शोध : बाघ और सुगना मुण्डा की बेटीः स्त्री चेतना / डॉ. विजय कुमार रंजन - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : बाघ और सुगना मुण्डा की बेटीः स्त्री चेतना / डॉ. विजय कुमार रंजन

                बाघ और सुगना मुण्डा की बेटीः स्त्री चेतना - डॉ. विजय कुमार रंजन



शोध-सार 

    आदिवासी साहित्य के उन्नयन में अनुज लुगुन ने बतौर युवा कवि अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। अनुज एक आदिवासी कवि होने के साथ-साथ उसके जीवन सरोकार से गहरे स्तर पर जुड़े हैं। यह एक लम्बी कविता है,जिसमें इतिहास लेखन की मुख्य परंपरा तथा पूँजीवादी विकास के माडल पर प्रश्न है। इस कविता में स्मृतियों एवं मौखिक परम्परा को लिखित परम्परा में विस्तृत किया गया है। यह कविता आदिवासियत एवं सहजीविता के पक्ष को उद्घाटित करते हुए, नव-साम्राज्यवादी विकास के खोखले माडल के समक्ष ‘यह धरती केवल मनुष्यों के लिए नहीं है’का विकल्प/चुनौती प्रस्तुत करती है। इस कविता में गंभीर चिंतन के कई सूत्र मौजूद हैं। कविता संघर्ष की परम्परा को भविष्योन्मुखी आधार प्रदान करती है। यह ‘भूमंडलीकरण’ एवं ‘एकध्रुवीय विश्व’का विरोध करती है।इस कविता का मुख्य उद्देश्य आदिवासी अस्मिता-अस्तित्व से जुड़े, आदिवासियत के जीवन राग, दर्शन तथा सहजीविता का सार्वभौमीकरण करना है।


बीज-शब्द : आदिवासी जीवन, आदिवासियत, सहजीविता, संघर्ष चेतना, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, कविता, अस्मिता, अस्तित्व, समाज।


मूल आलेख 

    ‘बाघ और सुगना मुंडा की बेटी’ समकालीन हिंदी कविता की बड़ी उपलब्धि है। ‘बिरसी’, ‘बाघ और सुगना मुंडा की बेटी’ कविता में कवि अनुज लुगुन की सृष्टि है। ‘बिरसी’ सुगना मुंडा की बेटी और बिरसा मुंडा की बहन के लिए प्रयुक्त काल्पनिक नाम है। बिरसी को रीडा हड़म मुंडाओं की पुरखा, हजारों वर्षों के श्रमशील विरासत की वारिस, हाशिए का रूपक स्वीकार करते हैं। कविता में नायिका (बिरसी) को अनुज नें प्रमुखता से केन्द्र में रखा है एवं नेतृत्व शक्ति से संपन्न भी किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आदिवासी समुदायों में स्त्रियां गैर बराबरी की शिकार न के बराबर हैं और आदिवासी समुदाय में स्त्रियों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जल, जंगल जमीन बचाने के आंदोलनों में महिलाओं की सहभागिता एवं नेतृत्व क्षमता प्रबल रूप से उभरती रही है।


    कविता की नायिका बिरसी, कवि की एक ऐसी सृष्टि है जिसे वह परिस्थितियों के सापेक्ष तैयार करता है। परम्परा से जोड़ते हुए वह उसे नव-साम्राज्यवादी, पूँजीवादी माडल के विरुद्ध अस्मिता-अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षशील बनाता है। कविता में एक तरफ वैश्वीकरण की खिलाफत है तो दूसरी तरफ वंचित अस्मिताओं का संघर्ष है। कवि सहजीविता का पक्षधर है, इसके आभाव में वह किसी भी तरह के अस्मिता को नहीं स्वीकारता। उसका मानना है कि सहजीवी ही वंचित अस्मिताओं का पक्षधर हो सकता है।वैश्वीकरण की शुरुआत के साथ ही आदिवासी संकट गंभीर हुए। आज के अस्मितामूलक विमर्श में आदिवासी स्वर एक साथ विरोध और संघर्ष दोनों ही परिस्थितियों का सामना कर रहा है। एक तरफ वह पूंजीवादी, नव-साम्राज्यवादी, बाजारवादी और भूमंडलीकरण की अप्राकृतिक नीतियों का खुलकर विरोध कर रहा है तो दूसरी तरफ अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्षरत भी है। पूंजीवादी मॉडल प्रकृति का संरक्षक नहीं हो सकता, वह इसकी मूल संरचना को विकृत करके ही आगे बढ़ सकता है। इसी मूल संरचना की हिफाजत आदिवासियों की अस्मिता-अस्तित्व से जुड़ी है। आदिवासी समाज की सहजीविता कभी भी इसकी संरचना और उससे जुड़े जीवन की बुनियादी जरूरतों को बेचने एवं नष्ट किए जाने का समर्थक नहीं है। ‘इसके प्रतिरोध में ही रेड इंडियंस को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा ‘सोंगबोगा’ की चिंता भी यही है। इसके प्रतिरोध में ही बिरसा आबा ने कहा था कि “जिन्हें विकास का मंदिर कहा जा रहा है वो आने वाले दिनों में आदिवासियों के लिए विनाश के कारण बनेंगे।” आज डोडे वैद्य की चिंता भी यही है। ‘बाघ और सुगना मुंडा की बेटी’ भी यही कहती है।’


    रीडा-बिरसी(सुगना मुंडा की बेटी)संवाद प्रमुख है। अनुज लुगुन उन लेखकों और कवियों की जमात में शामिल हैं, जो समय और समाज को बदलने को कृतसंकल्प हैं। वह मानते हैं कि मनुष्यों की दो दुनिया रही है- एक उपनिवेश बनाने पर यकीन करने वाली दुनिया और दूसरी सहजीवियों का संसार। वर्ण, वर्ग और लिंग उपनिवेशवादियों की उपज हैं। कविता में बिरसी के नेतृत्व और संघर्षशीलता के द्वारा स्त्री नेतृत्व को सामने लाने का कार्य किया है। उसके नेतृत्व में ही समान विचार वालों की सहभागिता के द्वारा नये सहजीवी समाज के निर्माण की परिकल्पना है।


    डोडे बिरसी से कहते हैं – हमारे गणतंत्र के आधार गीत हैं / गीत ही मंतर हैं / रोग निवारक प्रमुख औषधि हैं / गीतों का ह्रास गणंतत्र का ह्रास है / गीत रहित गणतंत्र प्रभुओं की व्यवस्था है / प्रभुताओं के खिलाफ / मैं तुम्हें मंतर दूंगा, गीत सौंपूंगा / वही होगा रोगों से मुक्ति का आधार।”1


    वह सहधर्मी, संघर्षशील, संगी की खोज का आहवान करती है साथ ही मदईत के आयोजन की बात करती है और आदमखोर बाघ के आहट की पहचान के लिए नृत्य का स्वभाव बदलने की भी चर्चा करती है। बिरसी अन्त में अपनी कुशल नेतृत्व(क्षमता)का परिचय देती है। बिरसी का संबोधन अत्यंत प्रभावशाली है –‘जाओ, जाओ हुकनू / जाओ, जाओ जोना / जितनी जाओ / बिधनी जाओ / सब जाओ लांघ कर / इतिहास की दीवारें / दर्शन की खाई / और सब पहाड़ों को... हो सहजीविता का सामूहिक गान।’


    बिरसी पुनः संबोधित करती है- “सुनो रे हे टिरूंग / सुनो रे हे असकल / तलवार चमकाते हुए / मशाल लिए हुए / कहां जा रहे हो? / जदुर के लिए जा रहे हो / करम के लिए जा रहे हो / लड़ने के लिए जा रहे हो / भिड़ने के लिए जा रहे हो / कहां जा रहे हो? / सुनो रे हे टिरूंग / सुनो रे हे असकल / संगी सगोतियों को / न्योता देते जाओ।”2


    ‘बाघ और सुगना मुण्ड की बेटी’ कविता के विश्लेषण से एक बात स्पष्ट है कि आदिवासी जीवन बहुत ही कठिन, श्रमसाध्य और संघर्षशील है। जीवन की सुरक्षा के लिए मुनष्य सदैव प्रकृति से संघर्ष करता रहता है। प्रकृति और मनुष्य का रागात्मक सम्बन्ध शाश्वत है। बात स्त्री जीवन की है तो यह स्पष्ट है कि स्त्री पुरूष की अधीनता में जीवन जीने के लिए बाध्य है, चाहे वह आदिवासी क्षेत्र की हो चाहे मैदानी क्षेत्र की हो। ‘बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी’ कविता में स्त्री के श्रम, संघर्ष, शोषण सब कुछ का चित्रण मिल जाता है। बाहरी तौर पर हम आदिवासी स्त्रियों के जिस रूप में देखते है इस कविता में उनके जीवन का रूप कुछ अलग ही मिलता है। उनके जीवन में दर्द है, पीड़ा है, घुटन है, छटपटाहट है और उसके बाहर निकलने की असीम इच्छा भी।


    समाज में स्त्री की स्थिति अब पहले से अधिक जटिल है। एक ओर स्त्री को अपेक्षित रखा जाता है तो दूसरी ओर उपेक्षित बनाकर रखा जाता है। सत्ता, समाज, सम्पत्ति पर उसका अधिकार है भी, और नहीं भी। न्याय की पोथियों में ये तीनों अधिकार स्त्री के नाम लिखें गए हैं, लेकिन यथार्थ पोथियों के बाहर पाया जाता है। न्याय दिलाने वाले से लेकर उसे एक ग्लास पानी पिलाने वाले भी दया और सहानुभूति के नाम पर लार टपकाने से नहीं चूकते हैं।”3


    ऐसी मान्यता है कि - जो भी जाति अपना इतिहास नहीं जानती वह कभी इतिहास नहीं रच सकती। ‘बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी’ कविता की नायिका बिरसी है। वह सुगना मुण्डा की बेटी है। बिरसी अपने समाज(आदिवासियों)पर हो रहे अत्याचार, शोषण, हमले आदि के बारे में जानना चाहती है। वह अत्याचारियों के बारे में जानकर उनसे मुकाबला करना चाहती है। बिरसी अपनी जड़ो से जुड़ी है, लेकिन बाहरी खतरों से अनजान है| वह भयभीत नहीं है उसे संघर्ष स्वीकार है। इसकी पुष्टि कविता के इस पंक्ति से होती है-    “ओह गोमके! / मुझे जल्दी बताओ / वह कौन है ? / कहा से आया था ? / मेरा खून मेरी आंखों से टपक रहा है / मेरा धनुष तन गया है / मुझे उसका पता चाहिए / मुझे उसका सही ठिकाना चाहिए.......।”4


    स्त्रियों का साहसी होना तभी संभव है जब उसके साथ बचपन से लेकर अंतिम समय तक स्त्री-पुरूष वाला भेद न हों। इस कविता की सबसे खूबसूरत बात यही है कि आदिवासियत के आधार पर इस समाज की स्त्रियाँ स्वतंत्र, स्वावलंबी और जुझारू हैं। कविता की नायिका बिरसी के व्यक्तित्व से यह स्पष्ट है। सुगना मुण्डा अपनी बेटियों को बेटों से अलग नहीं मानते। आदिवासी समाज में सहजीविता उसका मुख्य आधार है, जो किसी भी तरह की असमानता को प्रश्रय नहीं देती। उनकी बेटियाँ घूँघट के नीचे सहम कर जीवन नही जीती,  वे योद्धा एवं बलिदानी होती हैं-    “सुगना मुण्डा की बेटियाँ घूँघट के नीचे / सहम कर नही जीती हैं / वे तो फरसे और धनुष के साथ बलिदानी हैं / सुगना मुण्डा अपनी बेटियों को / बेटों से अलग नहीं करता है।”5


    ‘बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी’ कविता में आदिवासी समाज की त्रासदी के साथ स्त्री होने की पीड़ा भी दर्ज हुई है। संस्कृति,समाज,धर्म और पितृसत्ता की संरचना में स्त्री को ‘मूक’ बनाने की जो कोशिशे हुई, कविता में उसका प्रतिरोध है। इस संरचना में स्त्री की जाति एक होने पर भी परिस्थिति विशेष, उसकी आजीविका,  आर्थिक सबलता, शिक्षा और विभिन्न संस्कृतियों के कारण उनका यथार्थ भिन्न होता है। दलित और आदिवासी स्त्री का एका संभव नहीं उन्हें, साथ नही रखा जा सकता, दोनों की परिस्थितियां एक नहीं हैं। दलित तो समाज की मुख्य धारा के भीतर ही निचले पायदान पर खड़ा किया गया, जबकि आदिवासी वनवासी बना दिया गया और अब वनों तक में उसे सुरक्षित नहीं रहने दिया जा रहा है जबकि जल, जंगल, जमीन, उसकी पहचान है। आदिवासी स्त्रियां अपनी अस्मिता-अस्तित्व को लेकर संघर्षशील हैं -


    “मैं बेचैन हो उठी / मेरी अस्मिता क्या है / क्या मैं कौंड रेड्डी स्त्री नहीं हूँ / या, वह सम्भावित स्त्री हूँ / जिसकी हत्या उस चौराहे पर हुई है / उफ! ......यह द्वन्द मुझे हत्या या आत्महत्या के रास्ते पर ले जाएगा।”6


    आदिवासी अस्मिता की लड़ाई में आदिवासी महिलाएँ पुरूषों से पीछे नही रहीं। फूलों, मकी, सिनगी दई इसकी उदाहरण हैं। सिनगी दई ने मीर कासिम के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था। आदिवासी अस्मिता की रक्षा में स्त्रियाँ बराबर की भागीदार रही हैं। परंपरा में संघर्षशील स्त्रियों की जो छवियाँ इस कविता बार-बार इतिहास के पन्नों की तरह आती हैं, उनका संघर्ष कमतर नहीं है। इन्हीं वीरांगनाओं का रक्तबीज है ‘बिरसी’ लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में ‘बिरसी’ के समक्ष कठिन चुनौती है। कविता के पात्र रीडा, बिरसी को समझाते हैं कि वर्तमान चुनौती सिनगी दई के समय के चुनौती से अलग है-  

    “सुनो बिरसी! / यह इतना आसन नहीं है / समय के साथ कार्यवाई के तरीके भी / बदल जाते है और चुनौती भी / तुम्हारी चुनौती वही नहीं थी / जो सिनगी दई की थी।”7


    आदिवासी समाज हमेशा से बलात्कार मुक्त रहा है। जबसे तथाकथित सभ्य समाज का उद्घोष करने वाले महात्माओं का प्रवेश हुआ है, आदिवासी स्त्रियाँ असुरक्षित हुई हैं। श्रम के नाम पर आदिवासी स्त्रियों की अस्मिता को तार-तार किया जा रहा है। उनकी इच्छा, आकांक्षा और अरमानों का गला घोंटा जा रहा है। उन्हीं के घरों में ही घुसकर उनका बलत्कार किया जाता है। इसका जिक्र करते हुए ‘किसी से कहा नहीं हमने’ कविता में निर्मला जी लिखती हैं -

    “जिसने पहनाए नही वस्त्र कभी / निर्वसत्र किया वही बार-बार / बेआबरू हुए हम / अरमानों की बस्तियों में / थप्पड़ जड़ा तुमने कई बार / स्वीकार नहीं करने / से तुम्हारी बात / मेरे ही बिस्तर पर करते रहे रोज / कइयों का बलात्कार।”8


    स्त्रियों के बलात्कार को लेकर समाज में कम कपड़ो के कुतर्क को जस्टिफाई करने की लगातार दलीले दी जाती हैं। लेकिन अनुज लुगुन ‘बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी’ कविता में इस तर्क का खण्डन करते हुए बहुत ही आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि- आदिवासी समाज की भाषा में बलात्कार शब्द नहीं है, आकड़े भी इसी बात की पुष्टि करते हैं -

    “बलात्कार शब्द की व्युत्पत्ति / और किसी ने अपना पक्ष रखा है / कम कपड़े पहनने के बावजूद/  आदिवासी / समाज की भाषाओं में / उनका मूल शब्द बलात्कार नहीं है।”9


    आदिवासी विद्रोह में स्त्रियों के योगदान को हमे भूलना नहीं चाहिए। सिनगी दई जैसी वीर योद्धा मुगल सेना के साथ मैदान मे अकेले ही लड़ती हैं। ग्रेस कुजुर अपनी कविता के माध्यम से सिनगी दई को याद करते हुए उसकी अनुपस्थिति को व्यक्त करती हैं। आज आदिवासी कविताओं मे नवजागरण की भाँति स्त्री चेतना से युक्त आदिवासी समाज के आक्रोश एवं अस्तित्व-साकार के स्वर सुनाई देते हैं -    “अगर अब भी तुम्हारे हाथों की उंगलियाँ थरथराई तो जान लो / मैं बनूंगी एक बार और सिनगी दई।”10


    ‘बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी’ कविता की नायिका बिरसी अपने परिजनों की लाशें देखकर सिनगी दई बनने के लिए तैयार है-


    “ओह हड़म! / मैं और क्या कर सकती हूँ / जब मेरी ही आँखों के सामने / मेरे परिजनों को लाशें बिछी हैं, / क्या करना चाहिए मुझे? / कहाँ है वह............?”11


    आदिवासी स्त्री, पुरूष वर्ग से अपना समान अधिकार चाहती है। अधिकार की यह लड़ाई बहुत पुरानी है। वह बरसों से अपने होने का अर्थ ढूँढ रही है किन्तु उसे अभी तक वह अधिकार नहीं मिला है। पुरूष सत्ता ने हमेशा घुमा-फिरा कर उसके सवाल के जबाब दिए हैं। कहने को तो स्त्री को देवी का दर्जा दिया गया है लेकिन हकीकत कुछ और है। बिरसी लैंगिक भेद नहीं मानती है-    “यह क्या कह रहे है? / हम सुगना मुण्डा की बेटियाँ हैं / उनके बेटों के सामने बेटियाँ नहीं / उनके बेटों की संगी बेटियाँ / और आप यह ..........।”12


    स्त्री, पुरूष प्रधान समाज का शिकार रही है जिसमें उनकी अवधारणा इस रूप में स्पष्ट हो सकती है कि पुरूष के टिकने के लिए ‘स्त्री’ शायद ‘घर’ हो सकती है लेकिन ‘स्त्री’ का अपना ‘घर’ कहाँ? क्या उसका कोई ‘घर’ है भी? ‘निर्मला पुतुल अपने घर की तलाश’ शीर्षक कविता के माध्यम से इस प्रश्न की तलाश हुई स्त्री की पीड़ा को व्यक्त करती है-


    “अंदर समेटे पूरा का पूरा घर / मैं बिखरी हूँ पूरे घर में / पर यह घर मेरा नही / कहीं कोई घर नहीं होता मेरा / कहीं कोई घर नहीं होता मेरा / बल्कि मैं होती हूँ स्वयं एक घर / जहाँ रहते है लोग निर्लिप्त / गर्भ से लेकर बिस्तर के बीच / भागती! तलाश रही हूँ / सदिययों से निरंतर।”13


    निर्मला पुतुल की कविता ‘अपनी जमीन तलाशती बेचैन स्त्री’ में घर, प्रेम और जाति से बाहर खुद को तलाश रही है स्त्री। वह निरंतर उस जमीन की तालश कर रही है जो उसकी अपनी है। अभी तक उसको जो कुछ मिला है सब पुरूषों द्वारा किया गया एहसान मात्र है। वह सम्बन्धों की डोर से आबद्ध है। वह परतंत्र है स्वतंत्र नहीं। कभी पिता की हुकूमत है, कभी पति की और कभी बेटे की। वह हुकूमत दुनिया से अलग अपने अस्तित्व की खोज में है-    “अपनी कल्पना में हर रोज / एक ही समय में स्वयं को / हर बेचैन स्त्री तलाशती है / घर प्रेम और जाति से अलग / अपनी एक ऐसी जमीन / जो सिर्फ उसकी अपनी हो।”14


    अनुज लुगुन ‘बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी’ कविता मे पितृसत्ता को विषाणु बताते हुए इसे मुक्ति के राह में घातक मानते हैं -    “पितृसत्ता के विषाणु फैल रहे हैं हमारे बीच / जो घातक है मुक्ति की राह में.....?15


    आदिवासी मुण्डा समाज में लैंगिक भेद नहीं रहा है, लेकिन अब मातृसत्ता के अवशेष को धीरे-धीरे छीना जा रहा है। जिससे मातृसत्ता कमजोर पड़े और पितृसत्ता का विषाणु समाज में फैल सके। स्त्रियों के द्वारा जनहित के लिए उठाए गए कदम पर सबसे पहले उन्हीं लोगो के बीच से उंगली उठाया जाता है-    “तुम सही हो बिरसी / लैंगिक भेद पर / तुम्हारा यह आवेश / हमारी मातृसत्ता का ही अवशेष है / जो हर बार हर तरफ से छीना जा रहा है / नोच-नोच कर निगला जा रहा है इसे/  जनहित के लिए उठाए गये तुम्हारे कदम पर / सबसे पहले तुम्हारे लोगों के बीच से ही उँगली उठेगी ”16


    गैर आदिवासी समाज में सम्पत्ति, पु़रूष प्रधान है। लेकिन मुण्डा समाज में अगर किसी लड़की के माता-पिता की मृत्यु हो जाती है, तो उनके सम्पत्ति पर लड़की का ही हक होता है, किसी और का नही। पंचायत में भी यही निर्णय होता है-    “यह गलत है जैतू / मुण्डा बेटी को अपने माँ-पिता की / सम्पत्ति पर पूरा हक है / यह बच्ची जो चाहेगी / पड़हा का फैसला वही होगा”17


    पंचायत सम्पत्ति के हक का फैसला देते समय लड़कियों आगे रखते हैं। भले ही जमीन के कागज पर लड़की का नाम न हो, लेकिन बेटियों का मान रखते हुए सम्पत्ति का हकदार उन्हें ही मानते हैं। पंचायत कागज को इसलिए नहीं मानती की जो कम्पनी कागज बनाती है उसके यहाँ बेटियों का मान कुछ भी नही था-    “तुम जो बार-बार कागज/लहरा कर अपना दावा जता रहे हो वह ‘कम्पनी तेलेंगा’ लोगो का बनाया हुआ है / उनके लिए बेटियों का मान कुछ भी नहीं था / इसलिए उन्होंने कागज में नहीं लिखा अपनी बेटियों का नाम / जमीन और सम्पत्ति के हकदार बेटे ही बनाये जाते रहे / पड़हा उस कागज को नही मानती / जिस पर बेटियों का कोई हक उद्वृत नहीं है।”18


    आदिवासी मुण्डा समाज में स्त्रियों के विरूद्ध सत्ताओं का उदय घातक होता है। अगर कोई लड़की जिसके माता-पिता नहीं हैं। अविवाहित रहना चाहती है। तो उम्र भर वह सम्पत्ति की अधिकरिणी रहेगी। उसके मृत्यु के उपरान्त सब कुछ समाज मे हस्तान्तरित हो जायेगा। यह फैसला पंचायत का होता है-    “और यदि अविवाहित रहना चाहती है / तो उम्र भर वह सम्पत्ति की अधिकारिणी है / मृत्यु उपरानत सब कुछ समाज में हस्तान्तरित हो जायेगा अब बिटिया मुर्मु की कथा कही नही दोहरायी जायेगी / स्त्रियों के विरूद्ध सत्ताओं का उदय घातक है।”19


    अनुज लुगुन की कविता ‘बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी’ में बिरसी प्रेम करने वालों के लिए कोमल किन्तु दुश्मनों के लिए खतरनाक हो गई है। उनके दुश्मनों में भू-माफिया एवं उन्हें छेड़ने वाले पुरूष तो हैं ही वे पुरूष भी हैं जिन्होंने उन पर अत्याचार किया। मातृसत्ता से वंचित कर रखा। उन्हें घर की चौखट में कैद करके रखा। समाज तथा धर्म ग्रन्थों मे बराबरी का दर्जा नहीं दिया। आदिवासी स्त्री यह समझने लगी है कि लिंग पूजा ही क्यों की गई, योनि पूजा क्यों नहीं ? कन्या भू्रण हत्या करने वाले पुरूषों से वह अब मुकाबला कर सकती है क्योंकि वह स्वावलम्बी है- “मैं युवती की लाश पर झुकती हूँ / उसे गोद मे उठाती हूँ / लेकिन अरे यह क्या............? / यह तो कोई समकालीन पत्रिका है? / उसके आवरण पृष्ठ पर/एक गर्भवती स्त्री की नंगी तस्वीर छपी है / जिसके गर्भ में दो भू्रण हैं / एक में बच्चा है, दूसरे मे बच्ची है / बच्चे के सिरहाने पर ताजे फूल रखे हैं / और बच्ची के सिरहाने पर / सफेद कपड़ों से लिपटा एक ताबूत रखा है।”20


    अनुज लुगुन की कविता ‘बाघ और सुगुना मुण्डा की बेटी’ मुक्ति की आकांक्षा की एक बड़ी कविता है। ‘बाघ’ का सफल रूपक कवि ने गढ़ा है। एक बाघ, उसका सहजीवी है तो दूसरा, पूंजीवादी संरचना का साम्राज्यवादी बाघ है।अपने सहचर, सहजीवी बाघ और साम्राज्यवादी बाघ के बीच इस कविता की नायिका ‘बिरसी’ तमाम चुनौतियों के साथ संघर्षशील है। उसकी यह छवि कविता की एक मजबूत कड़ी है। यह कविता समाज का ध्यान आकृष्ट करने मे सफल है। कविता के माध्यम से आदिवासी स्त्रियों की जिन्दगी का सच अनुभूत किया जा सकता है।


निष्कर्ष –

   

     ‘बाघ और सुगना मुंडा की बेटी’ कविता आदिवासियत के बहुआयामी पक्ष को उद्घाटित करने में सफल है। आदिवासी जीवन के संकट और उसके उत्तरदाई कारणों की पहचान कविता का मजबूत पक्ष है। यह कविता अपने समय के अन्य कविताओं से अलग और सशक्त इसलिए है क्योंकि इसका विजन विस्तृत है। एक ही समय में यह कविता अपने अस्मिता-अस्तित्व के लिए संघर्षरत है तो साथ ही साथ वैश्विक पैमाने पर होने वाली राजनीति से भी बाखबर है। एक कवि के तौर पर अनुज लुगुन अपने दायरे को किसी विशेष क्षेत्र और वाद  में सीमित नहीं करते हैं। वे मौखिक परम्परा का दस्तावेजीकरण करते हैं, इसमें कल्पना, यथार्थ,और मिथक का अद्भुत समावेश है। ‘बाघ’ का प्रतीक और कविता की नायिका ‘बिरसी’ का रूपक कविता के सौन्दर्य में अभिवृद्धि करता है। 

 

सन्दर्भ

1. अनुज लुगुन, बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-71

2. अनुज लुगुन, बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-109

3. शरद सिंह, पिछले पन्ने की औरते, सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ0-26

4. अनुज लुगुन, बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-49

5. वही, पृ0-40

6. वही, पृ0-86

7. वही, पृ0-50

8. रमणिका गुप्ता, कलम को तीर होने दो, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-220

9. अनुज लुगुन, बाघ और सुगन मुण्डा की बेटी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-84

10. रमणिका गुप्ता, आदिवासी स्वर और नई शताब्दी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-23

11. अनुज लुगुन, बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-50

12. वही, पृ0-50

13. निर्मला पुतुल, नगाडे की तहर बजते शब्द, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, पृ0-50

14. निर्मला पुतुल, नगाडे की तहर बजते शब्द, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, पृ0-9

15. अनुज लुगुन, बाघ और सुगना मुण्डा की बेटी, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ0-52

16. वही, पृ0-51

17. वही, पृ0-93

18. वही, पृ0-93

19. वही, पृ0-94

20. वही, पृ0-84


डॉ. विजय कुमार रंजन
असिस्टेंट प्रोफेसर
हिन्दी, विभाग, म.गां. काशीविद्यापीठ, वाराणसी
9473705270, VIJAYRANJAN.BHU@GMAIL.COM

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue

'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' 

( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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