शोध आलेख : बाल अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में दिविकरमेश का बाल काव्य -दीपशिखा शर्मा

बाल अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में दिविकरमेश का बाल काव्य

दीपशिखा शर्मा

 

शोध - सार :

 बालक किसी भी राष्ट्र की अमूल्य निधि है जिसके भविष्य के साथ उसके देश का भविष्य भी जुड़ा है | अत: उसके समुचित विकास को सुनिश्चित करना प्रत्येक सभ्य समाज का उतरदायित्व है | भारतीय संविधान में बाल अधिकारों की रक्षा के लिए विभिन्न कानून बनाए गए हैं जो बालक को एक सुरक्षित भविष्य प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं परन्तु इन सबके पश्चात् आज भी बालक एक असुरक्षित जीवन जीने के लिए विवश हैं | दिविक रमेश हिंदी बाल साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं | इन्होंने अपने बाल साहित्य के माध्यम से वर्तमान बालक के जीवन के संघर्षों को दर्शाने का पूरा प्रयास किया है | प्रस्तुत शोध पत्र में बाल अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में दिविक रमेश के बाल काव्य का अध्ययन किया गया है |


बीज - शब्द : बाल अधिकार, असमानता,लिंगभेद, शोषण, बाल-अभिव्यक्ति, सुरक्षा |

 

मूल - आलेख :

 विलियम वर्ड्सवर्थ ने बहुत पहले कहा था- “child is the father of man.” बालक वह नन्हा पौधा है जिसे आगे चलकर विशाल वृक्ष में परिवर्तित होना है | बालक ही भावी समाज और राष्ट्र का निर्माता है जिसके कन्धों पर भविष्य के संसार का भार है | अतः उसके सही पालन-पोषण का कार्य परिवार के साथ-साथ सम्पूर्ण समाज का उत्तरदायित्व है परन्तु आज के समय में किसी के पास उसके मन में झाँकने का समय ही नहीं है |इस स्थिति में आवश्यकता है एक ऐसे माध्यम की जो बालक के इस अकेलेपन को भरकर एक सच्चे मित्र और मार्गदर्शक की भांति बालक का साथ निभाएँ एवं उसके भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करे | आज यह कार्य बालसाहित्य बखूबी कर रहा है | बालसाहित्य हर वर्ग के बालक का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके भावों को अभिव्यक्ति देता है |आज कई बाल साहित्यकार इस दिशा में कार्य कर रहे हैं जिनमें दिविक रमेश एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं | दिविक रमेश बच्चों के लोकप्रिय कवि हैं | इनके साहित्य में बालक के मन की हर इच्छा, प्रश्न और चिंतन को स्थान दिया गया हैऔर साथ ही उसके जीवन के संघर्षों को भी दर्शाया गया है | दिविक रमेश समाज के लिए बालक के महत्त्व को भली-भांति समझते हैं | दिविक रमेश के अनुसार, “जो समाज बालक को उपेक्षित करके चलता है स्वयं उपेक्षा के कगार पर आ खड़ा होता है | जिस देश को बालक के भविष्य में देखने की प्रवृति नहीं होती अथवा जिस देश के बालक का कोई स्पष्ट भविष्य नज़र नहीं आता उस देश का भविष्य भी चौपट समझिए |”2 

बालक के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है कि उसे उचित देखभाल प्राप्त हो, जिस के लिए संविधान में भी अनेक प्रावधान निर्धारित हैं | संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव कोफ़ी अन्नान ने इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था, “सब बच्चों को स्वस्थ बन कर शांति और सम्मान के साथ बड़े होने का अवसर मिलना चाहिए | क्या हमारे लिए इससे बड़ा कोई और पवित्र कार्य हो सकता है ? जिस तरह हम दूसरों के अधिकारों की रक्षा पूरी सतर्कता के साथ करते हैं तो फिर बच्चों के अधिकारों की रक्षा क्यों नहीं करनी चाहिए? किसी भी सरकार के लिए इससे बड़ा काम और क्या हो सकता है कि वह देश के बच्चों को उनके अधिकार पूरी ईमानदारी से दे |”3 

बाल अधिकारों को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्रदान की गई है | सबसे पहले सन 1924 में संयुक्त राष्ट्रसंघ की जेनेवा में बैठक हुई जिसमें बाल अधिकारों के विषय में चर्चा की गई | इसके पश्चात् सन 1959 में महासभा द्वारा बालअधिकारों की घोषणा की गई जिन्हें 20 नवम्बर 1989 संयुक्त राष्ट्रसंघ की सामान्य सभा में सदस्य देशों द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया | तत्पश्चात एक विस्तृत घोषणा-पत्र तैयार करके उसे कानूनी दर्जा दिया गया | भारत में भी बाल अधिकारों को लेकर एक शिक्षा नीति बनाई गई | 1974 में भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय बाल-बोर्ड की स्थापना की जिसको 1978 में पुनर्गठित किया गया और इसकी अध्यक्ष स्वयं देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी बनी | इसके बाद समय-समय पर बाल अधिकारों के विषय में देश-विदेश में विचार-विमर्श होते रहे | भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का एक अलग विभाग बनाया गया | इसके अतिरिक्त बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए मार्च 2007 में ‘बाल अधिकार सुरक्षा आयोग नामक एक आयोग का गठन किया गया | 29 दिसंबर 2006 को संसद में पारित कानून के अनुसार यह आयोग एक संवैधानिक संस्था है,जिसको बाल अधिकारों के हनन तथा बाल कल्याण से सम्बन्धित कानून लागू न किए जाने से सम्बन्धित मामलों की सुनवाई करने तथा ऐसे मामलों का स्वयं संज्ञान लेने का अधिकार प्राप्त है |प्रत्येक वर्ष 20 नवंबर को ‘अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस मनाया जाता है | इस अवसर पर सरकारों द्वारा संयुक्त राष्ट्रसंघ के ‘बाल-अधिकार घोषणापत्र के अनुसार बालक के निम्नलिखित मूल अधिकारों के संरक्षण पर बल दिया जाता है-  

1.अस्तित्व का अधिकार 2. सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार 3. परिवारों के सामाजिक-आर्थिक हैसियत के मुताबिक सही पालन-पोषण का अधिकार 4. स्वास्थ्य सुविधाओं और चिकित्सा का अधिकार 5. गम्भीर बीमारी,विकलांगता आदि की स्थिति में विशेष देखभाल का अधिकार 6. शिक्षा का अधिकार 7. खेल-कूद व आराम का अधिकार 8. अभिव्यक्ति का अधिकार 9. आर्थिक शोषण और यौनशोषण से संरक्षण का अधिकार 10. दंगे, युद्ध जैसी आपात स्थितियों में सुरक्षा की प्राथमिकता का अधिकार | 

सरकार द्वारा किए गए समस्त प्रयास के बावजूद भी बच्चों के एक बड़े तबके की स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है और वे आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं | दिविक रमेश के साहित्य में हर वर्ग के बालक की दशा को प्रभावी ढंग से दर्शाया गया है |इनका साहित्य बच्चों के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो इन अधिकारों से वंचित हैं | दिविक रमेश का साहित्य बालक के महत्त्व और अधिकारों के प्रति सजग एवं जागरूक है | समाज में आज भी व्यक्ति-व्यक्ति में भेदभाव की घटनाएँ सामने आ जाती हैं जिससे बालक भी सुरक्षित नहीं हैं | प्रत्येक बालक का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व होता है जिसमें जाति, वर्ण, रंग या नस्ल के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव निषेध है | कानून प्रत्येक बालक को बिना किसी भेदभाव के सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है परन्तु इसके बावजूद आज भी कई बालकों को समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है जो उसके आत्मसम्मान को भी चोट पहुँचाता है और उनके विकास को भी प्रभावित करता है | ‘जो कम है दो उसे सहारा’ कविता में बालक इसी भेदभाव का विरोध करते हुए कहता है-

 

“देखो वह सोनू है आता, रामू को न साथ खिलाता |

कहता रामू मोची काला, न गाड़ी न कुत्ते वाला |

पर मेरे बापू तो कहते, नहीं किसी को छोटा कहते |

समझ दोस्त अपना ही प्यारा, जो कम है दो उसे सहारा |”4

 

प्रत्येक बालक ईश्वर की बनाई अनमोल कृति है | फिर चाहे वह लड़का हो या लड़की दोनों ही समाज के अभिन्न अंग हैं | सभी को बिना किसी भेदभाव के जीने का अधिकार है | संविधान के अनुच्छेद-14 में लड़का और लड़की दोनों को समानता का अधिकार प्राप्त है परन्तु यह अधिकार केवल कागजों में सिमट कर रह गया है | वास्तव में आज भी कई परिवारों में लड़का-लड़की में भेदभाव की स्थिति विद्यमान है | आज भी हमारे समाज की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है | समाज में अधिकतर परिवार शिक्षित होने के बावजूद लड़के और लड़की को समान स्तर पर रखने की मानसिकता विकसित नहीं कर पाए हैं | आज भी कई ऐसे परिवार हैं जहां लड़की के जन्म पर प्रसन्नता के स्थान पर मातम पसर जाता है | भ्रूण लिंग परीक्षण के नाम पर लड़की को जन्म लेने से पहले गर्भ में ही मार दिया जाता है | भ्रूण लिंग परीक्षण पर रोकथाम के लिए कानून होने के बाद भी यह काम पूरे देश में बेरोक-टोक चल रहा है | सर्वेक्षण बताते हैं कि सन 1981 से 2011 के बीच देश में न्यूनतम एक लाख बीस हजार कन्या भ्रूणों की हत्या हुई है | इन सब से लड़कर यदि लड़की जन्म ले भी लेती है तो बहुत से परिवारों में उसे भेदभाव का सामना करना पड़ता है | “महानगरों के कुछ लोग शायद न मानें लेकिन सच्चाई यही है कि हमारे समाज में लड़कियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है | स्वयं यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में बड़ी संख्या में अभिभावक बच्चियों को स्वास्थ्य केन्द्र तक ले जाने की जहमत नहीं उठाते हैं जबकि लड़के के स्वास्थ्य का पूरा ख्याल रखा जाता है | उन्हें शिक्षा, भोजन,कपड़े और यहाँ तक कि स्नेह और प्यार में भी दोयम दर्जे का व्यवहार मिलता है |”5“मेरे पापाकविता इसी भेदभाव को उजागर करती है जहाँ बेटा-बेटी के अंतर कोइन शब्दों के माध्यम से दर्शाया गया है – 

“एक दोस्त है मेरी बुलबुल, उसको कोयल कह देते हैं,

चीज़ मांगती मैं हूँ लेकिन भैया को ला देते हैं |”6

 

बालक राष्ट्र की धरोहर है जिसका पालन-पोषण परिवार, समाज और राष्ट्र का उत्तरदायित्व है | बालक को जन्म से ही पौष्टिक भोजन और चिकित्सा का अधिकार स्वयं ही प्राप्त हो जाता है ताकि उसका स्वस्थ विकास हो पाए परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों पश्चात् आज भी बालक इस अधिकार से वंचित है | “सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में जन्म लेने वाले प्रत्येक एक हजार बच्चों में से 70 बच्चे अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते हैं | इसी प्रकार प्रत्येक एक हजार में से 95 बच्चे अपने पांचवे जन्मदिन से पहले ही काल-कवलित हो जाते हैं |.....जहाँ तक स्वास्थ्य सम्बन्धी टीकाकरण की बात है आज भी देश में एक चौथाई बच्चे ऐसे हैं जिन्हें किसी भी प्रकार का टीका उपलब्ध नहीं हो पाता है | इसी प्रकार देश के साठ प्रतिशत से अधिक बच्चे रक्त अल्पता के शिकार हैं | पाँच वर्ष से कम आयु के 42 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम है तथा 59 प्रतिशत बच्चों का कद सामान्य से कम है | एक तरफ जहाँ प्रतिवर्ष लाखों क्विंटल अनाज रख-रखाव के अभाव में सड़ जाता है वहीं दूसरी तरफ सर्वेक्षण बताते हैं कि देश में आज भी 63 प्रतिशत बच्चे रात को भूखे ही सो जाते हैं | जहाँ तक कुपोषण की बात है सर्वेक्षणों में यह तथ्य सामने आया है कि देश में 53 प्रतिशत बच्चे बुरी तरह से कुपोषण का शिकार हैं |”7इसी प्रकार सैंकड़ों बालक सही समय पर चिकित्सा ना मिल पाने के कारण काल के मुँह में समा जाते हैं | दिनोंदिन बढ़ती महंगाई के कारण मध्यम और निम्नवर्गीय परिवारों के लिए अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन देना एक बड़ी समस्या बन चुका है | जिसके कारण आज अनेक बालक इन मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं | ‘मंहगाईकविता में बालक महंगाई की समस्या को इन शब्दों में व्यक्त करता है-

 

“अगर कहीं बीमार पड़े तो,महंगी कितनी मिले दवाई |

बापू की आँखें सूनी हैं माँ को आती अरी रुलाई |”8

 

शिक्षा प्राप्ति हर बालक की सहज आवश्यकता और मूल अधिकार है | संविधान के अनुच्छेद 21-ए में छ: वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का प्रावधान है ताकि बालक अपने इस अधिकार से वंचित ना रहे परन्तु इसके पश्चात् भी बड़ी संख्या में बच्चों को शिक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं हो पाता है | इसके कई कारणों में सबसे प्रमुख कारण है निर्धनता | गरीब परिवारों में बालक पर  छोटी आयु में ही परिवार का उत्तरदायित्व आ जाता है और उन्हें काम करने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है| “गरीब व मजदूर वर्ग के माँ-बाप बच्चों के होश सम्भालते ही उन्हें काम में जोत देते हैं ताकि वे कुछ कमा सकें | सर्वेक्षण बताते हैं कि छ: वर्ष से चौदह वर्ष आयु वर्ग के पचास प्रतिशत बच्चे, बच्चियाँ विद्यालय का मुँह भी नहीं देख पाते हैं | शेष जो विद्यालय जाते हैं उनमें से पचास प्रतिशत बच्चे तथा अट्ठावन प्रतिशत बच्चियाँ कक्षा पाँच तक पहुँचते-पहुँचते पढ़ाई छोड़ देते हैं और कक्षा नौ तक पहुँचते-पहुँचते इनकी संख्या मात्र चालीस प्रतिशत रह जाती है | सरकार द्वारा बच्चों को विद्यालय तक पहुँचाने की योजनाओं पर करोड़ों खर्च करने के बावजूद परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात हैं |”9‘यह बच्चाकविता इसी समस्या पर प्रकाश डालती एक मार्मिक कविता है जिसमें एक बालक अपने पिता से पूछता है-

 

“कौन है पापा यह बच्चा जो, थाली की झूठन है खाता |

कौन है पापा यह बच्चा जो, कूड़े में कुछ ढूंढा करता |

पापा जरा बताना मुझको, क्या यह स्कूल नहीं है जाता|

थोडा ज़रा डांटना इसको, नहीं न कुछ भी यह पढ़ पाता|”10

 

संविधान में प्रत्येक बालक को यह अधिकार है कि उसका किसी भी प्रकार से शोषण या उत्पीड़न न किया जाएजिसमें आर्थिक और यौन शोषण से मुक्ति का अधिकार प्रमुख है | शिक्षा के अधिकार के साथ ही संविधान प्रत्येक बालक को एक सम्मानपूर्ण जीवन देने का भी पक्षधर रहा है जिससे बालक का सर्वागींण विकास हो सके परन्तु आज भी समाज में एक ऐसा तबका विद्यमान है जिसे यह अधिकार प्राप्त नहीं है| संविधान के अनुच्छेद 24 में बाल मजदूरी पर प्रतिबन्ध है | चौदह वर्ष से कम आयु के बालक से श्रम करवाना एक अपराध है जो श्रम कानून के अंतर्गत आता है | श्रम अधिनियम 2016 (संशोधन) के अंतर्गत ऐसे अपराध के लिए जुर्माने के साथ दंड का भी प्रावधान है | इन सब के बावजूद आज भी बालश्रम एक गंभीर समस्या बनी हुई है जो मासूम बचपन से उसकी स्वतंत्रता और विकास का अधिकार छीन रही है | आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग अट्ठारहकरोड़ बाल मजदूर हैं | ‘बच्चा मजदूरकविता में ऐसे ही एक बाल मजदूर की पीड़ा को दर्शाया गया है-

 

“तुम तो जाते पढ़ने-लिखने, तुम तो जाते खेल खेलने,

हम मजदूरी कर-कर थकते, मन मसोसते, क्या कर सकते |”11

 

बालक के अधिकारों में खेल-कूद और आराम का भी विशेष स्थान है | बदलते समय के साथ बालक के जीवन में भी व्यापक परिवर्तन आया है | पहले जहाँ बालक के पास खेलने-कूदने का पर्याप्त समय होता था वहीं आज तस्वीर बिलकुल उलट है | 2001 में बाल दिवस पर दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० एपीजे अब्दुल कलाम ने बच्चों के एक सम्मेलन का उद्घाटन किया था जिसमें देशभर से सोलह बालक सम्मिलित हुए थे | इस सम्मेलन में यह बात सामने आई कि शिक्षा-पद्धति की जटिलता और बोझ ने बच्चों के पास खेलने और आराम करने का समय ही नहीं छोड़ा है | पहले जहाँ बालक को उसका बचपन जीने का पर्याप्त समय मिलता था वहीं अब दो-ढाई साल की आयु में ही उसका दाखिला विद्यालय में करवा दिया जाता है | ऊपर से अभिभावकों की असीमित महत्त्वाकांक्षा और बालक के भविष्य के प्रति अत्यधिक चिंता बालक के स्वभाविक विकास में बाधा बनकर उन्हें समय से पूर्व ही वयस्क बना देती है | स्कूल,होमवर्क,कोचिंग, ट्यूशन हर वक्त पढ़ाई के बोझ तले दबे बालक को खेलना और घूमना तो दूर ठीक से खाने और पूरी नींद सोने तक का समय भी नहीं मिल पाता |जबकि यह बालक का मूलभूत अधिकार है |‘जरा हमारी भी तो मानो’ कविता में हर समय पढ़ाई की समस्या से दुखी बालक की इसी मनोस्थिति को दर्शाया गया है-

 

खूब पढ़ेंगे अगर हमारी बात खेलने की भी मानो |

कुछ अपनी मनवाओ पापा जरा हमारी भी तो मानो |”12

 

प्रत्येक बालक का अपना एक संसार होता है जिसमें उनकी जिज्ञासा तथा रचनात्मकता के रंग भरे होते हैं | इन्हें अभिव्यक्त करने के लिए उन्हें पर्याप्त अवसर प्रदान करना न केवल सबका कर्तव्य है अपितु यह बालक का अधिकार भी है | यदि बालक को अपनी बात कहने का अवसर प्राप्त नहीं होगा तो वह दब्बू, कायर और अन्तर्मुखी बन जाएगा | हमारे समाज में आज भी बालक को अपने विचारों को व्यक्त करने से रोका जाता है |इस विषय में हरिकृष्ण देवसरे के विचार महत्त्वपूर्ण हैं, “बच्चों को अभिव्यक्ति का अधिकार मिलना, उनके व्यक्तित्व के अधिकार की एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है | बच्चों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने की बुनियाद में यही मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है किउन्हें विचार और चिंतन के अवसर, उनके अपने दायरे में प्राप्त हों | उनके विचार कुछ अपरिपक्व हो सकते हैं, जो कि एक सहज बात है, गलत भी भी हो सकते हैं, उनमें भाषा के सौन्दर्य का अभाव भी हो सकता है, तो कोई बात नहीं | इस कारण उनका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार छीनना तो अन्याय है |”13 संविधान के अनुच्छेद 13 में बच्चों के लिए अभिव्यति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रावधान है जिसके अंतर्गत बालक को अपने भावों और विचारों को अभिव्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता है | भविष्य में बालक को ही देश का नेतृत्त्व करना है | अतः उसके विचारों को महत्त्व देना अति आवश्यक है ताकि उनकी सोच का दायरा विस्तृत हो सके और वह साहस तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण बने | ‘मेरी बात’ कविता में बालमन की मुखर अभिव्यक्ति दर्शाई गई है-

 

“सब कहते हैं,तुम बच्चे हो करो सभी का मन से आदर |

सब कहते हैं, पग फैलाओ उतने ही जितनी है चादर |

पर मैं समझ नहीं पाता हूँ, सब हमको ही क्यों कहते हैं |

जाने क्यों ये अच्छी बातें खुद तो वे भूले रहते हैं |”14

 

संविधान के अनुसार प्रत्येक बालक को यह अधिकार है कि युद्ध या दंगों जैसी आपातकालीन स्थिति में उनकी सुरक्षा को सुनिश्तित किया जाए | आज समाज में आपराधिक गतिविधियों का व्यापक प्रसार हो चुका है | आपसी भाईचारा, मानवता और दया जैसे मानवीय गुण दुर्लभ हो गए हैं | समाज को तोड़ने के लिए व्यक्ति ही व्यक्ति का शत्रु बन गया है और इस विकृत मनोवृति के कारण आज सम्पूर्ण मानवजाति खतरे में पड़ गयी है | आपसी घृणा और स्वार्थ ने आज संसार को आतंकवाद और युद्ध की विभीषिका झेलने पर विवश कर दिया है और जो देश इससे पीड़ित हैं वहाँ के बच्चों पर इसका व्यापक प्रभाव दिखाई देता है | “बच्चों से जुड़ी तमाम समस्याओं के साथ अब विश्वभर के बच्चों को आतंकवाद के जिस खौफ ने आतंकित कर दिया है , वह नई चिंता का विषय है | आज विश्व के तमाम देश किसी ना किसी तरह के आतंकवाद से ग्रस्त हैं |....आतंकवाद का विश्वभर में फैलता असर, उन देशों के बच्चों की भी चिंता का विषय है जो आतंकवाद की निंदा करते हैं और उसे नष्ट करने से जुड़ी करवाई का समर्थन करते हैं | इन देशों के बच्चों को अपने अनिश्चित बन रहे भविष्य की चिंता है | विशेष रूप से विकासशील देशों के बच्चों के लिए तो यह एक भयावह सपने जैसा है |”15 ऐसे वातावरण में बालक का विकास भी प्रभावित होता है और उसका भविष्य भी संदेह के घेरे में आ जाता है | ‘बुरी चीज है बम’ कविता में बालक आतंकवाद की इस विकट समस्या से चिंतित है और जानता है कियह मानवता के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है-

 

“जिससे पूछो वो ही कहता, बुरी चीज है बम |

सब कुछ होगा राख अगर जो गिरा कहीं पर बम |

जिन्दा ही हम भुन जायेंगे, अगर चला जो बम |”16

 

निष्कर्ष :

 

 आज बालक के अधिकारों को लेकर सरकार और विभिन्न संस्थाएं सक्रिय हैं और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए कई कानून भी बनाए गए हैं जिनमें समय-समय पर संशोधन भी हो रहे हैं परन्तु इन सब के बावजूद बालक के साथ होने वाले भेदभाव और अपराध में कोई कमी नहीं आ सकी है बल्कि दिनोंदिन स्थिति और भी शोचनीय बनती जा रही है | दिविक रमेश का बाल काव्य बालक के परिवेश और उसकी समस्याओं को लेकर सतर्क है जो समाज में बालक की स्थिति को दर्शाते हुए उसके अधिकारों के विषय में जागरूकता फ़ैलाने का प्रयास करता है | आज आवश्यकता है कि न केवल सरकार बल्कि परिवार और समाज भी बालक के महत्त्व को समझकर उसके उज्जवल भविष्य के निर्माण में अपना पूरा सहयोग दे | तभी विश्व का हर बालक स्वतंत्रता और समानता के साथ अपना जीवन जी सकेगा और भविष्य के सुखद संसार का निर्माता बनेगा |

 

सन्दर्भ : 

1.अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन:बच्चे, बचपन और बालसाहित्य, विकल्प प्रकाशन,दिल्ली,2014,पृ.12

2.दिविक रमेश: ‘बाल-साहित्य संभावना’, डॉ० दिविक रमेश और उनका बाल साहित्य(सं. शकुंतला कालरा), यश पब्लिकेशन्स,दिल्ली,2012, पृ.76

3.अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन: बच्चे, बचपन और बालसाहित्य, विकल्प प्रकाशन, दिल्ली,2014,पृ.34

4.दिविकरमेश:बंदर मामा,एक्सप्रैस बुक्स,दिल्ली,2015,पृ.40

5.मधुसूदन त्रिपाठी:बाल अधिकार तथा बाल शोषण, ख़ुशी पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली,2011, पृ.43 

6.दिविक रमेश:बंदर मामा, एक्सप्रैस बुक्स,दिल्ली,2015,पृ.67

7.अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन:बच्चे, बचपन और बालसाहित्य, विकल्प प्रकाशन, दिल्ली,2014,पृ.29

8.दिविकरमेश:समझदार हाथी : समझदार चींटी, ट्राईडेंट पब्लिशर्स, दिल्ली, 2015 पृ.65

9.अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन:बच्चे, बचपन और बालसाहित्य, विकल्प प्रकाशन, दिल्ली,2014,पृ.30

10.दिविकरमेश:एक सौ एक बाल कविताएँ, मैट्रिक्स पब्लिशर्स,दिल्ली,2016,पृ.116

11.दिविकरमेश:बंदर मामा, एक्सप्रैस बुक्स, दिल्ली, 2015,पृ.39

12.दिविक रमेश:समझदार हाथी : समझदार चींटी, ट्राईडेंट पब्लिशर्स, दिल्ली, 2015 पृ.69

13.हरिकृष्ण देवसरे:बाल साहित्य के सरोकार,यश पब्लिकेशंस, दिल्ली,2012, पृ.47

14.दिविक रमेश:एक सौ एक बाल कविताएँ, मैट्रिक्स पब्लिशर्स,दिल्ली,2016, पृ.106

15.हरिकृष्ण देवसरे:बाल साहित्य के सरोकार, यश पब्लिकेशंस, दिल्ली,2012, पृ.178-179

16.दिविक रमेश:एक सौ एक बाल कविताएँ, मैट्रिक्स पब्लिशर्स,दिल्ली,2016, पृ.142

 

दीपशिखा शर्मा

(शोधार्थी), हिंदी-विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़

9797803276, sharmads1106@gmail.com


                        अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-38, अक्टूबर-दिसंबर 2021

                            चित्रांकन : प्रकाश सालवी, Student of MA Fine Arts, MLSU UDAIPUR           

          UGC Care Listed Issue  'समकक्ष व्यक्ति समीक्षित जर्नल' ( PEER REVIEWED/REFEREED JOURNAL) 

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