शोध आलेख : शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में समकालीनता -डॉ. सचिन गपाट

शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में समकालीनता

डॉ. सचिन गपाट

 

शोध सार : शमशेर बहादुर सिंह को एक ओर ‘कवियों का कवि’ के रूप में जाना जाता है तो दूसरी ओर ‘कवि से बड़े आदमी’। उनकी कविताएँ मानव मन की विशिष्ट ऊर्जा और आत्मशक्ति के परिचायक हैं। उनका भावजगत हमेशा मानवीय संवेदनाओं तथा प्रकृति,  प्रेम और सौंदर्य के अनुपम तत्वों से जुड़ा है। वे अपनी कविताओं के माध्यम से मानव की परम शक्ति और श्रम के महत्त्व को प्रकट करते हुए जड़ परंपरा का विरोध करते हैं। कवि मानवीय मूल्यों के अभाव में आज की वैज्ञानिक प्रकृति को 'कीड़ों का अन्न' के समान मानता है। प्रणय,  प्रकृति और सौंदर्य के प्राय: सभी आयाम उनकी कविताओं में मिलते हैं। शमशेर जी की सौंदर्यानुभूति अत्यंत व्यापक,  गहन और सूक्ष्म है। उनका मृत्युबोध वास्तव में ज़िंदगी से उनके प्यार का सकारात्मक नतीजा है। वे परंपराबोध और उसके उच्च मूल्यों की रक्षा करते हुए अपनी कविताओं के माध्यम से वर्तमान में उसके महत्त्व को प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविताओं में मानवीय संवेदना और काव्यात्मक ईमानदारी प्रमुख हैं जो समकालीनता को प्रस्तुत करती हैं। शिल्प की दृष्टि से शमशेर जी की कविताएँ सशक्त और समृद्ध हैं।

 

बीज शब्द : समकालीनता,  मानवीय संवेदना,  सौंदर्यानुभूति,  मृत्युबोध,  रचना-धर्मिता,  प्रतिबद्धता,  काव्यात्मक ईमानदारी,  बिंब,  नव्यानुभूति आदि। 

मूल आलेख : 'समकालीनके लिए अँग्रेज़ी में 'कंटेंपररी' शब्द प्रचलित है। यह शब्द आज की आलोचना में विशिष्ट कालखंड से अंतर्संबन्ध स्थापित करता दिखाई देता है। लेकिन यह  अपने समय से संबंधित बातों को प्रस्तुत करता है। "किसी व्यक्ति के समय या किसी कालखंड में प्रचलित या व्याप्त प्रवृत्तियों या स्थितियों को उस व्यक्ति के समकालीन माना जा सकता है और इन प्रवृत्तियों एवं स्थितियों के होने का भाव समकालीनता है।"1 यह काल का मापदंड है। इसमें कालखंड को व्यक्ति अथवा लेखक के जीवन काल,  उसकी रचना-धर्मिता से जोड़ते हुए निश्चित सीमा में स्थिर किया जाता है।

 

समकालीनता में अपने समय के वास्तविक जीवन से निकट एवं महत्त्वपूर्ण समस्याओं और देश-काल स्थितियों को चित्रित किया जाता है। समकालीनता में "वर्तमान बोध के साथ ही अतीत और भविष्य का विवेक सम्मत बोध होता है।"2 वर्तमान बोध से समकालीनता को व्याप्ति प्रदान होती है। इतिहास बोध और भविष्य बोध को वर्तमान में समेटकर समग्र युग बोध को समकालीनता प्रकट करती है। समकालीनता में काल के प्रवाह में मनुष्य की वास्तविक स्थिति का अंकन भी किया जाता है। साहित्य के  विभिन्न पक्ष इसमें सदा सक्रिय रहते हैं। यह वह साहित्यिक संस्कृति है जिसमें मानसिक और सामाजिक अंतर्विरोधों का चित्रण होता रहता है। समकालीनता में जीवन और साहित्य की गतिशीलता निरंतर गुंजायमान् रहती है। समकालीनता समग्रता के चेतनामय क्षेत्रों को उजागर करती है। सृजनात्मकता,  प्रतिबद्धता और काव्यात्मक ईमानदारी ऐसे अनिवार्य तत्व इसमें विद्यमान् हैं।

 

समकालीनता के ऐसे विभिन्न तत्व शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में दिखाई देते हैं। शमशेर प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं। वे एक ऐसे विरले कवि हैं जिन्होंने आधुनिक कविता के विकास के हर चरण में अपना सहयोग दिया है। उनकी कविताओं में प्रेमानुभूति,  प्रकृति चित्रण,  परंपरा बोध और जनवादी चेतना में समकालीनता के तत्व विशेष रूप से आए हैं। उनकी कविताओं में समकालीनता का सफल,  व्यापक और सहज भाषा में पूरी ईमानदारी के साथ चित्रण हुआ है। उनकी कविताएँ जीवन के राग-विराग के साथ-साथ समकालीन स्थितियों का यथार्थ अभिव्यक्ति करती हैं।

 

प्रणय,  प्रकृति और सौंदर्य के अनेक तत्व शमशेर जी की कविताओं में दिखाई देते हैं। उनकी कविताओं में प्रणयानुभूति की अदमनीय यथार्थ अभिव्यक्ति हुई है। कवि की यह रोमांटिक चेतना कोरी छायावादी दायरे में सीमित नहीं रहती बल्कि वह समकालीनता में पदार्पण करती है। वे प्रणय के वैचारिक पक्ष पर भी विचार करते हैं। उनकी मांसल और ऐंद्रिय प्रणयानुभूति का विस्तार सामाजिक-दायित्व और विश्व प्रेम में बदल जाता है। देह और हृदय से मुक्त होकर यह प्रणयानुभूति आत्मा की चीज़ बन जाती है।

 

कवि का लौकिक प्रेम अलौकिकता में बदल जाता है। उनकी प्रेमानुभूति में व्यक्तिगत,  समष्टिगत तथा अलौकिक पक्ष के प्रणय दिखाई देते हैं। उनका प्रेम मानव मन की कोमलता एवं सुंदरता का परिचायक तत्व बन जाता है। उनकी प्रेम-भावना में समर्पण का भाव है। कवि ने प्रेम-भावना में मानव मन की स्वार्थ- भावनाओं का नष्ट तथा अहं का विगलन दर्शाया है। शमशेर सामाजिक प्रेमानुभूति  के संदर्भ में देश-प्रेम,  विश्‍व-प्रेम,  अंतर्राष्ट्रीय भाईचारे की भावना आदि को विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं। कवि प्रेमानुभूति को पूरी गहराई,  व्यापकता और सौंदर्य के साथ प्रस्तुत करते हैं। कवि के शब्दों में –

 

"प्रेम का कँवल कितना विशाल हो जाता है

आकाश जितना

और केवल उसी के दूसरे अर्थ

सौंदर्य हो जाता है

मनुष्य की आत्मा में।" 3

 

शमशेर जी ने अपनी कविताओं में प्रकृति के प्राकृतिक,  भौतिक सौंदर्य को जीवन में तथा उसके महत्त्व को रचना में आत्मसात किया है। वे पल-पल परिवर्तित प्रकृति के मनोरम तथा सूक्ष्म सौदर्य चित्रों में मानवीय भावनाओं को मिलाकर कविताओं में प्रस्तुत करते हैं। कवि मानव मन की चिर-परिवर्तनशील भावनाओं को ऋतुओं के द्वारा प्रकट करता है। उनके प्रकृति चित्रण में प्रकृति और मनुष्य के बीच का गहरा रिश्ता उभर आया है। वे प्रकृति के मुग्ध सौंदर्य में किसी अनंत अलौकिक सुषमा का समावेश देखते हैं।

 

            कवि की कविताओं में प्रकृति की चेतनामय स्थिति है जिसको केवल देख ही नहीं बल्कि महसूस भी किया जा सकता है। उन्होंने मानव मन के विभिन्न प्रणय भावों को प्रकृति में प्रतिफलित किया है। कवि ने प्रकृति के माध्यम से अनेक सजीव चित्रों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। जो हर संदर्भ में समकालीन कहने योग्य है। शमशेर प्रयोगात्मक दृष्टि से प्रकृति में नव्यानुभूति रचने में समर्थ दिखाई देते हैं। मानव मन की रागात्मक और सामाजिक चेतना को भी कवि ने प्रकृति परिवेश के साथ मिलाकर प्रस्तुत किया है। उनकी 'ये शाम है' कविता इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उसमें प्रस्तुत प्राकृतिक परिवेश ध्यान देने योग्य है। कवि के शब्दों में –

 

"ये शाम है

कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का।

लपक उठी लहू-भरी दराँतियाँ

कि आग है।" 4

 

शमशेर जी की सौंदर्यानुभूति अत्यंत व्यापक एवं गहन है। उनकी कविताओं में अभिव्यक्त सौंदर्य एक निजी वैयक्तिक अनुभूति है तथा सौंदर्यानुभव एक आनंदानुभाव है। यह सौंदर्यानुभूति मानव जीवन की एक सहजानुभूति है। स्थूल की अपेक्षा यह सूक्ष्म है। कवि इसे एक आध्यात्मिक तत्व के रूप में क़ायम करते हैं। शमशेर की सौंदर्यानुभूति वस्तुत: मानव जीवन की सहजानुभूति है। उन्होंने कविताओं में सक्रिय सौंदर्य की नवीन अभिव्यक्ति की है। 'बादल की हँसी',  ' स्मिों का विस्तार' जैसे पद प्रयोगों से कवि ने सौंदर्य को सजाया है। कवि के सौंदर्यबोध के संदर्भ में श्री. विजयदेव नारायण साही का कहना है कि "शमशेर की सारी कविताएँ यदि शीर्षक-हीन छपें या उन सबका एक ही शीर्षक हो सौंदर्य शुद्ध सौंदर्य तो कोई अंतर नहीं पड़ेगा"5

 

कवि के एक चित्रकार होने के कारण उनकी सौंदर्याभिव्यक्ति में चित्रात्मकता भी दिखाई देती है। चित्रात्मकता का यह सन्निवेश भी बिल्कुल स्वाभाविक है। भावपक्ष के सौंदर्य को अधिक अनुभवद्वेय बनाने के लिए कवि ने चित्रात्मक अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है।  चीनी अक्षरों की चित्रात्मकता को अपनाकर उससे उन्होंने अमर सौंदर्य प्रस्तुत किया है। इस नव्यानुभूति को कवि अमर सौंदर्य के चित्रमय भावों द्वारा प्रकट करते हैं। कवि के शब्दों में -

 

"मैंने

क्षितिज के बीचोंबीच खिला हुआ देखा

कितना बड़ा फूल।

अमर सौंदर्य का कोई इशारा-सा

एक तीर-

दिशाओं की चौकोर दुनिया के बराबर

संतुलित

संधा हुआ

निशाने पर

छूटने छूटने को था।" 6

 

शमशेर जनवादी कवि हैं। उनकी जनवादी रचनाएँ उनके सामाजिक दायित्व बोध को ज़ाहिर करती हैं। शमशेर जी की कविताओं में राजनीतिक चेतना,  विदेशी शासन के प्रति-विरोध,  पूँजीवाद-सामंतवाद के दुष्प्रभाव,  सांप्रदायिकता,  महान समाजसुधारकों के प्रति आदरभाव,  युद्ध विरोध एवं विश्‍व शांति का संदेश देखने के लिए मिलता है। कवि ने स्वतंत्र भारत में मध्यवर्ग और शोषित वर्ग की दु:ख स्थितियों का उद्घाटन करते हुए भारत की आज़ादी को झूठा साबित किया है। वे सांप्रदायिकता के विरुद्ध विश्व मानवतावाद की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करते हैं। 'अफ्रिका' कविता में शमशेर जी वर्ण-भेद की समस्या को व्यापकता से प्रस्तुत करते हैं। कवि के शब्दों में -

"तुम सफेदहम

काला

तुम्हें अब नाई

छोड़ सकता।

नेपथ्य में ढोल बजता है

डमाडम ! डमाडम ! डमाडम !" 7

 

इस कविता में कवि ने काले और सफ़ेद पत्थर के ऊपर-नीचे होते खेल के जरिये पिछड़े वर्ग की संगठन क्षमता को भी चित्रित किया है। इस कविता के बारे में श्री. परमानंद श्रीवास्तव कहते हैं कि "अफ्रिका अपने ढंग की अकेली कविता है। प्रतिरोधी कविता। जिसमें शमशेर मूक कवि बने नहीं रहते। मनुष्यता को चुनौती देने वाले उच्च श्रेणी के रक्त रंग संस्कारों पर जैसे टूट पड़ते हैं।"8

कवि की कविताओं में प्रेम और प्रकृति के समान दर्द और मृत्यु को भी स्थान दिया गया है। वे मृत्यु को एक निजानुभूति तथा जीवन की सबसे बड़ी वास्तविकता के रूप में स्वीकार करते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम और मृत्यु का आत्मीय साक्षात्कार दर्शनीय है। मृत्यु बोध का एक स्वाभाविक आत्मीयतापूर्ण स्वीकार कवि की पंक्तियों में द्रष्टव्य है -

 

"मौत कोई सेंटिमेंट की चीज नहीं है।

वह एक ठोस हस्ती है

व्यक्ति के लिए

हर व्यक्ति के लिए।" 9

 

शमशेर जी की पचासों से अधिक कविताओं में मृत्यु बोध की परिकल्पना दर्शनीय है। कवि मृत्यु के साक्षात् उपस्थिति का अनुभव करते हैं। उनके लिए मृत्यु एक वास्तविकता और सच्चाई है। उनकी कविताओं में मृत्यु इस जग-जीवन की परमार्थता बनकर आई है।

 

भारतीयता और भारत की अतिप्राचीन सभ्यता के प्रति शमशेर जी के मन में अटूट आस्था है। इसकी अमिट छाप उनकी कविताओं में मिलती है। वे परंपरा बोध में इतिहास बोध और सांस्कृतिक बोध को साथ लेकर चलते हैं। परंपरा बोध के आधार पर वे भारतीय गरिमा को प्रस्तुत करते हैं। वे भारतीयता को एक चिरंतन सत्य के रूप में प्रकट करते हैं। परंपरा बोध को वे भारतीय संस्कृति की सही पहचान मानते हैं। भारत की परंपरा ही ऐसा महान है,  जो विश्वकल्याण की भावना से अनुप्राणित है। समस्त विश्व में शांति सुख फैलाने वाले आर्ष भारत की महान भावना शमशेर की कविताओं में मुखर रहती है –

 

"जन का विश्वास ही हिमालय है

भारत जन मन ही गंगा है

हिंद महासागर लोकाशय है

यही शक्ति सत्य को उभारती।" 10

 

ग्रामीण जीवन के प्रति आस्था भी शमशेर जी की कविताओं में मौजूद है। उनकी कविताएँ किसानों के श्रम की महत्ता को उजागर करती हैं। शमशेर की समकालीनता इस बात में है कि वे मानव की परम शक्ति और श्रम के महत्त्व को उद्घोषित करते हैं। उनकी कविताओं में परंपरा बोध के प्रति गर्व है तथा जड़ परंपरा और जड़ व्यवस्था के प्रति विद्रोह का भाव भी विद्यमान् है।

शमशेर जी की कविताओं में परंपरा की पुनर्व्याख्या भी दिखाई देती है। कवि पुरातन मूल्यों के आधार पर नवीन दृष्टिकोण एवं जीवन प्रणाली के अनुरूप अपनी विचारधारा को रूपायित करता है। यह आधुनिकता बोध उनकी कविताओं में चेतना जोड़ देता है। उनकी रचनात्मकता की नवीनता एवं मौलिकता उनके आधुनिकता बोध में परिलक्षित होती है। उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता किसी एक वाद या सिद्धांत के प्रति नहीं है। युगीन चेतना की अनुभूति से उनका आधुनिकता बोध सजग और समृद्ध हो जाता है। वे आधुनिकता बोध के महत्वपूर्ण कवि हैं। उन्होंने मार्क्सवाद का मूल्यांकन एक नई दृष्टि से किया है। मानव मन में एकजुटता,  स्नेह और भाईचारे की भावना बढ़ाना कवि का ध्येय रहा है।

 

कवि मानवीय मूल्यों के अभाव में आज की वैज्ञानिक प्रकृति को 'कीड़ों का अन्न' के समान मानता है। उनका कहना है कि संस्कृति और मूल्यों के अभाव में हमारी सारी  वैज्ञानिक उपलब्धियाँ अधूरी ही रह जाएँगी। वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ समाज को मूल्यों की भी अधिक आवश्यकता है। कवि समसामयिक युग में शांति,  सत्य,  विश्व प्रेम आदि मानवीय मूल्यों के महत्त्व को विशेष रूप से प्रस्तुत  करता है। 'अमन का राग',  'सत्यमेव जयते' आदि शमशेर बहादुर सिंह की कविताएँ इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

 

            शमशेर शब्द शिल्पी हैं। भावान्विति के लिए वे कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हैं। उनकी भाषा प्रमुखता से व्यंजनात्मक है। उनकी रचनात्मकता शब्द की अर्थवत्ता और जीवंतता पर आधारित है। छंद,  लय और प्रास का अनुभव उनकी कविता में सम्गुम्फित हुआ है। शमशेर एक लयबद्ध कवि हैं। अप्रचलित शब्द उनकी कविताओं की विशेषता है। असामान्य शब्द संयोजन द्वारा उनकी कविताएँ नए अनुभव विश्व को प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताओं में हिंदी और उर्दू की एक मिश्रित भाषा का रूप प्रकट हुआ है। लेकिन उनका शब्द संयोजन कहीं भी अजनबी नहीं लगता। वर्णन विस्तार उनकी कविताओं में नहीं,  बल्कि सूक्ष्म संकेत है। ऐसी विभिन्न विशेषताओं के कारण इन्हें “कवियों का कवि तथा शुद्ध कवि जैसे विशेषण दिए गए हैं।

 

            शमशेर की कविताएँ बिंब की दृष्टि से अतिशय समृद्ध हैं। ऐंद्रिय और अतींद्रिय दोनों तरह के बिंब शमशेर की कविताओं में सर्वसुलभ हैं। उनकी बिंब योजना पर पाश्चात्य साहित्यकारों का प्रभाव भी दिखाई देता है। उनकी कविता की शिल्प योजना में प्रतीकों का भी विशिष्ट स्थान रहा है। जीवन में मानवीय संवेदनाओं की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति कविताओं की अनन्य विशेषता रही है। उनकी कविता में 'फूल' जीवन की संपूर्णता का प्रतीक है। उनकी कविताओं पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनमें काफ़ी दुरूहता और निरर्थकता है,  पर असल में शमशेर की कविता का आधार केवल बुद्धि नहीं बल्कि मानवीय संवेदना और हृदय है। वे कवि से बड़े आदमी और मनुष्य हैं।

 

निष्कर्ष :

 

इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि शमशेर जी की कविताएँ मानव मन की विशिष्ट ऊर्जा और आत्मशक्ति का परिचायक हैं। उनका भावजगत हमेशा मानवीय संवेदनाओं तथा प्रकृति,  प्रेम और सौंदर्य के अनुपम तत्वों से जुड़ा है। वे अपनी कविताओं के माध्यम से मानव की परम शक्ति और श्रम के महत्त्व को प्रकट करते हुए जड़ परंपरा का विरोध करते हैं। प्रणय,  प्रकृति और सौंदर्य के प्राय: सभी आयाम उनकी कविताओं में दिखाई देते हैं। शमशेर जी की सौंदर्यानुभूति अत्यंत व्यापक,  गहन और सूक्ष्म है। उनका मृत्यु बोध वास्तव में ज़िंदगी से उनके प्यार का सकारात्मक नतीजा है। वे परंपरा बोध और उसके उच्च मूल्यों की रक्षा करते हुए अपनी कविताओं के माध्यम से वर्तमान में उसके महत्त्व को प्रस्तुत करते हैं। वे मानवीय मूल्य और मनुष्यता को महत्वपूर्ण मानते हैं। शिल्प की दृष्टि से शमशेर जी की कविताएँ सशक्त और समृद्ध हैं। चित्रों के प्रति लगाव के कारण इनकी कविताओं में चित्रात्मकता का समावेश अधिक हुआ है। “वस्तुतः वे शब्द शिल्पी हैं जो शब्दों के माध्यम से चित्र-रचना करते हैं।“12  उनकी कविताओं में एक ओर मानवीय संवेदना प्रमुख है तो दूसरी ओर काव्यात्मक इमानदारी। ये संवेदनशीलता और ईमानदारी समकालीनता को प्रस्तुत करती हैं। समकालीनता का जो रूप शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में चित्रित हुआ है वह अन्यत्र दुर्लभ है।

 

संदर्भ :

 

1.    हिंदी साहित्य का इतिहास - डॉ. रमेश चन्द्र शर्मा,  विद्या प्रकाशन,  चतुर्थ संस्करण 2008,  पृ. 372

2.    समकालीन हिंदी कविता और शमशेर बहादुर सिंह - डॉ. यू. श्रीकला,  विद्या प्रकाशन,  संस्करण 2008,  पृ. 13

3.    इतने पास अपने - शमशेर बहादुर सिंह,  राजकमल प्रकाशन,  संस्करण 2011,  पृ. 44

4.    प्रतिनिधि कविताएँ - सं. नामवर सिंह,  राजकमल प्रकाशन,  संस्करण 1998,  पृ. 41

5.    शमशेर : कवि से बडे आदमी - सं. महावीर अग्रवाल,  श्री प्रकाशन,  संस्करण 1999,  पृ. 83

6.    कुछ कविताएँ कुछ और कविताएँ - शमशेर बहादुर सिंह,  राधाकृष्ण प्रकाशन संस्करण 1984,  पृ. 70

7.    काल तुझसे होड़ है मेरी - शमशेर बहादुर सिंह,  वाणी प्रकाशन,  संस्करण 1994,  पृ.25

8.    शमशेर : कवि से बडे आदमी - सं. महावीर अग्रवाल,  श्री प्रकाशन,  संस्करण 1999,  पृ.310

9.    काल तुझसे होड़ है मेरी - शमशेर बहादुर सिंह,  वाणी प्रकाशन,  संस्करण 1994,  पृ. 40

10. प्रतिनिधि कविताएँ - सं. नामरवर सिंह,  राजकमल प्रकाशन,  संस्करण 1998,  पृ. 70

11. 11.http://epgp.inflibnet.ac.in/epgpdata/uploads/epgp_content/S000018HI/P001524/M016486/ET/1514787652HND_P3_M5.pdf

12. https://egyankosh.ac.in/bitstream/123456789/23660/1/Unit-9.pdf

 

डॉ. सचिन गपाट

सहायक प्राध्यापकहिंदी विभाग,  मुंबई विश्‍वविद्यालय - 400098

dr.sachingapat@gmail.com9423641663

                    

                अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-38, अक्टूबर-दिसंबर 2021, चित्रांकन : गूगल

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