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शोध:‘बागबां’ फिल्म का चिह्नशास्त्रीय अध्ययन/डॉ. मनीषा

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अगस्त 03, 2014 | रविवार, अगस्त 03, 2014

            साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका           
'अपनी माटी'
          वर्ष-2 ,अंक-15 ,जुलाई-सितम्बर,2014                       
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चित्रांकन:उत्तमराव क्षीरसागर,बालाघाट 
चिह्नशास्त्र अंग्रेज़ी शब्द ‘सिमिओटिक्स’ का हिन्दी रूपान्तर है। चिह्नशास्त्रीय अध्ययन अर्थ के निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन है। यह अर्थ की खोज अधिक नहीं करता बल्कि अर्थ के निर्माण की खोज करता है।चिह्नशास्त्रमूलतः संरचनावाद का एक विकास है। संरचनावाद में ही चिह्नशास्त्र के उत्स मिलते हैं। लेकिन सबसे पहले एक अमरीकी दार्शनिक, जो दर्शन के व्यवहारवादी संप्रदाय के थे, उन्होंने ‘सिमिओटिक्स’ पद का एक दार्शनिक श्रेणी के रूप में उपयोग किया। ये प्रसिद्ध दार्शनिक चार्ल्स एस. पियरसे ;1839-1914 थे। जिस पद का चार्ल्स ने इस्तेमाल किया, वह इनके समय में प्रचलित नहीं हो पाया। इनका भाषा को चिह्न मानने और उसकी प्रक्रिया को समझने का जो आग्रह था, उसका 1930 तक कोई समर्थक नहीं था। चिह्नों की गतिविधि, उनका परस्पर संबंध यह सब भाषा में निहित हैं। इस क्षेत्र में एक और विद्वान हुए, जो स्विस भाषा वैज्ञानिक फर्डेनांर्ड-द-सस्यूर थे। इन्होंने एक बहुत बड़ी और प्रसिद्ध पुस्तक लिखी -‘कोर्स इन जनरल लिंग्विस्टिक्स’। इनकी मृत्यु के उपरांत यह पुस्तक 1959 में छपी। इसमें इन्होंने सिमिओटिक्स की समूची शब्दावली को विकसित किया और इसे अध्ययन का पूर्ण विषय बना दिया। इसमें चिह्नशास्त्रको पूरी तरह विकसित किया गया और इनके बाद से ‘चिह्नशास्त्र’ चलन में आया। 

एक सांस्कृतिक चिंतक को यह पद्धति बड़ी उपयोगी लगी। रोलां बार्थ फ्रांस के बहुत बड़े चिंतक थे जिन्होंने ‘फैशन सिस्टम’ नाम से एक पुस्तक लिखी। इसमें फैशन को भी चिह्नों की एक व्यवस्था के रूप में रखा गया और निम्नलिखित तीन बातें मुख्य तौर पर सामने आई:

1 इसे पहली बार सांस्कृतिक तौर पर समझा गया।
2 मनुष्य की देह और वस्त्रों का क्या संबंध है?-यह पता चला।

3 ज्ञात हुआ कि फैशन अर्थशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, मीडिया इत्यादि की एक व्यवस्था है। यह ज्ञात हुआ कि समय के साथ-साथ फैशन भी बदलता है। कुछ नया आता है। यह नया पुराने से किन मायनों में नया है? कैसे नया है? फैशन के पीछे छिपी शक्तियाँ कितनी बड़ी ताकत है। ये सब जानना ज़रूरी है तभी हम फैशन को समझ पाएंगे। उनके आपस में अंतर्सम्बद्ध इन तमाम सिरों को जानना ज़रूरी है।

इसी प्रकार उम्बर्तो इको नामक एक विद्वान ने सिमिऑलोजी पर पुस्तक लिखी। इन्होंने जेम्स बॉण्ड के उपन्यासों का विश्लेषण किया। सूपरमैन पर कार्टून पद्धति का अध्ययन किया। ;30वीं सदी में अमेरिका में आर्थिक स्थिति घाटे की ओर थी। वहाँ की समूची सामाजिक स्थिति निराशावादी थी। ऐसे में जितने भी आर्टिस्ट थे, वे निराशा में न डूबे बल्कि आशा बनी रहे इसलिए बैटमैन, सूपरमैन इत्यादि लाए गए। उस डिप्रेशन और आर्थिक मंदी को समझे बिना उनका अर्थ नहीं लगाया जा सकता।द् 1983 में ‘द नेम ऑफ द रोज़’ नाम से इको का सर्वाधिक बिकने वाला जासूसी उपन्यास छपा। क्रिश्चियन मैज़ ने भी हॉलीवुड सिनेमा काचिह्नशास्त्रीय अध्ययन किया। एलेन सीटर ने ‘चैनल्स ऑफ डिस्कॉर्स’ नामक पुस्तक में ‘सिमिओटिक्स एण्ड टेलीविज़न’ शीर्षक लेख में इससे संबंधित तीन बातों पर प्रकाश डाला,  जो इस प्रकार हैं:

1 चिह्नशास्त्र लगभग हर उस चीज़ का अध्ययन है जो जनसंचार के किसी भी माध्यम में काम आता है। वह बातचीत भी हो सकती है, सभागोष्ठी भी या बोलने वाले की बॉडी लैंग्वेज भी। हर वह चीज़ जो संप्रेषण करती है और हम जैसे ही संचार के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं वैसे ही उसमें चिह्न कार्य करने लगते हैं।
2 चिह्नों के कार्य करने की प्रणाली- इसके अंतर्गत कई बातें आती हैं। जैसे चिह्नों के कार्य करने की प्रणाली के क्या कोई नियम हैं? क्या इनके संप्रेषण की कोई प्रणाली है? यदि हाँ, तो इसके नियम या उपनियम क्या हैं?
3 इस अध्ययन में प्रथम प्रश्न यह होता है कि अर्थ किस प्रक्रिया में बना है? न कि वह क्या है? 

हिन्दी के आधुनिक रचनाकारों में मुक्तिबोध का नाम इस दृष्टि से लिया जा सकता है। उन्होंने रचना/अर्थ की प्रक्रिया को अधिक महत्व दिया न कि अर्थ को। रस सिद्धांत में भी साधारणीकरण की प्रक्रिया पर ज़ोर ज़्यादा है।एक चिह्न समूचे समाज का अध्ययन हो जाता है। अर्थ मनुष्य प्रदत्त है इसलिए उसके निर्माण की प्रक्रिया ज़रूरी है। वस्तुतः अर्थ कभी अंतिम नहीं होता। इसमें निरंतरता, तरलता विद्यमान रहती है। भाषा के अर्थ की निर्मितियों को जाने बिना अर्थ को नहीं जाना जा सकता।पर यह जानना ज़रूरी है कि इस संदर्भ में बार-बार जिस चिह्न पर बात की जा रही है वह आखिर है क्या?चिह्नशास्त्र में अर्थ की जो सबसे छोटी इकाई है, उसे हम चिह्न कहते हैं। चिह्नशास्त्रइन छोटी इकाइयों के आपसी सम्बन्धों, विभेदों और उनके संदर्भगत अर्थोंको देखता है। फर्डेनांर्ड-द-सस्यूर ने सुविधा के अनुसार चिह्नों को दो विशेष भागों में बाँटा हालांकि दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता:

  • व्यंजक-चिह्न का ऐसा हिस्सा, जिसका कोई भौतिक रुप हो जैसेः चित्र, वस्तु या  ध्वनि।
  • व्यंजित-वह विचार, जिसे यह प्रस्तुत करता है।चिह्न एक संपूर्ण इकाई है जो व्यंजित के साथ व्यंजक के योग का नतीजा है। कोई भी संप्रेषण व्यंजक से होकर व्यंजित तक पहुँचेगा। संचार की भाषा में ये दो बातें ;व्यंजक और व्यंजित प्रमुख हैं।

सस्यूर के अनुसार शब्दों में कोई धनात्मक मूल्य नहीं होते अर्थात् उनके अर्थ सुनिश्चित नहीं होते। न तो उनमें कोई अर्थ होता है और न ही उनका अपने आप में कोई अर्थ होता है। व्यंजक का व्यंजित से संबंध यादृच्छिक होता है। जैसे ‘मेज’ शब्द और मेज अर्थ इन दोनों के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं है। इनका संबंध यादृच्छिक है। इसके अतिरिक्त हम भेद से ही अर्थ पैदा करते हैं। जैसे ‘वर्षा’ शब्द व्यंजक है और व्यंजित है इसका अर्थ, जो आकाश से पानी की बूंदों का गिरना है। व्यंजक के स्तर पर, ‘वर्षा’ अपना अर्थ इससे अंतर करने योग्य शब्दों -ओला, बर्फ या कोहरा-द्वारा पाती है। यहाँ उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि सस्यूर के चिह्नवाद की एक सीमा है और वह है लिखे व छपे हुए शब्द को समझने की। जबकि चिह्न केवल अक्षर या लिखित भाषा का पर्याय मात्र नहीं है। वह किसी भी आकार-प्रकार का पर्याय है। 

छिपे हुए कार्यों के चिह्नों को खोजना उन्हें सक्रिय करना है। व्यंजक और व्यंजित के बीच जितने भी प्रकार के संबंध हैं, यह उन सबको पहचानने का कार्य करता है। चिह्न विज्ञान क्षणिक-क्षणिक परिवर्तनों को पकड़ने का कार्य करता है। इस तरह एक चिह्न के भीतर अर्थों की अंतःक्रिया और दूसरे चिह्नों के आपसी बदलाव की समझ- ये दो काम चिह्नशास्त्र करता है। उम्बर्तो इको की अवधारणा चार्ल्स एस. पियरसे से ली गई है जिन्होंने अपने आप को सस्यूर की भाँति भाषा विज्ञान तक ही सीमित नहीं किया बल्कि दुनिया की हर चीज़ को चिह्न के रूप में लिया। पियरसे के अनुसार चिह्न को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है बजाय सस्यूर द्वारा विभक्त दो ;व्यंजक और व्यंजितद्ध के। 

व्यंजक-जिसे वे रीप्रेज़े़न्टेमेेन्ट कहते हैं। यह एक प्रकार से व्यंजक का पर्याय है।
व्यंजित-जिसे वे ओब्जेक्ट कहते हैं।यह व्यंजित का पर्याय है।
व्याख्येय या इंटरप्रीटैन्ट-यह अर्थ की वह नई परत होती है, जो पुरानेपरम्परागत चिह्न की तरह नए अर्थ में आती है यानि कि ऐसा चिह्न जिसे हम पहले चिह्न की जगह समझने की कोशिश करते हैं।

पियरसे के लिए चिह्न गैर-मानवीय प्रक्रिया से भी पैदा हो सकता है। पियरसे की सैद्धांतिकी में चिह्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनका मानना है कि चिह्न व्यवस्था के बाहर कोई संचार संभव नहीं है। चिह्न व्यवस्था मूलतः एक संप्रेषण व्यवस्था है। चिह्न व्यवस्था की परंपराएँ अर्थ निर्माण की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है यानि व्यंजक के निर्माण को नियंत्रित करती है और इस तरह वे हमारे अर्थों की उपलब्धि को नियंत्रित करती है। इस तरह से पियरसे ने चिह्नों की तीन श्रेणियाँ बताई हैं:

  • मूर्तिवत्त ;आइकॉनिक
  • सूचीगत ;इण्डैक्सिकल और
  • प्रतीकात्मक ;सिम्बॉलिक


चिह्न और उनके आपसी संबंध चिह्नशास्त्रीय विश्लेषण की मूल धारणाएं मानी जा सकती हैं।चिह्नों के अनेक रुप हमें देखने को मिलते हैं। जैसे षब्द, बिम्ब, ध्वनि इत्यादि। शब्दइनमें से सबसे ज़्यादा परिचित रुप हैं जो वस्तु, विचार इत्यादि के लिए इस्तेमालहोते हैं। परंतु चिह्न के अन्य रुप भी हैं। जैसे बिम्ब ;इमेजद्ध। जिन पदार्थों की सहायता से ये बिम्ब तैयार किए जाते हैं, वे भी संकेत देते हैं कि बताने वाला अमुकबिम्ब के माध्यम से किस ओर ध्यान दिलाना चाहता है। जैसे सड़क के किनारे लगाएक बड़ा बैनर जिस पर एक नए संस्थान और उसमें पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों की संक्षिप्त जानकारी दी गई है और बस स्टॉप पर चिपकाए गए पैम्फ्लेट जिन परसामान्य कोचिंग कक्षाओं के लिए प्रचार किया गया है। बैनर के लिए प्लास्टिक केअच्छे किस्म के बोर्ड, रंगों, पेन्ट इत्यादि का इस्तेमाल किया गया है जबकि पैम्फ्लेटएक सादे कागज़ पर मुद्रित कराया गया है। इन सामान्य सी चीज़ों से ही ज्ञात होजाता है कि दोनों में आर्थिक रुप से व उद्देश्यगत अंतर है। बैनर विविध पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने के इच्छुक विद्यार्थियों को और इस तरह अपेक्षाकृत बड़े उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनाया गया है और पैम्फ्लेट साधारण कोचिंग कक्षाओं के उद्देश्य से इच्छुक विद्यार्थियों के लिए। इस प्रकार किसी बिम्ब को बनाने मेंकाम आए डिज़ाइन या पदार्थ भी यह संकेत करते हैं कि वह उच्च श्रेणी के हैंअथवा सामान्य श्रेणी के।

कई निगम या कम्पनियाँ भी प्रतीकों या मूर्तिवत्त चिह्नों का प्रयोग करती हैंक्योंकि ऐसे चिह्नों को याद रखना अधिक सरल होता है। इन चिह्नों को देखकर भी दर्शक यह पता लगा लेता है कि किस कार के लिएप्रचार किया जा रहा है। इस तरह चिह्नशास्त्र हर उस चीज़ पर लागू होता है जो कुछ भी अभिव्यक्त करती दिखाई पड़ती है या जो अर्थ रखती है।

जैसे कि पहले ही बताया जा चुका है कि हर वह चीज़ जो संप्रेषण करती है, उसमें चिह्न कार्य करने लगते हैं। इस दृष्टि से यदि चिह्नों की सक्रियता पर ध्यान दिया जाए, तो यह देखा जा सकता है कि चिह्नों की यह क्रियाशीलता पहले पहल स्क्रीन पर अंकित ‘बाग़बान’ शब्द से ही शुरू हो जाती है। ‘बाग़बान’ शब्द चिह्न है जो अपने अर्थ के ज़रिए इस फिल्म की कहानी को इंगित करता है। चूँकि‘बाग़बान’ का अर्थ है- बाग़ को सींचने वाला, उसकी रखवाली और पोषण करने वाला। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस फिल्म की कथा किसी संरक्षक और पालनकर्त्ता से जुड़ी हुई है जो भगवान भी हो सकता है और इंसान भी। इसी के  तुरंत बाद स्क्रीन पर एक दृश्य दिखाया गया है जो नंबरिंग के साथ-साथ चलता है और साथ ही सुनाई पड़ती है एक व्यक्ति की आवाज़। इस दृश्य पर ध्यान दिया जाए तो देखा जा सकता है कि इसमें सुबह का समय है, विशाल समुद्र है और तट पर है एक व्यक्ति और एक छोटा बच्चा। यह व्यक्ति उस बच्चे को चलना सिखा रहा है। उसे अपने साथ कदम से कदम मिलाकर चला रहा है। इसी क्रम में समय परिवर्तित होता है धीरे-धीरे बच्चा चलना सीख जाता है। कुछ ही समय बाद वह उस व्यक्ति का हाथ छोड़ आगे निकल जाता है और वह व्यक्ति वहीं खड़ा रहा जाता है। यदि इस दृश्य पर चिह्नशास्त्रीय सैद्धांतिकी को अप्लाई किया जाए तो यहाँ सुबह से शाम तक का परिवर्तनशील समय एक चिह्न है, जो उस व्यक्ति की आयु को व्यंजित करता है। विशाल समुद्र चिह्न है, जो इस संसार को व्यंजित करता है अर्थात् एक व्यक्ति अपनी सारी ज़िंदगी इस संसार से उसे मिलने वाले अनुभवों को दे एक बच्चे के लिए आसान और सही रास्ता चुन रहा है। उसे इस लायक बनाता है कि वह स्वयं अपने पैरों पर खड़ा हो सके और वह बच्चा जब चलना सीख जाता है या लायक बन जाता है, तो उस व्यक्ति का हाथ छोड़ आगे निकल जाता है। कहीं न कहीं ये सारी क्रियाएँ और पहले संकेत दे चुका ‘बाग़बान’ शब्द  मिलकर उस व्यक्ति को पिता के रूप में और बच्चे को उसके पुत्र के रूप में व्यंजित करते हैं। चिह्नों की क्रियाशीलता इसी दृश्य के साथ-साथ सुनाई देने वाली आवाज़ को लेकर भी पुष्ट होती है:

‘‘बाग़ को जन्म देने वाला बाग़बान और परिवार को जन्म देने वाला पिता दोनों ही अपने खून-पसीने से अपने पौधों को सींचते हैं। न सिर्फ अपने पेड़ से बल्कि उसके साये से भी प्यार करते हैं क्योंकि उसे उम्मीद है कि एक रोज़ जब वह ज़िंदगी से थक जाएगा, तो वही साया उसके काम आएगा।’’

यहाँ पर बाग़ और पिता में समानता दिखाकर इस फिल्म के नाम ‘बाग़बान’ और उसमें निहित कथा को न केवल एक-दूसरे से सम्बद्ध किया गया है वरन् इस फिल्म के शीर्षक की सार्थकता पर भी प्रकाश डाला गया है। इस तरह ये भी एक चिह्न है। इसके बाद शुरू होता है एक गीत:

‘‘धरती तरसे, अंबर बरसे, रुत आए रुत जाए
हर मौसम की खुशबू चुनके बाग़बां बाग़ सजाए......
बाग़ों के हर फूल को अपना समझे बाग़बां
हर घड़ी करे रखवाली, पत्ती-पत्ती डाली डाली सींचे बाग़बां।’’

यह गीत लगता तो ‘टाइटल साँग’ है लेकिन चिह्नशास्त्र केवल यही जानना तो काफी नहीं मानता। इस ‘टाइटल साँग’ में अब जिस ‘बाग़बां’ षब्द का प्रयोग है, वह केवल पौधों की रखवाली या पोषण करने वाले माली को ही व्यंजित नहीं करता। इसके साथ एक विशेष अर्थ जुड़ गया है जो पहले-पहल स्क्रीन पर दिखाए गए शब्द से लेकर अब तक सक्रिय भूमिका निभाते आ रहे चिह्नों की वज़ह से एक पिता को व्यंजित कर रहा है।

इसके उपरांत शुरू होती है- फिल्म, जिसमें दिखाए गए हर एक दृश्य पर काम किया गया है। फलस्वरूप इस पूरी फिल्म से 129 दृश्य और 600 से भी अधिक चिह्न निकलते हैं। चूँकि एक लेख या अध्याय में इस फिल्म के प्रत्येक दृश्य पर बात नहीं की जा सकती इसलिए यहाँ उदाहरण के लिए इस फिल्म के निम्न दृश्यों पर प्रकाश डाला गया है।

एक फिल्म में शब्द, चित्र, ध्वनि, रंग, हाव-भाव, वेशभूषा और बहुत सी चीज़ें अर्थ संप्रेषण में कारगर सिद्ध होती हैं इसलिए एक-एक करके इन सभी पर ध्यान दिया गया है। शब्दों को चिह्न मान उदाहरण के तौर पर दृश्य संख्या 21 को लिया जा सकता है जो राज मल्होत्रा की रिटायरमेंट से जुड़ा है। बैंक को छुट्टी न होने पर भी खाली देख आश्चर्यचकित रह जाने वाले राज का स्वागत अचानक तालियों के साथ किया जाता है। तालियाँ बज रही हैं और दो लोगों के हाथ में है-एक बैनर, जिस पर लिखा हैः-

Raj Malhotra, We will miss you!

इस स्लोगन के सहारे एक विशिष्ट अर्थ संप्रेषित किया जा रहा है। डपेेशब्द व्यंजित करता है-राज से आगे न मिल पाने का भाव। इसलिए यह एकचिह्न है। इसी तरह 

ICICI Bank bids a good bye to Raj Malhotra!

ळववक इलम शब्द ‘विदाई’ का अर्थ देता है। इस तरह यह पूरा स्लोगन राज के रिटायरमेंट समारोह को व्यंजित करने में एक टूल का काम कर रहा है। 

चूँकि चित्र व्यक्ति के चयन को व्यंजित करते हैं और चयन की पृष्ठभूमि में व्यक्ति का स्वभाव, प्रकृति और कामना छिपी रहती है इसीलिए चित्र भी चिह्न हैं। सबसे पहले नज़र डालते हैं-राज मल्होत्रा के घर पर। राज के घर की दीवारों पर सीनरीज़ और पेंटिंग लगी हैं। ये प्रमुख रूप से दो तरह की हैं - एक प्रकृति को दर्शाने वाली और दूसरी देवी-देवताओं की। चूँकि फिल्म का नाम ही ‘बाग़बान’ है जो बाग़ और प्रकृति को आधार बनाकर एक परिवार को व्यंजित करता है इसलिए कहीं न कहीं ये चित्र इसी अर्थ में जुड़ते हैं और ज़्यादा ध्यान से देखा जाए तो शायद इसीलिए पूरी फिल्म में ही- चाहे वह राज का घर हो, बैंक हो, बेटों का घर हो, म्यूज़िक कैफे हो या सम्मान समारोह हो - हर जगह पेड़-पौधों को महत्वपूर्ण मान इनका प्रयोग किया गया है। जहाँ तक प्रश्न है देवी-देवताओं की पेंटिंग का, तो राज के घर में गणेश की, श्री कृष्ण की और यशोदा व बाल रूप में कृष्ण की तस्वीरे हैं। ये सभी चिह्न हैं, जो बुज़ुर्ग लोगों की प्रकृति व स्वभाव को व्यंजित करते हैं। उनकी आस्था को व्यंजित करते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच का प्यार व्यंजित करते हैं। यही चीज़ें अगर राज के बेटों के घर में देखी जाए, तो कहीं नहीं मिलेंगी। वहाँ ज़्यादातर मॉडर्न आर्ट के नमूने हैं। यह एक चिह्न हैं।ये मॉडर्न आर्ट जहाँ उनके आधुनिक व्यक्तित्व को, उनके रहन-सहन के स्तर को, सोच को व्यंजित करती हैं वहीं कहीं न कहीं ये छुपाव-दुराव और दिखावटीपन को भी व्यंजित करने वाले व्यंजक के रूप में सामने आती हैं। कुछ चित्र स्थान विशेष को व्यंजित करते हैं: जैसे हेमंत के म्यूज़िक कैफे में लगा मेनू बोर्ड, बैंक में लगे लोन और पॉलिसी की जानकारी संबंधी चित्र या पोस्टर।

फिल्म के अर्थ संप्रेषण में ध्वनि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस संदर्भ में सबसे पहले लेते हैं पात्रों द्वारा कहे गए संवाद। जैसे: 

पूजा-‘‘पहले जब आइने के सामने खड़ी हो सजती-सँवरती थी, तो लगता था कि आप मुझे देख रहे हैं और कह रहे हैं पूजा तुम पर नीले रंग की साड़ी बहुत सुन्दर लगती है। सच कहूँ अब सजने-सँवरने का मन ही नहीं करता। आखिर किसके लिए सजूँ? कौन देखता है मुझे?’’

पूजा द्वारा कही गई बात व्यंजित करती है कि अब वह राज के साथ नहीं रहती ;बड़े बेटे अजय के साथ रहती हैद्ध और यह कहना कि ‘कौन देखता है मुझे?’ उस घर में उसकी दयनीय स्थिति को व्यंजित करता है। इस तरह पात्रों द्वारा कही और कुछ अनकही बातों में बहुत महत्वपूर्ण पक्ष सामने आते हैं। इसी के अंतर्गत फिल्म के गीत भी स्थान पाते हैं। इस फिल्म के सभी गीत इमोशनल हैं। ये प्रसंगानुकूल होने के साथ-साथ भावनाओं की अभिव्यक्ति में भी सक्षम हैं। उदाहरण के तौर पर दृश्य संख्या 65 को लिया जा सकता है। इस दृश्य में राज अपनी कहानी लिखने का निर्णय ले लेता है। लेकिन लिखने से पहले वह काफी देर तक सोचता है। इस समय राज खामोश है और चेहरे के हाव-भाव के माध्यम से व्यंजित कर रहा है कि वह कुछ सोच रहा है लेकिन वह क्या सोच रहा है? इसे जानना भी ज़रूरी है। इसीलिए इस सोच को व्यंजित करने के लिए यहाँ एक गीत डाला गया है जिसके बोल हैं:

‘‘बीती बातें याद आती हैं, जब अकेला होता हूँ मैं
बोलती हैं खामोशियाँ, सबसे छुपके रोता हूँ मैं
एक अरसा हुआ मुस्कुराए हुए, आसुँओं में ढली दास्ताँ.......’’

इस प्रकार ये गीत जहाँ राज की पुरानी यादों को व्यंजित करता है, वहीं उसके दुःख को भी व्यंजित करता है। यह दुःख उसकी पत्नी पूजा से अलग होने का भी है और बेटों से मिलने वाला भी। इस तरह इन्हें भी चिह्नों की श्रेणी में लिया जा सकता है।

ध्वनि के अंतर्गत ही दृश्यों में प्रयोग किए गए बैकग्राऊण्ड साऊंड को भी लेना होगा। कभी एक-दूसरे से अलग न रहने वाले राज और पूजा बच्चों की बनाई योजना के चलते एक-दूसरे से अलग हो अलग-अलग बेटों के पास अगले छः महीने के लिए चले जाते हैं। जाते समय वे दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे हैं। थामा हुआ उनका हाथ जब उन्हें छोड़ना होता है, उस समय बाँसुरी की तेज़ आवाज़ का प्रयोग किया गया है जो दुःख को व्यंजित करता है। इसी तरह बेटों द्वारा जब कटु बातें कहीं जाती हैं, तो ड्रम बीट्स का प्रयोग किया गया है। इस तरह फिल्म में प्रयोग किया जाने वाला बैकग्राऊण्ड साऊंड भी चिह्न है, जो पात्रों के कहे गए शब्दों की गहराई को और कहीं-कहीं पात्रों के मौन को भी अभिव्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अगला महत्वपूर्ण चिह्न है- रंग। इस फिल्म में हल्के और गहरे दोनों ही तरह के रंगों का प्रयोग किया गया है। राज और पूजा के घर की दीवारों पर हल्का रंग है। इसके साथ ही राज और पूजा हल्के रंग के कपड़ों को ही अधिक पहनते हैं। वास्तव में हल्के रंग प्रसन्नचित्त व्यक्तियों की पसंद होते हैं और कहीं न कहीं वृद्धावस्था में अधिक रुचिकर होते हैं। ज़ाहिर है ये रंग व्यंजक हैं, जो बुज़ुर्ग पीढ़ी को रीप्रेज़ेन्ट कर रहे हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने गहरे रंग पहने ही नहीं। ‘वैलेन्टाइन्स डे’ पर पूजा ने लाल रंग की साड़ी पहनी है। यह प्रणय को व्यंजित करने वाला रंग है। शादी की सालगिरह पर वह पीली साड़ी पहनती है। पीला रंग आनंद व उल्लास को व्यंजित करता है। राज ने अधिकतर सफेद रंग पहना है जो ळववकदमेे को व्यंजित करता है। इसी तरह अजय और संजय के घर में हल्के रंग भी हैं व गहरे श्ी। अलग-अलग कमरों में अलग-अलग पेन्ट है। रोहित के घर में गहरे काइया रंग का प्रयोग है। पायल के कमरे में गहरे मेरून रंग का, तो आर्चीज़ म्यूज़िक कैफे में गहरे भूरे रंग का ;यहाँ भी लगभग सभी युवा लोग आते हैंद्ध। इन सभी बातों से निष्कर्ष निकलता है कि गहरे रंग युवा लोगों को अधिक आकर्षित करते हैं और कहीं न कहीं फैशन के हिसाब से भी वे इनका प्रयोग करते हुए दिखाई पड़ते हैं।

चूँकि The Desire of the heart is also the light of the eyes  इसलिए पात्रों के हाव-भाव भी चिह्नों की श्रेणी में शामिल होंगे। उदाहरण के लिए दृश्य 31 में पूजा बच्चों के साथ चलने की मंजूरी देते हुए उन्हें यह बताने को कहती है कि कब किसके साथ चलना है और चली जाती है। बच्चे उसे घूरते रह जाते हैं और फिर एक-एक कर अपने कमरों में चले जाते हैं। यहाँ पूजा के हाव-भाव पर ध्यान दिया जाए तो पूजा का धीरे-धीरे सीढ़ियों से उतरना, खामोशी और फिर दुःख के साथ दी गई उसकी रज़ामंदी बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ संप्रेषित कर देती है। ये बहुत कुछ है- राज से अलग हो जाने का दुःख और एक बार फिर बच्चों की खुशी के लिए स्वयं की खुशियों का गला घोंट देना। बच्चों द्वारा पूजा को घूरते रह जाना व्यंजित करता है कि उनके लिए पूजा का यह फैसला कितना Unexpected था और इसीलिए वे हैरान हैं। उनका एक-एक करके चले जाना भी उनकी नाराज़गी को व्यक्त करता है। इस तरह एक फिल्म में पात्रों के हाव-भाव भी अर्थ संप्रेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इस नाते इन्हें चिह्नों की श्रेणी में शामिल किया जाएगा।

कई दृश्यों में वॉयस ऑवर भी हुआ है और लैड आऊट भी। इस सोच मे पुराने दृश्यों को दिखाया जाता है। उसमें स्क्रीन ब्लैक एंड वाइट हो जाता है और सभी चीज़ हल्की धुंधली नज़र आती है। यह एक चिह्न है जो व्यंजित करते हैं-पुरानी यादों को। वैसे तो चाहे खुशी हो या गम फिल्म में हर पात्र फिल्म के दृश्य के अनुकूल मेकअप किए हुए नज़र आता है लेकिन कहीं न कहीं यह मेकअप भी पात्र की स्थिति को व्यंजित करता है। उदाहरण के लिए पूजा को लिया जा सकता है। जब वह राज के साथ थी, तो उसके चेहरे पर एक चमक दिखाई देती थी। लेकिन अलग हो जाने पर बच्चों के साथ रहते समय यह चमक कहीं नज़र नहीं आती। करवाचौथ के दिन भी वह एक हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहने हुए दिखाई देती है। पहले करवाचौथ के दिन वह जिस तरह दिखती थी उसमें और अब उसके बनने के तरीके में बहुत अंतर दिखाया गया है।

कोड:  इसी श्रृंखला में इस फिल्म से निकलने वाला एक महत्वपूर्ण कोड भी सामने आता है जो इस फिल्म में शुरू से अंत तक कार्य कर रहा है और वह कोड है-परिवार संबंध। पूरी कहानी इन्हीं परिवारिक संबंधों को केन्द्र में रखकर दिखाई गई है। इन्हीं परिवारिक संबंधों को आधार बनाकर दो पीढ़ियों की सोच में, उनके जीवन जीने के ढंग में अंतर दिखाया गया है। बुज़ुर्ग माता-पिता को रीप्रेज़ेन्ट करने वाले राज और पूजा के लिए परिवार ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। अपने बच्चों की खुशियों, ज़रूरतों और उज्ज्वल भविष्य के लिए माता-पिता अपनी पूरी ज़िंदगी लगा देते हैं। पैसों की ताकत को नकारते हुए वे बच्चों के साथ और प्यार को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। लेकिन आज की पीढ़ी जिसे राज और पूजा के बेटे व बहुएँ रीप्रेज़ेन्ट कर रहे हैं- की सबसे बड़ी ताकत पैसा है, प्यार नहीं। परिवार के नाम पर उन्हें एकल परिवार का कॉन्सेप्ट भाने लगा है जिसमें बूढ़े माता-पिता के लिए कोई जगह नहीं है। उनकी फास्ट लाइफ में प्यार एक हद तक ही ठीक माना जाता है। एक हद से आगे बढ़ जाने पर वह घुटन बन जाता है। अपने परिवार में उन्हें न तो नियंत्रण पसंद है और न ही अनुशासन क्योंकि उनके लिए यह व्यक्ति का डॉमिनेटिंग नेचर है। उनकी ज़िंदगी के लिए महत्वपूर्ण हो चुकी है-आज़ादी और वे अपनी ज़िंदगी में किसी का भी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करते। आधुनिक जीवन-शैली का चोला ओढ़ने को वह मॉडर्न हो जाना मानते हैं। उनके लिए माता-पिता सिर्फ और सिर्फ उनके विकास का साधन मात्र है। माता-पिता द्वारा निभाए गए कर्त्तव्य और अनुशासन युवा पीढ़ी की नज़रों में उनका स्वार्थ और उनकी दख़लअंदाज़ी है। लेकिन जिस तरह हाथ की पाँचों अगुंलियाँ बराबर नहीं होती, उसी तरह समाज के सभी लोग श्ी एक जैसे नहीं होते। इस पीढ़ी में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो व्यक्ति की इज्ज़त उसकी अच्छाइयों और गुणों के आधार पर करते हैं न कि उनके बैंक बैलेंस के आधार पर। जैसे आलोक, अर्पिता, कपिल, नीली, राहुल और देर सवेर ही सही, लेकिन अपनी गलतियों का एहसास करने वाली पायल। ये परिवार के संबंध ही व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। लेकिन इन संबंधों को कभी भी इंसान की कमज़ोरी नहीं समझना चाहिए। माता-पिता पैसों के लालच से अपने परिवार का भरण-पोषण या उनके साथ जुड़कर नहीं रहते। वरना पूरे परिवार को चलाने वाला इंसान खुद को भी पाल सकता है। इस संदेश के साथ ही इस फिल्म को समाप्ति की ओर ले जाया गया है।


डॉ. मनीषा

सहायक प्रबंधक (राजभाषा)
राजभाषा विभाग, केन्द्रीय कार्यालय
वरली, मुंबई-18

ई-मेल drmanisha1@rbi.org.in
निष्कर्षतः चिह्नशास्त्रीय विश्लेषण के आधार पर इस फिल्म के अर्थ संप्रेषण में कार्यरत छोटी-छोटी सारी इकाइयाँ हर दृष्य में देखी जा सकती हैं, जो एक-दूसरे के साथ मिलकर या कहना चाहिए कि तालमेल कायम कर अर्थ को प्रभावशाली ढंग से व्यंजित कर रही हैं। इस तरह इस पूरी कार्यप्रणाली में चिह्नों की अंतहीन और एक-दूसरे से सम्बद्ध श्रृंखला दिखाई देती है। एक फिल्म में जो भी अर्थ संप्रेषित होता है उसे महज़ व्यंजित मान हम लोग ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन उस व्यंजित अर्थ को संप्रेषित करने के पीछे जितने भी व्यंजक काम करते हैं, उनकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। यदि इन सभी बातों का ध्यान रख एक फिल्म को देखा जाए, तो निश्चित ही उसमें निहित कथा और अर्थ को व उसकी निर्माण प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझा भी जाएगा और उसमें निहित कथा और अर्थ का संप्रेषण भी प्रभावशाली ढंग से होगा। 

  • गेरोड, पेरे, ‘सिमिओलॉजी, फंक्शन एण्ड मीडिया’ ;1975
  • क्रिश्नन, ए., पाठक, बी.एम., शर्मा एम.के, ‘आस्पेक्ट्स ऑफ ह्यूमन कम्यूनिकेशन’, प्रथम संस्करण 1989, मित्तल पब्लिकेशन, नई दिल्ली।
  • पचौरी, सुधीश, ‘टी.वी. टाइम्स’, प्रथम संस्करण 1998, मेधा बुक्स दिल्ली।
  • सस्यूर, फर्डेनांर्ड, द, ‘ए कॉर्स इन जनरल लिंग्विस्टिक्स’ ;अनुदित डब्न्यू. बास्किनद्ध, 1966, मैकग्रो हिल न्यूयार्क।
  • हॉकेज़, टेरेंस ‘स्ट्रक्चरलिज़्म एण्ड सिमिऑटिक्स’ द्वितीय संस्करण 2003, रुटलेज टैलर एण्ड फ्रांसिस ग्रुप, लंदन।
  • फ्रॉम, एरिक, ‘द सेम सोसाइटी’, रूटलेज एंड कैगान पॉल लिमिटेड, लंदन।
  • सीटर, एलेन, ‘सिमिऑटिक्स एण्ड टेलीविज़न’ ;लेख-पुस्तक का नाम:‘‘चैनल्स ऑफ डिस्कोर्स: टेलीविज़न एण्ड कंटैम्पररी क्रिटिसिज़्म’’, प्रकाशन वर्ष 1987, द यूनीवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना प्रेस।
  • बाग़बान फिल्म ;डीवीडी
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