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विमर्श:मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ:आदिवासी अस्तित्व पर मंडराता संकट/हनुमान सहाय मीना

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मई 14, 2014 | बुधवार, मई 14, 2014

                 साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
    'अपनी माटी'
         (ISSN 2322-0724 Apni Maati)
    वर्ष-2 ,अंक-14 ,अप्रैल-जून,2014
       
चित्रांकन :शिरीष देशपांडे,बेलगाँव 
आदिवासी साहित्य उन वन-जंगलों में रहने वाले वंचितों का साहित्य है जिनके प्रश्नों का अतीत में कभी उत्तर ही नहीं दिया गया | यह ऐसे दुर्लक्षितों का साहित्य है जिनके आक्रोश की ओर यहाँ की समाज व्यवस्था ने कभी कान ही नहीं दिए | उनकी समस्याओं की उपेक्षा और उन्हें सभ्य समाज से अलग समझा जाने के कारण आज उनका अस्तित्व खतरे में नज़र आ रहा है | पानी के बिना मछली का अस्तित्व नहीं उसी प्रकार जंगल के बिना आदिम मानव का अस्तित्व भी न के बराबर हैं |
            ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआउपन्यास में मूल समस्या विकिरण, प्रदूषण और विस्थापन की है | यह समस्या उत्पन्न होने का कारण यदि देखें तो वह है देश का विकास | विकास के क्रम में केवल सभ्य समाज विकसित होता है परन्तु आदिवासियों की स्थिति दयनीय होती जाती है | यूरेनियम एवं लौह खदानों से उत्पन्न हो रहे समस्याओं से जूझते आदिवासियों का चित्रण इस उपन्यास में मिलता है | ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआउपन्यास दर्द का महाकाव्य है | उपन्यास में विकास के दर्द को बेहद नाजुक तरीके से अभिव्यक्त किया गया है | इसमें लेखिका एक्टिविस्ट बनकर यूरेनियम खदानों के आसपास जाती है और सारंडा के जंगल में विचरण करती है |

           


विकिरण की समस्या को लेकर लिखा गया हिंदी का यह पहला उपन्यास है | इस उपन्यास में महुआ माजी ने रेडियेशन के खतरनाक नतीजों पर बहुत ही बेबाकी से अपने विचारों का चित्रण किया है | झारखण्ड के इसी सच को आधार बनाकर उन्होंने मानवीय सरोकारों का एक शोक पत्र तैयार किया है, जिसका नाम है मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ |

आदिवासी जीवन का संबंध प्रकृति से रहा है और प्रकृति ही उनकी पहचान भी है परन्तु आज उनका अस्तित्व खतरे में नज़र आ रहा है | ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआउपन्यास के माध्यम से हम यहाँ उनके जीवन में आने वाली संकटों का चित्रण देख सकते हैं | आधुनिकता की दौड़ में विचार और शैलियां जीवन को जो अर्थ देने लगी हैं, आदिवासी उसमें ठगे से रह जा रहे हैं और अपनी ही जमीन से काट दिए जा रहे हैं | विकास की रफ्तार जरुरी है पर सवाल यह है कि यह विकास किसके लिए और किसकी कीमत पर | उपन्यास का मूल विचारणीय सवाल यही है |

            उपन्यास का आरम्भ करने से पहले उपन्यास के शीर्षक की सार्थकता पर विचार करना महत्त्वपूर्ण है | ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआशीर्षक में नीलकंठ शब्द का संबंध नीलकंठ वाले शिव जी से जोड़ा जा सकता है | समुद्र मंथन के समय निकले विष को पृथ्वी के कल्याण के लिए शिव जी ने सेवन किया था जिसके कारण उनका कंठ नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा | मरंग गोड़ा ने भी देश के विकास के लिए खदानों से निकालने वाले विकिरण और प्रदुषण को अपने में समाहित कर लिया जिस कारण मरंग गोड़ा नीलकंठ हो गया है | उपन्यास का आरम्भ जाम्बिरा से होता है | जाम्बिरा की पीढ़ी जंगल और प्रकृति के साथ अपना जीवन व्यतीत करते आये थे परन्तु बाहरी लोगों के आगमन और खोजों के बाद उनका जीवन पूर्ण रूप से बदल गया | उनके भोलेपन के कारण वह निकट आती संकट को भांप न सके और उस भयावह संकट का अनजाने में ही शिकार होते रहे | परिवर्तन और विकास के नाम पर आदिवासियों को अपना बहुत कुछ खोना पड़ गया | पत्थरों की डाक्टरी जिसे आदिवासी बाहरी लोगों की बुद्धि का कमाल मान रहे हैं कि किस प्रकार पत्थरों को खोजकर परख कर उसमें से उपयोगी पदार्थ को जान लेते हैं | वे नहीं जानते कि उनके जिस कौसल को वह अपार बुद्धिमता मान रहे हैं और अपनी अगली पीढ़ी को उसी राह पर चलता देखना चाहते हैं, वह कितना खतरनाक है | उन्हें बहुत देर से इस खतरे का पता चलता है जब विकिरण और प्रदूषण से अत्यधिक आदिवासी प्रभावित हो चुके थे | मरंग गोड़ा में लौह खदान से यूरेनियम खदान तक शामिल हैं और स्वाभाविक ही इसके कारण विकिरण और प्रदूषण की समस्या बढ़ती चली गयी |

            यूरेनियम और उसका कचरा जीवन में लगातार जहर घोलता जा रहा है | इसका अहसास उन्हें बहुत देर से होता है | इन खतरों से उन्हें सावधान नहीं किया गया तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं | असल में यह केवल मरंग गोड़ा के आदिवासियों की ही समस्याएं नहीं हैं अपितु उन सभी आदिवासियों की समस्या है जिसे सभ्य समाज केवल अपने विकास के लिए इनका और इनके क्षेत्रों का प्रयोग करते हैं | इन आदिवासियों की उपेक्षा की गयी है और इसी कारण उन्होंने एक ऐसा आन्दोलन शुरू किया है जिससे समाज को देखने का नजरिया बदल गया है | यह विरोध केवल यहीं तक सीमित नहीं रही बल्कि इसका विस्तार विदेशों तक हुआ और इसके कारण आदिवासी समाज अपनी समस्याओं का विरोध करने में सक्षम हो सके हैं |

उपन्यासकार महुआ माजी 
मरंग गोड़ा वस्तुतः जमशेदपुर से तीस चालीस कि.मी. दूर स्थित जादूगोड़ानामक वह क़स्बा है जहाँ सन 1967 में शुरू हुए यूरेनियम अयस्क खनन से आसपास के पंद्रह गावों के तीस हजार से अधिक लोग बुरी तरह विकिरण से प्रभावित हुए थे | जो जमीन रेडियोधर्मी धातु यूरेनियम के जहर को पीकर देश दुनिया को उर्जा प्रदान कर रही है, वह यही आबादी है जो नीलकंठ हुई है | आदिवासी स्त्री अपेक्षाकृत समाज की पहरेदारी से मुक्त है, बावजूद आदिवासी एवं गैर-आदिवासी(दिकू) लोगों के शोषण का शिकार बनी हुई है | इस सन्दर्भ में महुआ मांझी लिखती है-दुनिया में हर जगह महिलाओं को छेड़ा जाता है...यहाँ इतना खुलापन है| स्त्री पुरुष का एक साथ घूमना-फिरना, मिलना-जुलना, काम के दौरान एक कमरे में रात गुजारना बुरा नहीं माना जाता, हमारे देश की तरह उन पर समाज की कठोर पहरेदारी भी नही रहती, फिर भी ?...जहाँ मर्जी नहीं होती वहीँ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की जाती है” | इस तरह वे उच्च वर्ग की महिलाओं की तरह मर्यादाओं के मानदंडों से परे तो है लेकिन उनका आर्थिक एवं शारीरिक शोषण दिकुओं द्वारा किया जाता रहा है | अंग्रेज सैनिक आदिवासी औरतों के साथ बन्दूक की नोक पर बदसलूकी करते थे | कारपोरेशन के अधिकारी और कर्मचारियों द्वारा मजदूरों और उनकी औरतों का आर्थिक एवं शारीरिक शोषण किया जाता था |

       आदिवासी  क्षेत्रों में शिक्षा का आभाव है | इस शिक्षा एवं अज्ञानता के चलते वे रुढियों और अंधविश्वासों से जकड़े हुए हैं | इन कुरूतियों एवं प्रथाओं के चलते आदिवासी स्त्री की जिन्दगी बेबसी और नरकीय बनी हुई हैं जिनमें गोनोंग ,डायन प्रथा और लड़की का अपसगुन माना जैसी प्रथाएं प्रमुख है | गोनोंग प्रथा लड़की के पिता के द्वारा लिया जाना वाला दहेज़ है | इस सन्दर्भ में महुआ माज़ी लिखती हैं- गोनोंग के चक्कर में बेटी की जवानी ढले तो ढले देह पर उम्र की कोई काई जमे तो जमे | वह आजीवन विवाहित रहे तो रहे, इन्हें इसकी कोई परवाह नही.मांग बैठते है मुँह फाड़कर | ठीक ही करती हैं वे लड़कियां जो परब के नाच के दौरान या मेले से खीचकर कर ले जाने पर अपने पसंदीदा साथी के साथ यूँ ही चली जाती हैं  और घर बसा लेती है |” यह दहेज़ समस्या आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों समाज में एक बहुत बड़ी समस्या है| दहेज़ चाहे लड़की का पिता ले या लड़के का पिता, हमेशा लड़की ही पिसती है| उधर लड़की की उम्र ढल जाती है, तो इधर किसी अयोग्य वर के साथ ब्याह डी जाती है | गोनोंग के लालच में लड़की का पिता दुगुने उम्र के व्यक्ति के साथ ब्याह देता है, चाहे वह बुजुर्ग ही क्यों न हो | इस तरह लड़की अँधेरे कुएं में धकेल दी जाती है, जहाँ बाहर निकलना मुश्किल होता है|

हनुमान सहाय मीना
शोधार्थी
हैदराबाद विश्वविधालय ,हैदराबाद
ईमेल-hanumanjnu09@gmai.com
मोबाइल- 09542859974

साथ ही कुछ प्रथाएं एवं अंधविश्वासों के चलते स्त्री का जीवन नरकीय बना दिया जाता है | उपन्यास के अंतर्गत मारंग गोंडामें यूरेनियम एवं इसके अपशिष्ट पदार्थों से निकली विकिरण से अजीबोगरीब बीमारियाँ उत्पन्न हो गई| इस उपन्यास में लेखिका ने विकिरण, प्रदुषण और विस्थापन की समस्या को मुख्य रूप से रेखांकित करने की कोशिश की है | इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका ने विकिरण के दुष्परिणामों और इससे होने वाली खतरनाक बीमारियों की ओर ध्यान दिया है | विकिरण, प्रदूषण व विस्थापन से जूझते आदिवासियों की गाथा को महुआ माझी ने इस उपन्यास का मुख्य कथानक बनाया है, जो आदिवासी की वास्तविक समस्याओं से रूबरू करने का प्रयास करता है |इन बीमारियों एवं इन से हो रही  भयानक मौत का इल्जाम निर्दोष सगेन की ताईपर लगाया जाता है | उसे डायन घोषित करके उसकी जान लेने पर उतारू हो जाते हैं | लेखिका 1984 की एक घटना का जिक्र करती है, जिसमें तथाकथित डायनों को मारना काटना आरम्भ कर दिया | इस तरह आज भी निर्दोष स्त्री को डायन घोषित करके प्रताड़ित किया जाता है | आदिवासी समाज में अपशगुन की पात्र हमेशा कोई लड़की ही बनती है जहाँ पर किसी कुते से उसकी शादी करवाकर अपशगुन उतारने का रिवाज प्रचलित है |

इस तरह आदिवासी स्त्री एक तरफ समाज की कठोर पहरेदारी से मुक्त तो है, लेकिन शोषण के तमाम रूपों में सतायी जाती रही है | उनका शोषण आदिवासी और गैर-आदिवासी लोगों द्वारा किया जाता है | शिक्षा का विकास नहीं हो पाने से अपने अधिकारों से अनभिज्ञ एक अंधकारमय दयनीय जिन्दगी जीने के लिए विवश है |

आधार ग्रन्थ :मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ महुआ माजी
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