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शोध:संजीव का कथा साहित्य और आदिवासी संघर्ष/ज्योति कुमारी मीणा

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अप्रैल 21, 2015 | मंगलवार, अप्रैल 21, 2015

अपनी माटी             (ISSN 2322-0724 Apni Maati)              वर्ष-2, अंक-18,                   अप्रैल-जून, 2015

आदिवासी समुदाय का इतिहास देखने पर पता चलता है कि आदिवासियों में प्रतिरोधक की भावना हमेशा से मौजूद रही है। आदिवासी समाज में संघर्षों की परम्परा हजारों साल से चली आ रही है। इनके जल, जंगल और जमीन पर जब-जब दूसरे लोगों ने हमला किया तब-तब प्रतिरोध में इन्होंने विद्रोह और आन्दोलनों को जन्म दिया। आदिवासयों के बारे में रूपचन्द वर्मा लिखते हैं ‘‘आदिवासी लोग बहुत ही सीधे-सादे और स्वाभिमानी है यह शोषणकारी दुश्मनों के खिलाफ अनवरत लड़े और इन्होंने अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखा है।’’1

संजीव के कथा साहित्य में सिर्फ दयनीय और पीड़ित स्थितियों का ही चित्रण नहीं है वरन् शोषित, पीड़ित उपेक्षित लोगों का विरोध का स्वर भी वर्णित हुआ है। संजीव ने अपने लेखन में बारे में स्वयं कहा है ‘‘देश के लाखों दलित, दमित, प्रताड़ित, अवहेलित जनों की जिजिविषा और संघर्ष का मैं ऋणी हॅंू जिन्होंने वर्ग, वर्ण, भाषा, सम्प्रदाय के तंग दायरों को तोड़ते हुए शोषकों, ढलालों, कायरों के विरूद्ध मानवीय अस्मिता की लड़ाई लड़ी है और लड़ रहे हैं। मेरा लेखन उससे ऋण मुक्ति की छटपटाहट भर है।’’2

आजादी के बाद देश में समाजवादी समाज की स्थापना करने की घोषणा हुई लेकिन पूरी तरह से यह आज भी स्थापित नहीं हो पायी है। 1951 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार अधिकांश आदिवासी लोग कृषि पर निर्भर थे लेकिन 60 के दशक के बाद कृषि कार्य के अलावा उद्योग धंधों की ओर जाने लगे। शहरों में जाकर कारखानों में मजदूरी करने लगे, वन विभागों में मजदूरी करने लगे। इन सभी जगहों पर आदिवासियों की आय तो नहीं बढ़ी लेकिन शोषण को जरूर बढ़ावा मिला। कारखानों में मजदूरों की मजदूरी कम दी जाती है या देते ही नहीं है। मजदूरों की जान की परवाह भी नहीं की जाती। ‘सावधान! नीचे आगे है’ उपन्यास में संजीव ने इसका यथार्थ रूप प्रस्तुत किया है। उपन्यास में मैनेजमेंट की लापरवाही के कारण हजार मजदूर खदान में डूबकर मर जाते हैं मरने के बाद मजदूरों के परिवारों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती है, परिवार को मुआवजा देने में कंजूसी की जाती है। कई मजदूर तो खदान में ऐसे होते हैं जिनका रजिस्टर में नाम ही दर्ज नहीं होता। रजिस्टर में जिन मजदूरों का नाम दर्ज होता है उनको भी थोड़ा बहुत मुआवजा दिया जाता है। जिनका नाम नहीं है उनके प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती। ‘‘अफसरों की बीवियॉं संतरा, सेव, कपड़ा लेकर अपने चटख कपड़ों में दरवाजे-दरवाजे बॉंट रही थी, आगे-आगे इस्पात मंत्री और उपायुक्त। एक अकेले घर के दरवाजे पर एक औरज अपने बच्चों के साथ रोती मिली। मंत्री रूक गये। उपायुक्त ने लिस्ट देखी। क्या नाम तुम्हारे पति का?’’

‘‘ फ्रांसिस हेम्ब्रम’’
‘‘इस नाम का कोई मजदूर नहीं है सर।’’
‘‘फिर से देख ले।’’ मंत्री जी का अनुरोध
देख लिया सर, ये रही पूरी लिस्ट।’’ 
मंत्री की द्विविधा पर पीछे से एक आदमी ने जिसका नाम कोई तिवारी है। झिड़की दी हुजूर बहुत से लोग राहत सामग्री के लोभ में झूठ बोल रहे हैं जाओ-जाओ देखों कहीं पी-पा के पड़ा होगा नाली में।’’
आदिवासियों के ही जंगल, जमीन, कोयला खदान लेकिन इन पर ही इनका नाम मात्र का भी अधिकार नहीं है। पॅंूजीपति वर्ग भोले-भाले आदिवासियों को अपने चुंगल में फसाकर सब कुछ छीन लेता है और बदले में देता है सिर्फ तिरस्कार। ‘धार उपन्यास में महेन्द्र बाबू ‘मैना के पिता को बहला-फुलाकर, अनेक प्रकार के लालच देकर जमीन को हडप लेते है और अन्त में उसे मशीन में कुचलवाकर मरवा दिया जाता है, मैना का पति जनखदान ये कोयला निकालता है तो पुलिस उस पर रोक लगाती है मैना इन सबके खिलाफ संघर्ष करती है और साहस के साथ अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है। ‘‘देखिए आप लोग आपस में फैसला कर लीजिए अभी-अभी पुलिस को दिया, अब आप लोग आए हैं कितना देगा।’’ उसे ऐसे कहा जैसे घर की मालकिन भिखारियों को झिडक रही हो। थोड़ी बहुत खिच-खिच के बाद पचास पर अड़ गयी। ‘‘इससे जास्ती नहीं सिपाई साब, चाहे खाल उधेड़ लो।’’4

महाजन लोगों में भी आदिवासियों का भरपूर शोषण किया है आदिवासी समाज आजादी के बाद भी इनके चुंगल से बाहर नही आ पाया है। आदिवासियों को सूद पर पैसा देकर उनकी जमीन को हड़प लिया है, खाने-कमान के लिए आज उनके पास अपनी जमीन ही नही बची है। ‘पॉंव तले की दूब’ उपन्यास में संजीव आदिवासियों को अपनी जमीन वापस लेने के लिए संघर्ष करवाते है। ‘‘दूसरी सुबह हम जल्दी-जल्दी तैयार होकर टीले पर पहॅंुचे थे। मेड़ पर नगाड़ा बज रहा था और तीर धनुष, कुल्हाड़ी, हॉंसिया लिए काले-काले दरिद्र आदिवासी, महिला, पुरूष, बच्चे तक दो-एक बन्दूक भी थी। बहुत दूर पर खड़े कुछ अपेक्षाकृत सम्पन्न से दिखने वाले लोग ताक रहे थे . . .  मगर वे पास न फटके और दोपहर तक सारा धान कट-बटकर पहाड़ की दरारों में समा गया।’’5 उपन्यास में संजीव आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करते नजर आते हैं।

प्रेतमुक्ति कहानी में एक तरफ आदिवासियों की मेहनतकश और अभावग्रस्त जिन्दगी के दुःखदर्द को चित्रित करते हैं तो दूसरी ओर मुखिया जी और सुरेन्दर जी जैसे सामंतों की सामंती व्यवस्था के प्रेत से प्रेत मुक्ति दिलाते हैं। मुखिया जी इलाके की एक मात्र नदी पर बॉंध बनाकर सारे पानी को रोक लेते हैं जिससे जानवर तो जानवर उस क्षेत्र के आदिवासी लोग तक बिना पानी के रह जाते हैं। इसके विरोध स्वरूप ‘‘सबसे तो घूम-घूमकर कह आए काका गंगा-माय को बॉंध रहे हैं मुखिया जी, समसे इलाका का खेती, ढोर-डॉंगर, पशु-पाखी, इदमी तड़प तड़प के मरेगा, कुछ करो, किसी ने कुछ किया? अकेले काका खिलाफत करते रहे। अकेले ही बुढवा जब-जब बॉंध काट दिया करता। . . . बाघ के शिकार के लिए पाड़ा बॉंध जाता और पाड़ा खोल देते। मुखिया जी को मेहमानों के आगे शरम से गड़ जाना पड़ता।’’6 परन्तु एक दिन सुरेन्दरजी ने ही पाडे की जगह बाघ के चारे के रूप में बॉंध दिया काका (चलित्तर महतो) को। उसी दिन से उसके बेटे जगेसर पर बाप का प्रेत सवार हो गया है जिसे लोग पागल कहकर नकार देते हैं लेकिन। ‘‘जब तक बूढा हतिया का बदला नहीं ले लेगा, जाएगा नहीं, डागडर आवे चाहे डागडर का बाप।’’7 एक दिन वह समय भी आ जाता है जब जगेसर अपने परिवार और सम्पूर्ण क्षेत्र को आक्रांत करने वाले मुखिया के बेटे सुरेन्दर जी को मारकर प्रेम-मुक्ति पाता है। तीसरे पहर दूर से ही जंगल हरहराया। ऑंधी से सुरेन्दर जी के चीखने की आवाज एक बार आई और फिर चिथड़ी-चिथड़ी हो गई। . . . बॉंध कटा हुआ था। हरहराता कलकलाता पानी तेजी से बह रहा था। . . . सुरेन्दर जी को लादकर पम्प के पास समतल जमीन पर ले आया मुस्तकीम। सारा शरीर बर्फ की मानिन्द ठंडा। . . . जीवन का कोई स्पन्दन बाकी नहीं रह गया था। . . . काहे को डोली खटोली मॅंगवा रहे है मुखिया जी, परेत मुक्ति हो गया।’’8 वास्तव में आन्तरिक बेचैनी, व्याकुलता और विवशता (जब सारे रास्ते बंद हो जाये, सारी शक्तिमय शोषित के खिलाफ हो) व्यक्ति को ऐसी लड़ाई और संघर्ष की ओर प्रवृत्त कर देती है। संजीव ने दिखाया है कि आदिवासी समाज की नयी पीढ़ी अपने संघर्ष और विद्रोह की नयी चेतना को लेकर आगे बढ़ रही है।

संजीव की चेतना पर भगतसिंह की विचारधारा और नक्सलवादी आन्दोलन का व्यापक प्रभाव दिखायी देता है। समाज, देश और मनुष्यता के प्रति समर्पित हर शख्स उनकी सहनुभूति का पात्र है। सामन्तवाद, पॅंूजीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ जनता की व्यापक एकता उनका सपना है। अपने कथा साहित्य में जहॉं एक ओर उन्होंने आम जन के दुःख दर्द की अभिव्यक्ति की है वहीं उन्हें बदहाली की कारक शक्तियों के विरूद्ध जाग्रत करनेकी चेष्ठा भी की है। 14 मई 1967 को पश्चिमी बंगाल में साहूकार-सरकार जमींदार के शोषण के खिलाफ नक्सलवादी आन्दोलन का जन्म हुआ। यह किसान, मजदूर और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ खुला विद्रोह था इस आन्दोलन ने हिन्दी साहित्य को नयी दिशा और दृष्टि प्रदान की। संजीव कहते हैं कि ‘‘मैं आन्दोलन के सात्विक और निःस्वार्थ विचारों का कायल था। परोक्ष रूप से काफी दिनों तक और आज भी मुझे ये विचारधारा प्रभावित करती है। यहॉं पर दुःख कातरता और सर्वांगीण मुक्ति की कामना मुझे ऐसे आन्दोलनों से जोड़ती थी। . . . नक्सलवाद के पवित्र मानवी भाव से मैं अलग नहीं हॅंू। लेकिन उसके भटकाव पर मैंने उंगली जरूर रखी।’’9 संजीव द्वारा लिखित अपराध, शिनाख्त, ऑपरेशन जोनाकि आदि कहानियॉं नक्सलियों की संवेदनशील और देशभक्ति छवि को सामने लाती है और उनके दमन का विरोध करती है। संजीव इन कहानियों के माध्यम से कहना चाहते हैं कि जब प्रशासन पुलिस, महाजन, सूदखोर, जोतदार और जमींदार किसानों, मजदूरों तथा आदिवासियों पर हिंसक जुल्म ढ़हाते हैं और उस जुल्म से भारतीय न्यायपालिका तक द्वारा छुटकारा नहीं दिलाया जाता है तो उसके खिलाफ शोषित वर्ग द्वारा हिंसक प्रतिरोध विद्रोह और संघर्ष का एक मात्र रास्ता होता है। इनकी कहानियॉं इस धारणा और मान्यता को ध्वस्त करती है कि नक्सली अपराधी है। संजीव द्वारा लिखित ‘अपराध’ कहानी जो कि उनकी श्रेष्ठ कहानियों में से एक है, नक्सलवादी आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर लिखी गयी है। संजीव के प्रिय सूर्यनारायण शर्मा को नक्सलवादी आन्दोलन में शामिल होने के ‘अपराध’ में पुलिस ने हजारीबाग जेल में बंदूक की नालों से कोंच-कोंच कर मार डाला था। इसी के चलते वे ‘अपराध’ कहानी लिख पाते हैं। संजीव ने इस कहानी में प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका, राजनेताओं सब पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। ‘अपराध’ कहानी के नायक सचिन (बुलबुल) को जब सजा दी जाती है तो उससे बचाव के लिए बोलने को कहा जाता है तब वह कहता है कि ‘‘मुझे इस पॅंूजीवादी, प्रतिक्रियावादी न्याय-व्यवस्था में विश्वास नहीं है। आम जनता भी जिसे न्याय का मंदिर कहती है वह लुटेरे-पंगे और जूता-चोरों से भरा पड़ा है। . . . ये लाल थाने, लाल जेलखाने और लाल कचहरियॉं . . . इन पर कितने बेकसूरों का खून पुता है, वकीलों और जजों का काला गाऊन न जाने कितने खून के धब्बों को छुपाए हुए हैं। परिवर्तन के महान रास्ते में एक मुकाम भी आएगा जिस दिन इन्हें अपना चरित्र बदलना होगा वरना इनकी रोबीली बुलन्दियॉं धूल-चाटती नजर आएगी।’’10 कहानी में बताया है कि सत्ता, व्यवस्था और समाज के तमाम विरोधियों व अपराधियों को संघर्ष और विरोध के माध्यम से हराया जा सकता है। भले ही उसके लिए समानान्तर सत्ता और व्यवस्था की स्थापना ही क्यों नही करनी पड़े। संजीव मानते हैं कि आदिवासी किसान, मजदूर व नारी द्वारा सामन्तवाद, पॅंूजीवाद के फैलते वर्चस्व का हिंसात्मक विद्रोह और संघर्ष ही नक्सलवादी आन्दोलन है।

‘ऑपरेशन जोनाकि’ कहानी में दिखाते हैं कि किस तरह वन विभाग के भ्रष्टकर्मी, महाजनों, अफसरों, जोतदारों आदि द्वारा आदिवासियों का खूब शोषण किया जाता है। पुलिस भी इस शोषण में अत्याचारियों के साथ नजर आती है विभिन्न आदिवासी समाज संघर्ष के लिए तैयार हो गया है बिना डरे हुए। कहानी में अनिमेष दा असामाजिक कौन है? का जवाब देते हुए कहते हैं ‘‘ये वन-विभाग के कुछ भ्रष्टकर्मी और कुछ वैसे ही भ्रष्ट महाजन, अफसर, जोतदार और इनके गुर्गे यही है न आपके शान्तिप्रिय प्रतिष्ठित नागरिक . . ? आखिर ये त्रस्त क्यों है उन भूमिहीन चासा और आदिवासियों से? गॉंव की दस लाइसेंस शुदा और बीस अवैध बन्दूके तो इन्हीं के गॉंव में जब भी कोई मारा पीटा गया तो वह उस दूसरे भूमिहीन तबके का रहा, बलात्कार भी तो उन्हीं पर। सत्येन का कसूर सिर्फ यही है कि गॅंूगे अब बोलेने भी लगे हैं सरकार क्या नहीं चाहती कि वे बोले? आज वे अपने अधिकारों, भूमिक, जंगल, मजदूरी और अस्मत के लिए खड़े होने लगे हैं तनकर सरकार क्या नहीं चाहती कि वे खड़े हो तनकर?’’11 संजीव ने बताया है कि सत्येन जैसे शिक्षित और प्रतिवाद युवक के सहयोग के चलते आदिवासी समाज अपने अधिकारों के प्रति सचेत होता जा रहा है शोषण के खिलाफ संघर्ष और विद्रोह की जो उनकी एक परम्परा रही है उनमें और अधिक ललक पैदा हो रही है। ‘‘सत्येन के बहकावे में पड़ने से पहले ये आदिवासी कितने सीधे और आज्ञाकारी थे, लेकिन अब . . .? जब से सत्येन उनके बीच आया है अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं। जब चाहा, पेड काट लिए, तालाबों से मछलियॉं चुरा ली, जब चाहा फसले काट ली। अनुशासन इसी तरह टूटता रहा तो उसकी परिणति वहीं हो सकती है जो यहॉं हुई। दरोगा तक को खदेड दिया उन्होंने। . . . पुलिस का आतंक इस तरह दरकता रहा तो कानून और शक्ति व्यवस्था को हर कोई खिलवाड़ नहीं समझ बैठेगा?’’12

उदारीकरण, भूण्डलीकरण और बाजारीकरण के दौर में आदिवासी पर हो रहे अत्याचारों का वे विरोध कर रहे हैं संगठित होकर, लेकिन पुलिस के माध्यम से शोषणकारी व्यवस्था उन्हें कुचलने पर आमदा है। आदिवासी समाज का शोषण और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष और विद्रोह की परम्परा का लम्बा इतिहास रहा है। पहले आर्यों के खिलाफ संघर्ष किया है तो फिर मुगलों के साथ, फिर बाद में अंग्रेजों, सामंतों, जमींदारों के साथ संघर्ष किया वर्तमान दौर में ग्लोबल गॉंव के देवताओं टाटा, बिड़ला, अम्बानी, पास्को, वेदान्ता आदि के साथ संघर्ष कर रहे हैं। आदिवासी समाज के इसी संघर्ष के इतिहास को याद दिलाती हैं। ‘दुनिया की सबसे हसीन औरत’ नामक कहानी। इस कहानी के माध्यम से संजीव आदिवासी समाज के साथ-साथ उन शोषणकारी आतताईयों को भी आदिवासी संघर्ष के इतिहास में बताते हैं। संजीव के लिए विरोध और प्रतिरोध करने वाली औरत ही दुनिया की सबसे हसीन औरत है। प्रेमचन्द्र ने दुनिया का सबसे अनमोल रत्न ‘खून के उस आखिरी कतरे को माना था जो देश की हिफाजत के लिए गिरता है संजीव के लिए प्रतिरोध और संघर्ष करने वाली औरत ही दुनिया की सबसे हसीन औरत है।

कहानी में शिक्षित टी.टी. साहिबा, पुलिस के जवान और बिना टिकट यात्रा करने वाली दो शरीफ जादिया एक मेहनती और टिकट के साथ गाड़ी में बैठकर सब्जी बेचने वाली औरॉंव आदिवासी महिला पर अत्याचार करते हैं तो वह रोने लग जाती है। तब कथानायक महमूद उनको दुत्कारते हुए बताता है कि इस ओरॉव आदिवासी महिला के मुखडे पर तीन गोदने हैं वे आदिवासियों के संघर्षपूर्ण इतिहास के प्रतीक है। ‘‘तुम्हें मालूम है, ओरॉव औरते अपने मुखड़े पर तीन गोदने गुदवाती है। रानी सिनगी दई ने महज औरतों की फौज लेकर हमलावरों (मुगलों को) को मुॅंह की खिलाई थी। सरहुल का पर्व था मर्द सारे के सारे हंडिया पीकर मुर्दा बन हुए थे। यह एक तरह से आजाद जातियों पर साम्राज्यवादियों का हमला था, जिसे उन मर्दानी औरतों ने नाकाम कर दिया था एक बार, दो बार नहीं तीन-तीन बार। इसी की याद में बारह वर्ष में ओरॉव औरतों का पर्व मनाया जाता है ‘जनी शिकार’।13

तीन बार मुगलों को हराने के बाद मुगलों ने चौथा हमला किया। इस हमले में गद्दार सुन्दरी के चलते रानी व उसकी बहादुर लड़ाकू औरते पकड़ी गयी, जिनसे मुगलों ने तीन हार का बदला तीन बार चेहरे को दाग कर लिया। ‘‘उन दागों को कलंक न मानकर सभी ओरॉव औरतों द्वारा सिंगार के रूप में अपना लिया।’’14 आदिवासी युवतियों के चेहरों पर ये तीन गोदनों का सम्बन्ध इसी परम्परा और इतिहास से है। संजीव इस कहानी के माध्यम से कहते हैं कि जुल्म और अन्याय के खिलाफ लड़ना सबसे बड़ी बहादुरी है। फल चाहे जो निकले जीत या हार। ‘‘जुल्म की मुखलाफत ही बहादुरी है और जरूरी नहीं कि बहादुरी महज जीत का ही वाइस बने उसकी हार भी सिंगार है। यही बताते हैं ये गोदने।’’15 यहॉं पर संजीव ने उसी प्रकार प्रचलित, पारम्परिक सौन्दर्य (रूप-रंग, नैन-नक्श, उम्र) का अर्थ बदल दिया जिस प्रकार प्रेमचन्द ‘अनमोल रत्न’ का अर्थ बदल दिया था। यहॉं जुल्म का विरोध वर्तमान में नहीं है वह अतीत में है इस नए अर्थ के द्वारा परम्परा को जीवित रखा जा रहा है और संघर्ष तथा सौन्दर्य के सह-संबंध को नए रूप में ढाला गया है। यह संजीव की नयी सौन्दर्य दृष्टि है। प्रगतिशील लेखक संघर्ष के मंच से प्रेमचन्द ने कहा था ‘‘हमें सुन्दरता की कसौटी बदलनी होगी और संजीव ने वह कसौटी बदल दी है। यह संजीव की आदिवासी संवेदना की मजबूती भी है तो आदिवासी संघर्ष को जिलाए रखने की आशा भी। वे आदिवासियों के भीतर लगातार दरक रहे टूट रहे उनके मन को भी जानते हैं और संघर्ष करने की परम्परा की दुर्द्वर्ष जिजीविषा को भी।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि संजीव के कथा साहित्य में आदिवासी समाज के संघर्षशील इतिहास को दिखाया है तो उससे प्रेरणा ग्रहण करने की आवश्यकता को भी। आज के निजीकरण, बाजारीकरण के दौर में तो आदिवासी समाज ने अपनी पहचान, अस्तित्व और नस्ल को बचाए रखने के लिए संघर्ष और आन्दोलन की सबसे अधिक आवश्यकता है संजीव ने भी अपने कथा साहित्य में संघर्ष की आवश्यकता को अनिवार्य रूप से महसूस किया है।

सन्दर्भ:
1 रूपचन्द्र वर्मा, भारतीय जनजातियॉं, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली, पृ.सं. 70
2 संजीव, संजीव की कथा यात्रा: पहला पड़ाव, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.10
3 संजीव, सावधान! नीचे आग है, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 202-203
4 संजीव, धार, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 98
5 संजीव पॉंव तले की दूब, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, पृ.सं. 15
6 संजीव, संजीव की कथा यात्रा: पहला पड़ाव, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 344
7 वही, पृ.सं. 344
8 वही, पृ.सं. 345-346
9 वही, पृ.सं. 88
10 वही, पृ.सं. 308-309
11 वही, पृ.सं. 301
12 डॉ. रविभूषण, स्वतंत्र भारत की वास्तविक कथा: संजीव की कहानियॉं (लेख) कथाकार संजीव, पृ.सं. 188
13 संजीव, संजीव की कथा यात्रा: दूसरा पड़ाव, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.सं. 41
14 डॉ. भीमराव पाटिल, ‘प्रेतमुक्ति’,: महाकाव्यात्मक धरातल की लम्बी कहानियॉं (लेख) कथाकार संजीव, पृ.सं. 223
15 संजीव, संजीव की कथा यात्रा: दूसरा पड़ाव, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.सं. 41

ज्योति कुमारी मीणा,
हिन्दी विभाग वनस्थली विद्यापीठ, 
वनस्थली,राजस्थान meenajyoti15@gmail.com
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