शोध आलेख:सप्तक श्रृंखला की महिलात्रयी के काव्य में स्पंदित नारी संचेतना/ रेखा भट्ट


सप्तक श्रृंखला की महिलात्रयी के काव्य में स्पंदित नारी संचेतना

रेखा भट्ट  

  

शोध सारांश: इक्कीसवीं सदी तक आते-आते साहित्य तथा साहित्यिक विमर्शों में भी बदलाव आया है।पिछले कुछ दशकों में स्त्री विमर्श एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है।शायद इसी चिंतन और मनन की बदौलत ही नारी की स्थिति में कुछ सुधार संभव हुआ है।पूर्व में जिसेत्याग,लज्जा और कर्तव्यनिष्ठा की प्रतिमूर्ति के रूप में मात्र सैद्धांतिक रूप से पूजनीय घोषित कर दिया गया था। अब वह कुछ–कुछ मानवीय रूप में परिणित होती दिखाई देती है।आज उसे अभिव्यक्ति के सभीअधिकार प्राप्त होते हैं।इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारा साहित्य है। साहित्य के क्षेत्र में महिला लेखन की बढ़ोतरी भी यहपुष्टि करती है कि पूर्व की अपेक्षाकृत महिलाएं वर्तमान में अपने अधिकारों तथा अपने अभिव्यक्तिकरण के प्रति ज्यादा मुखर हैं।हिंदी साहित्य के इतिहास में सप्तक काव्य में शामिल तीन लेखिकाएं शकुंत माथुर, कीर्ति चौधरी और सुमन राजे जिनका संपूर्ण काव्य उनकी संवेदनाओं और भावनाओं की जीवंत झांकी है। स्त्री होने के नाते सत्यता स्वभाविकता और सहजता की त्रिवेणी महिलात्रयी के काव्य का प्राण है।सप्तक की महिलात्रयी के काव्य में नारी संचेतना तथा संवेदना मात्रअश्रुदलित नहीं है। उनकी सजग रचना धर्मिता समय के साथ सहृदयकेमस्तिष्क में गहरी पैठ बनाती जाती है।

मुख्य शब्द:  सप्तकश्रृंखला,सप्तककार, महिलात्रयी,नारीसंचेतना, स्पंदन, अनुशीलन।


प्रस्तावना

नर–नारी ईश्वर की सुंदरतम रचना है। पुरुष और नारी एक दूसरे के पूरकहैं। एक पक्ष दूसरे के बिना अधूरा है।क्योंकि युगल रूप में ही दोनों समाज के लिए फलदायी साबित हो सकते हैं।समाज की विकासात्मक प्रक्रिया को युगल रूप में बढ़ाने में दोनों समर्थ हैं। परंतु फिर भी स्त्री पुरुष की उत्पन्नजा होने के कारण पुरुष से श्रेष्ठ ही ठहरती है।

दुनिया की आधी आबादी होने के कारण साहित्य में भी नारी का हिस्सा हमेशा बराबरी का रहा है। प्राचीन काल से वर्तमान दौर तक नारी की भावनाएं,आकांक्षाएं,इच्छाएं, वेदनाएं सब कुछ साहित्य में परिलक्षित हुईं है साहित्य के माध्यम से स्त्री की सामाजिक, मानसिक, आर्थिक स्थिति को भली–भांति समझा जा सकता है।

19वीं शताब्दी से साहित्य में नारी विमर्श का मुद्दा सामनेआया। तभी सेनारी संचेतना साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।नारीसंचेतना का अर्थ समझने से पूर्व संचेतना को समझना आवश्यक है। संचेतना का अर्थ है जागरूकता या विशेष चेतना संपूर्ण प्राणी जगत की वह आध्यात्मिक भावना है जो उसे जड़ पदार्थों से भिन्न करती है अलग बनाती है। चेतना वह तत्व है जिससे प्राणी जगत अनुभूतियों को ग्रहण करने में सक्षम होता है।नारीसंचेतना जिसे हम नारी के प्रति विशेष जागरूकता के रूप में समझ सकते हैं।सप्तक की महिलात्रयी(शकुंत माथुर, कीर्ति चौधरी और सुमन राजे) के काव्य में नारी के प्रति यह विशेष जागरूकता परिलक्षित होती है। दुनिया की आधी आबादी होने के कारण नारी का अपने अधिकारों के प्रति चेतनस्वरूप होना अति आवश्यक है।

शकुंत माथुर, कीर्तिचौधरी तथा सुमनराजेकेकाव्य में चित्रित नारीवेदना के अध्ययन एवं विश्लेषण के माध्यम से महिलात्रयी के काव्य की प्रासंगिकता की अभिव्यक्ति करना प्रस्तुतशोध का परम्उद्देश्यहै।

हिंदी साहित्य के इतिहास में तार सप्तक के रूप में एक महत्वपूर्ण घटना घटित हुई जिसने काव्य की दिशा को एक नवीन मोड प्रदान किया था। तार सप्तक एक काव्य पत्रिका थी जिसे प्रयोगवाद केप्रवर्तक अज्ञेय द्वारा संपादित किया गया। तार सप्तक मुख्यतः सात कवियों का एक ऐसा समूह था जिनका साहित्य के क्षेत्र में चमकना अभी शेष था। सप्तक की अवधारणा के जनक अज्ञेयने काव्य के क्षेत्र में इस शेष की पूर्ति की थी।

 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के संपादन में वर्ष 1943 में तार सप्तक प्रकाशित हुआ।इसमेंसम्मिलित कवि प्रभाकर माचवे, गजानन माधव मुक्तिबोध,नेमिचंद्रजैन, भारत भूषण अग्रवाल, गिरिजा कुमार माथुर, रामविलास शर्मा तथा स्वयं अज्ञेय हुए।तार सप्तक की प्रसिद्धि तथा सफलता से प्रेरित होकर इस श्रृंखला ने विस्तृत रूप धारण करना आरंभ किया। इस श्रृंखला की नई कड़ी के रूप में दूसरा सप्तक हिंदी साहित्य प्रेमियों के समक्ष अज्ञेय के संपादन में फिर से प्रस्तुत होता है। दूसरा सप्तक वर्ष 1951 में प्रकाशित हुआ, जिसमें भवानी प्रसाद मिश्र, हरि नारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय और धर्मवीर भारती तथा शकुंतला माथुर शामिल थी। इसी कड़ी में तीसरा सप्तक वर्ष 1959 में प्रकाशित हुआ और इसकी शामिल कवि हुए कुंवर नारायण, विजय देवनारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह, कीर्ति चौधरी,मदन वात्स्यायनतथा प्रयाग नारायण त्रिपाठी। श्रृंखला की चौथी कड़ी एक लंबे अंतराल लगभग बीसवर्षों के उपरांत वर्ष 1979 में फिर से चौथा सप्तक के रूप में जुड़ती है। चौथा सप्तक में अवधेश कुमार, स्वदेश भारती राजकुमार कुंभज, नंदकिशोर आचार्य, सुमन राजे, श्री राम वर्मा तथा राजेंद्र किशोर जैसे महत्वपूर्ण नाम सम्मिलित हुए।

 सप्तक के इन चार भागों की श्रृंखला में लगभग 28 कवियों का काव्य उद्घाटित हुआ। यह सभी कवि उषाकाल के सूर्योदय की भांति रक्तिम शोभा से युक्तथे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और आश्चर्य की बात यह थी कि इन 28 कवियों की श्रृंखला में तीन महिला सप्तककार भी शामिल हुई थी। दूसरा सप्तक की शकुंत माथुर, तीसरा सप्तक की कीर्ति चौधरी तथा चौथा सप्तक की सुमन राजे।

सप्तक की महिलात्रयीके काव्य में नारी संचेतना अत्यंत स्वभाविक रूप से अभिव्यक्त हुई है। स्वयं महिला होने के नाते वे इस भावनात्मक हस्तांतरण को यथार्थ के बहुत करीब पहुंचा सकीं।प्रायःयह सवालउठायाजातारहा है ऐसा क्या हैजिसे महिलाएंही लिख सकती हैं। यह सच है की रचनाकारदेहांतरणकरताहै, परन्तुफिरभी स्वयंभोगेयथार्थकी एक निजीलयहोती है। मातृत्व एक ऐसा क्षणहैजिसे स्त्रीको अकेले ही भोगना होता है।“1वस्तुतः कवि भावों, विचार का साधारणीकरण करसहृदय तक भावों को काव्यात्मक रूप में अभिव्यक्त करता है परंतु एक महिला स्वयं भोगे को रुपायित करती है। स्वयंभोगे को किसी काव्यात्मक उपादान की आवश्यकता नहीं होती है। वह भोगा यथार्थ बहतेनिर्झर–सा स्वयं प्रेषित होकर पाठकके हृदय रूपी सागर में जा मिलता है। इस साधारण प्रक्रिया में किसी बाह्य काव्यात्मक उपादान या काव्यात्मक कल्पनाओं रूपी बैसाखी की आवश्यकता स्वयमेव ही समाप्त हो जाती है। और स्वाभाविक तथा प्राकृतिक रूप से बहते निर्झर में जो गति शीतलता,उज्ज्वलता तथा स्वच्छता उपलब्ध होती है लगभग वही गति,शीतलता,उज्ज्वलता तथा स्वच्छता महिलात्रयी के काव्य में भी उपलब्ध होती है।

सप्तकीय श्रृंखला के दूसरा सप्तक में शामिल शकुंतला माथुर को अत्यंत संवेदनशील कवि हृदय प्राप्त था। जो कवि होने की प्रथम और अंतिम शर्त की पूर्ति करता है। दूसरा सप्तक की भूमिका में शकुंत माथुर कहतीहै– “बात बहुत सीधी है।प्रत्येक मनुष्य वही काम करता है जिसमें उसे सुख मिले। भौतिक सुविधाओं में सुख पाते तो सभी को देखा है किंतु आध्यात्मिक चिंतन से लेकर काव्य और ललित कलाओं तक में भौतिक सुख से भी अधिक कितना सुख मिलता है यहतो उनका पुजारी ही जान सकता है।”2 शकुंतला माथुर लेखन को आत्मिक सुख के तौर पर स्वीकार करती है शकुंत के काव्य में स्व की अभिव्यक्ति है और बहुत स्वभाविक था कि उनकेकाव्यमें नारी सुलभ कोमल कल्पनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। शकुंत दूसरा सप्तक में स्पष्ट करती हैं कि“नारी का सुख केवल उसकी घर गृहस्थी तक ही सीमित है, यह मैं नहीं मानती।गृहस्थी के साजसंवार के बाद भी वह पूरा संतोष नहीं कर पाती, उसे लगता है जैसे वह अपूर्ण है ।उसकी सांसारिक और व्यवहारिक सुख–साधना की पूर्ति होने पर भी वहएक सामाजिक अभाव महसूस करती है और वह है मानसिक विकास का। घर में रहकर वहप्रत्येक इच्छा पूर्ति करती है, किंतु फिर भी वह मानसिक क्षेत्र में पैर फैलाने का अवसर उसे घर की चारदीवारी में प्राप्त नहीं होता है।इसलिए सब प्रकार का सुख होते हुए भी इस अभाव की पूर्ति मुझे काव्य में मिली।”3शकुंत गृहस्थीकी चारदीवारी में सुख पाने पर इसकी पूर्ति काव्य के माध्यम से करती हैं। शकुंत के काव्य में नारी संचेतना कदम कदम पर नजर आती है। उनकी कविता ‘नारी का संदर्भ’ में स्वयं को थका कमजोर महसूस करतीहैं। नारी की मानसिक स्थिति को बखूबी बयां करतीहैं।

मैं इतनी कमजोर क्यों हूं

जोअपनेही से बार-बार हार जाती हूं

मैं इतनी कमजोर क्यों हूं

जो अपनी ही कमजोरियों से कतराती हूं

मैं इतनी कमजोर क्यों हूं

जो आगे बढ़ा हुआ कदम

मोड़ लेती हूं

जहां से शुरू हुई थी

अपनेखुले हुई मार्ग

स्वयं बंद कर

अपनेही को कोसतीरहतीहूं

और चहार– दिवारी में

होली सीजलती रहतीहूं।“4

जीवनमें पल पल नारी को अनेकोंपरिक्षाएंदेनी होती है।कभी कभी मन के उत्साहका कम होना स्त्रीको कमज़ोर और अधिककमज़ोरबना देताहै।परिस्थितियोंसे समझौताकरती हुईवो अपनेखुलेमार्गोंकोस्वयंबंदकर देती है।अपनेसपनोंका गला स्वयं घोंटदेती है।‘होली–सी जलना’ शब्द स्त्रीकी कठिनपरिस्थितियों मेंहोने की स्पष्टअभिव्यक्तिकरता है।कठिन से कठिनतरपरिस्थितियोंसे जूझकरभी नारीआंधी के दीपकसी दूसरोंका मार्ग प्रशस्तकरती है।

धन्य दीपक

इतनीआंधियों के बाद भी

तू रोशन है

जलते जलते ध्यान रहे

कालखव धुंआ

इतना ना बढ़े

मुंह पर पुते

आंख भरे

ज्योति बुझे।“5

शकुंत नारी को भविष्य के प्रति सचेत भी करतीहैं। सब कुछ में से कुछ अपने लिए भी बचा लेने की सलाह देती है। तीसरा सप्तक की कवयित्रीकीर्ति चौधरी रामायण काल के लक्ष्मण रेखा प्रसंग की पृष्ठभूमि में पुरुष के झूठे दंभ और स्त्री की व्यथा को अभिव्यक्त करती हैं। समाज द्वारा स्त्री के लिए बनाई गई इनसीमा रेखाओं को मर्यादा का नाम दिया गया है। जिनमें फंसकर नारी जीवन बदतर हुआ है।

मृग तो नहीं था कहीं

बावली भरमते से इंगित पर चलेगए

तुम भी नहीं थे

बस केवल यह रेखा थी

जिसमें बंधकरमैंने दुस्सह प्रतीक्षा की”।6

कीर्ति स्त्री के लिए बनाई समाज की इन सीमा रेखाओं को लांघने का आह्वान करती हैं।

“मन मेरे!

अब रेखा लांघो

आए तो आए

वह वन्य

छद्म धारी

अविचारी

कर खंडित कलंकित

ले जाए तो ले जाए

मंदिर में ज्योतित

उजाले का प्रण करती

कविता मेरे धूम शिखा–सी

यह अनिमेष लगन

कौन वहां आतुर है

किसे यहां देनी है

ऊंचा ललाट रखने को

अग्नि की परीक्षा वह।“7

कीर्ति चाहती है कि समाज में अब वह वक्त आ गया है किस्त्री अपनी अधिकारों के लिए स्वयं लड़े और अपनी ऊपर होने वाली विभिन्न ज्यादतियों के प्रति मुखर हो। प्रत्येक अग्नि परीक्षा भला स्त्री के लिए ही इंतजार क्यों करें ? यह प्रश्न एक स्त्री के मन में आना स्वाभाविकहै जो सदियों से शोषित, दलित और पीड़ितरही है। सदियों से समाज में नारी उपेक्षित ही रही है। फिर चाहे वह किसी भी किरदार में हो वह मां हो, बहन हो, पत्नी तथा बेटी ही क्यों ना हो ।प्रत्येककिरदार में सहना और चुप रहना ही जैसे उसकी नियति हो।उसके हिस्से का दर्द जैसे विधि के लेख की भांति दुर्निवारहो। चौथा सप्तक की कवयित्री सुमन का काव्य तो नारी चेतना और वेदना से ही स्पंदितहै।

“हम न कथाएंहैं

नमहाकाव्य

दृष्टांत और परिशिष्ट

हस्तांतरित होने को

पीढ़ी–दर–पीढ़ी।“8

स्त्री अपने अस्तित्व की मांग करती है।सुमन स्त्री होने की पीड़ा को पहचानती हैं। वे दुनिया की आधी आबादी द्वारा उपेक्षा का जहर पीने का दंशस्वीकारतीहै। स्त्री जन्म से लेकर मृत्यु तक उपेक्षितों–साजीवन जीने को मजबूर है। सुमन ‘एरका’ में स्वीकारती हैं–

“कन्या का जन्म

किसी भी युग में

मंगल नहीं होता

कन्या का जन्म

न तो वह पिता की

भूमि की

रक्षा कर सकती है।

ना आहत अभिमान की

अधिक से अधिक

किसी राजा

छत्रपति सम्राट की

उपहार बन सकती हैं।”9

उक्तपंक्तियां स्त्री के सच की अभिव्यक्ति करती हैं। स्त्री को मात्र उपभोग की वस्तु बना दिया गया है। कन्या का जन्म हरकिसी घर में अमंगल का विषय रहा है। पुत्री के रूप में कन्या अग्राह्य ही है, परंतु पत्नी तो सारे संसारमें अपेक्षित है। समाज सदियों से ऐसा दोगला व्यवहार स्त्री के साथ करता आया है।सुमन का काव्य स्त्री की झकझोरतीपीड़ा से स्पंदितहोता है। साथ ही सहृदय के हृदय तक संवेगों का आवेग पहुंचने में समर्थ होता है।

‘मनु पुत्र के नाम खुली चिट्ठीनामक लम्बीकवितासुमनराजे की स्त्री चेतना और वेदना से अनुप्राणितप्रतिनिधि कविता है, जिसमें एक मां अपने बेटे को पत्र के माध्यम से अपने दुख और दर्दों को सांझा करती है। यह कविता स्त्री की शारीरिक, मानसिक तथा संवेगात्मक पीड़ा की चरम पर जाकर सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों को चिंतन के लिए छोड़ती है और मनन के लिए मजबूर करती है।

“मेरी तुम अगर बेटी होते तो

इस खत की जरूरत शायद नहीं होती

मेरे चिरे हुए नाखून और फटी फटी

खुरदुरी एड़ियां अपनी परंपरा

तुम्हें सौंप चुकी होती

अपनी हर पीड़ा को उलटती–पलटती

तुम महसूस करती हर बार

मेरी करकराती चीखें

उसी तरह जैसे आज

दर्द से कराहतीहुई

बार-बार अपने हाथ

वहां ले जाती हूं

जहां मेरी मां ले जाया करती थी।“10

वर्तमान दौर में इसी संवेगात्मक जागरूकता की आवश्यकता है कि स्त्री अपने और अपनी संपूर्ण स्त्री जाति के प्रति संवेदनशील हो। स्वके साथ ही संपूर्ण नारी जाति की पीड़ा उसे भीतर तक पीराये और इस पीड़ा के बलबूते पर वह अपने अस्तित्व को तलाश ने की ओर अग्रसरित हो सकें। क्योंकि वर्तमान और अतीत में यदि देखें तो बहुत ज्यादा परिवर्तन स्त्री की स्थितियों में नहीं हो पाया है। आजादी प्राप्तिसे पहले भी देश में जो हालात थे आजादी के कई दशक गुजर जाने के बाद भी स्थिति जस की तसबनी हुई है।विकास का जो सपना आजादी की शाम संपूर्ण देश ने देखा वह आज भी सपना ही बनकर रहा है। विकास का वह सपना सच की धरातल पर परिणत नहीं हो पाया है ।क्षोभ और पीड़ा की सटीक अभिव्यक्ति सुमन अंकित करती हैं।

“लोग कहते हैंतब और ही

थी बात सदियों की गुलामी ने

तोड़ दी थी रीढ़ समाज की,

परंपराओं की, मेरी मां ने भी कहा

था आजादी की संध्या को

मुझे जन्म दे और है बात अब

बेटे और बेटियों में कोई फर्क नहीं

और आजादी के पैंतीससाल बाद तुम्हें

जन्म देकर सोचती हूं

चलो एक प्राणी नहीं बढ़ा

प्रताड़न और रोदन के लिए।“11

एक मां अपनी पुत्र के पैदा होने पर खुश नहीं है बल्कि प्रताड़ित होने के लिए एक प्राणी अर्थात पुत्री के न पैदा होने से अत्यंत खुश है, क्योंकि स्त्री की प्रताड़ना का जो दौर प्रारंभ हुआ है वह समाप्त ही नहीं होता फिर चाहे वह आजादी से पूर्व का समय हो या आजादी प्राप्तिके बात का। स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं।सुमन वर्तमान दौर की इन विडंबनाओ और विसंगतियों को अपने काव्य में अभिव्यक्त करती हैं।

              सुमन समकालीनदौर की कवयित्रीहैं। इस दौर में नारी जाति अपने कर्तव्यों के साथ अपने अधिकारों की प्रति भी जागरूक दिखाई देती है। सदियों से अपनेवजूद की खोज की दरकार स्त्री जाति के भीतर दिखाई पड़ती है। यही छटपटाहट, बेचैनी सुमन के काव्य में स्पष्ट परिलक्षित होती है।यहस्त्री चेतना सुमन के काव्य का प्राण कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। सुमन ने स्त्री संचेतना से अनुप्राणितहिंदी साहित्य का आधा इतिहास लिखकर विश्व की आधी आबादी अर्थात नारी को उसकी अस्तित्व की तलाश करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।यह अत्यंत ही प्रभावशाली इतिहास है।क्योंकि वे जानती हैं कि “जहां पुरुष मौन हो जाता है वहां जन्म लेता है महिला लेखन। जो अंश खाली छूट गए हैं या छोड़ दिए गए हैं उनके भराव में मिलता है महिला लेखन।“12 समकालीन दौर में जहां महिला अपने अधिकारों के प्रति जागरुक है वहीं महिला लेखिका भी इस जागरूकता को आगे बढ़ाने के लिए संकल्पितदिखाई पड़ती हैं। सप्तक की कवयित्रियों ने अपने काव्य में नारी चेतना और वेदना को युगल रूप मेंध्वनित किया है। चेतना और वेदनानारी के संदर्भ में दोनों प्रत्यय आपस में जुड़े हुए हैं।शकुंत और कीर्ति की चेतना सहज और स्वाभाविक है जो अपने आसपास के वातावरण से अत्यधिक प्रभावित है।शकुंतअपनेस्व से प्रभावित है वह अपनी गृहस्थी से बाहर के सुख प्राप्त करना चाहती है। उस मानसिक प्रसन्नताके अंतराल की पूर्ति वह काव्य के माध्यम से करती हैं। कीर्ति मुखर होकर स्त्री पीड़ा के प्रति सीमा रेखा को लांघनेका प्रस्ताव रखती हैं।वे सर्वस्व में अपने स्व को बचा लेने की पक्षपाती नजर आती हैं।जबकि सुमन के काव्य में नारी संचेतना अपने विस्तृत फलक को समेटे हुए है। सुमनदुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं।वे न केवल पौराणिक प्रसंगों की माध्यम से स्त्री के अस्तित्व को तलाशने का प्रयास करती है वरन समकालीन दौर की विसंगतियों तथा विडंबनाओंऔर स्त्री के जीवन की समस्याओं को खोजने तथा उन्हें दूर करने का प्रयास करती नजर आती है। इस प्रकार सप्तक की महिलात्रयी के काव्य में नारी संचेतना पूर्ण रूप से दिखाई पड़ती है जो अत्यंत सहज स्वाभाविक तथा प्रभावशाली रूप मेंसाहित्य इतिहास में अंकित हुई है।महिलात्रयीके काव्य में नारी चेतना इस प्रकार गुम्फीतहै जैसे पुष्प में सुगंध। जिसकेअस्तित्व को कुदरती स्वाभाविकता के कारणविलगायानहीं जा सकता है ठीक उसी प्रकार महिलात्रयी नारी चेतना की अभिव्यक्ति से गुम्फीतउत्कृष्टकाव्य है।आधुनिक नारीआत्मनिर्भरहै और आर्थिकदृष्टिसे स्वतंत्रभी।सम्पूर्णसाहित्य के केंद्र में आज नारी है।वर्तमानसमाज में नारी की सुदृढ़स्थितिनारी संचेतना का उत्कृष्ट उदाहरण है।

सन्दर्भ सूची

1– सुमन राजे,हिंदीसाहित्यका आधा इतिहास,पृष्ठ– 26

2–अज्ञेय(संपादक), दूसरा सप्तक,पृष्ठ– 44

3–उक्त ।

4– पवन माथुर(संपादक) शकुंत माथुर:कविता समग्र, पृष्ठ–267

5– उक्त, पृष्ठ–126।

6– कीर्ति चौधरी,कीर्तिचौधरी की कविताएं,पृष्ठ– 24

7– उक्त।

8– सुमन राजे,एरका, पृष्ठ–02

9– सुमन राजे,एरका,पृष्ठ–45

10– सुमन राजे,यात्रादंश,पृष्ठ– 50

11– सुमन राजे यात्रादंश, पृष्ठ– 65

12– सुमन राजे, हिंदी साहित्य का आधा इतिहास,पृष्ठ– 30

 

रेखाभट्ट (शोधार्थी) 

असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी)

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय

बागेश्वर, उत्तराखंड


अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-39, जनवरी-मार्च  2022

UGC Care Listed Issue चित्रांकन : संत कुमार (श्री गंगानगर )

 


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