आलेख : कबीर मेला के बहाने अस्पृश्यता और सांप्रदायिकता से जंग / सुजीत कुमार सिंह

कबीर मेला के बहाने अस्पृश्यता और सांप्रदायिकता से जंग
सुजीत कुमार सिंह

        बीसवीं सदी का चौथा दशक औपनिवेशिक भारतीय समाज के लिए काफ़ी उथल-पुथल भरा था। पूना-समझौता और हिंदू-मुस्लिम संघर्ष ने हिंदी लेखकों के सामने एक चुनौती खड़ी कर दी कि हमारा  समाज समरस कैसे बने? इस काल की मुद्रित सामग्री देखने से पता चलता है कि हिन्दी के लेखक अपने-अपने ढंग से इसका सामना कर रहे थे।


            कलकत्ता से निकलने वाली हिंदी की प्रमुख पत्रिकाविशाल भारतके अंकों को उलटते-पलटते मेरा ध्यानकबीर-मेलेपर गया। बनारसीदास चतुर्वेदी अपनेसंपादकीय विचारमें लगातार अस्पृश्यता और सांप्रदायिकता पर लिख रहे थे। यही नहीं, वे अन्य लेखकों से भी लिखवा रहे थे। सितंबर 1930 के अंक में रामेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव की कहानीअछूतछापा तो मई 1933 के अंक में माधवराव विनायक किबे का लेखहिंदू-मुस्लिम समस्या फरवरी 1933 केसंपादकीय विचारमें बनारसीदास चतुर्वेदी ने आर.वी. शास्त्री संपादित अँगरेज़ी साप्ताहिक पत्रहरिजनका ग्राहक बनने के लिए जनता से निवेदन किया। इसी अंक में एक टिप्पणीअस्पृश्यता की औषधि - बौद्ध धर्मशीर्षक से लिखा मिलता है तो मार्च 1933 अंक मेंभगवान बुद्ध और जाति-भेदशीर्षक से।साम्यवाद और सांप्रदायिकतामें वे दावा करते हैं कि राजनैतिक आकाश में छाये अंधकार को दूर करने के लिएसाम्यवाद का प्रचार प्रचंड मार्तण्ड का काम देगा।मई 1933 केसंपादकीय विचारमें एक दिलचस्प जानकारी यह मिलती है कि मैसूर के नवाब साहब और दतिया राज्य के सनातनी हिन्दू महाराजा ने क्रमशः एक मन्दिर और मस्जिद की नींव रखी थी।


            बनारसीदास चतुर्वेदी नेविशाल भारतके जून 1933 के अंक में अपनेसंपादकीय विचारस्तंभ मेंकबीर-मेलाशीर्षक टिप्पणी में हिंदी जनता से निवेदन करते हुए लिखा :


        हिंदी जनता के सम्मुख आज हम एक प्रस्ताव रखना चाहते हैं, वह यह कि हिंदी-भाषा-भाषियों की ओर से कबीर उत्सव मनाया जाय। उस अवसर पर कबीर के ग्रंथों का एक सुसंपादित संस्करण प्रकाशित हो, कबीर के विषय में निबंध लिखाये जायें, उनका संग्रह छपाया जाय और कबीर तथा अन्य संत कवियों के साहित्य को अधिक लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न किया जाए।

        कबीर की रचनाओं को हम कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानते हैं; एक तो यह कि वह जाति-भेद तथा सांप्रदायिकता की दुर्गंधमय दायरे से कहीं ऊँची हैं, और दूसरी यह कि मानव-समाज की आध्यात्मिक प्यास को बुझाने के लिए जितना मसाला कबीर में मिलता है, उतना अन्य किसी हिंदी कवि में शायद ही मिले। भारत के - भारत के ही नहीं, संसार केदो महापुरुष महात्मा गांधी तथा कवींद्र रवींद्र कबीर के बड़े प्रशंसक हैं, और दोनों से ही इस पुण्यकार्य में आशीर्वाद के अतिरिक्त और भी सहायता मिल सकती है।


        इस कार्य की आयोजना में डेढ़-दो वर्ष से कम लगेंगे। यदि अधिक लग जायँ, तब भी कोई हर्ज नहीं, पर कार्य होना चाहिए सुव्यवस्थित ढंग पर। पंडित सुंदरलाल जी से हम प्रार्थना करेंगे कि वे इस काम को हाथ में उठा लें। वह कबीर के बड़े भक्त हैं भी, और उन्होंने अपनी पुस्तकभारत में अँगरेज़ी राज्यकबीर को ही अर्पित की थी। कबीर ही भारत के भावी युग के आदर्श कवि हैं।


        हिंदू कहें राम मोहि प्यारा, तुरक कहे रहिमाना;

          आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म काहू जाना।


        कबीर का यह दोहा कितना सामयिक है। कबीर-मेला का जो कार्यक्रम रखा जाय, उसमें मगहर की यात्रा भी सम्मिलित होनी चाहिए।विशाल भारतके पाठकों से हम प्रार्थना करते हैं कि इस विषय में वे अपनी सम्मति और परामर्श हमें भेजने की कृपा करें।


        दरअसल उक्त प्रस्ताव बनारसीदास चतुर्वेदी का नहीं था। यह योजना थी - बाबा राघवदास की। यह पंडित सुंदरलाल के पत्र से भी पुष्ट होता है। 56 चक, इलाहाबाद से पंडित सुंदरलाल ने बनारसीदास चतुर्वेदी को एक पत्र लिखा। वह पत्र जुलाई 1933 केविशाल भारतमें प्रकाशित है -


प्रियवर,

इस महीने केविशाल भारतमें आपकाकबीर-मेलाशीर्षक नोट पढ़कर चित्त बड़ा प्रसन्न हुआ। कबीर के विषय में मेरे विचार तो आप जानते ही हैं। आपने उनका उल्लेख भी अपने नोट में किया है। भविष्य के लिए मैंकबीरही को बहुत दर्जे तक भारत का पथ-प्रदर्शक मानता हूँ।कबीरही अकबर का मानसिक-पिता था। सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में जो समन्वय कबीर ने उत्पन्न करना चाहा, अकबर ने देश के राजनैतिक जीवन में उसी को लक्ष्य मानकर, उसी के अनुसार अपने को, साम्राज्य को तथा देश को ढालना चाहा। इन दोनों महान आत्माओं को कहां तक सफलता हुई और उस स्थिति में कहां तक हो सकती थी, यह दूसरी बात है; किंतु आज तीन सौ वर्ष के बाद भी ज़माने-भर के झकोले खाने के बाद संसार की गति हमें स्पष्ट बता रही है - नाऽन्ये पन्था विद्यते अयनाय।


भारत के लिए सिवा इसके कोई दूसरा मार्ग नहीं। केवल इतना ही नहीं, मैं आपके इस विचार से भी अक्षरशः सहमत हूँ कि मानव-समाज की आध्यात्मिक प्यास को बुझाने के लिए भी कबीर एक अनंत स्रोत हैं।


चंद महीने हुए, चिरंजीव विश्वम्भरनाथ के द्वारा श्रद्धेय बाबा राघोदास जी ने जेल से मेरा ध्यान इस ओर दिलाया था। दूसरी झंझटों के कारण मैं अभी तक कुछ कर सका। अब मुझे बड़ा हर्ष है कि आप जैसे कर्तव्यपरायण सज्जन का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ है। मैं अपनी शक्ति-भर जितना भी हो सकेगा, इस महान और पवित्र कार्य में आपका साथ देना अपने लिए सौभाग्य की बात समझूंगा। आपके निमंत्रण परकबीरके अन्य प्रेमियों के विचार मालूम होने पर मैं स्वयं आपसे मिलकर इस विषय में अधिक बातचीत करूंगा।


आपका भाईसुंदरलाल।


        अब यह देखना दिलचस्प होगा कि तत्कालीन हिंदी समाज ने इस मेले को किस अर्थ में ग्रहण किया और कबीर के प्रति उनकी भावनाएँ कैसी थीं?


(एक)


            अछूतोद्धार-आंदोलन से जुड़े मंगलदेव शर्मा ने एक लम्बा पत्र चतुर्वेदी जी को लिखा। इस पत्र कोविशाल भारतके अगस्त 1933 के अंक मेंचिट्ठी-पत्रीस्तंभ में स्थान दिया गया। मंगलदेव शर्मा ने लिखा -


            आपका प्रस्ताव अत्यंत सामयिक और उपयोगी है।  भारत के राजनीतिक और सामाजिक वर्तमान विग्रह-युग में देश को एक ऐसे मार्ग-निदर्शन की आवश्यकता है, जो दिशा भूले लोक-समुदाय का नेतृत्व आलोकपूर्ण वातावरण की ओर कर सकने की क्षमता रखता हो।


            मंगलदेव शर्मा ने कबीर का गहन अनुशीलन किया था। अतः उनका मानना था कि वह क्षमता सिर्फ कबीर को प्राप्त है। कबीर नेअपने समकालीन जनसमुदाय की मंगल-कामना से प्रेरित होकर जो वचन कहे हैं, जो चेतावनियां दी हैं, उनमें आज भी उतना ही जीवन, उतनी ही नवीनता और उतनी ही उपादेयता विद्यमान है।


            हिंदी-समाज ने कबीर की उपेक्षा क्यों कीइसका कारण बताते हुए मंगलदेव शर्मा ने लिखा :


            कबीर द्रष्टा थे - विलक्षण और अलौकिक। वर्तमान लोक से उनकी संगति बैठी थी। उनकी विचार-धारा एकदम ऊर्ध्वगामी और क्रांतिशील थी, इसीलिए तत्कालीन मानव-समाज ने उनको समादृत किया। कबीर के क्रांतदर्शी विचारों के तीव्र प्रकाश को स्थितिपालक याकंसर्वेटिवसमाज सहन कर सका। रीति-नियमों के चिर-अभ्यस्त जनसाधारण कबीर के अनुभूत विमल जीवन-मार्ग का अनुसरण कर सके। अपनी स्वाभाविक दुर्बलता के वशीभूत होकर अन्य समीक्षकों और द्रष्टाओं के उपदेशों को दैनिक जीवन में व्यावहारिक स्थान देकर उनके व्यक्तित्व की पूजा करने लगने के अभ्यासी लोग कबीर को भी पूजने लगे, और निरर्थक रूप में उनका एक पन्थ चला बैठे।


            मंगलदेव शर्माकबीर-पन्थऔर उनके पूजा-भाव की तीव्र आलोचना करते हैं। वे कबीर की वाणी को यथार्थ रूप में देखना चाहते हैं। अतः अब समय गया है कि हम कबीर का उसके वास्तविक रूप में आदर करें। यह हमारा दुर्भाग्य था कि हमने कबीर को अब तक नहीं पहचाना। इस महात्मा ने केवल धार्मिक दृष्टि से, अपितु राष्ट्रभाषा हिंदी पर बड़ा उपकार किया है। इनकी समस्त वाणी हिंदी में है - ऐसी भाषा में, जिसे हम जनसाधारण की बोली हिंदुस्तानी कह सकते हैं, और जो निर्मल नीर की भांति ज्ञानपिपासु के हृदय में उतरती चली जाती है। शुद्ध साहित्यिक दृष्टि से भी कबीर ने सूर और तुलसी से कम हम पर अहसान नहीं किया है। केवल इसी कारण हिंदी वाले आदि कबीर-मेला का योजना करें, तब भी वे अपने कर्तव्य का ही पालन करेंगे।


            मंगलदेव शर्मा ने कबीर कोआदर और आकर्षण की वस्तुकहा है। लोग कबीर को निरक्षर कहते हैं किन्तु मंगलदेव शर्मा की दृष्टि में कबीर गीता का स्थितिप्रज्ञ, इस्लाम का सूफ़ी और भारतीय दर्शन का अद्वैतवादी वेदांती था। उसने आजीवन सामाजिक त्रुटियों का डंके की चोट व्यावहारिक विरोध किया; उसका मार्ग संसार से निराला था; उसने धर्म की वाह्य रीति-रिवाजों को ही मनुष्य-जीवन की चरमसीमा मान बैठने वाले समाज की तीव्र आलोचना करने में ज़रा भी रू-रिआयत की; उसकी जीवन-धारा तथा उसकी वाणी बंधनमुक्त करने वाली अमरत्वप्रदायिनी है। कबीर जहां एक ओर उत्कृष्ट आदर्शवादी है, दूसरी ओर वह अनुपम व्यावहारिक भी। वह संसार के वाह्य प्रतीक और कर्मकांड का कट्टर शत्रु है। लोगों को वह विशुद्ध जीवनवाद के राजमार्ग पर आने का निमंत्रण देता है।


            कबीर कैसा समाज चाहते थे - यह भी देख लेना चाहिए :


            वह संसार को वहदानियत (एकेश्वरवाद) की ओर लाकर समस्त विश्व को प्रीतिपूर्ण भाई-चारे के व्यवसाय-स्थल की भांति देखने का अभिलाषी है। कर्मकांडवादियों - रीति नियमपालकों - की भांति वह जनता को मुक्ति के मिथ्या सब्ज़ बाग़ दिखाकर उन्हें गुमराह नहीं किया चाहता। वह जैसा अनुभव करता है, वैसा ही व्यवहार में लाता है, और दैनिक जीवन की कसौटी पर कस लेने के उपरांत वैसी ही चेतावनी लोगों को देता है। उसका मार्ग परीक्षा और कठिनाइयों का मार्ग है, जीवन को जीवन-रूप में ग्रहण करने का मार्ग हैमिथ्यात्व, आडंबर और गुरुडम को वहां कोई स्थान नहीं... रीति-नियम तथा कर्मकांड की वहां ज़रा भी गुजर नहीं; इसीलिए वह अपनी बात को अलंकारमय भाषा में नहीं कहता। उसका मार्ग सीधा है, भाषा और भाव भी उसके अनुरूप हैं। वह द्वैतवादी नहीं, इसलिए भाषण में भी द्वैत का अभ्यासी नहीं।  वह अपने मार्ग की दूरूहता को छिपाना नहीं चाहता। उस पर किसी भी प्रकार के आडंबर का ग़िलाफ़ नहीं चढ़ाना चाहता।


            औपनिवेशिक भारतीय समाज के लिए कबीर क्या कर सकते थे और उनके ऋण से उऋण कैसे हुआ जा सकता हैइस पर मंगलदेव शर्मा लिखते हैं :


            कबीर के हम पर अनेक उपकार हैं। यह समय है कि हम उनकी वाणी से लाभान्वित हों। आज हमारे समाज में केवल कर्मकांड का एकछत्र राज है। सांप्रदायिक कलह से आज समस्त भारतीय लोक-कलेवर दग्ध हो रहा है। ऐसे समय में यदि हिंदी-भाषा-भाषी कबीर की आत्मा का विशुद्ध दर्शन जनता को करा सकें, तो साहित्यिक, सामाजिक और धार्मिक तीनों रूपों से देश का कितना उपकार हो। चाहिए तो यह कि समस्त भारतवासी कबीर-मेला मनाने की चेष्टा करें; परंतु जितना भी हो सके, भला है। यह हम जानते हैं कि साहित्यिक और सामाजिक दृष्टि से कबीर के विरोधी हमारे समाज में हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत थोड़ी है। कबीर को कवि मानकर उनके काव्य में त्रुटियां ढूंढ़ना अनधिकार चेष्टा और धृष्टता है। कबीर जीवन के प्रत्येक व्यवहार में सरलता और स्वाभाविकता के कायल थे, इसीलिए उन्होंने गूढ़-से-गूढ़ तत्व को भी बोलचाल की भाषा में कहा है।  हमारे समस्त धर्म-ग्रंथ संस्कृत में हैं, और संस्कृत जनसाधारण की भाषा होने से सब लोग उन धर्म-ग्रंथों से लाभान्वित नहीं हो सकते, इसलिए कबीर ने संस्कृत कोकूपजलऔर भाषा - हिंदी - कोबहता नीरकहा है; और उनकी समस्त वाणी केवल हिंदी में है। संस्कृत की इस स्वाभाविक समीक्षा से पंडित-समुदाय रुष्ट हुआ, इसकी उन्होंने चिंता की। कबीर को कवि की दृष्टि से देखना भूल है, वे संदेशवाहक मिशनरी थे। हिंदी भाषा पर उनका महान् उपकार है।कबीर-मेलामनाकर हम अपने ऋण से ही उऋण होंगे।


            मंगलदेव शर्मा ने बनारसीदास चतुर्वेदी से एक निवेदन यह किया कि कबीर का आदर करने वाले मुसलमान भाइयों से भी कबीर-मेले में हम सहयोग प्राप्त करें, और मेले में मुसलमानों को सार्वजनिक रूप से निमंत्रित करें। मेरा अपना ख़याल है कि सूफ़ियाना विचारों के सैकड़ों मुसलमान हमारे निमंत्रण को स्वीकार करेंगे। कुछ आश्चर्य नहीं कि इस साहित्यिक कबीर-मेले में हम राष्ट्रघातिनी सांप्रदायिकता सुरसा के वध का कोई अनुष्ठान भी सोच सकें, और यह भी संभव है कि पंथवाद के चिर-अभ्यस्त हम लोग कबीर के नाम पर प्रचलित Ceromonelism रीतिवाद का अंत करके वास्तविक कबीर-जीवन का प्रचार कर सकें।


(दो)


           विशाल भारतने कबीर-मेले को आंदोलन का रूप दे दिया था। इस पर व्यापक बहस हुई। खंडवा से प्रकाशितकर्मवीरऔर सहारनपुर केविकासने मेले का समर्थन किया। आश्चर्य तो यह कि बनारस से प्रकाशितसनातन-धर्मने भी मेले का स्वागत करते हुए लिखा :


            कबीर के विषय में अभी हम बहुत अंधकार में हैं। उनकी साखियां और भजनों का एक भी सुंदर प्रामाणिक संस्करण अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ, यह हिंदी-भाषा-भाषियों के लिए कितनी लज्जा की बात है। श्री हरिऔध जी का संग्रह लोकप्रिय होते हुए भी अधूरा है। नागरी-प्रचारिणी-सभा ने हाल में कबीर-ग्रंथावली का जो संस्करण निकाला है, उसमें कई भाषाओं का पँचमेल गया है, और उससे पाठक कबीर के संबंध में कोई निश्चित मत निर्धारित नहीं कर सकते। भाषा दुरूह ही नहींकहीं-कहीं बुरी तरह बिगड़ी हुई भी है। उसे लोक-प्रिय बनना कठिन ही नहीं असंभव सा है।


लाली मेरे लाल की जित देखें तित लाल
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल

की गहरी अनुभूति को अपने हृदय में स्थापित, पल्लवित एवं विकसित करने वाले संत कबीर के संबंध में विश्व-भारती के बाबू क्षितिमोहन सेन ने बहुत अधिक शोध किया है। आपके पास कबीर पर ही एक सुबृहत् पुस्तकालय है। आपने गांव-गांव में जाकर, बहुत कष्ट सहकर कबीर के गीतों और भजनों का एक बहुत सुंदर संग्रह तैयार किया है। शायद पाठको को पता होगा कि रवींद्र बाबू पर कबीर का बहुत अधिक प्रभाव है, और यह शुभ प्रभाव क्षितिमोहन बाबू के ही कारण हुआ, जिसे रवींद्र बाबू ने मुक्तकंठ से स्वीकार किया है। क्षिति बाबू पिछली बार जब हिंदू विश्वविद्यालय में आए थे तो उन्होंने कहा था कि कम-से-कम एक दर्जन विद्वान 20 वर्ष तक उनके साथ काम कर सकें, तब जाकर कबीर के भजनों और गीतों पर पूरा-पूरा प्रकाश डाला जा सकता है। हिंदी-भाषा-भाषियों को एक और भी शुभ-संवाद सुनाना है किआनंदघनपर भी क्षिति बाबू ने बहुत मार्के के शोध किए हैं, और वे उन्हें एक रहस्यवादी प्रेम-कवि के रूप में जनता के सम्मुख रखने की चेष्टा कर रहे हैं। अस्तु।


            कबीर के संबंध में शोध करना हमारे लिए राष्ट्रीय, सामाजिक, धार्मिक आदि सभी दृष्टियों से लाभदायक सिद्ध होगा। कबीर हिंदू-मुस्लिम एकता की सजीव मूर्ति थे। सगुण-निर्गुण की विमल त्रिवेणी उनके संवेदनशील निर्मल हृदय में बहा करती थी, जिसमें सुधार की सरस्वती अप्रत्यक्ष रूप में विद्यमान थीं।


            कबीर के संबंध में हमें यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। गांव-गांव में, घर-घर मेंकहत कबीर सुनो भाई साधोकी ध्वनि गूँजा करती है। कबीर घर-घर में पैठ गए हैं, और अपनेपंथके अतिरिक्त भी उनका हिंदी-भाषा-भाषियों पर विशेष प्रभाव है। कबीर की साखियों और भजनों की विशेषता पर हम फिर कभी प्रकाश डालेंगे। अभी तो इतना ही निवेदन करना है किविशाल भारतका इस दिशा में प्रयत्न स्तुत्य है, और हम उनके प्रस्ताव को हृदय से समर्थन करते हुए भगवान से यह कामना करते हैं कि यह प्रयत्न सफल हो।” (विशाल भारत, अक्टूबर 1933)


            उत्तर प्रदेश के मिश्रिख (सीतापुर) में कबीर महासभा के छठवें वार्षिक अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास हुआ कि यह महासभा पूज्य बाबा राघवदास जी केकबीर-मेलावाले प्रस्ताव का, जिसके विषय में मासिक पत्रविशाल भारतमें बराबर आंदोलन किया जा रहा है, हार्दिक समर्थन करते हुए सहानुभूति प्रकट करती है, और अपने कबीर-पंथी भाइयों से अनुरोध करती है कि वह इस महान कार्य में यथोचित सहायता देते रहें।कबीर महासभा के इस प्रस्ताव का बनारसीदास चतुर्वेदी ने मुक्त कंठ से स्वागत करते हुए हर्ष जतलाया। (विशाल भारत, अप्रैल 1934)


(तीन)


            दिसंबर 1933 केविशाल भारतमें संत साहित्य के मर्मज्ञ परशुराम चतुर्वेदी का एक पत्र संपादक के नाम लिखा मिलता है। इस पत्र मेंविशाल भारतके विचारों पर प्रसन्नता व्यक्त की गई है और मेले का सहर्ष अनुमोदन भी। इस पत्र से ज्ञात होता है कि परशुराम चतुर्वेदी उस समय कबीर की रचनाओं का अध्ययन कर रहे थे। अपने आरंभिक अध्ययन में कबीर को वे इस रूप में पाते हैं :


            मेरे विचार में कबीर ने मानव-जीवन के लिए जिस विशुद्ध आदर्श की कल्पना की है, वह उच्चतम होने के साथ ही अत्यंत सरल तथा स्वाभाविक भी है। वह घनोन्मुक्त विस्तृत आकाश की भांति व्यापक और रमणीय है। उसमें तो पग-पग पर सचेत करते रहने वाले विधि-निषेध-विधायक आदेशों की आशंका है, और आपस की होड़ के कारण उत्पन्न किन्हीं काल्पनिक भावनाओं का संघर्ष ही है। वह नितांत स्वच्छ और सुंदर है। कबीर उसका आशय एकमात्र शब्दसहजद्वारा प्रकट करते हैं; किंतु उसमें जीवन्मुक्ति का अनुपम रहस्य भी सन्निहित है।


आगे लिखते हैं :


आदर्श और व्यवहार का सामंजस्य तथा विचार-स्वातंत्र्य जो कबीर की रचनाओं में दीख पड़ता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। यह सच है कि एक सीधी-सादी सी बात की ओर समुचित ध्यान देकर व्यर्थ के ढकोसलों में पड़ने वाले वर्तमान समाज की नासमझी से तंग आकर कबीर ने अपने मुख्य उद्देश्य को स्पष्ट करते समय प्रेमातिरेक अथवा शुद्ध-हृदयता के कारण कभी-कभी खरी-खोटी सुनाई हैं; किंतु वास्तव में वे एक बड़े ही सहृदय कवि हैं, और उनकी सहृदयता केवल शिक्षित समाज के ही प्रति सीमित रहकर सर्वसाधारण के लिए, बल्कि विशेष रूप से निर्दिष्ट है। यही कारण है कि उन्होंने गंभीर-से-गंभीर भावों को भी सरलातिसरल उदाहरणों द्वारा ही व्यक्त करने की चेष्टा की है।


कबीर की तरफ़ ध्यान दिए जाने के सवाल पर वे लिखते हैं :


कबीर का संदेश वास्तव में संपूर्ण मानव-समाज के लिए एक समान हितकर है; परंतु खेद की बात है कि आज तक सारे भारतवासियों की कौन कहे, कुल हिंदी-भाषा-भाषी तक उनके वास्तविक रूप से पूर्णतः परिचित हो पाए, और बहुतों की दृष्टि में वे अभी तक एक सांप्रदायिक नेतामात्र ही जान पड़ते हैं। कबीर की रचनाओं का अध्ययन जो इस समय एक सिरे से आरंभ हुआ है, वह अभी बहुत ही थोड़ी मात्रा में है। उसे और भी विस्तृत और गंभीर बनाने की आवश्यकता है। इस कारण ऐसे समय आपका प्रस्ताव कबीर के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करने अथवा उनकी रचनाओं को अधिकाधिक लोकप्रिय बनाने के साथ ही इस और उत्साह प्रदान करने की दृष्टि से भी उपयोगी सिद्ध होगा।


            परशुराम चतुर्वेदी कबीर-मेले का आयोजन सुचारु रूप से होने की बात करते हैं, भले ही उसमें दो साल का समय लग जाए। चतुर्वेदी जी चाहते हैं कि कबीर की रचनाओं का एक उत्तम प्रामाणिक संस्करण निकले। साथ ही उनके जीवन-चरित के प्रकाशन का भी प्रबंध हो। प्रामाणिक ग्रंथों के प्रकाशन पर इसलिए जोर दे रहे थे क्योंकिकबीर की रचनाओं में, विचार-गांभीर्य तथा उल्टवाँसी वाली वर्णन-शैली के कारण अनेक स्थलों पर दुरूहता गई है, जिस कारण सर्वसाधारण उनके मनोहर भावों को भलीभाँति समझने से बहुधा वंचित रह जाते हैं।


(चार)


            जनवरी 1934 केविशाल भारतमेंकबीर-मेलाशीर्षक स्तंभ में परशुराम चतुर्वेदी और मोतीदास ने अपने विचार रखे हैं। चतुर्वेदी जी ने कबीर अध्येताओं को सुझाव दिया कि वे अगर निम्न पाँच प्रकार के ग्रंथों की रचना कर दें तो हिन्दी समाज का भला होगाकबीर ग्रंथावली, कबीर-कोश, कबीर कसौटी वा संदेश, कबीर चरित और कबीर-संग्रह।


           मोतीदास नेविशाल भारतके नोटों को पढ़कर लिखा कि हिंदी संसार ने कबीर-मेले का समर्थन कर बुद्धिमानी का कार्य किया है। मोतीदास कबीर मतानुयायी थे। हिंदी संसार संत कबीर कोकबीरयाकबीरदासनाम से संबोधित करता था। अतः वे निवेदन करते हैं कि कबीर या कबीरदास लिखकरकबीरसाहबलिखना चाहिए : मेरी तुच्छ सम्मति मेंकबीरसाहबकोकबीरयाकबीरदासके नाम से लिखना या संबोधित करना अशिष्टतासूचक है। ऐसे विश्ववंद्य पुरुषों का संबोधन सम्मानित शब्दों से करने से जनता की अभिरुचि स्वभावतः उनकी ओर हो जाती है।


मोतीदास ने कबीर की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है :


        कबीरसाहब सारे विश्व के जनसमाज के हैं। उनकी अनुभूति एकदेशी, एकांगी नहीं है; किंतु सर्वदेशी सर्वांगीण है। उनकी साखियां केवलदोहेनहीं हैं; किंतु वह संसार कीसाक्षीगवाही (witness) देती हैं। और उनके शब्द संसार के झगड़े का फैसला देते हैं। कबीरसाहब की अनुभूति सर्वतोमुखी, करुणामय एवं सहृदयतापूर्ण है। कहीं-कहीं लोगों को उनके कठोर शब्द अखरते हैं। उन शब्दों का प्रयोग राग-द्वेष से नहीं हुआ है; किंतु जैसे रोग की गंभीरता में लाचार कड़ुवी औषधियों का प्रयोग करना पड़ता है, वैसे ही कबीरसाहब को भी निरुपायपांडे निपुन कसाईजैसे शब्दों का प्रयोग करना पड़ा है। समय की परिस्थिति ही ऐसी थी कि बिना ऐसे शब्द-प्रयोगों के जन-समाज में जाग्रति ही नहीं सकती थी। जैसे आजकल हम लोग सरकार के कार्य के प्रति अनादर व्यक्त करने के लिए कुछ शब्दों का प्रयोग व्याख्यानादि में करते हैं, जो राग-द्वेष से होकर केवल सुधार की पवित्र भावना से प्रयुक्त किए जाते हैं। जब सामान्य पुरुषों के बारे में यह बात है, तो कबीरसाहब तो एक महापुरुष थे। उनकी जन-कल्याण तत्परता इतनी सहानुभूतिपूर्ण थी कि उन्होंनेकहैं कबीर सुनो भाई साधोयासंतोंके रूप से सबकोभाईऔरविचारशीलजैसे आत्म-भाव और सम्मान-सूचक शब्दों से संबोधित किया है। ऐसी पवित्र भावना मेंराग-द्वेषकी जो सामान्य कोटि के मनुष्यों में बहुधा पाया जाता है, गंध तक नहीं सकती। कहां तक लिखूं; परंतु इतना जरूर है कि हिंदी के साहित्य सेवियों ने जितना समय तथा ध्यान शृंगारिक साहित्य की खोज और वृद्धि में दिया, उतना कबीरसाहब जैसे कवि और संत के साहित्य की खोज, अध्ययन एवं प्रचार के लिए नहीं दिया। हम लोग शेक्सपियर और गेटे का उद्धरण जरूर देंगे; किंतु कबीरसाहब का उद्धरण देना असंगत समझते हैं, क्योंकि हमारा ज्ञान ही उनके विषय में शून्य है।


(पाँच)


               मार्च 1934 केविशाल भारतमें लक्ष्मीकांत त्रिपाठी, एमए का लेखकबीर-मेले की उपयोगिताशीर्षक से मिलता है। यह लेख बहुत कुछ कहता है। कबीर ने अचानक हिंदी वालों का ध्यान क्यों खींचाइसका विस्तार से वर्णन है। पूरा लेख यों है :


            कबीर-मेले के आंदोलन को उठाकरविशाल भारतने स्तुत्य कार्य किया है।  कबीर साहब ने हिंदी-साहित्य, हिंदू-धर्म और समस्त भारतीय राष्ट्र की जो सेवा की है, उसका अनुमान पूर्णरूप से बहुत कम लोगों ने किया है। अशिक्षितों की बात तो जाने दीजिए, हमारे उच्च शिक्षा प्राप्त सज्जनों ने भी कबीर साहब के महत्व को नहीं समझा है। यह हमारे दुर्भाग्य की बात है। उनके नाम से तो प्रायः सभी परिचित हैं, और उनकी वाणी के एक-आध पद भी प्रायः सभी ने सुने हैं, किंतु उनके उच्च संवाद और उपदेश की महिमा तथा उनके अनुपम जीवन से लोग प्रायः अनभिज्ञ हैं। हमारे पढ़े-लिखे लोगों में से कुछ तो ऐसे हैं, जो कबीर साहब के महत्व का अनुमान उनके वर्तमान पंथानुयायियों के मानदंड से करते हैं। वर्तमान कबीरपंथी भी यद्यपि भारतीय जनता के अन्य संप्रदायों की तरह अशिक्षित है और उनमें भी दुर्गुणों की कमी नहीं है, तथापि मैं अपने निजी अनुभव से यह बात कहता हूं कि उनमें कुछ अनुकरणीय गुण भी हैं, जो अन्य पंथियों और जातियों में नहीं पाए जाते। फिर भी कबीरपंथ की वर्तमान दशा से कबीर की महत्ता प्रकट नहीं हो सकती। हमारे साहित्यिक महारथियों ने भी कबीर के महत्व को कुछ देर में समझ पाया। कारण यह है कि अभी 7-8 वर्ष पहले तक हिंदी में साहित्य-समीक्षा की जो प्रणाली थी, वह अलंकार नायका भेद आदि के प्रभाव से इतनी दबी हुई थी कि प्रत्येक बड़े से बड़े महाकवि का बड़प्पन इसी में समझा जाता था कि वह कितने अलंकारों का समावेश एक ही छन्द में कर सकता है। मिश्रबंधुओं ने अपनेहिंदी-नवरत्नका प्रथम संस्करण लिखते समय तक कबीर की अपेक्षा की। उन्हें देव, बिहारी आदि के तुल्य भी समझकर मिश्रबंधुओं ने नवरत्नों में गिना तक नहीं। यह बात नहीं है कि प्राचीन साहित्य-समीक्षकों ने कबीर की साहित्यिक महत्ता समझ पाई हो। भक्तप्रवर नाभादास तक ने कबीर जैसे सुधारवादी एवं उग्र परिवर्तन के पक्षपाती को अपनेभक्तमालमें आदर का स्थान प्रदान किया है। प्रियादास जी ने अपनीटीकामें कबीर साहब की जीवनी पर और भी अधिक प्रकाश डाला है। मराठी के प्रसिद्ध कवि महीपति ने अपने ग्रंथों में कबीर की पवित्र लीला का गुण-गान किया है।ग्रंथसाहबमें तो महात्मा कबीर का स्थान सर्वोपरि है।कबीर कही अनूठवाली उक्ति से भी हमारे पूर्वजों की साहित्य-मर्मज्ञता का कुछ परिचय मिलता है। परंतु इधर बीसवीं शताब्दी के पहले चरण के साहित्यालोचकों ने अलंकारप्रियता के वशीभूत होकर कबीर को शायद कभी ही नहीं माना। मैंने कुछ पुराने ढंग वाले समस्यापूरक तुक्कड़महाकवियोंसे इस विषय में बातचीत की। उनकी रायशरीफ़ में भी कबीर को कवि मानना सरस्वती का उपहास करना है। परंतु इधर कुछ वर्षों से कबीर साहब की साहित्यिक महिमा को नवीन समीक्षक निस्संकोच स्वीकार कर रहे हैं। मिश्रबंधुओं ने हिंदी-नवरत्न के नवीन संस्करण में अपने पुराने अपराध का प्रायश्चित किया है। नवीन शैली के आलोचक तो कबीर के भक्त ही हैं।


            इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि कबीर के संबंध में जो यह मत-परिवर्तन-सा हुआ है, उसमें ईसाई लेखकों और प्रचारकों के लेखों का पूरा प्रभाव पड़ा। सबसे पहले एच.एच. विलसन महोदय ने अपनेहिंदुओं के धार्मिक संप्रदायनामक ग्रंथ में कोई 100 वर्ष से अधिक हुए, कबीर पर एक बड़ा विचारपूर्ण निबंध लिखा था। कबीर की स्वच्छंद विचारधारा ईसाई लेखकों और प्रचारकों को इतनी अधिक पसंद आई और उसमें उन्हें ऐसे भाव मिले, जो उनकी समझ में साधारण हिंदू-मनोवृति के विरुद्ध जान पड़े। ऐसे बाग़ी विचार वाले उपदेश के शब्दों द्वारा ईसाई प्रचारकों को साधारण हिंदू धर्म की निंदा करने का भी अच्छा साधन उपलब्ध हो गया। इन लेखकों में से एकआध ने तो यहां तक कह डाला कि कबीर की विचारशैली इतनी अहिंदू है कि वह ईसाई-धर्म के सिद्धांतों से प्रभावित हुई होगी। 19वीं शताब्दी के अंतिम भाग में ऐतिहासिक पत्रिकाओं आदि में इस विषय पर काफी वाद-विवाद हुआ। अंत में उन लोगों ने स्वयं लड़-झगड़कर यह मत निश्चित कर लिया कि कबीर साहब के विचारों पर ईसाई-धर्म के सिद्धांतों के प्रभाव पड़ने की ऐतिहासिक संभावना नहीं जान पड़ती। उनके विचार स्वतंत्र, मौलिक और निजी अनुभव पर स्थित थे।


            कुछ भी हो, यह बात निःस्संकोच स्वीकार करनी पड़ेगी कि इन ईसाई लेखकों द्वारा कबीर के जीवन, उनके उपदेशों आदि की विशेष छानबीन हुई, उनके शब्दों का प्रकाश हुआ, उनके संबंध में हमारे ज्ञान की वृद्धि हुई और उनकी महत्ता की ओर हमारी आंखें खुलीं। करीब-करीब जिस समय महर्षि दयानंद अपनेसत्यार्थ-प्रकाशमें केवल धर्म-प्रचारक की दृष्टि से कबीर और उनके पंथ की आवेशपूर्ण भाषा में संकीर्ण आलोचना कर रहे थे, उसी समय विलसन महोदय कबीर का गुण-गान कर रहे थे। कुछ काल उपरांत डॉ. ग्रियर्सन, मि. मैकालिफ, विशप वेस्टकेट, श्री सीएफ एंड्रयूज, पादरी अहमदशाह, मि. फ़ारकूहर, मिस्टर की आदि महानुभावों ने अंग्रेजी में कबीर के संबंध में पर्याप्त साहित्य की सृष्टि की; और उनके ग्रंथों का प्रकाशन भी किया। इन लोगों के लेख और ग्रंथ अभी इस संबंध में प्रमाण कोटि में गिने जाते हैं। भारतीयों में डॉ. भांडारकर ने सबसे पहले कबीर का वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन किया।  इधर कवींद्र रवींद्र की पुस्तिकाकबीर के 100 पद्यके अंग्रेजी में प्रकाशित होते ही हमारी आंखें खुलीं, और हमें अपनी मूर्खता पर शर्म आई। जिस पुरुष को हमने गँवार, कुपढ़, ‘नीचजातियों का गुरु समझ कर उपेक्षा की दृष्टि से देखा था, जिसके अनगढ़ छंदों का हमारे विदग्ध साहित्य प्रेमियों और आचार्यों ने उपहास किया था, वह तो गुरुओं का भी गुरु निकाला। उसके सामने रवींद्र जैसे महाकवि भी माथा टेकते हैं। जिस महापुरुष का लोहा गुरु नानक-जैसे विचारशील महात्मा ने माना तथा गुरु गोविंद सिंह जैसे कर्मवीर महात्मा ने जिसका बौद्धिक प्रभुत्व स्वीकार किया, जिसकी अमर वाणी की धाक समस्त हिन्दुस्तान, पंजाब, राजपूताना, सिंधु, गुजरात, महाराष्ट्र आदि में फैली, जिससे उच्च अनुभवों को सूफ़ियों और संतों ने वेद-वाक्य की तरह सत्य माना, प्राचीनकाल के वैष्णव आचार्यों तक ने जिसकी महत्ता स्वीकार कर अपनी उदारता का परिचय दिया, और विदेशी विद्वानों तथा धर्म-प्रचारकों तक ने जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, उसकी उपेक्षा करना हमारे लिए कितना लज्जास्पद है, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। कबीर साहब ने हमारी वर्तमान समस्याओं को सुलझाने के लिए जो मार्ग 15वीं शताब्दी में दिखाया था, वह आज 500 वर्ष बीत जाने पर भी वैसा ही विशद बना हुआ है, बल्कि समय की कसौटी पर कसा जाकर वह और भी शुद्ध साबित हो गया है। हिंदू-मुस्लिम एकता का महामंत्र इस महात्मा ने उस कट्टरता के युग में फूँका था। उसका तात्कालिक प्रभाव सिख-धर्म के रूप में व्यक्त हुआ, तथा अनेक सुधारकों और कवियों के उपदेशों में उसकी प्रतिध्वनि हुई। धार्मिक सहिष्णुता की आवश्यकता सम्राट अशोक ने अपने अमर वाक्यों में अब से 2300 वर्ष पहले बतलाई थी। अशोक की भाषा शांत रस से भरी हुई है, उनकी शब्दावली कोमलता और मार्दव की साक्षात् मूर्ति है। कबीर की भाषा उग्र है, उनकी बानी में सर्जन के चाकू से भी अधिक तीव्रता है। उनके व्यंग्यों में हृदय को बेधने की शक्ति है। जिस भाव को अशोक अपनी स्वभावजन्य कोमलता से व्यक्त करता है, उसी बात को कबीर साहब तीक्ष्ण उपहास तथा उत्कट व्यंग्य के द्वारा प्रकट करते हैं। कबीर की वाणी के प्रचार से हमारे राष्ट्र की अनेक गुत्थियां सुलझ सकती हैं; हमारी धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक मनोवृति में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता है और एक नई परिमार्जित राष्ट्रीय संस्कृति की स्थापना हो सकती है। हमारे साहित्य में कबीर का फूँका हुआ मंत्र काफी प्रभाव दिखा रहा है। भविष्य में और अधिक व्यापक रूप में हमारे साहित्य की धारा को वह प्रभावित करेगा। हमारे समाज से छुआछूत का कलंक मिट जाएगा, जाति-पाँति का भेद दूर हो जाएगा, अनिष्टकारी कुरीतियां नष्ट हो जायंगी। हमारा धर्म सहिष्णुता की मूर्ति होकर हिंदू-मुसलमानों को एक सूत्र में ग्रथित करेगा। हमारी रुढ़ियां और हमारे मूढ़-विश्वास हमारी मानसिक उन्नति को बाधा पहुंचाकर उसे अग्रसर करेंगे। कबीर-वाद के प्रचार से ये सब विभूतियां हमें प्राप्त होंगी। इसीलिए मैंविशाल भारतके कबीर-मेले वाले प्रस्ताव का हृदय से स्वागत करता हूं।


            कानपुर-नागरी-प्रचारिणी सभा ने 4 वर्ष पहले छोटे रूप में कबीर-उत्सव की योजना पर विचार किया था। परन्तु कई कारणों सेविशेषकर उसके अधिकारियों के निरुद्योग से (यह लेखक उस समय उक्त सभा का प्रधानमंत्री था), पूरा हो सका। मुझे अत्यन्त प्रसन्नता है कि अब श्रीयुत सुंदरलाल जी तथा बाबा राघवदास जी के सुयोग्य हाथों द्वारा सुसंपादित होगा।




सुजीत कुमार सिंह
हिंदी विभागगवर्नमेंट पीजी कॉलेज, हमीरपुर (.प्र.)
सम्पर्क : 9454351608

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक ई-पत्रिका 
  अपनी माटी (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-50, जनवरी, 2024 UGC Care Listed Issue
विशेषांक : भक्ति आन्दोलन और हिंदी की सांस्कृतिक परिधि
अतिथि सम्पादक : प्रो. गजेन्द्र पाठक सह-सम्पादक :  अजीत आर्यागौरव सिंहश्वेता यादव चित्रांकन : प्रिया सिंह (इलाहाबाद)

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