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शोध:मध्यकालीन हिन्दी कविता की पुनर्व्याख्या क्यों?/रंजन पाण्डेय

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अप्रैल 21, 2015 | मंगलवार, अप्रैल 21, 2015

अपनी माटी             (ISSN 2322-0724 Apni Maati)              वर्ष-2, अंक-18,                   अप्रैल-जून, 2015


सामान्यतः मध्यकाल की परिधि में हिन्दी साहित्य की भक्तिपरक और रीतियुक्त कविता आती है, जिसकी समय सीमा संवत् 1375 से संवत् 1900 है। वास्तव में प्रत्येक कविता का अर्थ और भाव, संवेदना समय के अनुसार बदलती रहती है। आलोचक की दृष्टि ही एक ऐसा कारक है जो कविता की व्याख्या पर नियंत्रण रखते हुए उसे गतिशील बनाती है। जिस प्रकार अतीत न सिर्फ वर्तमान को प्रभावित करता है बल्कि वर्तमान भी अतीत को उतना ही प्रभावित करता है, उसी तरह साहित्य या कविता के संदर्भ में भी यही तर्क लागू होता है। प्रत्येक कविता में भविष्य की संभावनाएँ, आशाएँ, आकांक्षाएँ होती हैं और वर्तमान युग-बोध, युग मूल्य से अतीत की कविता में नये अर्थ खोजे जा सकते हैं, जो आज के दौर के समाज के लिये उपयोगी होते हैं।

आज की आवश्यकताओं के अनुरूप मध्यकालीन कविता में वर्तमान संभावनाओं का अन्वेषण करने के लिये यह आवश्यक है कि उसे नयी सदी की मान्यताओं, विचारधराओं की कसौटी पर कसते हुए उसकी पुनर्व्याख्या की जाए। साहित्य के इतिहास पर विचार करते हुए किन्हीं दो कालों के बीच एक निश्चित सीमा रेखा नहीं खींची जा सकती। मान्यताएँ, विचार धाराएँ और साहित्यिक प्रवृत्तियाँ एक धरावाहिक क्रम में अपना मार्ग बनाकर आगे बढ़ती रहती हैं। इस प्रकार इतिहास और वर्तमान में कोई निश्चित विभाजक रेखा खींचना दुष्कर है। इतिहास और वर्तमान की इसी सम्बद्धता का कारण है कि रचनओिं का अर्थ, उद्देश्य, भावबोध इतिहास के अतिरिक्त वर्तमान से भी निर्धारित होता रहता है। वर्तमान की विचारधारा, मानसिकता कहीं न कहीं अतीत की रचनाओं का अर्थ बदल देती हैं, यही कारण है कि हर नये युग में अपने से प्राचीन रचना की पुनर्व्याख्या आवश्यक हो जाती है। प्रसिद्ध विद्वान ‘पिकासो’ की सर्वविदित मान्यता है कि अगर कोई कलाकृति वर्तमान समय में जीवित नहीं रह सकती तो उसकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिए। तात्पर्य यह है कि हर रचना आने वाले समय में कुछ न कुछ प्रासंगिक होनी चाहिए। वर्तमान समस्याओं, संदर्भों से उसका जुड़ाव होना चाहिए और आलोचक का यही उत्तरदायित्व होता है कि वर्तमान संदर्भों से रचना का संदर्भ जोड़कर उसकी व्याख्या करे। यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि आलोचक उसी रचना को प्रतिष्ठित करता है जो उसकी विचारधरा के साँचे में एकदम फिट बैठती है। यही कारण है कि शुक्ल जी अपने ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ नामक पुस्तक में कबीर को उतना महत्व नहीं देते हैं, जितना तुलसी को इसलिये भी मध्यकालीन कविता की पुनर्व्याख्या आवश्यक हो जाती है। पुनर्व्याख्या का उद्देश्य यह होता है कि किसी भी कविता को परम्परागत बँधे-बँधाये साँचे से मुक्त कर उससे स्वस्थ और निरपेक्ष अर्थ प्रदान किये जाएँ।

विज्ञान और तकनीकी के इस दौर में हमारे सामने मध्यकालीन कवियों और उनकी कविताओं के संदर्भ में नये-नये तथ्य और साक्ष्य उपस्थित हो रहे हैं। परिणामतः वर्तमान युग का पाठक तथा सक्रिय आलोचक उन नये तथ्यों के आलोक में कविता की पुनर्व्याख्या का प्रयास करता है, जो परम्परागत दृष्टि से की गयी व्याख्या से भिन्नता रखती होगी। इस प्रकार नये साक्ष्यों के आलोक में की गई पुनर्व्याख्या कवियों और उनकी कविताओं की महत्ता को घटाती या बढ़ाती है। यह पुनर्व्याख्या आलोचक की कविता को समझने की दृष्टि भी पुष्ट करती है। नये तथ्यों या साक्ष्यों की उपस्थिति हमें या आलोचक को इस बात के लिये बाध्य करती है कि कविता को नयी दृष्टि से देखते हुए उसकी पुनर्व्याख्या की जाए।

जायसी के संदर्भ में विचार करते समय यह कहा जा सकता है कि किसी समय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जायसी को सूफी बताते थे और उनकी कविता की व्याख्या सूफी मत के प्रभाव के आधर पर करते थे, वहीं आज विजयदेव नारायण साही नये साक्ष्यों के आधर पर यह सिद्ध कर चुके हैं कि जायसी सूफी कवियों की श्रेणी में नहीं आते हैं। अब वर्तमान संदर्भों में यह आवश्यक हो गया है कि कवि जायसी की कविताओं की व्याख्या सूफी मत के प्रभाव से हटाकर की जानी चाहिए।आज के दौर में राजनीति, समाज और साहित्य को गहरे अर्थों में प्रभावित करने लगी है। अब यह राजनीति नये-नये मतों, नयी-नयी विचारधाराओं की उत्पत्ति का बहुत बड़ा कारण भी है। राजनीतिक उथल-पुथल से विचारधारा की भूमिका में भी परिवर्तन होता है। कोई भी विचारधारा अपनी प्रतिद्वन्द्वी विचारधारा को चुनौती देने के लिये अपने आदर्शों, मान्यताओं और मूल्यों के आधार पर कविता की पुनर्व्याख्या का प्रयास करती है। मार्क्सवादी, अस्तित्ववादी, संरचनावादी, उत्तर संरचनावादी, आधुनिकतावादी और उत्तरआधुनिकतावादी जैसी विचारधाराओं के घमासान में कविता की व्याख्या अलग-अलग होती रहती है। इसलिये भी यह आवश्यक हो जाता है कि मध्यकालीन कविता को निरपेक्ष भाव से पुनर्व्याख्यायित किया जाना चाहिए।

मध्यकाल में सर्वप्रथम भक्तिकाल पर विचार करते समय हमारा ध्यान सहज रूप से तुलसी और उनकी कविता पर जाता है। आज जहाँ दलित विमर्श और स्त्री विमर्श को केन्द्र में रखकर मध्यकालीन कविता की व्याख्या की जा रही है, वहाँ तुलसी और उनकी कविता को गंभीर आलोचना का सामना पड़ रहा है। यहाँ पर यह आवश्यक हो जाता है कि तुलसी की कविता को पुनर्व्याख्यायित किया जाए। उनकी कविता में किसानों की दयनीय दशा, बेरोजगारी और भुखमरी आदि को आज के दौर से जोड़कर देखें तो भी तुलसी की कविता की पुनर्व्याख्या आवश्यक हो जाती है। यह बात तुलसी के साथ-साथ अन्य भक्तिकालीन कवियों की कविताओं पर भी लागू होती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि किसी राजा के राज्य में जनता दुःखी है तो वह राजा नरक का अध्किारी होता हैः-
‘‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी,
सो नृप अवसि नरक अधिकारी।’’

इन पंक्तियों को वर्तमान संदर्भों से जोड़कर देखें तो हम पाते हैं कि तुलसी का उद्देश्य मात्रा कविता करना न था, बल्कि अपने तत्कालीन समाज और भविष्य की पीढ़ियों को भी मार्गदर्शन प्रदान करना था, यह अर्थ हम पुनर्व्याख्या के द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा तुलसी को किसान चेतना का कवि कहते हैं, जबकि मैनेजर पाण्डेय को तुलसी के काव्य में किसान जीवन की पंक्तियाँ नाममात्र ही नजर आती हैं, अतः इस आधार पर वे तुलसी को किसान चेतना का कवि स्वीकार नहीं करते हैं। यहाँ पर तुलसी की पुनर्व्याख्या आवश्यक हो जाती है, जो यह बात स्पष्ट कर सके कि तुलसी का काव्य किसान चेतना की आत्मा से बना है। वास्तव में मानस पर कथावाचन शैली का प्रभाव है, साथ ही किसान जीवन की व्यापकता का असर मानस की व्याप्त चेतना पर देखा जा सकता है। आज जब नये साहित्यिक विमर्शों से तुलसीदास पर हमले हो रहे हैं, तब उनकी कविता की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता का अनुभव होता है। यह बात तुलसी पर ही नहीं सम्पूर्ण मध्यकालीन कविता पर लागू होती है। जब-जब नयी विचारधारा पुरानी रचना को चुनौती देगी, तब-तब रचना को वर्तमान संदर्भों से जोड़ने तथा प्रासंगिक बनाने के लिये उसकी पुनर्व्याख्या की आवश्यकता पड़ती रहेगी।

भक्तिकालीन कविता के संदर्भ में वर्तमान विद्वान यह मानते हैं कि इस कविता का स्वर सामन्त विरोधी लोकजागरण वाला था, क्योंकि यह कविता जातीय आन्दोलन से प्रेरित और प्रभावित थी। जातीय आन्दोलन का अर्थ है- जातीय निर्माण की प्रक्रिया और इसका मतलब है लोक-भाषाओं की साहित्य में प्रतिष्ठा तथा उनमें समर्थ साहित्य रचना का वेगवान कभी न समाप्त होने वाला धरावाहिक प्रवाह। कबीर, जायसी, मीरा, सूर, रसखान, रहीम, रैदास और तुलसी के साहित्य में यही वह महान रिक्थ है जो एक ओर अपनी पूर्ववर्ती संस्कृत-साहित्य की उदात्त मानवतावादी प्राणधरा से रस ग्रहण करता है तो दूसरी ओर हमारे साहित्य में लोकवादी नवजागरण और आधुनिक चेतना का सूत्रापात करता है। इस संदर्भ में डॉ. राम विलास शर्मा प्रश्न उठाते हैं- ‘‘आश्चर्य की बात है कि जो साहित्य दूर-दूर के जनपदों में एकता के सूत्र बाँधता आया है, लाखों किसानों को आंदोलित करता रहा है, उसे लोग मध्यकालीन कहते हैं। आधुनिकता का प्रारम्भ जातीय निर्माण की प्रक्रिया से मानना चाहिए।... हिन्दी प्रदेश में सूरदास और तुलसीदास जैसे कवियों की भूमिका इसी परिप्रेक्ष्य में समझी जा सकती है।’’ 

वस्तुतः भक्ति साहित्य इसी अर्थ में इस जातीय आन्दोलन का सांस्कृतिक प्रतिबिम्ब है। इस प्रकार इस मध्य काल को शर्मा जी के मतानुसार आध्ुनिक काल कहा जाना चाहिए। इस तरह के अनेक प्रश्नों के उत्तर पाने के लिये अब यह आवश्यक हो जाता है कि हम मध्यकालीन कविता की पुनर्व्याख्या, नये दृष्टिकोण से करें, ताकि हम यह निर्धरित कर सकें कि क्या सचमुच मध्यकाल से आध्ुनिक काल माना जाना चाहिए?

मध्यकाल के दूसरे भाग ‘रीतिकाल’ पर विचार करते हुए यह कहा जा सकता है कि रीतिकालीन कविता के पहले आधुनिक पाठक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामविलास शर्मा और विजय देव नारायण साही, जैसे चिन्तकों के संदर्भ में यह बात मान्य है कि रीतिकालीन कविता के प्रति सभी की कुछ-न-कुछ सहानुभूति है। रीतिकालीन साहित्य की भाव-प्रवणता सरसता और भाषा की प्रशंसा सबने की है। फिर भी इस साहित्य की आलोचना क्यों की? क्यों इसे पतनोन्मुख माना? निःसंदेह इसलिये क्योंकि आध्ुनिक पाठक इतिहास और समाज के परिप्रेक्ष्य में साहित्य के प्रश्नों को हल करना चाहते थे और उन्हें ऐसा लगता है कि रीतिकालीन काव्य में इतिहास और समाज की चुनौतियों का सामना करने की व्याकुलता नहीं या बहुत कम थी। शुक्ल जी, द्विवेदी जी और रामविलास शर्मा तीनों का मानना है कि रीतिकाल में जनता या पूरे समाज की रूचि की विकृत है, यह सर्वथा भ्रम है। सामंत वर्ग की रूचि विकृत थी। रीतिकालीन कवि उनके आश्रय में थे और विलासी जीवन को ध्यान में रखकर कविता करते थे। सामंतों का जीवन निष्क्रिय और चुनौतीहीन था जो स्वाद और स्वाद के अतिरिक्त चमत्कार का दास था। साथ ही सामंतों को स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम से कोई लेना-देना भी न था, तो फिर सहज ही प्रश्न उठता है कि रीतिकालीन कवियों की कविताओं में प्रेम वर्णन क्यों मिलता है? उत्तर स्पष्ट है कि यह प्रेम गृहस्थ प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही रीतिकालीन कविता के सामान्य जन-मानस से जुड़ाव की भी पुष्टि करता है। इस तरह के तथ्यों की जानकारी तभी सम्भव है। जब मध्यकालीन कविता की पुनर्व्याख्या की जाए।

साही जी का मत यह है कि रीतिकालीन कविता ने एक प्रकार की भावानुभूति को धार्मिकता से मुक्ति दिलाई। साही ने हिन्दी के रीतिकालीन काव्य को एक नया संदर्भ दिया। रीति कवियों की आलंकारिक और चमत्कारपूर्ण भाषा दरअसल दरबारों में प्रतिष्ठित फारसी को चुनौती देने में सक्षम है। रीति कवियों की प्रतिष्ठा के कारण ही ब्रजभाषा हिन्दी-प्रदेश की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है। वह काव्य की राष्ट्र-भाषा का रूप ग्रहण करने लगती है। यह रीतिकाल में निहित सामर्थ्य के कारण हुआ है। इस सामर्थ्य के संदर्भ में रीतिकालीन कविता की पुनर्व्याख्या करने पर दोहों के अर्थ नये रूप में सामने आ पाएँगे, जिनके  शृंगारिकता के अतिरिक्त समाज और स्त्री दृष्टिकोण देखने को मिल सकता है। वास्तव में रीतिकालीन कविता के विरह-वर्णन में नारी की समाज में स्थिति तथा उस स्थिति के कारण उसके जीवन दुःख-सुख का चित्र उभारा जाता था, लेकिन एक परम्परागत रूपवादी या  शृंगारवादी दृष्टि के अंतर्गत ही आलोचक उसकी व्याख्या करता था, अब रीतिकालीन कविता को इस परम्परागत दृष्टि से मुक्त करके उसकी स्वतंत्रा पुनर्व्याख्या होनी चाहिए। नारी की तत्कालीन समाज में स्थिति को ध्यान में रखकर रीतिकालीन कविता की पुनर्व्याख्या आवश्यक है।

निश्चय ही कोई भी व्याख्या अंतिम व्याख्या नहीं होती है, और न हो सकती है, लेकिन जब भी हम किसी रचना पर विचार करते हैं, तो उसके कुछ नये आयाम खोजने का प्रयत्न करते हैं। आज मध्यकालीन कविता में अधिकाधिक संभावनाएँ तथा नये आयाम खोजने के लिये उसकी पुनर्व्याख्या की आवश्यकता बढ़ी है जिससे कि उस कविता का बार-बार विवेचन हो सके और वह समाज को बेहतर प्रेरणा और मार्गदर्शन प्रदान कर सके।

सन्दर्भ
1. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पुनर्लेखन की समस्याएँ, संपा. श्याम कश्यप, पृष्ठ संख्या 69, हिन्दी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, द्वितीय संस्करण, 1999
2. हिन्दी जाति का साहित्य, डॉ. रामविलास शर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 1992, नई दिल्ली

रंजन पाण्डेय ,
शोधार्थी, हिन्दी विभाग ,
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
ई-मेल:ranjandu86@gmail.com,मो-09555850412
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