शोध आलेख:तुलसीदास के काव्य में समन्वय भावना / पिंकल मीणा - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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शोध आलेख:तुलसीदास के काव्य में समन्वय भावना / पिंकल मीणा

                        तुलसीदास के काव्य में समन्वय भावना

हिन्दी साहित्य के स्वर्णयुग के एक महान भक्त, प्रबुद्ध कवि एवं तत्व दृष्टा दार्शनिक महाकवि तुलसीदास ने अपने साहित्य के माध्यम से समन्वय की जो विराट साधना की है वो आज तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किए हुए है। इसका कारण एक ओर उनकी सुन्दर काव्यशक्ति है तो दूसरी ओर उनके काव्य का धार्मिक स्वरूप भी है। इनका काव्य एक कवि की प्रेरणा ही नहीं बल्कि एक गहरे अध्ययन व चिंतन का वह जागरूक स्वरूप है जिसे कवि ने सोच-समझकर प्रस्तुत किया है और इसीलिए इनका समन्वय प्रयास इनकी लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण बन गया जिसका समर्थन आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने करते हुए कहा है कि तुलसीदास के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।

 तुलसीदास का व्यक्तित्व ही अनेक विरोधाभासों का समुच्च्य रहा है। आर्थिक विपन्नता के कारण इन्हें दर-दर भटकना पडा तो लक्ष्मी ने इनकी चरण वन्दना भी की। समाज ने इनको अपमानित भी किया और सर्वोच्च सम्मान भी दिया। ये रति-रंग में आकंठ मग्न भी हुए और परम वियोगी संत भी। कहने का तात्पर्य यह है कि ये सच्चे अर्थों में संत थे। ऐसे संत जिसने भौतिक वैभव की क्षणभंगुरता को पहचान लिया हो तथा आत्म-साक्षत्कार के उस सोपान पर पहुँच गया हो जहाँ मोहाकर्षण निरर्थक  हो जाते हैं। इनकी दृष्टि में साम्प्रदायिक या भाषागत विवाद महत्वहीन अथवा पाखंडी मस्तिष्क की उपज थे और इसीलिए उन्होंने सदैव समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया।

समन्वयशब्द के सन्दर्भानुसार कई अर्थ हैं। व्यापक रूप में इसका अर्थ पारस्परिक संबंधों के निर्वाह से लगाया जाता है लेकिन इसका एक विशिष्ट अर्थ में भी प्रयोग होता है और वह है- विरोधी प्रतीत होने वाली वस्तुओं, बातों या विचारांे के विरोध को दूर करके उनमें सामंजस्य बिठाना।तुलसी ने जिस समय साहित्य में प्रवेश किया उस समय के समाज, धर्म, राजनीति, भक्ति, साहित्य तथा लोगों के जीवन में अनेक  परिस्थितियाँ परस्पर एक दूसरे के विरोध में खडे होकर जनमानस के जीवन को कठिन बना रही थीं। धर्म के क्षेत्र में शैव, वैष्णव व शाक्तों के रूप में विभिन्न सम्प्रदाय दिन-प्रतिदिन कट्टरता की ओर बढ रहे थे। सगुणोपासक जहाँ निर्गुण मार्ग को नीरस बताकर उसकी निन्दा कर रहे थे तो निर्गुणपंथी भी सगुण भक्ति का विरोध कर रहे थे। जनता ज्ञान, कर्म और भक्ति के बीच चुनाव को लेकर असमंजस में थी। सभी वैष्णव आचार्य शंकर के निर्गुण ब्रह्मवाद और माया के विरोधी थे तो सभी अद्वैतवादी मध्वाचार्य के द्वैतवाद के विपक्षी हो गए थे। राजा और प्रजा, वेदशास्त्र और व्यवहार के बीच का फासला निरन्तर बढता जा रहा था। पारिवारिक संबंधों में और वर्णाश्रमधर्म में वैषम्य फैल रहा था। ऐसे समय में सभी साहित्यिक विद्वान अपने अपने स्तर पर इन परिस्थितियों से जूझने का प्रयास कर रहे थे। जायसी ने फारसी मसनबी शैली में भारतीय प्रेम व लोक कथाओं को पिरोकर प्रेम का संदेश दिया तो कबीर ने भी हिन्दु-मुसलमान, उच्च-निम्न, अमीर-गरीब आदि भेदों का विरोध कर समाज में सामंजस्य बिठाने का प्रयास किया। परन्तु इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण व सराहनीय कार्य यदि किसी ने किया है तो वह गोस्वामी तुलसीदास ने। इन्होंने इन सभी विरोधों को बहुत अंशों में दूर कर अपनी समन्वयवादी दृष्टि का परिचय दिया और अपना एक निश्चित दार्शनिक मत स्थापित किया जो मुख्यतः रामचरितमानस और विनयपत्रिका में दृष्टिगत होता है। इसीलिए आचार्य द्विवेदी ने उनको बुद्ध के बाद सबसे बडा लोकनायक सिद्ध करते हुए कहा है- ‘‘लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।‐‐‐‐तुलसीदास महात्मा बुद्ध के बाद भारत के सबसे बडे लोकनायक थे।’’1

भक्तिकाल में ब्रह्म के सगुण व निर्गुण स्वरूप को लेकर जो विवाद चला उसपर भारतीय दर्शन में बहुत गम्भीर चिन्तन-मनन हुआ है। शंकराचार्य के अनुसार तत्व केवल एक है-ब्रह्म। ये ब्रह्म को स्वरूपतः निर्गुण व निराकार मानते हैं जबकि वल्लभाचार्य ने सगुण ब्रह्म को पारमार्थिक सत्य माना है लेकिन तुलसीदास के अनुसार राम के दोनों रूप- निर्गुण और सगुण परमार्थतः सत्य हैं-

‘‘अगुन सगुन दुई ब्रह्म सरूपा।
अकथ अगाथ अनादि अनूपा।।’’2

तुलसीदास के अनुसार निर्गुण और सगुण में कोई तात्विक भेद नहीं है, केवल वेश का अन्तर है। दोनों स्वरूपों की अभेदता को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने दृष्टान्त भी दिया है-

‘‘एक दारूगत देखिए एकू।
पावक जुग सम ब्रह्म विवेकू।।’’3

अर्थात् अग्नि के दो रूप हैं, एक अव्यक्त और एक व्यक्त। इसका दारूगत अव्यक्त रूप ही व्यक्त होने पर दृश्यमान हो जाता है। उसी प्रकार ईश्वर का भी जो निर्गुण व निराकार रूप है, जो दृष्टव्य नहीं है, वही प्रकट होने पर सगुण व साकार रूप में दिखाई देने लगता है-

‘‘अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।’’4

और तुलसी के राम उसी निर्गुण ईश्वर का सगुण साकार व अवतरित रूप हैं। हालांकि तुलसीदास के संबंध में यह कहना भी गलत न होगा कि उन्होंने निर्गुण की अपेक्षा सगुण की उपासना को ही अधिक श्रेयस्कर माना है क्योंकि इनके मतानुसार निर्गुणोपासना केवल योगियों और ज्ञानियों तक  ही सीमित है जबकि सगुणोपासना के अधिकारी सभी मनुष्य हैं। वह सुरसरि के समान सबका हित करने वाली है। लेकिन साथ ही जिस प्रकार इन्होंने अपने राम को एक ही साथ निर्गुण और सगुण, निराकार और साकार, अव्यक्त और व्यक्त, अंर्तयामी और बर्हियामी, गुणातीत और गुणाश्रय दिखाकर जो समन्वय भक्ति के क्षेत्र में दिखाया है वह अद्भुत है।

सगुण और निर्गुण का यह विवाद भक्ति के अतिरिक्त दार्शनिक क्षेत्र में भी था। तुलसी से पूर्व सभी विद्वान शंकराचार्य के अद्वैतवाद के विरोधी थे और इसीलिए सभी ने अलग-अलग विचारधाराओं की प्रतिष्ठा करते हुए अद्वैतवाद का खंडन किया। लेकिन तुलसी शंकर के ब्रह्मवाद और रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद दोनों से ही प्रभावित थे और यही नहीं इनके अलावा अन्य मतों से भी तुलसी ने विचार ग्रहण किए हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि उपनिषदों और वेद सम्प्रदायों में जो मान्यताएं समान रूप से पाई जाती हैं वे तुलसी को स्वीकार्य हंै परन्तु जहाँ अद्वैतवादियों और वैष्णव-वेदान्तियों में मतभेद है वहाँ उन्होंने समन्वयवादी दृष्टि से काम लिया है। उन्होंने विनयपत्रिकामें अद्वैतवाद के अनुसार ही ब्रह्म को परम सत्य मानकर जगत को मिथ्या घोषित किया है और माया का स्वरूप भी अद्वैतवाद के अनुरूप ही ग्रहण किया है लेकिन साथ ही विशिष्टाद्वैतवाद के अनुयायी होने के कारण जीव को ईश्वर का अंश मानकर उसे ईश्वर की ही भांति चेतन व अविनाशी भी माना है-

‘‘ईश्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।’’5

दार्शनिक क्षेत्र में प्रचलित तत्कालीन विचारधाराओं के साथ-साथ धार्मिक वैमनस्य को मिटाने का प्रयास तुलसी ने किया है। उस समय हिन्दू-मुस्लिम समस्या तो थी ही, हिन्दुओं में भी वैष्णव-शैव-शाक्त व स्मार्त आदि अनेक सम्प्रदाय थे और इनके भी अनेक उप-सम्प्रदाय थे जिनमें प्रायः संघर्ष होता रहता था। तुलसीदास की समन्वयवादी दृष्टि ने इस विवाद को समाप्त करने के अनथक प्रयास किए। मुख्य द्वन्द्व शैवों और वैष्णवों में था इसलिए तुलसी ने इस ओर भी ध्यान दिया। आचार्य शुक्ल के शब्दों में कहें तो- ‘‘शैवों और वैष्णवों के बीच बढते हुए विद्वेष को उन्होंने अपनी सामंजस्य व्यवस्था द्वारा बहुत कुछ रोका जिसके कारण उत्तरी भारत में वैसी भयंकर रूप न धारण कर सकी जैसा उसने दक्षिण में किया।’’6

इसी के चलते तुलसी ने राम की कथा शिव-मुख से कहलवाई। यही नहीं उन्होंने शिव के मुख से राम की प्रशंसा भी करवाई है वहीं दूसरी और शिव के ही अंश रूप हनुमान के द्वारा राम की भक्ति तुलसी ने करवाई है तो राम के द्वारा भी जगह-जगह शिव की भक्ति व आराधना करवाई है और राम के मुख से भी कहलवाया है-

‘‘सिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहुं मोहि नहिं पावा।।’’7

इस प्रकार तुलसी ने राम और शिव का परस्पर आत्मीय संबंध अपने साहित्य में निरूपित किया है। यद्यपि तुलसी मूलतः राम भक्त हैं किन्तु उन्होंने कहीं भी राम को शिव से श्रेष्ठ सिद्ध करने की चेष्टा नहीं की है। दोनों को समान महत्त्व दिया है। लंका प्रयाण के समय सागर पर सेतु-बंधन के पश्चात् शिव की आराधना व शिवलिंग की स्थापना, ‘रामचरितमानसमें राम कथा से पूर्व शिव-कथा, ‘पार्वती-मंगलकी स्वतंत्र रचना और विनयपत्रिकामें 12 पदों में शिव की वंदना आदि इनके इसी प्रयास का हिस्सा है।

अपने इस समन्वय के प्रयास में तुलसी ने ज्ञान व भक्ति के अन्तर को भी पाटने का प्रयास किया है। वैष्णव आचार्य भक्ति को श्रेष्ठ मानकर चल रहे थे जबकि सांख्य योग में ज्ञान की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई है। अतः तुलसी ने दोनों का समन्वय करते हुए विरति-विवेक संयुक्त भक्ति और ज्ञानी भक्त को श्रेष्ठ बतलाया है-

‘‘श्रुति सम्मत हरि भगति पंथ संजुत विरति विवेक।’’8

यद्यपि तुलसी ने ज्ञान मार्ग को तलवार की धार के समान तीक्ष्ण और दुरूह भी बताया है लेकिन साथ ही वे यह भी कहते हैं कि साध्य की दृष्टि से ज्ञान भक्ति में कोई अन्तर नहीं है-

‘‘भगतिहिं ग्यानहिं नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव सम्भव खेदा।।’’9

इसलिए वे केवल भक्ति या कोरे ज्ञान की अपेक्षा भक्ति समन्वित ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं।
इस सबके अतिरिक्त तुलसीकालीन शासन व्यवस्था भी कई प्रकार के अन्तर्विरोधों से ग्रस्त हो चुकी थी। मुगल शासकों का असली उद्देश्य प्रजा-पालन और प्रजा-रंजन न होकर अपने साम्राज्य की स्थापना, निजी योग क्षेम और भोग विलास ही था और इसके लिए जनता की मेहनत की कमाई खर्च की जा रही थी इसलिए प्रजा भी असंतुष्ट होकर अपने मन मुताबिक रास्ते पर चलने के लिए बाध्य थी। अर्थात् राजा और प्रजा के बीच की दूरी निरन्तर बढती जा रही थी जो कि समाज के लिए बहुत खेदजनक बात थी। तुलसी ने रामचरितमानसके उत्तर कांड में कलियुग वर्णन के माध्यम से इसी स्थिति का चित्रण किया है और मात्र चित्रण ही नहीं किया है बल्कि इस स्थिति को सुधारने का, इनके फासले को कम करने का प्रयास भी किया है। रामराज्यके रूप में एक आदर्श शासन व्यवस्था की स्थापना अपने साहित्य के माध्यम से करते हुए तुलसी बताते हैं कि किसी भी देश और समाज की सुख-समृद्धि के लिए शासक व जनता का समन्वित प्रयास अपेक्षित है। उनके अनुसार एक शासक या कहें कि अच्छे शासक को मुख की भांति होना चाहिए जो समस्त शरीर रूपी प्रजा का पालन-पोषण भली प्रकार से करे-

मुखिया मुख सो चाहिए खान पान कौ एक।
पालई पोषई सकल अंग तुलसी सहित विवेक।।’’10

साथ ही वे यह भी कहते हैं कि सिर्फ एकतरफा प्रयास ही इस सामंजस्य के लिए पर्याप्त नहीं है, प्रजा को भी अपना पूरा सहयोग देना चाहिए और इसीलिए उन्होंने एक अच्छे सेवक के कत्र्तव्य निर्धारित करते हुए उन्होंने कहा है-

‘‘सेवक कर पद नयन से, मुख सो साहिबु होय।’’11

और इस प्रकार दोनों की सामंजस्यपूर्ण भागीदारी से ही जीवन सुचारू रूप से चल सकता है। यह समन्वय और सहयोग केवल राजा-प्रजा के लिए ही नहीं बल्कि एक परिवार के लिए, उसके सदस्यों के लिए भी उतना ही आवश्यक है। और फिर पारिवारिक व नैतिक मूल्यों के पक्षधर मर्यादावादी तुलसी ने देखा कि समाज में पारिवारिक मान्यताएँ लगभग समाप्त होती जा रही हैं। पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई में जो स्नेह संबंध होना चाहिए वह भी लगभग समाप्ति की ओर है। पिता और पुत्र दोनों स्वार्थ प्रेरित हैं। पति-पत्नी के संबंधों में आत्मीयता का दिखावा अधिक हो गया है। पुत्र शादी होते ही पत्नी का साथ पाकर माता-पिता को बेसहारा छोड देता है। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन न होकर धनार्जन रह गया है। पुरूष परत्रिय लंपट कपट सयानेहो गए हैं और स्त्रियाँ गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारी पर पुरूष अभागी।।हो गई हैं। तुलसीदास ने अपने रामचरितमानसमें जिसे विद्वानों ने व्यवहार का दर्पणभी कहा है, जीवन मुल्यों की, नैतिक मूल्यों की व पारिवारिक मूल्यों की पुनः स्थापना का प्रयास किया है। पारिवारिक संबंधों का निर्वाह, सदस्यों का व्यवहार, एक-दूसरे के प्रति कत्र्तव्य, निष्ठा, त्याग आदि को ध्यान मे रखकर तुलसी ने राम, लक्ष्मण, भरत, सीता, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण आदि के माध्यम से जो उदात्त चरित्र व आदर्श जीवन मानस में प्रस्तुत किया है वह इनकी समन्वय साधना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। तुलसी के राम एक आदर्श राजा, आदर्श पुत्र, पति व मित्र के रूप में पाठक के सामने आते हैं तो भरत व लक्ष्मण आदर्श भाईयों का दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं जिनके बीच सिंहासन पाने के लिद संघर्ष न होकर त्याग है, एक दूसरे के लिए बलिदान की भावना है। हनुमान के द्वारा तुलसी आदर्श सेवक का चरित्र उपस्थित करते हैं तो सुग्रीव के द्वारा मित्रता का पाठ पाठक को सिखाते हैं। कहने का आशय यह है कि तुलसी ने अपने पात्रों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के पोषक जीवन मूल्यों को, उनके उदात्त स्वरूप को प्रस्तुत कर पारिवारिक स्तर पर समन्वय स्थापित करने की कोशिश की है जिसमें वे बहुत सफल भी हुए हैं।

तुलसी को साहित्य के क्षेत्र में भी काफी विरोधों का सामना करना पडा। उस समय भाषा के स्तर पर, काव्य रूप, शैली आदि कई स्तरों पर विविधता साहित्य में प्रवेश पा चुकी थी। भाषा की दृष्टि से काशी का वातावरण तुलसी के विरूद्ध था। पंडित लोग साहित्य के जनभाषा में लिखे जाने के विरूद्ध थे और तुलसी यह बात अच्छे से जानते थे कि जनभाषा को माध्यम बनाए बिना जनता का कल्याण संभव नहीं है इसलिए उन्होंने रामचरितमानसके लिए अवधी को चुना और उसमें संस्कृत पदावली का प्रयोग भी किया। लोकभाषा और शास्त्रभाषा के इस समन्वय के साथ-साथ तुलसी ने लोकभाषा के रूप में प्रतिष्ठित दोनों भाषाओं- ब्रज और अवधी का भी समानता से प्रयोग किया है। रामचरितमानस’, ‘बरवै रामायण’, ‘पार्वती-मंगल’ ‘जानकी-मंगलऔर रामललानहछुका माध्यम अवधी को बनाया है तो विनय-पत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘दोहावलीगीतावलीकी रचना ब्रजभाषा में की है। रूपविधान की दृष्टि से भी प्रचलित तीनों रूपों का प्रयोग तुलसी ने किया है। प्रबंध रूप में मानस’, निबंध रूप में रामललानहछु’, ‘पार्वती-मंगलजानकी-मंगलतथा मुक्तक रूप में कवितावली’ ‘गीतावली’, ‘दोहावली’ ‘विनयपत्रिकाआदि की रचना की है। शैलियों में भी तुलसी ने समन्वयवादी दृष्टि से काम लेते हुए सभी प्रचलित काव्य शैलियों में साहित्य सृजन किया है। दोहा-चैपाई शैली में रामचरितमानसवैराग्य-संदीपनी’, पद शैली में विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, दोहा शैली में दोहावली’, बरवै शैली में बरवै-रामायणऔर कवित्त-सवैया शैली में कवितावलीकी रचना तुलसी ने की है। इन्होंने प्रतिपाद्य विषय और प्रतिपादन शैली के सामंजस्य का निरन्तर ध्यान रखा है।

यद्यपि देखा जाए तो तुलसी दास वर्णाश्रम धर्म  के निष्ठावान समर्थक हैं और न केवल उन्होंने अपनी विभिन्न कृतियों में कलियुग का वर्णन करते  हुए उसके हृास पर खेद प्रकट किया है-

‘‘बरन धर्म नहिं आश्रम चारी।
श्रुति विरोध रत सब नर नारी।।’’12

बल्कि धर्म-निरूपण के प्रसंगों में उनके पालन पर भी बल दिया है। परन्तु उनका दृष्टिकोण संकुचित नहीं है। उनका लक्ष्य लोक कल्याण है और इसीलिए वे उच्चतम वर्ण ब्राह्मण और निम्नतम वर्ण शूद्र, दोनों को भक्ति का समान अधिकार दिया है फिर चाहे वह शबरी के बेर खानें का प्रसंग हो या केवट व निषाद के साथ राम, भरत व गुरू वशिष्ठ की भेंट का प्रसंग। क्षत्रिय श्रेष्ठ भरत व ब्राह्मण रत्न वशिष्ठ के द्वारा निषाद व केवट को प्रेमपूर्वक गले लगाने की बात तुलसी ने कही है-

‘‘प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।
रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुटत सनेह समेटा।।’’13

कहने का तात्पर्य यह है कि तुलसी ने वर्णाश्रम धर्म के समर्थक होकर व उसे समाज के सुचारू संचालन के लिए अनिवार्य मानते हुए भी मानव धर्म को ही अधिक महत्त्व देकर समाज के वर्णभेद के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है।
ईश्वर में पूरी आस्था और मनुष्य का पूरा सम्मान, ये दोनों दृष्टियाँ तुलसी में एक दूसरे से जुडी हुई हैं-
‘‘सिया-राममय सब जग जानी। करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।’’14

उपरोक्त पंक्ति इनके इसी गहरे आत्मविश्वास की सूचक है। जहाँ ईश्वर और मनुष्य दोनों की एक साथ प्रतिष्ठा हो। सिया-रामयदि उनकी भक्ति के लिए आश्रय स्थल हैं तो सब-जगउनके रचना-कर्म के लिए। अनुभूति और अभिव्यक्ति का संश्लिष्ट रूप रचना में, वस्तुतः मानस में प्रत्याशित है वह ईश्वर और मनुष्य की इस एकरूपता में से निकलता है। एक स्तर पर ईश्वर और मनुष्य का समन्वित रूप तुलसी के राम दशरथ पुत्र के साथ साथ परब्रह्म परमात्मा विष्णु के अवतार हैं जिन्होंने धर्म की स्थापना, मानव रक्षा व असुर संहार के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया है-

‘‘विप्र धेनु, सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।’’15

इन सबके अतिरिक्त सांस्कृतिक क्षेत्र में भी जहाँ जहाँ तुलसी ने विरोध की झलक पाई है, वहाँ-वहाँ उन्होंने उसके शमन का प्रयास किया है। यद्यपि भारतीय संस्कृति अपने आप में समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। समय-समय पर इस देश में कितनी ही संस्कृतियों का आगमन और आर्विभाव हुआ परन्तु  वे घुल-मिलकर एक हो गईं। कितनी ही दार्शनिक, धार्मिक, सामाजिक, साहित्यिक व सौंदर्यमूलक विचारधाराओं का विकास हुआ, किन्तु उनकी परिणति संगम के रूप में हुई। किन्तु फिर भी कुछ विरोधी तत्व जो इसमें मौजूद थे उनके सामंजस्य का प्रयास तुलसी ने किया है जैसे कि राजन्य वर्ग, जनसामान्य और कोल-किरातों के जीवन, संस्कृति क भिन्नता को तुलसी ने वैसे ही चित्रित किया है परन्तु राम के संबंध में इन्होंने इन सभी जीवन पद्धितियों को समन्वित रूप दिया है। और इससे भी महत्त्वपूर्ण बात है- हिन्दू संस्कृति के साथ मुस्लिम संस्कृति का समन्वय। तुलसीदास ने सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के दृढनिष्ठ अनुयायी होते हुए भी अपने दृष्टिकोण को उदार रखते हुए अपने काव्यधर्म का निर्वाह किया है। और इसीलिए राम की सेवा में प्रेषित विनयपत्रिकाका विधान मुगल सम्राट के पास भेजी जाने वाली अरजी की रीति पर किया है। साथ ही अरबी-फारसी की शब्दावली का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है।

इस प्रकार तुलसीदास ने अपने युग, परिस्थितियों की माँग व आवश्यकता को ध्यान में रखकर भक्ति, धर्म, भाषा, साहित्य, पारिवारिक जीवन, समाज आदि सभी क्षेत्रों में व्याप्त विरोध व वैमनस्य को मिटाने और सामंजस्य स्थापित करने का जो प्रयास अपने साहित्य में किया है वह अतुलनीय है। और अपने इसी प्रयास के चलते भारतीय जनमानस के हृदय में, साहित्य में जो स्थान इन्होंने प्राप्त किया है, वह किसी भी अन्य साहित्यकार को अभी तक प्राप्त नहीं हो पाया है। अपने साहित्य के माध्यम से जिस विस्तृत  व समन्वयवादी दृष्टिकोण का परिचय तुलसी ने दिया है, उसके लिए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उन्हें भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि स्वीकारते हुए कहा है- ‘‘अपने दृष्टिविस्तार के कारण ही तुलसीदास जी उत्तरी भारत की समग्र जनता के हृदयमंदिर में पूर्ण प्रेमप्रतिष्ठा के साथ विराज रहे हैं। भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि यदि किसी कवि को कह सकते हैं तो इन्ही महानुभाव को।’’16

संदर्भ सूची -

1 हिन्दी साहित्य की भूमिका - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, संस्करण-2010, पृष्ठ सं- 98
2 रामचरितमानस, बालकाण्ड, 23/1
3 वही, 23/2
4 वही, 116/2
5 वही, उत्तरकाण्ड, 117/2
6 हिन्दी साहित्य का विकास - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मलिक एण्ड       कम्पनी प्रकाशन, संस्करण-2009, पृष्ठ सं- 115
7 रामचरितमानस, लंकाकाण्ड, 2/8
8 वही, उत्तरकांड, दोहा सं-100
9 वही, उत्तरकांड, 115/13
10 दोहावली, 522
11 दोहावली, 523
12 रामचरितमानस, उत्तरकांड, 98/1-2
13 रामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, 243/3
14 वही, बालकाण्ड, 8/1-2
15 वही, बालकाण्ड, दोहा सं- 192
16 हिन्दी साहित्य का विकास - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, मलिक एण्ड       कम्पनी प्रकाशन, संस्करण-2009, पृष्ठ सं-113

 पिंकल मीणा, पीएच. डी. शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय,मो. 965470197 
अपनी माटी(ISSN 2322-0724 Apni Maati) वर्ष-4,अंक-27 तुलसीदास विशेषांक (अप्रैल-जून,2018)  चित्रांकन: श्रद्धा सोलंकी

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