आलेख:वैश्वीकरण और हिन्दी:- प्रसार और प्रवाह / डॉ. विमलेश शर्मा

साहित्य और संस्कृति की मासिक ई-पत्रिका            'अपनी माटी' (ISSN 2322-0724 Apni Maati )                 दिसंबर-2013 

  
चित्रकार:अमित कल्ला,जयपुर 
मानव समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि इसके पास मस्तिष्क है, और इस मस्तिष्क में उपजते हैं विचार। इन विचारों को अभिव्यक्त होने के माध्यम की जरूरत होती है। हालांकि यों तो मौन भी मुखर होता है किन्तु अभिव्यक्ति के स्तर पर भाषा ही वह माध्यम है जिससे विचार, अनुभव और भाव मूर्त रूप धारण करते हैं। भाषा वस्तुतः व्यक्ति मात्र की पीङाओं ,उल्लासों और संवेदनाओं का एक अनुवाद है। भाषा वैचारिक और मानस पटल पर उद्वेलित होने वाली भावनाओं का प्रतिबिम्ब है। विश्व में कई भाषाएं बोली जाती हैं और सम्भवतः सभी भाषाएं आपस में संवेदना के स्तर पर जुङाव रखती है परन्तु हिन्दी भाषा अपनी सहजता और लचीलेपन के कारण इस संवेदनशीलता की इस विशेषता के अत्य़न्त निकट है. हिन्दी शब्द पूर्व में  भारतीयता या भारत से संबंध का द्योतक था जो कि प्रायः अभारतीयों द्वारा प्रयोग में लाया जाता था, अर्थात् वे लोग जो भारत से आए हैं या भारतीय हैं उन्हें और उनकी बोली को हिन्दवी कहते थे। कालांतर में यह शब्द हिन्दी प्रदेश की उपभाषाओं एवं बोलियों के लिए भी प्रयुक्त होने लगा। हिन्दी के इतिहास पर नजर डालें तो पाते हैं कि इसका इतिहास हजार वर्षों से भी पुराना है तथा यह भाषा अपनी विकास प्रक्रिया में एक गतिशील नदी की तरह बहती हुई निरन्तर जटिलता से सरलता की ओर अग्रसर होती गई।

     आज हम जिस समृद्ध हिन्दी को बोलते और अभिव्यक्त करते है उसके विकास की भी अपनी कहानी है।शैशवावस्था में हिन्दी अपभ्रंश के बहुत निकट थी। 1000-1100 ई. के आस पास तक हिन्दी का कुछ ऐसा ही मिला जुला रूप था। उस समय इसका व्याकरण भी अपभ्रंश का ही प्रतिरुप था.अनेक परिवर्तनों को संजोए हुए ,अवधी और ब्रज के सान्निधय में 1500 ई. तक आते आते हिन्दी स्वतंत्र रूप से अपनी पहचान बना कर वर्तमान स्वरूप में आने लगी। हिन्दी साहित्य का मध्यकाल (1500-1800) आक्रमणों का काल था अतएव विदेशी आक्रमणकारियों की भाषा संस्कृति का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था जिसके परिणामस्वरुप हिन्दी में तुर्की व फारसी शब्दों का समावेश बहुतायत से हुआ। इसी दौर में व्यापार के माध्यम से विदेशी सम्पर्क भी बढ़ने लगा अतः पूर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और अंग्रेजी भाषा के शब्दों का समावेश भी हिन्दी में हुआ।ठीक इसी समय पिंगल, मैथिली, ब्रजभाषा और खङी बोली का स्वर्णिम साहित्य रचा गया। मुगल काल में उर्दू का उद्भव हुआ और उर्दू के कई शब्द हिन्दी भाषा में रच बस गए। भारत जैसे विवधता पूर्ण राष्ट्र में हिन्दी ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका परतंत्रता से मुक्ति दिलाने में निभाई। हिन्दी वह भाषा थी जो प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हो या उसके बाद चले आंदोलन, देश भर में आजादी की अलख जगाने में सेतु बनी खास कर उत्तर भारत में। यही वजह रही कि स्वतंत्रता के पश्चात अंग्रेजों की ओर से बनाई व्यवस्था में हर काम अंग्रेजी में होने और अभिजात्य वर्ग के अंग्रेजी का प्रयोग करने के बावजूद 22 बोलियों से युक्त हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया।

वर्तमान में हिन्दी देश के मानचित्र पर व्यापक फलक पर छायी हुई जनभाषा है.यह न केवल सम्पर्क भाषा के रूप में देश को एक सूत्र में बांधे रखने का महती काम कर रही है, साथ ही अपने लचीलेपन व लोकप्रियता तथा सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने की क्षमता के कारण ही हिन्दी का राजभाषा का दर्जा कायम है, हालांकि इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने की मांग हर कहीं से उठती रही है, पर क्षेत्रीयता के चलते अभी यह स्थिति नहीं बन पाई है। आज हिन्दी व्यापार,ज्ञान-विज्ञान,अध्य़ात्म और संस्कृति  के विभिन्न आयामों की छटा को समूचे विश्व में प्रसारित कर अपनी पहचान का दायरा भी बढ़ा रही है। वर्तमान में विश्व के 33 देशों में हिन्दी भाषा बोली एवं समझी -जाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हिंदी विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा थी परन्तु आज यह दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा का दर्जा प्राप्त कर चुकी है

     भारत विश्वभर में सर्वाधिक विविधताओं वाला देश है। बहुभाषिकता की दृष्टि से भी यह तथ्य पूर्णरूपेण सत्य है। हजारों मातृभाषाएं यहां अनेक वर्षों से बोली जाती रही है। इन्ही भाषाओं में  से कुछ ने देश को एकता के सूत्र में पिरोने का काम किया .पुरातन समय में जो काम संस्कृत कर रही थी वही आज हिंदी कर रही है हिंदी आज समाचार पत्रों,संचार माध्यमों में प्रयोग बाहुल्य से अपना वर्चस्व स्थापित कर रही हैयह भाषा अनुवाद तथा मौलिक लेखन जैसी सचेतन दृष्टि से आगे बढ़कर प्रसाद की ‘उल्का लेकर अमर शक्तियाँ,खोज रही ज्यों खोया प्रात’ पंक्ति का अनुसरण करती दिखाई दे रही हैं.

        हिंदी भाषा का साहित्य भी आज विविध विधाओं के माध्यम से वैश्विक फलक पर अपना स्थान बना रहा है। उत्कृष्ट लेखन व हिंदीतर श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद इस भाषा को मांझ कर इसके  वैश्विक स्वरूप को प्रभावी रूप से प्रस्तुत कर सकता है जो कि भूमंडलीकरण के इस दौर में परम आवश्यक है आज हिन्दी के प्रचार में पत्र पत्रिकाओं के साथ साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्र भी अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन हिन्दी को बढ़ावा दे कर सहारा बन रहे इन माध्यमों से ही हिन्दी को सबसे बड़ा खतरा भी है। ये माध्यम बोल चाल की भाषा के नाम पर विदेशी भाषा के व्यामोह से स्वंय को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं और इनमें प्रयुक्त भाषा में अंग्रेजी शब्दों की बहुतायत होने लगी है परिणाम है कि हिंदी के स्वरूप में बदलाव आ रहा है और हिंग्लिश के रूप में एक नया अपभ्रंश रूप अवतरित होने लगा है।वर्तमान में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग केवल भाषागत आवश्यकता के लिए ही नहीं होता अपितु एक सामाजिक स्तर प्रदर्शन के रूप में किया जा रहा है सह राजभाषा के पद पर आसीन अंग्रेजी को आज विकास का पर्याय माना जा रहा है। मध्यवर्ग इस प्रवृत्ति को अधिक ओढ़ रहा है यही कारण है कि कई बार हिंदी की स्थिति शोचनीय लगती है परन्तु साथ ही इसके प्रसार को देखकर आश्वस्ति होती है कि तुमुल कोलाहल में भी हिंदी अपनी शांत, सौम्य परन्तु दमदार उपस्थिति दर्ज करा रही है यह हिंदी की लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि आज संचार के अत्याधुनिक साधनों मोबाइल और इन्टरनेट जहां अंग्रेजी का एकछत्र राज्य हुआ करता था वहां भी यह भाषा विस्तार प्राप्त कर रही है आज इन यंत्रों पर देवनागरी टंकण हेतु अनेक एप्स उपलब्ध हैं जिससे हिंदी लोकप्रिय हो रही हैं। तकनीकविज्ञों के अनुसार हिन्दी कम्प्यूटर इत्यादि के लिए संस्कृत के पश्चात सर्वश्रेष्ठ भाषा माध्यम है और इसका कारण इसकी ध्वन्य़ात्मक प्रकृति है। हिन्दी विश्व की बिरली भाषा है जो ध्वनि संचरित है। अर्थात जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। और अब जब कि इस तरह की तकनीक अपना जोर जमाने लगी है जिसमें वस्तुओं को कार्य आदेश लिख कर नहीं बल्कि बोल कर दिए जाएंगे तब इस ध्वन्यात्मकता का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है। परन्तु यह केवल एक पक्ष है वास्तविकता में हिंदी आज अनेक समस्याओं से जूझ रही है।

                      वर्तमान समय में हिन्दी भाषा एक संक्रमण के दौर से गुजर रही है। यह संक्रमण भाषाई तो है ही साथ ही सांस्कृतिक भी है। आज हिंदी पर भूमंडलीकरण अपना व्यापक प्रभाव डाल रहा है. ऐतिहासिक दृष्टि से विश्व ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रारम्भ में आर्थिक एकीकरण की प्रक्रिया में भूमंडलीकरण की अवधारणा को महसूस किया भूमंडलीकरण समकालीन विश्व की विशिष्टताओं में से एक है। वस्तुत़ः यह सम्पूर्ण विश्व को एक गाँव में बदलने की अवधारणा है जो सीमाओं, सरहदों, दीवारों,विभिन्नताओं से परे है. भूमंडलीकरण का प्रत्यक्ष संबंध बाजारवाद से है इसी का प्रभाव है कि प्रत्येक गतिविधि व्यावसायिक दृष्टिकोण या तो स्वयं अपना रही है या अपनाने को मजबूर है। संगीत, कला ,विज्ञान, दर्शन आदि के साथ ही साहित्य पर भी व्यावसायिकता का प्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई पड़ रहा है वास्तव में यह वैश्विकरण आंचलिकता, स्थानीयता व क्षेत्रीयता का धुर विरोधी है चाहे वो कला के क्षेत्र में हो या अन्य किसी क्षेत्र में इसी का परिणाम है कि देशज तत्वों पर संकट दिन ब दिन  गहराता जा रहा है भाषा भी इसी दंश को झेल रही है। यही एकमात्र कारण है जिससे अंग्रेजी का दबदबा निरन्तर बढ़ता जा रहा है। भारत में हिन्दी उपभोक्ता समाज की भाषा है अतः विदेशी निवेशकों और कंपनियों को भारत के धरातल पर उतरने के लिए एवं उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए हिन्दी के सहारे की सख्त आवश्यकता है अपनी इसी आवश्यकता के चलते वे अपने उत्पादों की जानकारी, उनकी विज्ञापन सामग्री हिन्दी में प्रस्तुत तो कर रहे हैं पर उसमें वे गुणवत्ता या मानकीकरण की अनदेखी कर रहे हैं। गैर भाषाई दक्षता प्राप्त लोगों की ओर से किया गया अनुवाद न केवल हास्तास्पद होता है बल्कि कई बार अनजाने में या सरलता और सहजता के नाम पर हिन्दी के स्वरूप के साथ छेड़छाड़ भी साबित होता है। यह बदलाव अगर लचीलेपन की जद में हो तब तो उचित है परन्तु जब भाषा की अस्मिता से ही खिलवाड़ हो तो स्थिति चिन्ताजनक हो जाती है शनैः शनैः यह हिन्दी के अपने शब्दों का स्थान लेने लगता है जो भाषाई खतरा बन कर उभरता है।

          आज  हिन्दी किसी प्रदेश विशेष की भाषा न रहकर समूचे देश की भाषा बन गई है.विदेशों में भी इसका पठन पाठन हो रहा है। प्रवासी भारतीय साहित्य अन्तरराष्ट्रीय फलक पर हिन्दी को अपनी विशिष्ट पहचान दिला रहा है.इस प्रकार हिन्दी भाषा और साहित्य का दायरा निःसन्देह विश्व के मानचित्र पर बढ़ा है परन्तु विज्ञापनों व समाचार माध्यमों में प्रय़ुक्त हो रही हिन्दी भाषा ने इसके स्वरूप व भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है हिन्दी की बोलियों का स्वर्णिम साहित्य वर्तमान में पूर्णरूपेण लुप्त हो चुका है ऐसे में इस साहित्य की श्रेष्ठ रचनाएं अंधेरे में धूमिल हो रही है.आज हिन्दी में नए शब्दों का प्रचलन न के बराबर हो रहा है साथ ही बाजार की भाषा बनने की प्रक्रिया में इसकी मूल प्रकृति भी नष्ट हो रही है। आज  विश्व के अधिकांश विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई ज़रूर जाती है परन्तु या तो अंग्रेजी भाषा में या क्लिष्ट हिन्दी में। भाषा का मानकीकरण एक अन्य ऐसा प्रमुख बिन्दु है जो हिन्दी के रूप को प्रभावित करता है। हालांकि केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय इस दिशा में प्रयास कर रहा है और निदेशालय ने मानकीकरण के लिए स्थायी समिति भी गठित कर रखी है, फिर भी इस ओर प्रभावी काम होने की जरूरत है। आज विश्व स्तर पर हिन्दी फैल तो रही है पर अपने ही घर में उपेक्षित जिंदगी जी रही है। जिससे स्वतंत्रता के उपरान्त भी कहीं न कहीं परतंत्रता का बोध स्वतः ही हो जाता है। यहीं हिन्दी की वर्तमान दशा भी है और  दिशा भी जिसे राष्ट्रहित में अनुकूल बनाना बहुत जरूरी है।इन सबके साथ हिन्दी के अत्यधिक विस्तार के साथ ही भाषाई एकरूपता की समस्या आ खड़ी होती है. हिन्दी में अनेकरूपता की भरमार है। यह अनेकरूपता ध्वनि स्तर पर,लेखन के स्तर पर,शब्द स्तर पर और वाक्य स्तर पर पाई जाती है.वर्तमान में आवश्यकता है हिन्दी के सर्वमान्य मानकीकृत रूप को अपनाने की और इसे व्यावहारिक स्तर पर प्रचलित करने की क्योंकि हिन्दी जन जन की भाषा है इसका प्रसार भी भाषाई ज्ञान के दायरों से दूर व्यावहारिकता की छांव में ही हो सकता है



डॉ. विमलेश शर्मा
कॉलेज प्राध्यापिका (हिंदी)
राजकीय कन्या महाविद्यालय
अजमेर राजस्थान 
ई-मेल:vimlesh27@gmail.com
मो:09414777259
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भारत एक युवा राष्ट्र है और युवावर्ग सर्वाधिक चिन्तित रोजगार को लेकर है. अगर हिन्दी को रोजगारोन्मुखी आयाम प्रदान किया जाए तो युवाशक्ति इस भाषा से और अधिक जुड़ सकती है इस हेतु शिक्षा प्रणाली में बदलाव की आवश्यकता है ताकि यह भाषा अपनी वास्तविक प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके। अनुवाद को बढ़ावा देकर हिन्दी की बाईस बोलियों के साहित्य को प्रकाश में लाया जा सकता है इसी के साथ आवश्यकता है इस भाषा के साहित्य को पुनर्जिवित करने की क्योंकि इस समय यह मात्र एक वैचारिक अखाड़ा बनकर रह गया है जिसमें प्रयोगवाद ,माक्सर्वाद ,उत्तर आधुनिकतावाद, संरचनावाद,विखण्डनवाद निरन्तर जूझ रहे हैं अतः दरकार है ऐसे साहित्य सृजन की जो सम्वेदनात्मक जमीन तैयार कर हिन्दी भाषा की पौध को हरिताभ कर सकता है
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