आलेख: शोध केन्द्रित यात्रा में गाँव लमही की विरासत / सूर्यप्रकाश पारीक - अपनी माटी

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मंगलवार, दिसंबर 22, 2020

आलेख: शोध केन्द्रित यात्रा में गाँव लमही की विरासत / सूर्यप्रकाश पारीक

        अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-34, अक्टूबर-दिसम्बर 2020, चित्रांकन : Dr. Sonam Sikarwar

                                       'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 


आलेख: शोध केन्द्रित यात्रा में गाँव लमही की विरासत / सूर्यप्रकाश पारीक 

विश्व सभ्यता का सबसे प्राचीन शहर बनारस...काशी कहिए, बनारस कह दीजिये या वाराणसी...लगेगा बस, अपना ही! इसे देवनगर भी कहा जाता है, जिसके आधार पर कुछ विद्वानों ने देवनागरी की व्युत्पत्ति भी बताई है। इस शहर में घुसते मुझे कुछ शब्द याद आ रहे हैं...पढ़े थे कभी, बड़े ही अपनेपन के साथ! कविता है...केदारनाथ_सिंह जी की”बनारस"...और शब्द है कुछ यूँ...

"कभी सई-साँझ

बिना किसी सूचना के

घुस जाओ इस शहर में

कभी आरती के आलोक में

इसे अचानक देखो...

अद्भुत है इसकी बनावट

यह आधा जल में है

आधा मंत्र में/आधा फूल में है

आधा शव में/आधा नींद में है

आधा शंख में/

अगर ध्‍यान से देखो/

तो यह आधा है/

और आधा नहीं भी है!!!”(1)

 

तो मेरा भी प्रवेश होता है...ऐसे ही सई सांझ... शहर बनारस में! बिन किसी सूचना के। मैं संध्या समय हवाईजहाज से इस नगरी में उतरा हूँ। एयरपोर्ट शहर से 30 किलोमीटर की दूरी पर है, तो इस नगर में प्रवेश तो थल मार्ग से ही हुआ है। पहली हवाईयात्रा का प्रसंग और अनुभव कभी और...फिलहाल घुसते है... इस बहुआयामी शहर में! जहाँ कबीर है... भारतेंदु भी! प्रसाद है तो...प्रेमचंद भी। बाबा विश्वनाथ की धार्मिक नगरी भी...भारत की राजनीति की जमीन भी! माँ गंगा भी...बनारसी पान और भांग भी! मणिकर्णिका तो...अस्सी घाट भी! सुबह-ए-बनारस ...तो दशाश्वमेध पर सन्ध्या आरती भी! बनारसी साड़ी तो ...गंगा में नौका विहार भी! आते ही दर्शन हुए हैं...महान शैक्षिक राजधानी के...बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जिसे बीएचयू कहना आम है। रिक्शा वाले लंका गेट से या कहीं और से इसे”भेंचु भेंचु" भी पुकारते हैं। ख़ैर... नाम में क्या रखा है!

 

मेरा बनारस आने का मकसद बचपन से पढ़ रहे साहित्यकारों एवं उनसे जुड़े प्रमुख स्थानों को जी लेना था... सूची में मुंशी प्रेमचंद अव्वल है, जिसके लिए बनारस से कुछ दूरी पर स्थित लमही की यात्रा करनी होगी। जयशंकर प्रसाद के साथ ही भारतेंदु हरिश्चंद्र का निवास भी प्राथमिकता में है। शुरुआत प्रेमचन्द जी से की...आखिरकार हर व्यक्ति साहित्य में प्रवेश पहले पहल प्रेमचन्द को ही पढ़कर करता है। इस बेजोड़ साहित्यिक नगरी में आकर पहला दुख यही हुआ कि यहाँ के लोक(ल) परिवहन वाले इन स्थानों के विषय में बिल्कुल अनभिज्ञ है।

 

मैं उच्च कक्षाओं को हिंदी पढ़ाते हुए आरम्भ सदैव”प्रेमचंद जी" से करता आया हूँ। 2010 से ही एक तरह से शगुन ही मानकर, जैसा मैंने स्वयं भी पढ़ा। उनके जीवन परिचय में पहला तथ्य उनकी जन्मस्थली यानि लमही होता है। जब भी पढ़ाता हूँ, विद्यार्थियों को यही कहता आया हूँ कि...मैं एक दिन लमही अवश्य जाऊँगा। और वो ही”एक दिन" आज ही है। वाराणसी से ये स्थान 15 किलोमीटर की दूरी पर है। बनारस की खास बात ये भी लगी कि यहाँ किराए पर दुपहिया से सफर किया जा सकता है। मैंने होटल के बाहर निकलते ही एप्प से यात्रा बुक की। यात्रा बुक करने से पूर्व गन्तव्य में मैंने लमही डाल दिया था।

 

चालक संजीत कुमार यादव यही के मूल निवासी हैं। इसकी पहचान के लिए आप मुँह में पान की ओवरडोज भरे हैं। कुछ भी पूछने पर आप हर बार अपनी पीक से सड़क को लाल जरूर करते हैं। लेकिन मेरे सफर के बेहतरीन साथी निकले। जगह जगह पर स्थानों का परिचय देते चल रहे हैं।”इधर से सारनाथ आना है"“इधर गोन्दोलिया"“ये अगला वाला जलियांवाला बगीचा है"“हैं...! जलियांवाला बाग, यहाँ कैसे???" संजीत यादव स्थिति समझकर पान की पीक थूकते है और ताम्बूल कणों को जिह्वा से संभालते हुए कहते हैं,

"अरे चोरियां वाला बाग"

"अच्छा जी, अच्छा जी!”

 

वैसे मैंने इस रिक्शेवालों, टेम्पो वालो को पूछा था कि,”लमही जाना है!” लेकिन अफ़सोस है कि जिस लमही को मैं पुस्तकों में पढ़ता हुआ यहाँ तक आ गया हूँ, उसे यहाँ कोई नहीं जानता! ऐसे समय से गूगल ही काम आया। लमही पाण्डेयपुर के पास पड़ता है। प्रेमचंद जी ने कभी अपनी आत्मकथा नहीं लिखी लेकिन अपने जीवन की महत्वपूर्ण, यादगार या रोचक घटनाओं को अपनी कहानियों/उपन्यासों में डाला है।

 

उनके सबसे वृहद कथानक वाले उपन्यास”रंगभूमि"(1925) में पाण्डेयपुर का जिक्र आता है। उद्योगपति जॉनसेवक वहाँ सिगरेट का कारखाना बनाना चाहते हैं और उनकी नजर सूरदास की जमीन पर है। सूरदास अपने गाँव की गायों के लिए अपनी जमीन जॉन सेवक को नहीं देना चाहता। वो भले ही अंधा है, लेकिन मूर्ख नहीं। जानता है कि उद्योग आएंगे तो आधुनिकता की दौड़ में अनाचार बढ़ेगा। सूरदास का कल्पित यही अनाचार रंगभूमि में भी बताया गया था, “मिल के परदेसी मजदूर, जिन्हें न बिरादरी का भय था, न सम्बन्धियो का लिहाज, दिन भर दिन भर तो मिल का काम करते, रात को ताड़ी पीते। जुआ नित्य होता था। ऐसे स्थानों पर कुल्टाएँ भी आ पहुँचती है। यहाँ भी एक छोटा मोटा चकला आबाद हो गया था।”(2)

 

बनारस जैसे बड़े शहर से गाँव लमही की ओर बढ़ते हुए शहर और गाँव की वैसी ही अनुभूति होती है, जो कभी गोदान में हुई थी। आज भी गोदान का गोबर बनारस जैसे बड़े शहर में मजदूरी करने लगता है। गाँव का युवा शहर में आकर बदलता हुआ, “गोबर को यहां रहते साल भर हो गया। अब वह सीधा साधा ग्रामीण युवक नहीं है। उसने बहुत कुछ दुनिया देख ली और संसार का रंग ढंग भी कुछ कुछ समझने लगा है। मूल में वह अब भी देहाती है। पैसे को दांत से पकड़ता है स्वार्थ को कभी नहीं छोड़ता और परिश्रम से जी नहीं चुराता, ना कभी हिम्मत हारता है लेकिन शहर की हवा उसे भी लग गई है।”(3)

 

खैर...बात करते करते हम पाण्डेयपुर आ गए हैं, और सूरदास की धारणा को सही साबित करते हुए यहाँ भरापूरा बाजार लगा है। अनाचार की यही वाले जाने। पाण्डेयपुर में मुख्य चौराहे पर प्रेमचन्द की मूर्ति लगी हुई है, और उसके चारों तरफ उनके कथा साहित्य का शिलॉंकित चित्रण मिलता है। सर्कल की चारदीवारी के रूप में उनकी रचनाओं गोदान, बूढ़ी काकी, ईदगाह, दो बैलों की कथा, प्रेमाश्रम, सेवासदन, रंगभूमि को अंकित किया गया है। प्रेमचन्द बीच में मूर्ति के रूप स्थापित न जाने कब से निर्निमेष बदलते हुए पाण्डेयपुर को देखते आ रहे हैं। पाण्डेयपुर से ही आगे है लमही! ये अपेक्षाकृत छोटा गाँव है।”(4)

 

वाराणसी जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर वाराणसी-आजमगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर पांडेयपुर चौराहे से करीब पांच किलोमीटर का यह रास्ता पूरा होने पर जैसे ही गोदान के होरी-धनिया, पूस की रात के हलकू जैसे किरदारों के जनक मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही का प्रवेश द्वार आता है, उनकी छाप महसूस होने लगती है।

 

             प्रवेश द्वार के आसपास ही गरीब, किसान, गाय और मजदूर की मूर्तियाँ बनी हुई है, जिस पर प्रेमचन्द सदैव लिखते रहे। मजे की बात थी कि मूर्तियों के नीचे ही कुछ गरीब परिवार बैठे थे, जिनकी स्थिति में तब और आज में भी कोई परिवर्तन देखने को नहीं मिला। यहाँ मूर्तियों में एक क्रम है जिस में किसान और गाय के बाद महिला और मजदूर की मूर्तियाँ है, जिससे एक यात्रा समझी जा सकती है, किसान के गाय की लालसा लिए हुए मजदूर बन जाने की...कथा, जो उनके अंतिम उपन्यास गोदान(1936) का मुख्य कथानक रही।

बड़े गेट से भीतर की ओर अंदर प्रवेश किया है। लमही गांव अभी भी लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर है। राह चलते हुए उत्तरप्रदेश की संस्कृति के दर्शन भी होते चलते हैं। खुले में बिकता माँस, सड़क किनारे दाढ़ी और कटिंग बनाते नाई लोग...और शक्तिवर्धक दवाइयों के ठेले सड़क के किनारे लगे हुए हैं। लमही की ओर बढ़ता हुआ मैं उसी प्रकार से उत्साह में हूँ, जैसे कभी "ईदगाह" कहानी में हामिद और बाकी बच्चों ने मेले के लिए शहर जाते हुए अनुभव किया था। सड़क पर चलते हुए सामने से कार, मोटरसाइकिल और साईकल भी गुजरती दिखती है। हर तरह के वर्ग यहाँ मौजूद हैं। लमही में बाजार नहीं है, केवल आबादी है। यहाँ समय के साथ बदलते लमही को पक्के मकानों, खेतों में फार्म हाउसों में देखता हूँ तो फुस की बनी झोपड़ियों में प्रेमचन्द का लमही ढूंढने के प्रयास करता हूँ।

 

रास्ता पूछते पूछते हम प्रेमचन्द जी के निवास पर आ पहुँचते है। लमही में सफेद रंग की इमारत है, मुंशी प्रेमचंद स्मारक। बड़े मकान के पास स्थित खाली जमीन पर बनाया गया है, प्रेमचन्द स्मारक। बड़े फाटक से भीतर प्रवेश करने पर चिड़ियों की चहचहाहट से स्वागत होता है। दालान के बाद सामने एक छज्जा बनाकर नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा सन 1966 में प्रेमचंद जी की प्रतिमा स्थापित हुई है। पूरे स्मारक स्थल में कोई भी मौजूद नहीं है। मेरे आने के बाद एक दो व्यक्ति आये और घूमकर चले गए। प्रतिमा के पास बैठकर शांति से आँखे बन्दकर प्रेमचन्द जी को अपनी उपस्थिति की सूचना देता हूँ।

 

स्मारक में ही बनी इमारत में दो कक्ष है, जहाँ प्रेमचंद साहित्य रखा हुआ है। एक कक्ष में पुस्तकालय की स्थापना की गई है, जो खुला हुआ था। लेकिन यहाँ बैठकर पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं है। दीवार में बनी ताक में कुछ पुस्तकें भर दी गयी है, जिन में अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए गाइड थी। सच भी है, आज युवाओं के लिए पुस्तके पढ़ने का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना ही रह गया है।

 

प्रेमचन्द की कुछ रचनाओं के आधार पर यहाँ सामग्री भी पड़ी है, मसलन कहानी”गुल्ली डंडा" के गुल्ली और डंडा, कहानी ईदगाह वाला हामिद का चिमटा। अपनी कहानी गुल्ली डंडा में प्रेमचंद गुल्ली डंडा का कुछ यूं बखान करते हैं,”हमारे अंग्रेजीदा दोस्त माने या न माने, मैं तो यही कहूंगा कि गुल्ली डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली डंडा खेलते देखता हूँ तो जी लोट पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगु। न लान की जरुरत, न कोर्ट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से टहनी काट ली, गुल्ली बना ली और दो आदमी भी आ गए तो खेल शुरु हो गया। विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उनके सामान महंगे होते है। जब तक कम से कम एक सैकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाडियों में शुमार ही नहीं हो सकता। यहां गुल्ली डंडा है कि बिना हिर्र फिटकरी के चोखा रंग देता है।”

 

अब काल्पनिक कहानियों ने बचपन से हमारे मन को कुछ यूँ सच्चाई का अहसास करवाया है कि ये भी वास्तविक ही प्रतीत होते हैं। पास ही घर भी है, सफेदी में पुता हुआ। अभी हाल ही में इसका जीर्णोद्धार हुआ है। प्रेमचन्द का जन्म तो एक कच्चे घर में हुआ था। सफल होने के उपरांत वर्तमान मकान प्रेमचन्द द्वरा वाराणसी रहते हुए बनाया गया था। इसी घर में प्रेमचन्द होली-दीवाली जैसे अवसरों पर आकर रुकते थे। सामान्य अवसरों पर भी आने घर के बाहर बनी चबूतरी पर बैठे हुए खेत से आते जाते किसानों को देखते रहना उनका पसंदीदा काम रहा है।

 

अर्धांगिनी शिवरानी देवी द्वारा रचित उनकी जीवनी “प्रेमचन्द घर में” प्रेमचन्द के सफल होने के उपरांत लमही के जीवन का वर्णन कुछ यूँ किया गया है, “आप गांव में रहते तो अपने दरवाजे पर हमेशा झाड़ू लगाते कभी-कभी मैं उन्हें रोक देती। छोटे बच्चों को दरवाजे पर बैठाकर चार बजे शाम को उनके पास मिट्टी इकट्ठा कर देते, पत्तियां इकट्ठी कर देते सिकटा कट्ठा कर देते और लड़कों को खेलने के ढंग सिखाते उसके बाद जब गांव के काश्तकार इकट्ठा होते तो उनसे बातें करते,झगड़ा निपटाते। बच्चों से खेलते भी जाते कोई नए कायदे कानून बनते तो उन काश्तकारों को समझाते उन सबों के साथ तो वे बिल्कुल काश्तकार हो जाते थे उम्र की बड़ाई के लिहाज से जिसका जैसा संबंध होता सदा वैसा आदर देते चाहते थे गांव एक किला बन जाए उपन्यास के चित्रों की तरह सजीव कर देना चाहते थे काश्तकार की कमजोरी देख कर उनको बड़ा दुख होता(5)

 

पुत्र अमृत राय कृत की जीवनी “कलम का सिपाही” में प्रेमचन्द जी द्वारा दयानारायण निगम को लिखे एक पत्र में यहाँ का हाल कुछ यूँ बयान किया है, “गर्मी की कैफियत न पूछिए कहलाने को साहिबे मकान है और सोना की फड़क से मकान भी सारे गांव का माबूद है मगर रहने काबिल एक कमरा भी नहीं कोठे पर आग बरसती है।बैठा तो पसीना चोटी से एडी को। मौजे के कमरे सब गंदे(6) उल्लेखित दोनों जीवनियों में लमही का विस्तृत वर्णन किया गया है। लमही के मकान और लमही को हम इन दोनों जीवनियों के आरंभिक पृष्ठों की चित्रावली में भी देख सकते हैं। स्वयं प्रेमचन्द लमही के लम्हो को अपनी कई रचनाओं में अभिव्यक्त करते हैं। प्रेमचन्द इसी स्थान से जुड़ी हुई अपनी बचपन की कुछ यादों को भी साझा करते हैं।

 

प्रेमचन्द ने यद्यपि कोई आत्मकथा तो न लिखी, लेकिन अपनी कई रचनाओं में अपने बचपन की यादों को साझा करते हैं। प्रेमचन्द द्वारा अपने जीवन की अनेक घटनाओं को लिखकर बताया गया है, जिसे उनकी जीवनी”कलम का मजदूर" लिखने वाले मदन गोपाल ने अपनी अन्य पुस्तक अमर कथाकार : प्रेमचन्द में प्रेमचन्द की कहानी उनकी जुबानी से संकलित किया है। इसकी शुरूआत कुछ यूँ होती है, “मेरा जन्म संवत 1937 में हुआ। बाप का नाम मुंशी अजायबलाल, सबूनत मौजा, मढ़वा लमही मुत्तसिल पांडेयपुर बनारस। पिता डाकखाने में क्लर्क थे। मेरी बाल स्मृतियों में कजाकी एक न मिलने वाला व्यक्ति है। आज कितने ही साल गुजर गए लेकिन कजाकी की मूर्ति अभी तक आँखों के सामने नाच रही है। मैं उन दिनों अपने पिता के साथ आजमगढ़ की एक तहसील में था। कजाकी जाति का पासी था, बड़ा ही साहसी बड़ा ही जिंदादिल।”(7)

 

उनकी कहानी बड़े भाईसाहब में कनकौओं(पतंगों)का जो शौक छोटे भाई का बताया गया है, उस आनन्द के दौर से भी कभी धनपत राय गुजरे थे, "विनोद का एक और विशेष साधन पतंग उड़ाना था इसका भी धनपत राय का शौक था घर वालों की आंख बचाकर कनकौए उड़ाने में बहुत सारा समय व्यतीत होता मांझा देना,कन्ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए भी तैयारी होती विजय बहादुर के साथ मियां मैदान को जाते और पतंगों को देखते कल कौवा लूटने के लिए बेतहाशा दौड़ते आंखें आसमान की ओर होती और मन उस आकाश गामी पथिक की ओर"(8)

 

कहानी गुल्ली डण्डा भी एक ऐसी ही कहानी है, जिस में प्रेमचन्द अपने बाल सखा गया के साथ गुल्ली डण्डे के जरिये अपने खंडित अभिमान को व्यक्त करते हैं। प्रेमचन्द अपने बचपन में गुड़ के शौक को भी कुछ यूँ लिखते हैं, “मां बीमार रहती थी। सातवें साल गुजर चुकी थी। एक बड़ी बहन भी थी। मैं नवी क्लास में पढ़ता था। एक बार मेरे लिए पांच रुपए का गुड खरीदा गया बस सवेरे दूध के साथ, दोपहर को रोटी के साथ गुड, शाम को दानों के साथ गुड, रात को दूध के साथ फिर गुड़। यह तो वाज़िब खर्च था मगर मदरसे से बार-बार पानी पीने घर आना और एक दो टुकडे निकालकर खा लेना। गुड़ का ऐसा चस्का चढ़ गया था कि हर वक्त नशा सवार रहता।

 

बचपन सुहावना न रहा। प्रेमचन्द लिखते हैं, माता की मृत्यु के बाद पिता ने पुनः विवाह किया और मेरा भी करवा दिया। प्रेमचन्द लिखते हैं, “उस वक्त मेरे पिता शायद 20 रुपए पाते थे 40 रुपए तक पहुंचते पहुंचते उनका निधन हो गया। यूँ तो वह बड़े दूरदर्शी, दृढ़ और दुनिया में आँखे खोल कर चलने वाले आदमी थे, लेकिन आखिरी उम्र में एक ठोकर खाई गए और खुद तो गिरे ही उसी धक्के में मुझे भी गिरा दिया। पन्द्रह वर्ष की उम्र में उन्होंने मेरी शादी कर दी, जिसके कुछ वर्ष बाद ही वे स्वयं चलते बनें।उनकी पहली पत्नी कर्कशा थी, जिससे आये दिन उनकी विमाता के झगड़े हुआ करते थे। परिवार के क्लेश, पिता की मृत्यु से युवा कंधों पर असमय आया परिवार के भार से प्रेमचन्द नौकरी करने लगे। बाकी कार्यक्षेत्र वाराणसी ही रहा। उनके जीवन पर पढ़ी पुस्तके याद करते हुए विचरण करता हूँ। स्मारक में घूमते हुए यहाँ मैं पूरी तरह से अकेला हूँ। कोई भी कर्मचारी मौजूद नहीं। स्मारक अधीक्षक के कक्ष पर ताला है। अंदर भी कुछ ग्रन्थ दिखे है खिड़की से। बाहर प्रेमचन्द साहित्य से जुड़ी चित्रावली है, जो समय समय पर विविध आयोजनों से प्रतिभागियों से प्राप्त हुई थी। यहाँ उनके जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं और उनके द्वारा रचित कहानियों पर आधारित अनेक चित्र बने हुए हैं। नीचे रखी बुकशेल्फ में प्रेमचंद का कथा साहित्य एवं लमही पत्रिका के अनेक अंक सजे मिले। विजय राय द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका लमही का प्रकाशन लखनऊ से होता है जिसमें विभिन्न साहित्यिक एवं समसामयिक विषयों पर लेख पढ़े जा सकते हैं।

 

आज उनकी साहित्यिक धरोहर को स्मृति में बनाये रखने के लिए जीर्णोद्धार कर स्थापित हुआ है ये स्मारक और किये जाते रहे हैं ऐसे साहित्यिक प्रयास। कुल मिलाकर यही है, प्रेमचंद स्मारक! प्रेमचंद राजनीतिज्ञ होते और समाज को धर्म, जाति, भाषा के नाम पर खंडित करते तो शायद बड़ा भव्य स्मारक होता। इन्होंने तो समाज के दबे-कुचले वर्ग की पीड़ा को उभारा था तो इतना स्मारक बन गया, वो भी हम से साहित्यिक के लिए सांत्वना ही मानिए! आज के दौर में तो ये भी सम्भव नहीं हो पाता कि किसी साहित्यकार के लिए इस प्रकार से कोई स्मारक बन जाये और आम पाठक वहाँ मेरी ही तरह साहित्यिक पर्यटन करे। मेरे साहित्यिक पुरखे, चिंता न करना...इन भवनों के कारण तुम्हारे प्रति सम्मान नहीं है... हम सबका का सम्मान तो उन अमर कृतियों के लिए है, जो सदा प्रासंगिक रहेगी।

 

सन्दर्भ:

1. कविता ‘बनारस’: केदारनाथ सिंह, हिंदी समय ई-पत्रिका" https://bit.ly/3qzZYA1

2. रंगभूमि (1925) : प्रेमचन्द, सुमित्र प्रकाशन, इलाहाबाद 2016 पृ. 364

3. गोदान (1936) : प्रेमचन्द, राजपाल एन्ड संस 2015 पृ. 183

4. मानसरोवर (कहानी संग्रह) : प्रेमचन्द, राजपाल एन्ड संस (सन्दर्भित विविध कहानियों हेतु)

5. प्रेमचन्द घर में : शिवरानी देवी, सरस्वती प्रेस, बनारस 1944, पृ. 92

6. कलम का सिपाही : अमृत राय, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1962, पृ. 70

7. कलम का मजदूर : मदन गोपाल, राजकमल प्रकाशन 1965, पृ. 17

8. अमर कथाकार : प्रेमचन्द (विशिष्ट जीवनी) : मदन गोपाल, राजपाल एन्ड संस, 1981 पृ. 118

 

सूर्यप्रकाश पारीक, असिस्टेंट प्रोफेसर,

श्री शिवचरण माथुर राजकीय महाविद्यालय, माण्डलगढ़(भीलवाड़ा) सम्पर्क: 9828514918


 


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