शोध आलेख : मार्कंडेय की कहानियों में स्त्री का बदलता रूप / डॉ .रजनीश कुमार यादव

मार्कंडेय की कहानियों में स्त्री का बदलता रूप

- डॉ.रजनीश कुमार यादव

 

शोध सार : अब तक मार्कंडेय को ग्रामीण और किसान चेतना के कहानीकार के तौर पर एकांगी दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया गया है लेकिनपान-फूलसेहलयोगतक की कहानी यात्रा मेंउनकी कहानियों में स्त्री का बदलता हुआ रूप भी दिखाई पड़ता हैl ‘गुलरा के बाबासे लेकरप्रिया सैनीतक की कहानियों में स्त्री परम्परा और आधुनिकता के बीच अपने अस्तित्व, अस्मिता और आज़ादी को खोजती रही हैl उनकी कहानियों की मुख्य चिंता स्त्री-पुरुष संबंधों में संस्थागत सुधार की नहीं बल्कि बदलाव को लेकर है जिस दृढ़ता के साथ माही, सूर्या, प्रिया आदि स्त्रियाँ अपने प्रेम और स्थितियों को बिना किसी हिचक के निडरता से अभिव्यक्त करती हैं और अपने वर्तमान के प्रति भी दृढ़ और ईमानदार रहते हुए पाठक के समक्ष खड़ी होती हैं, उनका यह रूप स्त्री मुक्ति और उसके सवालों के लिए एक मजबूत आधार निर्मित करता हैl

 

बीज शब्द : स्वातन्त्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, परम्परा और आधुनिकता, सामन्तवादी, स्त्री-मुक्ति, स्त्री-विमर्श, ग्रामीण, शहरी, दलित, किसान, शिक्षितl

 

मूल आलेख : मार्कंडेय स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथा साहित्य के प्रमुख कथाकार हैं जिनकी दृष्टि समाज के हर वर्ग पर पड़ती हैl पान-फूल(1954) से हलयोग (2012) तक आठ कहानी संग्रहों में उनका कहानीकार रूप व्यापक और गहरा हैl वे मेरी कथा-यात्रा में लिखते हैं-जितने लोग कहानी पढ़ते हैं, वे सब कहानी नहीं लिखते, लिखते वही हैं जिनके भीतर कुछ कहने की तीव्र आकांक्षा होती है। इस आकांक्षा के स्रोत मूलतः दो ही हैं। एक जीवन प्रवाह में प्राप्त मानवीय अनुभवों की नवीनता और एकांतिकता, दूसरा व्यक्ति और समाज के संबंधों में उपस्थित होने वाले अन्तर-विरोध जो अनुभव की विचित्रता और नवीनता से आगे बढ़कर लेखक को जीवन की वास्तविकताओं की दिशाओं में मोड़ते हैं और उसके मन में कदम-कदम पर प्रश्नों की संरचना करते हैंl1 मार्कण्डेय की कहानियों की संरचना गाँव और शहर की पृष्ठभूमि पर निर्मित होकर किसान, स्त्री और दलित चेतना से विकसित होती हैl

 

मार्कंडेय की कहानी यात्रा पान-फूल(1954) से शुरू होकर हलयोग (2012) तक पूरी होती हैl अपनी कहानियों में उन्होंने स्त्री जीवन के बदलते रूप को नयी वास्तविकता और नयी ग्रहणशीलता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया हैl हालाँकि मार्कंडेय से पूर्व स्त्री जीवन और स्त्री मुक्ति के प्रश्नों की पृष्ठभूमि निर्मित हो चुकी थी जहाँ प्रेमचंद ने स्त्री मुक्ति को स्वाधीनता आंदोलन से जोड़ा तो जैनेन्द्र और अज्ञेय ने स्त्री की मानसिक उलझनों को मनोचिकित्सक के रूप में देखने की कोशिश कीl वहीं महादेवी वर्मा ने अपने रेखाचित्रों और संस्मरणों के द्वारा स्त्रियों के सामाजिक और आर्थिक स्थितियों का यथार्थ चित्रण किया। आजादी के बाद कथा-लेखन में महिला कथाकारों के एक बड़े वर्ग ने स्त्री-मुक्ति को केन्द्र में रखकर लिखना शुरू किया। इसी समय मार्कण्डेय जहाँ एक ओर प्रेमचन्द, जैनेन्द्र, अज्ञेय और यशपाल की परम्परा का विकास कर रहे थे वहीं दूसरी ओर अपने समकालीन लेखक-लेखिकाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर कहानी को नई गति दे रहे थेl उनकी कहानियों में स्त्री को स्त्री चेतना के रूप में प्रस्तुत करके उसके संपूर्ण जीवन को मुख्य विषय बनाया गया। मार्कण्डेय की कहानियों में स्त्री के बदलते रूप को देखा जा सकता हैl उनकी स्त्रियाँ किसान, मजदूर, शिक्षक और प्रेमिका के रूप में चित्रित हुई है। उनका चरित्र बहुआयामी है जिसमें पारम्परिकता और आधुनिकता के साथ ग्रामीण और शहरी परिवेश का समावेश हुआ है।

 

मार्कण्डेय जब कहानी लेखन कर रहे थे तब उनकी स्त्री पात्रों को लेकर हिंदी कहानी आलोचना में तर्कहीन विवाद भी खड़े हुए थे उनकी स्त्री-विषयक कहानियों के विषय में गोपाल राय ने लिखा है- "इन कहानियों में मार्कण्डेय का स्वर एकदम बदला हुआ है। गाँव की पृष्ठभूमि से इलाहाबाद आये और गाँव की जमीन पर कहानियाँ लिखकर प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाले वे इतना शीघ्र पुरानी संहिता को धता बताकर आधुनिक जीवन जीने वाली स्त्रियों की कहानी लिखने लगे, यह कम चौकाने वाली बात नहीं है।"2 इसमें कहानी पाठकों को चौकने वाली कोई बात नहीं है, बल्कि आलोचकों द्वारा एकांगी मूल्याङ्कन कर दूसरे को चौकाना है। किसी भी कथाकार को ग्रामीण और शहरी पृष्ठभूमि के खांचे में बांटना तर्कसंगत नहीं लगता और यह महत्वपूर्ण भी नहीं हैl कथाकार की सामाजिक चेतना सबसे महत्वपूर्ण है जो उसकी व्यापकता और गहराई की ओर संकेत करती है। हर कथाकार का अपना विशिष्ट क्षेत्र होता है जहाँ की समस्याओं और गतिविधियों को वह अपने कथा क्षेत्र का विषय बनाता है।

 

यह बात सही है कि मार्कंडेय मूलतः ग्रामीण कथाकार हैंl ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से उनका समय संक्रमणकाल के दौर से गुजर रहा था। आजादी के बाद रोजगार की तलाश में गाँव से शहर की ओर लोगों का पलायन हो रहा था। प्रथम पंचवर्षीय विकास योजना का कृषि क्षेत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था जिसका प्रभाव गाँव से शहर आए हुए व्यक्ति पर भी पड़ रहा था। इस भाग-दौड़ और अस्थिर समय में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध भी प्रभावित हो रहे थेl मार्कंडेय की कहानियों में ग्रामीण और शहरी पृष्ठभूमि में विकसित स्त्री जीवन रूप उभरकर सामने आया हैl

 

मार्कण्डेय जौनपुर से इलाहाबाद आने के बाद प्रगतिशील आंदोलन और मार्क्सवाद को गहरायी से समझते हैं जिससे उनकी सामाजिक चेतना और अधिक पैनी होती है। वे अपने समय के उन विरले कथाकारों में हैं जिन्होंने समय की गति को पकड़ने की कोशिश की है। किसान जीवन का यथार्थ चित्रण करने के बाद उन्हें लगा कि स्त्रियों का जीवन भी समस्याओं से भरा है, तो उन्होंने इसे अपना विषय बनाया। यह तो उनकी व्यापक सामाजिक चेतना को ही दर्शाता है जिसमें स्त्री जीवन के प्रत्येक पहलू को मनोवैज्ञानिक और तार्किक रूप से देखने की कोशिश की गई है। अतः इसमें कोई चौकाने वाली बात नहीं दिखाई पड़ती है।

 

पान-फूल(1954) कहानी संग्रह केगुलरा के बाबाकी चमेलिया, ‘वासवी की मांकी बासंती और सीता, ‘घूराकी घूरा, ‘रामलालकी भाभी, ‘सात बच्चों की मांसन्नो औरकहानी के लिए नारी पात्र चाहिएकी संध्या, रमोला, लक्ष्मी, रसीदा और जमुना बारिन आदि मार्कण्डेय की शुरूआती कहानी लेखन की स्त्री पात्र हैं जिनके विविध रूप उभरकर सामने आते हैंl

 

'गुलरा के बाबा' मार्कण्डेय की आरंभिक कहानी होने के कारण रोमांस से भरी हुई है। इस कहानी की स्त्री चमेलिया एक विशेष वर्ग से संबंधित है। ऐसा वर्ग जो गाने-नांचने का अपना पारम्परिक काम करता हैl चमेलिया अपने माँ के ही काम को आगे बढ़ाती है। नांचने गाने वाली स्त्रियों की छवि तत्कालीन समय में कैसी थी, इसका यथार्थ चित्रण इस कहानी में हुआ हैl चमेलिया बाबा के उमर की है उनमें प्रेम है। मार्कण्डेय चमेलिया सहित अन्य स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का यथार्थ चित्रण करते हैं, जो उस पेशे से जुड़ी हैं- "सुखई ने चिलम पर दम लगाते हुए कहा, बाबा! आज मनकिया भी गयी। अब तो छे रंडियाँ हो गईं, मुदा चमेलिया जैसी गाने वाली...l3 चमेलिया बाबा के साथ ही जवान हुई और उसने अपनी माँ की गद्दी को जगाए रखा। इस कहानी में मार्कण्डेय ने चमेलिया के माध्यम से सामन्ती व्यवस्था और ताकत के कुचक्र में जकड़ी एक स्त्री जीवन को चित्रित किया है जो उसका प्रतिकार नहीं कर पाती है बल्कि मजबूर होकर परम्परा का निर्वाह करती हैl

 

'वासवी की माँ' कहानी उच्च मध्यवर्ग की स्त्री के जीवन पर आधारित है इसमें कहानीकार ने एक स्त्री की मानसिक उलझनों का मनोवैज्ञानिक ढंग से चित्रण किया है। इस उलझन का कारण उसका पति है, जो समलैंगिक है। पढ़ी-लिखी होने के बावजूद वह स्त्री अपने को संभाल नहीं पाती है और आत्महत्या कर लेती है। मार्कण्डेय स्त्री मन को कैसे पकड़ते हैं, वह देखने और समझने लायक हैं- "स्त्री सहारा चाहती है, स्त्री मुहब्बत चाहती है, स्त्री एक पुरूष चाहती है, पर जिसे चाहती है, उसकी ही बनकर जीना चाहती है चाहे वह उसका विवाहित पति हो, चाहे मन चाहा प्रेमी, पर उसी के आगे, उसी के हाथों अपनी अस्मत लुटती देख कर वह मर जाती है, टूट जाती हैl4  कहानीकार ने बड़े ही सरल शब्दों में स्त्री के जीवन की मनोकांक्षाओं का चित्रण किया है। इस कहानी की स्त्री पात्र का रूप चमेलिया के चरित्र से बदला हुआ दिखाई पड़ता है इसमें शोषण के प्रतिकार और प्रतिरोध करने की ताकत तो जुटाती है लेकिन अंततः हार जाती हैl

 

'घूरा' एक वृद्ध महिला की कहानी है। मार्कण्डेय ने घूरा के संपूर्ण जीवन का सूक्ष्म तरीके से चित्रण किया है। उसका जीवन दो रूपों में विकसित होता है। पहला रूप जब वह सुहागिन होती है - "वह घूरा जो रात के अंधेरे में पलंग के नीचे पैर नहीं रखती थी, सुख संपत्ति पाँवों पर लोटती थीl"5 विधवा होने के बाद वह अपने ही परिवार में उपेक्षित हो जाती है। इसके बावजूद उसका अपनों के प्रति ममत्व कम नहीं होता। गरीबी के बावजूद उसमें स्वाभिमान कम नहीं होता। पुलिस जब उसके बेटे को पकड़ने आती है तो उसका चरित्र विस्तार लेता है और वह कहती है- "तेरे जैसे सिपाही तो मेरा पानी भरते थे रे, दाढ़ीजार के नाती ! बड़ा रूपये वाला हुआ है ...घूरा ने चिल्लाकर कहा बुधुआ, ले तो कुदारl... थोड़ी ही देर में तीन सौ गिन्नियाँ मुर्चही बटुली में पीली-पीली ... गोल-गोलl सबकी आँखें टंग गयीं, जैसे सबको किसी साँप ने एक साथ छू लिया होl"6

 

'रामलाल' कहानी में रामलाल की भाभी के माध्यम से मार्कण्डेय ने पारिवारिक संबंधों में टूटन का यथार्थ चित्रण किया है। इस कहानी में तीन तरह की स्त्रियों का जीवन चित्रित हुआ है। पहली, रामलाल की पत्नी सरूपा जिसका अपने बहू से मधुर संबंध है। दूसरी, रामलाल की भाभी है, जो सरूपा के मरने के बाद उसकी बहू का शोषण करती है। वह बहू के चरित्र का भी गाँव में प्रचार-प्रसार अपनी मनगढन्त कहानी से करती है - "बहू, तुम्हारी तो जवानी-बुढ़ापा कुछ जान ही नहीं पड़ता। एक हम लोगों का समय था कि हाथ पैर में बिजलियाँ दौड़ा करती थीं। देखो, मेरे पेट में बड़ा दरद हो रहा है, जरा चिलम भर के लाओ, तब पैर में हाथ लगाओ।"7  रामलाल की भाभी परिवार तोड़ने वाली स्त्री के रूप चित्रित की गई हैl ऐसी कहानियों को लिखकर मार्कंडेय ने यह संकेत जरुर किया है कि सामन्तवादी और पितृसत्तात्मक व्यवस्था का पोषक केवल पुरुष ही नहीं बल्कि कुछ स्त्रियाँ भी हो सकती हैंl

 

'सात बच्चों की माँ' की सन्नों के चरित्र के माध्यम से स्त्री के शारीरिक शोषण का यथार्थ चित्रण किया गया है। सन्नो सात बच्चों की माँ है। उसकी गरीबी और कमजोरी का फायदा समाज का प्रत्येक वर्ग उठा चुका है। उसका यौन-शोषण जमींदार, पंडित और बनिया आदि वर्गों ने समय-समय पर किया है, लेकिन उसे कोई अपना मानने के लिए तैयार नहींl उसका पति उसके चरित्र को कलंकित कहकर उसे प्रताड़ित करता है। वह केवल मशीन बनकर रह गयी है। स्त्री जीवन की त्रासदी का यथार्थ चित्रण करते हुए मार्कण्डेय लिखते हैं- "वह बहुत रोयी कलप-कलप कर और कहने लगी, मुझे मार डालो, मुझे मार डालो, यही तो मैं चाहती हूँ..मुझे खूब ताना मारो, जिसमें मेरा कलेजा फट जाए। अब मैं जीना नहीं चाहती पंडित, मैं यही तो चाहती थी कोई मुझसे पूछे, मुझे डाँटे, मुझे मारे, मुझे रास्ते पर लाए। मैं तो केवल मशीन थी, भूख और अंधेरे में राक्षस मुझे खाते रहेl8 उसके शोषण का कारण केवल गरीबी नहीं बल्कि उसका स्त्री होना भी हैl मार्कण्डेय ने सन्नो के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि स्त्री भले ही अपने को ताकतवर बनाने की कोशिश करे लेकिन पुरुषवादी व्यवस्था में उसका कोई अस्तित्व नहीं हैl

 

'कहानी के लिए नारी पात्र चाहिए' मार्कण्डेय की ऐसी कहानी है जो स्त्रियों के कई रूपों को एक साथ प्रस्तुत करती है। उन्होंने चाची, प्रोफेसर, महिला मित्र और अन्य दोस्त जैसे काल्पनिक पात्रों के माध्यम से समाज के यथार्थ से जोड़ने का प्रयास किया है। चाची एक पारंपरिक स्त्री की प्रतिनिधि है जो स्त्री जीवन को परंपरा का विरोधी नहीं चाहती। प्रोफेसर मध्यवर्ग का प्रतिनिधि है जो स्त्री को शिक्षित, स्वतंत्र, सौन्दर्यशालिनी और प्रेमिका के रूप में चित्रित करने का पक्षधर है। महिला मित्र के अधिक निकट होने के कारण कहानीकार उसके मन की बात जानना चाहता है तो महिला मित्र कहती है – “स्त्री-पुरूष में यदि सांस्कृतिक विचारों को छोड़ दिया जाए तो कुछ भी भेद नहीं है। यह सारे नियम, बंधन पुरूष के अपने गढ़े हुए हैं। यदि स्त्री भी वास्तविक समानता का दावा करती है तो उसे मानसिक स्वतंत्रता पहले अर्जित करनी होगी।"9

 

'कहानी के लिए नारी पात्र चाहिए' कहानी में संध्या, रमोला, लक्ष्मी और जमुना बारिन के द्वारा मार्कण्डेय स्त्री जीवन का यथार्थ चित्रण करते हैं। पहली स्त्री पात्र संध्या हैl वह पढ़ी-लिखी हैl वह विजातीय लड़के से प्रेम करती है और उससे विवाह करके स्वच्छंद जीवन व्यतीत करना चाहती है, लेकिन उसकी चाची को उसका यह चरित्र ठीक नहीं लगता है। मार्कंडेय इस प्रसंग के माध्यम से पारंपरिक और आधुनिक स्त्री के दृष्टिकोणों में द्वंद्व निर्मित करते हैंl दूसरी स्त्री पात्र रमोला है। वह एक प्रोफेसर की शिष्या है। प्रोफेसर रमोला से प्रेम करता है। वह उसे अनेक प्रकार का प्रलोभन देता है। वह विवाह करने की आड़ में रमोला का यौन-शोषण भी करता है। इतना ही नहीं वह अपने दोस्तों के साथ रमोला का सामूहिक बलात्कार करने की कोशिश भी करता है। लेकिन रमोला अपने आत्मस्वाभिमान की रक्षा करते हुए उसकी हत्या कर देती है और कहती है- "मैं जेल जाऊँगी। मैं लडूंगी, मैं खून करूंगी। क्या मैं मोम की पुतली हूं कि जो जैसे चाहे, मुझे इस्तेमाल करेंl10 कहानी में तीसरी स्त्री पात्र लक्ष्मी है उसके जीवन में धन का बहुत महत्व है। वह प्रणय को धन की दृष्टि से देखती है। उसका विवाह एक सेठ से होता है, आगे चलकर संबंधों में तनाव होने से उसका तलाक हो जाता हैl लक्ष्मी धन लोलुप है, परन्तु वह ताकतवर भी है। कहानी में चौथी स्त्री पात्र जमुना बारिन है जिसका जीवन 'सात बच्चों की माँ कहानी की सन्नो से मिलता-जुलता है। जमुना बारिन के आठ विवाह हो चुके हैं। उसका यौन-शोषण समाज का प्रत्येक वर्ग कर चुका है। अब उसे अपनाने वाला कोई नहीं है। वह कहती है- " मैंने कुछ नहीं किया है रे लेखक! क्यों नहीं पूछता उन सारे लोगों से, जिन्होंने मुझे ऐसा बनाया। देखता नहीं, यह पंडित, वह जमींदार का छोकरा और महाजन का छोटा भाई, सभी मेरे साथ सो चुके हैं, पर सब मुझे गाली देते हैं और जब- जब मेरे पेट में बच्चा आया उन्होंने पंचायत करके नाजायज करार दिया और मुझे गाँव से बाहर निकाल दियाl”11 ऐसा प्रतीत होता है कि मार्कंडेय ने इन चार स्त्री पात्रों के माध्यम से अपने पूरे युग की स्त्रियों की वास्तविक स्थिति को अनुभूत कर लिया होl

 

महुए का पेड़ (1955) कहानी संग्रह कीएक दिन की डायरीकी सुशीला, ‘मिस शांताकी शांता औरमहुए का पेड़की दुखना और हरखू की माँ का रूप पहले कहानी संग्रह की स्त्री पात्रों से बदला हुआ और सशक्त दिखाई पड़ता हैl महुए का पेड़' कहानी में दुखना ग्रामीण जीवन की स्त्री है। जिसके जीवन में महुए के पेड़ के अलावा कुछ नहीं है। वही उसकी संतान है, सब कुछ है। महुए के पेड़ पर ठाकुर की नजर गड़ी हुई है, वह उसे कटवाना चाहता है। जब दुखना के कान में यह बात पड़ती है तब उसका सशक्त रूप सामने आता है। वह निरीह स्त्री जिसके आस-पास कोई नहीं है, लेकिन दुखना आत्मनिर्भर, आत्मनिर्णय और आत्मसम्मान से युक्त है। वह आर्थिक रूप से कमजोर है, परन्तु अपने अधिकार के प्रति सचेत है।

 

हंसा जाई अकेला (1957) कहानी संग्रह केकल्यानमनकी मंगी, ‘सोहगईलाकी रनिया औरहंसा जाई अकेलाकी सुशीला का रूप बदलता हुआ दिखता हैं जहाँ ये सभी पात्र प्रेमचन्द की स्त्री पात्रों से जुडती हैं वहीं आजादी के बाद स्त्री मुक्ति और अधिकारों के सवालों को सीधे-सीधे उठाती हैंl 'कल्यानमन' स्त्री जीवन की एक महत्वपूर्ण कहानी है। इसमें मंगी एक दलित स्त्री है जो सिंघाड़े की खेती करती है। उसमें स्त्री के कर्तव्यों और अधिकारों की चेतना कूट-कूट कर भरी है। आजादी के बाद के जमींदार और पटवारी की कुचालों को वह भली भाँति समझती है। वह निर्भया है। वह कहती है- "कोई सेत का खाती हूँ जो लात गारी सहूँ। रात-दिन छाती पर बज्जर जैसे गगरा-बाल्टी ढ़ोती हूँ। बन्न कर दूँ तो सरने लगे रानी लोगl का हमरी देहियाँ माटी की है। का हमके देखे वाले की अखिया घुमची की हैl हमहूँ हाथ-पाँव में मेंहदी रचाय के बैठ सकती हैंl12 यह कहना गलत होगा कि मंगी जैसी स्त्री छवि अब तक लिखी गई ग्रामीण परिवेश की कहानियों में सबसे सशक्त छवि है। प्रेमचंद की धनिया, मूलिया आदि स्त्री पात्र भी चेतना के स्तर पर मंगी से पीछे हैं। मंगी जहाँ अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सचेत है, वही निर्णय लेने में सक्षम भी है। वह पुरुषवादी सत्ता का विरोध तो स्पष्ट रूप से नहीं करती है, परन्तु उस सत्ता के बलबूते समाज की दलित स्त्रियों पर शासन करने वाली सामंतवादी स्त्रियों के समक्ष कई सवाल खड़े करती है वह उन्हें सचेत करती है कि यदि उसकी जैसी स्त्रियाँ उनका काम धाम करें तो उनकी स्थिति बुरी और दयनीय हो सकती है। उसकी भी मनोकांक्षा है कि वह सौन्दर्य प्रसाधन करेl मंगी के अंदर दलित स्त्री चेतना का प्रबल प्रभाव तब दिखता है जब ठाकुर और पटवारी मिलकर 'कल्यानमन' तालाब पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश करते हैं। वह कहती है- "खेती चमरू करेगा, परताल ठाकुर के नाम से होगी बीच में पटवारी इधर से भी खाएगा, उधर से भी खाएगा। अब तो ये का किसान खाद हो गया है, खाद बस वह खेत बनाता है।"13 इस कहानी में मंगी का चरित्र स्त्री, किसान स्त्री और दलित स्त्री के रूप में उभरा है।

 

'हंसा जाई अकेला' कहानी में मार्कण्डेय सुशीला की छवि एक नये रूप में चित्रित करते हैं। वह एक लोकगायिका होने के साथ कांग्रेस की कार्यकर्ता है। वह सभाओं का आयोजन कर कांग्रेस के पक्ष में प्रचार करती है। समाज में उसकी छवि खराब है, क्योंकि वह राजनीति में भाग लेने वाली महिला है। उसी नयी वास्तविकता का यथार्थ चित्रण करते हुए मार्कण्डेय समाज के परिपक्व और शिक्षित लोगों की मानसिकता को कहानी में उभारते हैं- "औरत-सौरत का भासन यहाँ नहीं होने पाएगा। बहू-बेटियों पर खराब असर पड़ता हैl14 लेकिन इसकी परवाह सुशीला को नहीं है। वह राजनीति में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती है। कहानी में सुशीला की छवि राजनीतिक स्त्री के रूप में उभरती हैl

 

माही (1962) कहानी संग्रह मेंमाहीकी माही और रुक्मी औरसूर्याकी सूर्या अपनी पूर्ववर्ती स्त्री पात्रों से एकदम अलग हैंl वह पढ़ी-लिखी सशक्त और अपने  अधिकारों के प्रति जागरूक स्त्री हैंl 'माही' कहानी में मार्कण्डेय ने प्रयोग के तौर पर एक बार फिर से पारम्परिक और आधुनिक विचारों की स्त्री पात्रों को एक साथ रखा है लेकिन यहाँ उसका बदला हुआ रूप दिखाई पड़ता है पारम्परिक स्त्री आधुनिक स्त्री की प्रतिरोधी नहीं बल्कि समर्थक दिखाई देती हैl माही का चरित्र आधुनिक, स्वच्छंद और स्वतंत्र निर्णय लेने वाली स्त्री के रूप में उभरा है। माही के समानान्तर ही रूक्मी का चरित्र परंपरा में बंधा है। रूक्मी को माही की एक बात हमेशा याद रहती है- "आखिर डर किस बात की दीदी, जो बात जैसी है, उसे उसी तरह देखा जा सकता है। कभी आदमी अपने वश से बाहर भी तो हो जाता हैl15

 

बीच के लोग (1974) कहानी संग्रह कीप्रिया सैनीकी प्रिया का चरित्र माही के चरित्र का विस्तार है। प्रिया नृत्य-संगीत की शिक्षिका है। उसे नृत्य से बहुत लगाव है, उसके विषय में वह कहती है- "मैं तो सड़कों के किनारे, चौराहों पर भी नांच सकती हूँ, मजदूरों और किसानों के बीच नांच सकती हूँ क्योंकि मेरे जीवन और नृत्य दोनों का मंतव्य उनके जीवन से जुड़ा हैl16 प्रिया निर्भिक प्रेमिका है, अविवाहित रहते हुए भी वह प्रेमी के पुत्र को जन्म देने की इच्छा रखती है। लेकिन वह प्रेम को अपने पर हावी नहीं होने देतीl वह कहती है- "इसलिए कहने में कोई हिचक नहीं है कि अब से हम एक-दूसरे सदा के लिए अलग हैं। पूर्णतः अपरिचित और कभी एक-दूसरे से भूलकर भी मिलने की कोशिश अथवा इसका विचार करेंगे। "17 यह कहना गलत होगा कि मार्कण्डेय ने प्रिया सैनी के चरित्र को प्रस्तुत करके स्त्री बदलते रूप को दिखाया हैl उन्होंने जहाँ गुलरा के बाबा की चमेलिया जैसी परम्परा-निर्वाह करने वाली स्त्री को दिखाया वहीं प्रिया सैनी तक आते-आते प्रिया उनकी स्त्री पात्रों में सबसे अधिक सशक्त और अधिकारों के प्रति सचेत ऐसी स्त्री है जिसने जीवन के सही मायने तलाशे और अपनी इच्छाओं को उनसे जोड़ाl सारे स्त्री-विरोधी तत्त्वों की पहचान और उनसे एक स्वाभाविक विरोधी भाव रखने वाली प्रिया सैनी हर कदम पर उनके विरुद्ध मजबूती से खड़ी होती है। प्रिया सैनी एक लम्बी कहानी है उसे पढ़ने पर ऐसी अनुभूति होती है जैसे उसे कोई पुरुष नहीं बल्कि स्त्री ही लिख रही होl यह कहानी स्त्री विमर्श के मुख्य सवालों का प्रतिनिधित्व करती हैl

 

गुलरा के बाबा से लेकर प्रिया सैनी तक की कहानियों में स्त्री का बदलता हुआ रूप दिखाई पड़ता हैl मार्कण्डेय की कहानियों की मुख्य चिंता स्त्री-पुरुष संबंधों में संस्थागत सुधार की नहीं बल्कि बदलाव को लेकर है। जिस दृढ़ता के साथ माही, सूर्या, प्रिया आदि स्त्रियाँ अपने प्रेम और स्थितियों को बिना किसी हिचक के निडरता से अभिव्यक्त करती हैं और अपने वर्तमान के प्रति भी दृढ़ और ईमानदार रहते हुए पाठक के समक्ष खड़ी होती हैं, उनका यह रूप स्त्री मुक्ति और उसके सवालों के लिए एक मजबूत आधार निर्मित करता हैl सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि ये स्त्रियाँ पितृसत्ता से संघर्ष करती हुई अपने प्रेमी या पति के विरुद्ध भी जाती हैं। आज के स्त्रीवादी लेखन को मार्कण्डेय की कहानियों से यह रूप तो ग्रहण करना ही चाहिए कि स्त्री-जीवन की सहजता को बाधित या ख़त्म करने वाली हर पुरुषसत्तात्मक ताकत से आजादी को सबसे ऊपर रखना होगाl

 

संदर्भ :

1. सं दुर्गा प्रसाद सिंह - कहानीकार मार्कंडेय, साहित्य भंडार, इलाहाबाद-2017, पृष्ठ सं. 15

2. गोपाल राय हिंदी कहानी का इतिहास खंड-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2011, पृष्ठ सं. 268

3. मार्कण्डेय मार्कण्डेय की कहानियां, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद-2010, पृष्ठ सं. 05

4. वही, पृष्ठ सं. 16

5. वही, पृष्ठ सं. 37

6. वही, पृष्ठ सं. 37

7. वही, पृष्ठ सं. 50

8. वही, पृष्ठ सं. 73

9. वही, पृष्ठ सं. 77

10.  वही, पृष्ठ सं. 82

11.  वही, पृष्ठ सं. 85

12.  वही, पृष्ठ सं. 188

13.  वही, पृष्ठ सं. 192

14.  वही, पृष्ठ सं. 217

15.  वही, पृष्ठ सं. 341

16.  वही, पृष्ठ सं. 522

17.  वही, पृष्ठ सं. 537

 

डॉरजनीश कुमार यादव
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिंदी, राजेंद्र कॉलेज छपराजय प्रकाश विश्वविद्यालय छपराबिहार
rajneesh108.jnu@gmail.com, 9968361598


अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati), चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
अंक-47, अप्रैल-जून 2023 UGC Care Listed Issue
सम्पादक-द्वय : माणिक व जितेन्द्र यादव चित्रांकन : संजय कुमार मोची (चित्तौड़गढ़)

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