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पुस्तक समीक्षा:भूमंडलीकरण के दौर में ‘गायब होता देश’ –भानु प्रताप प्रजापति

Written By अपनी माटी,चित्तौड़गढ़ on बुधवार, नवंबर 16, 2016 | बुधवार, नवंबर 16, 2016

    चित्तौड़गढ़ से प्रकाशित ई-पत्रिका
  वर्ष-2,अंक-23,नवम्बर,2016
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पुस्तक समीक्षा:भूमंडलीकरण के दौर में ‘गायब होता देश’ –भानु प्रताप प्रजापति
सन्दर्भ:- गायब होता देश (उपन्यास):रणेंद्र

                 
भूमंडलीकरण के इस दौर में आज जहाँ प्रत्येक मनुष्य एक तरफ अपने भौतिक जीवन को सुख सुविधा संपन्न बनाने के लिए अपना तीव्र गति से विकास चाह रहा है/ और कर भी रहा है। वहीं दूसरी तरफ वह अपनी बहुत सी चीज़ों को खोता भी जा रहा है। आज भूमंडलीकरण के इस दौर में तीव्र विकास ही सभी के लिए एकमात्र लक्ष्य हो गया है। तीव्र विकास की इस अंधाधुंध दौड़ में व्यक्ति अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक, शुभ-अशुभ, आदि बातों का ध्यान ही नहीं रख रहा है और बहुत से ऐसे कार्य करता जा रहा है जिसे उसको नहीं करना चाहिए। आज का मनुष्य विकास के नाम पर अपने आप को इस तरह बदलता चला जा रहा है कि उसकी अपनी वास्तविक पहचान ही खोती जा रही है। अर्थात उसके अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक एवं मानवीय मूल्य भी एक प्रकार से गायब होते जा रहे हैं। यह भौतिक समृद्धि भूमंडलीकरण की ही उपज है। वस्तुतः भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण आज के युग की बहुआयामी, विशिष्ट तथा नई परिघटना है, जिसने पिछले कुछ वर्षों से पूरी दुनिया तथा दुनिया के समस्त लोगों के जन-जीवन को प्रभावित किया है। यह एक ऐसा बहुआयामी विषय है जिसके अंतर्गत आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक सभी पक्ष आ जाते हैं। मानवाधिकार हो, पर्यावरण, लिंग न्याय या जनतंत्र, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद की चुनौती हो या टेक्नोलाजी का अभूतपूर्व प्रसार सभी बुनियादी तौर पर भूमंडलीकरण से जुड़ जाते हैं।  अर्थात भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि सभी पक्ष प्रभावित हुए हैं और हो रहे हैं। लेकिन इस बहुआयामी तथा विशिष्ट परिघटना का प्रभाव सभी के लिए एक समान नहीं है। अतः इसके कुछ साम्य पक्ष हैं तो कुछ वैषम्य पक्ष भी हैं। जहां पर कुछ लोगो के लिए यह विकास की एक जादुई छड़ी साबित हुआ है तो वहीं पर ज़्यादातर लोगों के लिए यह एक प्रकार की आकस्मिक आँधी या तूफ़ान ही साबित हुआ है, जिसने उन्हे उखाड़ कर फेंक दिया है। कुल मिलाकर यदि देखा जाये तो समाज के कई तबके ऐसे हैं जिनको सिर्फ इसका वैषम्य पक्ष ही ज्यादा प्रभावित किया है जैसे: आदिवासी समाज तथा दलित समाज आदि। भारत में दसवें दशक के आरंभ में उदारीकरण की नीति (1991) के साथ ही भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण, नवनिवेशीकरण, नवसाम्राज्यवाद आदि का उदय होता है। ऐसे में भारत दुनिया के सभी देशों के लिए मुक्त बाज़ारका द्वार खोल देता है। जिस कारण निजीकरण को प्रोत्साहन दिया जाने लगा और इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में कई विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां स्थापित होने लगीं। आज तो भारत दुनिया के सभी देशों के लिए उभरता हुआ बड़ा बाज़ार साबित हो रहा है। यह उदारीकरणऔर निजीकरण’ ‘वैश्वीकरणके ही कारण आये हैं। इन्होने राष्ट्र-राज्यों की भूमिका को कमजोर बना दिया है।  मुक्त बाज़ारकी इस अर्थव्यवस्था में निजीकरणऔर रियल स्टेटको बढ़ावा मिला। नतीज़ा यह हुआ कि पहले के मुक़ाबले अब प्राकृतिक संसाधनों (जल, जंगल, और जमीन) का दोहन तीव्र गति से बढ़ने लगा है। और इस प्रक्रिया में सबसे अधिक यदि कोई प्रभावित हुआ है या हो रहा है तो, वह है आदिवासी समाज।

                रणेन्द्र का उपन्यास गायब होता देशआदिवासी समाज की इन्हीं समस्याओं, संकट की स्थिति, उनकी कला एवं संस्कृति, आदि को केंद्र में रखकर लिखा गया है। गायब होता देश’ (पेंगुईन बुक्स, 2014) से प्रकाशित इनका दूसरा उपन्यास है। हालांकि रणेंद्र अपने पहले उपन्यास ग्लोबल गांव के देवतामें भी असुरजनजाति यानी कि एक आदिवासी समाज की ही समस्या को उठाये थे। वहीं अपने दूसरे उपन्यास गायब होता देशमें भी आदिवासी समाज की मुंडाजनजाति को केंद्र में रख कर उनकी वास्तविकताओं से समाज को अवगत कराने का सराहनीय प्रयास किया है। चूंकि रणेंद्र आदिवासी समुदाय के बीच काफी समय से रह रहें हैं। आदिवासी समाज की समस्याओं को देखा सुना और अनुभव किया है। तथा आदिवासी समाज की समस्याओं को आदिवासी समुदाय के बीच रहकर वहां के समाज और संस्कृति का सूक्ष्म अध्ययन भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में किया है। रणेन्द्र ने भूमंडलीकरण रूपी आंधी के विविध आयामों खासकर आर्थिक आयाम को लिया है और इस आर्थिक आयाम का क्या कुप्रभाव आदिवासी समाज एवं संस्कृति पर पड़ रहा है इसे सही-सही पहचानने का प्रयास किया है। इसलिए भूमंडलीकरण के दौर में गायब होता देशको विश्लेषित करना उपयुक्त हो जाता है। गायब होता देशउपन्यास की अंतर्वस्तु के विषय में स्वयं लेखक रणेन्द्र का कथन है कि “…‘गायब होता देशकी विषयवस्तु आदिवासी मुंडा समुदाय के असह्य शोषण, लूट, पीड़ा, विक्षोभ पर ही केंद्रित है।....आजादी के बाद विकसित देशों के कथित विकास मॉडल ने विस्थापन के वज्र से जो आघात आरंभ किया उसकी चोट ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थायी बंदोबस्ती, जमींदारी प्रथा से भी ज्यादा गहरी और मारक थी। 1991 ई. के बाद उपभोक्तावादी पूंजीवाद को ज्यादा खनिज, ज्यादा जंगल, ज्यादा जमीन चाहिए। कल तक बाहुबली बिल्डर दबंगई के बल पर अपना पेशा चला रहे थे। नई आर्थिक नीति और 2008 की महामंदी ने रियल एस्टेट को सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाले सेक्टर में बदल दिया है। वही रंगदार-बिल्डर अब प्रतिष्ठित कॉरपोरेट हैं। जमीन की लूट की गति हमारे अनुमान से भी ज्यादा तेज है। स्वाभाविक है कि झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि राज्यों में इस सेक्टर का सबसे बड़ा शिकार आदिवासी समुदाय है।....यही जलते प्रश्न नए उपन्यास की अंतर्वस्तु हैं।  प्रसिद्ध आलोचक प्रणय कृष्ण श्रीवास्तव उपन्यास के रचाव के समय और भारत में भूमंडलीकरण के समय को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि-गायब होता देश के रचनाकार रणेंद्र की उपन्यास-यात्रा का समय वही है जिसे सामान्य रूप से भारत के भूमंडलीकरण का समय कहा जाता है। यह उनके उपन्यासों के रचे जाने का भी समय है और उनके उपन्यासों के भीतर बहता समय भी।....यह उपन्यास बहुत जतन से हमारे युग की भूमंडलीय लूट के केंद्रीय अंतर्विरोध और संघर्ष के खंडित समाजशास्त्रीय, मानवशास्त्रीय (ऐन्थ्रोपोलोजिकल) प्रशासनिक या निकट वैचारिक भाष्य का अतिक्रमण करके ही उपन्यास बनता है। वे आगे लिखते हैं कि भारत के भूमंडलीकरण के समय को उसकी तमाम जटिलताओं में समग्रतः में उपस्थित करता रणेंद्र का 'गायब होता देश' शीर्षक उपन्यास लिखा तो काफी पहले से जा रहा होगा, लेकिन उसके प्रकाशित होने का समय इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता था। अभी-अभी तो भारत के आम चुनाव गुज़रे हैं जिसमें पूंजी के जादूगरों ने 'विकास' की ऐसी रेशमी चादर तानी जिसने मतदाताओं की नज़रें बाँध लीं। देखते-देखते 'विकास' की यह जादुई चादर एक लबादे में बदल गई जिसे सिर्फ एक आदमी ने पहन लिया। पूंजी के सभी जादूगर एक ही काया में समा गए। इस 'विकास' के तिलिस्म को तोड़ता, कारपोरेट जादूगरी को औपन्यासिक जादू से काटता यह उपन्यास हमारे समय की ज़रुरत है। पूंजी-प्रतिष्ठान ने देश, समय और समाज का जैसा आख्यान रचा है, 'गायब होता देश' उपन्यास उसका प्रति-आख्यान है, मूल्य, विचार, ज्ञानशास्त्र, अनुभव व भाव संपदा, संस्कृति और राजनीति हर स्तर पर।  लगभग इसी से मिलता-जुलता मत युवा आलोचक अनुज लुगुन का भी है - झारखंड के मुंडा आदिवासियों को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास (गायब होता देश) सम्पूर्ण आदिवासी समाज के संकट की ओर ध्यान खींचता है। पूंजीवादी विकास की दौड़ में शामिल लोग किस तरह घास की तरह एक मानव समुदाय को चरते जा रहे हैं, ‘गायब होता देशइसी की मार्मिक कहानी है।  दोनों आलोचक अपने-अपने कथनों में पूँजी के वर्चस्व तथा उसके कुचक्र को रेखांकित किये हैं। यानि की सब खेल पूँजीवाद और पूंजीवादी ताकतों का है। अतः एक प्रकार से यह कहने में तनिक भी संदेह नहीं कि आज का भूमंडलीकरण पूंजीवाद का ही नव-विकसित या नव्य रूप है। पूंजीवाद के इस नव-विकसित रूप अर्थात भूमंडलीकरण से उभरे संकट और समस्याओं की तरफ भी दोनों आलोचकों ने इशारा किया है।

                रणेंद्र ने यह उपन्यास बाबा रामदयाल मुंडा की स्मृति एवं दीदी दयामनी बारला और इरोम शर्मिला चानू के संघर्ष के जज्बे को समर्पित किया है। इसमें मुंडा आदिवासी समाज के संकट, शोषण, लूट, पीड़ा और प्रवंचना का इतिवृत्त है- किस तरह सोना लेकन दिसुम’ (सोना जैसा देश) विकास के नाम पर रियल एस्टेट द्वारा ग्लोबल भूमंडलीकृत पतन का शिकार है। (उपन्यास के प्राक्कथन से)। एक विडम्बना यह भी है कि इस शोषण और लूट में स्वयं आदिवासी तबके के उच्च पदों पर पहुंचे हुए लोग भी शामिल हैं। लेकिन वहीं दूसरी तरफ सोमेश्वर मुंडा, नीरज पाहन, अनुजा पाहन, सोनामनी दी ऐसे आदिवासी लोग भी हैं जो अपना सब कुछ त्याग कर इन शोषण करने वालों या यों कहें की पूंजीवादी ताकतों से संघर्ष करते रहते हैं। इन लोगों को इसमें छोटी-छोटी ही सही लेकिन सफलताएँ मिलती जरूर हैं। इनकी इसी सफलताओं तथा उपन्यास के शीर्षक के विषय में आलोचक डॉ. प्रणयकृष्ण श्रीवास्तव लिखते हैं कि- उपन्यास के शीर्षक और उसके आखिरी घटना-सत्य में एक ज़बरदस्त द्वंद्व है। शीर्षक में जो 'गायब होता देश' है, उपन्यास का अंत होते-होते, वही अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए लड़ता हुआ, बल्कि छोटी- छोटी ही सही, जीत हासिल करता हुआ देश है। संभव है कि आज उसका 'गायब होते जाना' प्रबलतर सच्चाई हो, लेकिन उसका लड़ते हुए आगे बढ़ना भी एक सच है जिसे संगठित होता जाना है। चूंकि यह उपन्यास मुंडाजनजाति पर केन्द्रित है इसलिए इस जनजाति के इतिहास को जानना समीचीन होगा। मुंडाजनजाति प्राचीनतम जनजातियों में से एक है, तथा विश्वास किया जाता है कि ये लोग कोल वंश के हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, त्रिपुरा तथा पश्चिम बंगाल राज्यों में इन्हे अनुसूचित जनजाति में विनिर्दिष्ट किया गया है। बिहार में ये मुख्य रूप से छोटा-नागपुर क्षेत्र में तथा रांची, सिंघभूम, गुमला व लोहारडागा जिलों मे पाये जाते हैं। उड़ीसा में ये सुंदरगढ़ और संबलपुर तथा पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी, मिदनापुर, पश्चिम दिनाजपुर और 24-परगना जिलों में पाये जाते हैं। इनकी मुख्य भाषा मुंडारी है। मुंडारी भाषा में मुंडा शब्द का अर्थ प्रतिष्ठा और धन से संपन्न व्यक्तिहोता है। ये अपने-अपने राज्यों में हिंदी, उड़िया, और बंगला भी बोलते हैं।....मुंडा लोग मुख्य रूप से कृषक वर्ग के हैं। सिंगबोंगाइनके महान देवता हैं। गरम-धरम’, ‘माघे-परब’, तथा सरहुलइनके प्रमुख त्यौहार हैं।  इसी मुंडाआदिवासी जनजाति को केंद में रखकर लिखा गया यह उपन्यास (गायब होता देश) इक्यावन छोटे-छोटे अध्यायों (कुल मिलाकर 318 पृष्ठों) में विभाजित है। प्रथम अध्याय का शीर्षक है गुमशुदगी या ब्लैकहोल की यात्रा। और अंतिम अध्याय कौन जिता है तेरी ज़ुल्फ के सर होने तकहै। उपन्यास की शुरुआत कुछ इस तरह से होती है किशन विद्रोही की हत्या की गई ! लेकिन न तो कोई चैनल न कोई अखबार पूरी गारंटी के साथ यह कहने को तैयार था की हत्या ही हुई है। लाश मिली नहीं थी। ख़ून में सना तीर और बिस्तर में जज़्ब ख़ून के गहरे धब्बे यह बताने की कोशिश कर रहे थे की हत्या ही हुई होगी।  यह गुमशुदगी किसी और की नहीं बल्कि किशनपुर एक्सप्रेसके पत्रकार किशन विद्रोही’ (कृष्ण कुमार झा) की है, उपन्यास की कथा की शुरुआत हत्या की इस गुत्थी को सुलझाने और उसकी खोजबीन से शुरू होती है। यह उपन्यास शिल्प की दृष्टि से एक डायरीनुमा उपन्यास बन गया है। यह डायरी उपन्यास के ही पात्र किशन विद्रोही की है। डायरी से ही संकेत सूत्र मिलने लगते हैं लेकिन बावजूद इसके इस (पत्रकार किशन विद्रोही की हत्या) हत्या की गुत्थी उपन्यास के अंत तक अनसुलझी ही रह जाती है। लेकिन इस हत्या की गुत्थी सुलझाने की प्रक्रिया में ही उपन्यास में चित्रित सारी घटनाएँ और प्रसंग एक-एक करके कथा के रूप में पाठकों के समक्ष आते रहते हैं और उपन्यास की कड़ी साबित होते हैं। इस प्रकार से  इन्ही छोटे-बड़े प्रसंगों से इस महाकाव्यात्मक उपन्यास का फ़लक भी विस्तृत होता है। गायब होता देशउपन्यास के इसी विस्तृत और व्यापक कलेवर पर मैत्रेयी पुष्पा की यह टिप्पणी बहुत ही महत्वपूर्ण लगती है-यह उपन्यास बड़े फलक का आख्यान समेटे हुए अपनी लोक संस्कृति के अद्भुत दर्शन कराता है- गीत, नृत्य के साथ सुस्वादु भोजन की ऐसी तस्वीरें पेश करता है कि बरबस ही उस क्षेत्र में उतर जाने का जी चाहता है

                रणेन्द्र ने इस उपन्यास में आदिवासी जीवन-समाज का यथार्थ चित्रित किया है। इसमें वह इस प्रकार से सारी विशेषताओं को पाठकों के समक्ष रखे हुए हैं कि वाकई सच में हर कोई इस क्षेत्र में रहना पसंद करेगा। सच में इस तरह था पहले मुंडाओं का अपना देश सोना लेकन दिसुम’ (सोना जैसा देश)। सोने के कणों से जगमगाती स्वर्णकिरण-स्वर्णरेखा, हीरों की कौंध से चोंधियाती शंख नदी, सफ़ेद हांथी श्यामचंद्र और सबसे बढ़कर हरे सोने, शाल-सखुआ के वन। यही था मुंडाओं का सोना लेकन दिसुम। मुंडाओं को कोकराह ऐसा ही लगा था। इसी कोकराह में विल्किंसन साहब द्वारा बसाया गया शहर किशनपुर था। कितना सुंदर था उनका अपना सोना लेकन दिसुम। यहाँ पर उपन्यासकार व्यंग्य करते हुए लिखता है कि लेकिन इंसान थोड़ा ज्यादा समझदार हो गया। उसने सिंगबोंगा की व्यवस्था में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। उसने लोहे के घोड़े दौड़ाने के लिए शाल वन की लाशें गिरानी शुरू कर दीं।....उसने बन्दरगाह बनाने, रेल की पटरियाँ बिछाने, फर्नीचर बनाने, मकान बनाने के लिए अंधाधुंध कटाई शुरू की। मरांग बुरु-बोंगा की छाती की हर अमूल्य निधि, धातु-अयस्क उसे आज ही, अभी ही चाहिए था।....इन्ही जरूरत से ज़्यादा समझदार इंसानों की अंधाधुंध उड़ान के उठे गुबार-बवंडर में सोना लेकन दिसुम गायब होता जा रहा था। सरना-वनस्पति जगत गायब हुआ, मरांग-बुरू बोंगा, पहाड़ देवता गायब हुए, गीत गाने वाली, धीमे बहने वाली, सोने की चमक बिखेरनेवाली, हीरों से भरी सारी नदियां जिनमें इकिर बोंगा-जल देवता का वास था, गायब हो गई। मुंडाओं के बेटे-बेटियाँ भी गायब होने शुरू हो गए। सोना लेकन दिसुम गायब होते देश में तब्दील हो गया

                 इस तरह एक प्रकार से गायब होता देशएक रूपक है। उपन्यासकार ने इसमें यह बतलाने का प्रयास किया है कि किस तरह विकास के नाम पर आज आदिवासी (मुंडा) समाज की सभ्यता एवं संस्कृति के साथ-साथ उनका अपना आशियाना भी उजाड़ा जा रहा है। जल, जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनो का तीव्र-गति से दोहन हो रहा है। कभी बांध बनाकर तो कभी बांध को तोड़कर। भूमंडलीकरण से उपजा यह निजीकरण व रियल एस्टेट सुरसा की तरह इस तरह मुँह बाए हुये हैं कि कितनी जल्दी कितना ज्यादा से ज्यादा इनका दोहन कर लिया जाए। आज यही हो रहा है विस्थापन के नाम पर कम से कम कीमतों में आदिवासियों की ज़मीन हथिया लेना और उन्हें हमेशा के लिए मुसीबतों और ढेर सारी समस्याओं की खांई में धकेल देना। उपन्यासकार रणेन्द्र ने गायब होता देशउपन्यास में इन सभी मुद्दों व समस्याओं पर बहुत गंभीर होकर इनका सूक्ष्म चित्रण किया है। इस उपन्यास में मीडिया का दोहरा चरित्र तथा सरकार और सरकारी तंत्र की कूटनीतियाँ भी उजागर हुई हैं। रणेन्द्र ने इस उपन्यास के माध्यम से एक संदेश यह भी दिया है कि सिर्फ कोकराह ही नहीं बल्कि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से अपना देश भी धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। गायब होता देशशीर्षक रणेन्द्र ने शायद इसी कारण रखा है। इससे सीख लेना जरूरी है, नहीं तो एक दिन कोकराह की तरह अपना देश भी गायब होते देश में तब्दील हो जाएगा। हमें जरूरत है भूमंडलीकरण के सही-सही रूपों को पहचानने और उसे स्वीकारने की। तभी उचित न्याय हो सकता है। उपन्यास के विषय में आलोचक डॉ. प्रणयकृष्ण श्रीवास्तव का कथन है कि २१वीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में संजीव का 'रह गयीं दिशाएं इसी पार' के बाद 'गायब होता देश' ही उत्तर-पूंजी के इस युग में कार्पोरेट मुनाफे के तंत्र द्वारा विज्ञान के सर्वातिशायी अपराधीकरण की परिघटना को सामने लाता है। 

गायब होता देश (उपन्यास),रणेंद्र,पेंगुईन बुक्स (2014)
प्रथम-संस्करण,दिल्ली,पृष्ठ ख्या-318,मूल्य:250 
                                                                                  भानु प्रताप प्रजापति
          शोधार्थी, हिंदी विभाग,               
 हैदराबाद विश्वविद्यालय हैदराबाद 
          सम्पर्क:9441376914,bppraja@gmail.com
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