शोध आलेख : “निर्गुण काव्य में जीवन एवं मृत्यु की दार्शनिक अवधारणा” / आदित्य रंजन यादव

निर्गुण काव्य में जीवन एवं मृत्यु की दार्शनिक अवधारणा
आदित्य रंजन यादव


शोध सार : भारतीय चिंतन परंपरा में चिंतन का केंद्र बिंदु यह है कि कैसे मुक्ति या मोक्ष पाया जाए। यहां की चिंतन परंपरा मुख्यतः जीवन पर केंद्रित है। उसके चिंतन का सबसे बड़ा भाग जीवन को समर्पित है।  यहां ऐसा माना गया है कि जीवन दुखमय है। इन दुखों से बाहर निकलना है और जिसे हम सामान्य बोलचाल में मृत्यु कह देते हैं वह एक तरह से इस जीवन के इन अपार दुखों से मुक्ति का रास्ता है। इसे दुखवादी दृष्टिकोण नहीं कह सकते हैं बल्कि एक तरह से मृत्यु संबंधित चिंतन को भारतीय परंपरा ने जीवनधारा से संबंधी चिंतन की ओर मोड़ दिया। इस शोध आलेख में यह देखने की कोशिश की गई है कि भक्ति काल की निर्गुण धारा किस प्रकार जीवन और मृत्यु की अवधारणा पर अपने साहित्य में उतरती है। साथ ही निर्गुण कवियों के इस दार्शनिक चिंतन पर किसका प्रभाव सर्वाधिक देखा जा सकता है, इसे इस आलेख में देखने का प्रयास किया जाएगा।

बीज शब्द : पँचमहाभूत, मोक्ष, वेदांत , उपनिषद्, आत्मा, जीवन, मृत्यु, मोक्ष , कठोपनिषद्, द्वैतभाव, आत्म-संस्कार, बौद्

मूल आलेख : जन्म और मृत्यु के मध्यकाल का नाम ही जीवन है। जीवन अनिश्चित अवधि में बद्ध होता है और इस अवधि की कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं है। जब मनुष्य मरता है तब यही कहा जाता है कि व्यक्ति की जीवन- गति समाप्त हो गई।  वास्तविकता यही है मृत्यु जीवन की प्रत्यक्ष अंतिम सीमा है। यह कोई नहीं जानता कि किसके जीवन की सीमा कहाँ है ? अर्थात् वह कब मृत्यु को प्राप्त होगा। यह जीवन का ऐसा रहस्य है जिसमें जीवन के गूढ़ रहस्य का स्पष्टीकरण भी निहित है। यहां रहस्य एवं स्पष्टीकरण का चिन्तन, मनन जीवन की विस्तृतता का द्योतक है। भारतीय चिंतन धारा में मृत्यु को किसी दुखद पड़ाव की तरह देखते हुए इसे सिर्फ आत्मा का शरीर परिवर्तन बताया गया है। भक्तिकाल की निर्गुण धारा में भी यह चिंतन मुख्य रूप से देखा जा सकता है। ज्ञानमार्गी कबीर भी इस संबंध में चिंतन करते देखे जा सकते हैं और प्रेममार्गी कवि भी जीवन-मृत्य के चक्र की दार्शनिक अवधारणा से प्रभावित देखे जा सकते हैं। इस आलेख में निर्गुण कवियों के इस दार्शनिक चिंतन का स्वरूप और उसके स्रोत पर विचार किया जाएगा।

भारतीय मान्यता है कि जो कुछ भी मूल नहीं है अवश्य ही समाप्त होगा। हमारा शरीर मूल नहीं है यह तो हमें ज्ञात ही है। पँन्चमहाभूत अर्थात पाँच अवयवों से मिलकर बनने वाला यह शरीर एक दिन अवश्य खत्म होगा। स्थानीय कहावतों के सहारे कहें तो माटी का यह देह माटी में ही मिल जायेगा। हमारा जन्म अलग अलग अवयवों से मिलकर बना हुआ है जिनका अलग होना तय है। इस संदर्भ में श्रीमद्भागवात में कहा गया है कि, हे महान वीर, जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है, क्योंकि मृत्यु शरीर के साथ जन्म लेती है। कोई आज या सैकड़ों वर्षों के बाद मर सकता है, लेकिन हर जीव की मृत्यु निश्चित है।

मृत्युर्जन्मवतां वीर देहेन सह जायते  अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुव:।। [1]

प्रो० हिरियाना लिखते हैं कि  "पाश्चात्य दर्शन की भाँति भारतीय दर्शन का आरम्भ आश्चर्य एवं उत्सुकता से होकर जीवन की नैतिक एवं भौतिक बुराइयों के शमन के निमित्त हुआ था। दार्शनिक प्रयत्नों का मूल उद्देश्य था जीवन के दुःखों का अन्त ढूँढ़ना और तात्त्विक प्रश्नों का प्रादुर्भाव इसी सिलसिले में हुआ।"[2] भारत में दर्शन की चर्चा ज्ञान के लिए होकर मोक्षानुभूति के लिए हुई है। अतः भारत में दर्शन का अनुशीलन मोक्ष के लिए ही किया गया है। दर्शन का आरम्भ आध्यात्मिक असन्तोष से हुआ है। भारत के दार्शनिकों ने विश्व में विभिन्न प्रकार के दुःखों को पाकर उनके उन्मूलन के लिए दर्शन की शरण ली है। प्रो मैक्समूलर की ये पंक्तियों इस कथन की पुष्टि करती है-" भारत में दर्शन का अध्ययन मात्र ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं, वरन् जीवन के चरम उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किया जाता था।'[3]

इस प्रकार भारतीय चिंतन धारा ध्यान,योग, निष्काम कर्म एवं ज्ञान आदि तत्वों के संयोजन से संसार के इन आकस्मिक उलझनों तथा माया के बंधनों से मुक्ति की सफल व्याख्या देती है। जिसकी कालातीतता इसकी वैज्ञानिकता को भी परिभाषित करती है।  समग्रतः कहें तो ऐसा माना जा सकता है कि यहां जीवन में जन्म एवं मृत्यु को सिर्फ दो बिंदुओं के रूप में देखकर इसके बीच की बात की गई है यहां जन्म के बाद एवं मृत्यु के पहले जीवन के तौर-तरीकों एवं व्यवस्थाओं पर सुगठित एवं सार्थक चिंतन उपरांत जीवन में मृत्यु के विभिन्न मार्गो का रास्ता खोला गया है। यह हमारे मस्तिष्क को जीवन पर एकाग्र चित्त करते हुए सांसारिक बंधनों से मुक्ति एवं सकारात्मक कामनाओं की पूर्ति तथा नकारात्मक कामनाओं की त्याज्यता की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त कर रही है।

जीवन और मृत्यु के चक्रों की तुलना सोने और जागने की वैकल्पिक अवधियों से की जा सकती है। जिस तरह नींद हमें अगले दिन की गतिविधि के लिए तैयार करती है, उसी तरह मृत्यु को एक ऐसी अवस्था के रूप में देखा जा सकता है जिसमें हम आराम करते हैं और नए जीवन के लिए खुद को भरते हैं। इस ब्रह्मांड में अगर एक कोई चीज निश्चित है तो वह है मृत्यु। जीवन के आरंभ के दिन ही मृत्यु निश्चित हो जाती है, फूल के खिलने के साथ ही यह तय हो जाता है कि  एक दिन यह मुरझा जाएगा। लेकिन फिर भी भारतीय चिंतन धारा में आरंभ से ही मृत्यु एक महत्वपूर्ण विषय बनकर सामने आता है। मृत्यु के भय से उबरना हो या जीवन में जीवन मरण के चक्र से मुक्त होकर जीवन यापन करना यह सब दार्शनिक चिंतन का विषय रहा है और भारतीय साहित्य का भक्तिकाल जो कि जीवन से जुड़ा हुआ साहित्य है, इसमें सायास अनायास जीवन और मृत्यु की दार्शनिक अवधारणा देखी जा सकती है। 

रैदास कहते हैं कि जन्म के समय कैसा हर्ष और मृत्यु पर कैसा दुःखयह तो ईश्वर की लीला है। संसार इसे नहीं समझ पाता। जिस प्रकार लोग बाज़ीगर के तमाशे को देखकर हर्षित और दुःखी होते हैंउसी प्रकार ईश्वर भी संसार में जन्ममृत्यु की लीला दिखाता है। अतः ईश्वर के इस विधान पर हर्षित अथवा दुःखी नहीं होना चाहिए।[4] इसे ही कबीर के एक दोहे में देखें तो वे कहते हैं किमृत्यु रूपी माली को आता देखकरजीव कहता है कि जो पुष्पित थे अर्थात् पूर्ण विकसित हो चुके थेउन्हें काल चुन ले गया। कल हमारी भी बारी  जाएगी। अन्य पुष्पों की तरह मुझे भी काल कवलित होना पड़ेगा। अर्थात इस जीवन मरण चक्र से कोई बच नहीं पाया है, कोई धर्म कोई दर्शन इस विषय में नहीं बताता की किस प्रकार मृत्य से विजय पाई जा सकती है, बल्कि भारतीय दर्शन और निर्गुण साहित्य में भी जीवन में मृत्यु के भय से बचते हुए जीवन के सद्मार्ग की बात की गई है।

माली आवत देखि के, कलियाँ करैं पुकार।  फूली-फूली चुनि गई, कालि हमारी बार॥

            निर्गुण धारा में संत साहित्य के पीछे जो दार्शनिक प्रेरणा रही है उसके संबंध में विद्वानों ने वेदांत और उपनिषद् में प्रतिपादित निर्गुण ब्रह्मवादी विचारधारा को मुख्य प्रेरक शक्ति के रूप में निरूपित किया है। संत साधक और उनके अग्रणी कबीर को लोगों ने यही समझा है कि वे जीव, आत्मा और प्रकृति संबंधी अपनी मान्यताओं को व्यक्त करने में मुख्य रूप से प्राचीन हिंदी परंपराओं  और विशेष रूप से निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन करनेवाले ग्रंथों और महात्माओं से प्रभावित हुए थे। निर्गुण ब्रह्म की इसी मान्यता के आधार पर कबीर में अद्वैत दर्शन के प्रति दृढ़ आस्था दिखलाई देती है। किंतु कबीर का अद्वैतवाद सगुण और निर्गुण के परंपरागत भेद पर आधारित नहीं दिखता है। प्राचीन वैदिक और उपनिषद् काल की परंपरा में तो निर्गुण ब्रह्म के प्रतिपादन के साथ ही अद्वैतवाद का प्रतिपादन समझा जाता है।कबीर के सूक्ष्म दार्शनिक विचारों को पूर्णरूप से समझने के लिये हमें उनकी एक ही दो उक्तियों पर नहीं, बल्कि उनकी सब रचनाओं पर एक साथ विचार करना होगा ऐसा करने से इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि वे पूर्ण अद्वैत थे।'”[5]

उपनिषदों में स्पष्ट ऐसा वर्णित है कि जिसकी संपूर्ण कामनाएँ नष्ट हो जाती है और ज्ञान और विद्या के द्वारा उपलब्ध आत्म लाभ और ब्रह्म भाव के होने पर अविद्या और मायाके सभी रूप नष्ट हो जाते हैं वही अमरत्व है संपूर्ण वेदांतों का बस इतना ही अनुशासन बतलाया गया है। उनके अनुसार वास्तव में कामनाओं का अभाव ही मोक्ष है।

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः , अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते

"यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह प्रन्थयः अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध चनुशासनम् [6]

निर्गुण संत शिरोमणि कबीरदास भी इन्हीं विचारों का समर्थन और प्रतिपादन करते हैं। उनकी वाणी तथा उपनिषद् के वचनों में यहाँ अपूर्व समानता देखी जा सकती है। कबीरदास मुक्ति की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि मुक्ति की उपलब्धि तो जीवित अवस्था में ही होनी चाहिए। जो लोग जीवन काल में ही अपने कर्म के बंधन को काट नहीं सके, उन्हें मरने के उपरांत मोक्ष की आशा करना सर्वथा व्यर्थ है। कबीरदास तो प्रत्यक्ष सत्य और अनुभूत सत्य पर विश्वास करनेवाले थे।[7] उनकी उक्ति है कि,-

साधो भाई, जीवत ही करो आसा जीवत समझे जीवत बूझे, जीवत मुक्तिनिवासा                                    

जीवत करम की फांसन काटी, मुए मुक्ति की श्रासा तन छूटे जिव मिलन कहत है, सो सब झूठी यासा |[8]

संत कवि कबीरदास जी का यह मत स्पष्ट रूप से उनके साहित्य में आता है कि मृत्यु के पश्चात मोक्ष पाने का प्रयत्न श्रेयस्कर नहीं है। उचित तो यह है कि इसी जीवन में मुक्त होने का प्रयत्न किया जाय। मनुष्य को इसी जीवन में अपनी आत्मा को सांसारिक बन्धनों से छुटकारा दिलाना चाहिए। कबीर के शब्दों में उसे 'मरजीवा' अर्थात् "जीवन्मृत' बनने का प्रयत्न करना चाहिए। अतः उन्होंने इसी जीवन में इन्द्रियों को पूर्णतः अपने वश में करके माया के जंजाल से निकलने की रीति बतलाई है। माया का प्रभाव मन पर पड़ता है। मन ही माया के अस्त्र काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह आदि का लक्ष्य बनता है- 'मन पांचों के बस परा, मन के बस नहिं पांचऔर इसी कारण जीव व्यथित रहता है।

कबीर के ईश्वरवादी विचार वेदांत से प्रभावित एवं अत्यंत निकट हैं। कबीर के दोहों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि कबीर जीव एवं ब्रह्म की पूर्ण एकता में अटूट विश्वास रखते थे:-“हेरत- हेरत हेरिया, रहा कबीर हिराय बूंद समानी समुंद्र में, सो कत हेरी जाय।[9] कबीर कवि के रूप में जीवन के जितने निकट हैं, उतने ही एक वेदज्ञ के रूप में ब्रह्म के निकट देखे जा सकते हैं।  यदि वेदांत की दृष्टि से देखें तो जीव और ब्रह्म समन्वित प्राप्त नहीं होते। उपनिषद की भी श्रुति यही कहती है कि जीव और ब्रह्म दोनों शरीर रूपी वृक्ष पर निवास करते हैं, इनमें एक संसार बृक्ष के फलों का भोग करता है और दूसरा भाग देखता है :-  

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति [10]   

मोक्ष शरीर के बाहर अन्यत्र नहीं है उसका वास शरीर के भीतर है। बाहर ढूंढ़ने का प्रयास उसी प्रकार भ्रमात्मक है, जिस प्रकार मृग अपने ही भीतर स्थित कस्तूरी को नहीं पहचानता और बार बार घूमकर घास में उसे ढूँढ़ता है। वास्तव में मनुष्य के हृदय में जब तक ममता, मोह और श्रासक्ति बनी हुई है तब तक मोक्ष प्राप्ति की सफलता कभी संभव नहीं जब मनुष्य ममता और मोह पर विजय प्राप्त कर लेता है तब प्रभु स्वयं उसकी सफलता के साधन प्रस्तुत करते हैं। ममता के नाश होने पर ही सच्चे ज्ञान का उदय होता है। सच्चा ज्ञान होने पर कर्मों का नाश हो जाता है। उससे प्रणीत सब बंधन नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य के सभी कर्म फूल के समान हैं। उनका उद्देश्य फल रूपी मोक्ष की प्राप्ति, कर्म के बंधन से मुक्त होना है जब मोक्ष की सिद्धि हो जाती है तो फूल रूपी कर्म अपने आप नष्ट हो जाते हैं कबीर ने सदैव आत्मा को परमात्मा का अंश स्वीकार किया है। अद्वैतवादियों की तरह ब्रह्म और आत्मा में एकता स्थापित की है, और उनको अंश अंशी के रूप में सर्वत्र अवस्थिति मानी है। इसीलिये उनका प्रिय के लिये संदेश प्रेषण का प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि वह तो प्रतिक्षण उनके पास ही विद्यमान रहता है।[11]

"प्रियतम को पतियाँ लिखूं, जो कहि होय बिदेस

तन में, मन में, नैन में, ताकों कहा संदेस

जैसा की शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में हम देखते हैं  ब्रह्म के साक्षात्कार के लिये आत्मा रूपी प्रियतमा विकल है, मिलन नहीं होता। क्षण-क्षण युग-युग-सम बीत रहे हैं। यह विरह यद्यपि क्षणिक ही है। कबीर ने शरीर में व्याप्त आत्मा को दो रूपों प्राप्त और प्राप्तव्य के रूप में स्वीकार किया है। कबीर के अनुसार आत्मा-परमात्मा अभिन्न हैं। केवल माया के आवरण के कारण ये दोनो भिन्न प्रतिभासित होते हैं। जब यह शरीर जो माया महल है, नष्ट हो जाता है, तो आत्मा फिर अपने उसी स्वरूप में जा मिलती है जिसका कि अंश है।

"जल में कुंभ, कुंभ में जल है। बाहर-भीतर पानी ।फूट्यो कुंभ जल जलह समाना यह तथ्य कथ्यौ गियानी |"

            शंकराचार्य के वेदान्त का भी यही मत है। अगर हम कुछ विषयांतर होकर सगुण धारा से उदाहरण लें तो गोस्वामी तुलसीदास भी ने इसे स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है-"ईश्वर अंश जीव अविनासी