आलेखमाला: लोक और कला की कहानी 'ठेस'/ डॉ. संगीता मौर्य - अपनी माटी

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सोमवार, जुलाई 06, 2020

आलेखमाला: लोक और कला की कहानी 'ठेस'/ डॉ. संगीता मौर्य

             ''समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-32, जुलाई-2020

                 लोक और कला की कहानी 'ठेस'- डॉ. संगीता मौर्य

चित्रांकन: कुसुम पाण्डेय, नैनीताल
औद्योगीकरण के इस दौर में जहाँ हम रोज एक नया प्रयोग कर रहे हैं, वही आज भी हम अपनी उपनिवेशिक सोच से उबर नहीं पाए हैं।भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्ताननामक अपनी पुस्तक में पवन कुमार वर्मा ने एक बड़ी अच्छी बात कही है कि उपनिवेशवाद का प्रभाव कइयों के दिमाग में बुरी तरह बैठ चुका था, वे रातों-रात अंग्रेज हो जाना चाहते थे”1 आज  भी हम अंग्रेजियत के प्रभाव से अपने आपको मुक्त नहीं कर पाए हैं। या कहें कि इसके प्रभाव ने हमें कहीं और अधिक जकड़ लिया है। इसका ही दुष्परिणाम है कि हम अपनी ही चीज को किसी दूसरे के चश्मे से देखने की कोशिश करते हैं। इस सन्दर्भ में श्रीकांत किशोर का यह कथन है कि औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हम लोग अपनी हीन ग्रंथि के प्रभाव में अपना सब कुछ तब तक हेय और त्याज्य मानते रहे हैं, जब तक उसे पश्चिम की स्वीकृति नहीं प्राप्त हो गई।”2
  
विदित हैं कि किसी भी संस्कृति को समझने के लिए हमें उस वस्तु को उसी के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य (कल्चरल कॉन्टेक्स्ट) में देखना होता है लेकिन जब बात तुलनात्मक हो जाये तो वहां श्रेष्ठता और हीनता की भावना आनी ही है। यही बात उपनिवेशवाद की पराकाष्ठा भी है। हम जानते हैं कि भारतीय संस्कृति अनेक विविधताओं से युक्त रही है इसका एक कारण भारतीय समाज का कई श्रेणियों में विभक्त होना भी है। यह श्रेणियां जाति और पेशे के आधार पर बनी है । इस प्रकार भारतीय समाज का उच्चता और निम्नता में विभाजन तथा दूसरी ओर पश्चिमी संस्कृति के वर्चश्व को प्रभावी संस्कृति मानना हमें हीनता का बोध कराती रही है।

भारतीय जीवन में लोक कलाओं की जो महत्ता थी वह पश्चिमी सभ्यता के संपर्क में आने के पश्चात (जैसे-जैसे हम उसकी नकल करना शुरू किये ) हम अपनी पुरानी पहचान को खोते चले गये। आज जब हम भारतीय लोक-कलाओं का वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव को देख रहे हैं तब हम पुनः अपनी लोक-कलाओं की ओर झांकने की कोशिश कर रहे हैं। भीष्म साहनी की कहानी  चीफ की दावतइस मनःस्थिति का गहन अध्ययन करती दिखाई पड़ती है। इस कहानी का नायक मिस्टर शामनाथ अपने घर आने वाले चीफ को हर तरह से खुश करना चाहता है, इसके लिए दोनों, पति-पत्नी सुबह से ही घर की साफ़ सफाई और पुरानी चीजों को यहाँ-वहां छिपाने में लगे हुए हैं। इनमें से एक पुरानी चीज मां भी है। पुराने सामान छिपाने की जगह तो फिर भी मिल जाती है लेकिन मां को कहाँ छिपाया जाये, यह समझ से परे है। लेकिन जब चीफ मां के हाथ की फुलकारी की प्रशंसा करता है, और उसे बनाने के लिए मां से आग्रह करता है तब जाकर कहीं शामनाथ को साधारण सी दिखने वाली इस फुलकारी का महत्व समझ में आता है। इस तरह भीष्म साहनी बूढी मां और समाप्त होती हस्तकला (फुलकारी) दोनों को संजोने और सम्मान करने  की गुजारिश करते हैं।
  
वर्तमान समय में दो प्रवृत्तियां देखी जा सकती है, एक तरफ तो हम इतने विकसित हो रहे हैं कि पृथ्वी ही नहीं आकाश की भी पड़ताल कर लेते हैं तो वहीँ दूसरी ओर हमारा परंपरागत ढांचा टूट रहा है। हम अपने रीति रिवाज़ वेश- भूषा और लोक कलाओं को भूलते जा रहे हैं। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप उत्पादन का स्वरूप तो बदला लेकिन उत्पादन से जुड़े परंपरागत मूल्य भी इससे गहरे प्रभावित हुए। इसने उन मूल्यों को पूरी तरह से नष्ट नहीं किया लेकिन उन लोक कलाओं के सामने चुनौती जरुर खड़ी कर दी। फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियां भी इन्हीं चुनौती की ओर बार-बार इशारा करती हैं।

फणीश्वर नाथ रेणु वर्तमान का बोध और भविष्य के स्वप्न को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने वाले कथाकार हैं। एक ओर इन्होनें अपनी कहानियों में राजनीति तथा आंचलिकता को आधार बनाया तो वहीँ दूसरी ओर गँवई-गाँव की लोक-कलाओं की होती दुर्दशा की ओर संकेत किया है। रेणु की ठेसकहानी इन्हीं लोक कलाओं के संजोने के प्रयत्न में रत दिखाई पड़ती है। लक्ष्मण प्रसाद गुप्त की कविता इसकी ठीक ही अभिव्यक्ति करती जान पड़ती है-वे बचा देखना चाहते हैं/ नदी को कागज पर नहीं/ जमींन पर/ चिड़िया को चिड़ियाघर में नहीं/ पौधों की शाखाओं/ या कि घर के रोशनदान में/ वे रंगों को/ पेंसिल की शक्ल में नहीं/ फूलों और तितलियों में/ बचा देखना चाहते हैं।”3 इस कहानी के  नायक का  नाम सिरचन हैं। जो भोजपुरी के सईचनशब्द से बना है। जिसका अर्थ है संजोकर या सहेज कर रखने वाला। अर्थात भारतीय कलाओं को संरक्षित करने वाला। सिरचन भी उसी ख़त्म होती परंपरा की एक कड़ी है। जो सिरचन एक समय में इतना अधिक मान-सम्मान पाता था, यहाँ तक कि साहब-सूबा भी मिनती-चिरौरी करते  थे। लोग खूब अच्छा खिलाते-पिलाते थे तब जाकर कहीं सिरचन उनके यहाँ जाने के लिए तैयार होता था। “..आज सिरचन को मुफ्तखोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था, जबकि उसके मडैया के पास बड़े-बड़े बाबू लोगों की सवारियाँ बंधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे।”4 आज स्थिति यह है कि लोग सिरचन को काम पर रखने का मतलब बेगार कराना समझते हैं इसका कारण पारम्परिक ढांचे का टूटना ही है।

भारतीय समाज कई जातियों तथा वर्गों में बटा है। इसकी विविधता का एक कारण इसका वर्गों में बटा होना भी है। यह विविधता चाहे कला के रूप में हो या किसी अन्य रूप में। सदैव से इस समाज में ब्राह्मणवाद का वर्चस्व बरक़रार रहा है। जिसका जिक्र रेणु अपनी कहानी रसप्रियामें भी करते हैं। जब पंचकौड़ी मृदंगिया ब्राह्मणों के बच्चों को बेटाकह देता है तो वे चिढ़ जाते हैं और बाप जी कहकर माफ़ी माँगने पर ही छोड़ते हैं। वहीँ ठेसकहानी के सिरचन के मान-सम्मान का अंदाजा इन्हीं बातों से लगाया जा सकता है जब वह ब्राम्हण टोली के पंचानन चौधरी के छोटे बेटे को बे पानी किया था -तुम्हारी भाभी नाख़ून से काट कर तरकारी परोसती है। और इमली का रस साल कर कढ़ी तो हम कहार-कुम्हारों की घरवाली बनाती हैं। तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनाई!” 4 इस तरह की बात को ब्राम्हण टोली के लोगों द्वारा बर्दाश्त कर लेना समाज में सिरचन की  श्रेष्ठ स्थिति को दर्शाता है।
  
सिरचन यह मान-सम्मान यूँ ही नहीं पाया है बल्कि इसके पीछे उसके काम करने की लगन, कड़ी मेहनत, उसकी तन्मयता है। वह अपने काम को पूरे मनोयोग से करता है। उस समय उसको खाने तक की भी सुध नहीं रहती। उसका अपने कामों में तल्लीनता का ही परिणाम उसकी कारीगरी है। सिरचन जाति का कारीगर है जिसके नस में ही काम के प्रति तन्मयता और ईमानदारी बसी हुयी हैं-मैंने घंटों बैठ कर उसके काम करने के ढंग को देखा है। एक-एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जतन से उसकी कुच्ची बनाता। फिर, कुच्चियों को रंगने से लेकर सुतली सुलझाने में पूरा दिन समाप्त..काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी की गेंहूअन साँप की तरह फुफकार उठता-फिर किसी दूसरे से करावा लीजिए काम। सिरचन मुंहजोर है, कामचोर नहीं।”5 निश्चय ही सिरचन एक कलाकार है, उसकी तन्मयता ही उसके काम के परिणाम को दर्शाती है।
  
भारतीय समाज लोक कलाओं से संपन्न रहा है। विभिन्न लोक कलाएँ जैसे- दीवार पर अनेक प्रकार के भित्तिचित्र जिसको लेकर रेणु ने कहानी भी लिखा है। गाँव में बैठने के लिए मोढ़े, मचिया यहाँ तक कि शादी-ब्याह में भी हाथ की बनी हुयी पंखी, दौरी, डलिया, सूप, छीता(दौरा) इसके साथ ही मिट्टी और चीनी मिट्टी के बर्तन भी आदि दिये जाते थे । लेकिन आज सब रेडी-मेड चीजें ही दिखाई पड़ती है। पहले खाना खाने के लिए पत्तल भी हाथ से बनाये जाते थे लेकिन आज इन सबकी जगह प्लास्टिक और थर्माकोल ने ले लिया है। हम जानते हैं की प्लास्टिक को विनष्ट होने में सैकड़ो वर्ष लग जाते हैं । निश्चय ही इसका निस्तारण एक गम्भीर समस्या बनी हुयी  है। जबकि देखा जाय तो गाँव के कलाकार अपने हाथों से इन सारी चीजों को केवल बनाता ही नहीं था बल्कि वह उसमें पूरा मनोयोग और हाथों की मिठास भी भर देता था। इसके साथ ही ये सारी चीजें इको-फ्रेंडली भी हुआ करती थीं। लेकिन आज इनको बनाने वाले ही नहीं दिखते। यहाँ तक कि गाँव में चारपाई बीनने वाले भी अब कम ही लोग बचे हैं । रेणु भी इस कहानी के माध्यम से उन समाप्त होती चीजों की ओर संकेत करना चाह रहे हैं -मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बांस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों  / की छतरी-टोपी तथा इसी तरह के बहुत-से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता।”6 भले ही सिरचन उस समाप्त होती परंपरा की कड़ी है। लेकिन अब लोग उस परम्परा को जीवित रखने का प्रयास तो दूर उसके काम के बदले खाना खिलाकर पुराने-धुराने कपड़े देकर बिदा कर देना चाहते हैं ।कहने का तात्पर्य यह है लोक क़ी परंपरा भी उसी पुराने कपड़े के समान ही बची है जो बस समाप्ति की कगार पर है। निश्चय ही अब इस तरह के काम को लोग बेगारी समझने लगे हैं जिसके कारण दिन भर काम करने के बाद भी कला का सम्मान करने वाला नहीं दिख रहा है। कला और कलाकार का यह अपमान सिरचन के मन को अन्दर तक छिल देता है। तभी तो वह भज्जू महाजन की बेटी से कहता है- बड़ी बात ही है बिटिया ! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिला कर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है बबुनी!”7

समाज में अभी भी कुछ क़द्र-दान हैं जो जिनका ध्यान कलाओं के संचयन की ओर है। उसमें से एक मानू का दूल्हा भी है, जिसको विदाई में कोई सामान नहीं चाहिए यहाँ तक कि मिठाई भी नहीं। लेकिन चीक और शीतल पाटी जरुर चाहिए। देखा जाय तो लड़की की ससुराल से किसी चीज की मांग हो जाती है तो दिन-रात एक करके मायके वाले बेहतर ही नहीं, बेहतरीन चीज देने का प्रयास करते हैं। इसीलिए तो मानू की विदाई में देने के लिए चीक और शीतल- पाटी बनाने के काम में सिरचन को एक सप्ताह पहले ही लगा दिया दिया गया। हिदायत भी कि ऐसा काम करो कि देखने वाले देखते ही रह जाएं। इस काम के बदले असली मोहर छाप वाली धोती देने का वादा भी। हम जानते हैं कि सिरचन एक ऐसा कारीगर है जिसकी पत्नी और बच्चे नहीं हैं  इसलिए वह  अब भविष्य की चिंता नहीं करता लेकिन सम्मान का भूखा जरुर है। लोग उसे कुछ भी बोल लें चटोरा, लालची लेकिन वह अपने काम और सम्मान से कभी समझौता नहीं करता। उसके काम करने के ढंग से ऊँची समझी जानेवाली जाति के लोग भी आदर करते थे। “‘पान जैसी पतली छुरी से बांस की तीलियों और कमानिओं को चिकनाता हुआ अपने काम में लग गया.....डेढ़ हाथ की बुनाई देखकर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनीं।’”8


भारतीय समाज में ननद- भौजाई का एक रिश्ता प्रेम का होता है तो दूसरा प्रतिष्पर्धा का , इसीलिए तो मानू के लिए इतनी सुन्दर चीक बनते देख मझली भाभी को रहा नहीं जाता और अपना व्यंग बाण सिरचन पर चला ही देती है। वह कहती है कि अगर मुझे पता होता कि असली मोहर छाप वाली धोती के बदले इतनी सुन्दर चीक बन जाती है तो मैं भी अपने भाई से कहकर असली मोहर छाप वाली धोती दिलवा देती। मझली भाभी को लगता है कि सिरचन यह काम लालच के कारण कर रहा है। जबकि सिरचन यह काम आत्मीय लगाव के कारण कर रहा होता है। इसीलिए तो वह कहता है, ‘मोहर छाप वाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया। मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है....मानू दीदी का दूल्हा अफसर आदमी है।’9 जैसे ही मझली भाभी सिरचन के मुंख से मानू के अफसर दुल्हे की बात सुनती है, यह बात उसके पति के अफसर न होने की ओर संकेत भी करती है। एक कहावत है न कि आँख वाले को अँधा कहा जाए तो उतना बुरा नहीं लगता जितना बिना आँख वाले को अँधा कहने पर बुरा लगता है। यही बात मझली भाभी को लग गई।


काम के दूसरे दिन जब सिरचन उसी मनोयोग से चीक में सुतली डाल रहा था तो मझली भाभी चिउड़ा और गुड़ फेंक कर चली जाती है। सिरचन कुछ नहीं बोलता तभी माँ की आवाज आती है- सिरचन को बूंदिया क्यों नहीं दिया? तब सिरचन कहता है, मैं बूंदिया नहीं खाता चाची। चूँकि सास की आज्ञा थी बूंदिया देने की इसीलिए मझली भाभी एक मुठ्ठी बुँदिया सूप में फेंक देती है। सुखा चिउरा से  सिरचन को उतना दुःख नहीं होता जितना बुंदिया फेकने से हुआ। और वह  बोलता है, ‘मझली भाभी अपने मायके से आई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोलकर देती हो ?’ यह बात सुनकर मझली भाभी रोने बैठ जाती है और कहती है - छोटी जाति के आदमी का मुंह भी छोटा होता है, मुंह लगाने से सिर पर चढ़ेगा ही।’ 10 रेणु अपनी कहानियों में जाति व्यवस्था में जकड़े समाज की सच्चाई को बड़ी बारीकी से उकेरते हैं। भले ही सिरचन छोटी जाति का है लेकिन अपने काम में हासिल महारत की वजह से किसी के सामने नहीं झुकता। यह समाज उससे लाभ तो लेना चाहता है लेकिन बीच-बीच में उसे उसकी औकात भी दिखा देना चाहता है। इसी परंपरा की एक कड़ी मानू की माँ सिरचन से चीक आदि बनवाना चाहती थी लेकिन उसको भी मझली बहू की यह बात सह लगती है कि  छोटी जाति वालों को मुंह नहीं लगाना चाहिए।


सिरचन मानू के यहाँ काम करने ही इसीलिए आया था कि इस घर में उसका बहुत सम्मान था। वह सामान का नहीं सम्मान का भूखा है, और जब मानू की माँ उसे भला बुरा कह देती है तो यह बात उसके दिल में लग जाती है ,लेकिन मानू उसे यह कहकर सम्हाल लेती है कि- शादी व्याह के घर में कई तरह के लोग होते हैं किसी की बात पर ध्यान मत दो। यह बात सिरचन को भी सही लगती है और इस माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए चाची से गमकौवा जरदा मांग बैठता है। चाची भी इस छोटी जाति वाले इस आदमी से जाने कबसे कुढ़ी बैठी थी आज भी उसे मौका हाथ लग ही गया वह गुस्से में लाल होकर कहती है मश्खरी करता है ? तुम्हारी चढ़ी हुई जीभ में आग लगे। घर में भी पान और गमकौवा जरदा खाते हो?...चटोर कहीं के।’11 यह बात सिरचन के कलेजे को बेध जाती है। कला और कलाकार का ऐसा अपमान वह सह नही पाता। वह अधूरी चीक की तरफ दृष्टि डालता है और पान की पीक थूककर बाहर निकल जाता है। माँ भी यह जान गई कि सिरचन की वापसी अब संभव नही इसीलिए मानू को यह सांत्वना देते हुए कहती है कि मेले से खरीदकर भेजेगी। जबकि रेणु जी का कहना है कि मानू के लिए तो सातों तारे मंद पड़ गए।’12 क्योंकि उसे याद आता है कि ससुराल वाले कितनी बार मेंहमानों को चीक खोलकर दिखलाते रहे थे। इस बात को सोचकर वह और दुखी हो जाती। बहन को इस तरह उदास देख किस भाई का कलेजा नहीं पसीजेगा ऐसे में वह एक आखिरी कोशिश करता है। जैसे ही वह सिरचन के यहाँ जाता है, सिरचन फफक पड़ता है और देखते ही बोलता है, ‘ बबुआ जी! अब नहीं।"13

एक कलाकार कला का अपमान होते नहीं देख सकता । ऐसे में सिरचन कहता है कि अब यह काम छोड़ दूंगा। क्योंकि इसकी अब कदर नहीं रही। अब हम  कहानी की शुरुआत की तरफ ध्यान दिलाते  हैं जब वह काम छोड़ चूका है। यह रेणु की कला ही है कि जब वह  कहानी की शुरुआत करते  है तब सिरचन हमें कामचोर, चटोर आदि दिखाते है। वास्तव में ऐसे कामचोर व्यक्ति को काम पर क्यों  रखा जाये ?लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढती है पाठक सिरचन के साथ हो लेता है। जब वह यह कहता है ससुरी खुद मरी, बेटे-बेटिओं को साथ ले गई”14, ऐसे में हर पाठक की गहरी संवेदना उससे जुड़ जाती है। यह उसके अकेलेपन के दंश को दिखाती है जो वह अकेले ही भोग रहा है। कहानी पढ़ते समय पाठक को यह भी लगता है कि वह चटोर है और केवल खाने के लिए ही काम करता है लेकिन पाठक जल्दी ही समझ जाता है कि वह सम्मान का भूखा है। जिस घर में उसका हमेशा सम्मान होता आया है आज इस तरह के अपमान से वह अब जान गया है कि कला और कलाकार को महत्व देने वाले लोग अब नहीं बचे हैं।  यहाँ एक कलाकार के दिल में ठेस लग चुकी थी। फणीश्वरनाथ रेणु इस कहानी के शुरुआत में जिस पात्र को कामचोर दिखाते हैं और अंत होते-होते पाठकों का  सिरचन से गहरी आत्मीयता हो जाती है। जब पाठक मानू की उदासी देखता है तब एक बार फिर पाठक की संवेदना मानू की तरफ जुडती है। जब मानू उस अधूरी चीक को मोड़कर अपने साथ बहुत सम्हालकर रख रही होती है तब एक बार फिर सिरचन को कोसने का मन करता है। इस कहानी में मानू एक ऐसी किरदार के रूप में चित्रित हुई है जो अपने दुःख को तो प्रकट करती है लेकिन किसी को कुछ बोलती नहीं। जिसकी वजह से पाठकों की गहरी संवेदना पा जाती है। यह रेणु की ही कला है कि तुरंत बाद ही एक बार फिर सिरचन सबका मन मोह लेता है जब वह रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर पीठ पर बोझ लादे हुए दौड़ता हुआ आता है और कहता है दौड़ता आया हूँ... दरवाजा खोलिए। मानू दीदी कहाँ है? एक बार देखूं !सिरचन जो मानू को बेटी की तरह मानता है उसकी अपनी बेटी नहीं रही लेकिन पिता का फर्ज वह मानू को शीतलपाटी चीक आसनी आदि देते हुए निभा देता है।”15

संदर्भ
1 -भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्तान’, पवन कुमार वर्मा
2- देशी ठाठ में राग विदेशिया, श्रीकांत किशोर आलोचनासंपादक, अपूर्वानंद, अप्रैल-जून 2015
3 - जिसे वे बचा देखना चाहते हैं, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता
4- चीफ की दावत, भीष्म साहनी
5- फणीश्वर नाथ रेणु, मेरी प्रिय कहानियां
6- वही पृष्ठ सं. 7,8,9,10,11,12,13,14,15

डॉ. संगीता मौर्य
सहायक प्रोफेसर-हिंदी, राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय गाजीपुर, उ.प्र.

1 टिप्पणी:

  1. Empathetic discussion.
    बिना कहानी पढ़े कहानी की रूह तक पहुंचने का स अहसास। आभार, शुभकामनाएं।

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