आलेखमाला: शिक्षा के माध्यम में मातृभाषा का महत्त्व/राजेन्द्र शर्मा - अपनी माटी

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मंगलवार, मार्च 17, 2020

आलेखमाला: शिक्षा के माध्यम में मातृभाषा का महत्त्व/राजेन्द्र शर्मा

                             शिक्षा के माध्यम में मातृभाषा का महत्त्व

भाषा अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। यही नहीं वह हमारे आंतरिक एवं बाह्य सृष्टि के निर्माण, विकास, हमारी अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का भी साधन है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परंपरा से विच्छिन्न है। सामान्यतः भाषा को वैचारिक आदान-प्रदान का माध्यम कहा जा सकता है। भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार भाषा यादृच्छिक वाचिक ध्वनि संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा मानव परंपरा एवं विचारों का आदान-प्रदान करता है।

विश्व में भाषा का महत्व:
यदि विश्व के अन्य देशों का आकलन करें तो यह प्रतीत होता है कि वे मातृभाषा को कितना महत्व देते हैं। स्वीडन में स्वीडिश, फिनलैंड में फिनीश, फ्रांस में फ्रेंच, इटली में इतालवी, ग्रीस में ग्रीक, जर्मनी में जर्मन, ब्रिटेन में अंग्रेजी, चीन में मैन्देरिएन और जापान में जापानी भाषा शिक्षा का माध्यम है। यदि हम यह सोचते हैं कि विकास को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा का माध्यम कोई अंतर्राष्ट्रीय भाषा ही मददगार साबित होगी तो यह हमारा भ्रम है। जापान में जापानी का इस्तेमाल होता है फिर भी वह देश तकनीकी दृष्टि से विश्व में आगे है। चीनी बोलने वाली प्रजाति विश्व की सर्वोपरि महासत्ताओं में से एक कही जाती है।

मातृभाषा:
अनुसंधानों के अनुसार हमारी पठनगति मातृभाषा में अधिकाधिक होती है क्योंकि उसके सारे शब्द परिचित होते हैं। अन्य माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों को दो भाषाओं का बोझ उठाना पड़ता है और मासूम बच्चे भार सहन नहीं कर पाते। परिणामतः बच्चे दोनों भाषाओं के साथ न्याय नहीं कर पाते और उनकी पठन क्षमता क्रमशः कम होती जाती है। इसे ‘‘न्यूरोलॉजिकल थ्योरी ऑफ लर्निंग‘‘ कहते हैं जो वैश्विक स्तर पर स्वीकृत है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में दो बाते सामने आई -
1. अधिकांश बच्चे विद्यालय जाने से कतराते है, क्योंकि उनकी शिक्षा का माध्यम वह भाषा नहीं है जो भाषा घर में बाली जाती है।
2. संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकारों के घोषणा पत्र में भी यह कहा गया है कि बच्चों को उसी भाषा में शिक्षा प्रदान की जाये जिस भाषा का प्रयोग उसके माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन एवं सारे पारिवारिक सदस्य करते हो।

मातृभाषा में तीव्रता, क्षमता और गहराई:

वैश्विक चुनौतियां और मातृभाषा के संबंध पर विचार आवश्यक है। मातृभाषा अपने मां-पिता से प्राप्त भाषा है। उसमें जड़े हैं, स्मृतियां है व बिंब भी है। शिक्षा को समझने के कई सूत्र होते हैं। मातृभाषा उनमें सर्वोपरि है। उसमें अपनी कहावतें, लोक कथाएं, कहानियां, पहेलियां, सूक्तियां होती है, जो सीधे हमारी स्मृति की धरती से जुड़ी होती है। उसमें किसान की शक्ति होती है। उसमें एक भिन्न बनावट होती है। एक विशिष्ट सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बनावट जिसमें अस्मिता का रचाव होता है। जब भी किसी महादेश की पीड़ा का बयान होगा तो कोई भी मौलिक लेखक अपनी मातृभाषा में जितनी तीव्रता और क्षमता के साथ अपनी बात कह पाएगा, अन्य भाषा में नहीं। आत्म-अन्वेषण की जो गहराई मातृभाषा के साथ संबंध है, अन्य भाषा के साथ नहीं। अन्य भाषा में बात कही जा सकती है, लेकिन वह मार्मिकता संभव नहीं।

मातृभाषा में संप्रेषणीयता सर्वाधिक:
मातृभाषा एक भिन्न में कोटि का सांस्कृतिक आचरण देती है, जो किसी अन्य भाषा के साथ शायद संभव नहीं। मातृभाषा के साथ कुछ ऐसे तत्व जुड़े होते हैं जिनके कारण उनकी संप्रेषणीयता उस भाषा के बोलने वाले के लिए अधिक मार्मिक होती है। यह प्रश्न इतिहास और संस्कृति के वाहन से भी संबद्ध है। इसलिए शिक्षा में इसका महत्व है। संस्कृति का कार्य विश्व को महज बिंबों में व्यक्त करना नहीं, बल्कि उन बिंबों के जरिए संसार और नूतन दृष्टि से देखने का ढंग भी विकसित करना है। औपनिवेशिकता के दबावों ने ऐसी भाषा में दुनिया देखने के लिए विवश किया गया था जो दूसरों की भाषा रही है। उसमें हमारे सच्चे सपने नहीं आ सकते थे। साम्राज्यवाद सबसे पहले सांस्कृतिक धरातल पर आक्रमण करता है। वह भाषा को अवमूल्यित करने लगता है। हमारी ही भाषा को हीनतर बताता है। लोग अपनी मातृभाषा से कतराने लगते हैं और विश्व की दबंग भाषाओं के प्रभुत्व को महिमामंडित करने लगते हैं। हम उसी से अभिव्यक्ति करने लगते हैं या बंध जाते हैं और मातृभाषा अंततः छोड़ने लगते हैं। गर्व से कहते हैं कि मेरे बच्चे को मातृभाषा नहीं आती। यानि कि शिक्षा का वर्गांतरण होता जाता है।

मातृभाषा में सृजन, अधिगम व साहित्य का उच्च वैभव:
शिक्षा का मूल है वह सौंदर्य बोध जो हमारी लोक कथाओं, हमारे सपनों, विज्ञान, हमारे भविष्य की कामना में छिपी है। उसका सौंदर्य हमारी धरती की गंध से उपजा होता है। अन्य भाषाओं को अपनाने, उनमें अभिव्यक्ति करने में कोई बुराई नहीं। न ही उनमें ज्ञान-विज्ञान, सामाजिक विज्ञान सीखने व अर्जित करने में कोई संकोच होना चाहिए। मूल यह है कि जो ताकतें मातृभाषा को रचनात्मकता से हीन करने व उसे हीनतर करने को सक्रिय रही हैं, उन्हें पहचानने की आवश्यकता है। हमारी अस्मिता, साहित्य, सृजनात्मकता का सर्वोच्च वैभव मातृभाषा में ही संभव है। वह हसीन है। कल्पना का वह छोर है। वह हमारी धरती का रंग है। मातृभाषा में परंपरा की जीवंतता है। वह हमारे गोमुख से आती है। उसमें हमारी धूप व हमारी छांव है। हमारी धमनी व शिराएं उससे रोमांचित होती हैं। वह हमारा गहन आकर्षण प्रीति व मुक्ति है। उसमें हमारे लिए गहन आवेग भी है। वह हमारी परंपरा में हमें परिष्कृत करती चलती है। मातृभाषा जीवंत अभिव्यक्ति व शिक्षा का शायद सबसे सुंदर माध्यम है। मातृभाषा न केवल सहज शिल्प है, अपितु सबसे अर्थ पूर्ण संभावना है। अन्य भाषाओं के प्रति उदार होना मातृभाषा का सबसे उज्जवल पक्ष होना चाहिए।

गौरवशाली अतीत का आभास मातृभाषा से:
मातृभाषा में जनता के संघर्ष बोलते हैं। कोई व्यक्ति जो मातृभाषा की महत्ता जानता है उसे पता है कि आंदोलन, लोकछवि, आत्म-आविष्कार और बदलाव के लिए इससे बेहतर कोई माध्यम नहीं है, क्योंकि उस का वास्ता उन भाषाओं से पड़ेगा जो वहां की जनता बोलती है और जिनकी सेवा के लिए उसने कलम उठाई है। वह वही गीत गाएगा जो जनता चाहती है। मातृभाषा के माध्यम से अर्थ सीधे-सीधे सरोकार से है। इससे उस माध्यम के सामाजिक व राजनैतिक निहितार्थों का बोध होता है। इसलिए शिक्षा में इसका गहरा औचित्य है। मातृभाषा के माध्यम से लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं को गीतों, नृत्यों, नाटकों, कविताओं आदि के जरिए अभिव्यक्ति दी जा सकती है तथा नई चेतना की आकांक्षा को स्वर दिया जा सकता है। श्रमिक वर्ग व जनसामान्य को मूलतः उनकी मातृभाषा में अच्छी तरह संबोधित व संप्रेषित किया जा सकता है। मातृभाषा में संरचनात्मक रूपांतर की प्रक्रिया में शिक्षा संस्कृति की एक निर्णायक भूमिका होती है।

मातृभाषा से पर्यावरण बोध एवं संरक्षण:
शिक्षा में मातृभाषा से अपने परिवेश और पर्यावरण का बोध होता है, तथा पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी मिलता है। मातृभाषा से संबद्धीकरण की प्रक्रिया में मजबूती होती है। अलगाव से बचाव होता है। मातृभाषा से वह मौखिक लय प्रकट होती है जिसमें प्रकृति और परिवेश के साथ सामाजिक संघर्ष भी प्रकट होता है। उससे साहित्य और संस्कृति के सकारात्मक, मानवीय जनतान्त्रिक तत्व भी सामने आते हैं। अपनी संस्कृति की जड़ों में जाकर हमें आत्मविश्वास की अनुभूति होती है। उधार ली हुई भाषा हमारे साहित्य एवं कलाओं का विकास नहीं कर सकती, क्योंकि उनका संबंध हमसे रागात्मक रूप से जुड़ा नहीं है। उधार की भाषा का सत्ता केंद्र कहीं और होता है और वह मातृभाषा जैसी आकांक्षा की पूर्ति का वाहक नहीं हो सकता। मातृभाषा में धरती की जो गंध है और कल्पनाशीलता का जो पारंपरिक सिलसिला है वह अन्य भाषा में नहीं है।

शिक्षा के माध्यम में मातृभाषा की प्रभावी भूमिका:
शिक्षा और संस्कृति में आवश्यक संबंध है और सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक पक्षों से सीधा सरोकार है। इसलिए शिक्षा में मातृभाषा की प्रभावी भूमिका है। सच यह है की संस्कृति अपने आप में इतिहास की अभिव्यक्ति व उत्पाद भी है, जिसका निर्माण प्रकृति और अन्य लोगों के साथ संबंधों पर आश्रित है। इसीलिए वहां मातृभाषा का अंतरंग प्रवेश है। यदि मातृभाषा को आधार बनाया गया तो सामुदायिकता के आबद्धगण अपनी भाषा, साहित्य, धर्म, थिएटर, कला, स्थापत्य, नृत्य और एक ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करते हैं जो इतिहास और भूगोल को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को पहुंचा पाते हैं। शिक्षा और संस्कृति वर्गीय विभेदों को समाज की आर्थिक बुनियाद में व्यक्त करती है। वास्तव में वर्गीय समाज में दो तरह की शिक्षा के बीच संघर्ष चलता रहता है। औपनिवेशिकता से ग्रस्त सांस्कृतिक पक्षों के लिए मातृभाषा की आवश्यकता है ही नहीं। वे अपने लिए वैसी ही भाषा चुनेंगे जो उनके क्लास को प्रतिनिधित्व दे। इसी देश में कई जगह बच्चे मातृ भाषा बोलते हुए दंड पाते हैं तो इसको समझना चाहिए।

मातृभाषा में हो शोध:
वर्तमान समय में अनिवार्य शिक्षा अधिनियम के अनुसार माध्यमिक स्तर तक मातृभाषा (क्षेत्रीय भाषा) को शिक्षा का माध्यम स्वीकार किया गया है, परंतु उच्च शिक्षा स्तर पर आज भी यह समस्या बनी हुई है। शोध मातृभाषा में किए जाते हैं तो उनकी गुणवत्ता बेहतर होती है, जबकि अंग्रेजी में यह औसत रहती है। यही कारण है कि रूस, जापान और फ्रांस में शोध वहीं की भाषाओं में ही होते हैं। संस्कृति की सुरक्षा में समाज की अपनी मातृभाषा का महत्व आवश्यक है। मातृभाषा के साथ-साथ राष्ट्र की संस्कृति एवं संप्रभुता सुरक्षित हो जाती है।

संदर्भ ग्रन्थ सूची
1.  डाॅ. लक्ष्मीलाल के. ओड (116) - ‘‘शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि‘‘ (राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, जयपुर)
2.  डाॅ. नन्दकिशोर देवराज (58-59) - ‘‘भारतीय दर्शन‘‘ (उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ)
3.  प्रो. हरिन्द्र प्रसाद सिन्हा (54) - ‘‘भारतीय दर्शन‘‘ (मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली)


राजेन्द्र शर्मा
शोधार्थी
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

             अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) शिक्षा विशेषांक, मार्च-2020, सम्पादन:विजय मीरचंदानी, चित्रांकन:मनीष के. भट्ट

2 टिप्‍पणियां:

  1. सर,
    मातृभाषा के प्रति आपके अमूल्य शब्दो से हमें बहुत सीखने को मिला है

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  2. पढ़ने के लिए धन्यवाद,,

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