शोध आलेख :- कबीर के काव्य में आर्थिक चिंतन / दीपक कुमार भारती

कबीर के काव्य में आर्थिक चिंतन
दीपक कुमार भारती

शोध-सार : हिंदी साहित्य में भक्तिकाल का विशेष महत्त्व है और कबीर इस काल के प्रतिनिधि कवियों में से एक हैं। कबीर संतकाव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। हिंदी साहित्य में जिसे संतकाव्य के नाम से जाना जाता है, वह धारा अपने आप में एक समृद्ध, प्रासंगिक एवं अविच्छिन्न काव्य परंपरा है। यह काव्य मध्यकालीन संस्कृति की उपज है लेकिन इसकी जड़ें भारतीय चिंतन एवं साहित्य की धारा से गहरे रूप में जुड़ी हुई हैं। इस काव्यधारा ने तत्कालीन समय के आध्यात्मिक, सामाजिक और धार्मिक चिंतन को एक नई दृष्टि दी। कबीर की वाणी में तत्कालीन मानवीय संवेदना बड़ी ही व्यापकता और समग्रता से ध्वनित हुई है। कबीर का उद्देश्य राजा-महाराजाओं की लड़ाइयों का ब्यौरा या उनके मिथ्या गुणगान को प्रस्तुत करना नहीं था। किंतु वे अपनी  वाणी में समसामयिक सांस्कृतिक जीवन को सशक्त रूप में अभिव्यक्त करते हैं। वे एक जागरूक रचनाकार की तरह अपने सम्पूर्ण अनुभवों को अपने काव्य में वर्णित करते हैं। कबीर का संबंध वर्ग में निम्न वर्ग से तो जाति में भी निम्न जाति से ही था। इसलिए इनके काव्य में जहां एक ओर जाति व्यवस्था, धार्मिक व्यवस्था, बाह्यडंबर का विरोध देखने को मिलता है तो दूसरी ओर समाज सुधार की भावना, भक्ति भाव देखने को मिलता है। साथ ही इनके काव्य में तत्कालीन समय में देश की दयनीय आर्थिक स्थिति का वर्णन भी बहुत ही मानवीय संवेदना के साथ देखने को मिलता है। इस शोध आलेख में हम कबीर की आर्थिक दृष्टि पर विचार करेंगे। 

बीज शब्द : भक्ति आंदोलन, भक्ति काव्य, संत काव्य,कबीर, उत्पादन, उपभोग, निवेश,आर्थिक क्रिया, आर्थिक दृष्टि, लोक, अर्थशास्त्र। 

मूल आलेख : भक्ति आंदोलन का भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व है। यह एक ऐसा आंदोलन था जो अपनी पूर्व परंपराओं से प्रेरणा ग्रहण करते हुए, जरूरत के मुताबिक उसमें सुधार करते हुए और तत्कालीन समय की जड़ताओं को तोड़ते हुए आगे बढ़ता है। हिंदी साहित्य में जिसे भक्तिकाव्य के नाम से जाना जाता है, वह अपने आप में एक समृद्ध, प्रासंगिक एवं अविच्छिन्न काव्य परंपरा है। यह काव्य मध्यकालीन संस्कृति की उपज है लेकिन इसकी जड़ें भारतीय चिंतन एवं साहित्य की धारा से गहरी रूप में जुड़ी हुई हैं। इस काव्य धारा ने तत्कालीन समय तक के सभी प्रकार के आध्यात्मिक, सामाजिक और धार्मिक चिंतन को अपने विचारों में समेट लिया। इसी की एक धारा संत काव्य में जहाँ एक ओर उपनिषद, शंकराचार्य का अद्वैतवाद, गीता, बौद्ध साहित्य और नाथ साहित्य के उपयोगी तथ्यों को अपने विचारों  में समाहित किया और अनुपयोगी तथ्यों का खंडन किया तो दूसरी ओर भविष्य के लिये उपयोगी मार्ग भी प्रशस्त करने का प्रयास किया। कबीर इस धारा के प्रतिनिधि कवि हैं। 

    कबीर का जो समय है, वह मुख्य रूप से 15वीं से 16वीं शताब्दीके पूर्वार्द्ध तक का है जो इतिहास में राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। इनका समय राजनीतिक दृष्टि से लोदियों (1451 ई. से 1526 ई.) का शासन काल है। मध्यकाल के पूर्वार्द्ध में हिंदुओं तथा मुसलमानों का संघर्ष तीव्र था। तुर्कों के शक्तिशाली आक्रमण के फलस्वरूप भारत में मुस्लिम राज की स्थापना हो गई थी लेकिन ये भक्तिकालीन कवि किसी राजा या नवाब के लिए कविता लिखने को तैयार न थे। क्योंकि इनका राजा तो कोई और ही था, वह था- निर्गुण-निराकार परमेश्वर। कबीर की वाणी में तत्कालीन मानवीय संवेदना बड़ी ही व्यापकता और समग्रता से ध्वनित हुई है। कबीर का  उद्देश्य राजा-महाराजाओं की लड़ाइयों का ब्यौरा या उनके मिथ्या गुणगान को प्रस्तुत करना नहीं था। किंतु वे अपनी वाणी में समसामयिक सांस्कृतिक जीवन को सशक्त रूप में अभिव्यक्त करते हैं। वे एक जागरूक रचनाकार की तरह अपने निजी अनुभवों को अपने काव्य में वर्णित करते हैं जिनके वे स्वयं साक्षी हैं। 

    मध्यकाल में सामान्य जनता की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। इसका मुख्य कारण था सत्ता पक्ष का विलासी और संवेदनहीन हो जाना। जिनका ध्येय आर्थिक विकास से ज्यादा धार्मिक विकास पर था।समाज में तीन वर्ग बन गए थे- शासक वर्ग, मध्यवर्ग,तथा निम्न वर्ग। शासक वर्ग में बादशाह और अमीर आते थे, मध्यवर्ग में व्यापारी वर्ग और निम्न वर्ग में मुख्यतः कारीगर, दुकानदार, छोटे व्यापारी, किसान और मजदूरों कीगणना की जाती थी। इस निम्न वर्ग की दशा के बारे में पैलसर्ट ने लिखा है कि-“उनके मकान मिट्टी के बने हुए, छप्पर के छतों के हैं। मिट्टी के घड़ों,पकाने के बर्तनों और दो चारपाइयों के अतिरिक्त उनके घरों में साज - सज्जा की सामग्री बहुत कम है या बिल्कुल नहीं है। उनके बिछौने बहुत कम हैं केवल एक या दो, संभवतः दो चादरें जिनमें एक बिछाने और दूसरा ओढ़ने के काम आता है। ग्रीष्म ऋतु के लिए ये काफी है किंतु कड़ाके के जाड़ों की रातें वस्तुतः दयनीय होती हैं।”[1] तत्कालीन समय में स्थिती इतनी खराब थी कि आदमी की  भी खरीद-बिक्री होता थी। धनवान लोग दास और दासियाँ खरीद और रख सकते थे।  पशुओं की तरह खरीदा और बेचा जाता था। मालिक की सेवा इनका मुख्य कार्य था।
 
    अधिकांशतः संत कवि निम्न जाति से थे और यह वही जातियां हैं जो उस समय के उत्पादन की प्रक्रिया में संलग्न थीं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी उत्पादन की प्रक्रिया में लगे लोगों को लोक की संज्ञा देते हैं।लोकको गाँव और नगर की अशिक्षित,सामान्य एवं सरल व्यवहार वाले श्रमिक वर्ग के साथ जोड़ते हुए कहते है कि -“लोक शब्द का अर्थ जन-पदया ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों एवं गांवों में फैली हुई समूची जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है। ये लोग नगर में परिष्कृत, रुचि सम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची     विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तु आवश्यक होती है उनको उत्पन्न करते हैं।”[2] आर्थिक क्रिया वह क्रिया है जिसके माध्यम से उत्पादन,उपभोग और निवेश का कार्य किया जाता है। ये निम्न वर्ग के लोग उत्पादन तो करते थे लेकिन उपभोग और निवेश कम ही कर पाते थे। कबीर स्वयं जुलाहा जाति से थे जो कपड़े कीकताई और बुनाई का कार्य करते थे। कपड़े का उद्योग तत्कालीन समय के व्यापार में मुख्य भूमिका अदा करता था। आज भी कपड़ा उद्योगकी अर्थव्यवस्था में बहुत ही अहम भूमिका है।तो स्वाभाविक सी बात है कि कबीर की वाणी में आर्थिक क्रिया का वर्णन मिलेगा। कबीर भले ही इसका वर्णन प्रत्यक्ष रूप से नहीं करते लेकिन रूपक के माध्यम से अप्रत्यक्ष रुप से इसका वर्णन करते हैं।
 
    कबीर अपने युग की आर्थिक व्यवस्था का निरूपण बहुत ही गंभीर रूप में करते हैं। साधारण व्यापारी वर्ग व्यापार के लिए धनिकों से ऋण लेता था। ब्याज की दर बहुत ऊंची होती थी। कोई एक व्यक्ति जमानतदारभी होता था।आज के समय में भी गारेंटर की आवश्यकता होती है, साहूकारों, महाजनों और बैंको से कर्ज लेते समय। हाँ आधारकार्ड के हो जाने से इसकी प्रक्रिया कुछ आसानहो गई है।ऋण का भुगतान समय से या नहीं होने पर कैद की सजा भी हो जाती थी। आज के समय में भी जुर्माना लगाया जाता है या वस्तु को जप्त कर लिया जाता है। वर्तमान में अमीर तो बैंकों से कर्ज लेकर विदेश भाग जाते हैं और गरीब पैसे नहीं होने के कारण महंगे दर पर साहूकारों या एप आधारित ऑनलाइन ऋण ले कर इनके दुश्चक्रों में फंस जाता है। इसके कई कारण है जैसे- सरकारी बैंकोके द्वारा गरीब लोगों को असानी से कर्ज नहीं मिल पाना या आम लोगों को जानकारी का अभाव भी होता है। कबीर तत्कालीन समय की इस व्यवस्था के बारे में इस प्रकार वर्णन करते हैं-

मन रे कागज कोर पराया, कहा भयौ व्यौपार तुम्हारै, कलतर बढे सवाया।
बड़ए बोहरै साँठी दीन्हौ कलतर काढ्यौ खोटैं ॥
चार लाख अरु असी ठीक दे, जनम लिष्यो सब चोटै ॥
अबकी बेर न कागद किरयौ, तौ धर्म राई सूँ तूटै ॥
पूँजी बितड़ि बंदि ले दैहै, तब कहै कौन के छूटै ॥
गुरुदेव ज्ञानी भयौ लगनियाँ, सुमिरन दीन्हौ हीरा ॥
बड़ी निसरना नाव राम कौ , चढ़ि गयौ कीर कबीरा ॥[3]
 
    कबीर ने किसानों की दुर्दशा को बहुत ही नजदीक से अनुभव किया था। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वे निर्धारित कर जमा करने में असमर्थ थे।लगान वसूलने वाले लोगों का व्यवहार बहुत ही क्रूर होता था। कई बार तो छोटे- छोटे किसान इनके अत्याचार से घर छोड़कर भी भाग जाते थे।तत्कालीन समय का वर्णन करते हुए श्यामसुंदर दास लिखते हैं कि “खेतों में खून पसीना एक करने वालों की कमाई का आधे से अधिक अंश भूमिकर के रूप में राजकोष में जाने लगा। प्रजा दाने-दाने को तरसने लगी। सोने चाँदी की तो बात ही क्या हिंदुओं के घरों में तांबे पीतल की  थाली, लोटों तक का रहना सुलतान को खटकने लगा।”[4] कबीर कहते हैं -

अब न बसूं इहि गाँइ गुसाईं, तेरे नेवगी खरे सयांने हो राम ॥
नगर एक तहाँ जीव धरम हता, बसै जु पंच किसाँनाँ।
नैनूँ नकटू श्रवनूँ ,रसनूँ, इन्द्री कह्या न मानै हो राँम ॥
गाँइ कुठाकुर खेत कु नेपै, काइथ खरच न पारै।
जोरि जेवरी खेति पसारै,सब मिलि मोकौ मारै,हो राम ॥
खोटी महतौ बिकट बलाही, सिर कसदम का पारै।
बुरा दिवांन दादि नहिं लागै, इक बांधे इक मारै हो राम ॥[5]
 
    किसान,खेती की सिंचाई के लिए मौसम पर ही आश्रित था और कुछ कुएं से काम चल जाता था। वर्षा समय पर हो गई तो फसल अच्छी हो जाती थी। वर्षा के समय पर न होने से किसान की दिक्कत बढ़ जाती थी, क्योंकि कर (लगान) उसको कैसे भी देना ही होता था। कबीर के काव्य में निम्न वर्ग के आवास, घरेलू स्थिति, उनके पात्र (बर्तन) आदि का चित्रण भी मिलता है। वे बताते हैं कि किस प्रकार उनका घर मिट्टी के दीवारों के होते थे,  छप्पर के छत होते थे जो आंधी- तूफान का सामना नहीं कर पाते थे। कैसे इन्हें भींग-भींग कर समय गुजरना होता था।
कबीर कहते हैं -

संतौ भाई आई ग्यान की आंधी रे।
भ्रम की टाटी सबै उड़ाणी, माया रहै न बाँधी ॥
हितचित की द्वै थूनि गिरांनी, मोह बलिंडा तूटा।
त्रिस्नाँ छाँनि परि घर ऊपरि, कुबधि का भांडा फूटा ॥
जोग जुगति करि संतौ बांधी, निरचू चुवै न पाँणी।
कूड़ कपट काया का निकस्या हरि की गति जब जाँणी ॥
आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
कहै कबीर माँन के प्रगटे उदित भया तम षीनाँ ॥[6]
 
ये बात सही है कि कबीर यहाँ ज्ञान रूपी आंधी और भ्रम रूपी टाटी की बात कर रहे हैं लेकिन इसके वर्णन के लिए उन्होंने प्रतीक के रूप में गरीब के घर और उसमें प्रयोग किए गए समान को लेते हैं जिससे उनके दयनीय स्थिति की जानकारी मिलती है। इसी तरह एक दूसरा पद है-

इब न रहूँ माटी के घर मैं,
इब मैं जाइ रहूँ मिलि हरि मैं ॥
छिनहर घर अरु झिरहर टाटी, धन गरजत कंपै मेरी छाती ॥
दसवै द्वारि लागि गई तारी, दूरि गवन आवन भयौ भारी ॥
चहुं दिसि बैठे चारि पहरिया, जागत मुसि गये मोर नगरिया ॥
कहै कबीर सुनहु ले लोई, भाँनड़ घड़ण संवारण सोई ॥[7]
 
कबीर अपने काव्य के लिए प्रेरणा लोक से ग्रहण करते हैं।लोक समाज के वे लोग हैं जो उत्पादन प्रकिया में मुख्य भूमिका अदा करते हैं। कबीर अपनी वाणी में इन विशिष्ट जातियों के उद्योग धंधों का वर्णन करते हैं

अवध राम सबै करम करिहूँ ,
सहज समाधि न जम थैं डरिहूँ ॥ टेक ॥
कुंभरा हैं करि बासन धरिहूँ,धोबी है माल धोऊँ ॥
चमरा है करि बासन रंगों, अघौरी जाति पांति कुल खोऊ ॥
तेली है तन कोल्हुं करिहौ,पाप पुंनि दोऊ पेरूं ॥
पंच बैल जब सूध चलाऊँ, राम जेवरिया जोरूं ॥
क्षत्री है करि खड़का संभालूँ ,जोग जुगति दोउ सांधू ॥
नउआ है करि मन कूं मुंडूँ ,बाढ़ी है कर्म बाढ़ूँ ॥
अवधू ह्वै  करि यह तन धूतौ , बधिक ह्वै मन मारूं ॥
बनिजारा  ह्वै तन कूं बनिजूं, जुवारी ह्वै जम जारूं ॥
तन करि नवका मन करि खेवट ,रसना करऊं बाड़ारूँ ॥
कहि कबीर भवसागर तरिहूँ आप तिरु बष तारूँ ॥[8]
 
    इस पद में कबीर ने कुम्हार, धोबी, चमार, तेली, क्षत्री, नाई, बढ़ई, अवधूत, व्याघा, बंजारा, केवट आदि जातियों का वर्णन उनके उद्योग धंधों के साथ किया है। तत्कालीन समाज और वर्तमान समाज में भी इन जातियों के उद्योग धंधे वैसे के वैसे ही हैं। शहरीकरण के वजह से अब कुछ लोग अपने जातिगत धंधों से हटकर अन्य कार्यों में लगे हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि कबीर के काव्य में अनेक ऐसी पंक्तियां मिलती हैं जो विशिष्ट जातियों के उद्योग धंधों से संबंधित है। कबीर निम्न जाति से थे लेकिन उन्होंने उच्चता और नीचता को कभी व्यवसाय के साथ नहीं जोड़ा। क्योंकि उनका मानना है कि कोई भी व्यवसाय नीच नहीं होता। उन्होंने कभी भी अपने को जुलाहा कहने में संकोच नहीं किया। कबीर परिश्रम को महत्त्व देते हैं और अपने आजीविका के लिए अपने हाथों पर भरोसा रखते हैं।
 
    ऐसा नहीं है कि कबीर सिर्फ अपने ही वर्ग से सबंधित ही आर्थिक स्थिति को दिखाते हैं बल्कि उस समय की  उच्च वर्ग के स्थिति को भी दिखाते हैं। जनता से उगाहे गए कर से उच्च वर्ग किस प्रकार विलासिता का जीवन जीता है इसका भी वर्णन कबीर करते हैं। वर्तमान समय में भी इस स्थिति को देख जा सकता है। चुनाव जीतने के बाद नेता लोगोंका ध्यान अपने संबंधियों और मित्रों को ही आगे बढ़ाने पर रहता है।
तत्कालीन समय में गरीबी इतनी ज्यादा थी कि गरीब लोगों को अच्छा भोजन भी नहीं मिल पाता था।उनकी दशा इतनी दयनीय थी कि कभी कुछ अच्छा खाने का मन करे तो भगवान की मनौती के बहाने हलुआ, पूड़ी या अच्छे भोजन की व्यवस्था करते थे। लेकिन गरीब लोगों को अधिकांश खिचड़ी ही खाकर काम चलना पड़ता था। कबीर कहते हैं-

कबीर खूब खांड है खीचड़ी, मांहि पडै टुक लूंण।
हेड़ा रोटी खाइ करि, गला कटावै कौंण ॥[9]
 
तत्कालीन समय में उच्च वर्ग का कामिनी और कंचन से बड़ा लगाव था। जिनके पास जितना ज्यादा धन था वे और भी धन संचय करते जाते थे। आज के समय में भी बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ है। इस संबंध में कबीर कहते हैं –

धन संचते राजा मूये, अरु ले कंचन भारी।[10]
 
    अर्थशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि धन का संचय व्यक्तिगत स्तर पर तो अच्छा है लेकिन इसका समष्टि स्तर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। धन संग्रह का परिणाम यह हुआ कि मुद्रा का प्रवाह बाधित हो गया। लेकिन कबीर अपने आजीविका भर से मतलब रखते थे। धन संपत्ति जोड़ना वे उचित नहीं समझते थे। थोड़े में ही संतोष रखने का उन्होंने उपदेश दिया। कबीर अपरिग्रह की बात करते हैं, उनका मानना है कि मनुष्य को उतना ही एकत्रित करना चाहिए, जिससे उसका कार्य सम्पन्न हो जाए, अधिक से कोई लाभ नहीं है। गांधी जी के यहाँ भी इस सिद्धान्त को देखा जा सकता है। जहां गांधी जी अपरिग्रह की बात करते हैं। कबीर कहते है –

काहे कू छाऊँ उंच ऊंचेरा ,साढ़े तीनि हाथ घर मेरा ॥
कहै कबीर नर गरब न कीजै,जेता तन तेती भुंई लीजै ॥[11]
 
कबीर कहते हैं –

साँई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥
 
कबीर उन लोगों को चेतावनी भी देते हैं जो जरूरत से अधिक धन का संचय करते हैं। वे कहते हैं –

काहे कूँ भीत बनाऊँ टाटी, का जानूँ  कहाँ परिहै माटी।
काहे कूँ मंदिर महल चिनाऊँ, मूवाँ पीछै घड़ी एक रहन न पाऊँ ॥[12]
 
समाज में पहले से भुखमरी थी ही अमीरों द्वारा धन संचय ने आर्थिक स्थिति को और ही दयनीय बना दिया। भूख से मुक्ति का उपाय नहीं दिख रहा था। लोगों को भगवान का ही भरोसा रह गया था।कबीर लिखते हैं-

कबीर भूखा क्या करै, कहा सुनावै लोग।
भांडा घड़ि जिनि मुख दिया,  सोई पूरण जोग।।[13]
 
इस दयनीय स्थिति को तुलसी भी अपने यहाँ व्यक्त करते है –

खेती न किसानको, भिखारीको न भीख, बलि,
बनिकको न बनिज, न चाकरको चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों, कहाँ जाई, का करि ?’[14]


प्रायः ऐसा देखा गया है कि गरीबी कई प्रकार के समस्याओं को जन्म देती है जैसे-पैसे नहीं होने पर लोगों का स्वास्थ्य और शिक्षा बेहतर नहीं हो पाती,समाज में असमानता बढ़ती है,लोगगलत काम भी करने लग जाते हैं। कबीर चोरों से भय का वर्णन इस प्रकार करते है –

जागि रे जीव जागि रे।
चोरन को डर बहुत कहत है, उठि उठि पहरै लागि रे ॥[15]
इसी प्रकार एक और पद देखते हैं –
पंच चोर गढ मंझा, गढ लूटे दिवस और संझा।
जो गढपति मुहकम होई, तौ लूटि न सकै कोई ॥[16]
 
कबीर इन पदों जागने की जो बात कर रहे हैं, वह प्रत्यक्ष रूप से अज्ञानता से जागने का है और चोरों का संबंध लोभ, मोह,स्वार्थपरकता,विषय वासनाओं से है। लेकिन इसका दूसरा संबंध तत्कालीन समय के दयनीय स्थिति से भी है।
 
निष्कर्ष : इस प्रकार हम देखते हैं कि कबीर की दृष्टि तत्कालीन समय के सामाजिक तथा अन्य समस्याओं के साथ–साथ आर्थिक व्यवस्था पर भी थी। कबीर जहां एक ओर जाति व्यवस्था, धार्मिक कट्टरता, बाह्याडंबरों, अंधविश्वासों का विरोध करते हैं तो दूसरी ओर उनकी पैनी नजर आर्थिक व्यवस्था पर भी थी। उनके काव्य में गरीब और निम्न जातियों की दयनीय आर्थिक स्थिति के साथ-साथ इनके जातिगत उद्योग धंधों का भी वर्णन है तो तत्कालीन समय में उच्च वर्ग की आर्थिक स्थिति और इनके विलासिता का भी वर्णन हैं। जरूरत है कि कबीर का अध्ययन उनके आर्थिक दृष्टि को भी ध्यान में रखकर किया जाए।
 
सन्दर्भ:
[1]शर्मा,रामकिशोर. कबीर ग्रंथावली-सटीक (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 14   
[2] उपाध्याय,कृष्णदेव.लोक साहित्य की भूमिका (2019). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 11
[3]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 142        
[4]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 11        
[5]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 169         
[6]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 121
[7] वही पृ -183
[8]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰212
[9][9] शर्मा,रामकिशोर. कबीर ग्रंथावली-सटीक (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 19      
[10]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 194
[11]शर्मा,रामकिशोर. कबीर ग्रंथावली-सटीक (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 524
[12]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 35
[13]शर्मा,रामकिशोर. कबीर ग्रंथावली-सटीक (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰19
[14] तुलसीदास. कवितावाली (2017). गोरखपुर ,गीताप्रेस पृ॰ 116    
[15]दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 203
[16]  दास,श्यामसुंदर. कबीर ग्रंथावली (2018). इलाहाबाद ,लोकभारती प्रकाशन : पृ॰ 28
 
दीपक कुमार भारती
शोधार्थी
हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालयवर्धामहाराष्ट्र

 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन : सत्या कुमारी (पटना)

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