शोध आलेख :- ‘जूठन’ में निहित सामाजिक प्रतिरोध का स्वर / डॉ. अब्दुल हासिम

‘जूठन’ में निहित सामाजिक प्रतिरोध का स्वर

 -  डॉ. अब्दुल हासिम

 

शोध-सार : दलित आत्मकथाएँ दलित साहित्य की प्रतिनिधि विधा मानी जाती हैं। दलित आत्मकथाओं में दलित जीवन की सामूहिक अभिव्यक्ति होती है इसलिए दलित समुदाय, आत्मकथाओं के माध्यम से दलित सार्वभौमिकता के नए आख्यान को भी आमंत्रित करता है। प्रतिरोध की चर्चा केवल संघर्ष के स्तर पर नहीं है अपितु प्रतिरोध के दार्शनिक अर्थ को भी प्रतिपादित करता है। दलित समुदाय को शोषण के जिस दंश को झेलने के लिए विवश किया गया वह समाज और साहित्य में लंबे समय तक अभिव्यक्ति के स्तर पर उपेक्षित था। दलित आत्मकथाएँ इसी उपेक्षा का प्रतिरोध भी हैं। छद्म वैचारिकताओं एवं छद्म प्रगतिशीलता का भी विरोध यह आत्मकथाएँ करती हैं। दलित आत्मकथाओं की पहली सार्थक अभिव्यक्ति मराठी साहित्य में व्यक्त हुआ और उसके बाद हिंदी पट्टी में दलित आत्मकथाएँ लिखी जाने लगीं। हिंदी में दलित आत्मकथाओं का इतिहास बहुत पुराना नहीं है किंतु कम समय में हिंदी में भी दलित आत्मकथाओं ने अपनी सार्थक पहचान बनाई है। हिंदी दलित आत्मकथाओं ने हिंदी पट्टी में धार्मिक जकड़न और वर्ण-व्यवस्था के कुचक्र पर बहुत तीखा प्रहार किया है। दलित आत्मकथाओं ने अमानवीयता, शोषण और रूढ़ियों के माध्यम से दलित जीवन के अन्तर्विरोध को भी सामने लाने का कार्य किया है।  दलित आत्मकथाओं में अम्बेडकरवादी चेतना व दलित आंदोलनों की भाव-भूमि स्पष्ट तौर पर दिखती है। दलित चेतना के निर्माण के इन्हीं कारकों ने दलित साहित्य का विकास किया है। यही चेतना दलित आत्मकथाओं में भी दिखाई देती है।

 

दलित आत्मकथाएँ ऐतिहासिक कारकों की भी पुष्टि करती हैं। आज जिस रूप में दलित साहित्य दिखाई दे रहा है वह दरअसल दलित चिंतकों के अथक प्रयास और अतीत में हुए दलित आंदोलनों की ही देन कही जा सकती है। दलित साहित्यकार अपनी आत्मकथाओं में वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था, पितृसत्ता का प्रतिरोध करते हुए सामाजिक न्याय तथा समता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व पर जोर देते हैं। वर्तमान में दलित शोषण कम नहीं हुआ है और इस बात में कोई गुंजाइश नहीं कि सवर्णवादी व्यवस्था के पोषक अपनी अनैतिक धारणाओं के माध्यम से इस शोषणकारी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। अम्बेडकरवादी चेतना इस शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में सबसे अधिक समर्थ है किंतु इस चेतना का प्रसार अब भी दलित समाज के सभी तबके तक नहीं हुआ है। दलित चेतना का प्रसार साहित्य एवं जन-आंदोलन के माध्यम से ही संभव है। दलित प्रतिरोध इन सभी प्रयासों का सम्यक स्वरूप है।

 

बीज शब्द : अम्बेडकरवादी चेतना, प्रतिरोध, वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था, पित्रसत्ता, सामाजिक न्याय, समता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व।

 

मूल आलेख : वर्ण-व्यवस्था भारतीय समाज में प्राचीन काल से स्वीकृत रही है। इसके पीछे सामाजिक कार्यों को विभाजित करने का उद्देश्य रहा है। परिवार इन्हीं कार्यों की वजहों से आगे के दिनों में जाति के नाम से जाना जाने लगा। सामाजिक कार्य इसी रूप में जातिवाचक बनकर भारत में जातिवाद के फैलने का कारण बना। कार्य करने वालों के प्रति घोर सामाजिक अन्याय करना भारतीय समाज में शुरू हो गया। सामाजिक अन्याय के साथ-साथ इन्हें अस्पृश्य कहकर घोर अपमानित किया गया। गाँव-शहरों में उनके लिए अलग मोहल्ले निर्माण कर के समाज की मुख्यधारा से दूर रखा गया। उन्हें सभी अधिकारों से वंचित कर दिया गया। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विकास से इन्हें दूर रखा गया। उनके मानवीय अधिकार छीनकर उन्हें गुलाम समझते हुए नारकीय जीवन जीने के लिए विवश कर दिया गया। चमार, चांडाल, डोम आदि नामों से पुकार कर उनके श्रम का शोषण करना शुरू कर दिया गया। उन्हें मंदिर तथा सवर्ण वर्गों के मोहल्ले में प्रवेश करने से मना किया गया। अन्य सामाजिक वर्गों के सामने सर उठा कर चलने की मनाही के साथ-साथ ऐसा ना करने पर दंड का प्रावधान किया भी गया।

 

मनुवादी सामाजिक व्यवस्था में किस तरह समाज के एक विशाल हिस्से को निम्न एवं अपमानजनक स्थिति प्रदान की गई? क्यों उसे शिक्षा के अधिकार से वंचित किया गयाक्यों उसे मवेशी उठाने, उसकी कटाई करने और उसका मांस खाने पर विवश किया गया? क्यों सफाई करने और जूठा उठाने का काम उसे सौंपा गया? क्यों अच्छे कपड़े पहनने के अधिकार से वंचित कर कतरन पहनने को बाध्य किया गया? क्यों उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित किया गया? आखिर क्यों उसके श्रम का दिनभर शोषण होने के बाद भी उसे भरपेट भोजन मयस्सर नहीं हुआ? क्यों उन्हें अंधविश्वासों और कर्मकांडों में उलझा दिया गया? क्यों दलित महिलाओं को दोहरी-तिहरी प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा? दलित आत्मकथाएँ इस तरह  के अनगिनत सवाल उठाती हैं और उनके कारण व कारक तत्त्वों को भी ढूंढ निकालती हैं। विमल थोरात के शब्दों में, “दलित जीवन के सरोकारों को समेटती यह आत्मकथात्मक रचनाएँ भारतीय जाति व्यवस्था, हिंदू धर्म, जन्म-सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। दलितों के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक शोषण के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करते हुए शोषक वर्ग को अंतर्मुखी होकर सोचने के लिए बाध्य करती हैं। समाज के एक हिस्से को केवल अपमान, अवहेलना, दरिद्रता, अभाव, वेदना और पीड़ा भोगने के लिए बाध्य करके सदियों तक सुविधाएँ, संपत्ति और सत्ता को अपने हिस्से में रखने वाले अभिजात वर्णों की शातिर साजिशों को आज उन्हीं के सामने खोला जा रहा है। धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की फिर से पड़ताल करने की आवश्यकता महसूस कराई जा रही है। मानवता शर्म से डूब जाए ऐसे नीति-धर्म, रीति-रूढ़ियों को बनाने और उनका संवर्धन करने वाले ब्राह्मणवाद की चीर-फाड़ है दलित आत्मकथनों में अभिव्यक्त वेदना, पीड़ा और विद्रोह।”1  ये आत्मकथाएँ भारतीय समाजशास्त्र पर व्यापकता में प्रकाश डालती हैं। दलितों की जीवन दशा में व्याप्त अमानवीय और क्रूर समस्याओं का इनमें स्वाभाविक चित्रण होता है। इसी सन्दर्भ में शरणकुमार लिंबाले अपनी पुस्तक दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र में लिखते हैं- “दलित साहित्य में ‘नकार और ‘विद्रोह दलितों की वेदना के गर्भ से पैदा हुआ है। यह नकार अथवा विद्रोह अपने ऊपर लादी गई अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध है।”2 ज़ाहिर है कि दलित आत्मकथाएँ अमानवीयता के खिलाफ़ पुरज़ोर आवाज़ उठाती हैं।

 

‘जूठन सुप्रसिद्ध दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है। संपूर्ण दलित जीवन की तस्वीर उकेरने वाली यह आत्मकथा दलित साहित्य जगत की अमूल्य निधि है। जाति-व्यवस्था के अंतर्गत निम्नस्तरीय समझी जाने वाली भंगी जाति में उनका जन्म हुआ। यह बस्ती गाँव की मुख्य बस्ती से दूर और बेहद गंदी बस्ती थी। इनकी बस्ती के ही पास लोग शौच कर्म के लिए जाया करते थे। उच्च जाति के लोगों के द्वारा इनकी पूरी बिरादरी को निम्न और तुच्छ समझा जाता था और इनसे अपमानजनक व्यवहार भी किया जाता था। व्यवस्था इस तरह की थी कि ये लोग नए कपड़े नहीं पहन सकते थे और न ही जूते-चप्पल पहन सकते थे। शिक्षा प्राप्त करने में भी खुली छूट नहीं थी। जैसे-जैसे समाज में जागरूकता आने लगी वैसे-वैसे ही इनका परिवार भी पढ़ाई में अभिरुचि लेने लगा। परिणामस्वरूप इनके पिता ने इनका दाखिला स्कूल में करा दिया। जब ये स्कूल जाने लगे तो उच्च जातियों द्वारा जातिगत तानों से इन्हें अपमानित किया जाने लगा। यहाँ तक दुर्भावना से ग्रस्त लोगों ने इनकी पिटाई भी की ताकि ये स्कूल जाना छोड़ दें। इनके अलावा शिक्षकों द्वारा भी इनके साथ भेदभाव और दुर्व्यवहार किया जाता था।

 

शिक्षा का अभाव सदियों से दलित वर्ग की एक बहुत बड़ी समस्या रही है। मनु की सामाजिक व्यवस्था में उन्हें शिक्षा से न केवल दूर रखा गया बल्कि शिक्षा प्राप्ति को उनके लिए गंभीर अपराध भी निरूपित किया गया और इस मार्ग पर चलने का प्रयास करने वालों के प्रति कठोर दंड के प्रावधान किए गए। यह व्यवस्था पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों वर्षों तक चलती रही और जागृति के अभाव में अस्पृश्यता के कारण दलितों का जीवन दो वक़्त के भोजन की व्यवस्था कर पाने के निमित्त कोल्हू के बैल की तरह सवर्ण के शोषण की चपेट में घूमता रहा। ये स्थितियाँ दलित आत्मकथा में बखूबी अभिव्यक्त हुई हैं। जूठन आत्मकथा में दलितों की दयनीय स्थिति का मार्मिक एवं यथार्थ चित्र देखने को मिलता है। बरला गाँव सवर्ण अहंकार से ग्रस्त त्यागियों का गाँव है जहाँ सदियों से सवर्ण लोगों ने दलितों का केवल शोषण ही किया। अजमेर सिंह काजल के अनुसार, “जूठन हिंदू समाज व्यवस्था द्वारा जातियों के अंतिम सोपान पर स्थित चूहड़ा(जिसे आज वाल्मीकि कहा जाने लगा है) जाति के उत्पीड़न-शोषण के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक रूप से दमन करने के अनेक प्रकरणों से हमारा परिचय करवाती है। आत्मकथा के प्रकरणों को पढ़ते-पढ़ते पाठक का मन पसीजने लगता है।”3 ओमप्रकाश वाल्मीकि ने जूठन में समस्त चूहड़ा जाति की यथार्थ परिस्थितियों का बेबाक चित्रण किया है। बरला गाँव में दलित बस्तियों को सवर्ण घरों से दूर बसाया जाता था। लेखक का जहाँ बचपन बीता उस परिवेश के भयावाह वातावरण के बारे में लेखक ने  बेबाक टिप्पणी की है। जूठन पूरी शिक्षा पद्धति और शिक्षकों की घिनौनी मानसिकता को पूर्णतया उजागर करती है। शिक्षकों का भयावह रूप इस आत्मकथा में उजागर होता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि को अपने घर में सबसे छोटे होने की वजह से उनके पिता ने सदैव उन्हें जातिगत कार्यों से दूर रखा। वह सदैव यही चाहते थे कि उनका पुत्र शिक्षा प्राप्त कर अपने और अपने परिवार को एक दिशा दे। इसी प्रबल इच्छा से वे ओमप्रकाश वाल्मीकि को एक सरकारी स्कूल में दाखिल कर देते हैं परंतु उस विद्यालय में भी जातीय भेदभाव व छुआछूत को मानने वाले जातिवादी  मानसिकता के शिक्षक मौजूद थे जो न केवल दलित बच्चों से घृणा करते बल्कि उनका शोषण भी करते थे। जहाँ ‘त्यागियों’ के बच्चे दलित बच्चों को केवल चूहड़े का ही बोलकर पुकारते थे। अजमेर सिंह काजल के अनुसार, “जूठन में दलित विद्यार्थियों के प्रति अध्यापकों के क्रूर व्यवहारों का उद्घाटन हुआ है।”4 गाँव के स्कूल का वातावरण दलित बच्चों के लिए अत्यंत यातनामय था जहाँ स्कूल से बच्चों को भगाने के लिए शिक्षक तरह-तरह के हथकंडे अपनाते थे। दलित बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना प्रताड़ित किया जाता ताकि वह दोबारा स्कूल का रुख ही ना करें।  शिक्षक समुदाय जातिभेद की पूर्वाग्रह की भावना से ग्रस्त है जो आदर्श शिक्षक के नाम को कलंकित करते हुए प्रतीत होते हैं। अपनी आत्मकथा में ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि, “शिक्षकों का आदर्श रूप जो मैंने देखा वह अभी तक मेरी स्मृति में मिटा नहीं है। जब भी कोई आदर्श गुरु की बात करता है तो मुझे भी तमाम शिक्षक याद आते हैं जो मां-बहन की गालियाँ देते थे। सुंदर लड़कों के गाल सहलाते थे और उन्हें अपने घर बुलाकर उनसे वाहियातपन करते थे।5 यह भी एक प्रमुख कारण रहा है जिसकी वजह से दलित समाज में शिक्षा का विस्तार नहीं हो सका। दलित चिन्तक सुभाष चन्द्र के अनुसार- “ओमप्रकाश वाल्मीकि ने इस कथित ‘पहचान के संकट पर ‘जातिगत हीनता-बोध पर विजय पाई है। उन्होंने योग्यता प्रतिभा, संघर्षशीलता से अपनी मानवीय पहचान बनाई, न कि वंशगोत्र में संस्कृत निष्ठता का पुट डालकर या ‘मुख्यधारा’ के अन्य किसी पाखण्ड को अपनी पीठ पर लादकर। वाल्मीकि ने इस ब्राह्मणवादी मिथक-भ्रम को तोड़ा कि ‘निम्न जातियों में प्रतिभा नहीं होती, ‘शिक्षा-ज्ञान से उनका कोई वास्ता नहीं।”6 सवर्ण समाज कभी नहीं चाहता की दलित पढ़-लिखकर उनकी बराबरी करें इसलिए प्रत्येक स्तर पर वह अपनी जातिवादी मानसिकता को उजागर करते हुए दलित समाज का शोषण करते हैं।

 

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा में जातिवाद, ब्राह्मणवाद और कुत्सित मानसिकता के खिलाफ़ प्रतिरोध की आवाज बुलंद की है। वह अपनी आत्मकथा में यह बताने की कोशिश करते हैं कि किस तरह से सवर्ण समाज दलित समाज के मानवीय मूल अधिकारों से वंचित करने के फिराक में लगा रहता है। एक तो जागरूकता और शिक्षा के महत्व को ना समझने की वजह से दलित समाज शिक्षा की तरफ अग्रसर नहीं होता है और यदि कोई शिक्षा प्राप्त करना भी चाहे तो  सवर्ण समाज चाहे वह अध्यापक ही क्यों ना हो, उन्हें रोकने की कोशिश करता है। अपनी आत्मकथा में विद्यालय के हेडमास्टर की मानसिकता को उजागर करते हुए ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं, “ एक रोज हेड मास्टर कालीराम ने अपने कमरे में बुलाकर पूछा, क्या नाम है बे तेरा?  ओमप्रकाश।  चूहड़े का है? हेड मास्टर का दूसरा सवाल उछला…  ठीक है… वह जो सामने शीशम का पेड़ खड़ा है उस पर चढ़ जा और टहनियाँ तोड़कर झाड़ू बना ले। पत्तों वाली झाड़ू बणाना। और पूरे स्कूल कू ऐसा चमका दे जैसे सीसा। तेरा तो यह खानदानी काम है। जा फटाफट लग जा काम  पे।7 इस तिरस्कार व अपमानजनक व्यवहार के बाद भी हेडमास्टर को जरा भी पछतावा नहीं होता है और वह पूरी निर्लज्जता से ओमप्रकाश वाल्मीकि को स्कूल से निकाल देने की और हाथ-पैर तोड़ने की धमकी भी देता है। दलित लेखक और चिन्तक मोहनदास नैमिशराय के अनुसार- “ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन से गुज़रना वस्तुतः उस समाज से गुज़रना है, जिसमें घृणा भरी है, शोषण नैतिक है, दमन जायज़ है, असमानता स्वीकृत है और अत्याचार का अंतहीन सिलसिला है। इन सबको दार्शनिक आधार भी प्राप्त है… जूठन इस सनातनता की पोल खोलती है। ‘गर्व को ‘शर्म में तबदील कर देती है और दार्शनिक आधार के झूठेपन को बेपर्दा कर जाती है।”8 अब यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि दलित समाज में शिक्षा का अभाव सिर्फ उनकी अपनी कमी की वजह से नहीं है बल्कि उनको शिक्षा से दूर रखने के लिए सवर्ण समाज ने हर तरह से कोशिश की है। अशिक्षा की वजह से दलित वर्ग में रूढ़ियों और अंधविश्वासों का बोलबाला हो गया था जिससे उनका जीवन बदतर होता चला गया जिसकी प्रमुख वजह यह थी कि उन्हें अच्छाई और बुराई में, अधिकार और शोषण में कोई फर्क नजर नहीं आता था।

 

ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ में दलितों की दयनीय स्थिति का मार्मिक एवं यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है। बरला गाँव सवर्ण अहंकार से ग्रस्त ‘तयागियों’(त्यागियों) का गाँव है जहाँ सदियों से सवर्णों ने दलितों का केवल शोषण किया। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने जूठन में समस्त ‘चूहड़ा’ जाति की यथार्थ परिस्थितियों का विधिवत चित्रण किया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने परिवार एवं दलित समाज के व्यवसाय के बारे में लिखा है। समस्त दलित परिवारों के लोग कुछ न कुछ कार्य करते परंतु दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी कर पाना नामुमकिन था। भंगी समुदाय के लोगों का कार्य था- तगावों के घरों की साफ-सफाई, सड़क व सार्वजनिक शौचालयों की साफ-सफाई, सवर्णों का मैला ढोना, बेगार करना। इन लोगों को सवर्ण द्वारा दी गई गाली-गलौजप्रताड़ना व घृणा का सदैव सामना करना पड़ता था। दलितों पर होने वाले जुल्मों पर वाल्मीकि जी ने मुखर होकर लिखा है। सवर्णों के फसल की कटाई करने पर दलित मजदूर एक किलो से भी कम अनाज मजदूरी के तौर पर पाते थे। बेकार के रूप में कटाई के उपरांत बैलगाड़ी या भैंसों की बुग्गी में लगाईउतराई करनी पड़ती। लेखक के परिवार को भी यह सब कार्य करने पड़ते।  लेखक की माँ फसलों की कटाई के साथ-साथ 8-10 तगाओं  के घर में साफ-सफाई का कार्य भी करती थीं जिसमें बहन, भाभी, भाई सब बिना मजदूरी उनकी सहायता करते। इस जी-तोड़ मेहनत का मुआवजा केवल कुछ जूठन के रूप में ही मिलता, जिसको पाकर परिवार को संतुष्ट होना पड़ता था। अजमेर सिंह काजल के अनुसार, “काम-काजी दलित समाज आर्थिक बदहाली का शिकार रहा है। यदि इनके श्रम का उचित मूल्य दिया जाता तो यह समुदाय भी सम्मानजनक जी सकता था।”9 आत्मकथा ‘जूठन’ में दलितों के घरों के आर्थिक विषमताओं एवं समस्याओं का सजीव चित्रण हुआ है। इतना सब कुछ करने के बावजूद भी दो वक्त की भरपेट रोटी नहीं मिलती जिसकी वजह से चुहड़ा जाति के लोग मरे हुए जानवरों को उठाते तथा उनकी खाल बेचकर कुछ धन कमाते। मरे हुए पशु को उठाकर उसकी खाल उतारना बड़ा ही घिनौना व घृणा पैदा करने वाला कार्य होता था।

 

लेखक ने इस संबंध में एक घटना का उल्लेख किया है। एकबार ब्रह्मदेव तगा का बैल मर जाता है तो लेखक की माँ लेखक को चाचा के साथ बैल उठाने के लिए भेज देती है।  चाचा ने छुरी लेखक के हाथ में पकड़ा कर खाल उतारने की हिदायत दी। ओमप्रकाश वाल्मीकि के जीवन का यह पहला घिनौना अनुभव था जिसे ना चाहते हुए भी कुछ पैसों की लालसा में उन्हें करना पड़ा। खाल की गठरी को सिर पर उठा कर जैसे-तैसे बस्ती में लाना पड़ा। ओमप्रकाश वाल्मीकि इस कार्य को करते हुए शारीरिक व मानसिक रूप से पूरी तरह से टूट गए जिसका ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं कि-मुझे उस हाल में देखकर माँ रो पड़ी थी। मैं सिर से पांव तक गंदगी से भरा हुआ था। कपड़ों पर खून के धब्बे साफ दिखाई पड़ रहे थे। बड़ी भाभी ने उस रोज मां से कहा था, ‘इनसे  यह ना कराओ… भूखे रह लेंगे। इन्हें इस गंदगी में न घसीटो।’ मैं इस गंदगी से बाहर निकल आया हूं, लेकिन लोग आज भी उस घिनौनी जिंदगी को जी रहे हैं।10 आत्मकथा जूठन में निम्न वर्ग की आर्थिक नीतियों का विस्तृत विवरण लेखक ने प्रस्तुत किया है जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था की आंतरिक दुर्बलताओं का उल्लेख करती हैं जिसमें दलित समाज के लोग अपने पेट की भूख शांत करने की लालसा व अपनी आर्थिक मजबूरियों के तहत सवर्ण समाज के जुल्मों व अत्याचार को  सहते हुए अपमानजनक कार्य करने को विवश हैं। जूठन आत्मकथा में लेखक ने  भूमिहीनता के कारण दलितों की आर्थिक मजबूरी और भूस्वामियों की शोषणकारी बेगार प्रथा से मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा दी है।

 

जातिगत भेदभाव के कारण होने वाले अपमान, तिरस्कार एवं प्रताड़नाओं के आसपास प्रायः दलित वर्ग की अधिकांश समस्याएँ फैली हुई हैं। यही समस्या एक प्रकार से सभी समस्याओं की जड़ हैं। दलितों को केवल दास समझ कर उनका निरंतर शोषण किया गया। भारतीय समाज में दलितों के साथ सदैव दुर्व्यवहार होता रहा है। जातीय आधार पर यदि दलित समाज को निम्न दर्ज़ा न दिया गया होता, घृणित आजीविका और निकृष्ट भोजन के लिए विवश न  किया गया होता, उन्हें शिक्षा से दूर न किया गया होता तो उनका जीवन इतना दुखमय और अमानवीय नहीं होता। इस जाति-भेद ने दलित वर्ग को आजीवन तथा हर कदम पर निरंतर अपमानित और प्रताड़ित किया है।

 

आर्थिक बदहाली दलित वर्ग की एक प्रमुख समस्या रही है। मनु की सामाजिक व्यवस्था में उन्हें संपत्ति के अधिकार से वंचित किया गया था। इस कुरीति ने परंपरा के रूप में अपनी जड़ें जमा लीं और सदियों तक निरंतर यह अन्याय पूर्ण व्यवस्था चलती रही। एक तरफ जात-पात ने तो दूसरी ओर गरीबी ने दलितों का जीवन कष्टकर बना दिया था। न उन्हें पहनने के लिए उचित कपड़े  उपलब्ध हो सके, न भरपेट भोजन और न ही उत्तम आवास। मात्र भोजन की व्यवस्था के लिए दिन-दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती और उच्च वर्ग के गुलामों सा जी-हुजूरी करनी पड़ती। आर्थिक अभाव के कारण अत्यंत कष्टप्रद जीवन जीने को बाध्य होना पड़ा। वर्ण-व्यवस्था विषमता पर आधारित व्यवस्था है जिस पर हिंदू धर्म का निर्माण हुआ है। सदियों से पशुओं की तरह जीवन जीकर भी आज दलितों ने अपने-आप को बचाया है। इस व्यवस्था में दलित हमेशा अपमान का शिकार हुआ है। हिंदी  दलित आत्मकथाओं में इस अपमान और अत्याचार का विस्तृत वर्णन मिलता है। सभी लेखकों को जीवन में अत्याचार, अन्यायअपमान आदि का अनुभव हुआ है। ऐसे समय में उन्होंने कभी सौम्य रूप धारण किया तो कभी विरोध करते हुए  अपने अधिकारों की बात भी की। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथाजूठनमें दलित समाज की आर्थिक स्थिति का बेबाक चित्रण प्रस्तुत किया है। भंगी जाति के लोगों के घरों की स्थिति दयनीय ही रहती थी। जब सवर्ण घरों में शादी-ब्याह होते तो भंगी समुदाय की महिलाएँ सवर्णों  के घर जाकर जूठी पत्तलें उठाकर अपने टोकरे में भर लेतीं। इस बचे हुए जूठन को घर लाकर इकट्ठा कर लेती थीं। ये जूठन दलितों के घरों में बड़े चटखारे के साथ खाए जाते थे। इसके अलावा सवर्ण तयागियों के घरों एवं खेतों में दिन रात काम करना पड़ता। काम के बदले बासी जूठन ही प्राप्त होती। दिन रात का मेहनताना केवल जूठन ही मिलता जिसको प्राप्त करके संतुष्ट होना पड़ता था। लेखक इस जूठन की पीड़ा को व्यक्त करते हुए आत्मकथा में लिखते हैं कि, “दिन रात मर-खपकर भी हमारे पसीने की कीमत मात्र जूठन, फिर भी किसी को कोई शिकायत नहीं। कोई शर्मिंदगी नहीं। कोई पश्चाताप नहीं।11 दलित वर्ग की आर्थिक बदहाली सवर्ण समाज की देन है। यह कैसी व्यवस्था है कि सबसे ज्यादा श्रम करने वाला वर्ग जूठन खाने पर मज़बूर है?

 

भारत में स्त्री-शोषण का इतिहास बहुत पुराना है। इस शोषण का ज़िम्मेदार पुरुषवादी व्यवस्था है। स्त्री-शोषण की इस प्रक्रिया को स्थाई और सर्वस्वीकृत बनाने में धर्म-ग्रंथों, संहिताओं और स्त्री-विरोधी अमानवीय सामाजिक रूढ़ियों की अग्रिम एवं निर्णायक भूमिका रही है। शोषण और गुलामी की इस लम्बी प्रक्रिया के बीच स्त्री-स्वाधीनता के स्वर साहित्य और जीवन में उभरते रहे हैं। लेकिन इन स्वरों को पितृसत्ता द्वारा निर्णायक परिणिति तक कभी नहीं पहुँचने दिया गया। डॉ. संतोष कुमार बघेल के अनुसार, “जब से मानव समाज की उत्पत्ति हुई तभी से महिलाओं के प्रति जो  सोच बनी वह अधिकांशतः भोग-विलास, संतानोत्पत्ति का साधन मात्र ही रही।”12 भारतीय समाज पुरुष प्रधान होने के कारण हमेशा से स्त्री को दोयम दर्जा देता रहा है। इस तरह कहा जा सकता है कि हर एक वर्ग की स्त्रियों को शोषण और अपमान से रूबरू होना पड़ता है। फिर भी दलित वर्ग की स्त्रियों की दशा पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि उनकी हालत ज्यादा बदतर है। वह अस्पृश्यता का शिकार है, निर्धनता की पीड़ा से ग्रसित भी है साथ ही बेगार के लिए घर से बाहर जाने पर विवश भी है।

 

धार्मिक और सामाजिक तौर पर अस्पृश्य  होने के बावजूद भी सवर्ण समाज दलित महिलाओं  का शोषण करते रहे। इस तरह की घटनाओं का ज़िक्र लगभग सभी दलित आत्मकथा में मिलता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा में एक बेबस स्त्री की दयनीय दशा का मार्मिक चित्रण किया है, जिसके साथ दो पुरुष पूरी रात बलात्कार करते रहे। यह घटना उनके लिए काफी पीड़ादायक रही। इस पीड़ा को व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है-मुजफ्फरनगर की घटना मेरे मन में हमेशा सवाल बनकर खड़ी रही। बारह-तेरह वर्ष उम्र का यह अनुभव मेरे लिए पीड़ादायक रहा है। क्षण भर के लिए उस स्त्री की छवि बार-बार आंखों के सामने आ जाती है जिसे दो भेड़िए रात भर झिंझोड़ते रहे। सुबह तक उसमें कुछ बचा भी था या नहीं, यह मेरे लिए हमेशा सवाल ही रहा।13 आत्मकथा में अनेक ऐसे प्रसंगों का उल्लेख हुआ है जिनमें दलित स्त्री की पीड़ादायक जीवन दशा के विविध आयामों का चित्रण हुआ है। ‘दलित साहित्य और स्त्री चित्रण’ पर भँवरलाल मीणा से बातचीत के दौरान ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं कि, “यदि स्त्री की वेदना को दलित साहित्य नहीं समझ रहा है, तो उसका एक पक्ष कमज़ोर हुआ है। दलित साहित्य का जो एक बेसिक कांसेप्ट है, उसकी अंतरंगता है जिसको कहना चाहिए आन्तरिक चेतना है उसमें ये फिट नहीं बैठेंगे तो दलित साहित्य कैसे हो सकता है? नहीं हो सकता है।”14 इसीलिए ओमप्रकाश वाल्मीकि के सम्पूर्ण साहित्य में स्त्री वेदना दृष्टिगोचर होती है। यह स्पष्ट है कि स्त्री जीवन सहज नहीं है बल्कि वह परिवार, समाज, कार्यक्षेत्र आदि विभिन्न स्थानों पर लिंग भेद, जाति-भेद, गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास एवं अनेक सामाजिक कुरीतियों के बहाने प्रताड़ित होती हैं। ‘जूठन’ आत्मकथा में ऐसे कई प्रसंग हैं जो अनेक सवाल खड़े करते हैं। ये सवाल उनसे है जिनके हाथों में समाज की व्यवस्था का दारोमदार है। वह कब तक स्त्रियों को गिद्ध की तरह झपटते रहेंगे। यह सवाल उन मां-बाप के लिए भी है जो स्त्री को बचपन से ही दोयम दर्जे का समझ कर भेदभाव करते हैं और उन स्त्रियों से भी सवाल है जो शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद भी खामोशी से अत्याचार को सहती हैं और इसे ही अपनी नियति मानती हैं।

 

निष्कर्ष: हम कह सकते हैं कि जूठन आत्मकथा में सामाजिक प्रतिरोध शाब्दिक ही नहीं है अपितु चेतना के स्तर पर वह आक्रोश भी पैदा करता है। अम्बेडकरवादी चेतना से निर्मित सामाजिक प्रतिरोध की यह ध्वनि इस बात की भी प्रतीक है कि जिस शोषण को सदियों से नियति मान कर दलित समुदाय झेलता आया था आज उसके खिलाफ़ चेतना जागृत होने लगी है। ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित समुदाय की पीड़ा, उनके शोषण तथा साथ ही उनकी आकांक्षाओं के वाहक बनते हैं। जूठन के माध्यम से ओमप्रकाश वाल्मीकि इस बात पर जोर देते हैं कि जाति श्रेष्टता किसी की योग्यता का मानक नहीं हो सकता। मानव मुक्ति की लड़ाई में जूठन मील का पत्थर साबित होने वाली आत्मकथा है। यह आत्मकथा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक तौर किये भेदभाव पर कड़ा प्रहार करती है।

 

सन्दर्भ :

  1. विमल थोरात, दलित दखल-हिंदी दलित साहित्य की प्रतिबद्धता और उसमें दलित आत्मकथाएँ(लेख), साहित्य प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, सं- 1999, पृष्ठ सं.- 205
  2. शरणकुमार लिंबाले, दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं- 2014, पृष्ठ सं.- 43
  3. अजमेर सिंह काजल, दलित आत्मकथाएँ : वेदना, विद्रोह और सांस्कृतिक रूपांतरण, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, सं- 2018, पृष्ठ सं.- 64
  4. अजमेर सिंह काजल, दलित आत्मकथाएँ : वेदना, विद्रोह और सांस्कृतिक रूपांतरण, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, सं- 2018, पृष्ठ सं.- 66
  5. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं-1997, पृष्ठ सं.-14
  6. सुभाष चन्द्र, दलित आत्मकथाएँ अनुभव से चिंतन, साहित्य उपक्रम, दिल्ली, सं-2012, पृष्ठ सं.-29
  7. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं-1997, पृष्ठ सं.-14
  8. मोहनदास नैमिशराय, हिंदी दलित साहित्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, सं.-2018, पृष्ठ सं.-192
  9. अजमेर सिंह काजल, दलित आत्मकथाएँ : वेदना, विद्रोह और सांस्कृतिक रूपांतरण, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, सं- 2018, पृष्ठ सं.- 75
  10. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं-1997पृष्ठ सं.- 48
  11. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं-1997, पृष्ठ सं.-20
  12. कर्मानद आर्य (सं.), अस्मितामूलक साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, द मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन, इग्नू रोड, दिल्ली, सं- 2018, पृष्ठ सं.- 98
  13. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, सं-1997पृष्ठ सं.-70
  14. बनास जन, अंतिम संवाद: ओमप्रकाश वाल्मीकि (ओमप्रकाश वाल्मीकि विशेषांक), अप्रैल 2014, अंक- 8


डॉ. अब्दुल हासिम

जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली

ahasim.jamia@gmail.com, 87000 32783


 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue

सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन सत्या सार्थ (पटना)

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