शोध आलेख : खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास में योग की प्रासंगिकता / देवेश कुमार एवं डॉ. ऊधम सिंह

खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास में योग की प्रासंगिकता
- देवेश कुमार एवं डॉ. ऊधम सिंह

शोध-सार : वर्तमान युग प्रतियोगिताओं का युग है, यह प्रतियोगिता किसी एक क्षेत्र में न होकर प्रत्येक क्षेत्र में है। इन्हीं प्रतियोगिताओं  में खेल प्रतियोगिताएं भी अपना विशेष स्थान रखती हैं। खेल प्रतियोगिता का सबसे बड़ा मंच ओलम्पिक में विश्व भर के खिलाड़ी प्रतिभाग करते हैं किन्तु विजय पताका वही फहराते हैं जो शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं। किसी खेल में शारीरिक बल की आवश्यकता होती है, किसी में मानसिक बल की। खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास हेतु योग में अनेक आयाम जैसे:- षट्कर्म, यम-नियम, आसन, प्राणायाम, ध्यान, मुद्रा-बंध आदि बताए गए हैं। इन योग आयामों को खिलाड़ियों की दिनचर्या में शामिल करने पर निश्चित ही उनका शारीरिक व मानसिक विकास होगा। इस शोध-पत्र में खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास में सहायक योग अभ्यासों को सुझाया गया है जिन्हें खिलाड़ियों की दिनचर्या में शामिल करने पर निश्चित ही सुधार होगा और  खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी उत्कृष्ट होगा।
 
बीज शब्द : योग, दृढ़ता, विजय, तनाव, प्रतियोगिता, आहार, दिनचर्या, खिलाड़ी, शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य।
 
मूल आलेख : वर्तमान युग प्रतियोगिता का युग है जिसमें सभी एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में हैं। यह प्रतियोगिता किसी एक क्षेत्र में नहीं अपितु प्रत्येक क्षेत्र में है। वह शिक्षा का क्षेत्र हो , कृषि क्षेत्र हो या राजनीतिक, व्यापारिक क्षेत्र हो या रोजगार या बॉलीवुड की दुनिया, या खेल प्रतियोगितायें  सभी क्षेत्रो में प्रतियोगी अपने विपक्षी को पीछे छोड़ कर आगे निकलना चाहते हैं। वह ये धारणा अपने मन मे बना लेते हैं कि यदि हम अपने प्रतिद्वंदी से आगे नहीं निकल पाये तो हम बहुत बड़ी गलती कर बैठेंगे और जब व्यक्ति की ये इच्छाएं पूरी नहीं होती तब वह अपने जीवन से हताश होकर आत्मग्लानि का अनुभव करता है और तनाव की स्थिति में चला जाता है। जो मानसिक रोग के साथ–साथ शारीरिक रोग भी उत्पन्न कर देता है। खिलाड़ियों का शारीरिक व मानसिक विकास योग से ही किया जा सकता है। योग शरीर के साथ-साथ मन पर भी प्रभाव डालता है जिससे हमारी शारीरिक व मानसिक शक्ति मजबूत होती है। शारीरिक व मानसिक विकास के लिए योग में विभिन्न आयाम बताए गए हैं। जैसे:- योगिक आहार, यम-नियम, षट्कर्म, आसन, मुद्रा-बंध, प्राणायाम, ध्यान, योग निद्रा आदि।
           
किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में एक मूल मंत्र बताया है कि “युक्ताहार विहारस्ययुक्तचेष्टस्य कर्मसु युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा”[1] कि व्यक्ति को सफलता प्राप्त करने के लिए किस तरह रहना चाहिए, कैसा व्यवहार करना चाहिए एक खिलाड़ी को हमेशा इस पथ पर चलना चाहिए और विजय पताका को फहराना चाहिए। श्री कृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को उचित आहार गृहण करना चाहिए। ऐसे ही एक खिलाड़ी का आहार पोष्टिक होना चाहिए, उसके खेल के क्षेत्र के अनुरूप होना चाहिए। खिलाडियों का विहार अर्थात् उनका रहन-सहन अच्छा होना चाहिए, ऐसा माहौल होना चाहिए जहां उन्हें उनकी सुविधाएं उपलब्ध हो जाएँ। एक खिलाड़ी कि इच्छाएं भी उचित हों ज्यादा न हों, वह हमेशा विजय कि सोच रखे किन्तु अपनी विजय के लिए किसी दूसरे खिलाड़ी को नुकसान ना पहुंचाए। उसके कर्म भी निष्काम कर्म हों जिसमें वह कार्यों को ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से करता हो। खेल को खेल की भावना से ही खेलें उसमें अपने प्रतिद्वंदी के प्रति ईर्ष्या का भाव ना रखें।  यदि खेल के मैदान में जीत मिली तो ठीक नहीं मिली तो स्वाध्याय करे कि मैं विजय पताका क्यूँ नहीं फ़हरा पाया। एक खिलाड़ी को समय से सोना व समय से जागना चाहिए। ऐसा खिलाड़ी जीवन में कभी असफल नहीं होता है। इसलिए खिलाड़ियों को इन सभी का पालन करना चाहिए।
 
योगिक आहार – किसी भी व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक विकास में आहार की मुख्य भूमिका होती है इसलिए कहा भी गया है की जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन  भगवान श्री कृष्ण ने गीता उपदेश में तीन तरह के आहार का वर्णन किया है सात्विक, राजसिक, तथा तामसिक। यहाँ हम केवल सात्विक आहार की बात करेंगे जिसे योगिक आहार भी कहा जाता है यथा “आयुः सत्त्वबलारोग्यं सुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥”[2] अर्थात् हमारा भोजन आयु को बढ़ाने वाला, सत्वगुण युक्त, बलदायक, रोगों से रक्षा करने वाला, सुख की अनुभूति करने वाला, चिकना, शरीर में अधिक समय तक रहने वाला, हृदय को भाने वाला, ऊर्जा देने वाला होना चाहिए उसे ही सात्विक आहार या योगिक आहार कहा गया है।
           
आहार  कितनी मात्रा में गृहण करना है, कैसे करना है इसकी चर्चा हठयोग ग्रंथ हठ्प्रदीपिका में स्वामी स्वात्माराम जी ने की है  जिसमें उन्होने बताया है कि “सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशविवर्जित: भुज्यते शिवसंप्रीत्यै मिताहार: स उच्यते”[3] अर्थात् स्वामी स्वात्माराम जी ने बताया है कि आहार स्निग्ध अर्थात् चिकना, मधुर अर्थात् मीठा होना चाहिए, पेट के दो भागों में आहार, तीसरे में पानी तथा चौथे भाग को वायु के लिए खाली छोड़ कर अपने इष्ट देव को समर्पित करके गृहण करना चाहिए।
 
यम :-   महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में कहा है कि “अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा:”[4] अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, तथा अपरिग्रह ये पाँच यम हैं, इन यमों का पालन करने से व्यक्ति के नैतिक मूल्यों में वृद्धि होती है। एक खिलाड़ी को इन यमों का पालन अवश्य करना चाहिए जिससे उनके मानसिक विकास में वृद्धि होगी। एक खिलाड़ी का मानसिक रूप से स्वस्थ होना अत्यंत आवश्यक है तनाव की स्थिति में खिलाड़ी अपना अच्छे से प्रदर्शन नहीं कर पाता इसलिए खिलाड़ी को इन यमों का पालन करना चाहिए जिससे वह अपने खेल में अच्छा प्रदर्शन कर सके।
 
अहिंसा- अहिंसा का अर्थ है किसी भी प्राणी को मन, वचन एवं कर्म से किसी भी प्रकार का कष्ट न देना। अहिंसा के फल के रूप में महर्षि पतंजलि कहते हैं “अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागा:[5] पतंजलि कहते हैं कि जब हम किसी को कष्ट नहीं देते हैं तो हमें भी कष्ट नहीं मिलता है। अहिंसा का पालन करने से सभी प्राणी हमारे प्रति बैर त्याग देते हैं। हमें खेल को अहिंसा का पालन करते हुए खेलना चाहिए। ऐसा करने से खिलाड़ियों में एक दूसरे के प्रति हीन भावना नहीं रहेगी और उनके मानसिक विकास में वृद्धि होगी।
सत्य- सत्य का फल बताते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं कि  “सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम॥”[6] अर्थात् व्यक्ति को सदैव सत्य बोलना चाहिए। सत्य बोलने से मन पवित्र होता है। पतंजलि कहते हैं कि जब हम निरंतर सत्य का पालन करते हैं तो हमारे मुख से जो भी वाणी निकलती है वह स्वत: सत्य हो जाती है। एक खिलाड़ी को हमेशा सत्य का पालन करते हुए ईमानदारी से खेलना चाहिए जिससे वह नैतिकता के साथ खेल में विजय प्राप्त करेगा।
 
अस्तेय- अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। अर्थात् हमें कभी–भी किसी भी वस्तु की चोरी नहीं करनी चाहिए। चोरी करने से हमारे मन में एक प्रकार का भय बना रहता है जो एक खिलाड़ी में तनाव पैदा करता है जिससे वह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता। महर्षि पतंजलि अस्तेय का फल बताते हैं कि “अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥”[7] अर्थात् जो व्यक्ति अस्तेय का पालन करता है उसके सामने रत्न कि पिटारियाँ स्थित हो जाती हैं।
 
ब्रह्मचर्य- ब्रह्मचर्य का लाभ बताते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं कि जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करता है “ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभ:॥”[8] अर्थात् सभी खिलाड़ियों के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यधिक आवश्यक है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से बल की प्राप्ति होती है, व्यक्ति की बुद्धि का विकास होता है, वीर्य लाभ होता है जिससे हमारी स्मृति भी अच्छी होती है, चेहरे पर तेज आता है वाणी में मधुरता आती है व्यक्ति आकर्षक दिखता है एवं बल की प्राप्ति होती है। ब्रह्मचर्य के विषय में अथर्ववेद में वर्णन मिलता है कि “ब्रह्मचर्येण तपसा देवानमृत्युपाघ्नत: इन्द्रो: ब्रह्मचर्येण देवेभ्यस्वराभरत॥”[9] अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन करने से देवताओं ने मृत्यु पर विजय पायी है और उसी ब्रह्मचर्य से युवराज इन्द्र ने देवताओं पर राज किया है।
 
अपरिगृह- आवश्यकता से अधिक संपत्ति एकत्र न करना अपरिगृह कहलाता है। एक खिलाड़ी हमेशा अपनी जीत की तैयारी करता है और वह सदैव विजय की कामना करता है अपनी जीत निश्चित करने के लिए वह अपना सर्वस्व लगा देता है और विजय प्राप्त करता है। अपनी विजय प्राप्ति हेतु खिलाड़ियों को हमेशा तत्पर रहना चाहिए किन्तु षड्यंत्र रचकर अपने विपक्षी को छल द्वारा पराजित करके विजेता बनने से वह पाप का भोगी बन जाता है। एक खिलाड़ी को सदैव विजय की सोच रखनी चाहिए किन्तु अपरिगृह का पालन करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।  

नियम :- महर्षि पतंजलि के योग दर्शन में पाँच यमों कि भांति ही पाँच नियमों की भी चर्चा मिलती है यथा “शौचसंतोषतप:स्वाध्यायईश्वरप्रणिधानि नियमा:॥”[10] अर्थात्  शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान ये पाँच नियम हैं। जिनका पालन करने से व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य में लाभ मिलता है। एक खिलाड़ी को सदैव इन नियमों का पालन करना चाहिए।
 
शौच- शौच का अर्थ है शुद्धि या सफाई। मन में प्रसन्नता, इंद्रियों का वश में होना आंतरिक शुद्धि है। महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन में शौच के विषय में बताया है कि “सत्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्रेन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वनि च॥”[11] महर्षि पतंजलि सभी प्रकार से शरीर की बाह्य शुद्धि के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि की बात करते हैं। अर्थात् वे किसी भी प्रकार के द्वेष, क्लेश से मुक्त रहने की बात करते हैं। तभी हम चिंता, कुंठा, तनाव आदि से मुक्त रह सकते हैं। एक खिलाड़ी को शारीरिक शुद्धि के साथ-साथ मानसिक शुद्धि कि अवश्यकता होती है जिससे कि वह तनाव में न रहे चूंकि मानसिक अस्वस्थता शारीरक रोगों को जन्म देते हैं। जिसके कारण उसके खेल प्रदर्शन में कमी आ जाती है।
 
संतोष:- संतोष का अर्थ है जो हमारे पास है उसी में खुश रहना अर्थात् संतुष्ट रहना। योग दर्शन में पतंजलि ने बताया है कि “संतोषादानुत्तम: सुखलाभ:॥”[12] अर्थात्  संतोष से बड़ा कोई सुख नहीं होता है जैसे पतंजलि ने कहा है कि संतोष से उत्तम सुख कुछ और है ही नहीं। एक खिलाड़ी को हमेशा संतोष रखना चाहिए यदि वह किसी प्रतियोगिता में पराजित भी हो जाए तो भी उसे विचलित नहीं होना चाहिए वरन् अपनी गलतियों को देख कर आगे की तैयारी करनी चाहिए।
तप- तप का अर्थ है किसी भी कार्य को सजगता के साथ मेहनत और लग्न से पूरा करना। एक खिलाड़ी का जीवन ही तप से बनता है  वह सुबह-शाम मेहनत करता है। महर्षि पतंजलि तप का लाभ बताते हैं कि “कायेंद्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपस:॥”[13] अर्थात् तप से शरीर और इंद्रियों कि शुद्धि होती है। जिससे हमारा शरीर स्वस्थ व तनाव मुक्त रहता है। एक खिलाड़ी की सफलता की कुंजी तप ही है जिसका जितना बड़ा तप होगा वह उतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करता है।
 
स्वाध्याय- स्वाध्याय का अर्थ है अपने किए गए कर्मों का मूल्यांकन करना। एक खिलाड़ी को निरंतर स्वाध्याय करना चाहिए उसे अपनी हार में होने वाली कमी को देख कर अगली बार उन छोटी-छोटी कमियों को दूर कर विजय पताका फहरा देनी चाहिए। महर्षि पतंजलि स्वाध्याय का फल बताते हैं कि “स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोग:॥”[14] अर्थात्  स्वाध्याय का पालन करने से अपने इष्ट देव के दर्शन हो जाते हैं जिससे व्यक्ति अपनी गलतियों को सुधारने में सक्षम हो जाता है।
 
ईश्वर प्रणिधान – अपने किए गए कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करने के भाव को ईश्वर प्रणिधान कहा गया है। भगवद्गीता में इसे ही निष्काम कर्म कहा गया है। हम जो भी कर रहे हैं ईश्वर की इच्छा के अनुसार कर रहे हैं, ईश्वर के लिए कर रहे हैं, ईश्वर के आदेशानुसार कर रहे हैं, हम कर्ता नहीं हैं हम एक यंत्र के समान हैं जो ईश्वर द्वारा चलाया जा रहा है, यह धारणा ईश्वर प्रणिधान कहलाती है।  एक खिलाड़ी को भी यह धारणा अपने मन में रखनी चाहिए जिससे उसका मानसिक विकास हो सके वह जय-पराजय पर अपने मानसिक स्तर को समान बनाए रखे। महर्षि पतंजलि बताते हैं कि “समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्॥”[15] अर्थात् जो साधक ईश्वर प्रणिधान का पालन करता है उसके कार्य स्वत: सिद्ध होते जाते हैं।
 
षट्कर्म :- हठयोग के ग्रन्थों में षट्कर्मों का वर्णन मिलता है  षट्कर्म का अर्थ है छ: शोधन क्रियाएँ। घेरण्ड संहिता में कहा गया है कि “षट्कर्मणा शोधनं च”[16] अर्थात् षट्कर्म से शरीर का शोधन होता है। यहाँ हम सभी षट्कर्मों की चर्चा न करके कुछ ही शोधन क्रियाओं का वर्णन करेंगे।
 
धौति – धौति क्रिया में हम वस्त्र धौति और वमन धौति की चर्चा करेंगे हठ्प्रदीपिका में वस्त्रधौति का लाभ बताया गया है कि “काश्श्वासप्लीहाकुष्टं कफरोगाश्चविंशति:। धौतिकर्मप्रभावेन प्रयान्तयेव न संशय:॥”[17] अर्थात् धौति के अभ्यास से खांसी, दमा, प्लीहा, कुष्ठ, तथा 20 प्रकार के कफ दोष दूर हो जाते हैं। वस्त्र धौति करने से गले व छाती में जमा कफ बाहर निकल जाता है जिससे श्वास लेने में होने वाली परेशानियाँ समाप्त हो जाती हैं। खिलाड़ियों का प्रदर्शन पहले से उन्नत हो जाता है।
 
नेति-  नेति क्रिया के दो भेद हैं जल नेति और सूत्र नेति। जल नेति में हम एक विशेष प्रकार के लोटे में जल लेकर नासिका मार्ग से मस्तिष्क की सफाई करते हैं जिससे वहाँ जमा म्यूकस साफ हो जाता है। इसका अभ्यास करने से श्वास लेने मे होने वाली कठिनाई दूर हो जाती है।  सूत्र नेति में हम विशेष रूप से तैयार एक धागे को नासिका मार्ग से अंदर डालकर मुह से बाहर निकलते हैं। हठ्प्रदीपिका में कहा गया है “कपालशोधनी चैव दिव्यदृष्टिप्रदायिनी। जत्रुऊर्ध्वजातरोगौघं नेतिराशु निहन्ति च॥”[18]  इसके अभ्यास से नासिका मार्ग में जमा बलगम, म्यूकस आदि साफ हो जाता है, नाक में बढ्ने वाला मांस या हड्डी जिसे साइनोसाइटिस कहते हैं ठीक हो जाता है, आँखों के रोग दूर हो जाते हैं, श्वास लेने में होने वाली समस्या समाप्त हो जाती है। जिससे एक खिलाड़ी को भरपूर ऑक्सीज़न मिलती है व कार्बनडाईऑक्साइड अधिक मात्रा में शरीर से बाहर निकलती है। जिससे खिलाड़ी को थकान नहीं होती है और उसके प्रदर्शन में सुधार होता है।
 
त्राटक :- एक खिलाड़ी को त्राटक का अभ्यास करना चाहिए त्राटक का अभ्यास करने से आँखों  की रोशनी बढ़ती है। मन शांत होता है, लक्ष्य को निर्धारित करने की क्षमता विकसित होती है। तीरंदाजी, शूटिंग, शतरंज, आदि ध्यान केन्द्रित करने वाले खेलों में त्राटक की मुख्य भूमिका है। त्राटक के विषय  में स्वामी स्वात्माराम जी लिखते हैं कि “मोचनं नेत्ररोगाणां तन्द्रादीनां कपाटकम्।”[19] अर्थात् त्राटक के द्वारा नेत्रों के रोग, तंद्रा, आलस्य आदि समाप्त हो जाते हैं।
कपालभाति :- खिलाड़ियों को कपालभाति का अभ्यास करने से उनके फेफड़ों में ऑक्सीज़न को धारण करने की क्षमता में वृद्धि होगी जिससे वे अधिक समय तक मैदान पर प्रदर्शन कर सकेंगे उनके खेलने के समय में भी वृद्धि होगी। स्वामी स्वात्माराम जी कहते हैं कि “कपालभातिर्विख्याता कफदोषविशोषणी।”[20] अर्थात् कपालभाती के अभ्यास से कफ दोषों का नाश होता है।
 
आसन :- आसन करने से खिलाड़ियों का शारीरिक विकास होगा आसन करने से शरीर सुदृढ़ होता है घेरण्ड संहिता में आसन का लाभ बताते हुये कहा गया कि “आसनेन भवेददृढ्म”[21] अर्थात् आसन करने से दृढ़ता आती है। महर्षि पतंजलि आसन की परिभाषा में कहते हैं कि “स्थिरसुखमासनम्”[22] अर्थात् जिस स्थिति में हम लंबे समय तक सुख पूर्वक बैठ सकते हैं वह आसन है। इसका लाभ बताते हुये कहते हैं कि “ततो द्वन्द्वानभिघात:”[23] अर्थात् आसन कि सिद्धि से द्वन्दों को सहने की क्षमता आ जाती है। हठप्रदीपिका में आसन का लाभ बताते हुये  कहा गया है कि “कुर्यात्तदासनं स्थैर्यंमारोग्यं चाङ्ग्लाघवम्॥”[24] अर्थात् आसन करने से शरीर पतला हो जाता है, शरीर में स्थिरता आ जाती है, आरोग्यता आ जाती है तथा शरीर हल्का हो जाता है। खिलाड़ियों को आसन करने से उनका शरीर दृढ़(मजबूत) हो जाएगा, हल्का हो जाएगा जिससे उनके प्रदर्शन में सुधार होगा।
 
सूर्यनमस्कार सूर्य नमस्कार करने से रक्त संचालन ठीक प्रकार से होने लगता है जिसके कारण मेलाटोनिन हार्मोन स्रावित होता है। शारीरिक बल मिलता है स्टेमिना बढ़ता है जो खेल मे सफलता के लिए अति आवश्यक है।
 
ताड़ासन- यह आसन खिलाड़ियों की लंबाई बढ़ाने मे कारगर है। जो उनके शारीरिक विकास मे वृद्धि करता है। ताड़ासन करने से मानसिक एकाग्रता आती है।
 
पश्चिमोत्तानासन :- यह आसन पाचन तंत्र को मजबूत करके भोजन को अच्छे से पचाता है तथा तंत्रिका आवेग को शांत करता है। इसके अभ्यास से कमर मजबूत होती है खेलने के समय में वृद्धि होती होती है। हठ्प्रदीपिका में कहा भी गया है कि “उदयं जठरानलस्य कुर्यादुदरे कार्श्यमरोगतां च पुंसाम्॥”[25] अर्थात् पश्चिमोत्तानासन के अभ्यास से जठराग्नि प्रदीप्त होती है, उदर अथवा पेट पतला होता है, रोगों का नाश होता है, तथा अरोगता की प्राप्ति होती है। 
 
शशांकासन शशांक आसन का तनाव दूर करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है , इसका अभ्यास खेलने के बाद किया जाना चाहिए जिससे खेल के दौरान होने वाली थकान दूर हो जाती है। खिलाड़ियों को नियमित रूप से इसका अभ्यास करना चाहिए।
 
मकरासन :- यह आसन शारीरिक व मानसिक संवेदनाओं को कम  करता है तंत्रिका आवेग को कम करता है जो व्यक्ति को अच्छी नींद लाने में सहायक है। इसके अभ्यास से खेल के दौरान होने वाली थकान दूर होती है।  मांसपेशियों को शिथिलता प्रदान करने वाला आसन है। 
 
बालासन :- यह आसन शरीर में खिंचाव व तनाव को दूर करता है तंत्रीय पेशियों को शीथिलता प्रदान करता है जिससे खिलाड़ी को खेलते समय होने वाला तनाव खत्म हो जाता है।
 
शवासन :- यह सभी आसनों में सर्वाधिक विश्रांति कारक आसन है जो शारीरिक व मानसिक तनाव को दूर करता है और पेशियों को शिथिलता प्रदान करता है यह आसन संपूर्ण शरीर व मन को शांति प्रदान करता है इसलिए यह आसन खिलाड़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। 
 
प्राणायाम :- प्राणायाम का अभ्यास करने से खिलाड़ियों की मानसिक स्थिति में सुधार होगा उनका मन शांत होगा। प्राणायाम का अभ्यास करने से उनके फेफड़ों की क्षमता मे वृद्धि होगी जिससे उनके अंदर ऑक्सीजन की मात्रा अधिक रहेगी। घेरण्ड संहिता में कहा गया है कि “प्राणायामालाघवम् च॥”[26] अर्थात् प्राणायाम से लाघवता यानि शरीर में हल्कापन आ जाता है, जिससे खिलाड़ी में स्फूर्ति आती है। महर्षि पतंजलि प्राणायाम को इस प्रकार बताते हैं कि “तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:॥”[27] श्वासप्रश्वास गति का पूर्णत: निरुद्ध हो जाना ही प्राणायाम है। यहाँ हम इसे ऐसे समझे की हमारे श्वास की गति धीमी होनी चाहिए यदि हमारे श्वास की गति तेज़ होती है रक्त का संचार बहुत तेजी से होता है हमें ऑक्सीज़न की अधिक आवश्यकता होती है। आगे प्राणायाम का लाभ बताते हुए पतंजलि कहते हैं कि “तत: क्षीयते प्रकाशावरणम्॥”[28] अर्थात् प्राणायाम के अभ्यास से ज्ञान पर पड़ा पर्दा उठ जाता है। ऐसे ही एक खिलाड़ी जब प्राणायाम का अभ्यास करता है तो उसके अंदर भी एक प्रकार की शक्ति उत्पन्न हो जाती है जिससे वह अपने खेल में पारंगत हो जाता है।
 
नाडीशोधन :- नाड़ी शोधन प्राणायाम शरीर के मल को नाडीयों से निकालकर शरीर को स्वस्थ बनाता है। नाडी शोधन करने से तंत्रिका तंत्र शांत होता है, तंत्रिकीय आवेग शांत हो जाते हैंमन शांत होता है और तनाव दूर हो जाता है जिस से व्यक्ति को अच्छी नींद आने लगती है। अच्छी नींद लेने के बाद खिलाड़ियों को हुई थकाठा आदि को दूर करने में यह सबसे महत्वपूर्ण है। योग निद्रा के अभ्यास से खिलाड़ियों के शरीर में होने वाली थकान को दूर करके उनको जल्दी आराम दिया जा सकता है जिससे वे अपने अगले लक्ष्य के लिए तैयार हो जाएंगे।  
 
खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास में योग की प्रासंगिकता – खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को उन्नत करने में योग के विभिन्न अभ्यासों को वर्तमान में अपनाया जा रहा है क्योंकि योग के अभ्यास शरीर को क्षति पहुंचाए बिना दृढ़ता,स्थिरता, लचीलापन, स्फूर्ति आदि ऊर्जा के स्तर की वृद्धि करने में सार्थक हैं। यम-नियमों के पालन से खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य का विकास होता है, जिससे उनके प्रदर्शन में सुधार होता है। खिलाड़ियों के शारीरिक विकास हेतु योगिक आहार बताया गया है जिसके गृहण करने पर खिलाड़ियों के शरीर में बल एवं आरोग्यता की प्राप्ति होती है। आसन करने से शरीर की मांसपेशियों में लचीलापन आता है जिससे शरीर में दृढ़ता आती है। प्राणायाम के अभ्यास से शरीर में हल्कापन एवं स्फूर्ति आती है। षट्कर्म के अभ्यास से शरीर में उत्पन्न विजातीय तत्वों का निष्कासन होता है, शरीर से स्थूलता समाप्त होती है, शरीर हल्का व स्वस्थ हो जाता है। मुद्रा-बंध के अभ्यास से नाड़ियों में रक्त संचार सुचारु रूप से कार्य करता है, हार्मोन्स का स्रावण अच्छे से होता है। ध्यान करने से मन एकाग्र एवं शांत होता है। योग निद्रा के अभ्यास से थकान को दूर कर शारीरिक क्षति की पूर्ति की जाती है। भौतिकीय शरीर, शांति, अध्यात्म, मानसिक एकाग्रता व भावनात्मक स्थिरता को विकसित करने में योग उपयुक्त है। योगिक जीवन शैली के अतिरिक्त अन्य अभ्यासों अथवा खेलों से यह संभव नहीं है। अत: प्रतिस्पर्धा के इस वर्तमान युग में खिलाड़ियों के लिए योग प्रासंगिक हो गया है।
 
निष्कर्ष : प्रस्तुत शोध आलेख  में खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास हेतु यम-नियम, योगिक आहार, आसन, प्राणायाम, मुद्रा, ध्यान, योगनिद्रा आदि बताए गए हैं जिनके पालन करने से खिलाड़ियों के जीवन में अनेक परिवर्तन घटित होते हैं। वे तनाव, चिंता, कुंठा आदि से मुक्त रहकर शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ हो जाते हैं। योग के इन अभ्यासों को खिलाड़ियों की दिनचर्या में शामिल करने से खिलाड़ियों के शारीरिक व मानसिक विकास में संभवत: वृद्धि होती है; तथा उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य में सकारात्मक परिवर्तन होकर उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। यदि खिलाड़ियों के जीवन में इन विभिन्न योग आयामों को शामिल किया जाए तो उनके प्रदर्शन में अत्यंत वृद्धि होगी उनका प्रदर्शन पूर्व से बेहतर होगा।
 
सन्दर्भ :

[1] श्रीहरिकृष्णदास, गोयन्दका, श्रीमद्भगवद्गीता, गीतप्रेस गोरखपुर गोबिन्द भवन कार्यालय कोलकाता, सं.2074, पृष्ठ सं 182.
[2] श्रीहरिकृष्णदास, गोयन्दका, श्रीमद्भगवद्गीता, गीतप्रेस गोरखपुर गोबिन्द भवन कार्यालय कोलकाता, सं.2074, पृष्ठ सं 396.
[3] स्वामी दिगम्बर जी व डॉ. पीताम्बर, झा, हठ्प्रदीपिका, कैवल्यधाम श्रीमन्माधव योगमन्दिर समिति लोनावाला पुणे, 2011,पृष्ठ सं.29.
[4] श्रीहरिकृष्णदास, गोयन्दका, योग-दर्शन, गीतप्रेस गोरखपुर गोबिन्द भवन कार्यालय कोलकाता, सं.2074, पृष्ठ सं. 63.
[5] वही, पृ.सं. 67.  
[6] वही,पृ.सं. 68.
[7] वही, पृ.सं. 68.
[8] वही, पृ.सं. 69.
[10] श्रीहरिकृष्णदास, गोयन्दका, योग-दर्शन, गीतप्रेस गोरखपुर गोबिन्द भवन कार्यालय कोलकाता, सं.2074, पृष्ठ सं. 65.
[11] वही, पृ.सं. 70.
[12] वही, पृ.सं. 70.
[13] वही, पृ.सं. 71.
[14] वही, पृ.सं. 71.
[15] वही, पृ.सं. 71
[16] स्वामी निरंजनानन्द, सरस्वती, घेरण्ड संहिता, योग पब्लिकेशन्स ट्रस्ट, मुंगेर, बिहार, भारत, 2004. पृ.सं. 18.
[17] स्वामी दिगम्बर जी व डॉ. पीताम्बर, झा, हठ्प्रदीपिका, कैवल्यधाम श्रीमन्माधव योगमन्दिर समिति लोनावाला पुणे, 2011,पृ. सं.46.
[18] वही, पृ.सं. 48.
[19] वही, पृ.सं. 50.
[20] वही, पृ.सं. 51.
[21] स्वामी निरंजनानन्द, सरस्वती, घेरण्ड संहिता, योग पब्लिकेशन्स ट्रस्ट, मुंगेर, बिहार, भारत, 2004. पृ.सं. 18.
[22] श्रीहरिकृष्णदास, गोयन्दका, योग-दर्शन, गीतप्रेस गोरखपुर गोबिन्द भवन कार्यालय कोलकाता, सं.2074, पृष्ठ सं. 72.
[23] वही, पृ.सं. 73.
[24] स्वामी दिगम्बर जी व डॉ. पीताम्बर, झा, हठ्प्रदीपिका, कैवल्यधाम श्रीमन्माधव योगमन्दिर समिति लोनावाला पुणे, 2011,पृ.सं.9.
[25] वही, पृ.सं.15.
[26] स्वामी निरंजनानन्द, सरस्वती, घेरण्ड संहिता, योग पब्लिकेशन्स ट्रस्ट, मुंगेर, बिहार, भारत, 2004. पृ.सं. 18.
[27] श्रीहरिकृष्णदास, गोयन्दका, योग-दर्शन, गीतप्रेस गोरखपुर गोबिन्द भवन कार्यालय कोलकाता, सं.2074, पृष्ठ सं. 73.
[28] वही, पृ.सं. 76.
[29] वही, पृ.सं. 79.
 
देवेश कुमार
शोधार्थी, योग विज्ञान विभागगुरुकुल काँगड़ी (सम विश्वविद्यालय) हरिद्वार, उत्तराखंड।
 
शोध निर्देशक - डॉ. ऊधम सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर, योग विज्ञान विभागगुरुकुल काँगड़ी (सम विश्वविद्यालय) हरिद्वार, उत्तराखंड।
udhamgkvv@gmail.com , +918439353407

सम्पादक-द्वय : माणिक एवं जितेन्द्र यादवचित्रांकन : धर्मेन्द्र कुमार (इलाहाबाद)
अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati)  अंक-43, जुलाई-सितम्बर 2022 UGC Care Listed Issue

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