शोध आलेख : हिंदी कविता में आधुनिकता का प्रवेश-द्वार : द्विवेदी युग / प्रीति राय

हिंदी कविता में आधुनिकता का प्रवेश-द्वार : द्विवेदी युग
- प्रीति राय
शोध-सार : द्विवेदी युगीन कविता विषय, भाषा, छंद और काव्य-रूप आदि के स्तर पर आधुनिक खड़ी बोली हिंदी कविता के लिए प्रस्थान बिंदु है। यह नवजागरण और आधुनिक राष्ट्रीयता के अतिरिक्त स्वच्छंद मनोभावों का काव्य है। रीतिकालीन शास्त्रबद्धता, रूढ़ियों, स्त्रियों व प्रकृति से संबंधित रूढ़ मान्यताओं से कविता पहले-पहल इसी काल में मुक्त होती है। काव्य-भाषा के तौर पर खड़ी बोली के स्वरूप-निर्धारण और विकास का श्रेय भी इसी कालखंड को है। द्विवेदी युग में छंद-प्रयोग की विविधता भी हमें अचंभित करती है, विशेषकर खड़ी बोली के संदर्भ में। इस युग में सभी काव्य-रूपों का सफल प्रयोग हुआ है। यद्यपि इस युग की अधिकांश कविता में कलात्मक श्रेष्ठता और सूक्ष्मता नहीं है, किन्तु राष्ट्र के उद्बोधन, जागरण, सुधार और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के अद्भुत सामर्थ्य एवं खड़ी बोली के स्वरूप-निर्माण और संस्कार के कारण हिंदी-कविता के इतिहास में द्विवेदी युग का अवमूल्यन नहीं किया जा सकता। द्विवेदी युगीन हिंदी कविता ने आधुनिक हिंदी कविता के प्रारंभिक युग की भूमिका को बखूबी निभाया है। द्विवेदी युग की कई काव्य-प्रवृत्तियों का कालांतर में गुणात्मक विकास भी हुआ, साथ ही अनेक काव्य-प्रवृत्तियों का नवोन्मेष भी।
 
बीज-शब्द : द्विवेदी-युग, आधुनिकता, प्राचीनता, मध्यकालीन, इहलौकिक, पारलौकिक,इतिवृत्तात्मकता, स्थूलता, पुनर्जागरण, नवजागरण, तार्किकता, प्रश्नाकुलता,मानवता, राष्ट्रीय स्वाधीनता, समाज-सुधार, फ्रांस की क्रांति, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व, 1857, भक्ति, रीति, स्वच्छंदतवादी काव्यधारा, राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा।
 
मूल आलेख : ‘आधुनिक’ शब्द दो अर्थों– प्राचीन और मध्यकाल से भिन्नता और नवीन इहलौकिक दृष्टिकोण की सूचना देता है। मध्यकाल अपने अवरोध, जड़ता और रूढ़िवादिता के कारण स्थिर और एकरस हो चुका था, एक विशिष्ट ऐतिहासिक प्रक्रिया ने उसे पुनः गत्यात्मक बनाया। प्राचीन और मध्यकालीन जड़ता से मुक्ति आधुनिक कविता का प्रमुख लक्षण है। आधुनिक काल का नवजागरण से गहरा संबंध रहा है। विश्व की प्रत्येक सभ्यता-संस्कृति नवजागरण के माध्यम से ही आधुनिक काल में प्रवेश करती है। प्रायः नवजागरण दो पूर्णतः भिन्न संस्कृतियों के आपसी टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक सांस्कृतिक ऊर्जा का परिणाम होता है। भारत के संदर्भ में पुनर्जागरण अथवा नवजागरण 19वीं शताब्दी से, नई यूरोपीय वैज्ञानिक संस्कृति और सनातन भारतीय संस्कृति की टकराहट के फलस्वरूप प्रारंभ होता है। सम्पूर्ण विश्व में आधुनिक काल वैज्ञानिक भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक अवधारणाओं पर आश्रित होकर आया है। आधुनिक सभ्यता और साहित्य तार्किकता पर आधारित है। किसी भी घटना या परिणाम के पीछे कार्य-कारण संबंधों की पड़ताल की प्रवृत्ति भी आधुनिक होने का प्रमाण है। मनुष्य कीप्रश्नाकुलता अथवा प्रश्नाकुल मनुष्य आधुनिकता की प्रमुख विशेषता है। आधुनिक सभ्यता और साहित्य में पारलौकिकता के स्थान पर इहलौकिकता को महत्त्व मिलता है। आधुनिक काल में साहित्य से लेकर दर्शन तक मानव ही चिंतन के केंद्र में स्थान पाता है। भावों के साथ-साथ विचारों की प्रधानता आधुनिक कविता की विशेषता है। मुक्ति की कामना अर्थात् स्वातंत्र्य-चेतना भी आधुनिकता और तत्संबंधी कविताओं का प्रमुख स्वर है। भारतीय नवजागरण के दो प्रमुख लक्षण हैं– राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्राप्ति और समाज-सुधार। आधुनिक हिंदी कविता में इन दोनों ही धाराओं को रेखांकित किया जा सकता है। फ़्रांस की क्रांति का विश्वविख्यात नारा– स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व दुनियाभर में आधुनिकता का पर्याय और आधुनिक काल के आगमन के लिए बुनियादी शर्त बना।
 
            आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उपरोक्त प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए, हिंदी साहित्य में आधुनिक काल की शुरूआत संवत् 1900(1843 ई०) से माना है। वे ‘गद्य साहित्य के आविर्भाव’ को आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्ति मानते हैं और गद्य-रचना के कारण ही आधुनिक काल को मध्यकाल से अलग करते हैं। किन्तु कई वामपंथी आलोचकों, जिनमें रामविलास शर्मा प्रमुख हैं, ने 1857 ई. के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से आधुनिक काल की शुरूआत माना है। यह ठीक भी है। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारत में आधुनिकता का प्रवेश द्वार है। भारतीय इतिहास में 1857 का व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्त्व है। आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रथम चरण ‘भारतेंदु युग’ के नाम से जाना गया। इस युग के गद्य में तो आधुनिक प्रवृत्ति स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है लेकिन पद्य मध्यकालीन विषय– भक्ति और रीति– और भाषा से मुक्त न हो सकी। कविता में आधुनिक काल का वास्तविक आगमन द्विवेदी युग (1900-1918 ई.) से माना जाता है। द्विवेदी युगीन कविताएँ आधुनिक होने की प्रायः सभी शर्तों पर खड़ी उतरती हैं। द्विवेदी युग में कविता भी मध्यकालीन विषय-वस्तु और भाषा के केंचुल उतार फेंकती है। मध्ययुगीन रीतिवादी काव्य-प्रवृत्तियों का रचनात्मक विरोध द्विवेदी युगीन कविता का प्रमुख स्वर है। द्विवेदी युग आधुनिक हिंदी कविता का प्रस्थान बिंदु है जो भारतीय परंपरा के धवल पक्षों से जुड़ती और स्याह पक्षों से जूझती हुई आगे बढ़ती है। द्विवेदी युगीन कवि यदि एक ओर भारतीय परंपरा के सार्वभौमिक और सार्वकालिक प्रगतिशील मूल्यों को ग्रहण करते हैं तो वहीं दूसरी ओर रूढ़ और प्रतिगामी मूल्यों को त्याग देते हैं। द्विवेदी युगीन हिंदी कविता सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा से प्रेरणा ग्रहण करती हुई नवीन परंपरा की नींव डालती है जिस पर कालांतर में आधुनिक हिंदी कविता का विशाल महल खड़ा होता है।
           
द्विवेदी युग में हिंदी कविता की तीन प्रमुख दृष्टिगोचर होती है –
  1. स्वच्छंदतावादी काव्यधारा
  1. राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा
  1. ब्रजभाषा काव्य
 
    ब्रजभाषा काव्य का श्रेष्ठतम रूप जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ में मिलता है। अन्य उल्लेखनीय कवि हैं– सत्यनारायण कविरत्न, लाला भगवानदीन, राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’ आदि। इस धारा की कविता के बारे में रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं– “द्विवेदी-युग जब अपने पूरे वैभव पर था, उस समय भी ब्रजभाषा काव्य की एक धारा चली आ रही थी जिसमें भक्ति और रीति-काव्य के अवशिष्ट संस्कार देखे जा सकते हैं।”[1]
     
    जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ ने ‘उद्धव शतक’ नामक ब्रजभाषा की क्लासिक कृति की रचना की है। इसके अलावा ‘गंगावतरण’ भी उन्हीं की रचना है। उन्होंने पोप के ‘एसे ऑन क्रिटिसिज़्म’ का अनुवाद ब्रजभाषा में ही ‘समलोचनादर्श’ नाम से किया है। द्विवेदी युग की यह काव्य-धारा ब्रजभाषा काव्य-परंपरा में नए अध्याय अवश्य जोड़ती है, किन्तु आधुनिक हिंदी कविता के विकास में इसका योगदान नगण्य है।
     
    द्विवेदी युग की स्वच्छंदतावादी काव्य-धारा के प्रमुख कवि हैं– श्रीधर पाठक, मुकुटधर पांडेय, लोचनप्रसाद पांडेय, रूपनारायण पांडेय तथा रामनरेश त्रिपाठी। स्वच्छंदतावादी काव्य-कृतियों में श्रीधर पाठक की अनूदित रचना– ‘एकांतवासी योगी’, ‘श्रांत पथिक’, ‘उजड़ ग्राम’; उन्हीं की मौलिक रचना– ‘कश्मीर-सुषमा’, ‘वनाष्टक’ एवं ‘सांध्य-अटन’ आदि; रामनरेश त्रिपाठी की काव्य-कृति ‘मिलन’, ‘पथिक’ और ‘स्वप्न’; तथा मुकुटधर पांडेय की रचना– ‘पूजाफूल’ तथा ‘कानन-कुसुम’ प्रमुख हैं। स्वच्छंदतावाद की प्रमुख विशेषताओं में हैं– प्रकृति-पर्यवेक्षण, प्रेम का स्वच्छंद भंगिमाओं में चित्रण, कथा-गीत या बैलेड का प्रयोग और काव्य-भाषा के रूप में खड़ी बोली की स्वीकृति। सबसे बड़ी बात यह है कि इस स्वच्छंदतावादी काव्य-धारा ने जीवन से लगाव की एक भूमिका तैयार की जो आगे चलकर छायावाद में और गहरी हो जाती है। स्वच्छंदतावादी कवि कविता को ईश्वर की सत्ता और राजदरबार से निकालकर विशुद्ध मानवीय धरातल पर ले आते हैं। अब कविता वर्तमान आम जन-जीवन से जुड़ती हुई प्रतीत होती है। इसे शास्त्र की रूढ़िबद्धता से मुक्ति और लोक-जीवन से जुड़ाव के तौर पर भी देखा जा सकता है। द्विवेदी युग की स्वच्छंदतावादी काव्य-प्रवृत्ति की इस विशेषता का अंग्रेजी साहित्य से तुलना करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं- “काव्य को पांडित्य की विदेशी रूढ़ियों से मुक्त और स्वच्छंद काउपर(Cowper) ने किया था, पर स्वच्छंद होकर जनता के हृदय में संचरण करने की शक्ति वह कहाँ से प्राप्त करे, यह स्कॉटलैंड के किसानी झोंपड़े में रहने वाले कवि बर्न्स (Robert Burns) ने ही दिखाया था।”[2]
 
    ठीक यही प्रवृत्ति हिंदी के स्वच्छंदतावादी कवियों– श्रीधर पाठक, मुकुटधर पांडेय और रामनरेश त्रिपाठी– की कविताओं में दिखती है। द्विवेदी युग की यह काव्य-धारा और अधिक विकसित होकर छायावाद में परिणत हो जाती है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसी को लक्ष्य करके लिखा है- “इन्हीं(स्वच्छंदतावादी) और इन्हीं जैसे अनेक कवियों ने उस महान वैयक्तिकता-प्रधान काव्य की भूमि तैयार की, जिसे छायावाद कहा जाता है और जो आज हिंदी कविता का गौरव स्वीकार किया जाने लगा है।”[3]
     
    स्वच्छंदतावादी कवि प्रकृति और प्रेम के अतिरिक्त देशभक्ति गीतों की भी रचना करते थे। इन कवियों की रचनाएँ देशप्रेम, प्रकृति, प्रेम आदि की समन्वित अभिव्यक्ति है। श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी की देशभक्ति की धारा मैथिलीशरण गुप्त से होते हुए गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आदि तक जाती है। स्वदेश भक्ति की जो भावना भारतेंदु के समय से चली आती थी उसे सुंदर कल्पना द्वारा रमणीय और आकर्षक रूप त्रिपाठी जी और श्रीधर पाठक ने ही प्रदान किया।
 
      देशभक्ति और समाज-सुधार नवजागरण का प्रमुख लक्षण है। आधुनिक हिंदी कविता अपने प्रारंभिक दौर में देशभक्ति और समाज-सुधार की भावना से संपृक्त थी। इसे राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्य-धारा के वर्ग में रखकर समझा जा सकता है। इस धारा के कवियों में प्रमुख हैं– अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, नाथूराम शंकर शर्मा, रामचरित उपाध्याय आदि। इस धारा के कवियों का स्वर भले ही स्वच्छंदतावादी कवियों से भिन्न हो लेकिन सामान्य मानवीय जीवन से जुड़ाव, देश-काल व वातावरण से गहरी संपृक्तता, परतंत्रता का विरोध और स्वातंत्र्य-चेतना आदि के स्तर पर रोमांटिक और क्लासिक काव्य-धारा आपस में एक-दूसरे से जुड़ते हैं। मैथिलीशरण गुप्त तो कविता को मनोरंजन का पर्याय समझने की प्रवृत्ति का सीधे-सीधे विरोध करते हैं– 
 
“केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए
क्यों आज ‘रामचरितमानस’ सब कहीं सम्मान्य है?
सत्काव्य-युत उसमें परम आदर्श का प्राधान्य है।”[4]
 
      मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ तो राष्ट्रीय-चेतना को प्रस्फुटित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह भारतीयों के नवजागरण कालीन मानसिकता का परिचायक है। ‘भारत-भारती’ में गुप्त जी ने ब्रिटिश शासन की आलोचना और विरोध करने से पूर्व भारतीय जनता को स्वमूल्यांकन के लिए प्रेरित किया है –
 
“हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी
आओ, विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।”[5]
     
अब तक के विश्लेषण से स्पष्ट है कि द्विवेदी युग विषयों की नवीनता और विविधता के लिए विख्यात है। अब कविता भक्ति और रीति की सीमा में नहीं बँधती। यह उचित ही है क्योंकि जब साहित्य सामान्य जन-जीवन से जुड़ता है तब जीवन के विविध आयाम साहित्य में स्थान पाते हैं। नवीन विषयों के अतिरिक्त द्विवेदी युगीन कवियों ने प्राचीन और पारंपरिक विषयों में भी नई भाव-भंगिमाएँ भरीं। इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’। उन्होंने सूर की राधा का चरित्र-विस्तार किया। ‘प्रियप्रवास’ में राधा पूर्णतः विरहिणी ही नहीं हैं। राधा अपने निजी दु:ख को सारे समाज के दु:ख में विलीन कर देती है और समाज-सेवा का व्रत लेती हैं। शताब्दियों से चले आते राधा के चरित्र में यह एक सर्वथा नई भंगिमा ‘हरिऔध’ ने उकेरी है।
     
द्विवेदी युग में प्रकृति को देखने का नजरिया परिवर्तित हो जाता है। रीतिकाल की तरह प्रकृति को उद्दीपन विभाव मानकर चित्रित करने की परंपरा पर विराम लगा। अब प्रकृति को आलंबन-रूप में देखा जाने लगा। और तो और स्वच्छंदतावादी कवियों के साथ-साथ ‘हरिऔध’ जैसे पारंपरिक कवि ने प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया है जो आगे चलकर छायावाद की प्रमुख विशेषता बनी। उदाहरण द्रष्टव्य है –
 
“दिवस का अवसान समीप था।
गगन था कुछ लोहित हो चला।।
तरु-शिखा पर थी अब राजती।
कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा।।”[6]
           
द्विवेदी युग का प्रकृति-संबंधी यह परिवर्तित दृष्टिकोण आधुनिक हिंदी कविता की प्रमुख विशेषता है जिसका उत्तरोत्तर विकास हुआ।
           
द्विवेदी युग में नारी-प्रश्न पर विचार करने की परंपरा का सूत्रपात हुआ। नारी-जीवन की समस्याओं– बाल-विवाह, विधवा पुनर्विवाह, बहु-विवाह प्रथा आदि– पर विचार तो भारतेंदु युग में भी हुआ। किन्तु समाज में स्त्रियों की भूमिका पर सर्वप्रथम विचार द्विवेदीयुगीन कवि मैथिलीशरण गुप्त ने किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘कवियों की उर्मिला-विषयक उदासीनता’ से प्रेरित होकर ‘साकेत’ जैसे महाकाव्य की रचना की। इतिहास द्वारा उपेक्षित नारी-चरित्र उर्मिला के अतिरिक्त गोपा (‘यशोधरा’) के महत्त्व व उनकी प्रासंगिकता का विवेचन गुप्त जी का उद्देश्य था। इन चरित्रों के माध्यम से गुप्त जी समाज में सामान्य स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हैं। गुप्त जी की ‘अबला’ नारी महादेवी वर्मा के यहाँ ‘नीर भरी दु:ख की बदली’ के समान अपनी करुण कहानी सुनाती हुई कृष्णा सोबती की ‘मित्रो’ और उससे भी आगे पहुँच चुकी है। आज नारीवादी साहित्य हिंदी साहित्य की प्रमुख धारा है। निश्चय ही इसका प्रस्थान बिंदु द्विवेदी युग विशेषतः मैथिलीशरण गुप्त एवं ‘हरिऔध’ आदि की कविताएँ हैं।
           
 
प्रश्नाकुलता जो आधुनिक होने का प्रमाण है, द्विवेदी युग में यह प्रवृत्ति बहुतायत से पाई जाती है। स्वच्छंदतावादी कवियों में प्रकृति के प्रति जिज्ञासा तो दिखती ही है, इस युग में ईश्वर की अवधारणा को भी सीधी चुनौती दी गई है। ईश्वर की सत्ता को शक की निगाह से देखना तथाकथित आधुनिक मनुष्य की पहचान बन गया है। आधुनिक काल में मनुष्य सम्पूर्ण रचना और चिंतन के केंद्र में है, ईश्वर अब व्यक्तिगत आस्था का विषय है, चित्रण का नहीं। इस दृष्टिकोण की पहली सशक्त उद्घोषणा ‘प्रियप्रवास’ के रचना-विधान में तो मिलती ही है, कृति की लंबी भूमिका में भी कवि ने इसका निर्भ्रांत आख्यान किया है। ‘ग्रंथ का विषय’ शीर्षक के अंतर्गत ‘हरिऔध’ लिखते हैं– “मैंने श्रीकृष्ण चंद्र को इस ग्रंथ में एक महापुरुष की भांति अंकित किया है, ब्रह्म करके नहीं।”[7]
           
आधुनिक हिंदी कविता में प्रश्नाकुलता की शुरूआत का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व पर ही प्रश्न-चिन्ह लगा देता है। मैथिलीशरण गुप्त ने ‘साकेत’ में लिखा है–
           
“राम तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?
विश्व में रमे हुए नहीं सभी कहीं हो क्या?”[8]
           
द्विवेदी युग की खड़ीबोली हिंदी कविता को आधार बनाया जाए तो यह कहा जा सकता है कि यह युग ऐहिकता(सांसारिकता) की चेतना से संपृक्त है। इस युग में अलौकिकता से लौकिकता की ओर एक सतत यात्रा दिखाई देती है। मैथिलीशरण गुप्त तो इसे समस्त आधुनिक काल की प्रवृत्ति घोषित करते हुए कहते हैं–
           
“भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया,
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया!
संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।”[9]
 
            1857 ई० से लेकर आज तक का अर्थात् आधुनिक हिंदी साहित्य इसी ऐहिकता, इहलौकिकता का साहित्य है।
 
            श्रीधर पाठक खड़ी बोली के प्रथम कवि के तौर पर जाने जाते हैं। अयोध्याप्रसाद खत्री ने हिंदी कविता में खड़ी बोली के प्रयोग के लिए आंदोलन चलाया। बाद में, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली को गद्य के साथ-साथ पद्य की भाषा के तौर पर स्थापित करने का उद्योग किया। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने तो खड़ी बोली के साहित्य को व्याकरण के स्तर पर परिमार्जित किया, साथ ही साहित्य में खड़ी बोली की विविधता को मानकीकृत करने का प्रयास किया। लेकिन, रचनात्मक स्तर पर इस समस्या से पहले-पहल श्रीधर पाठक ही जूझे। द्विवेदी युग खड़ी बोली को आधुनिक हिंदी कविता की भाषा के तौर पर प्रतिष्ठित करने के लिए जाना जाता है। खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में उपरोक्त कारकों के अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त का समग्र साहित्य और अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का प्रथम महाकाव्य(खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य) ‘प्रियप्रवास’ आदि का भी अन्यतम योगदान है। मैथिलीशरण गुप्त ने ‘भारत-भारती’ लिखकर खड़ी बोली को काव्य-भाषा के तौर पर पूर्णतया प्रतिष्ठित किया; तो ‘हरिऔध’ ने खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य ‘प्रियप्रवास’ लिखकर खड़ी बोली की कवित्व-शक्ति से संशय के बादल हटा दिए।
 
    खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में द्विवेदी युग की मौलिक रचनाओं के अतिरिक्त उस काव्य के अनूदित साहित्य का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। द्विवेदी युग के अनेक कवियों ने देशी-विदेशी साहित्य का खड़ी बोली के अलावा ब्रजभाषा में भी अनुवाद किया है। श्रीधर पाठक ने गोल्डस्मिथ कृत ‘हरमिट’, ‘डेज़र्टेड विलेज’ तथा ‘द ट्रैवेलर’ का क्रमशः ‘एकांतवासी योगी’ (ब्रजभाषा), ‘उजड़ग्राम’ और ‘श्रांत पथिक’ शीर्षक से काव्यानुवाद किया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी ‘लाइट ऑफ एशिया’ का ‘बुद्धचरित’ नाम से अनुवाद किया। कालिदास की कई रचनाओं का भी अनुवाद किया गया। रामचन्द्र शुक्ल की उपर्युक्त अनूदित रचना अनुवाद साहित्य की अन्यतम रचना है। खड़ी बोली कविता के प्रारम्भिक दौर में काव्य-विषय, काव्य-रूप, काव्य-शैली आदि के अभाव में अनुवाद ने आधुनिक हिंदी कविता के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनुवाद का एक उदाहरण प्रस्तुत है–
 
“नहीं किन्तु ममभाग्य जो कि ऐसा विनोद सुख पाऊँ मैं,
निज यौवन जब दु:खित भ्रमण और चिंता बीच बिताऊँ मैं।”[10]
           
द्विवेदीयुगीन कवियों का अनुवाद शब्दानुवाद नहीं भावानुवाद की कोटि में आता है, जो कि अनुवाद की उत्तम कोटि है। द्विवेदी युग में अनुवाद ने आधुनिक कविता के विकास के लिए वह समतल जमीन तैयार की जिस पर खड़ी बोली हिंदी कविता फर्राटा भर सके।
           
साहित्य और पत्रकारिता का परस्पर संबंध भारतेंदु युग में ही स्थापित हो चुका था। द्विवेदी युग में यह संबंध और अधिक प्रगाढ़ हुआ। द्विवेदी युग और ‘सरस्वती’ पत्रिका एक-दूसरे के पर्याय बन गए। एक तरह से इस स्थिति को भरतेंदुयुगीन पूर्व परंपरा के गुणात्मक विकास के रूप में देखा जाना चाहिए। साहित्य और पत्रकारिता का यह गठजोड़ विलक्षण है। आज भी पत्र-पत्रिकाएँ साहित्यिक प्रगति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आधुनिक हिंदी साहित्य में ‘सरस्वती’ पत्रिका ने पत्र और साहित्य के परस्पर संबंध को सुनिश्चित किया।
           
    इतिवृत्तात्मकता(Matter of Fact) और स्थूलता(शिल्प के स्तर पर) द्विवेदी युगीन हिंदी कविता की पहचान है। प्रायः सभी आलोचकों ने उक्त प्रवृत्ति की आलोचना की है। यह सही है कि द्विवेदी युग की उक्त दोनों ही प्रवृत्ति अभिव्यक्ति के कमजोर पक्ष का परिचायक है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि खड़ी बोली हिंदी कविता की शुरूआत ही हुई है द्विवेदी युग से। वस्तुतः यह खड़ी बोली हिंदी कविता के प्रारंभ से जुड़ी हुई स्वाभाविक समस्या है। जयशंकर प्रसाद, जिन्होंने ‘कामायनी’ में सूक्ष्मतम अभिव्यंजना की है, की भी द्विवेदी युगीन प्रारंभिक रचनाएँ स्थूलता और इतिवृत्तात्मकता नामक तथाकथित कमियों से संपृक्त है। डॉ. तारकनाथ बाली ने भी कहा है– “‘झरना’ के पूर्व की सभी रचनाएँ द्विवेदी-युग के अंतर्गत लिखी गई थीं। प्रसाद जी की आरंभिक शैली बहुत-कुछ अयोध्यासिंह उपाध्याय की संस्कृतगर्भित शैली से मिलती-जुलती है, जो स्थूल और बहिर्मुखी है। छायावादी प्रवृत्तियों के दर्शन सबसे पहले ‘झरना’ में होते हैं।”[11]
 
निष्कर्ष : निष्कर्षतः द्विवेदीयुगीन कविता विषय, भाषा, छंद और काव्य-रूप आदि के स्तर पर आधुनिक खड़ी बोली हिंदी कविता के लिए प्रस्थान बिंदु है। यह नवजागरण और आधुनिक राष्ट्रीयता के अतिरिक्त स्वच्छंद मनोभावों का काव्य है। रीतिकालीन शास्त्रबद्धता, रूढ़ियों, स्त्रियों व प्रकृति से संबंधित रूढ़ मान्यताओं से कविता पहले-पहल इसी काल में मुक्त होती है। काव्य-भाषा के तौर पर खड़ी बोली के स्वरूप-निर्धारण और विकास का श्रेय भी इसी कालखंड को है। द्विवेदी युग में छंद-प्रयोग की विविधता भी हमें अचंभित करती है, विशेषकर खड़ी बोली के संदर्भ में। इस युग में सभी काव्य-रूपों का सफल प्रयोग हुआ है। यद्यपि इस युग की अधिकांश कविता में कलात्मक श्रेष्ठता और सूक्ष्मता नहीं है, किन्तु राष्ट्र के उद्बोधन, जागरण, सुधार और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के अद्भुत सामर्थ्य एवं खड़ी बोली के स्वरूप-निर्माण और संस्कार के कारण हिंदी-कविता के इतिहास में द्विवेदी युग का अवमूल्यन नहीं किया जा सकता। द्विवेदीयुगीन हिंदी कविता ने आधुनिक हिंदी कविता के प्रारंभिक युग की भूमिका को बखूबी निभाया है। द्विवेदी युग की कई काव्य-प्रवृत्तियों का कालांतर में गुणात्मक विकास भी हुआ, साथ ही अनेक काव्य-प्रवृत्तियों का नवोन्मेष भी।
[1]रामस्वरुपचतुर्वेदी, ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृ० 101
[2]रामचन्द्र शुक्ल, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, कांतीपब्लिकेशंस, दिल्ली, 2007, पृ० 424
[3]हजारीप्रसादद्विवेदी, ‘हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ० 237
[4]मैथिलीशरण गुप्त, ‘भारत भारती’
[5] वही.
[6] अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, ‘प्रियप्रवास’।
[7]रामस्वरुपचतुर्वेदी, ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृ० 94
[8]मैथिलीशरण गुप्त, ‘साकेत’।
[9] वही.
[10]विजयेन्द्र स्नातक, ‘द्विवेदीयुगीन हिंदी नवरत्न’, आर्य प्रकाशन मण्डल, दिल्ली, 1994, पृ० 29
[11]तारकनाथ बाली, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, संपा० डॅा० नगेन्द्र, मयूर पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2009, पृ० 531

 
प्रीति राय
शोधार्थी, हिंदी भवन विश्व-भारती, शांतिनिकेतन।
  
 अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-43, जुलाई-सितम्बर 2022 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादवचित्रांकन : धर्मेन्द्र कुमार (इलाहाबाद)

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