कहानी :- जितिया - सुनीता मंजू

जितिया
सुनीता मंजू

"मां ,आज खाने में क्या-क्या बनाऊं?" सुनते ही कमला जी चौंक गयीं। बोलीं- "आज क्या बात है बहु? मुझसे पूछा जा रहा है।" "अरे मां , बच्चों की पसंद का तो रोज ही बनाती हूं। आज आपका दिन है।" अमन और अंशिका भी आ गए। "हां दादी, आज सब कुछ आपकी पसंद का बनेगा। ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक! कमला जी अभी भी नहीं समझीं। क्या बात है? कोई कुछ बताओ तो। अंशिका ने दादी को अंकवार में भरते हुए कहा- "अरे दादी कल जितिया पर्व है। आज सभी घरों में मृत पूर्वजों के लिए पकवान बनाए जाएंगे। हम आपके लिए आज का डे स्पेशल बनाना चाहते हैं। हम जीते जी ही आपको तृप्त करना चाहते हैं।"

"जी हां! आज नो पिज्जा, नो बर्गर, नो पास्ता। आज सिर्फ दादी की पसंद का देसी खाना" अमन बोला। "पापा ने बताया है आपको दाल पिट्ठा बहुत पसंद है। नाश्ते में बनाएं ?" वाह! दालपिट्ठा !! दादी ने कहा।

सभी नाश्ते की तैयारी के लिए चले गये। कमला जी की आंखों में बचपन से लेकर जवानी तक के दिन फिर गए। भोजन के मामले में कमला जी बचपन से ही बहुत शौकीन थीं। मां कहतीं "इसकी तो जीभ बहुत चटोरी है। छः गज की।" कमला जी कभी अचार तो कभी मुरब्बा चाटते हुए रसोई से भागती थीं। थोड़ी बड़ी हुई तो बड़े चाव से नई-नई बहुओं के पास जाकर पकवान बनाना सीखती। लकड़ी जलाकर मिट्टी के चूल्हे पर ही मालपुआ, दाल पिट्ठा, मेथियाउर, लौकाजाबर, रसियाव, ठेकुआ, टिकरी, खाजा इत्यादि बनाती और बड़े शौक से खातीं। गांव में बढ़िया भोजन की शौकीन लड़कियों को चटोरी-चटनी कहा जाता था। बुरा समझा जाता था। भली लड़कियों को तो कुछ भी मिल जाए, भरपेट खा लेती हैं। "अब यह क्या बात हुई, कि दाल भात के साथ सब्जी भी चाहिए। अचारचटनी भी चाहिए। दाल छौंकी हुई ही चाहिए, गाढ़ी चाहिए। यह कोई भली लड़कियों के लक्षण हैं?" पड़ोस की चाची कहती। किशोरावस्था में ही शादी की बातचीत होने लगी। सभी को लगता, इतनी चटोरी लड़की घर गृहस्थी कैसे संभालेगी।

विवाह के समय बुआ ने डोली में चढ़ाते-चढ़ाते कान में कहा था "बन्नी जीभ के तनी कंटरोल करीहा। न त तोहार घर ना बसी।" कमला की रुलाई और तेज हो गई थी। सोलह बरस की अवस्था में मां-बाप, घर-द्वार तो छूट ही रहा है! अब क्या वहां ससुराल में, भोजन के भी लाले पड़ने वाले हैं!! कमला चीखें मार-मारकर रोने लगी। ससुराल पहुंचते-पहुंचते कमला की चीखें सिसकियों में बदल गई। वो भावी जीवन की परीक्षा के लिए स्वयं को तैयार कर चुकी थी।

दुल्हन उतारने के पश्चात 'पूरी पकाने' की रस्म होने लगी। उन दिनों दुल्हन को पहले दिन ही दाल भरी पूरी और खीर चूल्हे पर बनाना होता था। बहू भोजन बनाकर रसोई से निकल जाती थी। तत्पश्चात सास रसोई में जाकर सबको परोसती थी। बहू को भी। बहू को जितना मिले उसी में संतुष्ट हो जाना पड़ता था। पुनः मांगने वाली बहू को पेटू और चटनी-चटोरी कहा जाता था। कमला अपने गांव में नई बहुओं के आगमन पर यह सब देख चुकी थी। गरम-गरम पूरियां तवे से निकालते-निकालते पूरियों की क्षुधावर्धक सुगंध से कमला की भूख तेज हो गई।

विवाह के दिन तो उपवास ही था। भोर में भी रोने-धोने में कुछ खाने की सुधि ही ना रही। "अब क्या करूं?" कमला ने सोचा और घूंघट की ओट से नजर दौड़ाई। आंगन में सभी व्यस्त थे। दहेज का सामान रखा जा रहा था। लड़कियां बायना बांटने में व्यस्त थीं। बड़ी बुजुर्ग महिलाएं बायना अलगअलग हिस्सा लगाकर, हिदायत के साथ दे रही थीं कि "रामकृपाल के घरे तीन जगह बायना दे दी हैं, तीनों पतोह फरका हो गईल बा लो।"

"हइ चार गो लड्डू वाला संपूरना फुआ के दे दिहा ना त रोज ओरहन दिहन।"

"हजामीन कहां रह गई ली? नेग लेबे खातिर आगे रहेली। बायना बांटे के उनकर काम ह कि लड़की सबके?"

"अब का करें बड़की दीदी जल्दी-जल्दी काम निपटाईं। ओकर बाट देखते रह जाएम। उ जौ के गइल सतुवान के लौटे वाला आदमी हइ।" आंगन में ठहाके गूंज गए। इसी तरह की आवाजें सुनाई दे रही थीं। रसोई की तरफ किसी का ध्यान नहीं था। कमला ने धीरे से एक पूरी ली, उसे गोल-गोल मोड़कर घूंघट की ओट में जल्दी-जल्दी खाने लगी। स्वाद में मगन कमला को पता ही नहीं चला कि कब तवे पर की पूरी जल गई। गंध के आंगन में फैलते ही सास दौड़ी-दौड़ी रसोई में आई। कमला को पूरी खाते देखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी" अरे ई सत्यानाशी हमार घर उजाड़े आईल बिया। अरे राम!! अभी देवता पितर के ना चढ़ल। अभी मरद मानुष ना खाइले। आ ई दलिदर भकोसे लागल।" चीख सुनकर सभी रसोई में आ गए और कमला को भला-बुरा कहने लगे। "अभी तो पहला दिन है बाप रे आगे क्या होगा?" "बुधन बहू बड़ी चटोरी है।" "राम-राम घर की लक्षमी भकछनी हो जाए तब का हो?" शादी के बिचौले (अगुआ) को बुलाया गया शिकायत की गई। वह आकर कमला के पास खड़े हुए तो, उनके पैर पकड़कर रोने लगी।" हम को बचा लो चाचा! हमें बहुत जोर से भूख लगी थी! हम क्या करते?" उसे समझा ही रहे थे कि सास आकर खड़ी हो गई। कहने लगी "का हो रामधनी, हमारा नौकरिहा लड़का के ठग ले ल। एही कुलछिनी के बांध देहला!" वह बोले "अरे बुआ बात समझे की कोशिश करो। अभी बच्चा बा, माफ करि दो।" यह सब बातें चल ही रही थी कि बुधन के कानों में विदाई के दौरान सास को दिया गया वचन गूंजने लगा। "दुल्हन के सुख-दुख का ध्यान रखूंगा।" वह रसोई में गए। कमला को घूंघट का होश नहीं था। वह ज़ार-ज़ार रो रही थी। आंसुओं से भीगा कमला का मासूम चेहरा बुधन को द्रवित कर गया। वह बोले "रहने दो माई! अब जो हुआ सो हुआ, बात को जाने दो तमाशा मत बनाओ।" मां का गुस्सा और भी बढ़ गया। बोली "काल्ह के बियाही खातिर माई से जबान लड़ावतारा! वाह रे जमाना!! तहरा इतना प्रेम बा त अपना दुल्हन के नाके काने पहिन ल। ई कुलछिनी हमरा घर में ना रही।" पिताजी ने भी मां को समझाने की कोशिश की "अरे बुधन की माई, क्यों जिद कर रही हो? नई बहुरिया के कहां लेकर जाए बुधन। कच्ची उम्र में घर गृहस्ती कैसे संभाल सकेगी। तुमको तो उसे प्रेम से सब सीखाना समझाना होगा।" परंतु सास नहीं मानी। बोली "टोला मोहल्ला में हमार का इज्जत रह जाई। घर में ई रही त हम ना रहब। नइहर चल जाइब।" वह बच्चों को पालने में हुए कष्ट को कहते हुए प्रलाप करके रोने लगी। बात उनकी आन पर आ चुकी थी। आखिरकार उनके फैसले से सहमत होने के बाद बुधन कमला को लेकर दिल्ली आ गया। कमला का डर के मारे बुरा हाल था। वह इस सब के लिए बस स्वयं को अपराधी मान रही थी। नई जगह, इतने बड़े शहर में वह कैसे घर गृहस्थी बसाएगी। वह तो आज तक कभी पटना भी नहीं गई थी। शहर के नाम पर छपरा ही देखा था। भरे पूरे ससुराल में सास- ननद के ताने बेशक मिलते हैं; परंतु नमक, तेल, लकड़ी की चिंता तो नहीं करनी पड़ती। जमी जमाई घर गृहस्थी मिलती है। पर अब क्या हो सकता था। अभी तक बुधन से कमला की कोई बात भी ना हुई थी। वह जो कहता था, उसके आदेश का पालन करते आ रही थी। ट्रेन अपनी रफ्तार में चली जा रही थी। कमला ने बुधन से पूछा "आप नाराज तो नहीं है मुझसे?" बुधन बोला "नहीं !तुम चिंता मत करो। सब ठीक हो जाएगा। मां दिल की बुरी नहीं हैं। बस अनिष्ट-अमंगल, शुभ-अशुभ यह सब को बहुत मानती है। कुछ दिनों बाद गांव चलेंगे और मां को मना लेंगे।"

दिल्ली में अपने छोटे से कमरे में ले जाकर बुधन ने कमला को बिठा दिया। वह जरूरी सामान लेने बाजार चला गया। कमला ने कमरे में नजर दौड़ाई। एक चारपाई, एक स्टोव, छोटा पतीला, एक थाली, एक गिलास, एक कटोरी, एक बाल्टी। एक कोने पर कुछ सामान अखबार में मोड़-मोड़कर रखा गया था। दीवार पर खूंटी पर कुछ कपड़े टंगे थे। थोड़ी देर में बुधन आया। तब तक कमला ने चारपाई पर चादर ठीक से बिछा दी थी। सब सामान ठीक से लगाकर, कमरे में झाड़ू लगाकर साफ कर दिया था। बुधन आटा, चावल के पैकेट, सब्जी, दूध, ब्रेड, कुछ बर्तन लेकर आया। फटाफट स्टोव जलाकर चाय बनायी। गिलास में डालकर कमला को दी। फिर बोले "चाय ब्रेड खाकर थोड़ी देर आराम करो। फिर सोचते हैं, आगे कैसे क्या करना है।" शुरू के दो तीन सप्ताह तो गृहस्थी जमाने में ही लग गए। कमला को तो स्टोव जलाने भी नहीं आता था। बुधन और अपनी पड़ोसन मीरा की सहायता से धीरे-धीरे कमला ने शहर के कामकाज करना सीख लिया कि कैसे पानी आते ही कपड़े धोकर नहा लेना है। सभी बर्तनों में पानी भरकर रख लेना है। सब्जी कहां से खरीदनी है। कचरा कहां फेंकना है। दूध कहां से लाना है। धीरे-धीरे कमला का घर-संसार बस गया। परंतु पोते की खबर सुनकर भी सास का गुस्सा कम नहीं हुआ। पोते के लिए कपड़े, डारा पहुंचारी (नजरिया), मालिश के लिए शुद्ध सरसों तेल, कजरौटा सब देवर के हाथों भेज दिया था। पोते और बेटे के लिए खूब आशीर्वाद दिए थे। परंतु कमला के लिए एक शब्द भी नहीं कहलवाया था। उनके लिए तो कमला मानो थी ही नहीं। बुधन कमला के खाने-पीने का बहुत ध्यान रखते। कहते "जो मन करे वह बना लेना सामान मंगवा लेना। जो मन करे खाओ पियो।" कमला जी अपने हाथों से रच-रचकर पकवान बनाती और चटकारे लेकर खाती।

बेटे के बड़े होने पर घर में उसकी पसंद को महत्त्व मिलने लगा। इसी बीच बुधन भी दुनिया छोड़ कर चले गए। अब कमला बेटे से ही पूछ कर खाना बनाती। फिर भी अपनी पसंद की चटनी अचार तो जरूर बनाती। अचार और मुरब्बे साल भर के लिए बनाकर रख लेती। बेटे के विवाह के पश्चात तो रसोई बहू के हाथ में आ गई। वह पूछती "मां खाने में क्या बनाऊं?" कमला जी कहती "विवेक (बेटे) से पूछ लेना, उसी की पसंद का बनाओ।" धीरे-धीरे बहू ने बेटे से ही पूछना शुरू कर दिया । अमन और अंशिका के जन्म के बाद रसोई में उनकी पसंद का खाना बनने लगा। परंतु प्रतिवर्ष कमला जी ने आचार और मुरब्बे बनाने नहीं छोड़े। वही तो थे उनका सहारा। अब आधुनिक रसोई में जाकर पकवान बनाना तो उनके बस की बात नहीं थी। जब भी कुछ चटपटा खाने को मन करता था, अचार या मुरब्बा लेकर चाट लेती थी। अभी कमला जी अतीत की गलियों में ही घूम रही थी कि बहू ने जीरे की छौंक लगाए गरम गरम दाल पीठा सामने रख दिया। "मां जी नाश्ता तैयार है। मैंने यूट्यूब पर 'देसी व्यंजन' सर्च करके बड़ी मेहनत से बनाया है। खाकर देखिए तो, कैसा बना है?" कमला जी ने एक टुकड़ा उठाकर मुंह में रखा। लहसुन, अदरक, हरी मिर्च-मिश्रित चना दाल का स्वाद मुंह में घुल गया। बहुत बढ़िया बना है बहू। तुम भी खाओ। विवेक और बच्चों को भी बुलाओ। आज मेरी पसंद का खाकर देखें। अंशिका ने चखकर कहा "वाओ, यम्मी! बहुत टेस्टी है दादी आपकी पसंद का नाश्ता। अब तो हर सन्डे आपकी पसंद का खाना बनेगा। है ना पापा?" "हां-हां क्यों नहीं? श्रद्धा तो हमेशा होनी चाहिए। इसके लिए जितिया और पितृपक्ष का इंतजार क्यों?" विवेक बोला। कमला जी ने जीवन में जब भी अपनी पसंद का कुछ खाया या तो डांट सुनकर खाया, या फिर स्वयं अपने हाथों से बनाकर। आज जीवन में पहली बार उनसे पूछकर, उनकी पसंद का नाश्ता किसी ने बनाकर उन्हें खिलाया था। नाश्ता करके तृप्त हो गईं। उनके रोम-रोम से अपनी बहू के लिए दुआएं निकल रही थी। बहू हौले हौले मुसकरा रही थी।

सुनीता मंजू, सहायक आचार्या
हिन्दी विभाग, राजा सिंह महाविद्यालय- सीवान (बिहार)
pranay1992015@gmail.com

अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue

सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन सत्या सार्थ (पटना)

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