शोध : छायावादी कविताओं के बहाने ‘लंबी कविताओं’ के शिल्प पर बहस / राजेश कुमार यादव - अपनी माटी

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शनिवार, जुलाई 31, 2021

शोध : छायावादी कविताओं के बहाने ‘लंबी कविताओं’ के शिल्प पर बहस / राजेश कुमार यादव

छायावादी कविताओं के बहाने ‘लंबी कविताओं’ के शिल्प पर बहस / राजेश कुमार यादव

  

शोध-सार :

    लंबी कविताओं का उद्भव हिंदी-साहित्य के छायावादी काल में हुआ। ये कविताएँ हिंदी-साहित्य का अपना रूप-विधान हैं, संस्कृत काव्यशास्त्र में इन पर चर्चा नहीं की गई है और हिंदी-साहित्य का अपना कोई व्यवस्थित मौलिक काव्यशास्त्र नहीं है। ऐसे में विभिन्न प्रकृति और स्वरूप रखने वाली हिंदी की लंबी कविताओं को हिंदी आलोचना-जगत में कहीं खंड-काव्य कहा जाता रहा है, कहीं प्रबंध-काव्य और कहीं लंबी-कविता। लंबी कविताएँ प्रबंध-काव्य की श्रेणी में आती हैं या मुक्तक-काव्य की, इस पर भी कोई निर्णयात्मक एकता देखने को नहीं मिलती। लंबी कविताओं को पहचानने या उन्हें नियमित करने का उपक्रम आलोचना जगत में हुआ ज़रूर; पर उनमें परस्पर सामंजस्य का अभाव रहा। दरअसल, लंबी कविताएँ प्रबंध-काव्य की श्रेणी में ही आएँगी, मुक्तक में नहीं; पर इनकी रचना-प्रक्रिया में मुक्तक-काव्य का भी योगदान रहता है। लंबी कविताएँ प्रबंध-काव्य और मुक्तक-काव्य, दोनों के ढाँचे को तोड़कर निर्मित होती हैं। इस तरह उनकी प्रकृति दो तरह की हो जाती है प्रबंधधर्मी लंबी कविताएँ और मुक्तकधर्मी लंबी कविताएँ। प्रबंधात्मकता दोनों तरह की लंबी कविताओं में होती है, यद्यपि कि मुक्तकधर्मी लंबी कविताओं में मुक्तक-काव्य के गुण भी विद्यमान रहते हैं।

 

बीज-शब्द : लंबी-कविता, शिल्प-विधान, प्रबंध, मुक्तक।

 

मूल आलेख

    यद्यपि कि कृतियाँ पहले लिखी जाती हैं और शास्त्रीय नियम उनको आधार में रखकर बाद में बनाए जाते हैं, पर मात्र इतने से ही शास्त्रीय विधानों की अपनी महत्ता गौण नहीं हो जाती। कालजयी कृतियों के आधार पर बनाए हुए शास्त्रीय नियम आने वाली कृतियों को लगातार प्रभावित करते हैं, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। अतः नए शिल्प की रचनाओं को शास्त्र-संवलित करना आलोचकों का धर्म होना चाहिए। हिंदी आलोचना-जगत में लक्षित ‘लंबी-कविता’ पर यद्यपि काफ़ी चर्चा-परिचर्चा हो चुकी है परंतु आज भी किसी के लिए यह जिज्ञासा का विषय हो सकता है कि ‘लंबी-कविता’ क्या कोई सैद्धांतिक नाम है? मतलब क्या ‘लंबी-कविता’ के मानक-लक्षण निर्धारित हैं? किन कविताओं को ‘लंबी कविता’ के नाम से अभिहित किया जा सकता है? लंबी-कविता प्रबंध-काव्य की श्रेणी में आती है या मुक्तक? आदि-आदि। यह जिज्ञासा का विषय इसलिए हो सकता है क्योंकि जिन-जिन कविताओं को लंबी-कविता के दायरे में समेटने की कोशिश की गयी उनमें परस्पर अंतर-बाह्य स्तर पर बहुत कुछ विभेद परिलक्षित किए जाते हैं। इन्हीं कारणों से एक ही कविता को कहीं खंडकाव्य तो कहीं लंबी-कविता कहा जाता रहा है, प्रसाद की ‘आँसू’ इसी तरह का काव्य-रूप है। “निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ के बारे में यह सवाल आलोचकों द्वारा उठाया जाता रहा है कि इस कविता का काव्यरूप क्या है? दरअसल यह कविता महाकाव्य या खंडकाव्य नहीं है बल्कि आधुनिक युग का एक नया काव्यरूप है।”[i]

 

    दरअसल इन सब संशयों के मूल में प्रबंध और मुक्तक काव्य का निर्धारित ढाँचा है। ‘लंबी-कविता’ क्योंकि दोनों काव्य-रूपों को तोड़कर उन्हीं की सामग्रियों से नया काव्य-रूप खड़ा करती है अतः इसके दो रूप परिलक्षित होते हैं। जब यह मुक्तक-काव्य के ढाँचे को तोड़ती है तब इसका स्वरूप मुक्तकधर्मी और जब प्रबंध के ढाँचे को तोड़कर निर्मित होती है तब प्रबंधधर्मी होता है। इन प्रबंधधर्मी लंबी कविताओं को कुछ आलोचक ‘प्रबंध-काव्य’ के भेद के अंतर्गत आने वाले ‘खंड-काव्य’ के रूप में देखते हैं, वे उसे ‘लंबी-कविता’ मानने के पक्ष में नहीं हैं। ऐसा दृष्टिकोण रखने वाले विद्वान मुक्तकधर्मी लंबी कविताओं को ही ‘लंबी-कविता’ की श्रेणी में रखना पसंद करते हैं। इस तरह की मान्यता के पीछे भी कुछ तार्किक कारण मौजूद हैं। दरअसल यह एक अघोषित प्रवृत्ति है कि ‘कविता’ शब्द का आशय छोटी कविता या मुक्तक-काव्य से लगाया जाता है, बड़ी कविताओं को ‘काव्य’ कहने की प्रवृत्ति रही है— महाकाव्य, खंड-काव्य या    प्रबंध-काव्य। इस हिसाब से ‘लंबी-कविता’ का आशय मुक्तकधर्मी लंबी-कविता से जोड़ा जाता है और प्रबंधधर्मी लंबी कविताओं को ‘खंड-काव्य’ कह दिया जाता है।

 

    यह पहले कहा जा चुका है कि मुक्तकधर्मी लंबी-कविता मुक्तक-विधान के ढाँचे को तोड़कर विकसित होती है। पहले कवि मुक्तकों में कोई ‘भाव-खंड’ व्यक्त करते थे, अतः उनकी अभिव्यक्ति भावों के अनुकूल किसी एक छंद यानी ‘छोटी-कविता’ में हुआ करती थी; पर जब कविता में ‘विचार-खंड’ अभिव्यक्ति पाने लगे तब छंद का बंधन भी टूट गया और विचार-खंड की प्रकृति के अनुसार कविता का आकार छोटा-बड़ा होने लगा; तब छोटी कविताओं के मुक़ाबले बड़ी कविताओं को अलगाने के लिए उन्हे लंबी-कविता नाम दिया जाने लगा। मतलब ‘लंबी कविता’ को यह नाम ‘छोटी कविता’ के मुकाबले दिया गया, और छोटी कविताएँ प्रबंध-काव्य के मूल तत्त्व ‘कथात्मकता’ से अलग होती थीं। अतः शुरू में कथात्मक लंबी कविताओं को ‘खंड काव्य’ की श्रेणी में रखने का उपक्रम हुआ।

 

कथात्मक लंबी कविताओं का विधान यद्यपि पुराने खंड-काव्यों से अलग है, पुराने खंड-काव्य सर्गबद्ध हैं और आकार में उनसे बड़े भी हैं, पर खंडकाव्य की परिभाषा और लक्षण में ही यह बात कह दी गयी है कि ये सर्गबद्ध भी हो सकते हैं और बिना सर्ग के भी। उनके स्थूल आकार के बारे में भी किसी बंधन की बात नहीं की गयी है। अतः इस नियम ने भी इस तरह की लंबी कविताओं को खंड-काव्य माने जाने का रास्ता दिखाया। खंड-काव्य का पहली बार लक्षण आचार्य विश्वनाथ ने दिया था और उन्होंने उसे बहुत स्थूल माप-तौल के बंधन से मुक्त रखा था। काव्य के भेदों का विवेचन अपने ग्रंथ साहित्यदर्पण के छठवें अध्याय में करते हुए उन्होंने महाकाव्य के अलावा प्रबंध-काव्य के दो और भेद किए हैं— ‘काव्य’ और ‘खंड-काव्य’। खंड-काव्य के लक्षण उन्होंने महाकाव्य के नहीं, बल्कि ‘काव्य’ के लक्षणों के सापेक्ष दिया। ‘काव्य’ नामक भेद का लक्षण देते हुए उन्होंने कहा–

भाषाविभाषानियमात्काव्यं सर्गसमुज्झितम्।

एकार्थ प्रवणै: पद्यै: संधिसामग्र्यवर्जितम्॥[ii]


    अर्थात ‘काव्य’ भाषा या विभाषा में लिखा जाने वाला वह पद्यमय काव्यरूप है जिसमें सर्गों का बंधन अनिवार्य नहीं है और न ही सभी संधियों का। वह एकार्थ (चार पुरुषार्थों में से एक) प्रवण होता है। इसके बाद इसी के सापेक्ष खंड-काव्य की परिभाषा आचार्य विश्वनाथ ने इस प्रकार दी है– खंडकाव्यं भवेत्काव्यस्यैकदेशानुसारि च।[iii] अर्थात खंड-काव्य ‘काव्य’ का एकदेशानुसारी होता है। ऐसे में प्रबंधात्मक लंबी कविताओं को खंड-काव्य की श्रेणी में लाने का उपक्रम हो, स्वाभाविक है। इन सबके अलावा भी आधुनिक काल में आकर जब कामायनी जैसे अपेक्षाकृत बहुत छोटे आकार के प्रबंध को उसके भव्य-विधान के कारण महाकाव्य की श्रेणी में रखा जाता है तो इन प्रबंधों को खंडकाव्य की श्रेणी में रखे जाने के पर्याप्त कारण हैं! पर इन कारणों का परिहार इस तर्क से किया जा सकता है कि हिंदी में प्रचलित खंडकाव्यों का रूप इन प्रबंधात्मक कविताओं से काफी अलग है, अतः नए प्रकार के काव्य-रूप के लिए नया नाम ही उपयुक्त हो सकता है। नया-नाम ‘लंबी-कविता’ अब रूढ़ हो चुका है तो इसे ही स्वीकार किया जा सकता है।

 

    अब देखना यह है कि प्रबंधधर्मी और मुक्तकधर्मी लंबी कविताएँ जिन्हें अब संयुक्त रूप से ‘लंबी-कविता’ के नाम से अभिहित किया जाता है उनमें क्या इतना अंतर्विरोध है कि उनके रूप को लेकर विवाद की स्थिति बने! दरअसल यहाँ जो विवाद का भासित तत्त्व है वह है प्रबंधात्मकता। यह आभासित इसलिए होता है क्योंकि इसे कथात्मकता से जोड़कर देखा जाता है। प्रबंधात्मकता जब बड़े काव्य से इतर छोटे काव्य को अपनाएगी तब उसका स्वरूप अकथात्मक भी हो सकता है, यह इस संशय या विवाद का मुख्य समाधान है। अकथात्मक-प्रबंध मुक्तकधर्मी लंबी कविता का रूप लेता है और कथात्मक-प्रबंध प्रबंधधर्मी लंबी-कविता का। यों ‘प्रबंधात्मकता’ लंबी कविता का अनिवार्य तत्व है। मुक्तकधर्मी लंबी-कविता भी प्रबंध-काव्य है।

 

    लंबी कविताओं के जन्म का मामला छायावाद से जुड़ा हुआ है और पंत की ‘परिवर्तन’ नामक कविता से इसका आविर्भाव माना जाता है। छायावाद में वैचारिक दबाव के कारण कवियों ने मुक्त-छंद का आविष्कार किया। लंबी कविताओं के जन्म का मामला मुख्य रूप से मुक्त छंद और वैचारिक तनाव के जन्म से ही जुड़ा हुआ है। छायावादी युग में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक आंदोलन की जिम्मेदारी के वैचारिक दबाव, समाज में व्याप्त अनेकानेक रूढ़ियों से मुक्ति चाहने के वैचारिक दबाव और मानवता की स्थापना आदि के वैचारिक दबावों ने कवियों के दिलो-दिमाग को हिलाकर रख दिया। उनके अंदर तमाम विचार-खंड या विचार-श्रृंखलाएँ पनपने लगीं। इनकी अभिव्यक्ति किसी एक छंद या छोटी कविताओं में नहीं हो सकती थी, अतः मुक्त-छंद का आविष्कार किया गया। और फिर मुक्त-छंद ने प्रायः मुक्तकधर्मी लंबी कविताओं के सृजन का रास्ता साफ़ किया। पहले कवि जब मुक्तकों में रचना करते थे तो अपनी एक बात वे एक छंद में खत्म कर देते थे और कहते थे कि ‘मैंने एक सवैया बनाया है, एक कवित्त बनाया है या एक अमुक छंद बनाया है।’ मुक्त-छंद का प्रचार होने से कविता का आकार अनिश्चित होने लगा। आकार यहाँ छंदों पर निर्भर न रहकर पंक्तियों पर निर्भर हो गया। एक बात के लिए, बात की प्रकृति के अनुकूल, कविताएँ दो-तीन पंक्तियों में भी सिमटने लगीं और बहुत सारी पंक्तियों में बद्ध होकर कई पेजों में भी विस्तृत होने लगीं। वैचारिक दबाव, आंतरिक तनाव आदि के चलते जब कविताएँ चार-पाँच या इससे अधिक पेजों में विस्तृत होने लगीं तो उन्हें सामान्य कविताओं से अलगाने के लिए उनके आकार को ध्यान में रखकर उन्हें लंबी-कविताएँ कहा जाने लगा। इस तरह की लंबी कविताएँ मुक्तकधर्मी होती हैं। वैचारिक तनाव एक निश्चित आयाम चाहते हैं। ज्यादा छोटे आकार में वे अट नहीं पाएँगे और ज्यादा बड़े आकार में उनकी कसावट के ढीले होने का ख़तरा है। अतः वे मुक्तक के ढाँचे को तोड़कर जहाँ अपना आकर निर्मित करते हैं, वहीं प्रबंध के ढाँचे को सिकोड़कर! प्रबंधात्मक ढाँचे से निर्मित प्रबंधात्मक कविताओं को भी इसीलिए ‘लंबी कविताएँ’ कहा जाने लगा।

 

    जैसा कि ऊपर कहा गया, पंत की परिवर्तन नामक कविता से लंबी कविताओं की शुरुआत मानी जाती है। उल्लेखनीय है कि पंत की ‘परिवर्तन’ मुक्तकधर्मी लंबी कविता है, इसी युग में बाद में आने वाली प्रबंधधर्मी लंबी कविताओं से अलग; यद्यपि कि, जैसा कहा गया, प्रबंधात्मकता लंबी कविताओं का अनिवार्य लक्षण है। इन सारे संदर्भों में लंबी कविता का ‘लंबी’ शब्द एक तरह से ‘प्रबंध’ का ही पर्याय है। लंबी कविताओं के जन्म के पहले तक मुक्तकों और प्रबंधों में अंतर स्थापित करने वाला मुख्य तत्त्व ‘कथा’ होती थी। लंबी कविताओं ने इस स्थिति में थोड़ा परिवर्तन उत्पन्न कर दिया है। उसने दिखाया कि छोटे प्रबंध को गढ़ने के लिए कथा कोई ज़रूरी तत्व नहीं रह जाता। बावजूद इन सबके, कथा प्रबंध-काव्य से अनिवार्य रूप से जुड़ी है। मतलब जिस काव्य में सुसंबद्ध कथा होगी वह अनिवार्यतः प्रबंध-काव्य ही होगा, वह मुक्तक नहीं हो सकता; भले ही कुछ प्रबंध-काव्य कथाविहीन होते हों। कथा के साथ प्रबंध के इसी संबंध के कारण ही लंबी-कविता के यहाँ प्रबंधधर्मी और मुक्तकधर्मी दो भेद किए गए हैं। मुक्तकधर्मी लंबी-कविता यहाँ उन्हें कहा जा रहा है जो किसी ‘कथा’ के ढाँचे में बंधी हुई नहीं होतीं, यद्यपि कि वे किसी न किसी मन:-स्थिति, विचार, परिस्थिति, वातावरण आदि के वर्णन के ढाँचे में अवश्य बंधी हुई होती हैं। इसीलिए उन्हें मुक्तकधर्मी प्रबंध वाली लंबी कविता कहा जा रहा है। मुक्तकधर्मी इसलिए कि उनमें मुक्तकों के गुण भी विद्यमान रहते हैं। प्रबंधधर्मी लंबी कविताएँ किसी न किसी कथा के ढाँचे में बंधी हुई होती हैं। अतः लंबी कविता के दो पक्ष हुए— प्रबंधधर्मी लंबी कविता और मुक्तकधर्मी लंबी कविता। इन्हें कथात्मक और अकथात्मक लंबी-कविता भी कहा जा सकता है, कहा जाता है।

  

    यह बात भी विचारणीय है कि स्थूल स्तर पर मुक्तकधर्मी लंबी कविताएँ नए तरह की प्रबंधात्मक लंबी कविताओं के आकार-प्रकार की होतीं थीं, दोनों मुक्तक और प्रबंध के लिए निर्धारित या प्रचलित दायरों का अतिक्रमण करती थीं, अतः नामकरण के संदर्भ में दोनों को ‘लंबी कविता’ के दायरे में समेट लिया गया। यों, लंबी कविता के नामकरण में आकारगत तत्त्व की प्रमुखता को नकारा नहीं जा सकता। मुक्तकधर्मी या अकथात्मक लंबी कविताओं के भी दो रूप परिलक्षित किए जा सकते हैं— प्रगीतात्मक लंबी-कविता और विचारात्मक लंबी-कविता। प्रगीतात्मक लंबी कविताओं में मुक्तकधर्मिता कुछ ज्यादा मात्रा में होती है, शायद इसीलिए कई आलोचक प्रगीतात्मक लंबी कविताओं को लंबी कविता नहीं मानना चाहते— “पंत का अधिकांश काव्य प्रगीतात्मक है। बावजूद इसके उनकी कविता ‘परिवर्तन’ को कई आलोचकों ने लंबी कविता कह डाला है। कारण कि लंबी कविता के केंद्र में उसकी लंबाई मान ली गई है।”[iv] विचारात्मक लंबी कविताएँ अपनी प्रबंधात्मकता के मामले में प्रगीतात्मक लंबी कविताओं से ज्यादा कसी हुई होती हैं। उनमें वैचारिक-तनाव के सहारे किसी भी स्थिति-परिस्थिति का मंथनपरक विश्लेषण रहता है। मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ या धूमिल की ‘पटकथा’ आदि इसी तरह की लंबी कविताएँ हैं।

 

    कथात्मक लंबी कविताओं में खंड-काव्यों या प्रबंधात्मक-कविताओं की तरह कोई कथा कही जाती है, उनमें पात्र होते हैं, स्थान होता है, समय होता है और वातावरण होता है। और उसकी कथा तारतमिक ढंग से कही जाती है। मतलब इसमें कथा-क्रम का निर्वाह किया जाता है। कथा व्यक्ति के जीवन के किसी एक खंड से जुड़ी होती है, फिर वह जीवन-खंड चाहे जितना छोटा हो। जबकि मुक्तकधर्मी लंबी-कविताओं में किसी कथा का नहीं, किसी स्थिति और परिस्थिति का चित्रण होता है। इसमें पात्र प्रायः नहीं रहते, रहते हैं तो भी प्रछन्न या संकेतित रूप में—स्थितियों या परिस्थितियों के चित्रण की गहनता में ही सहायक होने के लिए। जिनमें ‘कथा’ नहीं, वो मुक्तकधर्मी लंबी-कविता हैं और जिनमें ‘कथा’ होती है, वो प्रबंधधर्मी लंबी-कविता। निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ या ‘तुलसीदास’ नामक कविताएँ कथात्मक लंबी-कविता की उदाहरण हैं।

 

    ऊपर दी गई स्थापनाओं की पुष्टि के लिए हिंदी आलोचकों द्वारा ‘लंबी कविता’ में परिगणित प्रबंधात्मक लंबी कविताओं और मुक्तकधर्मी लंबी कविताओं के बीच के फ़र्क का विश्लेषण किया जा सकता है। क्योंकि लंबी कविताओं की शुरुआत छायावादी-युग में हुई अतः इस संदर्भ में छायावाद के ही दो कवियों, पंत और निराला, की कृतियों को आधार बनाया जा सकता है। निराला की राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास वैसे ही लंबी कविताएँ नहीं हैं जैसे की पंत की परिवर्तन है। निराला की ये कविताएँ कथात्मक लंबी-कविता के अंतर्गत आएँगी और पंत की परिवर्तन अकथात्मक। पंत की परिवर्तन से ही लंबी कविताओं की अवधारणा ने जन्म लिया, इस दृष्टि से इसके स्वरूप का विवेचन महत्वपूर्ण है।

 

    परिवर्तन नामक कविता जीवन और जगत के दिन-प्रतिदिन बदलते जाने की प्रक्रिया को रेखांकित करने वाली कविता है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है इस तथ्य को लेकर इस कविता में पल-पल परिवर्तित या समय-समय पर परिवर्तित जीवनगत स्थितियों का चित्रण किया गया है, इसमें कोई ‘कथा’ नहीं कही गयी है। कविता अतीत के सुख और वैभव की काल्पनिक दुनिया के परिप्रेक्ष्य में आधुनिक दुख-दैन्य को लेकर शुरू होती है– कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल/ भूतियों का दिगंत छवि जाल,/ ज्योति चुंबित जगती का भाल?/ राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन विस्तार?[v] इसके बाद दो बंद और इस काल्पनिक दुनिया पर, और फिर सीधे इस पर अविश्वास की घोषणा– हाय! सब मिथ्या बात! –/ आज तो सौरभ का मधुमास/ शिशिर में भरता सूनी साँस!/ वही मधुऋतु की गुंजित डाल/ झुकी थी जो यौवन के भार,/ अकिंचनता में निज तत्काल/ सिहर उठती, - जीवन है भार![vi] फिर पूरी कविता इसी अवधारणा को तरह-तरह के वर्णनों से चित्रित करती रहती है कि परिवर्तन के प्रहार से कोई बचता नहीं है। वह अपने में सबको लपेट ही लेता है! परिवर्तन का प्रहार मतलब सुख के बाद दुख का आगमन! दुख से परे रहने की दिली चाहत के बीच कवि का मन जीवन और जगत में इसकी सत्ता के स्थायित्व को नकार पाने की होड़ में हार-सा जाता है। और फिर स्वीकारोक्ति की प्रक्रिया से गुजरता है–हाय री दुर्बल भ्रांति! –/ कहाँ नश्वर जगती में शांति?/ सृष्टि का ही तात्पर्य अशांति![vii] कहीं-कहीं सुख संचारी भाव की तरह कवि के मानसपटल पर आ जाता है और वह इसकी भी संचारी सत्ता को अभिव्यक्ति प्रदान कर देता है, पर उसका मूल ध्यान परिवर्तन में दुख की ही तरफ है। कविता में मनःस्थितियों के अनुसार भावखंडों का चित्रण हुआ है। कहीं परिवर्तन का मानवीकरण कर उसे संबोधित करते हुए उसकी कार्यप्रणाली का वर्णन किया गया है तो कहीं उसे परिप्रेक्ष्य में रखकर उसकी विशेषताओं का। एक ही मन:स्थिति के चित्रण में भी कविता के हर बंद का चित्रण दूसरे बंद के चित्रण पर निर्भर नहीं है। कविता को कहीं भी खत्म किया जा सकता था या उसका इसी क्षेत्र की तमाम भावनाओं या विचारों के आधार पर और भी विस्तार किया जा सकता था, क्योंकि कविता में वैसा प्रबंधत्व नहीं है जैसा कथात्मक कविताओं में होता है। कुल मिलाकर यह प्रगीतात्मक लंबी-कविता है और इसमें प्रगीत के गुण विद्यमान हैं।

 

    ‘परिवर्तन’ नामक कविता में आंगिक प्रबंधत्व नहीं होने का एक आधार पहले ही बताया गया कि इसमें कोई कथा नहीं कही गयी है, परिवर्तन को लेकर कवि ने अपनी मनःस्थितयों का चित्रण किया है। दूसरा यह है कि इसके सभी बंद आपस में इस तरह से बंधे हुए नहीं हैं कि एक के न रहने से दूसरे की संपूर्णता प्रभावित हो। अर्थात इसमें आंगिक अन्विति भी नहीं है। तीसरे, इसमें कोई पात्र नहीं है। चौथे, कोई समय और स्थान नहीं है, यद्यपि वातावरण मौजूद है। अतः यह कविता आंगिक प्रबंधत्व से रहित है; पर इसमें प्रबंधत्व है। इसमें भावों और विचारों का प्रबंधत्व है। सारे भाव और विचार ‘परिवर्तन’ की प्रकृति को व्याख्यायित करने में आपस में जुड़े हुए हैं। प्रगीतात्मक लंबी-कविता में प्रबंधत्व की प्रकृति ऐसी ही होती है। प्रगीत भी एक तरह की मनः-स्थिति को विभिन्न प्रकार से व्याख्यायित करने का उपक्रम हुआ करता है। जैसे महादेवी वर्मा का ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ या निराला का ‘स्नेह निर्झर बह गया है’ नामक प्रगीत। अतः प्रगीतात्मक लंबी-कविता भी प्रगीत के गुणों से लैस होती है। इस तरह की कविताओं को देखकर इस तथ्य की तरफ ध्यान जा सकता है कि पेज-विस्तार भी लंबी-कविता का मुख्य अंग है। लगभग सोलह पेज की यह कविता है।

 

    निराला की राम की शक्ति पूजा रूप और वस्तु के स्तर पर पंत की परिवर्तन से भिन्न है, आलोचकों ने उसे भी लंबी-कविता का नाम दिया है। राम की शक्तिपूजा में कथा है, पात्र हैं, आंगिक अन्विति है; और स्थान, समय, वातावरण सब हैं। वह कथा और इसके तत्वों से बंधी हुई रचना है। अतः राम की शक्तिपूजा में आंगिक प्रबंधत्व है।

 

    ‘राम की शक्तिपूजा’ का विधान प्रबंधात्मक है। एक तो यह कथात्मक प्रवाह में लोकव्याप्त मिथकीय कथा से संबध्द है, दूसरे इसमें लोक-मिथ की प्रकृति के अनुकूल ही कुछ और घटनाएँ जोड़कर कथा को प्रतीकात्मक विश्वसनीय संदर्भ देने की कोशिश की गई है। शुरू से लेकर अंत तक कविता में एक प्रवाह है। यह प्रवाह कथात्मकता का ही है। मिथकीय कथा के पूर्वापर-संबंध के आधार पर कथा शुरू होती है राम-रावण के बीच हुए युद्ध की विभीषिका के वर्णन से : रवि हुआ अस्त, ज्योति के पत्र पर लिखा अमर/ रह गया राम रावण का अपराजेय समर।[viii] मिथकीय कथा के पूर्वापर संबंध का आशय है कि रामायण या महाभारत आदि मिथकीय ग्रंथों की कथाएँ लोक में व्याप्त होती हैं। यह जितनी ग्रंथों की नहीं होतीं उतनी शायद लोक की सामग्री होती हैं। उनके किसी भी प्रसंग को लेकर बिना किसी पूर्वापर भूमिका या परिचय के काव्य रचे जा सकते हैं। तमाम खंडकाव्य ऐसे ही मिथकीय कथा के पूर्वापर संबंधों के आधार पर ही लिखे गए हैं। यहाँ पर राम और रावण तथा उनके आपसी संबंधों से सभी पाठक पूर्व परिचित होते हैं। कथा शुरू होते ही यह पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि राम कौन है, रावण कौन है, और इनके बीच में लड़ाई क्यों हो रही है; आदि। पूरी प्रक्रिया से सामान्यतः पाठक परिचित रहता है। इस पृष्ठभूमि का सहारा लेकर मिथक की प्रकृति के अनुसार रचनाकार उसमें संभाव्य नए-नए प्रसंगों की उद्भावना कर सकता है। तमाम रचनाकार सफलतापूर्वक करते भी आए हैं।निराला ने कृत्तिवास के ‘बंगला रामायण’ से शक्तिपूजा का प्रसंग लिया और उसे तत्कालीन राष्ट्रीय आंदोलन के अनुरूप बनाकर पेश किया। किसी भी संघर्ष में हताश हो रहे व्यक्ति, समाज और देश को अपने अंदर नए तरीके से आत्मबल विकसित करने की प्रेरणा देने वाली है यह कृति। खैर!

 

    इसकी प्रबंधात्मकता, जैसा कि पहले कहा गया, इसमें है कि इस पूरी कृति में एक कथात्मक प्रवाह है। इसके किसी भी अंग को इसमें से निकाला नहीं जा सकता, सभी अंग ज़रूरी हैं उसके लिए। किसी भी अंग को निकालने से काव्य का प्रवाह प्रायः बाधित-सा हो जाएगा। और इस काव्य को पंत की परिवर्तन कविता की तरह कहीं भी समाप्त नहीं किया जा सकता। इसमें पात्र हैं, स्थान है, वातावरण है, घटनाएँ हैं; जो कथा-काव्य के अनिवार्य तत्त्व हैं। आधुनिक युग में प्रबंध के सूक्ष्म-विधान आने के पहले तक कथा-काव्य ही प्रबंध-काव्य हुआ करते थे। पात्र मुक्तक कविता में भी हो सकते हैं पर वहाँ उनकी स्थिति दूसरी होती है, यद्यपि प्रायः मुक्तक कविताओं में या तो पात्र रहते नहीं हैं या रहते भी हैं तो उनकी कोई विशेष ‘आइडेंटिटी’ नहीं होती है। मुक्तकों में जहाँ पात्र होते हैं प्रायः वहाँ पर कोई प्रसंगोद्भावना की गयी होती है और उसके अनुकूल उसमें या तो पात्रों के क्रियाकलापों का वर्णन कवि ने खुद किया होता है या किसी एक पात्र का ही किसी विशेष प्रसंग में कोई कथन होता है। और मुक्तकों में यह सब किसी पूर्वापर संबंध की अपेक्षा नहीं रखता, अपने में पूर्ण होता है— जैसे बिहारी के इस दोहे में का क्रियाकलाप, जिसमें उसका वर्णन कवि खुद कर रहा है : कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।/ भरे भौन में करत हैं, नैनन ही सौं बात।।[ix] यहाँ यह पूछने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती कि कौन बात कर रहा है, या क्या बात कर रहा है, किसलिए बात कर रहा है; आदि। सब कुछ पता चल जाता है। पात्रों की भी कोई ख़ास ‘आइडेंटिटी’ नहीं है। पात्र कौन हैं, यह भी जानने की विशेष ज़रुरत नहीं पड़ती। नायक-नायिका हैं, श्रृंगारिक क्रिया-कलाप कर रहे हैं। नायक-नायिका को लेकर ऐसे तमाम प्रसंगों की कल्पना की गयी है रीतिकाल के मुक्तकों में।

 

    दूसरे उदाहरण के रूप में है कालिदास त्रिवेदी जी का यह कवित्त जिसमें एक पात्र ‘नायिका’ का कथन नायक ‘कृष्ण’ के प्रति है : चूमौ करकंज मंजु अमल अनूप तेरो/ रूप को निधान कान्ह मो तन निहारि दै।/ कालिदास कहैं मेरो पास हरै हेरि-हेरि/ माथे धरि मुकुट लकुट कर डारि दै।/ कुँवर कन्हैया मुख-चन्द्र को जुन्हैया चारु/ लोचन चकोरन की प्यासन निवारि दै।/ मेरे कर मेंहदी लगी है नंदलाल प्यारे/ लट उरझी है नकबेसरि संभारि दै।[x] यहाँ भी किसी पूर्वापर संबंध की अपेक्षा नहीं है, पात्र की भी कोई ख़ास ‘आइडेंटिटी’ नहीं है। यह किसी नायिका का किसी भी नायक से चुहल-भरा आग्रह हो सकता है। प्रसंगोद्भावना है कि नायिका को कृष्ण दिख जाते हैं, अब वह उनका सुंदर मुख निकट से देखना चाहती है। अतः वह अपने बालों को नकबेसर में उलझाकर उनसे बहाना बनाती है कि उसके हाथों में मेहंदी लगी है इसलिए वह अपनी उलझी हुई लट को अपने हाथों से नहीं सुलझा सकती, वे कृपा करके उसे सुलझा दें। यहाँ यह कवित्त अपने आपमें पूर्ण है। नायिका का कथन कहीं भी अधूरा-अधूरा सा नहीं लग रहा है कि इसके आगे-पीछे कुछ न कुछ होना चाहिए था अन्यथा यह समझ में नहीं आएगा, इसका अर्थ नहीं खुलेगा, आदि। जबकि ‘राम की शक्तिपूजा’ में का जाम्बवान का यह कथन पूर्वापर संबंधों की पूरी अपेक्षा रखता है : रघुवर,/ विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण/ हे पुरुष सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,[xi] रघुवर क्यों विचलित हो रहे थे? स्थितियाँ क्या थीं? उन्हें कौन सी शक्ति धारण करने के लिए कहा जा रहा है? यह कहाँ की बात है? आदि की अपेक्षा तुरंत मन में जाग जाएगी। यद्यपि जाम्बवान का कथन और आगे तक चलता है पर उनके पूरे कथन को अलग से उद्धरित करने के बाद भी उसकी अपनी स्वायत्तता नहीं बन पाएगी। उसे पूर्वापर संबंध चाहिए ही! और यद्यपि कभी-कभी प्रबंध काव्यों के कुछ छंदों या बंदों को मुक्तक की तरह स्वतंत्र रूप से पेश किया जा सकता है, पर प्रबंध में होते हैं वे उसी कथा-प्रवाह के अंग—प्रबंध में उनके न रहने से उसकी आंगिक अन्विति प्रभावित होगी।

 

    ‘राम की शक्तिपूजा’ की कथा में शुरुआत है, मध्य है और अंत है। शुरुआत में राम और रावण का युद्ध चल रहा है, राम लाख प्रयत्न करने के बावजूद रावण को हरा नहीं पाते हैं। मध्य में अपने पारिषदों के बीच वे इसके हल के लिए एक सभा आयोजित करते हैं, जिसमें तरह-तरह के विचार विमर्श होते हैं— रावण को हराने के लिए। अंत में इसका हल यह निकाला जाता है कि राम भी उस शक्ति की आराधना करें जो रावण की ओर होकर उन्हें मजबूत बना रही हैं। राम ने आराधना की, और शक्ति राम के वदन में समाहित हो गयी। इस कथात्मक बुनावट में वर्णनों के बीच-बीच में सघन भावनाओं, वातावरण की सघनताओं को रचा गया है, बिंबों और प्रतीकों के सहारे या सीधे-सीधे! कठिन परिस्थितियों में लोगों को अपने जीवन के कोमलतम क्षण याद याते हैं, यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। राम के सामने जब कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं तो उन्हें अपनी पत्नी सीता और माँ की याद आती है। जब राम को एहसास होने लगता है कि वे रावण को शायद नहीं हरा पाएँगे, रावण के पास ज्यादा शक्ति है; जब इस एहसास के कारण वे सोच में पड़कर परेशान होते हैं तो उन्हें सीता की याद आती है : ऐसे क्षण घन अंधकार में जैसे विद्युत/ जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका छवि, अच्युत/ देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन/ विदेह का,—प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन।[xii] फिर राम के मन में उस समय के सारे दृश्य सजीव हो उठते हैं जब उन्होंने सीता को पहली बार जनक-वाटिका में देखा था, और दोनों की आँखें मिली थीं।

 

    ऐसे ही जब पूजा पूरी होते-होते रह जाने के आसार दिखाई देने लगते हैं, पूजा का अंतिम पुष्प परिहास-वश देवी दुर्गा के उठा ले जाने के कारण। तब राम के मन में एक बार फिर निराशा का संचार होता है। बड़ी कठिन और महत्वपूर्ण तपस्या, जिसके पूरे हो जाने पर जीवन की पूरी आशाएँ टिकी हुईं हैं, एकदम अंतिम पड़ाव पर, पूरे होते-होते खंडित हो जाने के कगार पर आ जाए तो तपस्वी का विचलित हो जाना स्वाभाविक है। ऐसे में राम अपने जीवन को धिक्कारना शुरू करते हैं : धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध/ धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध/ जानकी हाय उद्धार प्रिया का हो न सका।[xiii] और फिर जीवन की इस कठिनतम बेला में उन्हें अपनी माँ की याद आती है। माँ की याद आते ही उन्हें समस्या के समाधान का बिंदु भी मिल जाता है। माता जी उन्हें राजीव-नयन कहकर बुलाया करती थीं। अतः पूजा के लिए कम हुए एक नील-कमल की पूर्ति वे अपने एक नयन को अर्पित कर करेंगे : “यह है उपाय कह उठे राम ज्यों मंद्रित घन/ कहती थीं माता मुझे सदा राजीव नयन!/ दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण/ पूरा करता हूँ देकर मात: एक नयन।”[xiv] राजीव-नयन कहने से माँ का स्नेह अपने बेटे के प्रति झलक रहा है। और उस प्रसंग को निराला ने जीवन की उस कठिन परिस्थिति में लाकर वातावरण को संवेदनात्मक बनाने में पूरी सफलता प्राप्त की है। राम अपना नयन निकालने के लिए बाण निकालते हैं। ज्यों ही उसे नयनों के पास ले जाते हैं, दुर्गा आकर उनका हाथ पकड़ लेती हैं, और उन्हें जीत का आशीर्वाद देकर उनके वदन में लीन हो जाती हैं। इस तरह के कुतूहलपूर्ण घटनात्मक उतार-चढ़ाव के साथ शक्तिपूजा की कथा को ढाँचा प्रदान किया गया है। इससे स्पष्ट है कि यह कविता प्रबंधधर्मी है।

 

निष्कर्ष :

    उपर्युक्त विवेचन और विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि लंबी कविता के मुख्यतः दो रूप हैं—कथात्मक और अकथात्मक। किसी मानसिक स्थिति या अन्य परिस्थिति आदि पर आधारित कथारहित लंबी-रचना मुक्तकधर्मी लंबी कविता है और कथासहित लंबी-रचना प्रबंधधर्मी लंबी-कविता है। मुक्तकधर्मी लंबी कविताएँ भी किसी विशेष मनः-स्थिति से बंधी हुई होती हैं पर उनमें मुक्तकीय विशेषता भी होती है, खासकर प्रगीतात्मक लंबी कविताओं में। उनके बंदों को स्वतंत्र रूप में भी पेश किया जा सकता है, यद्यपि पूरी रचना में वे आवश्यक लगेंगे। इसीलिए इन्हें मुक्तक न कहकर मुक्तकधर्मी कहना अधिक समीचीन है। और क्योंकि प्रबंधात्मक कविताएँ कथा का बहुत ही छोटा सा अंश लेकर चलती हैं, अपनी प्रकृति में प्रबंध-काव्य से छोटी होती हैं, इसीलिए उन्हें प्रबंध न कहकर प्रबंधधर्मी कहना अधिक उचित है। प्रबंधात्मकता दोनों में रहती है— एक में सघन रूप में तो एक में विस्तृत रूप में। यों, लंबाई किसी न किसी आधार पर ही टिक सकती है, अन्यथा वह निराधार होकर लुढ़क जाएगी! लंबी कविता की लंबाई प्रबंधात्मकता के आधार पर ही खड़ी होती है।



[i] राजेंद्रप्रसाद सिंह : हिंदी की लंबी कविताओं का आलोचना पक्ष, राजकमल प्रकाशन, पटना, पेपरबैक संस्करण, 2011, पृष्ठ 5

[ii] विश्वनाथ : साहित्यदर्पण (सं. सत्यव्रत सिंह), चौखंभा विद्याभवन प्रकाशन, वाराणसी, पेपरबैक संस्करण 2021, पृष्ठ 554

[iii] वही, पृष्ठ 555

[iv] राजेंद्रप्रसाद सिंह : हिंदी की लंबी कविताओं का आलोचना पक्ष, राजकमल प्रकाशन, पटना, पेपरबैक संस्करण, 2011, पृष्ठ 6 

[v] सुमित्रानंदन पंत : पल्लव, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, नौवाँ संस्करण, 1993, (आवृत्ति 2014) पृष्ठ 140 

[vi]  वही, पृष्ठ 140-141

[vii] वही, पृष्ठ 145

[viii] सूर्यकांत त्रिपाठी निराला : अनामिका, भारती भंडार, इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1948, पृष्ठ 148

[ix] बिहारी-रत्नाकर (सं. जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’), गंगा पुस्तकमाला कार्यालय, अमीनाबाद, लखनऊ, 1926, पृष्ठ 19

[x] रामचंद्र शुक्ल : हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रयाग पुस्तक सदन, इलाहाबाद, पेपर बैक संस्करण 2005, पृष्ठ 156

[xi] सूर्यकांत त्रिपाठी निराला : अनामिका, भारती भंडार, इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण, 1948, पृष्ठ 159

[xii] वही, पृष्ठ 151

[xiii] वही, पृष्ठ 163

[xiv] वही, पृष्ठ 164  


राजेश कुमार यादव

सहायक प्राध्यापक, महात्मा गाँधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश

 9935467677

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)

अंक-35-36, जनवरी-जून 2021

चित्रांकन : सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत

        UGC Care Listed Issue

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