शोध आलेख :- रघुवीर सहाय की भाषा-शैली / डॉ. सत्यवन्त यादव

रघुवीर सहाय की भाषा-शैली
डॉ. सत्यवन्त यादव

शोध सार : भाषा एक प्रकार से समाज की एक संपत्ति है। समाज में मनुष्य भाषा को सुनते-सुनते सीख जाता है, चाहे वह अंग्रेजी हो चाहे उर्दू हो, चाहे फ़ारसी हो, चाहे वह हिन्दी हो। भाषा आदि से अंत तक समाज से ही जुड़ी हुई है। इसका विकास समाज से ही हुआ है इसको समाज से ही अर्जित किया जाता है और इसका प्रयोग भी समाज में ही होता है। अपने परिवेश और परिस्थिति के दबाव में भाषा भले ही कुछ शब्दों, मुहावरों को छोड़ दे, लेकिन वह अपनी आवश्यकता अनुसार नये शब्दों और नये मुहावरों को स्वीकार कर लेती है। कहने का अर्थ यह है कि कवि जिस भाषा का प्रयोग करता है वह अपने-आप में विशिष्ट स्थान रखती है क्योंकि भाषा विचार-विनिमय का एक सशक्त माध्यम होती है। भाषा के बिना कवि के विचार और भाव पंगु है।


बीज शब्द : रघुवीर सहाय, भाषा-शैली, सीढ़ियों पर धूप में, हमारा दल, रामदास।


मूल आलेख : भाषा मनुष्य के भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मानव जीवन व्यवहार में व्यक्ति अपने भावों और विचारों का आदान-प्रदान कर सकता है। हम अपने रोजमर्रा के जीवन में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह सामान्य भाषा होती है। सामान्य भाषा और काव्य भाषा में पर्याप्त अंतर होता है। सामान्य भाषा वहाँ समाप्त हो जाती है जहाँ उसके अर्थ को समझ लिया जाए जबकि काव्य-भाषा गहन अर्थ-बोध कराने वाली भाषा है वह अनेक अर्थों से प्रयुक्त होती है। काव्य भाषा और सामान्य भाषा में जो अंतर होता है वह यह है कि सामान्य भाषा जीवन के मर्म को उद्घाटित न करने कर्म को उद्घाटित करती हैं वह एक कामचलाऊ ढंग की अभिव्यक्ति पद्धति मात्र होती है। कविता की भाषा-समस्या दूसरी है। वह एक चिंतन और अनुभव को आकार देने वाले शब्दों की अपेक्षा रखती हैं अमूर्त जीवनानुभवों, मनःस्थितियों और संवेदनाओं के मौन-मुखर स्वरों की आंतरिक से आंतरिक तन्मयता, जटिलता और उद्वेलन को एक जीवंत प्रतिमा का रूप देना काव्य भाषा का सहज गुण होता है। दूसरे शब्दों में काव्यभाषा के बीच रचनात्मकता और सामान्य कथन का अंतर हुआ करता हैं यों हर शब्द कुछ न कुछ अर्थ रखता है और इस संदर्भ में उसकी प्रवणता असंदिग्ध है, पर कविता के संदर्भ में शब्द और अर्थ की संप्तिक्ति की विशेष अपेक्षा, कवि को हुआ करती हैं क्योंकि एक समय के बाद शब्द अपने पूर्व गहरे अर्थ आदि को खो देते हैं, इसलिए उनकी शक्तिमत्ता घटती है। वाणी का यदि वह मानव की सार्थक वाणी है, अर्थ तो होता ही है, पर वही केवल कवि का अभिप्राय न होकर उससे विशिष्ट भी कवि का अभिप्राय होता है।1


रघुवीर सहाय अपनी भाषा के प्रति बहुत जागरुक हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में और अपने वक्तव्यों में काव्यभाषा के संदर्भ में जगह-जगह भाषा के प्रति अपने विचार व्यक्त किये हैं दूसरा सप्तकमें अपनी भाषा के संदर्भ में वे कहते हैं कि मैंने अपनी कविता के इस चरण तक पहुँचते-पहुँचते शैली में ताल और गति के कुछ प्रयोग कर पाये हैं। ताल के साधारण बोलचाल की ताल के जैसा बनाने में कुछ कविताओं में, जैसे अनिश्चयऔर मुँह अंधेरेतथा दुर्घटनामें, थोड़ी बहुत सफलता मिली है। हालांकि उस कोशिक में भी कहीं-कहीं उर्दू की गति की बँधी हुई शैली का सहारा लेना पड़ा है। भाषा को भी साधारण बोलचाल की भाषा के निकट लाने की कोशिश रही है, मगर उसमें भी कहीं-कहीं भाषा की फ़िजूलखर्ची करनी पड़ी है।2


    शिल्प अंग्रेजी के टेकनिक शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है कलात्मक कार्य की वह रीति जो कविता और रचनात्मकता में प्राप्त होती है। इसका अन्य अर्थ होता है ढंग, विधि, रीति अथवा विधान। हिन्दी साहित्य में रचना विधान को यदि हम ध्यान से देखें तो पाते हैं कि प्रत्येक साहित्यकार की अपनी शैली होती है और उस शैली का अपना महत्त्व होता है। रचनाकार अलग-अलग विषयों, प्रसंगों के अनुसार अपने विचारों और भावों को अपनी शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करता हैं उसकी यह शैली परिवेशगत स्थिति और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। रघुवीर सहाय ने भी परिस्थितियों के अनुसार अनेक शैलियों का प्रयोग अपनी कविता के लिए किया है।


व्यंग्यात्मक शैली-

    समकालीन हिन्दी कविता के कवियों की यह विशेषता रही है कि उन्होंने अपनी कविता में व्यंग्यात्मक शैली का खूब प्रयोग किया है। उनके व्यंग्य उनकी शैली को रचनात्मक स्तर पर बहुत समृद्ध बनाते हैं। सहाय ने देश की सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पर सबसे ज़्दाया कुठाराघात किया है जो बात को सीधे-सीधे नहीं कर पाये वह व्यंग्य के सहारे कहने का प्रयास करते हैं।


हमारा दलकविता शीर्षक में वो देश की सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य करते है, और नेताओं की पदलोलुपता को लोगों के सामने लाने का प्रयास करते हैं-

सब लोग बारी से मुख्यमंत्री होंगे/ हमारी पार्टी में ही यह विशिष्टता है

विरोधी दल तो अभी बने ही नहीं हैं/ उनमें बनने के पहले स्पर्श होती है

हम लोग जब बन जाते हैं तब शुरु करते हैं।3


वहीं सीढ़ियों पर धूप में’ (कविता-संग्रह) स्त्रियों की स्थिति ओर उनकी दयनीय स्थिति के संदर्भ में कहते हैं कि-

पढ़िए गीता/ बनिए सीता/ फिर इन सबमें लगा पलीता

किसी मूर्ख की दो परिणीता/ निज घर बार बसाइये/ होंय कंटीली/ आँखे गीली

लकड़ी सीली, तबियत ढ़ीली/ घर की सबसे बड़ी पतीली/ भरकर भात पसाइये।4


आत्महत्या के विरूद्ध’ (कविता-संग्रह) में अधिनायककविता में वह देश के मनुष्यों की स्थिति को उजागर किया है।

राष्ट्रगीत में भला कौन वह/ भारत भाग्य विधाता है/

फटा सुथन्ना पहने जिसका/ गुन हरचरना गाता है।

x                      x                      x

नंगे-बूचे नरकंकाल/ सिंहासन पर बैठा, उनके/ तमगे कौन लगाता है

कौन-कौन है वह जन-गण-मन/ अधिनायक वह महाबली

डरा हुआ मन बेमन जिसका/ बाज़ा रोज़ बजाता है।5


व्यंग्य रचनाकार एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। जिसके माध्यम से वह लक्षित संदर्भ पर आक्रमण करता है। रघुवीर सहाय ने व्यंग्य को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। आपकी हँसीकविता में रघुवीर सहाय ने नेताओं की अपने वतन के लोगों से हो रही न इंसाफी के संदर्भ में व्यंग्य करते हैं और कहते हैं-

निर्धन जनता का शोषण है/ कह कर आप हँसे/

लोकतंत्र का अंतिम क्षण है/ कह कर आप हँसे

सब के सब है भ्रष्टाचारी/ कह कर आप हँसे

कितने आप सुरक्षित होंगे/ मैं सोचने लगा

सहसा मुझे अकेला पाकर/ फिर से आप हँसे।6


रघुवीर सहाय हिन्दी भाषा के विकास और उसके स्वरूप को लेकर बहुत चिंतित थे। उनके ऊपर भाषा आंदोलन का बहुत प्रभाव पड़ा वो हिन्दी भाषा को लेकर व्यंग्य करते हैं कि कैसे हमारी भाषा इतनी समृद्धशाली होते हुए भी बहुत पीछे है। अपनी कविता हमारी हिन्दीमें इसकी एक बानगी देखने को मिलती है-

हमारी हिन्दी एक दुहाजू की नयी बीबी है

बहुत बोलने वाली बहुत खाने वाली बहुत सोनेवाली

x                                  x                                  x

हमारी हिन्दी सुहागिन है सही है खुश है/ उसकी साध यही है कि खसम से पहले मरे

और तो सब ठीक है पर पहले खसम उससे बचे/ तब तो वह अपनी साध पूरी करे।7


सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि पर रघुवीर सहाय ने खुलकर व्यंग्य किया। रघुवीर सहाय ने जो भी व्यंग्य किया है उनके कथ्य की प्रासंगिकता है, जो प्रहारात्मक क्षमता को व्यक्त करता है।


नाटकीयता-

    रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं में नाटकीय शैली का भी प्रयोग किया है। उनके कविताओं में खीझ, रोष और तिलमिलाहट व्यक्त करने के लिये इस शैली का प्रयोग किया है। ऐसा लगता है कि मानों वह अपने पाठकों से एक गहन तर्क युक्त संवाद करना चाहते हैं क्योंकि कविता में रोष, खीझ, तिलमिलाहट एक गहन अर्थ देते हैं। डॉ. नामवर सिंह रघुवीर सहाय की नाटकीयता के संदर्भ में लिखते हैं कि आत्महत्या के विरूद्ध कविता के आंतरिक एकालाप के अंदर से एक दुनिया उठती हुई नज़र पड़ती है जो समाधिलेख की दुनिया से ज्यादा ठोस, ज्यादा खूंखार, ज्यादा भयावह है और संभवतः ज्यादा राजनीतिक है। इस दुनिया की सजीवता कविता की आंतरिक नाटकीयता का आधार है।8

    रघुवीर सहाय ने अपनी भाषा शैली में नाटकीयता को अनजाने में नहीं लाये बल्कि जानबूझकर लाये हैं। क्योंकि वे जानते थे कि नाटकीयता के माध्यम से ही समाज के असली सच को और उसकी विसंगतियों को व्यकत किया जा सकता है। ये नाटकीयता अपने सहज रूप में अभिव्यक्त हुई है। अपनी नाटकीयता में कवि ने सार्थक शब्दों को जगह दी है। आत्महत्या के विरूद्धकविता में कोई एक और मतदाताशीर्षक से उन्होंने अपनी नाटकीय शैली को अभिव्यक्त करते हुए लिखा है-


जब शाम हो जाती है तब ख़त्म होता है मेरा काम

जब काम खत्म होता है तब शाम ख़त्म होती है

रात तक दम तोड़ देता है परिवार/ मेरा नहीं एक और मतदाता का संसार।9


रघुवीर सहाय की अधिकांश कविताओं में एकालाप शैली को अपनाया गया है, उनकी भाषा एक हद तक अनौपचारिक और तात्कालिक परिस्थितियों को व्यक्त करने वाली है। उन्होंने एक अघड़े भारतीय आत्माकविता में भारतीय संसद को उसकी कार्यवाही को नाटकीय संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि-

टूटते-टूटते/ जिस जगह आकर विश्वास हो जाएगा कि

बीस साल/ धोखा दिया गया

वहीं मुझे फिर कहा जाएगा विश्वास करने को10


रघुवीर की भाषा पाठकों के मन में एक नये तरीके का संवाद रचती है और उनकी नाटकीयता को बहुत बेहतर ढंग से प्रदर्शित करती है। दयाशंकर’ कविता में इसको और भी सही तरीके से देखा जा सकता है-


उस रोज़ रात को बिस्तर पर कुछ शरमाकर/ मुंशी की बीवी ने मुंशी से कहा सुनो

मेरा मन पूआ खाने को जब करता है/ तब मुझको यह होना मुश्किल दिखलाता है

यह बात दयाशंकर ने दुःख के साथ सुनी/ वह सात जनों के लिए कहाँ पूआ लाते

वह चुप होकर के लेट रहे इसलिए कि वह/ माने बैठ थे पूआ पति घर लाता है

तब ज़रा देर कर इन्तजार बीवी बोली/ उठ पड़ो अभी हम लोग पका खाएँ पूआ

बच्चे सोते हैं मीठी नींद झगड़ करके/ बस जो तुतला है कभी-कभी अकुलाता है।11


उपर्युक्त कविता में कवि ने नाटकीय संदर्भों के माध्यम से दयाशंकरकी पत्नी के मनोभावों को चित्रित करने का प्रयास किया है ओर उसकी पारिवारिक मनोदशा का बहुत विस्तृत ढंग से चित्रण करने का प्रयास किया है।


रामदासकविता में रघुवीर सहाय ने नाटकीयता के माध्यम से मॉबलिचिंगकी समस्या को उजागर किया है। वो लिखते हैं कि-

चौड़ी सड़क गली पतली थी/ दिन का समय घनी बदली थी

रामदास उस दिन उदास था/ अंत समय आ गया पास था

उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी।12


रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं जैसे- क्लब के लिए’, ‘हिंसा, ‘नशे में दया’, ‘पितरों का श्राप’, ‘भेड़’, ‘विरह की हीनता’ ‘विचित्र सभ्य’, ‘माँ निषाद’, आदि कविताओं में अपनी नाटकीय शैली का परिचय दिया है।


स्वप्न शैली-

    रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं में स्वप्न शैली का भी प्रयोग किया है। स्वप्न शैली में एक तरह की खास संवेदना मूर्त होती है और उसमें एक निश्चित भाव अंतर्निहित होती है। रघुवीर सहाय ने स्वप्न शैली में जो भी कविताएँ लिखी हैं वह वास्तविकता की ओर संकेत करती है। उनकी इच्छायें और विचार जब अतृप्त होते हैं तो वही स्वप्न के रूप में उन्हें दिखाई देते हैं। गिरीश की मृत्युकविता में वे लिखते हैं कि-

एक महान राष्ट्रीय दायित्व ने मुझे जगा दिया

तब बैठा मैं / डकारता अपनी पतली टाँगे निहारता

अपने को झाड़ता कविता लिखने के लिए।13


रघुवीर सहाय की इन रचनाओं में स्वप्न तो है लेकिन एक कविता में अगर अनिश्चय की यातना से घिरे जीवन की विवशता को सामने लाती हैं जैसे काबुल स्वप्नकविता में। दूसरी कविता गुलाम का स्वप्नहै जो पराधीनता की बेड़ियों से जकड़ा हुआ उन अपराधों के लिए अपने बच्चों के साथ सजा काट रहा है, जो अपराध उसने किया ही नहीं। विचित्र, अनिश्चय और दहशत तथा आतंक से भरा हुआ एक गुलाम संसार इस कविता में चित्रित हुआ है।गुलाम स्वप्न कविता में रघुवीर सहाय लिखते हैं-

वे कैद खाने में थी अपने बाप को / हत्या में मदद पहुँचाने के जुर्म में

फिर मैंने देखा कि मैंने एक कमरे में / एक आदमी को गिर कर मरते हुए देखा है।14


वही काबुल स्वप्नकविता में रघुवीर सहाय लिखते हैं कि-

पथरीला काबुल / पुलिस ने पकड़ा / जेब में पिस्तौल

मैंने दिखाया / उसने लिखा / छोड़ दिया

खंडहर में युद्ध हुआ / सब भागे / मेंने गोली दागी

बादशाह ज़ख़्मी हुआ।15


    दरअसल यह शैली मनोविज्ञान पर आधारित होती है। यह व्यक्ति के अवचेतन मन में घटित होने वाली घटनाओं पर आधारित होती है। इसमें बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। इस शैली में एक क्रमबद्ध तरीके सभी घटनाएँ नहीं होती है। हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं इसका संबंध अवचेतन मन में घटित होने वाली घटनाओं की विशिष्ट और बेतरतीब बिम्बावियों से है। इसमें बिम्बों, प्रतीकों, मिथकों आदि को पद्धति र्कानुमोदित पद्धति पर उपस्थित किया जाता है।16

रघुवीर सहाय अपनी कविताओं के माध्यम से यह दिखाना चाहते थे कि भारत की जनता आजादी के बाद जो स्वप्न देख रही थी वह टूट गया है। अपनी कविता चेहरा’ - में वे कहते हैं कि-

खेत में सजी हुई क्याँरियाँ थी / उसमें पानी भरा था

मैंने हाथ से उन्हें पटीला / अखुयें आखते दिखाई दिये

सपना था यह / धीरे से बदल गया।17

इस प्रकार हम देखते हैं कि रघुवीर की स्वप्न शैली मनुष्य भीतर व्याप्त दहशत, आतंक और यातना को अभिव्यक्त करती है। इसमें मनुष्य की संवेदना का तर्क मौजूद है। इसमें यथार्थ जीवन की अभिव्यक्ति हुई है।


गद्यात्मक शैली-

    रघुवीर सहाय ने अपनी सभी कविताएँ बोलचाल की भाषा की में लिखी हैं। इनकी कविताएँ गद्यात्मक शैली का उत्कृष्ट उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत करती है। इसमें सहज और सरल तथा बोलचाल की भाषा के माध्यम से कवि अपने भावों और विचारों को अभिव्यक्त करता है। रघुवीर सहाय ने गद्य शैली में कविता के कथ्य और विचार को सम्प्रेषणीय बना दिया है।

साठोत्तरी हिन्दी कविता में कविता की भाषा वैसे भी अराजकता का शिकार रही है। गद्यात्मक कविता को कविता के रूप में सुशोभित किया गया रघुवीर सहाय ने कला क्या हैकविता में कहते हैं-

अद्वितीय हर एक है मनुष्य / और उसका अधिकार अद्वितीय होने का

छीनकर जो खुद का अद्वितीय कहते हैं / उनकी रचनाएँ हों या उनके हों विचार

पीड़ा के एक रसभीने अवलेह में लपेटकर / परसे जाते हैं तो उसे कला कहते हैं।”18

कौन थाकविता में उनकी गद्यात्मक शैली का उत्कृष्ट नमूना देखने को मिलता है। जिसमें वो लिखते हैं-

कौन है? क्या मेरे साथ कभी पढ़ता था / या मेरे बचपन में मेरा पड़ोसी था

या कोई ख़बरों में छपी हुई घटना / या कोई सुनी हुई घटना का पात्र था

वह चलते-चलते ठीक पास से गुज़र गया / नहीं, मुझे देखा, मुस्काया मुझसे नहीं

वह कोई और था।19


इनकी बहुत सी कविताओं में गद्यात्मक शैली का स्वरूप देखने को मिलता है। जैसे- कला के लिए’, ‘नन्हीं लड़की’, ‘भविष्य’, ‘धूप का इतिहास’, ‘नवनिर्माण’, ‘कैमरे मे बंद’, ‘निमंत्रण’, ‘कैंसर’, ‘युद्ध विराम’, ‘सड़क पर रपट’, ‘ऐसा क्या था’, ‘वर्गीकरण’, ‘निर्भयहत्यारे’, ‘अध्यापक से’, ‘फायदा’, ‘आज का पाठ’, ‘नयी हँसी’, ‘अकेला’, ‘बसंत की हवाएँइत्यादि।

निष्कर्ष : हम कह सकते हैं कि रघुवीर सहाय सरलता और सहजता के पक्षधर थे। वो भाषा को लेकर अलग-अलग प्रयोग करते रहे और इन प्रयोगों को लेकर वह कविता को साधारण बोलचाल की भाषा के नजदीक रखना चाहते थे और भाषा को अत्यधिक प्रभावी, संप्रेषण की क्षमता से जोड़ना चाहते थे। उनके भाव और विचार पाठकों के लिए सहज बोधगम्य हो वो ऐसी ही भाषा चाहते थे। रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं की भाषा को बोलचाल के बहुत करीब रखा। उन्होंने कविता को सरल और सहज भाषा को सरल और सहज भाषा में ही लिखने का प्रयास किया जहाँ वह अपनी कविता में भाषा के द्वारा अपनी बात कहने में असहज महसूस करते हैं वहाँ पर प्रतीक, बिम्ब, मुहावरे और लोकोक्तियों का सहारा लेते हैं। हालांकि तमाम रचनाकारों ने इसकी कड़ी आलोचना की है कि रघुवीर सहाय ने कविता को अखबारों की भाषा बना दिया है और उनके काव्य-संग्रह आत्महत्या के विरूद्धको इस आलोचना का आधार बनाया और रघुवीर सहाय इन बातों की परवाह न करते हुए अपनी काव्य-भाषा के संदर्भ में कहते हैं कि- मैं काव्यभाषा को न तो भाषाशास्त्री की तरह से देख सकता हूँ और न आलोचक की तरह से। यह तो नहीं कहूँगा कि सब कुछ मैं सहज भाव से कर देता हूँ और मुझे पता नहीं चलता। ऐसा तो नहीं है। मैं जानता हूँ कि मैं क्या करने की कोशिश कर रहा हूँ। बल्कि जैसा कि मैंने आपसे एक और प्रश्न के उत्तर में कहा था कि अपना वैचारिक आधार तो पहले से रहता है। उसी तरह से यहाँ भी आवाज की शक्ल में बिंबों की शक्ल में, शब्दों के अर्थों की शक्ल में शिल्प का एक नमूना- कुल मिलाकर रचना में रख-रखाव, तौर-तरीके, रूझान तथा शक्ल सब के संदर्भ में हल्का सा कभी-कभी स्पष्ट और कभी अस्पष्ट नमूना-रचना करने के पहले रहता है।20  यही कारण था कि रघुवीर सहाय ने बिना किसी की परवाह किये कविता को लेकर निरंतर अग्रसर रहे उन्होंने अपनी कविता के लिए नये शब्द, नयी भाषा, नये मुहावरों, नये बिम्बों और प्रतीकों का निर्माण किया और इन सबके माध्यम से कविता को बुलंदियों तक पहुँचाने का प्रयास किया।


संदर्भ :

1.    अनंत मिश्र, स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृ. 245-246
2.    रघुवीर सहाय रचनावली (सं. सुरेश शर्मा), भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013, पृ. 30
3.    वही पृ. 387
4.    प्रतिनिधि कविताएँ (सं. सुरेश शर्मा), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013, पृ. 23-24
5.    रघुवीर सहाय रचनावली (सं. सुरेश शर्मा), भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013, पृ. 111
6.    वही पृ. 163
7.    प्रतिनिधि कविताएँ (सं. सुरेश शर्मा), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013, पृ. 134-135
8.    नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1968, पृ. 155
9.    रघुवीर सहाय रचनावली, (सं. सुरेश शर्मा), भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013, पृ. 135
10. वही पृ. 163
11. वही पृ. 139-140
12. वही पृ. 231-322
13. वही पृ. 169
14. वही पृ. 194
15. वही पृ. 165
16. बच्चन सिंह, आलोचना के बीज शब्द, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2015, पृ. 61
17. रघुवीर सहाय रचनावली, (सं. सुरेश शर्मा), भाग-1, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013, पृ. 188
18. बच्चन सिंह, आलोचना के बीज शब्द, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2015, पृ. 205
19. वही पृ. 336
20. रघुवीर सहाय, याथर्थ स्थिति नहीं, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1984, पृ. 148


 

डॉ. सत्यवन्त यादव

अतिथि अध्यापक

श्री गुरु गोविन्द सिंह कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

Satyavant1april@gmail.com, 8287528857


 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue

सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन सत्या सार्थ (पटना)

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