शोध आलेख :- झारखण्ड की जनजातीय लोक चित्रकला / दीपाली एवं डॉ. मनोज कुमार

झारखण्ड की जनजातीय लोक चित्रकला
- दीपाली एवं डॉ. मनोज कुमार

शोध सार : मानवीय संस्कृति और कला के उद्भव और विकास की अवधारणा मानव की उत्पत्ति और विकास के साथ ही जुड़ी हुई है।ऐतिहासिक तथ्यों की ओर ध्यान दें तो स्पष्ट रूप से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारी आदिम अवस्था में जब मनुष्य के पास न तो कोई भाषा रही होगी और न ही कोई आक्षरिक ज्ञान, तब शायद अपनी अंगुलियों के माध्यम से ही मनुष्य ने जमीन, बालू, पत्थर आदि पर कुछ चिह्न बनाना शुरू किया होगा और जब मनुष्य ने गुफाओं में रहना प्रारंभ किया होगा, तब उन गुफाओं में ही पशु-पक्षियों, जीवनचर्या आदि से संबंधित कुछ चित्र आदि बनाने शुरू कर दिए होंगे, जिनसे इसी आदिम अवस्था में चित्रकला का शुभारंभ हुआ होगा।झारखंड में चित्रकला विशेषकर लोक चित्रकला की समृद्ध परंपरा मिलती है। जंगलों, पहाड़ों के बीच बसने वाले आदिवासी प्रकृति के सहज सौंदर्य से सदैव अभिभूत रहे हैं। यही कारण है कि उनके आसपास का प्राकृतिक वातावरण चित्रकला का प्रेरणास्रोत बना है। आदिवासियों की चित्रकला उनकी सामाजिक मान्यताओंरीति-रिवाजोंधार्मिक विश्वासों आदि को प्रतिबिंबित करती है। उनकी चित्रकला का सहज उपलब्धि रूप उनके घरों की सजावट में देखने को मिलता है। घरों की दीवारों पर चिकनी मिट्टी का लेप लगाकर उन्हें मिट्टी व वनस्पतियों से प्राप्त रंगों से विभिन्न प्रकार की आकृतियां एवं अनेक डिजाइन बनाते हैं। झारखण्ड की जनजातीय चित्रकला को आदिमानव से लेकर आज के आधुनिक मानव तक के बीच कुछ विशिष्ट शैलियों, यथा - शैल चित्रकला शैली, भित्ति चित्रकला शैली, काष्ठ चित्रकला शैली, पट्ट/जादोपटिया चित्रकला शैली, खोंड या अरिपन चित्रकला शैली, गोदना चित्रकला शैली आदि के रूप में जीवंत देखा जा सकता है। झारखण्ड की जनजातीय कलाओं और सांस्कृतिक परम्पराओं को इक्कीसवीं सदी की वैज्ञानिक और उत्तर आधुनिक उपलब्धियों से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि इन सांस्कृतिक परम्पराओं, धरोहरों, कलाओं को सुरक्षित करके इनकी प्रासंगिकता को सुनिश्चित किया जा सके।
 
बीज शब्द : झारखंड, चित्रकला शैली, जनजाति, संस्कृति इत्यादि।
 
मूल आलेख : झारखण्ड एक वनाच्छादित प्रदेश है तथा झारखंड का शाब्दिक अर्थ है - जंगल झाड़ वाला क्षेत्र। मुगल काल में इस क्षेत्र को ‘कुकरा’नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश काल में यह झारखंड नाम से जाना जाने लगा। पुराण कथाओं को भी इतिहास का हिस्सा मानने वाले इतिहासकारों के अनुसार वायु पुराण में छोटानागपुर को मुरण्ड तथा विष्णु पुराण में मुंड कहा गया।1झारखण्ड में कुल 32 जनजातियाँ (गोंड, बैंगा, संथाल, मुंडा, हो, महली, खड़िया, असुर, बिरहोर, कोरवा, परहिया, सवर, हिल खड़िया, सौरिया पहाड़िया, उरांव और माल पहाड़िया आदि) निवास करती हैं।
 
झारखण्ड की इस जनजातीय संस्कृति पर आदि धर्म और लोक विश्वास का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। यहाँ की लगभग सभी जनजातियाँ जीववादी धर्म(सरना) को मानती हैं और जीववादी होने के कारण ही आदिवासियों में अदृश्य, अव्यक्त, अभौतिक तथा आत्मिक शक्तियों पर अटूट विश्वास होता है। झारखण्ड की कला और संस्कृति दोनों ही पूरी तरह धर्म सम्बन्धी लोक विश्वासों एवं आदिकाल से चली आ रही लोक मान्यताओं पर आधारित है। झारखण्ड की जनजातीय चित्रकला को आधुनिक से लेकर आज के वैज्ञानिक मानव तक के बीच कुछ विशिष्ट शैलियों,यथा - शैल चित्रकला शैली, भित्ति चित्रकला शैली, काष्ठ चित्रकला शैली, पट्ट/जादोपटिया चित्रकला शैली, खोंड या अरिपन चित्रकला शैली, गोदनाचित्रकला शैली आदिके रूप में जीवंत देखा जा सकता है।

 
v   शैल चित्रकला शैली :

झारखण्ड में चित्रकला के विविध प्रकारों में शैल चित्र अत्यंत प्राचीन और प्रागैतिहासिक चित्रकला के रूप में विख्यात है। झारखण्ड प्रदेश की नदी घाटी तथा पठारी गुफाओं में प्रागैतिहासिक काल के ऐसे अनेकों पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं, जिनमें प्राचीन काल के शैल चित्र अंकित हैं।जैसे दामोदर नदी की घाटी में हजारीबाग के ‘बड़कागांव’ क्षेत्र में फैली असवारी पहाड़ी श्रृंखला की गुफाओं में प्रागैतिहासिक काल के आदिम मानव से लेकर लौह युग अर्थात् असुर सभ्यता तक के मानव समुदाय होने के साक्ष्य वहां उपलब्ध चित्रों के आधार पर मिलते हैं।श्यामा चरण दूबे ने अपनी पुस्तक ‘मानव और संस्कृति’ के कला अध्याय में यह उल्लेख किया है कि “ईसा से प्रायः20000 से 10000 वर्ष पूर्व पुरा पाषण युग के पूर्व मानव अपनी आद्य कला की अनेक कृतियाँ छोड़ गये हैं। संसार के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में अभी भी सहस्त्रों ऐसे समूह हैं, जिनकी अपनी पुरातन चित्रकला शैलियाँ अभी भी जीवित हैं।”2 असवारी पहाड़ी श्रृंखला की एक अन्य गुफा ‘मंडवा तरी’ में काफी बड़े शैल फलक पर रेड लेटेराइट से जीवंत चित्र उकेरे गये हैं।इन चित्रों को स्थानीय लोग ‘खोबर’ कहते हैं, जिसके आधार पर घरों पर की जाने वाली चित्रांकन कला ‘कोहबर’ की उत्त्पत्ति मानी जाती है।इन शैल चित्रों में पशु तथा कई तरह के प्रतीक चित्र चौकोर, आयताकार, लहरदार रेखाओं व वृत्तों आदि की आकृतियों के रूप में दृष्टिगत होते हैं। इसके साथ ही साथ जंगली सूअर, हिरन, वृषभ, आदि के साथ ही मानव आकृति का चित्रण भी इन शैल चित्रों में देखने को मिल जाता है।
 
हजारीबाग के शैल चित्रों के अध्ययन के दौरान यह देखा गया है कि “ग्राम के समीप सती पहाड़ी पर नाग छत्र की आकृति वाली शैल दीर्घ में सांकेतिक चित्र लिपि में कई गुफा चित्र अंकित हैं। वह शैल फलक जिन पर ये चित्र अंकित हैं, 500 फीट से भी अधिक लम्बा है। इसी शैल फलक पर 100 फीट लम्बा और 26 फीट ऊँचा निर्मित खैरी सतह पर बड़ी संख्या में चित्र उकेरे गये हैं। इन चित्रों में आदमी, गाय, खरगोश, हिरन, नदियाँ, सूरज, ईश्वर आदि के चित्र अंकित हैं। इन चित्रों के अतिरिक्त सांकेतिक चित्र लिपि भी अंकित हैं, जिनमें कुछ सन्देश अन्तर्निहित हैं। इन चित्रों को लौह अयस्क (हेमाटाइट) आदि से तैयार किये गये रंगों से सजाया गया है। चित्रों में कहीं-कहीं सफ़ेद रंग का भी प्रयोग किया गया है।”झारखण्ड के ये शैल चित्र चित्रांकन की कला के साथ-साथ तत्कालीन गुहावासियों की सभ्यता एवं संस्कृति को भी समझ पाने में सहायक हैं।


चित्र : हजारीबाग के शैल चित्र4

 
v   भित्ति चित्रकला शैली :
भित्ति चित्रकला कला के अंतर्गत जनजातीय जीवन में पर्व-त्यौहार तथा शादी-विवाह आदि के अवसर पर घर की दीवारों पर जो पेड़-पौधों, फूल, मोर, मछली आदि के चित्र बनाये जाते हैं, उन्हें जनजातीय भित्ति चित्रकला के अंतर्गत रखा जाता है। भित्ति चित्रकला की यह शैली झारखंड  जनजातियों में विविध लोक कलाओं की तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उनकी सांस्कृतिक विरासत के रूप में संचरित और संरक्षित होकर चली आ रही है। झारखण्ड में बसने वाली मुंडा, हो, संथाल, खडिया, उरांव, गोंड आदि बहुसंख्यक जनजातियों में भित्ति चित्रकला शैली का प्रचलन पर्व-त्यौहार, शादी-विवाह के अवसरों पर किसी न किसी रूप में देखने को मिलती है। गुन्झू और कुर्मी जाति के लोगों में कोहबर और सोहराय भित्ति चित्रकला अत्यधिक लोकप्रिय रही है। ‘कोहबर’ चित्रों का निर्माण मुख्यतः वैवाहिक अवसर पर किया जाता हैं, जिसमें वृक्ष, फूल, मोर, मछली आदि चित्र स्थानीय रूप से प्राप्त रंगों से बनाये जाते हैं। वहीं ‘सोहराय’चित्रों का निर्माण कृषि उत्सव के रूप में किया जाता है। फसलों की कटाई के बाद घर में अनाज के भंडारण के समय यह उत्सव मनाया जाता है। दीपावली के अगले दिन अन्य देवी-देवताओं के साथ ही कृषि से जुड़े पशुओं की भी इस अवसर पर पूजा की जाती है और इसी पूजा के दौरान घरों में विभिन्न प्रकार के भित्ति चित्र बनाए जाते हैं।ये भित्ति चित्र सजावट के साथ-साथ किसी मिथकीय या धार्मिक भावना से भी जुड़े हुए होते हैं। कृषि चक्र, शिकार, जतरा आदि से संबंधित भित्ति चित्र भी जनजातीयचित्रकला में यदा-कदा दृष्टिगत होते हैं।
 
सोहराई झारखंड के आदिवासी-मूलवासी समुदाय का त्योहार है। इस त्योहार के मौके पर घरों की दीवारों पर कलात्मक चित्र उकेरे जाते हैं। इसी तरह झारखंड में शादी-विवाह के मौके पर वर-वधू के कक्ष में भी खास तरह के चित्र बनाए जाने की परंपरा रही है, जिसे 'कोहबर' कहा जाता है। इन दोनों तरह की चित्रकारियों में एक जैसी पद्धति अपनाई जाती हैं।अनेक शोध में यह प्रमाणित हुआ है कि इस आदिवासी कला का इतिहास 5000 वर्षों से अधिक पुराना है। इसकी शुरूआत का काल 7,000-4,000 ईसा पूर्व के बीच आंका गया है। भित्ति शैली में सोहराय कला और कोहबर कला झारखण्ड के हजारीबाग क्षेत्र की प्रमुख कला है। कोहबर का अर्थ होता है- शादीशुदा नवदंपत्ति का घर। कोहबर की यह चित्रांकन कला ग्राफिटो के रूप में है जिसे दीवार पर कंघी से खुरच कर बनाया जाता है। यह विवाह से संबंधित मांगलिक चित्र होते हैं, जिसे विवाहोपरांत नवदंपति के घर आने पर विभिन्न प्रकार के लोकाचार के लिए भित्ति पर मांगलिक चित्र के रूप में अंकित किया जाता है। इन्हें ही कोहबर कहा जाता है। कोहबर की यह चित्रांकन कला लगभग सभी जनजातियों में प्रचलित है। सोहराय भित्ति चित्रांकन की कला कृषि से जुड़ी है, जिसमें धरती माता, ग्राम देवता तथा अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ गोहाल देवता और पशुधन की भी पूजा की जाती है। इस अवसर पर घर के बाहर और भीतरी दीवारों पर विभिन्न पेड़, झूला, पशु, पक्षी, मुर्गा, बत्तख, हिरन, हाथी, गाय आदि के चित्र बनाये जाते हैं।जिन्हें लाल, सफ़ेद, काले और पीले रंगों से दतवन की कूची के माध्यम से उकेरा जाता है। संथाली लोक जीवन की चित्रकला पर अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए डॉ. केसी टुडू ने भी यह स्पष्ट किया है कि, “इन चित्रों में संथाली जाति की संस्कृति, रीति-रिवाज, आचार-विचार परिलक्षित होते हैं।”5डॉ. केसी टुडू का यह कथन संथाली जाति की तरह अन्य सभी आदिम जनजातियों द्वारा निर्मित चित्रों के सन्दर्भ में भी सत्य प्रतीत होता है।
 
संथाली भित्ति चित्रों में पूजाघर की दीवारों पर पिरामिडनुमा चित्र के साथ-साथ सूरज, चंद्रमा आदि के चित्र बनाये जाते हैं और शेष भाग की दीवार पर पेड़-पौधे, फूल-पत्ते, पशु-पक्षी आदि के चित्र भी बनाये जाते हैं। इस जनजाति में घर के बाहरी दरवाजे पर युगल मोर व मछली के चित्र बनाना भी शुभ माना जाता है। वहीं झारखण्ड की ‘हो’ जनजाति में माघ पर्व के अवसर पर अपने घरों की दीवार को सफ़ेद काली और लाल मिट्टी से रंग जाता है तथा दीवार के निचले भाग में ज्यामितिक चित्र आदि बनाये जाते हैं।


चित्र : सोहराई व कोबर चित्र6

 
‘हो’ जनजाति में घरों के कमरों तथा फर्श पर भी तरह-तरह के पुष्प, चन्द्र, आदि बनाये जाते हैं। ‘मुंडा’ जनजाति के लोग भी पर्व के अवसर पर दीवारों पर फूल-पत्ती आदि के चित्र बनाते हैं। इसी प्रकार ‘सबर’ जनजाति में भी मोर, पक्षी, नृत्य, देवी-देवता तथा शिकार से जुड़े हुए चित्रों का अंकन किया जाता है। ‘सबर’ जनजाति के लोग मुख्य रूप से दुर्गा-पूजा, काली पूजा, रथयात्रा आदि के अवसर पर भित्ति चित्रों से अपने घरों को सजाते हैं।

चित्र : सोहराई चित्रकला झारखंड7

चित्र : कोहबर चित्रकला

 
v   काष्ठ चित्रकला शैली:

सूती वस्त्रों पर छपाई के लिए इस चित्र शैली के प्रयोक्ता रंगरेज कहलाते थे जो कि शादी-विवाह, पर्व-त्योहार आदि के अवसर पर काष्ठ चित्र के माध्यम से कपड़े पर छापा या ठप्पा लगाकर उसे रंगीन और आकर्षक रूप प्रदान करते हैं।श्री श्यामाचरण दुबे ने ‘मानव और संस्कृति’ नामक पुस्तक में काष्ठ कला के सन्दर्भ में उल्लेख किया है कि “सॉलोम द्वीपों में बसने वाली जनजातियों के बीच प्राचीन काल से चली आ रही काष्ठकला काफी विकसित और लोकप्रिय है। वहां के लोग हल्की लकड़ी का उपयोग कर उकेरे गये चित्रों को विभिन्न रंगों से सजाते हैं।”8 डॉ. महेश चन्द्र शांडिल्य ने जनजातीय सन्दर्भ में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए मध्य प्रदेश से झारखंड में आकर बसने वाले गोंड और बैंगा जनजातियों के बीच लोकप्रिय काष्ठ कला पर प्रकाश डाला है, “जनजाति जीवन एक सम्पूर्ण इकाई है। वे अपनी आवश्यकता की अनेक सामाग्रियाँ जंगल से प्राप्त करते हैं। वे अपने आवास और उसमें काम आने वाले उपकरणों के स्वयं निर्माता और उपभोक्ता होते हैं। उनकी प्रत्येक भौतिक सामग्रियों में उनकी संस्कृति की झलक मिल जाती है। आदिवासी परिवारों में काष्ठ कर्म भी उनकी विशिष्ट कला के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। गोंड और बैंगाजनजाति के लोग प्रारंभ से घने जंगलों में निवास करते हैं। वे अपने घर के किवार और चौखट आदि के निर्माण में कलात्मक काष्ठ शिल्प का उपयोग कर अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रस्तुत करते हैं।”9
 
झारखण्ड के गढ़वा, पलामू आदि जिलों में बैंगा बसे हुए हैं और वहीं वे काष्ठ कला के अच्छे कलाकार के रूप में जाने जाते हैं। प्रस्तुत समुदाय में पुरातन समय से ही उनके घर के किवाड़ और चौखट पर इस काष्ठ कला का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है। अपनी पुरातन परम्परा से चली आ रही काष्ठ-कला का प्रमाण उनके घर के किवाड़ और चौखट आदि पर देखा जा सकता है। विविध प्रकार के चित्र बैंगा लकड़ी पर खुदाई के द्वारा उकेरते हैं, जिन चित्रों में हाथी, फूल, मानव, पशु आदि चित्रों की प्रधानता अधिक रहती है।
चित्र : काष्ठ चित्रकला10
( बैगा जनजाति में दरवाजों पर बनाये गये पुष्प, पशु, पक्षी आदि के चित्र )


 
v  पट्ट या जादोपटिया चित्रांकन शैली :

चित्रांकन की यह शैली भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है। चित्रांकन की इस कला को ग्रामीण चित्रांकन कला कहा जाता है, जिसके चित्रकार ‘जादो’ या ‘जादोपटिया’ कहलाते हैं। वैसेरामायण और महाभारत की कथा को भी कपड़े पर पट्ट चित्र के रूप में बनाया जाता था, परन्तु जनजातीय जीवन में ‘जादोपटिया’ चित्र शैली के चित्रकार संताल परगना के कई गाँवों में भी निवास करते हैं। जादोपटिया की यह कला संथाल जनजाति के बीच उनके धार्मिक लोकविश्वास से जुड़े होने के कारण अधिक प्रचलित है। जादो संथाल जाति के किसी भी मृतक के सन्दर्भ में पूरी जानकारी लेकर उसके परिवार में जाकर पट्टचित्र में मृत्यु के देवता या यम के द्वारा मृत्यु के बाद प्राणियों को उनके क्रमानुसार मिलने वाले दंड और पुरस्कारों की चित्रात्मक सूची दिखाकर बताते हैं कि उस परिवार के मृतक को क्या दंड या पुरस्कार दिया जा सकता है।

चित्र : जादोपटिया चित्रकला11
(चित्र दो : उपरोक्त चित्र में यमराज के समक्ष मृतक को यमदूतों द्वारा सजा दिए जाने का अंकन हुआ है)

 
जादोपटिया से यह कथा सुनकर परिवार वाले विलाप करते हैं और दान स्वरूप नकद राशि या अनाज जादोपत्व को दे देते हैं। यह भिक्षा ही इनके भरण पोषण का साधन बनती है। चित्रकला की इस शैली में यम के दंड विधान को चित्रित करने वाली शैली के अलावा, संतालों की उत्पत्ति कथा, संतालों का पर्व, उनके समूह नृत्य अथवा जतरा, संथाल वंशावली तथा गोपियों के साथ श्रीकृष्ण के विविध प्रसंग भी इन पट्टचित्रों में चित्रित किये जाते हैं। इस चित्रशैली के चित्र सपाट और चौरस धरातल पर बने होते हैं। साथ ही इन चित्रों में रंगों की व्यापक विविधता का भी अभाव दृष्टिगत होता है। इस चित्र शैली के लिए जादोपटवा रंग, फलों-सब्जियों के रस या खनिज से तैयार किये जाते हैं तथा काले रंग के लिए कालिख, लाल रंग के लिए सिन्दूर और लोहित भूरे रंग के लिए मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है।जनजातीय जीवन में जादोपटवा चित्रांकन शैली अपने किस्म की अनूठी शैली है।
 
v   अरिपन अथवा खोंड चित्रकला शैली:

पर्व-त्यौहार, शादी-विवाह, उत्सव आदि के अवसर पर पूजा-पाठ संपन्न करने हेतु पूजा स्थल (जिसे आदिवासी भाषा में खोंड, जहेर थान, सरना स्थल, मंडवा आदि भी कहा जाता है) की शुचिता एवं शुद्धिकरण पर अन्य समुदाय के साथ-साथ जनजातीयसमुदाय के लोगों द्वारा भी विशेष ध्यान दिया जाता है। इसी सन्दर्भ में पवित्र पूजा स्थल के इस अलंकरण की परम्परा भी पुरातन समय से चली आ रही है। पूजा स्थल के इस अलंकरण को ही जनजातीय भाषा में ‘अल्पना’ अरिपन या चौक पूर्ण भी कहा जाता है। संथाली लोग इसे ‘खोंड’ भी कहते हैं। इस अरिपन के निर्माण में भूमि पर चित्र निर्माण करने के लिए रेखाओं के माध्यम से विभिन्न जनजातियों द्वारा विभिन्न प्रकार के ज्यामितिक चित्र अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बनाये जाते हैं। अरिपन के माध्यम से देवी-देवताओं और पितरों व पूर्वजों की आत्मा का मन्त्र द्वारा आह्वान कर उन्हें आसन प्रदान किया जाता है तथा विधिवत पूजा करके परम्परानुसार बलि देकर उनका आशीर्वाद भी लिया जाता है।अरिपन कला के इस महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए श्रीमती अरुण चौबे ‘चौमासा’ पत्रिका में कहती हैं,“अधिदैविक और अधिभौतिक शक्तियों को आमंत्रित करने हेतु उत्सवपरक पूजनचार्या के आयोजनों की प्रतिष्ठा की गयी है। इन धार्मिक आयोजनों में मंगल चौका (अल्पना) बनाना एक अनिवार्य अंग है।”12
 
झारखंड की विभिन्न जनजातियों द्वारा बनाये जानेवाले इस अरिपन को अरवा चावल का आटा, सिन्दूर, लकड़ी, कोयले के चूरे आदि से बनाया जाता है। इसके साथ ही साथ इसमें अन्य प्राकृतिक रंगों का भी प्रयोग किया जाता है। इन चित्रों के आकार त्रिभुजाकार, चतुर्भुजाकार, अष्टभुजाकार, वृत्ताकार आदि परम्परानुसार बनाये जाते हैं। प्रत्येक जनजाति की धार्मिक एवं लोक मान्यताओं के अनुरूप ही अरिपन के चित्रांकन की यह शैली एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती चली आ रही है। अरिपन का एक प्रमुख कार्य पूजास्थल पर दुष्ट प्रेतों द्वारा धार्मिक अनुष्ठान और कृत्य में आनेवाली बाधा को रोकना भी है।
 
अरिपन बनाने की यह परम्परा झारखंड में बसने वाली विभिन्न जनजातियों में भिन्न-भिन्न है। संथाल जाति में ‘बंधना’ सबसे बड़ा पर्व है, जिसे माघ माह में मकर संक्रांति के समय मनाया जाता है। इस अवसर पर संथाल जनजाति में पशुधन की पूजा के साथ ‘गोहाल’ देवता की भी पूजा की जाती है और खोंड के आस-पास गुपि कोड़ा की आकृति भी बनाई जाती है।उरांव जनजाति में भी प्रायः सभी पर्व-त्यौहार तथा शादी-विवाह के अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों को सफलतापूर्वक संपन्न करने के लिए वृत्ताकार अल्पना की रचना की जातीहै।

(चित्र 1 : संथाल जनजाति द्वारा सोहराय पर्व के अवसर पर गोहाल देवता तथा ‘गुपी कोड़ा’ की पूजा संपन्न करने हेतु बनाया गया मांगलिक अरिपन)



(चित्र 2 : उरांव जनजाति द्वारा पर्व त्यौहार आदि धार्मिक अनुष्ठानों और शादी विवाह के अवसर पर बनाया जाने वाला अरिपन)
 


अल्पना को उरांव जाति में ‘डंडा कट्टा पलकसना’ भी कहा जाता है। उरांव जनजाति में अल्पना लाल, काली मिट्टी और अरवा चावल के आटे से बनाया जाता है। खड़िया जनजाति में टोंगोए डिबरना के अवसर पर अरिपन की रचना लाल मिट्टी, कोयले तथा चावल के आटे से की जाती है। इस अरिपन रचना का मुख्य उद्देश्य पूर्वजों की मृतात्माओं को आमंत्रित कर उन्हें पूजा द्वारा संतुष्ट करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करना होता है। इसी प्रकार देवोत्थान पर्व अर्थात् बोन्दाई पर्व पर भी अरिपन की रचना कर पुजारी द्वारा धरती माता, कृषि की देवी तथा पूर्वज आदि की पूजा दीप जलाकर की जाती है।

(चित्र 1 : खड़िया जनजाति द्वारा ‘देवोलान पर्व’ के अवसर पर कृषि की देवी ‘बन्दोरानी’, धरती माता, पूर्वज, प्रेत आदि की पूजा हेतु बनाया गया अरिपन)

(चित्र 2 : बिरहोर आदिम जनजाति द्वारा विवाह मंडप में वर-वधु को प्रेत बाधा से बचाने के लिए अनुष्ठान में बनाया जाने वाला अरिपन)

 
झारखण्ड की आदिम जनजाति ‘बिरहोर’ में भी अरिपन का प्रचलन है। विवाह के पूर्व कन्या का चयन करने और छेका करने के विधान को ‘तकचड़ही’ कहते हैं। इस अवसर पर चौकोर आकार का अरिपन चावल के आटे से बनाया जाता है। इस अरिपन को प्रेत बाधा से वर-वधु को बचाने के लिए बनाया जाता है।चित्रकला की यह अरिपन शैली इसी प्रकार झारखण्ड की अनेक जनजातियों में मांगलिक एवं धार्मिक चित्रांकन के रूप में अपनी पहचान बनाये हुए है।
 
जनजातीय चित्रकला में अरिपन के समान अन्य मांगलिक प्रतीक चित्रों का भी प्रचलन रहा है, जिसमें एक ओर संथाल जनजाति द्वारा कृषिकार्य अथवा धान की बुआई तथा अगहन में धान की कटाई-बटाई के अवसर पर घर के आँगन में लक्ष्मी के घर से खेत में जाने और खेत से घर में पुनः वापस आने का प्रतीक मांगलिक हरण चिह्नों का चित्र अंकित किया जाता है। वहीं दूसरी ओर असुर जनजाति द्वारा ‘फगुआ पर्व’ के अवसर पर ‘लौह देव’ की पूजा हेतु ‘सड़सी’ और ‘नेहाई’ के चित्र भी मांगलिक प्रतीक के रूप में बनाये जाते हैं।

(चित्र 1 : संथाल जनजाति द्वारा धान की बुआई तथा अघन में धान की कटाई के अवसर पर लक्ष्मी के घर से खेत और पुनः खेत से घर वापस आने का मांगलिक प्रतीक )

(चित्र 2 : असुर जनजाति द्वारा ‘फगुवा पर्व’ के अवसर पर ‘लौह देव’ की पूजा हेतु बनाया जाने वाला ‘सड़सी’ और ‘नेहाई’ का मांगलिक चित्र)

 
‘बिरहोर’ आदिम जनजाति द्वारा बंदर के शिकार को सफल बनाने हेतु ‘हनुमानबीर’ देवता का मांगलिक चित्र भी इस जनजातीय चित्रांकन कला में उकेरा जाता है।

(चित्र : बिरहोर आदिम जनजाति द्वारा बनाया जाने वाला ‘हनुमानबीर’ देवता का मांगलिक चित्र)

 
v  गोदना चित्रकला शैली :

गोदना चित्रकला शारीरिक सौन्दर्य प्रदान करने की प्रथा के रूप में आदिकाल से ही विश्व के सभी जनजातीय प्रदेशों में प्रचलित रही है। देहसज्जा की यह परम्परा लोक संस्कृति और विशेषकर जनजातीय संस्कृति में सामाजिक मान्यता, धार्मिक लोक विश्वास से जुड़कर नारी जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग और अलंकार का प्रसाधन बन गया है, जिसके परिणामस्वरूप जनजातीय समुदाय में विवाह पूर्व किशोरी कन्याओं का गोदना गुदवाना प्रथा के रूप में अनिवार्य हो गया है।डॉ. राजेश सिंह ने ‘चौमासा’ पत्रिका में गोदना चित्रांकन शैली की उत्पत्ति के सन्दर्भ में लिखा है कि “गोदना के अंकन का प्रारंभ जादू एवं पराशक्तियों में विश्वास से शुरू हुआ होगा। गोदना अलंकरण में पाये जाने वाले अभिप्रायों में से अनेक अभिप्राय ‘टोटकों’ से संबंधित है, जिनको अंकित करने का उद्देश्य भी प्रतिकूल अभिचार के प्रतिरोध के रूप में किया जाता है।”13गोदना गुदवाने के सन्दर्भ में इस जनजातीय समाज में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं, जैसेकि “मृत्यु के उपरांत भौतिक जगत की सारी वस्तुएं-वस्त्र, आभूषण आदि इसी लोक में छूट जाते हैं, किन्तु गोदना आत्मा के साथ परलोक तक जाता है।”14 इन जनजातियों के अनुसार गोदना में निहित जादू या पराशक्ति पर विश्वास भी इस जगत में जीव पर आने वाले कष्टों से रक्षा करती है और साथ ही साथ अलंकरण के रूप में उनके सौन्दर्य में भी वृद्धि करती है। इसके अतिरिक्त गोदना की इस चित्रांकन शैली में “कामेच्छा की पूर्ति करने वाले, सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने वाले, जादुई प्रभाव रखने वाले, काया को रोगों से मुक्त रखने वाले और गहनों के अभाव में आभूषणों की मानसिक पूर्ति करने वाले प्रकृति और मनुष्य के ऐतिहासिक मिथकीय संबंधों को उजागर करने वाले और शारीरिक साज-सज्जा के अमिट चिह्न हैं।”15आदिम समाज में गोदना के सम्बन्ध में ऐसी ही अनेक मिथक, धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, जिनमें एक लोक विश्वास यह भी है कि शरीर पर गोदना के रूप में गोत्र का प्रतीक रहने पर उनके पूर्वज की मृतात्माएं संकट की घड़ी में उनकी रक्षा करती हैं और जो स्त्रियाँ अपनी कलाई, हाथों व बाहों पर अपने पति, भाई-बहन, परिवारजनों आदि का नाम गुदवाती हैं, उनकी मृत्यु के बाद उनसे स्वर्ग में मुलाकात होना संभव हो पाता है।
 
झारखण्ड में बसने वाली विभिन्न जनजातियों- उरांव, संथाल, मुंडा, हो आदि में गोदना गुदवाने की प्रथा प्रचलन में रही है। इन जनजातियों में किशोरी बालिकाएं विविध प्रकार की आकृति के चित्रात्मक गोदना अपने ललाट, कनपटी, छाती, हाथ, पैर आदि शरीर के विभिन्न अंगों पर गुदवाती हैं।
चित्र : गोदना करवाती आदिवासी स्त्री16


संथाल जनजाति की स्त्रियों में छाती, हाथ और पैरों पर गोदना गुदवाने की परम्परा अधिक प्रचलन में रही है। स्त्रियों के लिए इन आदिम जनजातियों में विवाह पूर्व गोदना को शरीर पर अंकित करवाना अनिवार्य माना जाता है। संथाल जाति की महिलाएं गले और छाती पर आभूषणों की अनुकृति गुदवाती हैं तथा हाथ-पैरों पर विभिन्न प्रकार के फूल-पत्ती, पशु-पक्षी, ज्यामितिक रेखाओं के साथ धार्मिक तथा गोत्र के प्रतीक भी गोदना के रूप में गुदवाती हैं। इनके अनुसार ऐसा करने पर कुल देवता प्रसन्न होकर उनकी रक्षा करते हैं और सुख-समृद्धि का रास्ता दिखलाते हैं।
 
पूर्व समय से वर्तमान समय में गोदना चित्रांकन की इस शैली में बहुत परिवर्तन देखने को मिलता है। पहले जहाँ शरीर के बड़े भाग पर गोदना गुदवाने का प्रचलन था वहीं अब शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ शहरीकरण के प्रभाव से गोदने के प्रचलन एवं लोकप्रियता में विशेष कमी आई है। वर्तमान में युवतियां ललाट, हाथ आदि अंगों पर सिर्फ प्रतीकात्मक रूप में छोटी आकृति का गोदना गुदवाती हैं। पूर्व में गैर जनजाति समुदाय की महिलाएं कोयले से बने काले रंग का प्रयोग कर सुई से गोदना गुदवाती थीं परन्तु अब बैटरी चालित मशीन से भी गोदना उकेरने का यह कार्य शहरी बाजारों के साथ ही गाँवों में भी किया जा रहा है।
 
समग्रत: देखा जा सकता है कि झारखण्ड की इस जनजातीय चित्रकला का स्वरूप वैविध्यपूर्ण है, जिसमें शैल चित्रांकन शैली, भित्ति चित्रांकन शैली, काष्ठ चित्रांकन शैली, पट्ट चित्रांकन शैली, अरिपन चित्रांकन शैली तथा गोदना चित्रांकन शैली जनजातीय समुदाय की कलात्मकता को ही सामने नहीं रखता, बल्कि साथ ही इन चित्रों में इनकी धार्मिक, सांस्कृतिक मतों, परम्परा और लोक विश्वासों का परिचय भी सहज ही मिल जाता है। परन्तु दुर्भाग्यवश इतनी समृद्ध व मूल्यवान जनजातीय चित्रांकन कला की सुरक्षा के लिए कोई विशेष व्यवस्थित कार्य नहीं हुआ है। झारखण्ड की यह जनजातीय चित्रांकन कला चित्रकला की अमूल्य धरोहर है। दामोदर नदी की घाटी में अवस्थित सती पहाड़ी के गुफा चित्र तथा बराकर नदी की घाटी में अवस्थित शैल चित्र एवं अन्य पुरातात्विक महत्त्व की सामग्रियां प्रत्येक क्षेत्रों में कोयले के खाद्यानों के खनन कार्य से खतरे में हैं। इस कला के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे विद्वानों ने अन्य जनजातीय कलाओं के साथ ही चित्रकला में भित्ति, प्रस्तर, गोदना और अरिपन चित्रकला आदि के संरक्षण एवं प्रबंधन की नई जमीन तैयार करने की आवश्यकता बताई है। उन्होंने स्पष्टतः अपने लेखों में अनेकों बार यह घोषणा की है, जनजातीय संस्कृति का आधार तत्व शहरीकरण और आधुनिकता के प्रभाव से अपनी पहचान खोता जा रहा है। समय के साथ इस संस्कृति पर अनेक सहवर्ती व्यवहारों का संक्रमण होता जा रहा है। इसलिए झारखण्ड की जनजातीय कलाओं और सांस्कृतिक परम्पराओं को इक्कीसवीं सदी की वैज्ञानिक और उत्तर आधुनिक उपलब्धियों से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि इन सांस्कृतिक परम्पराओं, धरोहरों, कलाओं को सुरक्षित करके इनकी प्रासंगिकता को सुनिश्चित किया जा सके।इसी दिशा में बुलू इमाम तथा गुस्ताम इमाम द्वारा हजारीबाग की विविध चित्रकलाएं, पुरातात्विक धरोहरों आदि की जानकारी प्राप्त करने के लिए वेबसाइट www.संस्कृति. कॉम को तैयार किया गया है। शिखा आनंद तथा आर के नीरद द्वारा जादोपटिया चित्रकला एवं इससे जुड़े चित्रकारों को संरक्षण प्रदान करने और विकसित करने हेतु सार्थक प्रयास किये गये हैं। अंजली कुमार सिंह द्वारा 1994 में दुमका जिले में आदिवासी चित्रकला अकादमी की स्थापना भी इसी दिशा में एक सार्थक कदम है। झारखण्ड में अनेकों चित्रकार व कलाकार झारखण्ड की जनजातीय कला एवं संस्कृति को संरक्षित करने तथा उसके प्रचार-प्रसार के लिए समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं, जिनमें ललित मोहनराय, विनोद रंजन, अमिताभ मुखर्जी, उज्ज्वल घोष, सुनील मोदी, हरेन ठाकुर आदि तथा चतुर्मासिक पत्रिका का प्रकाशन इस सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण योगदान है।
 
सन्दर्भ :
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  16. jharkhandculture.com
दीपाली 
पीएच. डी. शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय
ई-मेल deepfamily220293@gmail.com, मो. 8750786619
 
डॉ. मनोज कुमार 
परियोजना सहयोगी
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली
मो. 9728424929

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन सत्या सार्थ (पटना)

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