शोध आलेख : भारत में प्रचलित मीडिया शिक्षण मॉडल और उनके प्रभावों का अध्ययन / डॉ. मनीषकांत जैन

भारत में प्रचलित मीडिया शिक्षण मॉडल और उनके प्रभावों का अध्ययन

- डॉ. मनीषकांत जैन



शोध सार : भारत में मीडिया शिक्षा का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। मीडिया संस्थान भी पिछले एक दशक से लगातार खुल रहे हैं। मीडिया की समाज के हर क्षेत्र में दखल के कारण मीडिया के क्षेत्र में युवाओ का रुझान बढ़ रहा है। इतना ही नहीं युवाओं को मीडिया के क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। युवाओं की इसी आवश्यकता का फायदा मीडिया संस्थान उठाने से नहीं चूक रहे हैं। लगभग हर जगह यहां तक कि जिला स्तर पर मीडिया शिक्षा संस्थान शुरू किये जा चुके हैं या फिर पुराने विश्वविद्यालयों में मीडिया के पाठ्यक्रम शुरू किये गये हैं। सबसे बड़ी समस्या मीडिया के पाठ्यक्रमों में एकरूपता नहीं है। एकजाई पाठ्यक्रम न होने से विद्यार्थियों को तो परेशानियों का सामना करना ही पड़ रहा है,वही मीडिया शिक्षकों को भी इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अब जरूरत है, कि अन्य पाठ्यक्रमों जैसी मीडिया पाठ्यक्रम के लिये काउन्सिल का गठन किया जाये तो देश के तमाम मीडिया संस्थानों में एक समान मीडिया शिक्षा मॉडल लागू किया जा सके। जिससे मीडिया की समान शिक्षा विद्यार्थी को मिल सकें।

 

बीज शब्द : मीडिया शिक्षा, मीडिया मॉडल, रोजगार, एकरूपता, पाठ्यक्रम, काउन्सलिग आदि।

 

मूल आलेख : आज से 65-70 साल पहले जब पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू हुयी था,इस दौर में पत्रकारिता की शिक्षा में लक्ष्य सिर्फ प्रिंट पत्रकारिता हुआ करती थी, लेकिन मीडिया के माध्यमों में परिवर्तन होने और तकनीकी विकास होने के बाद मीडिया के शिक्षण संस्थानों की शिक्षा में भी परिवर्तन होने लगा। वर्तमान में ये शिक्षा केवल पत्रकारिता शिक्षा नहीं बल्कि मीडिया शिक्षा का रूप ले लिया है। मीडिया शिक्षा कहने का मतलब प्रिंट, रेडियो, टीवी, ऑनलाइन मीडिया के बारे में पढ़ना और उसके लिए काम कैसे करें,इसका प्रशिक्षण देना होता है,बल्कि छात्रों को तकनीकी ज्ञान से भी रूबरू करना होता है। शुरूआती दौर में पत्रकारिता शिक्षा में केवल समाचार पत्र में प्रूफ रीडिंग, संवाददाता, रिपोर्टर, फीचर लिखने और कहीं कहीं इससे थोड़ा आगे बढ़ें तो जनसंपर्क के बारे में पढ़ाया जाता था। लेकिन उदारीकरण के दौर के बाद मीडिया शिक्षा की दिशा और दशा ही बदल गयी। पहले अधिकांश जगहों पर कॉलेज या संस्थान डिस्टेंस एजुकेशन करवाया करते थे, लेकिन धीरे-धीरे पहले हिंदी और अंग्रेजी के विभागों के अधीन इसकी पढ़ाई शुरू हुई, लेकिन अब ये स्वतंत्र विभाग के रूप में कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाने लगा है।

 

अध्ययन के लिये चयनित मीडिया संस्थान

प्रस्तुत अध्ययन के लिये मध्यप्रदेश के चार विश्वविद्लायों में संचालित किये जा रहे मीडिया पाठ्यकमों को अध्ययन में शामिल किया गया है। इन चयनित विश्वविद्यालयों में दो सरकारी और दो निजी विश्वविद्यालयों को लिया गया है।

 

चयनित किये गये सरकारी विश्वविद्यालय

1-माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय संचार और पत्रकारिता विश्वविद्यालय,भोपाल।

2-महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय,चित्रकूट,जिला सतना।

3-एलएनसीटी यूनिवर्सिटी,भोपाल(म.प्र.)

4-मानसरोवर ग्लोबल विश्वविद्यालय,भोपाल(म.प्र.)

 

अध्ययन के चयनित पाठ्यक्रम

1-स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम(बी.जे.एम.सी और बी.ए(मॉस कम्यूनिकेशन)

2-स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (एम.जे.एस.सी और एम.ए.(जर्नेलिज्म एंड मॉस कम्यूनिकेशन)

 

शोध प्रविधि

प्रस्तुत अध्ययन विवऱणात्मक शोध प्रविधि से पूरा किया गया है। चयनित किये गये विश्वविद्यालयों के स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों का अध्ययन अंतःवस्तु विश्लेषण के आधार पर किया गया है। इस विश्लेषण के बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचा गया है।

 

भारत में प्रचलित मीडिया शिक्षा मॉडल

सबसे बड़ी बात यह है कि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में मीडिया शिक्षा प्रदान की जा रही है,उनमें शिक्षा के अलग-अलग मॉडलों के माध्यम से प्रशिक्षण दिया जा रहा है।यही स्थिति एनसीआर की है,एनसीआर में भी अलग-अलग विश्वविद्यालयों में अलग-अलग शिक्षा मॉडल के माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की जा रही है।इतना ही नहीं विभिन्न विश्वविद्यालयों में संचालित पाठ्यक्रमों में भी एकरूपता नहीं है।

 

यूनेस्को ने जो मीडिया के मॉडल बताये हैं, वे इस प्रकार हैं-

1--प्रायोगिक शिक्षण मॉडल

सन् 1970 मेंडेविड ए कोलब ने अपने सहयोगियों कर्ट लेविन, जॉन डेवी और जीन पियागेट के साथ मीडिया शिक्षा का प्रायोगिक लर्निंग मॉडल विकसित किया। इस मॉडल का मूल, अनुभव के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया है। यह सीखने के माध्यम से सीखना या अनुभव के द्वारा सीखना हो सकता है। यह हैंड्स-ऑन लर्निंग अप्रोच (कोलब, 1984) पर जोर देता है। इस मॉडल में मीडिया शिक्षकों,अपने विद्यार्थियों को अपने ज्ञान और कौशल के बारे में सिखा सकते है,जो उन्होने मीडिया के क्षेत्र में लगातार काम करने के दौरान सीखा है।

 

2-क्रिटिकल पेडागॉजी अप्रोच

पाउलो फ्रेयर ने क्रिटिकल पेडागॉजी शब्द गढ़ा है। यह दृष्टिकोण मूल रूप से छात्रों को क्रिटिकल कॉन्शियसनेस (फ्रीयर, 1984) प्राप्त करने में सहायता करता है। एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक शिक्षक इरा शोर ने आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र को गहरे में परिभाषित किया है। इरा शोर क्रिटिकल शिक्षाशास्त्र के अनुसार शिक्षण और सीखने के संवाद संबंधपर आधारित है। यह इस रूप में समझा जा सकता है कि, विचार, पढ़ने, लिखने और बोलने के साथ ही साथ सतह के अर्थ के आधार पर बोलना, पहला प्रभाव, प्रमुख मिथक, आधिकारिक उच्चारण, पारंपरिक क्लिच, प्राप्त ज्ञान,मात्र राय, गहरे अर्थ, मूल कारणों को समझने के लिए ही उपय़ोग किया जाता है। किसी भी कार्य, घटना, वस्तु, प्रक्रिया, अनुभव, पाठ, विषय वस्तु,संगठन,नीति, जनसंचार माध्यम या प्रवचन के सामाजिक संदर्भ, विचारधारा और व्यक्तिगत परिणाम।यह एक प्रगतिशील शिक्षण पद्धति है,जो छात्रों को बेहतर विचारक और बेहतर व्यक्ति बनाने में मददगार साबित हो सकती है। यह दृष्टिकोण छात्रों को दार्शनिक रूप से बेहतर और विचारवान बना सकता है। इस दृष्टिकोण के माध्यम से मीडिया के छात्र, मीडिया और समाज के बीच में त होने वाली घटनाओं और टकराव को भलीभांति समझ सकते हैं।

 

3-मीडिया शिक्षा के लिए टीचिंग हॉस्पिटल मॉडल

एरिक न्यूटन, एस.जॉन और जेएल नाइट फाउंडेशन के अनुसार, सीखने-सिखाने का एक मॉडल- जिसमें मीडिया के छात्र, मीडिया शिक्षक, मीडिया शिक्षाविद और पेशेवर मीडियाकर्मी एक साथ काम करते हैं, और एक ही छत के नीचे समुदाय द्वारा संचालित सामग्री का उत्पादन करते है। यह एक विचार है, जो पत्रकारिता के लिए मॉडल का निर्माण करने में मददगार साबित हो सकता है। है।इस विचार के अनुसार, मीडिया शिक्षा को एक चिकित्सा पेशे की तरह ही अपनी भूमिका का निवर्हन करना चाहिये। यह एक डॉक्टर की तरह पत्रकार बनने के लिए मीडिया छात्रों का उत्पादन और प्रशिक्षण देता है।

 

4-मीडिया शिक्षा मॉडल का निर्माण

शोधकर्ताओं ने भारत में मीडिया शिक्षा के लिए मॉडल (सुझाव) का निर्माण करने का प्रयास किया।शोधकर्ताओं का मत था कि भारत की सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक,शैक्षणिक,संस्कृति,परिवेश के साथ ही विकासशील देश होने के चलतेभारत की जरूरतें अलग प्रकार की है।यही वजह है, कि भारत जैसे देश में यूनिफार्म मीडिया शिक्षा मॉडल से परिणाम नहीं मिल सकते है।यही वजह है, कि शोधकर्ताओं ने भारत में अलग से मीडिया मॉडल विकसित करने पर जोर किया और नये मॉडल के प्रतिपादन की दिशा में कार्य किया।इस मॉडल में यह प्रयास किया गया कि मीडिया शिक्षा के उत्थान में यह मॉडल सहायक साबित होगा और मुद्दों और चुनौतियों से भी उबरने में मदद मिलेगी। इन मॉडल के आधार पर मीडिया अकादमी और मीडिया उद्योग के बीच की खाई को पाटा जा सकता है

 

5-मीडिया शिक्षा का अंब्रेला मॉडल

मीडिया शिक्षा के छाता मॉडल ने मीडिया अध्ययनों को दो भागों में विभाजित करने का काम किया।ये दो हिस्से इस प्रकार से है-

1-पत्रकारिता

2-जनसंचार संचार।

इस मॉडल के माध्यम से शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि, पत्रकारिता को समाचार या सूचना,संदेश जनरेटर के रूप में समझा जाना चाहिए। अर्थात मीडिया शिक्षकों को इस बात पर फोकस करना चाहिये कि समाचार या सूचना उत्पन्न कैसे हो सकें।साथ हीशोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि, पत्रकारिता शिक्षा को महत्वपूर्ण मीडिया शिक्षाशास्त्र के रूप में विकसित कर अंगीकार किया जाना चाहिए।संबंधित विषय पर शोध करने वाले विषय विशेषज्ञों का कहना है कि इम मॉडल के माध्यम से विद्यार्थियों के दृष्टिकोण में बदलाव लाया जा सकता है।इतना ही नहीं इसका प्रशिक्षण देने से विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा दिया जा सकता है।


रेखाचित्र-मीडिया शिक्षा का अंब्रेला मॉडल

 

6-मीडिया शिक्षा के लिए प्रायोगिक शिक्षण मॉडल

मीडिया शिक्षा का यह मॉडल प्रायोगिक शिक्षा मॉडल के रूप में जाना जाता है।यह मॉडल कोल्ब के प्रयोग के आधार पर आधारित है।

1970 मेंअमेरिकी शिक्षाविद और प्रसिद्ध सिद्धांतकार डेविड ए कोल्ब ने कर्ट लेविन, जॉन डेवी और जीन पियागेट के साथ पंस एक्सपेरिमेंटल(प्रायोगिक) लर्निंग मॉडल विकसित किया। यह मॉडल मूल रूप से अनुभव के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया पर आधारित है। इसे लर्निंग बाय डूइंग या लर्निंग बाय एक्सपीरियंस के नाम से जाना जाता है।यहहैंड्स-ऑन लर्निंग के दृष्टिकोण पर ज्यादा जोर देता है। इस मॉडल के माध्यम से मीडिया शिक्षक, मीडिया के छात्रों को सिखा सकते हैं,साथ ही शिक्षक भी मीडिया के पेशवरों से नये ज्ञान के बारे में जान सकते है। इस मॉडल में द्विआधारी सिद्धांत काम करते है। यानि पेशेवर मीडिया कर्मी भी अपने अनुभवों और ज्ञान को साझा कर सकते है।फील्ड में रहने के दौरान उनको किस प्रकार की और कौन से परेशानियों का सामना करना पड़ा,वे नये मीडिया के छात्रों को रूबरू करा सकते है।

 

रेखाचित्र-कोल्ब का  मीडिया शिक्षा के लिए प्रायोगिक शिक्षण मॉडल

 

7-मीडिया के अंतःविषय और बहु-विषयक मॉडल

भारत के संदर्भ में,मीडिया शिक्षा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए और भारत में मीडिया शिक्षा की स्थिति के उत्थान या सुधार के लिए इन मॉडलों का पालन किया जाना चाहिए। भारत में, मीडिया शिक्षा अभी भी पहचान की पीड़ा है कि क्या यह इंटरडिसिप्लिनरी या बहु-विषयक या सामाजिक विज्ञान या कला और मानविकी है या क्या? एक ओर, ये मॉडल इन मॉडलों के साथ-साथ मीडिया शिक्षा को पहचानने में भी मदद करते हैं, यह भी बताते हैं कि मीडिया शिक्षा केवल एक कौशल प्रशिक्षण पाठ्यक्रम है, यह भी एक विविध और शैक्षणिक विषय जैसे दर्शन, मनोविज्ञान, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र - ये उपरोक्त मॉडल हैं। भारत में मीडिया शिक्षा के प्रति आलोचनात्मक सोच को बढ़ाने में मदद कर सकता है।

रेखाचित्र-मीडिया शिक्षा का अंतविषय मॉडल

 

इंटरडिसिप्लिनरी मीडिया शिक्षा के विविधीकरण के लिए, इसे आंतरिक सिद्धांत माना जाना चाहिए और इसमें मीडिया के मुख्य विषयों के साथ अन्य विषयों जैसे दर्शन, मनोविज्ञान, राजनीतिक विज्ञान, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक आदि को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, मीडिया शिक्षा चाहिएवोकेशनल, प्रोफेशनल और ट्रेडिशनल माना जाता है। इसे अभिसरण शिक्षाशास्त्र के रूप में माना जाना चाहिए।

रेखाचित्र-क्रिटिकल मीडियॉ पेडागोजी के लिए अंतःविषय और बहु-विषयक मॉडल

बहु-विषयक मीडिया शिक्षा में महत्वपूर्ण सोच के विकास के लिए, इसे बहु-विषयक के रूप में धोखा देना चाहिए। यह मीडिया-स्वायत्तता, मीडिया-संस्कृति, मीडिया-समाज, मीडिया-फैशन, मीडिया-राजनीति, मीडिया-मनोविज्ञान आदि की समझ और अंतर-संबंध बनाने में मदद करेगा।

 

8-मीडिया शिक्षा के लिए टीचिंग हॉस्पिटल मॉडल

वैसे तो टीचिंग हॉस्पिटल मॉडल भविष्य और वर्तमान के पेशेवरों के लिए चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा का प्रशिक्षण प्रदान करता है। यहमॉडल चिकित्सा अनुसंधान में शामिल किया गया है। वैसे तो चिकित्सा शिक्षण अस्पताल अक्सर चिकित्सा संस्थानों से जुड़े होते हैं, और चिकित्सा  क्षेत्र से जुड़े छात्रों के साथ मिलकर काम करते हैं। टीचिंग हॉस्पिटल मॉडल के माध्यम से स्नातक स्तर की चिकित्सा शिक्षा भी प्रदान करता है, जहां चिकित्सा संस्थान के स्नातक स्तर के विद्यार्थियों के साथ देखभाल के समन्वय के साथ मदद के लिए पर्यवेक्षक डॉक्टर के जरिये प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।यह मॉडल मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों को चिकित्सा शिक्षा प्रदान करना, कई शिक्षण अस्पतालों में अनुसंधान संस्थानों के रूप में भी काम करते हैं।

मीडिया शिक्षा मॉडल भीटीचिंग हॉस्पिटल मॉडल पर आधारित है।इस मॉडल के माध्यम से हीविद्यार्थी पत्रकारिता शिक्षा का अध्ययन करते हैं और शिक्षक इसी मांडल के आधार पर पत्रकारिता शिक्षा के छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं।

 

9-मीडिया शिक्षा का उल्टे पिरामिड मॉडल

यह मॉडल मीडिया शिक्षा पर आधारित मॉडल है। मीडिया शिक्षा का उल्टा पिरामिड मॉडल में यह प्रमुख रूप से सुझाव दिया गया है कि कि प्रवेश के दौरान छात्रों की मीडिया क्षेत्र की पंसद के बार में जाना जाये। प्रवेश प्रक्रिया के दौरान छात्रों का दृढ़ता से विशुद्ध तरीके से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। साथ में यह समझने का प्रयास करना चाहिये कि कौन विद्यार्थी इस क्षेत्र में आना चाहिए और कौन विद्यार्थी इस क्षेत्र में आने का इक्छुक नहीं है। यह गेटकीपिंग दृष्टिकोण पत्रकारों की गुणवत्ता के साथ उत्पादन करने में मदद कर सकता है।

 

मीडिया शिक्षा के प्रचलित मॉडल पिरामिड मॉडल है लेकिन वर्तमान में भारत की मीडिया शिक्षा में दुर्भाग्य से इस मॉडल को उल्टा प्रयोग किया जाता है।यानि भारत में मीडिया शिक्षा के लिये उल्टा पिरामिड मॉडल का उपयोग किया जाता है।भारत में इस बात को सुनिश्चित करने के की पुख्ता इंतजाम नहीं है कि विद्यार्थियों की किस विषय में रूचि है और वह यानि विद्यार्थी मीडिया क्षेत्र में क्यों आना चाहता है।दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि भारत में गेटकींपिग की कोई खास व्यवस्था या इंतजाम नहीं है। यह जानने के लिये किसी के पास समय नहीं है कि जो विद्यार्थी मीडिया शिक्षा से जुड़े पाठ्यक्रमों में प्रवेश ले रहा है उसका उद्देश्य क्या है।

 

 

रेखाचित्र-मीडिया शिक्षा के उल्टे पिरामिड मॉडल

 

निष्कर्ष : विभिन्न प्रकार के मीडिया मॉडलों का अध्ययन करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि भारत जैसे देश में जहां पर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र की मौजूद है। नागरिकोण को संवैधानिक और मौलिक अधिकार प्राप्त है।जिस देश में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा पहिया माना जाता है।ऐसे देश में मीडिया शिक्षा के विभिन्न मॉडल अपनाकर मीडिया शिक्षा को सार्थक बनाया जा सकता है।

वर्तमान अध्यक्ष के निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि -

1-भारत में मीडिया शिक्षा के मुद्दों और चुनौतियों को दूर करने के लिए भारत के मीडिया शिक्षा संस्थानों में मीडिया शिक्षा मॉडल की स्थापना या निर्माण की अत्यधिक आवश्यकता है।

2-भारत में मीडिया को और मीडिया शिक्षा को दोनों दृष्टिकोणों यानीहैंड्स-ऑन-ट्रेनिंग औरक्रिटिकल मीडिया पेडागोजी के माध्यम से ही अपनाया जा सकता है।

3-भारत में मीडिया शिक्षा को मीडिया अकादमियों और मीडिया उद्योग के बीच उचित संवाद के जरिए बेहतर बनाया जा सकता है। मीडिया उद्योग की मांग के अनुरूप पेशेवरों को तैयार किया जा सकता है,ताकि मीडिया के क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों को रोजगार की दिशा में ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़े।

4-शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान यह पाया कि भारत में मीडिया शिक्षा, मीडिया की आलोचनात्मक सोच पर ज्यादा ध्यान नहीं देती है,जबकि मीडिया शिक्षा स्थानों को छात्रों के बीच महत्वपूर्ण सोच के निर्माण के लिए अंतःविषय का पालन करने की आवश्यकता है।इसके अलावा बहु-अनुशासन वाली पहुंच बनाने की भी आवश्यकता है।

5-पत्रकारिता शिक्षा के लिए टीचिंग हॉस्पिटल मॉडल अपनाये जाने की जरूरत कई वर्षों से महसूस की जा रही है।

6-वर्तमान मीडिया शिक्षा,मीडिया उद्योग की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही है।इसके लिये सरकार के स्तर पर,मीडिया संस्थानों के स्तर पर और मीडिया उद्योग के स्तर पर प्रयास किये जाने चाहिये।

7-मीडिया क्षेत्र में लगातार हो रहे तकनीकी परिवर्तन के अनुरूप मीडिया की शिक्षा में भी परिवर्तन के लिये विशेषज्ञों की टीम का गठन किया जाना चाहिये।

8-मीडिया शिक्षा संस्थानों को मीडिया उद्योग की जरूरतों का ध्यान में रखना चाहिये।

9-मीडिया शिक्षा संस्थानों पर खासकर निजी शिक्षा संस्थानों पर सरकार की पकड़ भी मजबूत होनी चाहिये।

10-मीडिया शिक्षा देने वाले संस्थानों की वर्षवार मीनिटरिंग की व्यवस्था की जानी चाहिये।

 

सुक्षाव : प्रस्तुत अध्ययन के निष्कर्षों के विवेचना के बाद सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि मीडिया शिक्षा के प्रति छात्रों के बढ़ते रूझान को देखते हुये मीडिया शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रमों को एकजाई किया जाने की आवश्यकता है। पहले मीडिया शिक्षा के लिये एक काउन्सलिंग के गठन की प्रक्रिया की जानी चाहिये। इसके बाद एक समान मीडिया शिक्षा मॉडल देश के सभी शिक्षा संस्थानों में लागू किया जाना चाहिये। ताकि मीडिया शिक्षा में एकरूपता बनी रहे और मीडिया संस्थान की जरूरतों को देखते हुये मीडिया पाठ्यक्रमों में समय-समय पर फेरबदल किया जा सके।

 

संदर्भ :

1-भारती,जयप्रकाश,ग्रामीण जीवन में विज्ञान एंव सूचना प्रौघोगिकी,प्रकाशन विभाग,सूचना और प्रसारण मंत्रालय,भारत सरकार,नई दिल्ली-2008

2-रेड्डी,यू.वी.-ए स्टोरी ऑफ इंडिया टेलीविजन,सेज पब्लिकेशस,1995

3-चटर्जी,पी.सी.ब्रॉडकास्टिंग इन इंडिया,प्रभात प्रकाशन,नई दिल्ली-2011

4-जे,कुरैन-द इंपैक्ट ऑफ टेलीविजन आंडियस,भारती प्रकाशन,नई दिल्ली-2012

5-नायर,के.एस.ब्रॉडकास्टिंग इन इंडिया,सेज पब्लिकेशंस,नई दिल्ली-1987

6-www.webduniya.com

7-www.tvguide.com

8-www.tvnet.com

9.www.mib.com

10-www.shodganga.com

11-www.grathalayah.com

 

डॉ मनीषकांत जैन

एसोसिएट प्रोफेसर,एलएनसीटी यूनिवर्सिटी,भोपाल(म.प्र.)

jainmanishkant@gmail.com 9340277383, 9425254042 


अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) मीडिया-विशेषांक, अंक-40, मार्च  2022 UGC Care Listed Issue

अतिथि सम्पादक-द्वय : डॉ. नीलम राठी एवं डॉ. राज कुमार व्यास, चित्रांकन : सुमन जोशी ( बाँसवाड़ा )

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