनाना चाहता है । ‘मत करना विश्वास’ के माध्यम से वह प्रेम के मध्य विश्वास की अहमियत को व्यक्त करते हुए यह उजागर करते हैं कि इसी विश्वास रूपी तिनके के सहारे दुःख और अभाव के अनंत महासागर पार हुए हैं, यथा- 

हालांकि सच है यह
कि विश्वास ही तो था वह तिनका
जिसके सहारे पार किए हमने 
दुःख और अभावों के अनंत महासागर ।
(मत करना विश्वास, पृ.43)

युद्ध और शांति का रिश्ता परस्पर विरोधाभासी रहा है । समय की इक्कीस सदियाँ पार करने के पश्चात् भी आधुनिक मानव हथियार, बारूद और लहू के साथ खेल रहा है । नैराश्य, पीड़ा, अवसाद उसके जीवन के केन्द्र में है । फिर इस बात की गारंटी भी कोई देने में सक्षम नहीं है कि यह ‘युद्ध’ नामक तत्त्व हमारे जीवन से कब समाप्त होगा ? कवि का दर्द अवलोकनीय है-

कोई आकस्मिक घटना नहीं है यह युद्ध
न आरम्भ हुआ था हमारे साथ
न हमारी ही किसी नियति के साथ हो जाएगा समाप्त ।
(विरूद्ध, पृ.118)

साम्राज्यवाद की पुरातन धारणाओं के स्थान पर अब वह ‘सत्ता तंत्र’ काबिज़ हो गया है, जो सत्ता की रक्षा के लिए युद्ध को अनिवार्य बना देता है । ‘एक सैनिक की मौत’ कविता में शहादत का मूल्य कवि के शब्दों में यह है कि ‘वजीरों की दोस्ती प्यादों की लाशों पर पनपती है।’ यही नहीं, चारों ओर विभाजनकारी ताकतें उन्माद फैला रही हैं और युद्ध को आमंत्रित कर रही है । अशांति हमारे जीवन का हिस्सा बन गई हैं । नक्सली हिंसा से लेकर वैश्विक संघर्ष सभी इसी श्रेणी के हैं । कवि की सूक्ष्म निरीक्षण के फलस्वरूप वेदना मिश्रित पंक्तियाँ हैं-

हर तरफ एक परिचित सा शोर
‘पहले जैसी नहीं रही दुनिया’
हर तरफ फैली हुई विभाजक रेखाएँ
‘हमारे साथ या हमारे खिलाफ’
युद्ध का उन्माद या बहाने हजार
इराक, ईरान, लोकतंत्र या कि दंतेवाड़ा ।
(अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार, पृ.127)

‘मौन’ की भी अपनी भाषा होती है, जिसका अर्थ गहराई में छिपा होता है । कवि की दृष्टि में वह इतना निःशब्द, मासूम और शालीन नहीं होता, जितना सुनाई देता है । लेकिन बुद्धिजीवियों के मौन पर कवि व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि वे आवाज के खतरों को बखूबी पहचानते हैं, इसीलिए मौन रहते हैं । चुप्पी में  अपना फायदा देखते हैं, इसीलिए वे चुप हैं-

चुप्पी खतरा हो तो हो
जिन्दा आदमी के लिए
तरक्कीराम के लिए तो मेहर है अल्लाह की
उसके करम से अभिभूत वे चुप हैं ।
(वे चुप हैं, पृ.33)

परिवार की सेवा के नाम पर भारतीय नारियों के संपूर्ण जीवन की कुर्बानी ‘माँ की डिग्रियाँ’ में प्रकट हुई हैं तो ‘चूल्हा’, ‘बुधिया’, ‘काम पर कांता’, ‘गाँव में अफसर’, ‘यह हमारा ही खून है’ आदि कविताओं में वंचित वर्ग की पीड़ाओं के साथ शोषण की तकनीक को भी उजागर किया है । ‘लगभग अनामंत्रित’, ‘अरण्यरोदन नहीं है चीत्कार’, ‘इन दिनों बेहद मुश्किल में है मेरा देश’, ‘ये किन हाथों में पत्थर हैं’ आदि कविताओं के माध्यम से कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने समय की विसंगतियों पर प्रहार किया है व जीवन को कविता के साथ जोड़ा है। 

कवि अशोक कुमार पाण्डेय की उक्त संग्रह में जिन अड़तालीस कविताओं को स्थान मिला है, वे सभी उन केन्द्रीय विषयों को समेटती हैं जो वर्तमान में प्रासंगिक हैं। कवि एक ओर घटते इंसानियत के स्तर से बेचैन है तो दूसरी ओर राजनीतिक चालबाजियों से व्यथित भी है। वह प्रेम में गहराई और विश्वास चाहता है और उसे यांत्रिकता के बहाने खोना नहीं चाहता। उसे वंचित वर्ग से न केवल सहानुभूति, बल्कि घनीभूत पीड़ा है तो बाज़ारवाद के दुष्प्रभाव को समय से पहले देखने का दूरदर्शिता पूर्ण कवि धर्म भी । इसी कारण गाहे-ब-गाहे वह मानवता के खतरों से सावधान रहने का निदेश भी कर देता है। 

डॉ.राजेन्द्र कुमार सिंघवी
युवा समीक्षक
महाराणा प्रताप राजकीय

 स्नातकोत्तर महाविद्यालय
चित्तौड़गढ़ में हिन्दी 
प्राध्यापक हैं।

आचार्य तुलसी के कृतित्व 
और व्यक्तित्व 
पर शोध भी किया है।

स्पिक मैके ,चित्तौड़गढ़ के 
उपाध्यक्ष हैं।
अपनी माटी डॉट कॉम में 
नियमित रूप से छपते हैं। 
शैक्षिक अनुसंधान और समीक्षा 
आदि में विशेष रूचि रही है।
http://drrajendrasinghvi.blogspot.in/
मो.नं. +91-9828608270

डाक का पता:-सी-79,प्रताप नगर,
चित्तौड़गढ़
कविता में भावों की प्रबलता इतनी तीव्र है कि भाषा की प्रवाहमयता निर्झर-धारा सी लगाती है। लम्बे वाक्यों के बावजूद आंतरिक लयात्मकता दर्शनीय है। कहीं-कहीं मौलिक प्रतीकात्मक भाषा यथा- ‘दोस्तों की शक्लें हो गई, बिल्कुल ग्राहकों जैसी’, ‘शांति भी लहू पीती है’, ‘हड़प्पा की लिपि की तरह अब तक नहीं पढ़ी गई मौन की भाषा’, ‘इन दिनों देशभक्ति का अर्थ चुप्पी है और सैल्समेनी मुस्कुराहट’, आदि से पाठकीय संवेदना तिलमिला उठती है । अरबी-फारसी शब्दों की उपस्थिति जैसे- ‘वजीरों की दोस्ती’, ‘मेहर हैं’ ‘अल्लाह की’, ‘महफिलों’, ‘ऐसी थी तुम्हारी मुहब्बत’ कविता को मिठास से भर देती है । आँचलिक शब्द, ‘हंडिया में दहकता बालू’, ‘खुदकता भुजा’, ‘ठुनकती बिटिया’, ‘ताखे पर टिमटिमाती ढिबरी’, ‘जलते-बुझते गोइंठे’ ग्रामीण जीवन के बिम्ब प्रकट कर देते हैं ।

अंत में कुमार अंबुज की समीक्षात्मक टिप्पणी को उद्धृत करना समीचीन होगा- “उन्होंने इन कविताओं के जरिए स्वयं को एक प्रतिबद्ध कवि की तरह सामने रख दिया है । यह संग्रह ही संभावना जगाता है कि वे समकालीन हिन्दी कविता के आगामी दृश्य में प्रमुख जगह के हस्ताक्षर हैं।” समग्रतः अशोक कुमार पाण्डेय समय की धारा का कवि है । 

समीक्षा-पुस्तक- लगभग अनामंत्रित
लेखक- कवि अशोक कुमार पाण्डेय

प्रकाशक- शिल्पायन, नई दिल्ली

 (यह समीक्षा पहली बार यहीं छप रही है।अशोक कुमार पाण्डेय पर सामग्री छाप कर अपनी माटी को खुशी है-सम्पादक )
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