शोध आलेख :- लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में प्रवासी भारतीयों की प्रस्तुति : विशेष संदर्भ इंग्लैंड का भारतीय समुदाय / आकाश कुमार

लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में प्रवासी भारतीयों की प्रस्तुति : विशेष संदर्भ इंग्लैंड का भारतीय समुदाय

- आकाश कुमार


शोध-सार : विश्व के लगभग सभी हिस्सों में, चाहे पर्यटक के रूप में या प्रवासी के रूप में, भारतीय लोग पाए जाते हैं। प्रवासी भारतीय एक समुदाय के रूप में वृहत प्रतिदर्श का निर्माण करते हैं। इनकी उपस्थिति पूरे ग्लोब पर है। प्रवासी भारतीयों से संबंधित साहित्य की अकादमिक जगत में बहुलता है। एक व्यापक क्षेत्र के रूप प्रवासी भारतीयों से संबंधित पहलुओं पर अध्ययन करने के लिए देश के बहुत से उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘डायसपोरा विभाग’ का प्रबंध है। अवश्य ही, प्रवासी भारतीयों के विभिन्न पक्षों को उजागर करने में अकादमिक साहित्य निर्णायक भूमिका निभाते हैं फिर भी, मात्र शिक्षितों के उपयोग में आने की सीमा के कारण अकादमिक साहित्य समूचे जनमानस तक नहीं पहुँच पाते; एक बड़ा अशिक्षित वर्ग उनसे छूट जाता है। इस अर्थ में, अकादमिक पुस्तकों के अलावा जो माध्यम प्रवासी भारतीयों का विमर्श सामान्य वर्ग तक लेकर जाता है, वह है- सिनेमा। भारत में सिनेमा संचार का सबसे लोकप्रिय माध्यम है। भारत फिल्म-निर्माण के क्षेत्र में विश्व का सबसे अग्रणी देश है। भारतीय लोगों की बहुत-सी धारणाओं का आधार फिल्में हैं। उदाहरण के तौर पर संतोषी माता की पूजा को या फिर करवा-चौथ के त्योहार को लोक तक पहुंचाने का काम सिनेमा ने ही किया है। अतः भारतीय जनमानस में सिनेमा के प्रभाव को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। विशेषकर प्रवासी भारतीयों के संबंध में सिनेमा की उत्तरदायिता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि यह दर्शकों को अपने दृश्य-रूपों के माध्यम से विदेशों की भौगोलिक सैर भी करवाता है। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सिनेमा को वह महत्त्व नहीं प्राप्त है जो उसे यूरोप के देशों में प्राप्त है। भारतीय अकादमिक जगत में अध्ययन के स्रोत के रूप में सिनेमा बहुत-सी रिक्तताओं को भर सकता है। मसलन ऐसी बहुत सी हिन्दी फिल्में हैं जिसमें प्रवासी भारतीयों की प्रस्तुति है। प्रवासी भारतीयों की वस्तु-स्थिति को समझने के लिए ये फिल्में एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन-सामग्री हैं। इस अर्थ में, प्रवासी भारतीयों से संबंधित यह शोध-पत्र बहुत से तथ्यों को सिनेमा की दृष्टि से समझाने का प्रयास करता है।

 

प्रस्तुत शोध-पत्र इंग्लैंड में जीवन-यापन कर रहे भारतीयों तक सीमित है जिनके अध्ययन के लिए इंग्लैंड में रहने वाले भारतीयों को दर्शाने वाली चार हिन्दी फिल्मों का चयन किया गया है। वे फिल्में हैं-1. पूरब और पश्चिम (1970), 2. आइ प्राउड टु बी एन इंडियन (2004), 3. रामजी लंदनवाले (2005), 4. नमस्ते लंदन (2007)। इन सभी फिल्मों के चयन का मुख्य आधार यह है कि इंग्लैंड इनमें मुख्य थीम (विषय) के तौर पर प्रकट होता है। इन फिल्मों के अध्ययन के लिए शोध-प्रविधि के रूप में ‘कथानक विश्लेषण’, ‘तुलनात्मक’ तथा ‘समीक्षात्मक’ प्रविधियों का प्रयोग किया गया है।

 

बीज शब्द : प्रवासी भारतीय, डायसपोरा, लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा, बॉलीवुड, भारतीय सिनेमा, संजातीय सांस्कृतिक अंतर्विरोध।

 

शोध-प्रविधि : यह अध्ययन गुणात्मक विधि पर आधारित है जिसमें फिल्मों में प्रस्तुत अंतर्निहित कारकों और तथ्यों की व्याख्या करने के लिए कथानक विश्लेषण प्रविधि का उपयोग किया गया है। इस आलेख के दृष्टिकोण की प्रकृति व्याख्यात्मक अनुसंधान प्रणाली पर केंद्रित है जहां इंग्लैंड में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की प्रत्येक फिल्म में विशिष्ट प्रस्तुति की व्याख्या करने का प्रयास किया गया है।

 

यह शोध-पत्र प्राथमिक और द्वितीयक दोनों ही स्रोतों से तथ्यों का संकलन करता है। इस आलेख के प्राथमिक स्रोत के रूप में वे सभी फिल्में हैं जिनमें इंग्लैंड में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को प्रस्तुत किया गया है, तथा द्वितीयक स्रोत के अन्तर्गत वे सभी पठन सामग्रियाँ हैं जो डायसपोरा और प्रवासी भारतीयों को केंद्र में रखकर रची गयी हैं।

 

डायसपोरा : प्रवासी अध्ययन - ‘डायसपोरा’ शब्द, सामान्य अर्थ में, किसी भौगोलिक क्षेत्र के मूल निवासियों का किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र में प्रवास करने को संदर्भित करता है। वर्तमान समय में प्रवासियों के लिए इसी शब्द के इस्तेमाल का प्रचलन है जो मूल ग्रीक भाषा के शब्द ‘डायस्पिरिन’ से बना है जिसका मतलब होता है– बीजों का बिखराव। परंतु व्यापक तौर पर ‘डायसपोरा’ का शाब्दिक अर्थ ‘पीड़ा और हिंसा के विशिष्ट इतिहास’ से संबंधित है क्योंकि सर्वप्रथम इस शब्द का इस्तेमाल उन यहूदियों के लिए किया जाता था जिन्हे रोमन साम्राज्य द्वारा बलपूर्वक इस्राइल के बाहर भगा दिया गया था। धीरे-धीरे ‘डायसपोरा’ का अर्थ सार्वभौमिक और निरपेक्ष होता गया, और अब यह अपने मातृदेश से बाहर रहने वाले लोगों के समूह के लिए प्रयोग किया जाता है (स्कॉट, 2014, पृ. 173) 1।

 

पिछले दो दशकों में ‘डायसपोरा’ अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को एक बौद्धिक विमर्श के रूप में स्थापित करने में सफल रहा है। वर्तमान में किसी देश के आंतरिक और बाह्य दोनों ही प्रकार के प्रवासों की विविधता, जटिलता और प्रवाह से संबंधित सिद्धांतों का नवीन डायसपोरा अध्ययन अधिक तार्किक और विस्तृत रूप में विश्लेषण करता है। के. एच. करीम के अनुसार, ‘डायसपोरा’ की नवीन अवधारणा का संबंध किसी देश में प्रवास करने वाले उन शक्तिहीन सांस्कृतिक समुदायों से है जो सामाजिक और राजनैतिक रूप से उस देश में हाशिये पर हैं। यदि हम दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की ओर होने वाले प्रवास का इतिहास देखें तो ‘डायसपोरा’ का मुख्य संदर्भ उन अश्वेत लोगों से है जो मेजबान देश में एक पृथक अल्पसंख्यक समुदाय की तरह जीवन व्यतीत करते हैं (करीम, 2003, पृ. 2) 2।

 

भारतीय डायसपोरा की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति - प्रवास एक सार्वभौमिक घटना है। सिर्फ मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षी भी भोजन और आश्रय की तलाश में एक भौगोलिक सीमा से दूसरी भौगोलिक सीमा में प्रवास करते हैं। एक समुदाय के रूप में विकसित होने के साथ ही मानव-कबीलों का अपने उद्गम स्थान से दूसरे स्थान पर अस्थायी, पारिस्थितिक और स्थायी विस्थापन होते रहा है (जयराम, 2004, पृ. 15) 3। भारतीय प्रवासियों के इतिहास पर नजर डालें तो विदेश-प्रवास की प्रथा को भारत में स्थापित करने में बौद्ध भिक्षुओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है। परंतु आधुनिक भारत में विदेश-प्रवास का अधिकांशतः निर्धारण औपनिवेशीकरण और व्यापारिक योजनाओं ने किया है। वर्तमान वैश्विक युग में आवागमन और संचार के असीमित विकास से विदेश-प्रवास एक आम घटना बन चुका है। रोजाना ही कितने भारतीय शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और रोजगार आदि कारणों से दूसरे देशों में पहुंचते हैं (झेंग, 2010, पृ. 11) 4।

 

2020 में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय डायसपोरा का आकार 1 करोड़ 80 लाख लोगों का है जो किसी भी अन्य देश के डायसपोरा समुदाय से बड़ा है। भारतीय डायसपोरा की सबसे अधिक संख्या संयुक्त अरब अमीरात (35 लाख), अमेरिका (27 लाख) और सउदी अरब (25 लाख) में उपस्थित है। प्रवासी भारतीयों की सबसे खास बात यह है कि ये समूचे ग्लोब पर विद्यमान हैं (“ऐट 18 मिलियन”, 2021) 5।

 

अगर इंग्लैंड के संदर्भ में देखें तो ब्रिटेन में भारतीयों के प्रवास का इतिहास, मुख्य यूरोप में प्रवास के इतिहास से जो लगभग 1980 के दशक से शुरू होता है, से काफी पुराना रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के शुरुआती तीन दशकों में ब्रिटेन जाने वाले भारतीयों की संख्या में पहले की तुलना में तेज वृद्धि देखी गई। इन भारतीयों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में बहुत भिन्नता थी जिनमें अधिक संख्या श्रमिकों की थी और थोड़ी संख्या में संभ्रांत भारतीय, विद्यार्थी और प्रशासनिक कर्मचारी थे। भारत की आजादी के बाद शुरुआती दो दशक इंग्लैंड में रहने वाले भारतीयों के लिए काफी उथल-पुथल वाले थे। ये वो दौर था जब इंग्लैंड में नये-नये आए भारतीय इस देश में अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित और अनिश्चित थे। बहरहाल इन प्रवासी भारतीयों ने इंग्लैंड को ही अपना नया घर बनाने का निश्चय किया और अपने सगे-संबंधियों को भी वहाँ आकर बसने के लिए प्रेरित किया। 20वीं सदी के अंतिम दो-तीन दशकों में इन प्रवासी भारतीयों की दूसरी पीढ़ी, जो कि इंग्लैंड में ही जन्मी थी, वहाँ बहुत तेजी से उभरी। हालांकि इस युवा पीढ़ी के मूल्यों में भारतीय संस्कृति और ब्रिटिश संस्कृति दोनों का ही समावेश था। दो पूर्णतया विपरीत संस्कृतियों के प्रभाव से उत्पन्न मानसिक द्वंद ने तो शुरुआत में इन्हें काफी विचलित किया। यही कारण था कि तब के शिक्षाविदों और सिद्धांतकारों ने यह अनुमान लगाया था कि प्रवासी भारतीयों की यह नई पीढ़ी जल्द ही ब्रिटिश संस्कृति को पूरी तरह से अपनाकर भारतीय संस्कृति को अलविदा कह देगी परंतु ये युवा अपने बुजुर्गों से ज्यादा आत्मविश्वासी और परिपक्व निकले। भारतीय युवा प्रवासियों ने इंग्लैंड में प्रवासी भारतीयों के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया जिसके फलस्वरूप इंग्लैंड की सामाजिक संरचना सांस्कृतिक विविधता और बहुलवाद के लिए और भी उदार हुई। इस अर्थ में, 1980 के अंत तक एक बहुसांस्कृतिक, बहुधार्मिक और बहुनस्लीय देश के रूप में इंग्लैंड ने अपनी पहचान बनायी। वर्तमान में देखें तो वर्ष 2011 में इस देश में प्रवासी भारतीयों की कुल संख्या 14 लाख थी, जिनमें 6 लाख पंजाबी थे। इन 6 लाख पंजाबियों में भी 80% केवल सिख समुदाय के लोग हैं तथा शेष 20% में पंजाब से आए हिन्दू, मुसलमान और ईसाई समुदाय के लोग हैं (थांडी, 2015, पृ. 106-126) 6।

 

डायसपोरा के क्षेत्र में सिनेमा का योगदान - प्रवासी समुदायों के विभिन्न मुद्दों को लोगों से अवगत कराने में सिनेमा की भूमिका निर्णायक है। हालांकि सिनेमा को मुख्यतः मनोरंजन का साधन माना जाता है, परंतु बहुत से मूर्त-अमूर्त तथ्यों को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत एवं व्याख्यायित करने के लिए सिनेमा के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। इस अर्थ में सिनेमा लोगों के सामाजिक सृजन का भी साधन है। यह भी गौरतलब है कि अपने आरंभिक काल में सिनेमा को एक सम्मानित दर्जा नहीं प्राप्त था। भारत के कई विचारकों ने, जिनमें महात्मा गांधी भी शामिल थे, सिनेमा को व्यसन माना था। इन विचारकों का मत था कि सिनेमा लोगों में, खासकर युवाओं में, गलत प्रवृतियों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक निरंकुशता को बढ़ावा देता है। पर एक माध्यम के रूप में सिनेमा की चित्ताकर्षकता इतनी अधिक प्रभावी थी कि बाद में सामाजिक चिंतकों ने इसे एक सम्मानित कला माध्यम के रूप में ना केवल स्वीकार ही किया बल्कि समाज के विभिन्न पहलुओं को साक्षर और निरक्षर दोनों ही प्रकार के लोगों में वर्णित करने का एक सशक्त माध्यम माना (सदरलैंड एवं फेल्टी, 2010, पृ. 4-6) 7।

 

विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए भारतीय सिनेमा इसलिए और भी प्रासंगिक है क्योंकि यह उन्हे मातृभूमि से तो जोड़ता ही है और साथ ही एक अजनबी राष्ट्र और विजातीय संस्कृति के लोगों के बीच उन्हें आभासी एकजुटता का एहसास भी कराता है। इस अर्थ में फिल्मविद विजय मिश्र ने बॉलीवुड सिनेमा को एक ऐसे वाहन की संज्ञा दी है जो ग्लोबल को लोकल तक लाता है। विदेशों की दृष्टि से भारतीय फिल्मों, खासकर हिन्दी सिनेमा, का सबसे बड़ा बाजार इंग्लैंड में है। इंग्लैंड के सिनेमाघरों में नियमित रूप से हिन्दी फिल्मों का प्रदर्शन होता है। हम आपके हैं कौन (1994), दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995), कुछ कुछ होता है (1998) जैसी फिल्मों ने इंग्लैंड में सराहनीय व्यापार किया है। इन फिल्मों ने विदेशों में जिस तरह की सफलता अर्जित की उसने फ़िल्मकारों को प्रवासी भारतीयों को हिन्दी फिल्मों के एक बड़े लक्षित समूह के रूप में सम्मिलित करने के लिए प्रेरित किया जिसके फलस्वरूप ऐसी फिल्मों के निर्माण अधिक होने लगें जिनमें नायक या नायिका भारतीय डायसपोरा समुदाय के हों (मिश्र, 2002, पृ. 236-251) 8। उदाहरणस्वरूप, शाहरुख खान की परदेस (1997), कभी खुशी कभी गम (2001), कल हो ना हो (2003), कभी अलविदा ना कहना (2006) इस श्रेणी की सफल फिल्में हैं।

 

भारतीय फिल्मों में प्रवासी भारतीयों की प्रस्तुति सिर्फ नायक या नायिका के विदेश में रहने तक ही सीमित नहीं रही। वर्तमान में जब भारतीय सिनेमा विषय-वस्तु की प्रस्तुति में काफी परिपक्व हो चुका है तो यह कैसे मुमकिन हो सकता है कि भारतीय डायसपोरा के विभिन्न पहलू इससे अनछुए रह जाएँ। भारतीय सिनेमा में प्रवासियों से जुड़ी समस्याओं को दिखाने का काम हनीफ़ कुरैशी, गुरिन्दर चड्ढा, मीरा नायर और श्रीनिवास कृष्णा जैसे फ़िल्मकारों ने शुरू किया। हालांकि इनसे पहले संगम (1964), पूरब और पश्चिम (1970) और जीवन संगम (1974) जैसी इक्का-दुक्का हिन्दी फिल्मों में प्रवासी भारतीयों को प्रस्तुत किया गया था, परंतु बाद के फ़िल्मकारों ने प्रवासी भारतीयों को मेजबान देशों की सामाजिक संरचना के एक महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में दिखाया (मिश्र, 2002, पृ. 235-240)। मसाला (1991), मिसीसिपी मसाला (1991), भाजी ऑन द बीच (1994), बेन्ड इट लाइक बेकहम (2002), ब्राइड एण्ड प्रेजडिस (2004), द नेमसेक (2006) आदि कुछ ऐसी ही फिल्मों के नाम हैं जो प्रवासी भारतीयों के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को बड़े ही तथ्यपरक और भावुकता के साथ प्रस्तुत करती हैं।

 

इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों का सिनेमाई चित्रण - हिन्दी सिनेमा के लिए इंग्लैंड हमेशा से एक लुभावना विषय रहा है। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि लगभग 200 वर्षों तक इंग्लैंड का उपनिवेश होने की वजह से भारतीय दर्शक जितनी आसानी से इंग्लैंड से संबंधित कथावस्तु में रुचि रखते हैं, उतना किसी अन्य पश्चिमी देश से नहीं। यद्यपि अपने शुरुआती दौर में हिन्दी फिल्मों ने इंग्लैंड को एक विषय-वस्तु के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। सिनेमा के पर्दे पर हिन्दी फिल्मों का इंग्लैंड से जुड़ाव मात्र इतना ही था कि बहुत से फिल्मों की कहानियों में कुलीन नायक इंग्लैंड (विलायत) से पढ़ाई करके वापस अपने देश लौटते थे। देवदास (1955) और गंवार (1970) सरीखी फिल्में इस श्रेणी की प्रचलित उदाहरण हैं। इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों की सिनेमाई पर्दे पर उपस्थिति की शुरुआत मनोज कुमार की पूरब और पश्चिम (1970) की जबरदस्त सफलता से हुई।

 

पूरब और पश्चिम (1970) 9 - इंग्लैंड में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को हिन्दी सिनेमा के कथानक से जोड़ने वाली यह पहली फिल्म है, और इस अर्थ में पथ-प्रदर्शक है। कथानक की दृष्टि से पूरब और पश्चिम देशभक्ति की पृष्ठभूमि में एक पारिवारिक कहानी है जिसके निर्देशक, निर्माता और लेखक, तीनों ही, अनुभवी मनोज कुमार हैं। मनोज कुमार ने ही फिल्म के मुख्य नायक भारत का किरदार भी निभाया है। गुलाम भारत में एक स्वतंत्रता सेनानी अपने ही दोस्त हरनाम द्वारा किए गए धोखे के कारण मारा जाता है। जब देश आजाद होता है तो इस स्वतंत्रता सेनानी का बेटा भारत (नायक का नाम) जो अब व्यस्क हो चुका है अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के लिए इंग्लैंड जाता है जहां वह अपने पिता के बचपन के मित्र शर्मा के यहाँ ठहरता है। इंग्लैंड में भारत प्रवासी भारतीयों के जीवन में चल रहे सांस्कृतिक गतिरोध को नजदीक से देखता है तथा उनके जीवन से खो चुके भारतीय संस्कृति और परंपराओं को फिर से स्थापित करने का प्रयत्न करता है। इस क्रम में भारत और शर्मा की बेटी प्रीति (जो पूरी तरीके से पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में है) के बीच प्रेम संबंध स्थापित होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति का वास्तविक अनुभव कराने के लिए भारत प्रीति और उसके परिवार को भारत देश ले आता है। भारत आकार प्रीति को अपनी गलती का एहसास होता है, उसके मन में भारत देश और इसकी परंपराओं के लिए आदर और सम्मान पुनः जागृत होता है। अंततः वह पाश्चात्य संस्कृति को पूरी तरह से त्याग कर एक सच्ची भारतीय नारी की तरह जीवन व्यतीत करने का निर्णय लेती है। इस तरह फिल्म का मुख्य विषय भारतीय संस्कृति और पश्चिमी संस्कृति के विरोधाभासों पर केंद्रित है जिसमें अंत में भारतीय संस्कृति की विजय होती है।

 

फिल्म के अन्य पात्रों के रूप में इंग्लैंड में रहने वाले बहुत से प्रवासी भारतीयों को दिखाया गया है, और फिल्म की मुख्य नायिका प्रीति (शायरा बानो) उनमें से एक है। असल में नायक भारत भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि है तो नायिका प्रीति ब्रिटिश संस्कृति की। यह फिल्म दो तरह के प्रवासी भारतीयों को दिखाती है। एक है प्रवासी भारतीयों की पहली पीढ़ी जो अपनी मातृभूमि भारत देश को हमेशा के लिए छोड़कर इंग्लैंड में बस जाने के अपराध-बोध से ग्रसित है। इनके लिए अपने पुरखों, गाँव और अन्तःमन में गहरे तक बसी हुई भारतीय परंपराओं को भुला देना आसान नहीं है। इसलिए, इंग्लैंड में बस जाने के बाद भी यह पीढ़ी भारत देश की याद में उदास और मायूस रहती है। दूसरी तरह के प्रवासी भारतीय पहली पीढ़ी वालों की सन्तानें हैं या इन्हे प्रवासी भारतीयों की दूसरी पीढ़ी भी कह सकते हैं इन दूसरी पीढ़ी के प्रवासियों को भारतीय परम्पराएं दकियानूस, पिछड़ी और रूढ़ियों में जकड़ी दिखाई देती है। यह पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को भारतीय सभ्यता और संस्कृति से कहीं अधिक श्रेष्ठ समझती है।

 

प्रवासी भारतीयों की प्रस्तुति में पूरब और पश्चिम फिल्म में सबसे उल्लेखनीय बात यह है की यह फिल्म प्रवासी भारतीयों को बुराई के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित करती है। फिल्म के पर्दे पर जब भी प्रवासी भारतीय प्रकट होतें हैं उन्हें जुआ, शराब, चरस-गाँजा के साथ दिखाया जाता है। मर्द-औरतों के बीच के संबंध प्रेम की जगह वासना और जिस्मानी सुख से संचालित होते हैं। इस प्रकार से फिल्म पूरब और पश्चिम में प्रस्तुत प्रवासी भारतीय दिग्भ्रमित नजर आते हैं जो इंग्लैंड की चका-चौंध में अपने असली वजूद को भूल गए हैं। दो धूर विपरीत संस्कृतियों का द्वंद उनके जीवन में साफ नजर आता है। यद्यपि फिल्म में इंग्लैंड के मूल निवासी गोरों का चित्रण प्रवासी भारतीयों की तुलना में काफी सकारात्मक है। गोरों के मन में भारतीय परंपराओं के प्रति आदर है।

 

पूरब और पश्चिम की सफलता ने बहुत से फ़िल्मकारों को इंग्लैंड में रहने वालें प्रवासी भारतीयों को फिल्मी पर्दे पर उतारने के लिए प्रेरित किया। इस श्रेणी की सबसे सफल फिल्म आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्देशित दिलवाले दुल्हनियाँ ले जाएंगे (1995) है। इस फिल्म में भी प्रवासी भारतीयों को अपनी मातृभूमि की याद में प्रलाप करते दिखाया गया है जो अपने वतन लौटने के सपने को सच होते देखना चाहते हैं। इस प्रकार से अधिकतर हिन्दी फिल्में जो इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों का चित्रण करती हैं मुख्य रूप से दोनों देशों के सांस्कृतिक गतिरोध को ही प्रस्तुत करती हैं जिनमें अंत में भारतीय संस्कृति की विजय होती है। परंतु 2004 में प्रदर्शित आइ प्राउड टु बी एन इंडियन इंग्लैंड में रहने वालें प्रवासी भारतीयों के जीवन को बिलकुल ही अलग परिप्रेक्ष्य में दिखाती है।

 

आइ प्राउड टु बी एन इंडियन (2004) 10 -  इस शीर्षक का हिन्दी अनुवाद है- ‘मुझे एक भारतीय होने पर गर्व है’। यह मार-धाड़ वाली एक एक्शन फिल्म है जिसे भारतीय गौरव की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है। फिल्म के निर्देशक पुनीत सिरा हैं और इसका निर्माण सोहेल खान ने किया है। सोहेल खान ने ही मुख्य नायक का चरित्र भी निभाया है। फिल्म का मुख्य विषय इंग्लैंड के गोरे लोगों द्वारा प्रवासी भारतीयों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव पर आधारित है। संक्षेप में फिल्म की कहानी यह है कि एक स्वाभिमानी भारतीय युवा (फिल्म में मुख्य पात्र के नाम का सम्बोधन नहीं है) अपने पिता के साथ बड़े भाई की बेटी की शादी में शामिल होने के लिए लंदन पहुंचता है। लंदन आकर उसे पता चलता है कि यहाँ के चरमपंथी अंग्रेजों का एक समूह भारतीय लोगों को प्रताड़ित करते रहता है। जब ये अंग्रेज चरमपंथी इस युवा की भाभी को घेरते और बेआबरू करते हैं तो वह इस घटना का अकेले ही प्रतिकार करता है जिसमें गोरे चरमपंथियों से उसकी हिंसक मुठभेड़ होती है। कई सारे नाटकीय घटनाक्रमों के बाद अंततः इस भारतीय युवा की इन चरमपंथियों से निर्णायक लड़ाई होती है जिसमें वह उनके सरगना को हरा कर यह साबित करता है कि एक भारतीय का बल और पौरुष किसी अंग्रेज से कम नहीं है।

 

आइ प्राउड टु बी एन इंडियन का कथानक पूरी तरह से इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों पर केंद्रित है जिसमें लंदन शहर में रहने वाले एशियाई मूल के लोगों के साथ होने वाले नस्लीय हिंसा को दिखाया गया है। दूसरी फिल्मों की तरह यह फिल्म भारत बनाम पाश्चात्य संस्कृति के गतिरोध का विषय नहीं उठाती बल्कि गोरे अंग्रेजों के बीच रहते हुए प्रवासी भारतीयों की रोजमर्रा से संबंधित संकटों का विषय उठाती है। यह फिल्म दर्शाती है कि पराए देश में किस तरह भारतीयों को निम्न नस्ल का समझा जाता है, यहाँ तक कि अक्सर उन्हे अंग्रेज चरमपंथियों द्वारा की गई हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। उन्हें अक्सर गोरों की श्रेष्ठता को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाता है। अंग्रेज चरमपंथी उन्हें अक्सर परेशान करते हैं। यदि वे अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो इसका परिणाम भयानक हिंसा में तब्दील होता है जिसमें भारतीयों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है।

 

इस अर्थ में यह फिल्म दर्शाती है कि इंग्लैंड में रहने वाले भारतीयों की समस्या सिर्फ सांस्कृतिक गतिरोध या वतन की याद ही नहीं है बल्कि भय भी है। परदेश में जीने के लिए उन्हें अपने स्वाभिमान और गरिमा से समझौता करना पड़ता है, उन्हें उस देश में गौण नागरिक और तुच्छ नस्ल का समझा जाता है।

प्रवासी भारतीयों के जीवन से जुड़े एक गंभीर मुद्दे को प्रस्तुत करने के बावजूद आइ प्राउड टु बी एन इंडियन फिल्म को व्यावसायिक सफलता नहीं मिली।

 

रामजी लंदनवाले (2005) 11- यह एक हास्य-प्रधान फिल्म है जिसे भौतिक सुख बनाम मानवीय मूल्यों की पृष्ठभूमि में दर्शाया गया है। फिल्म के निर्देशक संजय डायमा हैं तथा मुख्य भूमिका में आर. माधवन और समिता बंगार्गी हैं। फिल्म की संक्षिप्त कहानी यह है कि बिहार के एक छोटे से गाँव का बावर्ची रामजी पैसे कमाने के लिए लंदन आता है। लंदन पहुंचते ही उसे पता चलता है कि वह जिस मालिक के यहाँ काम करने आया था उसकी मृत्यु हो चुकी है। जिसके कारण रामजी के सामने लंदन में रुकने और जीविका कमाने का संकट खड़ा हो जाता है। दुर्भाग्यवश उसका पासपोर्ट और वर्किंग वीजा भी चोरी हो जाता है। अचानक से उसकी मुलाकात लंदन में रहने वाले एक दंपति से होती है जो वहाँ अपना रेस्तरां चलाते हैं। रामजी उनके रेस्तरां में बावर्ची की नौकरी करने लगता है। परंतु जल्द ही स्थानीय पुलिस को इस बात का शक हो जाता है कि रामजी के पास लंदन में रहने और कमाने के लिए जरूरी कानूनी कागजात नहीं है। ऐसे में पुलिस और सजा से बचने का एक ही उपाय है कि रामजी की शादी इंग्लैंड के किसी वैध नागरिक से करा दी जाए। इसलिए उस रेस्तरां का मालिक गुरु और उसका वकील दोस्त जय रामजी की शादी भारतीय मूल की लड़की समीरा से करा देते हैं जो जय की मंगेतर भी है। इमिग्रेशन अधिकारियों को यह शादी वास्तविक लगे इसके लिए रामजी और समीरा को असली पति-पत्नी होने का झूठा नाटक करना पड़ता है। शुरुआत में तो इस शादी का एकमात्र उद्देश्य रामजी और गुरु को कानूनी पचड़े से बचाना होता है। परंतु धीरे-धीरे रामजी और समीरा के बीच नजदीकियाँ बढ़ने लगती है। समय के साथ रामजी की वजह से समीरा को पता चलता है कि उसका प्रेमी जय एक धोखेबाज है, वह तलाकशुदा और एक बच्चे का बाप है। समीरा जय के साथ अपने सभी संबंध समाप्त कर लेती है, उसके मन में रामजी के प्रति आदर और प्रेम बसने लगता है। इसी बीच रामजी लंदन में होने वाले बावर्चियों की प्रतियोगिता का विजेता बन जाता है। जैसे ही रामजी के जीवन में सबकुछ अच्छा होते दिखता है, दुर्भाग्य से अपने भोलेपन में वह इमिग्रेशन अधिकारियों को यह बात बता देता है कि उसकी और समीरा की शादी असली नहीं है। फलस्वरूप इंग्लैंड में अवैध रूप से रहने के जुर्म में स्थानीय पुलिस उसे तत्काल हिरासत में ले लेती है और भारत वापस भेजने का प्रबंध करने लगती है। अंतत: पुलिस और स्थानीय अधिकारियों को यह बात पता चल जाती है कि रामजी वास्तव में वैध रूप से लंदन आया था, दुर्भाग्य से उसके कागजात चोरी हो गए हैं। पुलिस उसे एक सम्मानित प्रवासी के रूप में रिहा करती है। परंतु तब तक रामजी भारत लौटने का दृढ़ निश्चय कर चुका होता है। उसकी खुशी लंदन की परिष्कृत जिंदगी की जगह अपने गाँव वापस लौटने में है। समीरा भी रामजी के साथ भारत आ जाती है जहां दोनों पति-पत्नी के रूप में एक खुशहाल जीवन व्यतीत करते हैं।

 

रामजी लंदनवाले इस बात को बखूबी दिखाती है कि जब भारत के दूरस्थ गाँव का एक साधारण व्यक्ति पहली बार इंग्लैंड जाता है तो उसे किन संकटों का सामना करना पड़ता है। नई जगह, नए लोग, नई भाषा और नए मूल्यों के बीच तुरंत सामंजस्य स्थापित करना ही वह सबसे बड़ी चुनौती है जिससे हर प्रवासी भारतीय अपनी पहली विदेश यात्रा पर जूझता है।

 

यह फिल्म इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों से संबंधित जिस संवेदना को सबसे अधिक दर्शाती है वह है उनके पारस्परिक संबंधों में आत्मीयता की कमी। भले ही लंदन में रहने वाले भारतीयों के पास अच्छा घर है, अच्छा रोजगार है, काफी पैसा है, परंतु उनके जीवन में सच्चे प्रेम की घोर कमी है। भौतिकता के पीछे भागते-भागते ये भारतीय आत्मीयता को भूल चुके हैं, इसलिए जब कोई इनके साथ सच्चे दिल से आत्मीय लगाव दिखाता है तो ये असहज हो जाते हैं। शायद यही कारण है कि रामजी, जो भारत में रहने के कारण मानवीय आत्मीयता से भरपूर है, से मिलने के बाद गुरु का बीमार बेटा ठीक होने लगता है।

 

रामजी लंदनवाले फिल्म की सबसे खास बात यह है कि अन्य फिल्मों की तरह यह भारत बनाम इंग्लैंड का कथानक नहीं प्रस्तुत करती है बल्कि यह बताती है कि दोनों देशों की संस्कृतियों में ही अच्छाई और बुराई साथ-साथ है। यहाँ ना ही आदर्श भारत की परिकल्पना है और ना ही भारत विरोधी इंग्लैंड की। यही कारण है कि लंदन में रहते हुए रामजी के विचारों में भारतीय नैतिक मूल्यों के साथ-साथ पाश्चात्य प्रगतिशीलता भी दृष्टिगोचर होती है। प्रतियोगिता में जीते हुए पैसों से वह अपने गांव के बच्चों के लिए अंग्रेजी स्कूल खोलना चाहता है, शायद लंदन में रहने के बाद वह इस विदेशी भाषा की प्रासंगिकता को बेहतर समझ चुका है। इस प्रकार से फिल्म में रामजी ही वह पूल है जिसपर से होकर दोनों देशों की अच्छी बातें एकसाथ आवागमन करती हैं।

 

नमस्ते लंदन (2007) 12-  यह फिल्म एक पारिवारिक प्रेम-कहानी है जिसकी पृष्ठभूमि भारत और इंग्लैंड के बीच का सांस्कृतिक टकराव है। फिल्म के निर्माता-निर्देशक विपुल अमृतलाल शाह, नायक अक्षय कुमार और नायिका कैटरीना कैफ हैं। संक्षेप में फिल्म की कहानी यह है कि मनमोहन मल्होत्रा अपनी पत्नी और युवा बेटी जसमीत के साथ लंदन में रहता है। उसके जीवन की एकमात्र इच्छा यही है कि उसकी बेटी की शादी किसी भारतीय से हो। सुयोग्य वर की तलाश में वह अपने गाँव भारत आता है जहां उसकी मुलाकात अपने मित्र के बेटे अर्जुन से होती है। वह जसमीत की शादी अर्जुन से करना चाहता है जबकि जसमीत यह शादी नहीं करना चाहती। मनमोहन अपनी बेटी जसमीत पर दबाव बनाकर उसकी शादी अर्जुन से करा देता है। जसमीत एक ही शर्त पर इस शादी के लिए तैयार होती है कि भले वह अपनी शादी भारत देश के एक छोटे से गाँव में कर रही है पर वह अपनी सुहागरात लंदन में मनाएगी। अर्जुन इस शर्त को मान लेता है और शादी के अगले ही दिन जसमीत के परिवार के साथ लंदन आ जाता है। लंदन में जसमीत उसे बताती है कि वह इस शादी को नहीं मानती क्योंकि यह शादी उसकी मर्जी के खिलाफ हुई है। वह अपने अंग्रेज प्रेमी चार्ली से शादी करना चाहती है। अर्जुन जसमीत और चार्ली की शादी तक लंदन में रुकने का निर्णय करता है। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता है अर्जुन और जसमीत एक-दूसरे के नजदीक आने लगते हैं, जसमीत अर्जुन को पसंद करने लगती है। बहुत सारे घटनाक्रमों के बाद अंततः जसमीत को यह एहसास होता है कि जहां चार्ली का प्रेम शारीरिक वासना पर केंद्रित है वहीं अर्जुन का प्रेम निस्वार्थ भावना पर। परिणाम स्वरूप वह शादी वाले दिन शादी के मंडप से अर्जुन के साथ भाग जाती है। अर्जुन और जसमीत एक खुशहाल नवदंपती बनकर भारत लौट आते हैं। इन सारे घटनाक्रमों के बीच यह फिल्म भारत और इंग्लैंड के सांस्कृतिक गतिरोध को बखूबी दिखाती है। एक ओर नायिका जसमीत ब्रिटिश संस्कृति का प्रतीक है तो नायक अर्जुन भारतीय संस्कृति का।

 

प्रवासी भारतीयों के चित्रण में यह फिल्म पहली पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी के बीच पारिवारिक मूल्यों के टकराव को बड़े ही भावनात्मक रूप से दिखाती है। एक ओर प्रवासी भारतीयों की पहली पीढ़ी इस बात से चिंतित है कि उनकी संतानें भारतीय मूल्यों और परंपराओं को पूरी तरीके से भूल चुकी हैं, वे अपने बच्चों को ब्रिटिश संस्कृति के प्रभाव में आने से रोकने का हरसंभव प्रयास करते हैं, तो वही दूसरी ओर इंग्लैंड में ही जन्मी उनकी युवा सन्तानें यह मानती हैं कि उनके माँ-बाप दकियानूसी विचारों वाले हैं तथा उनकी व्यक्तिगत आजादी के खिलाफ हैं। इस अर्थ में नमस्ते लंदन सिर्फ भारत और इंग्लैंड के सांस्कृतिक गतिरोध या वतन की याद को ही नहीं दिखाती बल्कि प्रवासी भारतीयों के पारिवारिक समस्या को भी दिखाती है। सांस्कृतिक गतिरोध से उत्पन्न इस पारिवारिक समस्या के कारण इंग्लैंड में रहने वाले भारतीयों के घरों में सभी सदस्यों के बीच सामंजस्य का घोर अभाव साफ-साफ नजर आता है।

 

निष्कर्ष : हिन्दी सिनेमा उन दर्शकों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है जो कभी इंग्लैंड नहीं गए हैं या इंग्लैंड में रहने वाले भारतीयों से साक्षात रूबरू नहीं हुए है। ऐसे दर्शकों के मानस में इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों से संबंधित छवि का निर्माण हिन्दी सिनेमा के माध्यम से होता है। उपरोक्त चार फिल्मों के विश्लेषण के बाद यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों को प्रस्तुत करते समय भारत के राष्ट्रीय गौरव की पृष्ठभूमि मजबूती से रखने का कार्य करता है।

 

इंग्लैंड के प्रवासी भारतीयों को प्रस्तुत करते समय ये फिल्में मुख्य रूप से लंदन शहर में रहने वाले भारतीयों के सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर केंद्रित होती हैं। इन चार फिल्मों में से रामजी लंदनवाले को छोड़कर बाकी तीन फिल्में यह दर्शाती हैं कि इंग्लैंड में रहने वाले भारतीय अपनी मातृभूमि को हमेशा के लिए छोड़ आने के अपराध बोध से ग्रसित हैं। प्रवासी भारतीयों से जुड़े तथ्य जो चारों फिल्मों में कमोबेश नजर आते हैं वे हैं उनके जीवन में सांस्कृतिक गतिरोध, पराए देश में असुरक्षा की भावना, माता-पिता तथा बच्चों के बीच मूल्यों का टकराव, उनके व्यक्तिगत संबंधों में पारस्परिक आत्मीयता की कमी और अति भौतिकवादी हो जाने से उनके जीवन में संवेदनाओं का अभाव।

 

संदर्भ :
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8.विजय मिश्र: बॉलीवुड सिनेमा टेम्पलस ऑफ डिज़ाइअर, रूटलेज, लंदन, 2002.
9.पूरब और पश्चिम : मनोज कुमार द्वारा निर्देशित, मनोज कुमार, शायरा बानो, प्राण, अशोक कुमार आदि द्वारा अभिनीत एवं मनोज कुमार द्वारा निर्मित फिल्म, 1970.
10.आइ प्राउड टु बी एन इंडियन: पुनीत सिरा द्वारा निर्देशित, सोहेल खान, हिना तस्लीम, आसिफ शेख, कुलभूषण खरबन्दा आदि द्वारा अभिनीत एवं सोहेल खान द्वारा निर्मित फिल्म, 2004.
11.रामजी लंदनवाले : संजय डायमा द्वारा निर्देशित, आर. माधवन, समिता बंगार्गी, अखिलेन्द्र मिश्र, सतीश शाह आदि द्वारा अभिनीत एवं सुनंदा मुरली मनोहर द्वारा निर्मित फिल्म, 2005.
12.नमस्ते लंदन: विपुल अमृतलाल शाह द्वारा निर्देशित, अक्षय कुमार, कैटरीना कैफ, ऋषि कपूर, उपेन पटेल आदि द्वारा अभिनीत एवं विपुल अमृतलाल शाह द्वारा निर्मित फिल्म, 2007.
 
आकाश कुमार
शोधार्थी
गांधी विचार एवं शांति अध्ययन केंद्र, गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर
 
 
 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-41, अप्रैल-जून 2022 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादव, चित्रांकन : सत्या कुमारी (पटना)

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