शोध : मुक्तिबोधीय फैंटेसी, स्वप्न-कार्य की तकनीक तथा मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्न / अनूप बाली - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : मुक्तिबोधीय फैंटेसी, स्वप्न-कार्य की तकनीक तथा मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्न / अनूप बाली

       मुक्तिबोधीय फैंटेसी, स्वप्न-कार्य की तकनीक तथा मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्न / अनूप बाली 

      

शोध-सार -

    मुक्तिबोध स्वप्न की महत्ता को केवल रचनात्मक साहित्य में ही उजागर नहीं करते बल्कि वे सपनों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तक जाने की भी कोशिश करते हैं। प्रस्तुत प्रपत्र का उद्देश्य मुक्तिबोधीय फैंटेसी में स्वप्न-तकनीक के इसी वैशिष्ट्य को उजागर करना है। इस प्रक्रिया में एक ओर जहाँ मुक्तिबोधीय फैंटेसी में स्वप्न-कार्य की तकनीक को समझने की कोशिश रहेगी तो दूसरी ओर स्वयं मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्नों (anxiety dreams) के संदर्भ में उनकी फैंटेसिक रचनाओं पर विचार किया जाएगा। इस दिशा में यह आलेख तीन भागों में विभाजित है। पहले भाग में मुक्तिबोधीय फैंटेसी और स्वप्न-कार्य की तकनीक पर बात होगी। दूसरे भाग में मुक्तिबोध के उन दो व्यग्रता स्वप्नों पर बात होगी जो उनके अनुसार उन्हें जीवन भर आते रहे। तीसरा तथा अंतिम भाग मुक्तिबोध की फैंटेसिक रचनाओं के संदर्भ में स्वप्न-कार्य की तकनीक तथा मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्नों से संबंधों पर विचार करेगा।

 

बीज-शब्द - मुक्तिबोधीय फैंटेसी; स्वप्न-कार्य; प्रच्छन्न स्वप्न विचार; स्वप्न द्वारा निरूपित वस्तु-तत्त्व; स्थानांतरण; संघनन; वास्तविक; आत्म के मणि-रत्न; स्लावोज ज़िज़ेक; जैक लकां।

 

मूल आलेख -


    फैंटेसी की साहित्यिक विधा यथार्थ से पोषित हुए यथार्थ का अतिक्रमण करती है। यथार्थ का यह अतिक्रमण यथास्थिति के रूप में यथार्थ का नकार है। कला अनुभविक-यथार्थ से उत्पन्न होती है किंतु उसका अपना यथार्थ उस अनुभव से स्वायत्त होता कि जिससे वह उत्पन्न होती है। आनुभविक या सामाजिक यथार्थ के निषेध द्वारा कला अपने स्वायत्त अस्तित्व को स्थापित करती है। सौंदर्य-शास्त्र पर केंद्रित अपने ग्रंथ ऐस्थेटिक थियरी में जर्मन दार्शनिक थियोडोर डबल्यू. अडोर्नो इस बात को बखूबी पहचानते हैं[1]। वे रेखांकित करते हैं कि आनुभविक विश्व की अस्वीकृति के अपने गुण द्वारा कला यथार्थ की प्राथमिकता को प्रतिबंधित करती है। यह कला का यथार्थ से पलायन नहीं बल्कि उसके आंतरिक नियम हैं जिसके द्वारा कला यथास्थिति को प्रश्नांकित करती है[2]। अपने उद्गम के अनुभव को प्रतीकात्मक रूप से प्रकट करने के लिए साहित्यिक प्रयास अपने आनुभविक उद्गम से आगे बढ़ने का उद्यम करता है। इस अर्थ में ही वह यथार्थ के वास्तविक की संभावनाओं को सामने ला सकता है। कला में यथार्थ के वास्तविक की संभावनाओं का प्रतीकात्मक चित्रण साहित्यिक प्रक्रिया (रचना-प्रक्रिया) के गतिमय पथ तथा इस पथ की यात्रा पर निर्भर करता है जोकि समावेशी रूप से कलाकृति की रूपरेखा को आकार देते हैं। अत: यहाँ इस बात को रेखांकित करना ज़रूरी है कि आनुभविक से तटस्थता कलाकृति के आविर्भाव की पूर्व-शर्त है। इस तटस्थता की कार्यात्मकता साहित्यिक कृति के रूप द्वारा चिह्नित होती है तथा कार्यात्मकता और उसका परिपथ उस रूप के तत्त्व को प्रकट करते हैं। रूप और तत्त्व के यह गतिमय तथा एकात्मक संबंध ही कला की आंतरिक तकनीक का चिह्नांकन करते हैं कि जिसके द्वारा कला अपने मौलिक अस्तित्व को धारण करती है1। कला की इसी आंतरिक गतिमयता को रेखांकित करते हुए अडोर्नो लिखते हैं:


 कला को केवल उसकी गति के नियमों के द्वारा ही समझा जा सकता है, न कि अपरिवर्तनीयता के किसी सेट के अनुसार। वह इस संबंध द्वारा परिभाषित होती है कि वह क्या नहीं है। कला में विशिष्ट रूप से कलात्मक उसके अन्य से ही मूर्त रूप से व्युत्पन्न होता है; यह अकेले द्वंद्वात्मक भौतिकवादी सौंदर्य की मांगों को पूरा करेगा। कला की विशिष्टता की आवश्यकता उससे अलग होने के द्वारा होती है कि जिससे वह विकसित हुई है; उसकी गति के नियम उसके रूप के नियम हैं। ... कलाकृतियों में जो उनकी अपनी नियमसंगतता (lawfulness) प्रकट होती है वह उनके आंतरिक-तकनीकी क्रमिक विकास का परिपक्व उत्पाद है। ... कलाकृतियाँ केवल अपने उद्गम के निषेध द्वारा ही कलाकृति हो पाती हैं[3]। (स्वानुवाद)


    उपरोक्त विवेचन के आलोक में देखा जाए तो फैंटेसी की साहित्यिक विधा यथार्थ की तार्किकता के निरीक्षण के क्रम में उसमें अंतर्निहित अतार्किकता (irrationality) को खोल देती है। मुक्तिबोधीय फैंटेसी में अंतर्निहित इसी तर्कातीत प्रवृत्ति को परमानंद श्रीवास्तव बख़ूबी पहचानते हैं। इस ओर संकेत करते हुए वे लिखते हैं, “इस काव्य-संसार में अक्सर चीज़ें नियमों के बाहर तर्कातीत रूपों में घटित होती हैं और नकारात्मक निषेधमूलक संवाद-युक्तियाँ एक ही काव्य-प्रक्रिया में अथवा एक ही नाटकीय संरचना में गुंथी हुई जान पड़ती हैं[4]।” इस तरह कहा जा सकता है कि फैंटेसी में अंतर्निहित तार्किकता यथार्थ की अतार्किकता को उजागर करती है। अत: फैंटेसी की साहित्यिक विधा की तार्किकता में उसके अपने नियम-क़ानून होते हैं। अपने लेख कहानी और फैंटेसी में काफ्का की कहानी मेटामोर्फोसिस के संदर्भ में नामवर सिंह इस ओर ध्यान दिलाते हैं[5]मुक्तिबोधीय फैंटेसी का यह वैशिष्ट्य है कि यथार्थ के दमित और उपेक्षित आयामों को उजागर करने के लिए इस शिल्प के अपने विशिष्ट नियम-क़ानूनों की सहायता से वह तर्क से परे चली जाती है। फैंटेसी की साहित्यिक विधा में स्वप्न-कथा के शिल्प का ऐसा ही वैशिष्ट्य है। नामवर सिंह मुक्तिबोधीय फैंटेसी में स्वप्न-कथा के शिल्प की तर्कातीत प्रवृत्ति और उसके वैशिष्ट्य को गहरे से उजागर करते हैं। अँधेरे में कविता पर केंद्रित अपने एक निबंध में वे लिखते हैं:


 हिंदी में कविता के अंतर्गत फैंटेसी के उपयोग के लिए मुक्तिबोध विख्यात हैं, किंतु इस उपयोग की कलात्मक सार्थकता पर बहुत कम विचार किया गया है। स्वयं मुक्तिबोध फैंटेसी शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में करते थे। उनके लिए कामायनी भी एक तरह की फैंटेसी थी। इस प्रकार स्वप्न-कथा फैंटेसी का एक प्रकार मात्र है। मुक्तिबोध की दृष्टि में कविता के अंतर्गत फैंटेसी के प्रयोग की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि लेखक वास्तविकता के प्रदीर्घ चित्रण से बच जाता है। कहना न होगा कि स्वप्न-शैली में कथा कहने के कारण अँधेरे में कविता में काफी मितव्ययिता और सघनता आ गई है तथा वर्णन के अनावश्यक विस्तार से अपने-आप ही निजात मिल गई। स्वप्न-शैली के कारण एक और कथा अनिवार्यत: चित्रात्मक हो गई तो दूसरी ओर एक से अधिक कथाओं के क्रमबद्ध संयोजन से भी लाघव आ गया, क्योंकि स्वप्न-क्रम प्रकृत्या अतार्किक और विषयाधर्मी होता है। स्वप्न-शैली के साथ एक सुविधा यह भी है कि आवश्यतानुसार देश और काल की दृष्टि से नितांत असंबद्ध तथा दूर की वस्तुओं को एकत्रित रखा जा सकता है[6]। (स्वारेखांकन)

हालाँकि सिंह की यह टिप्पणी विशेष रूप से अँधेरे में पर केंद्रित है, लेकिन मुक्तिबोधीय फैंटेसी में स्वप्न-कार्य की तकनीक के संदर्भ में इस विचार की व्यापक प्रासंगिकता है।

     

    यह सुविदित है कि मुक्तिबोध अपनी फैंटेसिक कविताओं में स्वप्न-कथा का भरपूर प्रयोग करते हैं। जहाँ स्वप्न-कथा खुले तौर पर नहीं भी है वहाँ भी मुक्तिबोध स्वप्न-कथा की तकनीक को बखूबी प्रयोग में लाते हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि उनकी एक कविता का शीर्षक ही एक स्वप्न-कथा है। इन्हीं तथ्यों के संदर्भ में रामविलास शर्मा की मुक्तिबोध पर केंद्रित इस टिप्पणी पर विचार तथा विश्लेषण करना सार्थक हो सकता है कि “स्वप्न उनके मन की सहज वृत्ति है। यथार्थ को स्वप्न चित्रों में बदले बिना वह मानों उसे समझ ही नहीं सकते[7]।” मुक्तिबोध स्वप्न की महत्ता को केवल रचनात्मक साहित्य में ही उजागर नहीं करते बल्कि वे सपनों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तक जाने की भी कोशिश करते हैं। प्रस्तुत शोध-आलेख में हमारी कोशिश मुक्तिबोधीय फैंटेसी में स्वप्न-तकनीक के वैशिष्ट्य को उजागर करना है। इस प्रक्रिया में एक ओर जहाँ मुक्तिबोधीय फैंटेसी में स्वप्न-कार्य की तकनीक को समझने से कोशिश रहेगी तो दूसरी ओर स्वयं मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्नों (anxiety dreams) के संदर्भ में उनकी फैंटेसिक रचनाओं पर विचार किया जाएगा।


    इस दिशा में यह आलेख तीन भागों में विभाजित है। पहले भाग में मुक्तिबोधीय फैंटेसी और स्वप्न-कार्य की तकनीक पर बात होगी। दूसरे भाग में मुक्तिबोध के उन दो व्यग्रता स्वप्नों पर बात होगी जो उनके अनुसार उन्हें जीवन भर आते रहे। तीसरा तथा अंतिम भाग मुक्तिबोध की फैंटेसिक रचनाओं में स्वप्न-कार्य की तकनीक तथा मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्नों से संबंधों पर विचार करेगा।

 

मुक्तिबोधीय फैंटेसी और स्वप्न-कार्य की तकनीक -

 

मुक्तिबोधीय फैंटेसी के लिए स्वप्न-कथा की तकनीक एक आवश्यक औज़ार है। स्वप्न-कथा की तकनीक से मुक्तिबोध कविता में उलट-पुलटपन का निर्वहन करते हैं[8]। इस उलट-पुलटपन के माध्यम से वे दो नितांत विरोधी या अनजान चीज़ों या परिस्थितियों को जोड़ देते हैं। फैंटेसी में इस विरोधी या अनजान चीज़ों या परिस्थितियों के समन्वयन का एक प्रतीकात्मक अर्थ होता है। यही प्रतीकात्मक अर्थ फैंटेसी के यथार्थ का सृजन करता है। फैंटेसी का यथार्थ, यथार्थ की भाषा को प्रयोग में लाते हुए भी प्रति-यथार्थ होता है। स्वप्न-कथा इसी प्रति-यथार्थ का चित्रण है। स्वप्न-कथा की तकनीक इसके लिए नितांत विरोधी या अनजान पक्षों का पुनर्संयोजन करती है। निश्चित रूप से इसी कारण साहित्यिक फैंटेसी और स्वप्न तुलनीय हैं। इसी ओर संकेत करते हुए रोज़मेरी जैक्सन लिखती हैं:


 स्वप्न की तरह साहित्यिक फैंटेसी – जिसकी की स्वप्न से कई समानताएँ हैं – कई अवयवों के पुनर्संयोजन से निर्मित होती है तथा अनिवार्य रूप से लेखक/स्वप्नदर्शी को उपलब्ध उन अंगभूत/विधायक अवयवों के अनुक्रम से निर्धारित होती है। फ्रॉयड लिखते हैं,रचनात्मक कल्पना वाकई कुछ गढ़ने में अत्यंत अक्षम होती है; वह केवल एक दूसरे से अपरिचित घटकों को मात्र संयोजित ही कर सकती है। पुन: मानसिक जीवन में कुछ भी मनमाना तथा अनिर्णीत नहीं होता। फैंटेसी का संबंध किसी एक अन्य गैर-मानवीय जगत् को गढ़ने से नहीं है; यह लोकोत्तर नहीं है। इसका संबंध इसी जगत् के अवयवों को उलट देने से है, इसके अंगभूत वैशिष्ट्यों के पुनर्संयोजन को नए संबंधों में कुछ विचित्र, अपरिचित तथा प्रकटत: नए के उत्पादन से है जोकि नितांत अन्य तथा भिन्न है[9] (स्वानुवाद)


     अत: यहाँ स्वप्न-कार्य की तकनीक पर विचार करना ज़रूरी लगता है। स्वप्न दमित इच्छाओं का रूपांकन तथा अवचेतन की गतिमय इच्छा-मशीन का निरूपण है। विख्यात मनोविश्लेषक सिगमंड फ्रॉयड ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक द इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स में स्वप्नों के मनोविज्ञान का विशद विश्लेषण किया है। फ्रॉयड के लिए स्वप्न में स्वप्न-कार्य (Dream-work) की केंद्रीय और निर्णायक भूमिका होती है। स्वप्न-कार्य के विशद विश्लेषण के द्वारा ही स्वप्न के प्रच्छन्न सार तक पहुँच बनायी जा सकती है। इस दिशा में, स्लावोज ज़िज़ेक के अनुसार स्वप्न के रूप के पीछे छिपे वस्तु-तत्त्व तक पहुँच बनाने के पूर्णत: जड़ीभूत आकर्षण को त्यागना ज़रूरी है[10]। अत: उनके अनुसार विश्लेषण द्वारा स्वप्न के रहस्य को उजागर करना रूप के पीछे छिपे वस्तु-तत्त्व को उजागर करना नहीं है बल्कि ठीक इससे उलट इसी रूप के रहस्य को उजागर करना है। इस तरह स्वप्न की वास्तविक वस्तु रूप है न की उसकी अंतर्वस्तु। वही रूप जोकि अचेतन इच्छा की संतुष्टि का आलंबन करता है[11]। फ्रॉयड बताते हैं कि जैसा की सोचा जाता है जागृत की तुलना में स्वप्न-कार्य महज़ अधिक लापरवाह, अतार्किक, भुलक्कड़ तथा अपूर्ण नहीं होता। वह जागृत से गुणात्मक रूप से पूर्णत: अलग होता है तथा इसी कारण से वह तत्कालिक रूप से जागृत से तुलनीय नहीं है। वह किसी भी तरह से सोच-विचार, हिसाब-किताब या निर्णय नहीं करता। वह अपने आप को चीज़ों को नया रूप देने तक सीमित रखता है[12]अत: चीज़ों को रूप देने की इस प्रक्रिया में ज़िज़ेक सबसे पहले यही सवाल उठाते हैं कि प्रच्छन्न स्वप्न-विचार (Latent dream-thought) स्वप्न का रूप धारण ही क्यों करते हैं? उनके लिए स्वप्न-विश्लेषण की प्रक्रिया में इस बात को सामने लाना ज़रूरी है कि प्रच्छन्न स्वप्न-विचार स्वप्न द्वारा निरूपित वस्तु-तत्त्व (Manifest content of dream) में ही क्यों प्रकट होता है[13]? अर्थात ज़िज़ेक के लिए इस बात को रेखांकित करना ज़रूरी है कि स्वप्न के वस्तु-तत्त्व का निरूपण किस रूप में हो रहा है? अत: स्वप्न का रूप सीधे प्रच्छन्न स्वप्न-विचार द्वारा संघटित नहीं होता बल्कि यह स्वप्न-कार्य ही है जोकि प्रच्छन्न स्वप्न-विचार को किसी रूप में प्रकट करता है। इस तरह, ज़िज़ेक के लिए स्वप्न की संरचना तीन स्तरों पर कार्य करती है। वे लिखते हैं:

 

यह संरचना सदा त्रिपक्षीय होती है; यहाँ पर हमेशा तीन घटक कार्य में लगे होते हैं: निरूपित स्वप्न-टेक्स्ट, प्रच्छन्न स्वप्न-तत्त्व या विचार तथा अवचेतन इच्छा जोकि स्वप्न में अभिव्यक्त होती है। यह इच्छा अपने आप को स्वप्न से नत्थी कर देती है, यह प्रच्छन्न विचार तथा निरूपित टेक्स्ट के अंतराल में अपने को अंतर्विष्ट करती है; अत:  यह प्रच्छन्न विचार के संबंध में अधिक अप्रकट, गहन नहीं होती, यह निश्चित रूप से अधिकतर सतह पर ही पूरी तरह संकेतकों की उस प्रक्रिया से बनी होती है जिसके समक्ष प्रच्छन्न विचार समर्पित होता है। दूसरे शब्दों में, इसका एकमात्र स्थान स्वप्नके रूप में है: स्वप्न की वास्तविक विषय-वस्तु (अवचेतन इच्छा) स्वप्न-कार्य में अपने प्रच्छन्न तत्त्व को विस्तार देते हुए अभिव्यक्त होती है[14](स्वानुवाद)


 यहाँ सवाल उठता है कि इस स्वप्न-कार्य अर्थात प्रच्छन्न वस्तु-तत्त्व का विस्तारित होना क्या है? फ्रॉयड बताते हैं कि इस स्वप्न-कार्य में ही प्रच्छन्न स्वप्न-विचार की अवचेतन इच्छा स्थानांतरण (displacement) और संघनन (condensation) की गतिमय प्रक्रिया द्वारा अपने को ढका और छिपा लेती है। अत: इस ढकाव और छिपाव की प्रक्रिया में स्वप्न के रूप में यह दमित अवचेतन इच्छा एक विशेष रूप में उत्सर्जित होती है। यह विशेष रूप से उत्सर्जित होना दरअसल अवचेतन इच्छा का आच्छद (mask) होना है। इस बारे में टोम्सिक लिखते हैं, “पूर्वचेतन सामग्री के रूपांतरण में प्रकटन या प्रतीयमान (appreance) का उत्पादन शामिल है जोकि मात्र इच्छा की संतुष्टि का ही कारण नहीं बनता बल्कि इच्छा को एक चाह में वस्तुत: आच्छद करता है। सारभूत रूप से स्वप्न-कार्य आच्छदन की इन परिस्थितियों को बनाने में शामिल है, जोकि अन्य संतुष्टि को तुष्टि में, विनिमय-मूल्य को उपयोग-मूल्य में तथा अंतत: आनंदातिरेक (Jouissance) को भी आनंद में कूटबद्ध (codify) करता है। स्वप्न चाह की तुष्टि है इसलिए एक मासूम कथन के अलावा कुछ भी नहीं है[15]।” (स्वानुवाद)

      

    स्वप्न और फैंटेसिक रूप की तुलना इस कारण भी सहायक हो सकती है क्योंकि फैंटेसी में भी बल एक घटना से दूसरी घटना में स्थानांतरित हो जाता है। इस प्रक्रिया में फैंटेसिक अस्वीकार्य स्थिति को स्वीकार्य में बदलता है[16]। फैंटेसिक बिंब में अनेकों बिंबों और उनकी विशेषताओं का समावेश प्रतीक-रूप में होता है। इस तरह फैंटेसी में भी स्वप्न की तरह या तो एक ही वस्तु तीन या चार भागों में विभक्त हो जाती है या फिर तीन-चार वस्तुएँ एक ही वस्तु में संघनित हो जाती हैं। इस तरह स्वप्न की ही तरह फैंटेसी में भी वस्तुओं का आपसी स्थानांतरण और संघनन चलता है। एम. श्याम राव फैंटेसी शैली और स्वप्न-कार्य की समानता की ओर ध्यान दिलाते हुए लिखते हैं, “फंतासी शैली में कवि मुख्य रूप से बिंबों की श्रृंखला का ही निर्माण करता है और इन बिंबों में विभाजन, संघनन, प्रतीकात्मकता और कायांतरण आदि स्वप्न की प्रक्रियाओं से ही संभव होता है[17]।” वरिष्ठ कवि राजेश जोशी स्वप्न की व्यक्त और अव्यक्त अंतर्वस्तु के संदर्भ में मुक्तिबोधीय फैंटेसी की विशेषता को रेखांकित करते हैं। वे लिखते हैं, “व्यक्त अंतर्वस्तु बिंबात्मक फैंटेसी होती है, अव्यक्त अंतर्वस्तु भावात्मक यथार्थ होता है। मुक्तिबोध की फैंटेसी में भी दृश्य और अदृश्य, व्यक्त और अव्यक्त का खेल निरंतर चलता रहता है[18]।” व्यक्त और अव्यक्त के इन संबंधों को मलयज प्रस्तुत और अप्रस्तुत के रूप में सामने लाते हैं। मुक्तिबोधीय फैंटेसी में प्रतीक और बिंब विधान की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को समझने के लिहाज़ से मलयज के इस अवलोकन को देखना सार्थक हो सकता है। “मुक्तिबोध की रचना में तथ्य-जीवन और भाव-जीवन के रोल भी आपस में कभी-कभी बदल जाते हैं। उनकी कविता में प्रस्तुत; अप्रस्तुत की तरह आचरण करने लगता है और अप्रस्तुत, प्रस्तुत की तरह। जब प्रस्तुत, अप्रस्तुत बनता है तब प्रतीक की रचना होती है, जब अप्रस्तुत, प्रस्तुत बनता है तब बिंब की[19]।” विश्लेषण का काम प्रस्तुत में मौजूद अप्रस्तुत और अप्रस्तुत में मौजूद प्रस्तुत को खोलते जाना है। स्वप्न का विश्लेषण भी स्वप्न-कार्य के संदर्भ में व्यक्त अंतर्वस्तु और अव्यक्त प्रच्छन्न स्वप्न विचार के निरंतर खेल को खोलना है। इस दिशा में, विश्लेषण का उद्देश्य स्वप्न के निरूपित वस्तु-तत्त्व से स्वप्न-कार्य में स्थानांतरण और संघनन की प्रक्रिया द्वारा प्रच्छन्न स्वप्न-विचार और अंतत: स्वप्न में उत्सर्जित अवचेतन इच्छा को सामने लाना है। एंड्रू स्लेड इस प्रक्रिया का सार-गर्भित वर्णन करते हैं। वे लिखते हैं:


    सभी स्वप्न निरूपित तत्त्व – स्वप्न का चेतन प्रतिनिधि – से बने होते हैं तथा यह निरूपित तत्त्व प्रच्छन्न स्वप्न विचार को छिपाता है। प्रच्छन्न स्वप्न विचार वह इच्छा है जोकि स्वप्न को प्रोत्साहित करती है: स्वप्न के मूल में यही इच्छा है। स्वप्न संघनन और स्थानांतरण की प्रक्रिया में गतिमय ढंग से बनते है। प्रच्छन्न स्वप्न विचार प्राय: इतने आवेशित होते हैं कि बिना आवृत हुए वह चेतन विचार के लिए स्वीकार्य नहीं होते। स्वप्न-प्रक्रिया इन आवेशित विचारों को एक वस्तु से विस्थापित करते हुए दूसरी कम आवेशित वस्तु से प्रस्थापित करती है। संघनन में, आवेशित प्रच्छन्न विचार अन्य वस्तुओं के साथ संयुक्त होकर एक समग्र बनाता है, जो कि अपने आप में, सौम्य है। इस तरह स्वप्नों की व्याख्या का कार्य स्वप्न के निरूपित तत्त्व में स्वप्न-विचारों के संघनन और स्थानांतरण के कार्य की ट्रैकिंग के द्वारा स्वप्न के निरूपित तत्त्व में से प्रच्छन्न स्वप्न विचार को उधेड़ना है[20]।  (स्वानुवाद)

 

मुक्तिबोध के व्यग्रता-स्वप्न -

     

    मुक्तिबोधीय फैंटेसी का कच्चा माल केवल उनके युग का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक संदर्भ ही नहीं है बल्कि मुक्तिबोध इससे आगे बढ़ते हुए अपने निर्माणात्मक काल अर्थात बाल्य काल के सपनों का भी विश्लेषण करते हैं। इन सपनों की मुक्तिबोधीय साहित्य में अहम और निर्णायक भूमिका है। यह दर्शाता है कि मुक्तिबोध केवल रात में देखे हुए सपनों का ही काव्यानुवाद नहीं करते बल्कि स्वप्न के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा अवचेतन के गहन रहस्यों को उजागर करते हैं। मुक्तिबोध यहीं नहीं ठहरते बल्कि अपनी कवि-कर्म में अवचेतन की इस गतिमय प्रक्रिया को पूंजीवादी समाज के व्यापक परिप्रेक्ष्य में संदर्भित करते हैं। कुछ और डायरी के सातवें सेक्शन में मुक्तिबोध ऐसे दो स्वप्नों का ज़िक्र करते हैं। पहले सपने को प्रस्तुत करते हुए वे लिखते हैं:


    एक तस्वीर तैर गई। मकान की दूसरी मंज़िल पर मैं भागता आ रहा हूँ। कोई मेरा पीछा कर रहा है। कोई कौन? मैं नहीं जानता। क्यों? यह भी नहीं जानता। वह मुझे पकड़ने की कोशिश कर रहा है। मैं उसके दस क़दम आगे हूँ। वह मेरे पीछे है। मैं भाग रहा हूँ। वह मेरा पीछा कर रहा है। लेकिन मैं अपने पैरों पर भार का अनुभव कर रहा हूँ। लगता है जैसे पीछे किसी खिंचाव की ताकत है, कोई चुंबक है जो पैरों को पीछे खींच रहा है, लगातार पीछे खींचे जा रहा है, फिर भी मैं भागने की कोशिश में आगे बढ़ता रहा हूँ। लेकिन हर क़दम पर पैर आगे बढ़ने से इनकार कर रहे हैं, कोई शक्ति उन्हें पीछे खींच रही है। यदि मैं रुका या पीछे हटा तो वह आदमी (या जिन्न या भूत, पता नहीं कौन है!) मुझे पकड़ लेगा, शायद वह खा जाए। इसीलिए मैं जान बचाकर भाग रहा हूँ, इसलिए कि मुझे प्राणों का डर है, लेकिन मैं ज़्यादा बढ़ नहीं पा रहा हूँ... पैरों में भार है, किसी दानवी आकर्षण-शक्ति की ज़ंजीर मुझे पीछे खींच रही है[21]


    यह ध्यातव्य हो कि मुक्तिबोध रेखांकित करते हैं कि इस तरह भागने के स्वप्न उन्हें जीवन के अड़तीस सालों तक आते रहे हैं[22]। इस सवाल पर गौर करना सार्थक हो सकता है कि क्या अँधेरे में कविता की यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ “भागता मैं दम छोड़/घूम गया कई मोड़” मुक्तिबोध के इसी स्वप्न का काव्यानुवाद मालूम नहीं होती? ध्यातव्य हो कि मुक्तिबोध अँधेरे में कविता में पूंजीवादी सभ्यता के व्यापक परिप्रेक्ष्य में स्वप्न-कथा का सृजन करते हैं। सवाल उठता है कि अगर यह स्वप्न मुक्तिबोध के बचपन से संबंध रखता है तो किन कारणों के चलते वे अपनी कविता में इसे पूंजीवादी सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में संदर्भित और व्याख्यायित करने का प्रयास करने लगते हैं? इस सवाल से पूर्व इस संभावना पर गौर करना भी ज़रूरी लगता है कि बाल्य-काल की चेतन और अवचेतन स्मृतियों का कवि-कर्म से क्या संबंध बनता है?

 

      मनोविज्ञान की पत्रिका मनोवेद डाइजेस्ट को दिए एक साक्षात्कार में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह इस संभावना पर गौर करते जान पड़ते है जब वे अपनी प्रसिद्ध कविता पानी में घिरे लोग को अपनी बाल्य-काल की स्मृति से उत्सर्जित बताते हैं। “यह कविता मेरे बचपन की स्मृतियों से निकली हुई है और मैं मानता हूँ कि एक रचनाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसके बचपन की स्मृतियाँ होती हैं, क्योंकि उस समय एक बच्चे या किशोर का मन कोरी स्लेट की तरह होता है और उस पर जो भी बाहरी प्रभाव पड़ता है। वह हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। स्मृतियाँ आदमी के वयस्क हो जाने के बाद भी बार-बार लौटकर लौटकर चेतना के धरातल पर आती है और यह काव्यात्मक संपदा लेखक के बड़े काम की होती है[23]।” मुक्तिबोध के बाल्य-काल की स्मृतियों पर आएँ तो औपनिवेशिक भारत में पिता के पुलिस से संबंधित होने के कारण उसमें जेलखाने, क़ैद, क़ैदियों को दी जाने वाली यातनाएँ और यंत्रणा है जिस ओर चंद्रकांत देवताले संकेत करते हैं[24]। उनकी कविताओं में ऐसी यातनाएँ और यंत्रणा सर्वत्र देखी जा सकती है। अब अगर उपरोक्त स्वप्न की अवचेतन स्मृति पर आएँ तो देखते हैं कि जैसे-जैसे मुक्तिबोध के जीवन में तनाव, असुरक्षा तथा व्यग्रता गहन से गहनतर होती गई यह स्वप्न भी उनके चेतना में सामाजिक अस्तित्व के अनुसार संदर्भित होता चला गया। मुक्तिबोध के जीवन में नागपुर प्रवास इसी ओर संकेत करता है। वहाँ का जीवन उनके लिए कठिनतर था। 6 अगस्त 1949 के पत्र में वे नेमिचंद्र जैन को लिखते हैं कि नागपुर में वे अकेले, पृथक और विच्छेदित हैं। वे लिखते हैं कि उनकी जिंदगी का एक हिस्सा पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गया है। उनकी आवाज़ दब गई है[25]। इसी तरह 6 फरवरी 1952 के पत्र में वे लिखते हैं कि “मेरे नागपुर प्रवास के पहले दो साल लगभग पूरी तरह दु:स्वप्न थे। वे बेहद दर्द भरे और गंदे अनुभव थे[26]।” कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहने के कारण उनको यह संदेह होता कि उनकी जासूसी की जा रही है (ध्यान रहे कि वह दौर कम्युनिस्ट गतिविधियों के नृशंस दमन का भी दौर था)। देवताले भी रेखांकित करते हैं कि नागपुर के दिनों में उनको यह शक रहता कि कोई उनका पीछा कर रहा है[27]। इसी तरह कांतिकुमार जैन के अनुसार भी “नागपुर के प्रारम्भिक वर्षों में तो उन्हें होटल, गली, बाजार, पार्क हर जगह सी.आई.डी. नज़र आती थी[28]।” हालाँकि यहाँ राज्य-सत्ता के क्रूर दमन का प्रभाव मुक्तिबोध की मानसिक स्थिति पर पड़ता दिखता है लेकिन पूंजी की तानाशाही के पैशाचीय हालातों को भी मुक्तिबोध अपने जीवन की आर्थिक तंगहाली में गहरे से अनुभूत कर रहे थे। 6 अगस्त 1949 के पत्र में वे नेमिचंद्र जैन को लिखते हैं, “लेकिन ये हालात मौन बेजान चीज़ें नहीं है। ये जीवित पिशाच हैं। ये बढ़ते चले जाते हैं और आपको बुरी तरह से क़त्ल कर देते हैं, और आपकी मृत्यु के बाद भी एक आशाहीन दृढ़ता के साथ औरों का पीछा करते हैं जैसे कि एक दु:स्वप्न की तरह ये आपका पीछा कर रहे हैं[29]।” ध्यान रहे कि मुक्तिबोध यहाँ पूंजी की चक्की में पिस रहे अपने भीतर के बौद्धिक कामगार की तुलना किसी दु:स्वप्न से कर रहे हैं। कार्ल मार्क्स पूंजी की दमनकारी सर्वव्यापी शक्ति का निरूपण ख़ून चूसने वाले पिशाच के रूपक से करते हैं[30]। यह खून जीवंत-श्रम की रचनात्मकता का ख़ून है। अत: प्रस्तुत उद्धरण नागपुर प्रवास के दौरान मुक्तिबोध की मानसिक उथल-पुथल को तो सामने लाता ही है साथ ही यह भी स्पष्ट कर देता है कि उनके इस व्यग्रता स्वप्न का संबंध पूंजी की दानवी शक्ति से ही है। अपनी कविताओं में मुक्तिबोध इसी भूतही छाया के चुंबकीय आकर्षण और इससे भागने के अपने संघर्ष का रूपांकन करते हैं। निस्संदेह यह भूतही छाया पूंजी की भूतही छाया है जोकि मनुष्य के होने को सीमित करते हुए तथा उसकी रचनात्मकता को प्रतिबंधित रखते हुए बुर्जुआ समाज में वैयक्तिक स्वतंत्रता का प्रतिस्थापन करती है। वैयक्तिक-आत्म के प्रतिस्थापन की पूर्व शर्त आत्म की रचनात्मकता अर्थात सामूहिक आत्म का प्रतिबंधन है। मुक्तिबोधीय फैंटेसी इसी सामूहिक आत्म की रचनात्मकता का विध्वंसक विद्रोह है। यदि एक स्वप्न में मुक्तिबोध किसी काली दानवी ताक़त से भागते है तो दूसरे स्वप्न में वे सामूहिक विद्रोह के लिए बारूद एकत्रित करते दिखते हैं:

  

  मुझे याद है बचपन का एक और स्वप्न, जो अधेड़पन तक साथ चलता रहा। वह है – भागते-भागते मुझे कोई चीज़ – कोई चमकीला पत्थर, कोई हीरा, या कोई अशर्फी – रास्ते में मिल गई। सपना टूटा नहीं, आगे बढ़ता रहा। हाथ में वह अत्यंत अमूल्य वस्तु है और मैं रास्ते पर बढ़ गया हूँ या भाग रहा हूँ। मैं क़तई भूल जाता हूँ कि मेरे हाथ में महान अमूल्य वस्तु है, यद्यपि वह मेरे हाथ में है। सपने में एक प्रदीर्घ काल के बाद यह ख्याल आता है कि मेरे पास भी तो वह चीज़ है, लेकिन जब मैं अपनी बंधी मुट्ठी खोलता हूँ तो पाता हूँ उसमें कुछ नहीं है। वह चीज़ अपनी भुलक्कड़ लापरवाही में मैंने कहीं गिरा दी है। अब मैं बुरी तरह बेचैन हूँ। अपनी बेवक़ूफ़ी तथा भयानक लापरवाही के प्रति आत्मग्लानि, खुद को कचोटकर खा जाने वाला एक राक्षसी दर्द, अपने-आपके प्रति भयंकर सियाह निराशा मेरे मन में भर जाती है, और मैं ऐसी ही उद्विग्न मन:स्थिति में जग पड़ता हूँ और सोचता हूँ कि ऐसा क्यों हुआ? सिवाय अपनी सूनी निगाह की चेतना के और क्या पल्ले पड़ सकता है। आज इस सपने का मुझे ख्याल आता है, तो लगता है कि ज़िंदगी के कई अनमोल सत्य हमें ऐसे ही प्राप्त होते हैं और खो जाते हैं[31]


    मुक्तिबोधीय फैंटेसी इन्हीं खोये हुए अनमोल सत्यों को खोजती है। उनकी नागात्मन् कविताएँ रास्ते पर गिरे पड़े मणि-रत्नों को एकत्रित करती चलती हैं। रामविलास शर्मा यह नहीं पहचान पाते कि यह मणि-रत्न आधुनिक मनुष्य की अनुभव, वेदना और विवेक-निष्कर्षों का ही रूपक हैं। परिणामत: वे इन मणि-रत्नों की रहस्यवादी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं[32]। दरअसल वे मुक्तिबोधीय फैंटेसी के रहस्यमयी रूप के पीछे छिपे वस्तु-तत्त्व तक पहुँच बनाने की कोशिश करते हैं। ज़िज़ेक के अनुसार यही कोशिश अपने आप में जड़ीभूत आकर्षण है। इस प्रक्रिया में रूप के रहस्य को उजागर करने के बजाए विश्लेषक रूप के रहस्य और रूप में अंतर्निहित वस्तु-तत्त्व को अलग-अलग कर देता है। गौरतलब है कि शर्मा भी जहाँ रूप के रहस्य को उजागर नहीं कर पाते वहाँ उस रहस्य पर अपनी रहस्यवादी अथवा अस्तित्ववादी व्याख्या का आरोपण कर देते हैं और जहाँ रूप में अंतर्निहित वस्तु-तत्त्व स्पष्ट होकर सामने आते हैं वहाँ ही वे मार्क्सवादी व्याख्या करने के पक्षधर होते हैं। निश्चित ही इसी कारण वे यह स्थापित करते हैं कि मुक्तिबोध रहस्यवाद, अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद का समन्वय करते हैं।

 ...मुक्तिबोध की अंतर्मुख दशाएँ हैं अंतश्चेतना में डूबने के उनके प्रयास। ये दशाएँ गहनतर होती हैं बाहर की दुनिया में मार खा कर अपने भीतर समाज और ब्रह्मांड का रहस्य ढूँढने से। आत्मग्रस्तता का एक रूप है रहस्यवाद, दूसरा रूप है अस्तित्ववाद। आत्मग्रस्तता के बावजूद और उसे साथ लिए हुए मुक्तिबोध के आत्मसंवेदन समाज के व्यापकतर छोर छूते हैं – इसका  अर्थ है, वह रहस्यवाद और अस्तित्ववाद से मार्क्सवाद का समन्वय करने का प्रयत्न करते हैं[33]


    शर्मा यह नहीं पहचान पाते कि मुक्तिबोध की आत्मग्रस्तता आत्म के सवाल के प्रति ग्रस्तता है। मुक्तिबोध स्वप्न-कथा और फैंटेसी के माध्यम से आत्म, स्व या होने के सवाल का गहन विश्लेषण और उत्खनन करते हैं। फैंटेसी में वे अपने प्रतिबंधित आत्म के मणि-रत्नों की खोज में या उनके साथ एक दानवी भूतही छाया – जो उनका पीछा करती है – से मुठभेड़ करते हैं। मुक्तिबोधीय फैंटेसी इसी मुठभेड़ का प्रक्षेपण हैं। इसी मुठभेड़ का चित्रात्मक निरूपण उनकी फैंटेसिक कविताएँ करती हैं जिस बारे में हम अगले भाग में बात करेंगे।

 

मुक्तिबोधीय फैंटेसिक रचनाएँ और आत्म के प्रतिबंधित मणि-रत्न -


अपनी डायरी में मुक्तिबोध बताते हैं कि वे दिन-भर में जिस दुनिया में प्रवेश करते हैं, वह स्वप्न-कथा का ही एक रूप है[34]। अत: मुक्तिबोध अपनी कविता की स्वप्न-कथाओं में भौतिक जगत् का ही प्रक्षेपण करते हैं न की कोई रहस्यवादी प्रस्तुतिकरण। एक स्वप्न-कथा कविता में मुक्तिबोध गतिमय बिंबों की जटिल और संश्लिष्ट श्रृंखलाओं का निरूपण करते हैं। काव्य-नायक का स्व अर्थात आत्म सियाह समुंदर के अथाह पानी में नहाता रहता है जहाँ से निकलने की तड़पती कोशिश में वे संघर्षरत है। इस स्याह समुंदर से निकलने के संघर्ष में ही उसे चकाचौंध किरने नाचतीं हुईं दिखतीं हैं। संबंधित कविता पर अपनी आलोचना में शर्मा वह सूत्र नहीं पकड़ पाते जो कविता के शुरू की ही पंक्तियों में मुक्तिबोध पाठक को देते हैं।


एक विजय और एक पराजय बीच

मेरी शुद्ध प्रकृति

मेरा स्व

जगमगाता रहता है

विचित्र उथल-पुथल में।

मेरी साँझ, मेरी रात

सुबहें व मेरे दिन

नहाते हैं, नहाते ही रहते हैं

सियाह समुंदर के अथाह पानी में

उठते गिरते हुए दिगवकाश जल में।

विक्षोभित हिल्लोलित लहरों में

मेरा मन नहाता रहता है

साँवले पल में[35]

 

    शर्मा यह सवाल नहीं उठाते कि काव्य-नायक अपने स्व को एक विजय और एक पराजय के बीच की विचित्र उथल-पुथल के बीच ही क्यों प्रक्षेपित कर रहा है? वे यह सवाल भी नहीं पूछते कि इस अथाह काले सागर की लहरें विक्षोभित और हिल्लोलित क्यों हैं? उनकी समस्या यह है कि जहाँ भी उनका सामना आत्म या स्व के सवाल से होता है वे उसे अस्तित्ववाद से जोड़ देते हैं और पूंजीवाद समाज में आत्म के सवाल की उपेक्षा कर जाते हैं। इससे उलट, मुक्तिबोध आत्म के सवाल का भौतिकवादी विश्लेषण करते हैं, इसलिए प्रस्तुत कविता में वे पूंजीवादी समाज में स्व की विशिष्टता को रेखांकित कर रहे हैं जहाँ आत्म विजय और पराजय के द्वैत की विचित्र उथल-पुथल में विघटित कर दिया जाता है। यहाँ हमारा केवल होना मायने रखता है और न-होने को दबा दिया जाता है। यहाँ होने में अंतर्निहित न-होने को दबा और छिपा दिया जाता है तथा होने और न-होने के सरलीकृत द्वैत को खड़ा कर दिया जाता है। न-होना होने की ओर ही निर्देशित कर दिया जाता है। पूंजीवादी समाज में न-होना होने के शक्ति-संबंधों से बहिष्करण है। इस स्थिति में, यहाँ कर्ता शक्ति-संबंधों में अपनी जगह बनाने की कोशिशों में लगा रहता है। पूंजीवादी समाज में पराजय या असफलता, सफलता के संदर्भ में ही असफलता है। अर्थात यह पराजय का तत्त्वमीमांसीय निरूपण है जोकि पराजय की वेदना या पीड़ा को जड़ीभूत करता है। अपनी पुस्तक लॉस एज़ रेसिस्टेन्स: टूवर्ड्स अ हरमेन्यूटिक ऑफ रेवोल्यूशन में पोथिक घोष इसी ओर संकेत करते हुए लिखते हैं:


    कमी/अतिक्रम को मात्र तत्त्वमीमांसीय शब्दों में परिकल्पित करना उसको जड़ीभूत करना या जमा देना है। यह कमी को, जैसे कि उसका नाम सुझाता है, पूंजीवाद के दायरों में – उसके अंतर्विरोध के अंगभूत तर्क से उत्पादित  तथा सुस्पष्ट – तथा पाने (विजय या सफलता) और खोने के उस निर्वासित द्वैत में रखता है जोकि ऐसे प्रतिस्पर्धात्मक अंतर्विरोध का अनिवार्य परिणाम है। ऐसा तत्त्वमीमांसीय जमाव, निर्वासन (पूंजीवादी आधुनिकता का निर्वासन) के तर्क में अंतर्भूत है जोकि यथार्थ के बहुतेरे क्षणों को एक दूसरे से पराया करके तथा उनको पृथक्कृत, संघर्षरत मोनाड्स बनाकर यथार्थ की प्रक्रिया को बाधित करता है। इस प्रकार, कमी की तत्वमीमांसीकृत तथा जमी हुई चेतना प्रतिस्पर्धा, अलगाव एवं बाह्यकृत निर्धारण (वर्चस्व) की पूंजीवादी तार्किक प्रवृत्ति से उतनी ही निर्धारित होती है जितनी की पाने (सफलता) की तत्वमीमांसा जोकि प्रतिस्पर्धी प्रवृत्ति को उत्पन्न तथा सुदृढ़ करती है[36](स्वानुवाद)


    इस तरह उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि प्रस्तुत कविता में काव्य-नायक काले अथाह समुंदर के रूप में पूंजीवादी समाज को प्रस्तुत कर रहा है जहाँ न-होना अर्थात स्थैतिक आत्म की नकारात्मकता होने अर्थात वैयक्तिक-आत्म के नीचे दबा दी जाती है। न-होने की विद्रोही चीखें ही विक्षोभित और हिल्लोलित लहरों का कारण है जिसमें काव्य-नायक का मन नहाता रहता है और रह-रहकर बाहर निकलने की कोशिश करता रहता है। अर्थात काव्य-नायक का स्व होने में अंतर्निहित न-होने को पहचान रहा है। उससे जूझ रहा है। प्रस्तुत कविता न-होने की इस वैयक्तिक चीख़ के सामूहिक प्रतिरोध बनने को दर्ज करती है। घोष यह स्पष्ट करते हैं कि मुख्य बात यह नहीं है कि यह बताया जाए कि पराजय अपने को अनुभूत किस तरह करती है क्योंकि पराजय का अपने को पराजय के रूप में पहचान लेना ही किसी बाहरी चिह्न द्वारा पराजय के वास्तविक का विकृत होना है जोकि यथार्थ के वास्तविक को उससे छीन कर उसे प्रतीकात्मक अर्थ दे देता है[37]। यही मनोविश्लेषक जैक लकां की प्रतीकात्मक व्यवस्था है। घोष के लिए यह प्रतीकात्मक व्यवस्था ही पूंजीवादी आधुनिकता है[38]। कविता में काव्य-नायक इसी पूंजीवादी आधुनिकता के अथाह काले सागर में अपने आत्म के वास्तविक के लिए संघर्षरत है। इसीलिए वे किनारे तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। इसी बीच उसे दिखाई देता है कि उसी की तरह इस समुंदर में किरनीली मूर्तियाँ और उसकी अपनी ही स्फूर्तियाँ नहा रही हैं। स्फूर्ति-मुख उसे देख तमतमा उठते हैं और जब वे सवाल-जवाब करने लगता है कि यह लहरें कहाँ से आयीं हैं तब जल-अंतर से उठती हुई कठोर मुख आकृतियाँ गुस्से से उसकी ओर देखने लगतीं हैं। मुक्तिबोध अथाह काले सागर के गतिमय बिंबों के बीच यह प्रश्न उछाल देते हैं कि सागर यह कौन है? कविता के तीसरे प्रकरण में एक अनहद गान सभी ओर गूँजता हुआ सुनाई देता है। अपार्थिव पक्षिणीयाँ जमाने भर की शिकायतों को गा रहीं हैं। क्या शिकायतों को सामने लाने के कारण ही वे अपार्थिव हैं? क्योंकि पूंजीवादी समाज में मानवीय और नैसर्गिक होना ही पावन और अपार्थिव होना है। पूंजी का साम्राज्य पार्थिव और अपार्थिव का द्वैत खड़ा करता है। पक्षिणीयाँ काव्य-नायक से कहती हैं “सहस्रों वर्षों से यह सागर उफनता आया है/ उसका तुम भाष्य करो/ उसका तुम व्याख्यान करो/चाहे तो उसमें तुम डूब मरो।/ अतल-निरीक्षण को मर कर तुम पूर्ण करो[39]।” सवाल उठता है कि यह अतल-निरीक्षण क्या है? क्या यह केवल सागर का निरीक्षण है या इस सागर में काव्य-नायक का अपने होने का भी निरीक्षण है? इसी बीच काव्य-नायक यह स्पष्ट करता है कि यह स्फूर्ति-मुख उसके अपने अर्थात आत्म के छूटे हुए हिस्से हैं जोकि आज उसको आदेश दे रहे हैं। काव्य-नायक इस बीच उस पत्थर को खोजने लगता है जोकि अँधेरे काले सागर के विरुद्ध स्व-प्रकाश की महत्त्वपूर्ण सत्ता का प्रतिनिधित्व करता हो। काव्य-नायक को लगता है कि हो सकता है कि वह पत्थर संपूर्ण ब्रह्मांड की केंद्रीय क्रियाओं का तेजस्वी अंश हो। इसी बिंदु पर शर्मा को यह कविता रहस्यवादी प्रतीत होती है[40]। शर्मा इस रहस्यवादी निरूपण के भीतर तैर रहे भावात्मक यथार्थ तक पहुँच बनाने की कोशिश नहीं करते। इसीलिए न तो उनको इन ज्ञान-मणियों और मुक्तिबोध के स्वप्नों के बीच ही कोई संबंध दिखता है और न ही वे स्फूर्ति-मुख के रूप में आत्म के वास्तविक को पहचान पाते हैं। वे इस इस ओर भी संकेत नहीं करते कि यहाँ अगले ही क्षण यह बोध भी है कि ऐसा यह ज्ञान मणि, मरने से मिलता है। यह होने में अंतर्निहित न-होने की आत्माभिव्यक्ति है। वैयक्तित्व के बुर्जुआ संबंधों को नकारते चले जाने की की भौतिक (प्रति)-शक्ति।


    शर्मा के मन में यह प्रश्न नहीं उभरता कि क्यों वे स्फूर्ति-मुख काव्य-नायक का अनादर, तिरस्कार और अविश्वास करते हैं? वे एकाएक ही प्रकट होने वाली युगव्यापी बहस और जद्दोजहद की भी उपेक्षा कर जाते हैं। उनके लिए यह बिलकुल भी महत्त्वपूर्ण नहीं है कि इन स्फूर्ति-मुखों का वार काव्य-नायक पर है। “उनका वार/ बिलकुल मुझी पर है/ बिजली का हर्फ़/ सिर्फ मुझ पर गिर/ तहस-नहस करता है,/बहुत बहस करता है[41]।” क्या यह वैयक्तिक-आत्म की तहस-नहस नहीं हैं क्योंकि वह स्फूर्ति-मुख ठहाका मारकर काव्य-नायक को हिला देते हैं और उसकी सोयी हुई अग्नि को पुन: जिला देते हैं। स्फूर्ति-मुख अपने सत्य-वचनों से काव्य-नायक को उद्वेलित करते हैं। उसको झकझोरते हुए  उसके आत्म का विकेंद्रण करते हैं।

 

मुझको वे स्फूर्ति-मुख

 इस तरह देखते हैं कि

 मानो अजीब हूँ;

उन्हें छोड़ कष्टों में

उन्हें त्याग दुख की खोहों में

कहीं दूर निकल गया

कि मैं जो बहा किया

आंतरिक आरोहावरोहों में,

निर्णायक मुहूर्त जो कि

घपले में टल गया,

कि मैं ही क्यों इस तरह बदल गया[42]

 

    कोई हैरत नहीं अगर इस अपराध-बोध और आत्मालोचना में शर्मा को अस्तित्ववाद नज़र आ जाए। अगले खंड में स्फूर्तियाँ, काव्य-नायक को बीच समुंदर में फेंक देती हैं। इसी खंड में शर्मा को अस्तित्ववाद के दर्शन हो जाते हैं। ग्लानिकर समुद्र में मुझे गश आता है,” उनके अंत:स्थित संवेदन उन्हीं पर कड़क उठते हैं, सतहों पर छटपटा कर गिरना, माथे पर चोट लगना, लहरों द्वारा रक्त का चूसा जाना – यह सब अस्तित्ववादी भावजगत् का कार्यक्रम है[43]।” उनके लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि काव्य-नायक कहता है कि अंधी जल-खोहों में क्यों नहीं सर्वेक्षण किया जाए? इस सर्वेक्षण के लिए काव्य-नायक विकराल ह्वेल-पंजर की काँख में फँसने-मरने की हद तक तैयार है। क्या यह काव्य-नायक कि पूंजीवादी आधुनिकता के समुद्र को मथ डालने की आस्था नहीं है? क्या समुद्र के कई मील मोटी निराकार तमाकार लहरों के नीचे जाना पूंजी के रहस्य को उजागर कर देने का जुनून नहीं है? काव्य-नायक जानता है कि उसे इस अँधेरे के भीतर रहते हुए ही अँधेरों के खिलाफ संघर्ष करना है, “इसीलिए, मुझे इस तमाकार पानी से/ समझौता करना है/तैरते रहना है सीमाहीन काल तक/ मुझको तो मृत्यु तक भयानक लहरों से मित्रता रखना है[44]।”  क्या सीमाहीन काल तक तैरते रहना पूंजीवाद के अनवरत विध्वंस के लिए सतत् निरीक्षण नहीं है? काव्य-नायक के सतत् निरीक्षण की इस कोशिश से सागर की जल-त्वचा थरथरा उठती है। क्रोध से लहरों के पीसते हुए दाँत दिखाई देते हैं और इन्हीं क्रोधमयी लहरों के बीच जुलूस का दृश्य उभरता है जहाँ पहाड़ों-सी पुरुषों की आकृतियाँ और टीलों-सी नारी-प्रकृतियाँ गरबीली चाल से सरकती जाती हैं। काव्य-नायक देखता है कि वे ही नहीं बल्कि अनेक जन वेदना के द्रोहपूर्ण दीप्तिमान शिखरों पर चढ़कर इस विराट् पूंजीवादी जुलूस को देख रहे हैं जहाँ, “अनगिन चरित्र/पर, चरितव्य कहीं नहीं/ अनगिनत श्रेष्ठों की अनेक रूप-आकृतियाँ/रिक्त प्रकृतियाँ।/मात्र महत्ता की निराकार केवलता।” उन्हीं में से एक भयानक आकार का देव अनंत चिंता में डूबा हुआ इस जुलूस का समीक्षण-सर्वेक्षण कर रहा है। मुक्तिबोध यहाँ उस भयानक देव के जबर्दस्त फैंटेसिक चित्रण से इस पूंजीवादी आधुनिकता के अथाह काले सागर का रहस्योद्घाटन कर देते हैं। क्या यह रहस्योद्घाटन स्वप्न-तकनीक की इस शैली के बिना संभव था कि जहाँ एक अति विशालकाय देव – सागर का पानी जिसके सिर्फ घुटनों तक है और पर्वत-सा मुख-मंडल आसमान को छू रहा है जिसके इर्द-गिर्द चाँद और तारे लटक रहे हैं – एकाएक ही प्रकट हो अर्थवादिनी सत्ता पर आधारित इस सभ्यता का सच उजागर कर देता है।

 

   ...............

  कितनी ही गर्वमयी

  सभ्यता-संस्कृतियाँ

      डूब गयीं।

    काँपा है, थहरा है,

    काला जल गहरा है,

   शोषण की अतिमात्रा,

    स्वार्थों की सुख-यात्रा,

   जब-जब सम्पन्न हुई

आत्मा से अर्थ मर गया, मर गई सभ्यता।

भीतर की मोरियाँ अकस्मात् खुल गयीं।

   जल की सतह मलिन

    ऊंची होती गयीं,

   अंदर सूराख़ से

   अपने उस पाप से

शहरों के टॉवर सब मीनारें डूब गयीं,

काला समुंदर ही लहराया, लहराया![45]

 

    यह सच पाठक को एक ज़ोरदार झटका देता है और बताता है कि इस काले अथाह समुंदर का लहराना दरअसल पूंजीवादी आधुनिकता का लहराना है।

     

    काव्य-नायक अथाह सागर के सतत् निरीक्षण के दौरान देखता है कि अँधेरों के भीतर से ही कोई लक्ष्य रहस्यमयी लालटेन लिए तेज़ चलता हुआ हमारे सामने आ जाता है जिसे देख भीतर की ग्रंथियाँ और बाहर की समस्याएँ चीख़ने लगती हैं। यह गौरतलब है कि प्रस्तुत कविता में काव्य-नायक लक्ष्य को अपने सतत् निरीक्षण के दौरान एकाएक पा लेता है न कि वे लक्ष्य को तलाशने की प्रवृत्ति से ग्रस्त है। क्या लक्ष्य को तलाशने की प्रवृत्ति पराजय के संदर्भ में अपनी विजय के लिए पूंजी के उसी तर्क को स्थापित नहीं कर देती जोकि पूंजीवादी समाज में पराजय का भौतिक कारण है? अपनी बहुचर्चित व्याख्यान श्रृंखला द फॉर फंडामैंटल कान्सैप्टस ऑफ साइकोएनालिसिस के एक्सोकम्युनिकेशन नामक व्यखायान में लकां पिकासो का ज़िक्र करते हुए तलाशने और खोज के फर्क पर बात करते हैं[46]। घोष के अनुसार लकां यह पहचानते हैं कि तलाश के संदर्भ में पराजय का बोध बाहरी, परिघटनात्मक तथा पराजय का निष्क्रिय बोध है जहाँ वह उन्हीं दमनात्मक संबंधों में पहचानी जाती है जोकि उसे पैदा करते हैं[47]। घोष के अनुसार लकां के पास पराजय की इस पहचान से उलट पराजय की अपनी आंतरिक आत्माभिव्यक्ति भी है जहाँ पराजय प्रतीकात्मक के तर्क को लांघ जाती है। इसे ही लकां खोज कहते हैं। यही खोज वास्तविक का अवतरण होना है। घोष के लिए यह कमी/पराजय का प्रतिरोध बनना है। यहाँ कमी/पराजय प्रतिरोध का ही रूप है। इसी कारण घोष इसे क्रांति का मनोविश्लेषिक क्षण कहते हैं। घोष बताते हैं कि लकां का योगदान केवल यह ही नहीं है कि वे बताते हैं कि प्रतीकात्मक व्यवस्था वास्तविक अमूर्तन है बल्कि वे उस संबंधित तत्त्वमीमांसीय रूप के निषेध की भी बात करते हैं जोकि वास्तविक को खोजते हुए उसकी स्वायत्त आत्माभिव्यक्ति बनता है। निषेध पूर्ववर्ती क्षण के प्रक्रियात्मक-वास्तविक के स्थिर तत्त्वमीमांसीय प्रकटन का विध्वंस करता है[48]। यह निषेध का विध्वंसक क्षण/पक्ष है। मुक्तिबोध इस क्षण को पहचानते हैं। वे जानते हैं कि बिना विध्वंस के व्यवकलन ब्रह्मराक्षस बनना है। अंत: करण का आयतन कविता में वे स्पष्टत: कह देते हैं कि “बिना संहार के, सृजन असंभव है;/समन्वय झूठ है,/सब सूर्य फूटेंगे/व उनके केंद्र टूटेंगे/उड़ेंगे खंड/बिखरेंगे गहन ब्रह्मांड में सर्वत्र/उनके नाश में तुम योग दो[49]।” सूर्यों का फूटना पूंजीवादी समाज का फूटना है। यह पूंजीवादी आधुनिकता का विध्वंस है।

     

      मुक्तिबोध अपनी कविता में यह दर्ज करते हैं कि पूंजीवाद की औद्योगिक आधुनिकता का चरण भारत में साम्राज्यवाद के हस्तक्षेप से आया था। एक स्वप्नकथा में वे पूर्तगीज़, ओलन्देज़,  फिरंगी लुटेरों के हाथों से सधी हुई रोशनी-मीनार का चित्र खींचते हैं। गौरतलब है कि चकमक की चिंगारियाँ में उनकी रूह इन्हीं अंधेरी मीनारों में भटकती है[50]। जहाँ इस कविता में साम्राज्यवाद के प्रतीक-रूप रोशनी-मीनार में काव्य-नायक को मुक्तिकामी जन-सेनाओं के संग्रामों की सूचनाएँ और ज्ञान मिलता है तो वहीं एक स्वप्नकथा में अँधियारा इन मीनारों पर चढ़ जाने क्या गाने लगता है जिससे काव्य-नायक को ख्याल आता है कि “हो न हो/ इस काले सागर का/ सुदूर-स्थित पश्चिम-किनारे से/ज़रूर कुछ नाता है/ इसीलिए, हमारे पास सुख नहीं आता है[51]।” काव्य-नायक के स्थैतिक आत्म को सामूहिक जहाज की सर्च-लाइट तलाश लेती है। इसी बिंदु पर काव्य-नायक का वैयक्तिक-आत्म पूंजी द्वारा आरोपित की गई वैयक्तिकता को नकार देता है और अपने होने में अंतर्निहित (लेकिन दमित) न-होने को साकार करता है। निश्चित ही यह साकार वैयक्तिक-आत्म का नाश और सामूहिक-आत्म को अवतरण है। अत: निस्संदेह मुक्तिबोध के लिए यह जहाज मुक्तिकामी संघर्ष के लिए सामूहिक-आत्म का प्रतीक है जिसके लिए मुक्ति आने वाले कल का कोई यूटोपियन प्रक्षेपण नहीं बल्कि वर्तमानता का, आज और अभी का सवाल है।

 

       वह जहाज

क्षोभ-विद्रोह भरे संगठित विद्रोह का

      साहसी समाज है !!

भीतर व बाहर के पूरे दलिद्दर से

       मुक्ति की तलाश में

आगामी कल नहीं, आगत वह आज है[52] !!

 

    इस तरह मुक्तिबोध अपनी फैंटेसी में अपने अवचेतन में प्रतिबंधित मणि-रत्नों अर्थात रचनात्मकता से साक्षात्कार करते हुए ही सामूहिक-आत्म तक पहुँच पाते हैं। मुक्तिबोध की कविता जहाँ एक ओर चुपचाप इन्हीं मणियों को एकत्रित करती चलती है (ओ काव्यात्मन् फणीधर), तो दूसरी ओर एकाएक इन कविताओं में काव्य-नायक यह पहचान लेता है कि “मेरी ही विक्षोभ मणियों को लिए वे/मेरे ही विवेक रत्नों को लेकर/बढ़ रहे लोग अँधेरे में सोत्साह[53]।” अर्थात मुक्तिबोध की कविता में मणि-रत्नों का प्रतीकात्मक अर्थ किसी खोज से जुड़ा है। मणियों की अशांत स्व-प्रकाशित किरणें निज आत्म से परे आत्म के वास्तविक अर्थ को खोजने की जिज्ञासा में भटकती रहती हैं। मुक्तिबोध की कविता इसी भटकाव का चिह्नांकन करती है। जहाँ भविष्य-धारा कविता का भविष्य-कथन है कि यह मणि-रत्न मैन-होल में प्राप्त होंगे तो वहीं एक-अंतर्कथा कविता में कचरे में उपेक्षित फेंक दिए गए ज्ञानात्मक-संवेदनों अर्थात मुक्ति के मणि-रत्नों को खोजने, चीन्हे और बीनने के लिए ही मुक्तिबोध अपनी माँ के साथ सभ्यता के जंगल में भटक रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या यह मणि-रत्न मुक्तिबोध के बाल्यकाल के सपनों के ही मणि-रत्न नहीं हैं जिन्हें वे अपनी नागात्मन् कविताओं के माध्यम से एकत्रित करते चलते हैं? अत: उनकी कविता उपेक्षित और त्याग दिए गए आत्म-सत्यों से साक्षात्कार का क्षण है। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह आत्म-सत्य उन्हें आत्मानुसंधान की प्रक्रिया में ही प्राप्त होते हैं। मुक्तिबोध की कविताएँ उस नाग की तरह हैं जो कुंडली मारकर आत्म-सत्यों के इन मणि-रत्नों को छिपाये रखता है। अपनी कविता ओ काव्यात्मन् फणीधर में मुक्तिबोध कहते हैं:

 

      वे आते होंगे लोग.....

अरे, जिनके हाथों में तुम्हें सौंपना ही होंगे

ये मौन उपेक्षित रत्न !

        मात्र तब तक,

      केवल तब तक

तुम छुपा चलो द्युतिमान् उन्हें

तम-गुहा-तले!

, संवेदनमय ज्ञान-नाग.....

कुंडली मार तुम दाब रखो

फूटती हुई रश्मियाँ ![54]

 

    मुक्तिबोध चेतवानी देते हैं कि जो कुछ तुम हो उसको छिपा चलो क्योंकि यह काल तुम्हारा नहीं है। अत: मुक्तिबोध प्रति-क्रांतिकारी समय में  क्रांति के पुनरारंभ के लिए सतत् अनुसंधान की ज़रूरत को रेखांकित करते हैं। इसी अनुसंधान की प्रक्रिया में वे इन उपेक्षित रत्नों को ढूँढते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि “चुपचाप धँसाये गये, छिपाये गये रत्न मन के, जन के,/जो मूल सत्य है इस जग के परिवर्तन के![55]” प्रस्तुत कविता में मुक्तिबोध असुविधाजनक होने के कारण फेंक दिए गए इन मणि-रत्नों को कचरे के ढेरों और मैली सतहों से एकत्रित करते हैं। नाग इनको इक्कठा करके तम-गुहा के नीचे छिपा देता है। उसे यह मणि-रत्न उन लोगों के लिए संभाल के रखने हैं जोकि जग-परिवर्तन के प्रवर्तक हैं। जग के परिवर्तन के मूल सत्यों को इक्कठा करते जाने के क्रम में यह फैंटेसी साँप की सर्पिल गति से विविध स्थलाकृतियों को नापती चलती है। घर के पिछवाड़े से गुजरते हुए, छत में चढ़ते हुए तथा दीवारों को फाँदते हुए यह नाग फैंटेसी को एक भयावह परिवेश देता है। नाग की यह गतिमयता कविता की गतिमयता हो जाती है। इसीलिए मुक्तिबोध कहते हैं:

 

लहराओ, लहराओ, नागात्मक कविताओं,

      झाड़ियों छिपो,

उन श्याम झुरमुट-तले कई

मिल जाए कहीं

वे फेंके गये रत्न, ऐसे

जो बहुत असुविधाकारक थे,

इसलिए कि उनकी किरण-सूत्र से होता था

पट-परिवर्तन, यवनिका-पतन

मन में जग में!

ओ काव्यात्मन् फणीधर, अपना फन फैलाओ!

मणिगण को धारण करो, उन्हें

वल्मीक-गुहा में ले जाओ,

एकत्र करो.....[56]

 

    गौरतलब है कि एक स्वप्न-कथा में अथाह काला सागर लहराता है तो वहीं प्रस्तुत कविता में यह नाग बनी कविताएँ लहरा रही हैं। इस तरह यह बात स्पष्ट है कि मुक्तिबोध की कविताएँ अपनी फैंटेसिक शक्ति से जल, थल और नभ सभी जगह सर्वत्र सचेत उपस्थित रहती हैं। अँधेरे में की तर्ज़ पर कहें तो वह मनाती, मानती और मनवाती अड़ जाती हैं। रणजीत साहा प्रस्तुत कविता पर अपने पाठ में मुक्तिबोधीय फैंटेसी की इस शक्ति को पहचान लेते हैं। वे लिखते हैं, “संबोधन शैली में रचित यह कविता फैंटेसी के आवरण में बहुत बड़े रूपक का वितान रचती है। एक सर्प पृथ्वी-गह्वर में विचरण करता हुआ बड़ी सहजता से न केवल जल और थल बल्कि पेड़ पर भी चढ़ जाता है। किसी भी जगह पहुँचने की इसी क्षमता को कवि अपनी कविता का भी अंतरंग गुण बनाना चाहता है[57]।” मुक्तिबोध की नागात्मक कविता जंगल-जंगल से गुजरते हुए उस वट-वृक्ष तक पहुँच जाती हैं जहाँ कुछ गृह-हीन प्राण सो रहे हैं। यहीं पर उन्हें स्वर दबा कर सिसकती हुई दार्शनिक आत्मा भी मिलती है। यह वही दार्शनिक आत्मा है जो जन-उत्पीड़न की विभ्राट-व्यवस्था के सम्मुख उदर-शिशन के आध्यात्मिक सुख भोगती रही। मुक्तिबोध अपनी नागात्मक कविताओं को उसके आशयों का विष पीने को कहते हैं। कविता के दसवें प्रकरण में उसी वट-वृक्ष के तले नाग को पागल युवती सोयी दिखायी देती है। पिछले प्रकरण के उदर-शिशन का आध्यात्मिक सुख यहाँ स्पष्ट होता है जब नाग यह खुलासा करता है कि अनगिनत वासना-ग्रस्तों का मन इस युवती पर अटका था और उन्होनें ही उस शोषिता और व्यभिचरिता को गर्भ दिया जिससे उत्पन्न हुआ बालक उस पागल युवती के स्तन में मुंह डाल मर चुका है। उस बालक की मात्र अब परछाई ही वहाँ लेटी है। मुक्तिबोध पाठक के सामान्य-बोध को झटका देने वाले इन बिंबों का रहस्योद्घाट्न कर देते हैं, “आधुनिक सभ्यता-संकट की प्रतीक-रेखा,/उसको मैंने सपनों में कई बार देखा!!/जीने के पहले मरे समस्याओं के हल!! ओ नागराज, चुपचाप यहाँ से चल!![58]” स्पष्ट है कि मुक्तिबोध पूंजी की आधुनिक सभ्यता के संकटों को स्वप्न में जिन प्रतीक-रूपों में देखते हैं उन्हीं तनावों और रूपकों से उद्वेलित होकर वे अपनी कविताओं को सींचते हैं। इसके लिए मुक्तिबोधीय फैंटेसी प्राग्-ऐतिहासिक मिथकों, लोक-कथाओं तथा रहस्यमयी लोकों तक विचरण करती है। मुक्तिबोध में यह भटकाव लगातार चलता है जिस ओर संकेत करते हुए चंद्रकांत देवताले लिखते हैं, “जिस भौगोलिक परिवेश में मुक्तिबोध रात-बिरात भटकते रहे थे, वह उनकी कविता का अपरिहार्य हिस्सा है। भूत-प्रेत, ब्रह्मराक्षस, जादू-टोना, आदिम वातावरण लोकविश्वासों को उन्होंने बावड़ी, खंडहर, मैदान, टीले, पहाड़, घाटी, दर्रे से जोड़ते हुए अपने भीतर के जिज्ञासु बच्चे के कार्य-कलापों को निर्बाध रूप से घटित होने दिया[59]।” निर्बाध रूप से घटित हुई यह प्रक्रिया संघनन और स्थानांतरण की अनवरत प्रक्रिया है जो मुक्तिबोधीय फैंटेसी को एक स्वप्निल स्पर्श देती है। इस स्वप्निल स्पर्श की ऐंद्रिकता से मुक्तिबोध का काव्य भावात्मिका की उस शक्ति को उजागर करता है जोकि मनुष्य को स्वार्थ के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है। मुक्तिबोध की कविताएँ ऐसे बिंबों, भावों और अनुभूतियों का विधान करती है जोकि चेतना से ही नहीं बंधी होती बल्कि इतिहास और मानव-मन के अचेतन अँधेरों की प्रच्छन्न छायाओं के बचे हुए टुकड़ों को समेटती है। मुक्तिबोध की कविता की भावात्मिका अचेतन अँधेरों की यह प्रच्छन्न छायाएँ ही हैं। आधुनिक मनुष्य की क्रियाओं की जटिल परिस्थितियों के निरूपण के लिए मुक्तिबोध रहस्यमयी स्थलाकृतियों का विधान करते हैं। रहस्यमयी स्थलाकृतियों का यह विधान ही फैंटेसी में स्वप्न-कार्य की तकनीक है।

 

      कविता की ओर लौटें तो हम देखते हैं कि यहाँ से चलते हुए नागराज उस अँधियारे कुएं के पास पहुंचता है जहाँ आत्मज सद्योजात बालक को कोई छोड़ गया है। मुक्तिबोध प्रश्न करते हैं कि आखिर इस बालक को क्यों छोड़ा गया? आखिर यह कौन-सी क्रांति करने वाला था। यहाँ गौरतलब है कि अँधेरे में कविता में भी गांधीजी काव्य-नायक को बच्चा सौंपते हैं। कविता में शिशु के आगमन से मुक्तिबोध किसी उत्सवी माहौल का चित्र रचते हैं। शिशु की मुख-गरिमा का सौंदर्य देख मन में उल्लास-नृत्य उमड़ पड़ता है। मुक्तिबोध कविताओं के पलों को नाचने के लिए कहते हैं। वे पहचान लेते हैं कि उस बालक के स्वर में आगामी कई हविष्यों के असाधारण संकेत हैं। इसी उत्सवधर्मी माहौल में मुक्तिबोध अपनी नागात्मक कविताओं के अँधेरों का रहस्योद्घाट्न करते हैं। मुक्तिबोध की कविताओं का अँधेरा मात्र उसका भयावह चित्रण ही नहीं है बल्कि यह प्रकृति का वह अंधेरा भी है जिससे मनुष्य सभ्यता के विकास के कारण अलग हो गया है। मुक्तिबोध की कविता अवचेतन के उसी अँधेरे को मनुष्य-कर्ता की व्यवहारिक चेतना के आगे ले आती है। इसीलिए मुक्तिबोध अपनी नागात्मक कविताओं अर्थात कोब्रा, क्रेट, पुष्ट पायथन तथा तम-विशेषज्ञ, प्रज्वलत मन को संबोधित करते हुए कहते हैं, “तम-छायाओं द्वारा प्रकाश-पथ के ज्ञाता/आज की श्याम भूताकृतियों के द्वारा ही/ कल की प्रकाश-छवियों के ओ दर्शनकर्ता[60]।” अर्थात मुक्तिबोध पूंजी के उस अँधेरे को पहचानते हैं जोकि पूंजी की नकारात्मकता है। इसीलिए मुक्तिबोध अपनी कविताओं में अंतर्भूत अँधेरे के इस विष को अपने आभ्यंतर प्राण में स्वप्न देखते और विश्लेषण करते हुए भर लेना चाहते हैं। विश्लेषण और स्वप्न के इस अनवरत कर्म में ही मुक्तिबोध की कविता पथ खोजती हैं। उनकी कविताएँ वह भू-गर्भशास्त्री हैं जो सतत् अनुसंधान के लिए भीतर और बाहर का व्यापक सर्वेक्षण कर डालती हैं। कविता के अठारहवें प्रकरण में वह तम-गुहा जो छिपाए गए रत्नों के कारण भीतर से दैदीप्यमान रहती थी अंधियारी, काली व स्तब्ध तथा जड़ और निश्चेतन हो गई है। कवि नागात्मन् को शोक न करने के लिए कहता है क्योंकि उसकी अनुपस्थिति में वे लोग जिनकी प्रतीक्षा थी उन ज्वलत-द्युति प्रस्तर-धन को ले गए हैं। मुक्तिबोध बताते हैं कि अब उन रत्नों का अर्थ दीप्त होगा। मुक्तिबोध यहाँ रत्नों के दीप्त होने से भारतीय सभ्यता के उस शोषणकारी मिथक को बेपर्दा कर देते हैं जिसने हजारों सालों से मनुष्य को आंतरिक रूप से गुलाम बनाया हुआ है।

 

अब उन रत्नों का अर्थ दीप्त होगा,

      उनका प्रभाव घर-घर में पहुँचेगा फिर से,

उनके प्रकाश में

दीख सकेगा भीषण मुख...

वह भीषण मुख उस ब्रह्मदेव का

जो रहकर प्रच्छन्न स्वयं,

निज अंकशायिनी दुहिता-पत्नी सरस्वती

या विवेक-धी

के द्वारा ही

उद्दाम स्वार्थ या सूक्ष्म आत्मरति का प्रचार

करे, भटकाता

विक्षुब्ध जगत् को, उसके अपने मन से ही

काटकर अलग

फेंककर पृथक,

उन दोनों को दूर परस्पर से, तुरंत

अपने को स्वयं चूम जाता ![61]

 

    इस तरह प्रस्तुत कविता शहर, जंगलों तथा कुओं की यात्रा करते हुए भारतीय सभ्यता के उस मिथक को ही प्रश्नांकित और ध्वस्त कर देती है जोकि व्यक्ति को अपने आत्म-निर्माण की प्रक्रिया से अलग कर देता है। दूधनाथ सिंह को इस कविता का अंत कुछ अजीब-सा लगता है[62]। उनके अनुसार यह अंत कविता के पूरे प्रभाव को कुछ हल्का कर देता है। वे रेखांकित करते हैं कि वेदांत हिंदी साहित्यिक परंपरा को घेरे हुए है। उनके अनुसार मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल में मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, पंत, निराला तथा नई कविता में अज्ञेय और शमशेर में भी वैष्णववाद की स्वीकृति तथा अनुगूँजें हैं। इस चर्चा में सिंह निराला के ब्रह्म पर आक्रमण को नहीं देख पाते जिस ओर रामविलास शर्मा ध्यान दिलाते हैं। शर्मा के अनुसार कुकुरमुत्ता ब्रह्म के समान ही अनेक रूप धारण करता है तथा कुकुरमुत्ता का प्रच्छन्न व्यंग्य दरअसल ब्रह्म संबंधी विचारधारा पर व्यंग्य है[63]। इस दृष्टि से देखने पर यह मालूम होता है कि मुक्तिबोध निराला की परंपरा का ही द्वंद्वात्मक विकास करते हैं जिस ओर कई विद्वान संकेत करते हैं। हालाँकि दूधनाथ सिंह यह ठीक ही कहते हैं कि किसी भी मार्क्सवादी कवि के लिए ब्रह्म के सिद्धांत पर आक्रमण करना एक चुनौती है लेकिन उनका यह मानना कि मुक्तिबोध ने इस कविता का अंत बहुत चलताऊ और भौंडे ढंग से किया है उनके पाठ की सीमा को उजागर करता  है। उनके अनुसार इस कविता की जगह इसी काल में लिखी गई मुक्तिबोध की अन्य महत्त्वपूर्ण कविता एक अरूप शून्य के प्रति वेदांत दर्शन और ब्रह्म की भौतिकवादी व्याख्या करती है[64]। दूधनाथ सिंह यह पहचान नहीं पाते की उस कविता में ब्रह्म की भौतिकवाद व्याख्या कि जहाँ मुक्तिबोध ब्रह्म की आदर्शवादी विश्वात्मक फैंटेसी को अपनी भौतिकवादी फैंटेसी से ध्वस्त करते हैं, इस कविता के अंत से ही प्रेरित होती है। ओ काव्यात्मन् फणीधर की कुछ अंतिम पंक्तियाँ है:

 

उस ब्रह्मदेव का टेढ़ा मुंह

जग देख चुकेगा पूरा ही।

उस ब्रह्मदेव का दर्शन सभी कर सकेंगे,

जिसकी छत्रच्छाया में रह

अधिकाधिक दीप्तिमान होते

धन के श्रीमुख

पर, निर्धन एक-एक सीढ़ी नीचे गिरते जाते

उस ब्रह्मदेव का विवेक-दर्शन

होगा उद्घाटित पूरा ![65]

 

    दूधनाथ सिंह न तो ब्रह्म के टेढ़े मुंह को पहचान पाते है और न ही इस संबंध की ओर ध्यान दिलाते हैं कि प्रस्तुत कविता में जहाँ ब्रह्म का मुंह टेढ़ा है तो वहीं मुक्तिबोध की अन्य कविता चाँद का मुंह टेढ़ा है में सन् 53 का टेढ़े मुंह का चाँद पूंजी के साम्राज्य का द्योतक है। कुल मिलाकर दूधनाथ सिंह इस बात को नहीं समझ पाते कि प्रस्तुत कविता में किस तरह मुक्तिबोध अपने खास अंदाज़ में ब्रह्म के मिथकीय सिद्धांत की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं, जहाँ श्रम और पूंजी के संबंध आत्म और ब्रह्म के अद्वैत का ही परिष्कृत रूप मालूम होते हैं। जैसे ब्रह्म आत्म के बिना कुछ नहीं है वैसे ही पूंजी भी श्रम के बिना कुछ नहीं है। ब्रह्म की तरह पूंजी भी श्रम अर्थात आत्म को अपने में समाहित करके उसके वास्तविक को दबा देती है। आत्म के वास्तविक मणि-रत्नों के स्व-प्रकाश द्वारा मुक्तिबोध ब्रह्म की माया के विवेक-दर्शन अर्थात पूंजी की विमर्शात्मक तार्किकता के उद्घाटित होने की बात करते हैं जिसके कारण धन के श्रीमुख और अधिक दीप्तिमान होते जाते हैं तो निर्धन एक-एक सीढ़ी नीचे गिरते जाते हैं। इसी निश्चित अर्थ में मुक्तिबोध ब्रह्म के आध्यात्मिक-दार्शनिक पक्ष का भौतिकवादी विश्लेषण करते हैं।


उपसंहार -

      मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्नों से उत्सर्जित आत्म के ये मणि-रत्न ब्रह्म के मिथक को ही उजागर नहीं करते बल्कि वैयक्तिक-आत्म में अंतर्निहित उस पाखंड का भी उद्घाटन करते हैं जोकि पूंजीवादी समाज में आत्म की पीड़ा का कारण है। इसी पीड़ा को अपने कमरे के अचेतन खड्डे में समेटे रहने के लिए अँधेरे में कविता का काव्य-नायक तैयार नहीं था इसीलिए कविता में आगे उसका साक्षात्कार उस पागल से होता है जिसने उसको आत्मालोचना के लिए प्रवृत्त किया। पूंजीवादी समाज में अस्तित्व के रूप में वैयक्तिक-आत्म की अवधारणा में ही पाखंड अंतर्निहित है जो मनुष्य को प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में उलझाए रखती है। व्यक्ति अपने ही ख्यालों में दिन-रात लगा रहता है। आत्म की स्थैतिकता में वह अपने ही बनाए कीचड़ अर्थात पूंजी के सामाजिक-संबंधों में धंस जाता है। अँधेरे में का पागल अपने गान से पूंजीवादी समाज में वैयक्तिक-आत्म के अस्मितावादी अस्तित्व के रूप में आत्म की स्वायत्ता और प्रभुता के धोखे को काव्य-नायक के सामने खोल देता है। इस तरह वह काव्य-नायक के आत्म को विकेंद्रित करता है। उसे वैयक्तिक-आत्म की कारा से मुक्त होने के लिए ललकारता है। इसी ललकार के कारण काव्य-नायक का सिर भरम से गरम होता जाता है। उसे इस बात का साक्षात्कार होता है कि पूंजी द्वारा संघटित उसका यह अस्तित्व उसके आत्म से खोया हुआ है। अस्तित्व से निर्वासित आत्म को तलाशने के लिए वह बेचैन है। उसे उसके गुरु अर्थात आत्म के महान अस्तित्व की महक लगातार आ रही है। पर अभी भी वह महक-लहर अस्पष्ट है। उसमें कोई छिपी वेदना और कोई गुप्त चिंता अभी भी छटपटा रही है। “उस महक-लहर में/ कोई छुपी वेदना, कोई गुप्त चिंता/ छटपटा रही है  छटपटा रही है[66]।” यह गौरतलब है कि पुरुषोत्तम अग्रवाल के अनुसार “ अँधेरे मेंकविता की मूल संवेदना वस्तुत: महक के स्रोतों की खोज की ही संवेदना है[67]।” लेकिन सवाल उठता है कि इस महक का स्रोत कहाँ है? क्या यह महक अवचेतन में प्रतिबंधित रचनात्मक-आत्म की महक नहीं है तथा क्या मुक्तिबोध के व्यग्रता स्वप्न ही इस महक का स्रोत नहीं है? इसी महक का पीछा करते हुए काव्य-नायक दम छोड़ और कई मोड़ भागता अपने दिमाग के चक्कर और भँवरों से होता हुआ भूमि के नीचे की प्राकृत गुहा तक चला जाता है जहाँ अँधेरों को भेदते हुए चमकीले पत्थर चमक रहे हैं। 2015 में केलिफोर्निया विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पर केंद्रित अपने जमा किए पीएच.डी. शोध कार्य में विद्वान ग्रेग्री यंग गौलडींग यह तो मानते हैं कि यह आत्म की गुहा है लेकिन इसे वे उपचेतन या अवचेतन मानने से इंकार करते हैं[68]। लेकिन मुक्तिबोध के बाल्यकाल के सपनों और बाकी कविताओं में मणि-रत्नों की व्यापक मौजूदगी से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अवचेतन ही है जिसे काव्य-नायक के वैयक्तिक-आत्म ने गुहावास दे दिया है।

 

      कहने की ज़रूरत नहीं कि अँधेरे में कविता भारतीय साहित्य में पूंजी की उस भयावह यंत्रणा का सटीक निरूपण करती है जो मनुष्य के अवचेतन तक घुस जाती है। उसके अंत:करण को मुनाफ़ों के कीड़ों से चाट कर ख़त्म कर डालती है। रचनात्मक-आत्म की रैडिकल आस्था या तो मनुष्य के अवचेतन में प्रतिबंधित रहती है या फिर उदार या रूढ़िवादी रूप में पूंजी के सुपर-इगो द्वारा मध्यस्थ होती है तथा पूंजी के सामाजिक-संबंधों का पुनरुत्पादन करती रहती है। मुक्तिबोध आध्यात्म की उस रैडिकल आस्था से परिचित थे जो मनुष्य को सामूहिक स्वप्न देती है। मार्क्सवादी होने से पूर्व 1939 के अपने निबंध आधुनिक समाज का धर्म में वे इच्छा प्रकट करते हैं कि उनका अंतर इतना विस्तार चाहता है कि पूरा विश्व ही उसमें समा सके। यह विस्तार और गहराई Trans-individualism की विस्तार और गहराई है, उसके गुण हैं जिस आध्यात्मिक लक्ष्य3 पर मुक्तिबोध अपनी आस्था प्रकट करते हैं[69]। प्रस्तुत कविता में भी इस प्रकटत: आध्यात्मिकता और Trans-individualism के दर्शन होते हैं जहाँ भीषण यंत्रणा के बीच काव्य-नायक का मन देह की हद से हट कर किसी और ही जगत् में चला जाता है। अर्थात मन की हद को तोड़ अनहद होकर किसी अन्य जगत् में चला जाता है। यह जगत् कोई आधि-भौतिक जगत् या कांतीय अतींद्रिय प्रक्षेपण नहीं बल्कि किसी फटे हुए मन की जेब है जहाँ काव्य-नायक चुपचाप एक पत्र बन गिर जाता है। यह Trans-individualism की ही अनुभूति है जब वह कहता है, “हम कहाँ नहीं हैं,/सभी जगह मन!/निजता हमारी![70]” कविता के सातवें खंड में यही Trans-individualism सामूहिक-आत्म में तब्दील होता है जब श्रम के वास्तविक और पूंजी के यथार्थ के रूप में सत्य और सत्ता के बीच निर्णायक युद्ध छिड़ जाता है। यहाँ काव्य-नायक किसी विचित्र अनुभव में डूबा अपने आस-पास सामूहिक-आत्म के साकार होने को देख रहा है। सामूहिकता का यह अवतरण इतना महान और विशाल है कि काव्य-नायक जितनी भी पांतों को पार कर आगे बढ़ता है उतना ही पीछे और अकेला रह जाता है। सामूहिकता का यह अवतरण मज़दूर-वर्ग के आत्म-संगठन के रूप में प्रत्येक क्षण श्रम के सामाजिक-तकनीकी विभाजन की बुनियादी इकाई वैयक्तिक-आत्म को तोड़ रहा है। उसका निषेध करते हुए आगे बढ़ रहा है।

 

प्रत्येक स्थान पर लगा हुआ हूँ मैं काम में,

प्रत्येक चौराहे, दुराहे व राहों के मोड़ पर

सड़क पर खड़ा हूँ,

मनाता हूँ, मानता हूँ, मनवाता अड़ा हूँ !![71]

 

    यह क्रांति के साकार होने का क्षण है जहाँ प्रत्येक सामाजिक-उत्पादन यथास्थिति को निषेध करते हुए और अधिक क्रांति का उत्पादन करता है। यथास्थिति को अनवरत तोड़ने और इस निरंतर उत्पादन के लिए ही काव्य-नायक मनाता, मानता और मनवाता अड़ा हुआ है। यह अपने आप से और अन्य से निरंतर बहस में सामूहिक-आत्म का उभरना है। अत: यह मैं और अन्य के द्वैत का विसर्जित हो जाना है। इसी कारण यह अवचेतन के उन्मुक्त होने का भी क्षण है। पर यहाँ अवचेतन का उन्मुक्त होना काव्य-नायक के अवचेतन का ही नहीं बल्कि सामूहिक अवचेतन का मुक्त और उन्मुक्त होना है। यही मुक्तिबोध अपने आत्म के मणि-रत्नों के वास्तविक चरित्र का रहस्योद्घाटन

 

आश्चर्य !! अद्भुत !!

लोगों की मुट्ठियाँ बंधी हैं ।

उँगली-संधि से फुट रहीं किरनें

लाल-लाल

यह क्या !!

मेरे ही विक्षोभ मणियों को लिए वे,

मेरे ही विवेक-रत्नों को लेकर,

बढ़ रहे लोग अँधेरे में सोत्साह ।

किंतु मैं अकेला

बौद्धिक जुगाली में अपने से दुकेला ।

 

गलियों के अँधेरे में मैं भाग रहा हूँ;

इतने में चुपचाप कोई एक

दे जाता पर्चा

कोई गुप्त शक्ति

हृदय मैं चुपचाप करती है चर्चा !!

मैं बहुत ध्यान से पढ़ता हूँ उसको ।

आश्चर्य !

उसमें तो मेरे ही गुप्त विचार व

दबी हुई संवेदनाएँ व अनुभव

पीड़ाएँ जगमगा रहीं हैं ।

यह सब क्या है !![72]

 

यह सब मणि-रत्न के रूप में अवचेतन के गुप्त विचारों और दबी हुई संवेदनाओं और अनुभव-पीड़ाओं का सामूहिक होते हुए मुक्त और उन्मुक्त होना है। सामूहिक-आत्म के इस आविर्भाव को देखते हुए काव्य-नायक को ज़िंदगी की सरहदें टूटती हुई सूर्यों के प्रांगण के पार जाती हुई दिखती हैं। ज़िंदगी की सरहदों का टूटना उन अस्मितावादी साँचों का टूटना है जिसमें पूंजी मनुष्य की रचनात्मक कर्मण्यता को परिसीमित रखती है और सूर्यों के प्रांगण को लाँघना पहचान के इस साम्राज्य का विध्वंस करते हुए मुक्ति के मन और जन की असीम रचनात्मकता का मुक्त और उन्मुक्त होना है जहाँ ज़िंदगी ख़तरों से जूझते हुए भरपूर की खोज में लगी रहती है। दूसरे शब्दों में यह सामूहिक-आत्म का अपनी पहचान के विरुद्ध यथास्थिति का सतत् नकार है। प्रस्तुत कविता वैयक्तिक-आत्म का विध्वंस करती सामूहिक-आत्म के साकार होने की कविता है।

 

क्या प्रस्तुत कविता पर रामविलास शर्मा का यह मानना सही है कि मुक्तिबोध इस कविता में क्रांति के स्वप्न को इसलिए भंग करते हैं क्योंकि वे उसकी पराजय को नहीं देखना चाहते? क्या स्वप्न-भंग होना क्रांति के स्वप्न का भंग होना भी है? यदि ऐसा है तो काव्य-नायक के मन-मस्तिष्क में गहरे व बारीक छेद क्यों हैं? उन रंध्रों के दुखों में गहरी प्रदीप्त ज्योति क्यों बस गई है? आखिर आत्मा की यह चमकीली प्यास क्या है? शर्मा की समस्या यह है कि वे मुक्तिबोध की फैंटेसी में स्वप्न-तकनीक के प्रयोग का अध्ययन नहीं करते। वे यह नहीं देखते कि इस कविता के प्रभाव को प्रगाढ़ करने के लिए ही मुक्तिबोध कविता में चार बार स्वप्न-भंग की तकनीक का प्रयोग करते हैं। ऐसा मुक्तिबोध प्रस्तुत कविता में मौजूद तनाव और व्यग्रता को गहन से गहनतर करने के लिए करते हैं। जैसा की दूसरे भाग में हमने देखा है कि मुक्तिबोधीय फैंटेसी या प्रस्तुत कविता की स्वप्न के भीतर स्वप्न की व्यग्रता-स्वप्न (Anxiety dream) की तकनीक दरअसल मुक्तिबोध के खुद के सपनों के तनाव और व्यग्रता से गतिमय होती है। व्यग्रता स्वप्न की इस तकनीक के बारे में मुक्तिबोध डायरी के निबंध एक लंबी कविता का अंत में भी स्पष्टत: लिखते हैं कि “गद्य में यह रूपक एक सिलसिले से सामने आता है; लेकिन कविता में यह सिलसिला टूट जाता है, उसी तरह जैसे स्वप्न के भीतर स्वप्न आते हों, उलट-पुलट होकर। कविता में मैंने उस उलट-पुलटपन का निर्वाह करने का प्रयत्न किया है[73]।” अँधेरे में की फैंटेसिक पृष्ठभूमि में इसी उलट-पुलटपन और स्वप्न-तकनीक के कारण मुक्तिबोध समय के बड़े फ़लक में फैले हुए ऐतिहासिक कालखंडों का स्थानांतरण करते हुए उन्हें पुंजबद्ध कर पाते हैं तथा साथ ही वैविध्यमय और विरोधी प्रतीकों का संघनन भी कर पाते हैं। अत: मुक्तिबोधीय फैंटेसी के बारे में यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि वह स्वप्न-कार्य की तकनीक का भरपूर प्रयोग करती है तथा मुक्तिबोध के खुद के स्वप्न और उनका अंतर्मन ही इसका स्रोत है। अत: इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध का संपूर्ण साहित्य और विशेषकर उनकी कविता अँधेरे में स्वप्न-कार्य के तकनीक की उत्कृष्ट प्रयोग की मिसाल बन कर स्थापित हुई है।


पाद-टिप्पणी - 

1.           मुक्तिबोधीय रचना-प्रक्रिया के संदर्भ में रूप और तत्त्व के गतिमय तथा एकात्मक संबंधों पर अधिक पढ़ने के लिए देखें शोध आलेख, “द थ्री मोमेंट्स ऑफ आर्ट एंड ट्रुथ-इवैंट: रिफ्लैक्शन ऑन मुक्तिबोधियन क्रिएटिव-प्रोसैस”। इस लेख को प्राप्त करने के लिए निम्न वेबलिंक पर जाएँ:

http://ellids.com/archives/2019/03/2.3-Bali.pdf

2.       

        मनोविश्लेषक जैक लकां का यह मानना है कि प्रतीकात्मक (Symbolic) वह क्षेत्र है जिसे हम भाषा के माध्यम से जानते है और वास्तविक (Real) वह है जो भाषा की सीमा से सदैव बाहर है। Real अर्थात वास्तविक के माध्यम से लकां यह बताते हैं कि प्रतीकात्मकता या सांकेतिकता (signification) की प्रक्रिया में जो चीज़ भाषा की पकड़ में नहीं आती है, वही Real है। वह प्रतीकात्मक का सतत् अधिशेष है। इस तरह वास्तविक, भाषा और प्रतीकात्मक की सीमा से परे है जिसकी अभिव्यक्त ही नहीं बल्कि कल्पना भी असंभव है। निश्चित रूप से वास्तविक की झलक के कारण ही साहित्यिक फैंटेसिक की भाषा अनगढ़ प्रतीत होती है। अत: फैंटेसिक भाषा का अनगढ़ होना दरअसल भाषा के प्रतीकात्मक ऑर्डर में वास्तविक के चिह्न हैं। इस पर अधिक पढ़ने के लिए देखें समालोचन में प्रकाशित शोध आलेख “भाषा और अवचेतन का सवाल तथा ब्रह्मराक्षसीय ट्रैजेडी”। इस लेख को प्राप्त करने के लिए निम्न वेबलिंक पर जाएँ:

https://samalochan.blogspot.com/2021/02/blog-post_22.html  

3.   

        ध्यातव्य हो कि Trans-individualism और आध्यात्मिक लक्ष्य को तय करने के अपने जीवन के इस दौर में मुक्तिबोध हेनरी बर्गसाँ के दर्शन से अत्यंत प्रभावित थे। बर्गसाँ स्थैतिक और गतिशील धर्मों में भेद करते हुए बताते हैं कि गतिशील धर्म में विश्व-बंधुत्व का विषय रहता है[74] अपनी प्रसिद्ध पुस्तक क्रिएटिव इवोल्यूशन में बर्गसाँ ईश्वर को निर्वैयक्तिक सृजनात्मक प्राणतत्त्व मानते हैं जोकि शुद्ध रचनात्मक गति है जोकि स्वछंद रूप से परिवर्तनशील है[75]। गौरतलब है कि एक ओर जहाँ मुक्तिबोध का Trans-individualism भी किसी निर्वैयक्तिक सत्ता की ओर संकेत करता जान पड़ता है तो वहीं मुक्तिबोध यह निबंध भी आधुनिक समाज में धर्म के विषय पर लिख रहे हैं। इसके साथ ही यह रेखांकित करना भी ज़रूरी लगता है कि बर्गसाँ के लिए परिवर्तनशीलता ही सतत् सृजनात्मकता का स्रोत है जोकि लगातार नव के घटित होने का कारण बनती है। अपने पीएच.डी. के शोधकार्य में मेरी यह स्थापना है कि मुक्तिबोध के यहाँ रचनात्मकता और नवीनता पर अत्यधिक ज़ोर बर्गसाँ के प्रभाव के कारण ही मालूम होता है। कला के तीन क्षण की संकल्पना में नव के घटित होने का क्षण परिवर्तनशीलता की सतत् सृजनात्मकता की ओर संकेत हैं। इसके साथ यह रेखांकित करना भी ज़रूरी है कि मुक्तिबोध के यहाँ बर्गसाँनीय व्यक्तिवाद से विच्छेद भी है। शोध-कार्य में मेरी स्थापना है कि मुक्तिबोध के अनुसार बर्गसाँ प्राणशक्ति में अतर्निहित रचनात्मकता की ओर तो संकेत करते हैं लेकिन उसके पतन तथा प्रतिबंधन के कारणों का भौतिकवादी विवेचन नहीं करते। इस दिशा में मुक्तिबोध बर्गसाँ के दर्शन की सीमाओं की ओर संकेत करते हुए रचनात्मकता के प्रतिबंधन के रूप में आत्म-निर्वासन का भौतिकवादी विश्लेषण करते हैं जहाँ वे मार्क्सवाद की ओर अग्रसर होते हैं। मुक्तिबोध का तार-सप्तक का वक्तव्य इस लिहाज से दृष्टव्य है।

 


संदर्भ -


[1] थियोडोर डबल्यू. अडोर्नो, ऐस्थेटिक थियरी, सं. ग्रेटल अडोर्नो तथा रोल्फ टिडेमन, अनु. रॉबर्ट      ह्यूल्लोट केंटोर, कंटिनियम प्रकाशन, लंदन, न्यूयॉर्क, 2002, पृ. सं. 1

[2] वही, पृ. सं. 2

[3] वही, पृ. सं. 3

[4] परमानंद श्रीवास्तव, कविता का पाठ और काव्य-मर्म, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, 1993,   पृ. सं. 58

[5] नामवर सिंह, कहानी: नई कहानी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1982, पृ. सं. 91-92

[6] नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. सं. 225

[7] रामविलास शर्मा, नई कविता और अस्तित्ववाद, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1978, पृ. सं. 151

[8] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 159

[9] रोज़मेरी जैक्सन, फैंटेसी: द लिटरेचर ऑफ सब्वर्जन, रोटलेज प्रकाशन, लंदन, न्यूयॉर्क, पृ. सं. 4

[10] स्लावोज ज़िज़ेक, द सबलाईम ऑब्जेक्ट ऑफ आइडियोलॉजी, नवयाना, नई दिल्ली, 2008, पृ. सं. 3

[11] सेमो टोम्सिक, द कैपिटलिस्ट अनकांशस: मार्क्स एंड लकां, वर्सो, लंदन, न्यूयॉर्क, 2015, पृ. सं. 115

[12] वही,Tomšič में उद्धृत, पृ. सं. 115

[13] स्लावोज ज़िज़ेक, द सबलाईम ऑब्जेक्ट ऑफ आइडियोलॉजी, नवयाना, नई दिल्ली, 2008, पृ. सं. 5

[14] वही,पृ. सं. 6

[15] सेमो टोम्सिक, द कैपिटलिस्ट अनकांशस: मार्क्स एंड लकां, वर्सो, लंदन, न्यूयॉर्क, 2015, पृ. सं. 115

[16] एम. श्याम राव, मुक्तिबोध: फंतासी और रचना-प्रक्रिया, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, 2012, पृ. सं. 33

[17] वही, पृ. सं. 35

[18] राजेश जोशी, ‘अँधेरे में की आधी सदी’, हमारे समय में मुक्तिबोध,  सं. . अरविंदाक्षण, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृ. सं. 170

[19] मलयज, ‘सतह से ऊपर उठाती रचना’, हमारे समय में मुक्तिबोध. सं. . अरविंदाक्षण. वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृ. सं. 268.

[20] एंड्रू स्लेड, साइकोएनालिटिक थियरी एंड क्रिटिसिस्म, ओरियंट ब्लैकस्वान, तेलंगाना, 2016, पृ. सं. 13  

[21] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 4, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली,1986, पृ. सं. 179

[22] वही, पृ. सं. 180

[23] सिंह, केदारनाथ, "वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह से राजीव कुमार झा की बातचीत", (साक्षात्कारकर्ता: विनोद कुमार झ) मनोवेद डाइजेस्ट 1. 1 (जनवरी-मार्च 2008), पृ. सं. 15.

[24] चंद्रकांत देवताले, मुक्तिबोध: कविता और जीवन-विवेक, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, पृ. सं. 221 

[25] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 6, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1986, पृ. सं. 294

[26] वही, पृ. सं. 311

[27] चंद्रकांत देवताले, मुक्तिबोध: कविता और जीवन-विवेक, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, पृ. सं. 181 

[28] कांति कुमार जैन, महागुरु मुक्तिबोध: जुम्मा टैंक की सीढ़ियों में, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृ. सं. 39

[29] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 6, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 293

[30] कार्ल मार्क्स, कैपिटल: ए क्रिटिकल एनालिसिस ऑफ कैपिटलिस्ट प्रॉडक्शन वॉल्यूम 1, सं. फ़्रेडरिक एंगेल्स, अनु. सेमुयल मूरे तथा एडवर्ड अवेलिंग, लेफ्टवर्ड बुक्स, 2014, पृ. सं. 224 

[31] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 4, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 181

[32] रामविलास शर्मा, नई कविता और अस्तित्ववाद, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली,1978, पृ. सं. 135

[33] वही, पृ. सं. 142

[34] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 4, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 67

[35] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 258

[36] पोथिक घोष, लॉस एज़ रेसिस्टेन्स: टूवर्ड्स अ हरमेन्यूटिक ऑफ रेवोल्यूशन, आकार बुक्स, दिल्ली, 2010, पृ. सं. 12

[37] वही, पृ. सं. 6

[38] वही, पृ. सं. 7

[39] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 260

[40] रामविलास शर्मा, नई कविता और अस्तित्ववाद, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1978, पृ. सं. 161

[41] वही, पृ. सं. 262

[42] वही, पृ. सं. 264

[43] रामविलास शर्मा, नई कविता और अस्तित्ववाद, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1978, पृ. सं. 141

[44] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 266

[45] वही, पृ. सं. 268

[46] जैक लकां, द फॉर फंडामैंटल कान्सैप्टस ऑफ साइकोएनालिसिस, सं. जैक एलेन मिल्लर, अनु. एलन श्रिडन, डबल्यू.डबल्यू. नोर्टन एंड कंपनी, लंदन, न्यूयॉर्क, 1981, पृ. सं. 7

[47] पोथिक घोष, लॉस एज़ रेसिस्टेन्स: टूवर्ड्स अ हरमेन्यूटिक ऑफ रेवोल्यूशन, आकार बुक्स, दिल्ली, 2010, पृ. सं. 19

[48] वही, पृ. सं. 20

[49] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 152

[50] वही, पृ. सं. 238

[51] वही, पृ. सं. 269

[52] वही, पृ. सं. 270

[53] वही, पृ. सं. 349

[54] वही, पृ. सं. 176

[55] वही, पृ. सं. 177

[56] वही, पृ. सं. 178

[57] रणजीत साहा, "मुक्तिबोध: अंधगुहा में अँधेरे से जूझती दो कविताएँ", हमारे समय में     मुक्तिबोध, सं. ए. अरविंदाक्षण, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019, पृ. सं. 155

[58] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 179-180 

[59] चंद्रकांत देवताले, मुक्तिबोध: कविता और जीवन-विवेक, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003, पृ. सं. 132

[60] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 181

[61] वही, पृ. सं. 184-184

[62] दूधनाथ सिंह, मुक्तिबोध साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2013, पृ. सं. 79-80

[63] रामविलास शर्मा, भूमिका’, राग विराग, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2014, पृ. सं. 22-23

[64] दूधनाथ सिंह, मुक्तिबोध साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2013, पृ. सं. 80

[65] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 183-184

[66] वही, पृ. सं. 384

[67] पुरुषोत्तम अग्रवाल, ‘'अँधेरे में': फैंटेसी शिल्प का औचित्य’, 'अँधेरे में' का महत्व, सं. राजेन्द्र कुमार, सुमित प्रकाशन, इलाहाबाद, 2008. पृ. सं. 58

[68] ग्रेग्री यंग गौलडींग: द कोल्ड वॉर पोएट्री ऑफ मुक्तिबोध: ए स्टडी ऑफ हिंदी इंटरनेशनलिस्म 1943-1964 (पीएच.डी. उपाधि के लिए प्रस्तुत अप्रकाशित शोध-प्रबंध), कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले, 2015, पृ. सं. 126

[69] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 6, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 23-24

[70] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, 1986, पृ. सं. 346

[71] वही, पृ. सं. 350

[72] वही, पृ. सं. 349-350

[73] गजानन माधव मुक्तिबोध, मुक्तिबोध रचनावली 2, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली,1986, पृ. सं. 159

[74] याक़ूब मसीह, समकालीन धर्म दर्शन, बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना, 2010, पृ. सं. 186

[75] वही, पृ. सं. 187, 192


 अनूप बाली

शोधार्थी, साहित्यिक कला

स्कूल ऑफ़ कल्चर एंड क्रिएटिव एक्सप्रेशनस (SCCE)

अंबेडकर  विश्वविद्यालय दिल्ली (AUD)

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-35-36, जनवरी-जून 2021, चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue  'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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