कविताएँ :- शीलू अनुरागी

कविताएँ
-शीलू अनुरागी


1.बचा बुढ़ापा गाँव में।

समय के बैरी अफसर का, पड़ गया छापा गाँव में।
शहर चली गई भरी जवानी, बचा बुढ़ापा गाँव में।

आधुनिक नाखून से खुरचे, हुए घाव नासूर हुए।
कैसे गाँव के बाल-बरेदी, पढ़े-लिखे मजदूर हुए।
इन गंजे खेतों में भला, पुरवा कंघी कैसे कर दे।
दूब अकेली इन खेतों में, हरियाली कैसे भर दे।

ये ग्रीष्म-ताप पैमाने पर, कुछ डिग्री टापा गाँव में।
शहर चली गई भरी जवानी, बचा बुढ़ापा गाँव में।

अपने बूढ़े दादा-दादी की, आँखों का पानी ले ले।
कौन भला उस बखरी में, अब घोर-घोर रानी खेले।
नहीं रही नन्ही उँगली, जो उनकी लाठी बन जाती।
खोद-खोद मिट्टी को खाती, हुई उसी में सन जाती।

मैय्या-बाबू जी लुप्त हुए, जब आया पापा गाँव में।
शहर चली गई भरी जवानी, बचा बुढ़ापा गाँव में।

हैं गुस्से से सब बेर लाल, एकाकी इमली के बूटे।
लावारिस फिरती हैं सब गैयाँ, सूने हैं उनके खूँटे।
जामुन पर कालिक छाई, आम विरह से पीले हैं।
बेइज्जत सी पड़ी खजुरियाँ, भले बदन गदरीले हैं।

हर सुप्त ज़ुबाँ ने सूनेपन का, राग अलापा गाँव में।
शहर चली गई भरी जवानी, बचा बुढ़ापा गाँव में।

कटिया मशीन के ऊपर भी, मंडराता है अब खतरा।
अरसे बीते जबकि किसी ने, इसमें था चारा कतरा।
यहाँ कौन है जिसको अब, इस बैलगाड़ी से काम है।
समय का पहिया दौड़े है, इसका हर चक्का जाम है।

सर्वनाश होने के डर से अब, भय भी काँपा गाँव में।
शहर चली गई भरी जवानी, बचा बुढ़ापा गाँव में।

वो युवक जो कि विवाह की, रस्में-कसमें तोड़ गए।
अपनी जीवन संगिनी को, यहाँ अकेला छोड़ गए।
किसी पेड़ के शाखों जैसे, हवा के संग में झूल गए।
उड़े शहर की आँधी संग, अपनी जड़ों को भूल गए।

बिरही दुलहिन की आँखों ने, खोया आपा गाँव में।
शहर चली गई भरी जवानी, बचा बुढ़ापा गाँव में।

कौन सुधारे मिट्टी के घर, और उनके ये छप्पर टूटे।
कोने में खड़े मूसर को लेकर, काँड़ी में लाटा कूटे।
कौन भला ये गोबर पाथे, भठिया कौन लगा जाए।
ठाठे में खोंसी मथानी लेकर, मटके में माठा भाँए।

लिखा वही जो देख स्थिति, हृदय ने भाँपा गाँव में।
शहर चली गई भरी जवानी, बचा बुढ़ापा गाँव में। 



2. तू वही सरल-सी लड़की है।

तेरा परिचय कोई कैसे दे?
पर कुछ अस्तित्व तो तेरा है।
माना तू चाँद नहीं पर,
बादल ने तो आ घेरा है।
औरों पर आश्रित दिखती है,
लेकिन तू कोई बेल नहीं।
तेरी तरह समर्पित होना,.
गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं।
कुछ संबंधों की डोरों से,
जो खुद ही खुद में उलझ गई।
तू वही सरल सी लड़की है।

ज्यों आग किसी अंगारे की,
पानी को भाप बनाती है।
देकर कराह फिर पानी को,
खुद भी ठंडी हो जाती है।
अपने खारे लोचन जल से,
सुंदर मुख को धो लेती है।
सदा ही हँसकर मिलती,
इतना ज़्यादा रो लेती है।
जो सम-विषम परिस्थिति में,
अनायास ढल जाती है।
तू वही तरल सी लड़की है।
तू वही सरल सी लड़की है।

कभी सिमट कर कोने में,
स्वयं को गढ़ती रहती है।
राह स्वयं की खोज-खोज,
बस आगे बढ़ती रहती है।
जो तेरी नम्रता के कारण,
तेरे संग ग़लत कर जाएगा।
तेरी क्षमा के बोझ से वो,
एक दिन तो मर जाएगा।
जिसे पान करने के लिए,
जप-तप चाहिए भोले सा।
तू वही गरल सी लड़की है।
तू वही सरल सी लड़की है।

कविता में जिससे लय बँधती,
ऐसी युक्ति हो जाती है।
तेरा छोटा सा दु:ख लिखता हूँ,
अतिशय उक्ति हो जाती है।
जब तेरा हौसला जागा तो,
सब जागने वाले सुप्त हुए।
तुल्य नहीं कुछ बचा यहाँ,
उपमान धरा से लुप्त हुए।
जो स्वयं ओषधि बनती है,
खुद कटकर भवन बनाती है।
तू वही परल सी लड़की है।
तू वही सरल सी लड़की है।

अपनों से मिली वेदना को,
चुप होकर सहती रहती है।
लेकिन विरोध की अग्नि भी,
अंतर् में जलती रहती है।
निज अपमान को सहकर भी,
सम्मान न जिसने हारा है।
और हौसले से दु:ख-दानव,
पटक-पटक कर मारा है।
पत्थर सी कठिन बलाएँ जिसमें,
कुटकर छोटी हो जाती हैं।
तू वही खरल सी लड़की है।
तू वही सरल सी लड़की है।


3. मत पूछो

न तो हम चाहते कि हीरों का व्यापारी हो
न ही हम चाहते कि जॉब सरकारी हो
बस एक ऐसा लड़का जो कि आत्मनिर्भर हो
कच्चा-पक्का जैसा भी छोटा-सा एक घर हो
मन में महिला के लिए मान सत्कार हो
पढ़ा-लिखा कम हो पर सोच तो उदार हो

औसत लड़का हो, न अंग्रेज़ हमको चाहिए
फिर जाने क्यों इतना दहेज उनको चाहिए

लड़की लंबी-चौड़ी हो, खुद हल्का है रुमाल सा
साढ़े पाँच की लड़की माँगे, लड़का राजपाल सा
लड़की उनको चाहिए, सैफ की करीना सी
लुक कृति जैसा, उस पर चाल कैटरीना सी
लड़के की उमर हो, अट्ठाईस या फिर तीस की
पर उनको न चलेगी, कोई लड़की छब्बीस की

अठारह-उन्नीस से ज़्दाया, न ऐज उनको चाहिए।
मत पूछो कितना दहेज उनको चाहिए।

कहते, रखेंगे तुम्हारी बेटी को फुल ऐश में
माँगते ही क्या हैं, बस पंद्रह लाख कैश में
महँगाई के दिन और महँगाई की ही रात है
दो लाख का तिलक करना कौन बड़ी बात है?
कलेवा में रूठे लड़के को ब्रांड वाली घड़ी हो
डोली घर ले जाने को एक चार पहिया खड़ी हो

साथ ही खाने में, नॉन वेज उनको चाहिए
मत पूछो कितना दहेज उनको चाहिए

वैसे तो हमको बेटी तो, दो जोड़े में स्वीकार है
बस पूरे करने हैं तो वो, जो रीति-संस्कार हैं
माँग करते हैं वो हमसे, छोटी-छोटी एक-एक
परिवार वालों के लिए, सोने का नग एक-एक
बिछिया-बिछुआ तो दोनों, चाँदी के चल जाएँगे
पर हार-अँगूठी से सब गहने, सोने के ही आएँगे

किस्मत बदलने वाला फेज़ उनको चाहिए
मत पूछो कितना दहेज उनको चाहिए

घरेलू चीजें देने में क्या, घर वालों का ही नाम है
टी.वी.ए.सी.-फ्रीजर देना, उसमें तो फिर आम है
आटा-चावल-दाल पठौनी ये तो सब कर देते हैं
अपनी बेटी को, उसमें, कुछ खुशियाँ भर देते हैं
घर समाज के आगे बहू, तब इज्जत दे पाएगी
जब दहेज में अपने संग, खास कछू ले आएगी

तो आठ सिटर, खाने वाला मेज उनको चाहिए।
मत पूछो कितना दहेज उनको चाहिए।


4. छ: अंकों की आय।

दो अक्षर का नाम हो मेरा, छ: अंकों की आय।
सोचूँ मैंने सब पाया है, गर तू मुझको अपनाय।

छोड़ धरा के तोहफे औ, अम्बर के चंद सितारे।
फलक रखूँ कदमों पर जो, तेरे हृदय को भाय।

इस कलयुग में रिश्ते का, सर्वोत्तम दृष्टांत रखें।
मैं सीतापति हो जाऊँ, तू रामतिया हो जाय।

मेरे सीने को कर तकिया, तू सोये सारी रात।
करे मेरे दिन का शुभारंभ, तेरे हाथों की चाय।

मैं तेरी तारीफों के, लंकानगरी तक पुल बाँधूँ।
सुने प्रशंसा कानों में तेरे, मिश्री सी घुल जाय।

भाग-दौड़ के जीवन में जितना भी व्यस्त रहूँ।
मुझमें तेरा ख्याल मेरी, साँसों सा आए-जाए।

पायल पहने आँगन में, तू जब भी टहल करे।
केशकंबली की वीणा के सुर में नुपुर बजाए।

यूँ तो सुख के मौसम में हरित रहे तेरा मुखड़ा।
दु:ख की गर्मी पड़ने पर, गुलमोहर सा मुस्काय।

नाम तेरा ही लेकर मैं, जीवन के कौल करूँ।
और समय आने पर तू, मेरी ही कसमें खाय।

यशोधरा तू बने अगर, मैं भी बुद्ध सा हो जाऊँ।
साँची नहीं तो शीलू, विदिशा में जमीं पा जाय।


5. तुम मेरी अकथ कहानी में

तुम मेरी कलम की स्याही में, शब्दों की खींचा-तानी में।
जाने किस हद तक शामिल हो, तुम मेरी अकथ कहानी में।

अपने जीवन समय का व्यय, मुझ पर करने वाली तुम हो।
मेरे इस थके ओ खाली मन में, साहस भरने वाली तुम हो।
हर दुर्-विचार को त्याग-त्याग खुद, अपने को अपनाने में।
क्या कहूँ तुम्हारा योग है कितना, मुझको सफल बनाने में।
मेरी खुशियों की रग-रग में तुम, आँखों के खारे पानी में।
जाने किस हद तक शामिल हो, तुम मेरी अकथ कहानी में।

कभी कदम बढ़ाती दिखती तुम, मेरे हाथों के पगडंडी में।
कभी भाव दिखाती दिखती तुम, मेरे सपनों की मंडी में।
अक्षर गिनती रात-रात भर, जगराते करती दो आँखों में।
ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाले, मुक्त विचार की पाखों में।
मेरी भावी पत्नी के रूप-रंग औ, मेरी आराध्य भवानी में।
जाने किस हद तक शामिल हो, तुम मेरी अकथ कहानी में।

मुझमें तुम हो, मेरी कविता में, मेरे ग़ज़लों और गीतों में।
ये भली-भांति तुम जानो हो कि, तुम मेरे उत्तम मीतों में।
तुम हो कविता की तुकबंदी, तुम ही कविता के छंदों में।
तुम हो अज़ान की पाक ध्वनि, तुम हो बन्धों-उपबंधों में।
मेरी सुबह-शाम की आरत में तुम, गुरुद्वारे की गुरबाणी में।
जाने किस हद तक शामिल हो, तुम मेरी अकथ कहानी में।

है दुआ यही सौ साल जियो ओ, बची रहो सब रोगों से।
अपने जीवन भर घिरी रहो, अपने शुभचिंतक लोगों से।
दो आखर छोटा नाम मिले, कृष्ण नहीं, तुम्हें राम मिले।
विरह मिले नहीं सीता सा, लव-कुश सा हर पुष्प खिले।
यूँ भावी जीवन भी महक उठे, तुम सनी रहो गुड़धानी में।
जाने किस हद तक शामिल हो, तुम मेरी अकथ कहानी में।


शीलू अनुरागी, शोधार्थी(हिंदी)
 दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।
sheeluanuragi0044@gmail.com, 8802320729
 
 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन सत्या सार्थ (पटना)

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